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महिलाओं को अनीमिया की समस्या



क्यों होती है महिलाओं को अनीमिया की समस्या, कैसे इससे निपटें?
भारत की एक बड़ी जनसंख्या अनीमिया से परेशान है. ग्लोबल डेटा वेबसाइट के एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 40 प्रतिशत लोगों को अनीमिया की समस्या है, और इसमें भी 50 प्रतिशत से ज़्यादा जनसंख्या महिलाओं की है. हर महीने महिलाओं को होनेवाले पीरियड्स की वजह से अनीमिया की समस्या होना सामान्य बात है. आमतौर पर आयरन की कमी से होनेवाली अ‌नीमिया भारतीय महिलाओं में बेहद आम है. किशोरावस्था, प्रेग्नेंसी, स्तनपान और मेनोपॉज़ जैसे ज़िंदगी के कई अहम् चरणों में महिलाएं कई हार्मोनल बदलावों से गुज़रती हैं. इन सभी मौक़ों पर महिलाओं को ज़्यादा आयरन लेने की ज़रूरत होती है. और जब हम ज़रूरत जितना आयरन नहीं लेते, तब अनीमिया की समस्या होती है. अनीमिया की समस्या होने पर चक्कर आना, ऊर्जा की कमी, शरीर का पीला पड़ना, डार्क सर्कल का बढ़ना, नींद न आना, शरीर में कंपकपाहट, सांस लेने में व ध्यान लगाने में दिक़्क़त महसूस होना जैसे कई अन्य संकेत आप महसूस कर सकते हैं.

क्या और क्यों होती है अनीमिया?
अनीमिया एक ऐसी स्थिति है, जब आपके शरीर में पर्याप्त हीमोग्लोबिन नहीं होता. यह लाल रक्त कणों की कमी की वजह से भी हो सकती है. आयरन की कमी से शरीर में लाल रक्त कणों की कमी हो जाती है. असल में, आयरन शरीर में लाल रक्त कण बनाने में मदद करता है. अनीमिया होने की चार सबसे बड़ी वजहें हैं:1. हैवी मेन्सट्रुअल साइकल की वजह से ख़ून जाना
2. सर्जरी या ट्रॉमा की वजह से ख़ून जाना
3. कुछ प्रकार के कैंसर की वजह से
4. क्रोन्स (पेट में सूजन से जुड़ी एक तरह की बीमारी) डिज़ीज़ या सिलिएक डिज़ीज़ की वजह से


कैसे पाएं इससे निजात?

महिलाओं में यदि 12-15 ग्राम प्रति डेसीलीटर हीमोग्लोबिन हो, तो इसे सामान्य मात्रा माना जाता है. यदि ब्लड टेस्ट में आपका हीमोग्लोबिन स्तर इससे कम आता है, तो हो सकता है आपका डॉक्टर आपको कुछ दवाएं शुरू करने के लिए कहे. लेकिन दवाओं के साथ ही आपको अपनी डायट में कुछ बदलाव लाकर आयरन से भरपूर डायट फ़ॉलो करना होगा.

सेलेब्रिटी डायटीशियन और नमामी लाइफ़ की फ़ाउंडर नमामी अग्रवाल अपनी डायट में आयरन को शामिल करने के लिए कुछ ज़रूरी टिप्स देते हुए कहती हैं,“आयरन के कई स्रोत हैं. उसमें हरी पत्तेदार सब्ज़ियां, जैसे-पालक, केल, ब्रोकलि इत्यादि शामिल हैं, तो वहीं चुकंदर में भी आयरन की अच्छी मात्रा पाई जाती है. फलों में अनार और बेरीज़ आयरन के अच्छे स्रोत हैं. खजूर, किशमिश, अंजीर, एप्रिकोट जैसे ड्रायफ्रूट्स में भी आयरन होता है. वहीं ब्राउन राइस, गेहूं का आटा, अमरांथ, कीन्वा को भी अपनी डायट में शामिल करके आप आयरन पा सकते हैं. बादाम, अखरोट, पाइन नट्स, तिल, कद्दू के बीज, सनफ़्लावर के बीज, दाल इत्यादि में भी आयरन पाया जाता है. दूसरी ओर नॉनवेज में चिकन, ऑयस्टर्स, मछली, टर्की, अंडे में आयरन की भरपूर मात्रा होती है.”  


