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शशकासन योग के फायदे

शशकासन योग के फायदे


शशक का का अर्थ होता है खरगोश। इस आसन को करते वक्त व्यक्ति की जैसी आकृति बन जाती है इसीलिए इसे शशकासन कहते हैं। इस आसन को कई तरीके से किया जाता है यहां प्रस्तुत है सबसे सरल तरीका।
आसन विधि : सबसे पहले वज्रासन में बैठ जाएं और Sasakasana Yogaफिर अपने दोनों हाथों को श्वास भरते हुए ऊपर उठा लें। कंधों को कानों से सटा हुआ महसूस करें। फिर सामने की ओर झुकते हुए दोनों हाथों को आगे समानांतर फैलाते हुए, श्वास बाहर निकालते हुए हथेलियां को भूमि पर टिका दें। फिर माथा भी भूमि पर टिका दें। कुछ समय तक इसी स्थिति में रहकर पुनः वज्रासन की‍ स्थिति में आ जाइए।
सावधानी : यदि आपके पेट और सिर में कोई गंभीर समस्या हो तो यह आसन नहीं करें। हाथों को सिर के ऊपर उठाते समय कंधों से उन्हें ऊपर की ओर प्रेस करें जिससे सामने फैलाते समय कोई दिक्कत नहीं होगी।
इसका लाभ : हृदय रोगियों के लिए यह आसन लाभदायक है। यह आसन पेट, कमर व कूल्हों की चर्बी कम करके आंत, यकृत, अग्न्याशय व गुर्दों को बल प्रदान करता है। इस आसन के नियमित अभ्यास से तनाव, क्रोध, चिड़चिड़ापन आदि मानसिक रोग भी दूर हो जाते हैं।

योग भगाए रोग

योग भगाए रोग
बरसात में भीगना और बीमार होना आम बात है, ऎसे में इन दिनों योगासनों के जरिए रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा कर अधिक स्वस्थ रहा जा सकता है। 
मानसून में बारिश की गिरती बूंदे अमृत के समान लगती हैं, लेकिन इन दिनों हमारी थोड़ी-सी लापरवाही कई बीमारियों का सबब बन जाती है। इन दिनों संक्रमण के कारण पेट दर्द, सर्दी, अस्थमा, त्वचा रोग, जोड़ो में दर्द आदि बीमारियों का खतरा बना रहता है। ऎसे में योग के जरिए शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर इन बीमारियों से बचा जा सकता है। 
हस्त उत्तानासन
पंजों को मिला कर खड़े हो जाएं, सांस लेते हुए दोनों हाथों को ऊपर उठाएं और कंधे के बराबर में फैलाकर गर्दन पीछे ले जाएं। सांस रोक कर रखें, अब धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए दोनों हाथों को नीचे ले आएं। इसे 10 बार करें।
फायदा

इससे रीढ़ की हड्डी समेत कंधों के जोड़ों में फैलाव होSasakasana Yogaता है, श्वसन तंत्र ठीक रहता है और सुस्ती खत्म होती है। 
धनुरास
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पेट के बल लेट जाएं। दोनों पांवों को घुटने से मोड़ कर शरीर के पास लाएं। हाथों से एडियों को पकड़ लें और सांस लेते हुए सिर को ऊपर उठाएं, अब सांस छोड़ते हुए नीचे आएं।
फायदा
यह शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। ऑक्सीजन की उचित आपूर्ति होने से उदर संबंधी रोगों में आराम मिलता है। 
मत्स्यासन
पीठ के बल लेट जाएं। दोनों हाथों को कमर के पास रखें, अब हाथों का सहारा लेते हुए गर्दन को ऊपर उठाएं और सिर के ऊपरी भाग को जमीन पर रखें, जितना संभव हो, इस आसन में रूकें।
फायदा
बच्चों की गर्दन के नीचे स्थित थाइमस ग्रंथि प्रतिरोधी क्षमता देती है, खास बात यह है कि आठ साल की उम्र के बाद यह छोटी होने लगती है, इस आसन के जरिए ग्रंथि की सक्रियता को बढ़ाया जा सकता है।
योगिक ब्रीथिंग
इसे लेट कर या बैठ कर भी कर सकते हैं । पेट से सांस लें, अब पेट से सांस भरते हुए सात तक गिने, एक क्षण के लिए रूकें, फिर सात तक गिनते हुए सांस छोड़ें और पेट को अंदर की तरफ ले जाएं। एक क्षण के लिए रूकें और इस चक्र को दोहराएं। ऎसे सात चक्र करें।
फायदा
यह विधि हमारे शरीर में प्राण ऊर्जा का विस्तार करती https://www.healthsiswealth.com/है। इसके जरिए हम वातावरण से ऊर्जा को लेते हैं और इस ऊर्जा को हमारा शरीर अच्छे स्वास्थ्य के लिए इस्तेमाल करता है। इस श्वसन विधि से मानसिक शांति बढ़ती है। 
योग करें, धूम्रपान से छुटकारा पाएं
धूम्रपान के नुकसान से तो हर कोई वाकिफ है, लेकिन इस लत को छोड़ पाने में सभी बेहद लाचार साबित होते हैं। लेकिन ताजा अध्ययन में पता चला है कि योग के जरिए धूम्रपान की लत से छुटकारा पाने में आसानी होती है। प्राण योग के विशेषज्ञ दीपक झा ने बताया कि योग, धूम्रपान छोड़ने का एक समग्र समाधान है। साथ ही दीपक यह भी बताते हैं कि योग केवल धूम्रपान की आदतों से ही लोगों को दूर नहीं रखता बल्कि शरीर पर हुए दुष्प्रभाव को भी दूर कर देता है। धूम्रपान छोड़ने के लिए यूं तो बाजार में तमाम तरह के रासायनिक विकल्प उपलब्ध हैं, लेकिन इनके सहारे धूम्रपान छोड़ना उतना आसान नहीं होता।

