Header Ads

साइनसाइटिस के इलाज


साइनसाइटिस के इलाज में आयुर्वेद से लें मदद
दूषित हवा से बचने के लिए हमारी नाक के दोनों तरफ़ चार जोड़ी अर्थात 8 एयर पॉकेट्स होते हैं, जिन्हें साइनस कहा जाता है. साइनस हमारे नाक में उपस्थित रहकर धूल व अन्य नुक़सानदायक कणों को सांस के ज़रिए फेफड़ों तक पहुंचने से रोकते हैं. यह नाक में एक तरह के म्यूकस (एक तरह का चिपचिपा पदार्थ) छोड़ते हैं, जो बाहर से आनेवाले हानिकारक कणों को अपने साथ चिपका लेता है. अगर हानिकारक कण बहुत अधिक होता है, म्यूकस भी अधिक निकलता है. ऐसे में साइनस की वजह से ही हमें छींक आती है और म्यूकस के साथ ही हानिकारक कण नाक से बाहर निकल जाते हैं. साइनस ये सारे जतन हमारे फेफड़ों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए करते हैं पर साइनसाइटिस में इन पर सूजन आ जाती है, जिससे इनका काम और बढ़ जाता है. साइनसाइटिस की समस्या में हानिकारक कण नहीं होने के बावजूद साइनस ज़्यादा मात्रा में म्यूकस छोड़ते हैं और वह छींकों के ज़रिए बाहर निकलता रहता है. यह मुख्यतः एलर्जी के कारण होता है.

साइनसाइटिस के कारण
जिस तरह की लाइफ़स्टाइल के हम आदि होते जा रहे हैं, वही इस परेशानी के मूल कारणों में शामिल है. प्रदूषण, एसी-कूलर का प्रयोग, ठंडे पानी व कोल्ड ड्रिंक्स का लगातार सेवन, इम्यूनिटी की कमी, वायरल या फ़ंगल या बैक्टीरियल इंफ़ेक्शन, रीढ़ का कर्व ख़राब होना है. यह समस्या ऐंटीबायोटिक दवाओं के ज़्यादा प्रयोग से भी हो सकती है, क्योंकि ऐंटीबायोटिक दवाएं शरीर में मौज़ूद गुड बैक्टीरिया को नष्ट करके फ़ंगस की ग्रोथ को बढ़ाती हैं.
ऐंटीबोयोटिक और ऐंटी एलर्जिक दवाओं के साइड इफ़ेक्ट्स
अधिकतर डॉक्टर साइनसाइटिस का इलाज ऐंटीबायोटिक एवं ऐंटीएलर्जिक दवाओं से करते हैं, लेकिन इससे स्थाई रूप से आराम नहीं मिलता है. 15,000 लोगों पर हुए एक रिसर्च में पता चला है कि एक्यूट साइनसाइटिस से परेशान व्यक्ति को ऐंटीबायोटिक देने पर भी और ना देने पर भी 15 दिन में उन्हें आराम मिल जाता है. इसलिए ऐंटीबायोटिक का महत्व इसके उपचार में न के बराबर है. ऐंटीएलर्जिक या कॉर्टिकोस्टेरॉइड दवाएं इम्यूनिटी को भी कम कर देती हैं, जिससे साइनस में बैक्टीरिया, वायरस और फ़ंगस की ग्रोथ बढ़ने लगती है तथा समस्या और बढ़ जाती है.

सर्जरी से भी कम राहत
साइनस को सर्जरी से भी ठीक करने की कोशिश की जाती है, लेकिन सर्जरी से भी कुछ महीने या साल तक ही आराम मिलता है. उसके बाद उस व्यक्ति को फिर से उन्हीं समस्यों से जूझना पड़ता है. पर साइनसाइटिस की वजह नाक की हड्डी का फ्रैक्चर या बहुत ही ज़्यादा टेड़ी हो चुकी हड्डी है, तो उसमें सर्जरी मददगार हो सकती है.

साइनसाइटिस के लक्षण और पहचान
साइनसाइटिस के कई लक्षण हैं जैसे, बार-बार छींके आना, नाक बंद होना, नाक से पानी जैसा द्रव निकलते रहना, सिरदर्द, सर्दी-खांसी, बुख़ार व बदन दर्द, आंखों से पानी आना, आंख और कान में खुजली होना, दांतों में दर्द आदि. अगर आपको रोज़ाना ऐसी परेशानियां हो रही हैं, तो डॉक्टर की सलाह पर एक्स-रे, सीटी स्कैन ज़रूर करवाएं.

आयुर्वेदिक इलाज
आयुर्वेद इसका अच्छा व स्थाई रूप से समाधान प्रदान कर सकता है. इसके लिए आप निम्न उपाय कर सकते हैं.
*नियमित प्राणायाम करें.
*नाक में सुबह व शाम गाय के शुद्ध घी की कुछ बूंदें डालें.
*रीढ़ की हड्डी पर किसी पोषक तेल की मालिश करें.
*एक कप गुनगुने पानी में एक चुटकी नमक डालकर पानी को चुल्लू से नाक में लगभग एक से दो इंच तक अंदर खींचें, फिर निकाल दें. इससे तुरंत राहत मिलती है. यह इन्फ़ेक़्शन को कम करता है और साइनस के ब्लॉकेज को हटाता है.
*रात में सोते समय आग में भुने हुए अनार के रस में अदरक का रस मिलाकर पिएं. अनार को माइक्रोवेव में भून सकते हैं.
सावधानियां
साइनसाइटिस से परेशान व्यक्ति को कई सावधानियां बरतनी चाहिए.
* ठंडा पानी एवं कोल्ड ड्रिंक्स ना पिएं.
* दही, अचार एवं खटाई ना खाएं. विटामिन सी के लिए आंवला ले सकते हैं, क्योंकि विटामिन सी इसके उपचार में बहुत उपयोगी है.
* फलों को खाकर पानी न पिएं, क्योंकि इससे शरीर मे कफ़ बढ़ता है और वह साइनसाइटिस और अस्थमा जैसी समस्या उत्पन्न करता है.
* प्रदूषण से बचें. धूल और धुएं वाली जगह पर जाएं तो रूमाल से मुंह ढंककर जाएं.
* एसी-कूलर का अधिक प्रयोग करने से बचें.
* गर्म जगह से आकर एकदम ठंडी जगह पर ना जाएं, यानी एसी में जाने से बचें.
* ठंडे पानी से स्नान ना करें और नहाकर पंखे की हवा में न आएं.
* सुबह उठकर ख़ाली पेट पानी न पिएं, क्योंकि यह भी कफ़ बढ़ाता है.
* अपने पॉस्चर को ठीक रखें, रीढ़ को झुकाकर न बैठें.
* गर्म पानी में नमक मिलाकर नहाएं और नहाते समय पोर्स यानी रोम छिद्रों को खोलने के लिए शरीर को अच्छे से रगड़ें. ऐसा करने से शरीर से टॉक्सिन्स निकलते हैं और शरीर के सभी अंग स्वस्थ रहते हैं.

कोई टिप्पणी नहीं

Healths Is Wealth. Blogger द्वारा संचालित.