प्रिकॉशन्स, ताकि इस समस्या से गुज़रना ही न पड़े

आप कभी अनीमिया का शिकार न हों, इसलिए हमेशा अपनी डायट में आयरन युक्त खाद्य पदार्थों को ज़रूर शामिल करें.• विटामिन सी युक्त फ़ूड्स को भी अपनी डायट का हिस्सा बनाएं, क्योंकि यह आयरन के एब्ज़ॉर्प्शन को बढ़ाता है.
• खाने के बाद चाय या कॉफ़ी न पीएं. इससे आयरन का अवशोषण रुक जाता है.
• आयरन युक्त खाद्य पदार्थों के साथ कैल्शियम युक्त फ़ूड्स न लें. इससे आयरन का अवशोषण नहीं हो पाता.

क्या होता है इम्यून सिस्टम और कैसे रखें इसका ख़्याल?
जिस तरह किसी स्मार्टफ़ोन में नेटवर्क जितना स्ट्रॉन्ग होता है, बातचीत उतनी ही अच्छी तरह होती है, उसी तरह हमारे शरीर का इम्यून सिस्टम भी काम करता है. यह जितना मज़बूत होगा हम उतने अधिक स्वस्थ और फ़िट बने रहेंगे. लेकिन इम्यून सिस्टम क्या होता है, हम पहले इसके बारे में जान लेते हैं. इम्यून सिस्टम यानी हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली कोई एक अंग या इकाई नहीं है, बल्कि यह कोशिकाओं, ऊतकों, और अंगों का एक नेटवर्क है, जो शरीर की रक्षा के लिए मिलकर काम करते हैं. यह नेटवर्क पैथोजेंस (रोगजनकों) और ट्यूमर सेल्स (अर्बुद कोशिकाओं) की पहचान करता है और फिर अपने नेटवर्क के सहयोगियों के साथ मिलकर उन्हें नष्ट कर शरीर को स्वस्थ बनाए रखता है. इस नेटवर्क की ख़ासियत यह है कि यह जहां शरीर में घुसपैठ करनेवाले विषाणुओं से लेकर परजीवी कृमियों की पहचान करने में सक्षम होता है, वहीं यह शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं और ऊतकों को भी पहचान सकता है, ताकि उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई न कर बैठे.


एक्स्पर्ट्स का कहना है कि हमारे शरीर के पांच कोष होते हैं-भोजन और वातावरण से तैयार होनेवाला अन्नमय कोष, श्वास से संरचित प्राणमय कोष, विचार-शब्द से तैयार मनोमय कोष, चेतना और बोध से लैस होनेवाला विज्ञानमय कोष और आनंद से छलकता आनंदमय कोष. इम्यून सिस्टम का नेटवर्क हमारे शरीर के इन पांचों कोषों को संभालने के लिए मोटे तौर पर चार स्तरों में व्याप्त होता है-भौतिक, मानसिक, भावनात्मक और चेतना का स्तर.

इम्यून सिस्टम का नेटवर्क
इम्यून सिस्टम के मुख्य घटकों में ल्यूकोसाइट्स यानी वाइट ब्लड सेल्स, बोन मैरो (अस्थिमज्जा) के कुछ कोष, लसिका ग्रंथियां (लिंफ़ोइड ऑर्गन और ऐंटीबॉडी जैसे घुलनशील अणु) और प्लीहा का समावेश होता है. ल्यूकोसाइट्स शरीर पर हमला करनेवाले बाहरी पैथोजेंस, बैक्टीरिया आदि को खा जाती हैं. लिंफ़ोइड अंगों में टी-लिंफ़ोसाइट और बी-लिंफ़ोसाइट कोशिकाएं अपना अड्डा जमाती हैं. अपना विकास करती हैं और ऐंटीजन से निपटने की ट्रेनिंग प्राप्त करती हैं. अस्थि मज्जा (बोन मैरो) मुख्य लिंफ़ोइड अंग है जहां लिंफ़ोसाइट, ख़ासकर बी-लिंफ़ोसाइट का विकास होता है. इसी तरह सेम के आकार के प्लीहा में भी पर्याप्त मात्रा में लिंफ़ोसाइट और लिंफ़ नोड्स पाए जाते हैं. इसी के चलते प्लीहा रोगजनकों को फंसाकर रक्त को फ़िल्टर करता है. मृत लाल रक्त कण प्लीहा में जाकर रक्त से अलग हो जाते हैं. इसलिए इसे लाल रक्त कणों का क़ब्रिस्तान भी कहते हैं.