सिगरेट के धुएं से निकलने वाला विषाक्त पदार्थ शरीर में प्रवेश कर खून का गाढ़ाhttps://www.healthsiswealth.com/पन बढ़ा देता है और धीरे-धीरे एक थक्के के रूप में जम जाता है। यह रक्तचाप और हृदय की गति को भी प्रभावित करता है। साथ ही यह धमनियों को संकरा कर अंगों में ऑक्सीजन युक्त रक्त परिसंचरण की मात्रा को कम कर देता है। दीपक झा दावे के साथ कहते हैं, "धूम्रपान के दुष्प्रभावों से बचने के लिए योग एक अच्छा तरीका है। योगासन और श्वसन से संबंधित व्यायाम धूम्रपान के प्रभाव को खत्म करके फेफड़ों की दशा में सुधार लाते हैं। ध्यान और शुद्धि विषाक्त पदार्थो को शरीर से दूर कर कोशिकाओं को उत्साहित करने में मदद करता है।" झा ने कहा, "योग की सहज श्वास तकनीक को प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम से शरीर पूरी तरह से चुस्त रहता है, साथ ही तनाव और चिंता दूर होती है और आत्मविश्वास भी बढ़ता है।" दीपक के अनुसार, निम्नलिखित योगासनों और प्राणायाम से धूम्रपान की लत से छुटकारा पाने में मदद मिलती है। योगासन : सर्वागासन (शोल्डर स्टैंड), सेतु बंधासन (ब्रिज मुद्रा), भुजंगासन (कोबरा पोज), शिशुआसन (बाल पोज)। प्राणायाम : सहज प्राणायाम, भसीदा प्राणायाम, नाड़ी शोधन प्राणायाम (नोस्ट्रिल ब्रीदिंग तकनीक)। उल्लेखनीय है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक दुनियाभर में हर साल लगभग 54 लाख लोगों की तंबाकू के इस्तेमाल की वजह से मौत हो जाती है। औसतन हर छह सेकेंड में एक व्यक्ति की मौत हो रही है जिसमें लगभग हर दसवां व्यक्ति वयस्क होता है।

कमर दर्द के लिए 4 योगासन



कमर का दर्म कमर तोड़ देता है। कमर का दर्द असहनीय होता है। पीठ दर्द, कमर दर्द, सरवाइकल और कमर से जुड़ी अन्य समस्याएं आम हो गई है। डॉक्टर भी कहते हैं कि इसका सबसे अच्छा इलाज योग (Yoga for Back pain) ही है। आओ जानते हैं कि वह कौन से आसन हैं जिससे कमर का दर्द ठीक हो जाता है। ये चार आसन है- मकरासन, भुजंगासन, हलासन और अर्ध मत्येन्द्रासन। 
1.मकरासन ( makarasana ) : मकरासन की गिनती पेट के बल लेटकर किए जाने वाले आसनों में की जाती है। इस आसन की अंतिम अवस्था में हमारे शरीर की आकृति मगर की तरह प्रतीत होती है इसीलिए इसे मकरासन कहते हैं। मकरासन से जहां दमा और श्वांस संबंधी रोग समाप्त हो जाते हैं वहीं यह में रामबाण औषधि है।

2.भुजंगासन ( bhujangasana ) : भुजंगासन की गिनती भी पेट के बल लेटकर किए जाने वाले आसनों में की जाती है। इस आसन की अंतिम अवस्था में हमारे शरीर की आकृति फन उठाए सांप की तरह प्रतीत होती है इसीलिए इसे भुजंगासन कहते हैं।