इम्यून सिस्टम को मुख्यतया दो भागों में बांटा जा सकता है. पहला है इनैट यानी जन्मजात इम्यून क्षमता. यह किसी ऐंटीजन मसलन किसी तरह के संक्रमण या टीकाकरण के कारण नहीं विकसित होती है. बल्कि हमारे शरीर को अच्छे ढंग से चलाए रखने के लिए पहले से ही मौजूद होती है. दूसरा है एडॉप्टिव इम्यून सिस्टम यानी अनुकूल प्रतिरक्षा प्रणाली, जो हम जीवन में अपने रहन-सहन से हासिल करते हैं. जब हम किसी संक्रमण के शिकार होते हैं, या किसी पैथोजेंस (रोगजनक) के संपर्क में आते हैं, तो हमारा शरीर उसके ख़िलाफ़ लड़ने के लिए तैयार होता है. इस एडॉप्टिव इम्यून सिस्टम को हम अपने प्रयास से और अधिक मज़बूत बना सकते हैं.


इसके लिए हमें बस यह करना है कि जीवन में फ़िज़िकल ऐक्टिविटी के लिए भी थोड़ा समय निकालना है. अब मान लीजिए कि आप रोज़ाना कसरत करते हैं, तो आपका शरीर धीरे-धीरे मज़बूत होता जाएगा, लेकिन आप आराम के आदी हैं, तो शरीर को ज़्यादा मज़बूत बने रहने की ज़रूरत नहीं महसूस होगी और वह और अधिक आराम का आदी होता चला जाएगा. इसलिए इम्यून सिस्टम को मज़बूत बनाने का पहला क़दम है शरीर का पर्याप्त संतुलित इस्तेमाल करें.\
गड़बड़ी के मिलते हैं सिग्नल
हमारे पर्यावरण में कई तरह के पैथोजेंस पाए जाते हैं, जो भोजन-पानी या सांस से हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं. अगर इम्यून सिस्टम मज़बूत होता है, तो ये पैथोजेंस परास्त हो जाते हैं, लेकिन इम्यून सिस्टम कमज़ोर होने की स्थिति में व्यक्ति बीमार पड़ जाता है. इम्यून सिस्टम शरीर के पांचों कोषों में व्याप्त है, इसलिए किसी एक कोष में गड़बड़ी के लक्षण उभरते ही अन्य कोषों से इसके संकेत मिलने लगते हैं. उदाहरण के लिए यदि आपका इम्यून सिस्टम कमज़ोर है तो आप दूसरों की अपेक्षा बार-बार बीमार होते हैं, ज़ुकाम की शिकायत रहती है, खांसी, गला ख़राब होना, मसूड़ों में सूजन, मुंह में छाले या स्किन रैशेज़ जैसी समस्या उभरती है. ऐसे समय में ब्लड टेस्ट करवाकर आप पता कर सकते हैं कि कहीं आपका इम्यून सिस्टम कमज़ोर तो नहीं पड़ रहा है.

कई बार इम्यून सिस्टम कमज़ोर पड़ने के बजाय निष्क्रिय हो जाता है. मौसम ने ज़रा-सी करवट नहीं ली कि कुछ लोग बीमार हो जाते हैं. इनमें अधिकांश ऐसे लोग होते हैं, जो अधिकांश समय घर या दफ़्तर में वातानुकूलित कमरों में समय बिताते हैं. इनका शरीर एक जैसे तापमान में रहने का अभ्यस्त हो जाता है और खुले वातावरण में जाने पर भी शरीर तापमान एड्जस्ट करने की कोशिश कम करता है यानी इम्यून सिस्टम न्यूट्रल मोड में आ जाता है. मज़बूत इम्यून सिस्टम के लिए हमारे शरीर का सामान्य तापमान 36.3 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं होना चाहिए, क्योंकि सर्दी के वायरस 33 डिग्री पर सर्वाइव करते हैं.

कुछ लोगों का इम्यून सिस्टम कई बार जेनेटिक कारणों से भी कमज़ोर हो सकता है. जर्नल ट्रेंड्स इन इम्यूनोलॉजी में प्रकाशित हालिया अध्ययन रिपोर्ट में भी इसकी पुष्टि की गई है. बेल्जियम के ट्रांसलेशनल इम्यूनोलॉजी लैब के शोधकर्ता एड्रियान लिस्टन की रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक़, हमारे इम्यून सिस्टम पर हमारी जीवनशैली, भोजन, नींद लेने के तरीक़े, पर्यावरण और फ़ैमिली हिस्ट्री का संयुक्त रूप से प्रभाव पड़ता है. लिस्टन ने कहा है कि पर्यावरण के प्रति हमारे जीन की प्रतिक्रिया से कभी-कभार हमारा इम्यून सिस्टम डगमगा जाता है. कई बार लंबे समय तक किसी वायरस या बैक्टीरिया के संक्रमण के चलते भी हमारा इम्यून सिस्टम उसके प्रति निष्क्रिय हो जाता है. ऐसी स्थिति में इम्यून सिस्टम हमें सचेत करना बंद कर देता है. कई बार कुछ ऐसे लोग मिलते हैं, जिन्हें किसी तरह के संक्रमण की चपेट में आने पर भी सालों-साल बुख़ार नहीं होता है. यह कमज़ोर इम्यूनिटी का लक्षण है.


कैसे रखें इम्यून सिस्टम को दुरुस्त?
शरीर सफ़ा, तो रोग दफ़ा
मज़बूत इम्यून सिस्टम के लिए स्वच्छ वातावरण ज़रूरी होता है, क्योंकि गंदगी के कारण संक्रमण की चपेट में आने का ख़तरा बढ़ जाता है. दिनभर गंदगी या कीटाणु के संपर्क में रहने के कारण किसी ऐंटीबैक्टीरियल लोशन से अच्छी तरह हाथ धोएं. फल और सब्ज़ियों को खाने और पकाने से पहले अच्छी तरह से धो लें. खाना बनाने और खाने से पहले अपने हाथों को अच्छी तरह साफ़ करें. रोज़ाना स्नान करें. शरीर को यथासंभव स्वच्छ रखें. ऐसा करने से जहां संक्रमण से बचाव होगा वहीं मन प्रसन्न रहेगा और यह ताज़गी आपके इम्यून सिस्टम को बूस्ट करने का काम करेगी.
शरीर का इस्तेमाल करें
जिस तरह लोहे की चीज़ का इस्तेमाल न करने से उसमें जंग लग जाता है, उसी तरह शरीर का इस्तेमाल न करने से इम्यून सिस्टम सुस्त पड़ने लगता है. इम्यून सिस्टम को मज़बूत बनाने के लिए रोज़ाना एक्सरसाइज़ करें. लिफ़्ट के बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करें. थोड़ी दूर जाने के लिए ऑटो-टैक्सी लेने के बजाय पैदल चलें. ऐसा करने से आपके शरीर में रक्त का प्रवाह तेज़ होता है. पाचन क्रिया में तेज़ी आती है. आप यदि डेस्क जॉब कर रहे हों, तो भी समय निकालकर बीच-बीच में थोड़ा टहल लें. ऐसा करने से शरीर में लचीलापन बना रहता है. मुंबई पुलिस व बीएसएफ़ को मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग देनेवाले संतोष सिंह का कहना है,“10 से 18 साल तक के लोगों को रोज़ाना एक घंटा एक्सरसाइज़ करना चाहिए. 18 साल से 60-65 साल की उम्र तक के लोगों को सप्ताह में कम से कम 150 मिनट की एरोबिक एक्सरसाइज़ और दो दिन वेट एक्सरसाइज़ या मसल टोनिंग एक्सरसाइज़ करना चाहिए.”