3.हलासन ( halasana ) : दो आसन पेट के बल करने के बाद अब पीठ के बील किए जाने वाले आसनों में हलासन करें। हलासन करते वक्त शरीर की स्थित हल के समान हो जाती है इसीलिए इसे हलासन कहते हैं।
4.अर्ध-मत्स्येन्द्रासन ( ardha matsyendrasana ) : यह आसन सबसे महत्वपूर्ण है। कहते हैं कि मत्स्येन्द्रासन की रचना गोरखनाथ के गुरु स्वामी मत्स्येन्द्रनाथ ने की थी। वे इस आसन में ध्यानस्थ रहा करते थे। मत्स्येन्द्रासन की आधी क्रिया को लेकर ही अर्ध-मत्स्येन्द्रासन प्रचलित हुआ।

शरीर और मन की शांति के लिये बालासन


माना जाता है कि मां की कोख से अच्‍छी आराम की जगह और कोई नहीं होती। तभी तो जब आप इस अवस्‍था में कभी लेटते हैं तो शरीर और दिमाग दोनों को ही आराम पहुंचता है। बालासन योग का अभ्‍यास आप अपने शरीर को आरामदायक स्थिति में लाने के लिए कर सकते हैं। इस आसन से मेरूदंड और कमर में खींचाव होता है और इनमें मौजूद तनाव दूर होता है। बालाअसन करने के फायदे- यह पीठ, कंधे और गर्दन के तनाव को दूर करता है। शरीर के भीतरी अंगो में लचीलापन लाता है। अगर गर्दन और कमर में दर्द रहता है तो वह भी ठीक हो जाता है। शरीर और दिमाग को शांति देता है। घुटनों और मासपेशियों को स्‍ट्रेच करता है।
सावधानी जिन लोगों को उच्च रक्तचाप की समस्या हो अथवा घुटनों में परेशानी हो उन्हें इस योग का अभ्यास नहीं करना चाहिए। योग क्रिया - स्टेप 1 पलथी लगाकर बैठें स्टेप 2 अपने ऐड़ियों पर बैठें और शरीर के ऊपरी भाग को जंघाओं पर टिकाएं स्टेप 3 सिर को ज़मीन से लगाएं स्टेप 4 अपने हाथों को सिर से लगाकर आगे की ओर सीधा रखें और हथेलियों को ज़मीन से लगाएं स्टेप 5 अपने हिप्स को ऐड़ियों की ओर ले जाते हुए सांस छोड़े स्टेप 6 इस अवस्था में 15 सेकेण्ड से 2 मिनट तक रहें