तनाव को पास न आने दें
इम्यून सिस्टम हमारे मानसिक और भावनात्मक गतिविधियों से भी जुड़ा मामला है. जब हम स्ट्रेस में होते हैं, तो हमारा इम्यून सिस्टम कमज़ोर होने लगता है. स्ट्रेस की स्थिति में कोर्टिसोल हार्मोन का स्राव बढ़ जाता है, जो हमें बीमार बनाने की साजिश करता है. स्ट्रेस को दूर करने के लिए प्रतिदिन योग, प्राणायाम करें. मेडिटेशन, डांसिंग और सेक्स जैसे ख़ुशी देनेवाली गतिविधियां करें.

सुबह की गुनगुनी धूप सेंकें
विटामिन डी इम्यूनिटी को बढ़ाता है और ज़यादातर लोगों में इसकी कमी होती है. इसके लिए सबसे असरदार उपाय है सुबह सूरज की गुनगुनी धूप सेंकना. विटामिन डी शरीर में कैल्शियम के अवशोषण में मदद करता है, जिससे हमारी हड्डियां मज़बूत बनती हैं.

बनाए रखें इम्यूनिटी का पानी
हमारे शरीर में सबसे अधिक हिस्सा पानी का होता है. इसलिए इम्यूनिटी सिस्टम को मज़बूत करने का पहला असरदार क़दम है पर्याप्त पानी पीना. पानी हमारे शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने में मदद करता है. हमारी किडनी की कार्यप्रणाली को स्वस्थ बनाए रखता है. तांबे के बर्तन में पानी पीने से उसकी गुणवत्ता बढ़ जाती है. पानी हमारी मांसपेशियों को एनर्जी प्रदान करता है, आंतों की गतिविधियों में सुधार लाता है. स्वस्थ बने रहने के लिए ज़रूरी है कि दिन में कम से कम 7-8 ग्लास पानी पिएं. सोडा, अल्कोहल, चाय या कॉफ़ी से प्यास बुझाने से बचें.

पर्याप्त नींद लें
हमारे शरीर और मस्तिष्क के ठीक ढंग से काम करने के लिए 6-8 घंटे की नींद बहुत ज़रूरी है. पर्याप्त गहरी नींद कोशिकाओं को पुनर्निर्माण में मदद करती है. अगर आप पर्याप्त नींद नहीं लेते तो इम्यून सिस्टम को पुनर्निर्माण का समय नहीं मिलने के कारण वह कमज़ोर हो जाता है. पर्याप्त नींद न सिर्फ़ आपकी ऊर्जा और मिज़ाज को बनाए रखती है, बल्कि यह स्ट्रोक को रोकती, और वज़न संतुलित रखने में मदद करती है. शराब और सिगरेट से दूर रहें. जब कोई चारा न बचे, तो इंजेक्शन का सहारा लें. अगर इम्यून सिस्टम बहुत ज़्यादा ही कमज़ोर हो गया है, तो आप डॉक्टर से सलाह लेकर किसी डोनर के ख़ून से निकाले गए इम्यूनोग्लोब्युलिन का इंजेक्शन ले सकते हैं.
सही तरीक़े से करें भोजन
भोजन के बारे में लोग पहले से अधिक जानकार हो चले हैं. अधिकांश लोग जानने लगे हैं कि कार्बोहाइड्रेट एनर्जी देता है, प्रोटीन टिशूज़ को मज़बूत बनाता है. लेकिन अधिकांश लोग भोजन करने का सही तरीक़ा नहीं जानते, क्योंकि लोगों के पास समय नहीं है. आप जो भोजन करते हैं, उसकी ख़बर मस्तिष्क के तृप्ति केंद्र को लगने में लगभग 15 मिनट का समय लगता है. पर लोग पांच-सात मिनट में ही भोजन की प्लेट ख़ाली कर देते हैं. ऐसे में ब्रेन से आपके भूखा होने का सिग्नल मिलता रहता है, जबकि आप ज़रूरत से ज़्यादा खा चुके होते हैं. इसलिए ज़रूरी है कि आप जो कुछ भी खाएं उसे अच्छी तरह चबा-चबाकर खाएं. ताकि कम भोजन में शरीर संतुष्ट हो सके. सही ढंग से खाने से भोजन के पोषक तत्व बोन मैरो (अस्थि मज्जा) तक भरपूर मात्रा में पहुंच जाते हैं, जहां रोगों से लड़ने में कारगर श्वेत रक्त कोशिकाओं का निर्माण होता है.