प्राणायाम से दूर होते हैं ये रोग


के 8 अंगों में का स्थान चौथे नंबर पर आता है। प्राणायाम को में मन, मस्तिष्क और शरीर की औषधि माना गया है। चरक ने वायु को मन का नियंता एवं प्रणेता माना है। आयुर्वेद अनुसार काया में उत्पन्न होने वाली वायु है उसके आयाम अर्थात निरोध करने को प्राणायाम कहते हैं। आओ जानते हैं कैसे करें प्राणायाम और कौन-सा मिटेगा प्राणायाम से...
प्राणायाम की शुरुआत : प्राणायाम करते समय 3 क्रियाएं करते हैं- 1.पूरक, 2.कुंभक और 3.रेचक। इसे ही हठयोगी अभ्यांतर वृत्ति, स्तम्भ वृत्ति और बाह्य वृत्ति कहते हैं।
(1) पूरक- अर्थात नियंत्रित गति से श्वास अंदर लेने की क्रिया को पूरक कहते हैं। श्वास धीरे-धीरे या तेजी से दोनों ही तरीके से जब भीतर खींचते हैं तो उसमें लय और अनुपात का होना आवश्यक है।
(2) कुंभक- अंदर की हुई श्वास को क्षमतानुसार रोककर रखने की क्रिया को कुंभक कहते हैं। श्वास को अंदर रोकने की क्रिया को आंतरिक कुंभक और श्वास को बाहर छोड़कर पुन: नहीं लेकर कुछ देर रुकने की क्रिया को बाहरी कुंभक कहते हैं। इसमें भी लय और अनुपात का होना आवश्यक है।
(3) रेचक- अंदर ली हुई श्वास को नियंत्रित गति से छोड़ने की क्रिया को रेचक कहते हैं। श्वास धीरे-धीरे या तेजी से दोनों ही तरीके से जब छोड़ते हैं तो उसमें लय और अनुपात का होना आवश्यक है।
पूरक, कुंभक और रेचक की आवृत्ति को अच्छे से समझकर प्रतिदिन यह प्राणायाम करने से कुछ रोग दूर हो जाते हैं। इसके बाद आप भ्रस्त्रिका, कपालभाती, शीतली, शीतकारी और भ्रामरी प्राणायाम को एड कर लें।
योगकुडल्योपनिषद के अनुसार प्राणायाम से गुल्म, जलोदर, प्लीहा तथा पेट संबंध सभी पूर्ण रूप से खत्म हो जाते हैं। प्राणायाम द्वारा 4 प्रकार के वात दोष और कृमि दोष को भी नष्ट किया जा सकता है। इससे मस्तिष्क की गर्मी, गले के कफ संबंधी रोग, पित्त-ज्वर, प्यास का अधिक लगना आदि रोग भी दूर होते हैं।
नाड़ी शोधन के लाभ : नाड़ी शोधन के नियमित अभ्यास से मस्तिष्क शांत रहता है और सभी तरह की चिंताएं दूर हो जाती हैं। 3 बार नाड़ी शोधन करने से रक्त संचार ठीक तरह से चलने लगता है। इसके नियमित अभ्यास से बधिरता और लकवा जैसे रोग भी मिट जाते हैं। इससे शरीर में ऑ‍क्सीजन का लेवल बढ़ जाता है।
भस्त्रिका के लाभ : प्रतिदिन 5 मिनट भस्त्रिका प्राणायाम करने से रक्त शुद्ध हो जाता है। सर्दी-जुकाम और एलर्जी दूर हो जाती है। मस्तिष्क को फिर से उर्जा प्राप्त होती है।
कपालभाती प्राणायाम : कपालभाती से गैस, कब्ज, मधुमेह, मोटापा जैसे रोग दूर रहते हैं और मुखमंडल पर तेज कायम हो जाता है।
बाह्म प्राणायाम : 5 बार बाह्य प्राणायाम करने से मन की चंचलता दूर हो जाती है। इसके अलावा उदर रोग दूर होकर जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है।
अनुलोम-विलोम : 10 मिनट अनुलोम-विलोम करने से सिरदर्द ठीक हो जाता है। नकारात्मक चिंतन से चित्त दूर होकर आनंद और उत्साह बढ़ जाता है।
भ्रामरी : 11 बार भ्रामरी करने से जहां तनाव दूर होता है वहीं रक्तचाप और हृदयरोग में लाभ मिलता है। इससे अनिद्रा में भी लाभ मिलता है।
उज्जायी प्राणायाम : 5 बार उज्जायी करने से कफ का निदान होकर गला मधुर हो जाता है। सर्दी-जुकाम में भी यह लाभदायक है। इसके नियमित अभ्यास से हकलाना ठीक हो जाता है।
सीत्कारी : 11 बार सीत्कारी करने से पायरिया दूर हो जाता है और दांत का कोई भी रोग नहीं होता।
शीतली : इस प्राणायाम से पित्त, कफ, अपच जैसी बीमारियां बहुत जल्द समाप्त हो जाती हैं। शास्त्र के अनुसार लंबे समय तक इस प्राणायाम के नियमित अभ्यास से व्यक्ति पर जहर का भी असर नहीं होता। 11 बार शीतली कर भूख-प्यास पर कंट्रोल किया जा सकता है और मुंह व गले के रोग सहित पित्त संबंधी रोग भी मिट जाते हैं। इससे शरीर शीतल बना रहता है।

डायबि‍टीज और तोंद को कंट्रोल करे कुर्मासन योग


कुर्म का अर्थ होता है कछुआ। इस आसन को करते वक्त व्यक्ति की आकृति कछुए के समान बन जाती है इसीलिए इसे कुर्मासन कहते हैं।
कुर्मासन की विधि : सबसे पहले आप वज्रासन में बैठ जाएं। फिर अपनी कोहनियों को नाभि के दोनों ओर लगाकर हथेलियों को मिलाकर ऊपर की ओर सीधा रखें।
इसके बाद श्वास बाहर निकालते हुए सामने झुकिए और ठोड़ी को भूमि पर टिका दें। इस दौरान दृष्टि सामने रखें और हथेलियों को ठोड़ी या गालों से स्पर्श करके रखें। कुछ देर इसी स्थिति में रहने के बाद श्वास लेते हुए वापस आएं।
यह आसन और भी कई तरीकों से किया जाता है, लेकिन सबसे सरल तरीका यही है।
दूसरी विधि : सबसे पहले दंडासन की स्थिति में बैठ जाएं। फिर दोनों घुटनों को थोड़ा-सा ऊपर करके कमर के बल झुकते हुए दोनों हाथों को घुटनों के नीचे रखते हुए उन्हें पीछे की ओर कर दें। इस स्थिति में हाथों की बांहे घुटनों को स्पर्श करती हुई और हथेलियां पीछे की ओर भूमि पर टिकी हुई रहेगी।
इसके पश्चात्य धीरे-धीरे ठोड़ी को भूमि पर टिका दें। यह स्थिति कुर्मासन की है। सुविधा अनुसार कुछ देर तक रहने के बाद वापस लौट आएं।
कुर्मासन का लाभ : यह आसन डायबि‍टीज से मुक्ति दिलाता है क्योंकि इससे पेन्क्रियाज को सक्रिय करने में मदद मिलती है। यह आसन उदर के रोगों में भी लाभदयक है।
डायबिटिज कंट्रोल करने के लिए आप यह आसन-प्राणायाम भी कर सकते हैं- 1.शवासन, 2.हलासन, 3.पवन मुक्तासन, 4.शलभासन, 5.धनुरासन, 6.वक्रासन, 7.उष्ट्रासन, 8.योगमुद्रा, 9. ताड़ासन और अनुलोम-विलोम।