भोजन करते समय यह ध्यान रखें कि हम जो कुछ खा रहे हैं, वह कितनी आसानी से पचेगा. फ़ूड एक्स्पर्ट एन आर देसाई कहते हैं कि सब्ज़ियां, फल और अंकुरित अनाज 13 घंटे में पचते हैं, पकी सब्ज़ियों और दलहन को पचने में 24 घंटे का समय लगता है, जबकि मांसाहारी और तला हुआ भोजन पचने में 72 घंटे लग जाते हैं. हमारे बॉडी क्लॉक की ऐसी व्यवस्था है कि सुबह चार बजे से दोपहर तक शरीर पचे आहार के बचे कचरे को बाहर निकालने के लिए तैयार रहता है, दोपहर से रात आठ बजे तक खाने और पचाने के लिए हमारा इम्यून सिस्टम तैयार रहता है और रात आठ बजे से सुबह चार बजे तक आहार के अवशोषण और उपयोग की तैयारी रहती है. इसलिए हम जो भी भोजन करते हैं, उसमें हर बार 35% प्रोटीन, 35% कार्बोहाइड्रेट, 15% सलाद और 5% तेल होना चाहिए. कहने का मतलब है कि भोजन में व्यंजनों की भरमार के बजाय कोई एक प्रोटीनयुक्त व्यंजन, एक या दो कार्बोहाइड्रेट युक्त व्यंजन, हरे सलाद और लहसुन, धनिया, पुदीने आदि की चटनी होनी चाहिए.

अनिद्रा से राहत दिलाएंगे जायफल ड्रिंक्स

खाने में स्वाद व ख़ुशबू बढ़ाने के लिए पीढ़ियों से जायफल का इस्तेमाल होता आ रहा है. इंडोनेशियाई मूल का यह मसाला सेहत और स्वाद दोनों के लिए महत्वपूर्ण है. ऐंटी-ऑक्सिडेंट्स, ऐंटी-इंफ़्लेमेटरी, ऐंटी-डायबिटिक, ऐंटी-बैक्टीरियल और ऐंटी-डिप्रेसेंट गुणों से भरपूर जायफल वैसे तो कई बीमारियों के रोकथाम में सहायक है, लेकिन आज के समय में बढ़ती अनिद्रा जैसी परेशानी से राहत पाने में इसका सेवन अहम रोल निभा सकता है. नींद की कमी को दूर करने के लिए जायफल को घरेलू नुस्ख़े के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है. गर्म दूध या चाय में चुटकी भर जायफल का पाउडर मिलाकर पीने से अनिद्रा जैसी बड़ी परेशानी से छुटकारा पाया जा सकता है.


जायफल में ट्रायमिरिस्टन नामक प्राकृतिक रसायन पाया जाता है, जो अच्छी नींद लेने में मदद करता है और आपकी थकी हुई मसल्स और नर्व्स को भी आराम देता है. मन को शांत रखता है. एक सर्वे के अनुसार अनिद्रा से परेशान क़रीब 251 लोगों को चार सप्ताह तक जायफल युक्त हर्बल कैप्सूल दिया गया, जिसकी वजह से उनकी अनिद्रा की समस्या में सुधार देखा गया. इसके अलावा पशुओं पर भी इसी तरह का एक प्रयोग किया गया, जिसमें पशुओं को जायफल का अर्क दिया गया और पाया गया कि उनकी गहरी नींद के समय में बढ़ोतरी हुई है. हालांकि जायफल में मायरिस्टिसिन पाया जाता है, जिसके अधिक इस्तेमाल से मतिभ्रम जैसी समस्या हो सकती है, इसलिए इसके अधिक मात्रा में इस्तेमाल से बचना चाहिए.

कैसे करें जायफल का इस्तेमाल?
अच्छी नींद के लिए जायफल का इस्तेमाल काफ़ी पहले से होता आया है. आइए जानते हैं इसके इस्तेमाल के चार तरीक़े.