योग से गैस की दिक्कत को यूं करें गायब


 योग से गैस की दिक्कत को यूं करें गायब
पेट गैस को अधोवायु बोलते हैं। इसे पेट में रोकने से कई बीमारियां हो सकती हैं, जैसे एसिडिटी, कब्ज, पेटदर्द, सिरदर्द, जी मिचलाना, बेचैनी आदि। लंबे समय तक अधोवायु को रोके रखने से बवासीर भी हो सकती है। आयुर्वेद कहता है कि आगे जाकर इससे नपुंसकता और महिलाओं में यौन रोग होने की भी आशंका हो सकती है।
गैस बनने के लक्षण 

पेट में दर्द, जलन, पेट से गैस पास होना, डकारें आना, छाती में जलन, अफारा। इसके अलावा, जी मिचलाना, खाना खाने के बाद पेट ज्यादा भारी लगना और खाना हजम न होना, भूख कम लगना, पेट भारी-भारी रहना और पेट साफ न होने जैसा महसूस होना।

शराब पीने से, मिर्च-मसाला, तली-भुनी चीजें ज्यादा खाने से, बींस, राजमा, छोले, लोबिया, मोठ, उड़द की दाल, फास्ट फूड, ब्रेड और किसी-किसी को दूध या भूख से ज्यादा खाने से। खाने के साथ कोल्ड ड्रिंक लेने से। इसमें गैसीय तत्व होते हैं। तला या बासी खाना।
लाइफस्टाइल 

टेंशन रखना। देर से सोना और सुबह देर से जागना। खाने-पीने का टाइम फिक्स्ड न होना।

बाकी वजहें 

लीवर में सूजन, गॉल ब्लेडर में स्टोन, फैटी लीवर, अल्सर या मोटापे से। डायबीटीज, अस्थमा या बच्चों के पेट में कीड़ों की वजह से। अक्सर पेनकिलर खाने से। कब्ज, अतिसार, खाना न पचने व उलटी की वजह से।

गैस में योग 
– कपालभाति व अग्निसार क्रिया, उत्तानपादासन, पवनमुक्तासन, हृदयस्तम्भासन, नौकासन, मंडूकासन, अर्द्धमत्स्येंद्रासन, पश्चिमोत्तानासन, वज्रासन व उडियान बंध आसन करने से आराम मिलता है।

– आमतौर पर नाभि हिलने से भी पेट में गैस बनने लगती है। पहले उसे ठीक कर लें। उसके लिए पादागुष्ठनासा स्पर्श आसन करें।
आसन करते वक्त बरतें सावधानी

बीपी और दिल के मरीज कपालभाति बहुत धीरे-धीरे करें। जिनका हाल में पेट का ऑपरेशन हुआ हो, वे यह क्रिया न करें। पेट का ऑपरेशन, हर्निया और कमर दर्द में अग्निसार क्रिया न करें। हाई बीपी या कमर दर्द हो तो उत्तानपादासन एक पैर से करें। घुटनों में दर्द हो तो वज्रासन व मंडूकासन नहीं करना चाहिए।
पानी खाइए, खाना पीजिए 

यानी खाना इतना चबा लें कि बिल्कुल पानी की तरह तरल बनने पर ही पेट में उतरें, नहीं तो दांतों का काम आंतों को करना पड़ता है। अच्छी तरह चबाया हुआ खाना अंदर जाएगा तो आंतों पर लोड कम पड़ेगा और खाना जल्दी पचेगा। जबकि पानी को इतना धीरे घूंट-घूंट कर पीएं, जैसे खा रहे हों। इससे पानी के साथ अंदर जाने वाली हवा पेट में नहीं जा पाती और पेट गैस से भरता नहीं है।
– सुबह दांत साफ करते वक्त तालू को साफ करने से अंदर रुकी हुई गैस निकल जाती है और आंखों की रोशनी भी बढ़ती है।
– हर तीन घंटे में कुछ खा लें, लेकिन ठूंसकर न खाएं, खाने के साथ पानी न पीएं, दिन में तीन-चार बार गर्म पानी पीएं, खाकर एकदम न सोएं, एक्टिव लाइफ स्टाइल रखें, एक जगह ज्यादा देर बैठे न रहें।
– एक्सर्साइज करें, इससे गैस की आशंका काफी हद तक कम हो जाती है।

क्या खाएं 

– फ्रूट और सब्जियां ज्यादा-से-ज्यादा खाएं। सब्जियों को ज्यादा तलें नहीं।
– साबुत की बजाय धुली व छिलके वाली दालें खाएं।
– सोयाबीन की बड़ियां खाएं।
– दही व लस्सी का प्रयोग करें।
– नीबू-पानी-सोडा, नारियल पानी, शिकंजी या बेल का शर्बत पीना अच्छा है।
– आइसक्रीम और ठंडा दूध ले सकते हैं।
– बादाम व किशमिश लें, पर काजू कम मात्रा में लें।
– सौंफ, हींग, अदरक, अजवायन व पुदीने का प्रयोग करना अच्छा है।
-मोटा चावल खाएं। यह कम गैस बनाता है, जबकि पॉलिश वाला चावल ज्यादा गैस बनाता है। पुलाव के बजाय चावल उबालकर खाएं।
– खाना सरसों के तेल में पकाएं। देसी घी भी ठीक है, लेकिन मात्रा सीमित रखें। वनस्पति घी और रिफाइंड से बचें।

इनसे बचें 

– तेल-मक्खन व क्रीम आदि ज्यादा न लें।
– मैदे और रिफाइंड आटे से बनी चीजें और बेकरी प्रॉडक्ट जैसे कुलचे, पूरी, ब्रेड पकौड़ा, छोले-भटूरे, परांठे, बंस, बिस्कुट, पैटीज, बर्गर व फैन आदि कम खाएं।
– नमकीन, भुजिया, मट्ठी कम खाएं।
-चना, राजमा, उड़द व मटर आदि का प्रयोग कम करें। इन्हें बनाने से पहले भिगो लें। जिस पानी में भिगोएं, उसको इस्तेमाल करके के बजाय फेंक दें।
– चाय-कॉफी ज्यादा न पीएं। खाली चाय पीने से भी गैस बनती है।
– गर्म दूध भी गैस बनाता है। अल्सर वाले ठंडा दूध लें।
– सॉफ्ट-ड्रिंक्स या कोल्ड-ड्रिंक्स न पीएं।
– मोटी इलायची, तेजपत्ता, लौंग, जावित्री, जायफल आदि साबुत मसाले तेज गंध होने से पेट को नुकसान पहुंचाकर गैस की वजह बनते हैं। इन्हें पीसकर और कम मात्रा में लें।
– राजमा, छोले, उड़द, लोबिया या साबुत दालों से गैस बन सकती है।
– अरबी-भिंडी और राजमा से परहेज रखें।
– कच्चा लहसुन, कच्चा प्याज व अदरक भी गैस बनाता है।
– मूली-खीरे आदि से गैस की शिकायत हो तो उनका परहेज करें।
– अगर खाने का ज्यादातर हिस्सा फैट या कार्बोहाइड्रेट से आता है यानी रोटी, आटा व बेसन आदि ज्यादा खाते हैं तो गैस ज्यादा बनेगी।
– संतरा व मौसमी आदि एसिडिक फलों के रस से गैस बनती है। जूस के बजाय ताजे फल खाएं।
– खाली पेट दूध पीने और खाली पेट फल खासकर सेब और पपीता खाने से गैस बनती है।

लंबाई बढ़ाए उर्ध्वोत्तानासन योगासन


लंबाई बढ़ाए उर्ध्वोत्तानासन योगासन
उर्ध्वोत्तानासन को रीढ़ विकृतियों में, कमजोर पैरों की स्थिति में, मोटापे में, ड्रॉपिंग शोल्डर व नैरो चेस्ट की स्थिति में योग चिकित्सक की सलाह अनुसार करना चाहिए तो लाभ मिलेगा। यह अति उत्तम और सरल आसन आपको स्फूर्तिवान और प्रसन्नचित्त बनाए रखने में सक्षम है।
आसन परिचय : उर्ध्व का अर्थ होता है ऊपर और तान का अर्थ तानना अर्थात शरीर को ऊपर की और तानना ही उर्ध्वोत्तानासन है। अनजाने में ही व्यक्ति कभी-कभी आलसवश दोनों हाथ ऊपर करके शरीर तान देता है। शरीर को ऊपर की ओर तानते हुए त्रिबंध की स्थिति में स्थिर रहना चाहिए।
आसन विधि :

*सबसे पहले सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाएं। रीढ़ व गर्दन एक सीध में रखें। इस दौरान श्वास-प्रश्वास की गति सामान्य बनाए रखें। 

* इसके बाद श्वास भरते हुए कंधों को पीछे कर हाथों को बगल से धीरे-धीरे ऊपर उठाएं। कंधे की सीध में आने पर हथेली की दिशा आसमान की ओर करते हुए हाथों को कान से लगा दें।
* फिर कोहनियों को मोड़ते हुए विपरीत भुजाओं को पकड़े। गर्दन नीचे झुकाएं।
* अब पंजे के बल रहते हुए एड़ी उठाएं, फिर श्वास भरते हुए पंजों पर दबाव, पिण्डलियों में कसावट, जंघा की मांसपेशियों को ऊपर की ओर खींचें। नितंब को कसावट देते हुए नाभि अंदर, सीना बाहर पूरी श्वास भर लें। इस दौरान श्वास-प्रश्वास सामान्य बनाए रखें।
जंघा की मांसपेशियों को ऊपर उठाते समय घुटना भी ऊपर आएगा। ध्यान रखें इसे उठाएं पर पीछे की ओर न दबाएं।
* अब धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए नाभि को संकुचित कर उड्डीयन बंध लगाकर मूलबंध भी लगा लें। बाद में कुंभक की स्थिति में कुछ क्षण रुकें।
* अंत में वापस आने के लिए धीरे-धीरे विपरीत क्रम से बंध खोलते हुए वापस उसी स्थिति में आएं, जहां से आसन प्रारंभ किया था।
* यह आसन और भी कई तरीकों से किया जाता है।
इसके लाभ : इस आसन के नियमित अभ्यास से मोटापा और शरीर की अतिरिक्त चर्बी दूर होती है। इससे डायबिटीज के मरीजों को लाभ मिलता है। रीढ़ लचीली बनने से लंबाई बढ़ाने में लाभ मिलता है। पाचन संबंधी रोग दूर होने से शरीर स्फूर्त व मन प्रफुल्लित रहता है।

घुटनों के लिए जानू नमन आसन


घुटनों के लिए जानू नमन आसन
ढलती उम्र में व्यक्ति को जोड़ों से संबंधित रोग होने लगते हैं। अंग-अंग दुखता है। ज्यादा दूर चला नहीं जाता या बहुत ऊपर चढ़ा नहीं। व्यक्ति तभी तक जवान रहता है, जब तक उसके सभी अंग और जोड़ तनावरहित रहते हैं। जो लोग जानू नमन आसन करते रहते हैं उनको यह समस्या कभी नहीं सताती।
जानू घुटने को कहते हैं। क्रम से घुटनों को मोड़ने और सीधा करने को जानू नमन कहते हैं। जानू नमन आसन में अंग संचालन (सूक्ष्म व्यायाम) के अंतर्गत आता है।
कैसे करें यह आसन : सबसे पहले भूमि पर नर्म दरी या कंबल बिछाएं, फिर दंडासन की स्थिति में बैठ जाएं अर्थात दोनों पैरों को सामने की ओर फैलाकर बैठ जाएं। दोनों पैरों के बीच थोड़ा अंतर रखें। रीढ़ को सीधा रखें।
अब दाएं पैर को घुटने से मोड़ें और दाएं जांघ के नीचे दोनों हाथों की अंगुलियों की कैंची बनाकर जांघ को पकड़ लें। अब श्वास भरते हुए पकड़े हुए पैर को सीधा कर लें और पैर की अंगुलियों को बाहर की ओर खींचकर रखते हुए घुटने की मांसपेशियों में खिंचाव महसूस करें।
अब इसे दाएं पैर से करें। दाएं पैर को घुटने से मोड़ें और हथेलियों के दबाव से जांघ को सीने के करीब लाने का प्रयास करें। इस अवस्था में सांस पूरी तरह बाहर निकल जाएगी और पैर अंदर की ओर पिचक जाएगा।
सावधानी : ऐसा करने से आपके दोनों हाथ सीधे हो जाएंगे। इस बात का ध्यान रखें कि एड़ी जमीन से थोड़ा ऊपर रहे।


उत्तान पादासन से तुरंत पेट अंदर
आधुनिकता की अंधी दौड़ में खान-पान, रहन-सहन, आचार-विचार और जीवन पद्धति के विकृत हो जाने से आज सारा समाज अनेक प्रकार के रोगों से ग्रस्त हैं। खासकर वह अपच, कब्ज, मोटापा, और अन्यसंबंधी बीमारियों से परेशान हो गया है। सभी के निदान के लिए लिए योग ही एकमात्र उपाय है। यहां प्रस्तुत है पेट को अंदर करने के लिए अचूक आसन उत्तान पादासन।
सावधानी : जब कमर में दर्द तथा मांसपेशियों में ऐंठन की शिकायत हो, उस समय इस आसन का अभ्यास नहीं करें। गर्भावस्था के दौरान महिलाएं अभ्यास न करें।
इस आसन को स्त्री पुरुष समान रूप से कर सकते हैं। छह सात वर्ष के बालक-बालिकाएं भी इसे कर सकते हैं। यह बहुत आसान आसन है एवं अधिक लाभदायक है। करने की शर्त यह कि आपको पेट और कमर में किसी प्रकार का कोई गंभीर रोग न हो। यदि ऐसा है तो किसी योग चिकित्सक से पूछकर करें। 
पहली विधि : पीठ के बल भूमि पर चित्त लेट जाएं। दोनों हथेलियों को जांघों के साथ भूमि पर स्पर्श करने दें। दोनों पैरों के घुटनों, एड़ियों और अंगूठों को आपस में सटाए रखें और टांगें तानकर रखें।
अब श्वास भरते हुए दोनों पैरों को मिलाते हुए धीमी गति से भूमि से करीब डेढ़ फुट ऊपर उठाएं अर्थात करीब 45 डिग्री कोण बनने तक ऊंचे उठाकर रखें। फिर श्वास जितनी देर आसानी से रोक सकें उतनी देर तक पैर ऊपर रखें।
फिर धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए पांव नीचे लाकर बहुत धीरे से भूमि पर रख दें और शरीर को ढीला छोड़कर शवासन करें।
आसन अवधि : इस आसन का प्रात: और संध्या को खाली पेट यथाशक्ति अभ्यास करें। जब आप श्वास को छाती में एक मिनट से दो तीन मिनट तक रोकने का अभ्यास कर लेंगे तब आपका आसन सिद्ध हो जाएगा।
इसका लाभ :

*इसके अभ्यास से पेट और छाती का थुलथुलापन, पेडू का भद्दापन दूर हो जाता है।
* पेट के स्नायुओं को बड़ा बल मिलता है जिससे कद बढ़ता है।
* इसे कहते रहने से पेट कद्दू की तरह कभी बड़ा नहीं हो सकता।
* यह आसन पेट का मोटापा दूर करने के अतिरिक्त पेट की आंतें सुदृढ़ कर पाचन शक्ति को बढ़ाता है।
* इस आसन के नियमित अभ्यास से गैस और अपच का नाश होता है।
* पूराने से पुराना कब्ज का रोग दूर होता है और खूब भूख लगती है।
* उदर संबंधी अनेक रोक नष्ट होते हैं।
* नाभि केंद्र जो बहत्तर हजार नाड़ियों का केंद्र है। उसे ठीक करने के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
* इसके अभ्यास द्वारा नाभि मंडल स्वत: ही ठीक हो जाता है।
*यदि नाभि जगह से हट गई हो तो गिरी हुई धरण पांच मिनट उत्तान पादासन करने से अपने सही स्थान पर आ जाती है।

दूसरी विधि : पीठ के बल भूमि पर चित्त लेटें। दोनों हाथों को नितम्बों से लगाकर कमर के ऊपर तथा नीचे का हिस्सा भूमि से लगभग एक फुट उपर उठाएं। केवल कमर का हिस्सा जमीन पर लगा रहे। इसमें संपूर्ण शरीर को कमर के बल पर तौलते हैं। जिसका प्रभाव नाभि स्थान पर अच्छा पड़ता है।
इस आसन से लाभ :

* मोटापा दूर करने के लिए यह रामबाण है।
* महिलाएं प्रसव के बाद स्वाभाविक स्थिति में आने के बाद करें तो पेडू का भद्दापन दूर हो सकता है।
* इस आसन के करने से हार्निया रोग नहीं होता। जिन्हें हार्निया हो भी गया हो तो इस आसन से यह रोग दूर हो जाता है।
* इससे घबराहट दूर हो जाती है। दिल की धड़कन, श्वास फूलना, आदि रोग भी दूर हो जाते हैं।
* सामान्य रूप से दस्त, पेचिश, मरोड़, खूनी दस्त, नसों की खराबी, आंत्र वृद्धि, जलोदर, दर्द, कब्ज, फेफड़ों के रोग आदि अनेक रोग दूर होते हैं।

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