जायफल की चाय
एक कप पानी में एक चुटकी जायफल पाउडर मिलाकर उबलने के लिए रख दें. जब पानी अच्छी तरह से उबल जाए तो लिक्विड को छानकर उसका सेवन करें. इसका सेवन आपको अच्छीब और आरामदायक नींद दिलाने में मददगार साबित होगा.


जायफल और दूध
अगर आपको रात में सोने से पहले गर्म दूध पीने की आदत है, तो उसमें एक चुटकी जायफल पाउडर भी मिला लें. दूध में मौजूद अमीनो एसिड शरीर में सेरोटोनिन और मेलाटोनिन के स्तैर को बढ़ाने में मदद करता है, वहीं जायफल में ट्रायमिरिस्टन रसायन है और ये दोनों ही अच्छीो नींद के लिए लाभदायक होते हैं.
जायफल मिक्स शहद
रात में सोने से कम से कम 15 मिनट पहले एक चम्मच शहद में एक चुटकी जायफल पाउडर मिक्स करके उसका सेवन करें. यह आपको अच्छीप नींद के साथ अच्छा स्वास्थ्य भी देगा.

जायफल और आंवला रस
रात में खाने के बाद आंवला रस में एक चुटकी जायफल मिलाकर पीने से यह पाचन क्रिया बेहतर बनाता है, जिससे नींद की समस्या के साथ पेट संबंधी समस्याओं से भी आराम मिलता है.

जायफल के अन्य फ़ायदे

पाचन में फ़ायदेमंद
जायफल में कार्मिनेटिव गुण होता है, जिसकी वजह से पेट में गैस बनने की समस्या से राहत मिलती है. इसके अलावा यह डायजेस्टिव एंजाइम्स को रिलीज़ करता है, जो पाचन क्रिया में सहायता करते हैं. जायफल सूजन, कब्ज़, दस्त, जैसी समस्याओं में भी आराम दिलाता है. इसमें फ़ाइबर की भी अच्छी मात्रा पाई जाती है, जो हमारे पाचन क्रिया के लिए लाभदायक होता है.
मुंह के स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद
अपने ऐंटी-बैक्टीरियल गुणों के कारण जायफल मुंह को स्वस्थ रखने में मदद करता है. यह दांतों की सड़न, दांतों के दर्द और कैविटी जैसी समस्याओं का इलाज करता है. इसके अलावा मुंह से आनेवाली दुर्गंध को भी कम करता है.

कोलेस्टेरॉल लेवल व वज़न कम करने में सहायक
जायफल में मौजूद फ़ाइबर, कोलेस्टेरॉल लेवल को कम करने के साथ शरीर से विभिन्न विषाक्त पदार्थों को निकालने में मदद करता है. वज़न घटाने के लिए भी इसका सेवन किया जा सकता है.

स्किन के लिए फ़ायदेमंद
ऐंटी-इंफ़्लेमेटरी गुण के कारण यह स्किन के लिए अच्छा होता है. इसका इस्तेमाल मॉइस्चराइज़र या फ़ेस पैक में सीमित मात्रा में मिलाकर किया जा सकता है.

ऐंटी-कैंसर पावर
जायफल में कीमो प्रिवेंटिव गुण होने के कारण यह कैंसर सेल्स को बढ़ने से रोकता है.



युवा हो जाएं सावधान, रीढ़ की यह बीमारी कर सकती है परेशान

एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस (रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करने वाले गठिया के दर्द) से बहुत से लाेग परेशान हैं. वर्ल्ड एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस डे (4 मई) काे चलिए समझते हैं क्या है एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस? किन लाेगाें काे परेशान करती है यह बीमारी? कैसे राहत मिल सकती है इससे?

क्या है एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस?

एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस (एएस) लगातार बनी रहने वाली सूजन और प्रतिरोधक तंत्र में गड़बड़ी की बीमारी है, जो रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करती है. एंकिलॉजिंग स्पॉन्डिलाइटिस एक तरह का आर्थराइटिस यानी गठिया है, जिसका असर रीढ़ की हड्‍डी पर होता है. इसका शुरुआती लक्षण है गर्दन के नीचे से कमर तक रीढ़ की हड्‍डी में अकड़न. रीढ़ की हड्डियों के मनके फ़्यूज़ होकर मिल जाते हैं, जिससे रीढ़ को नुक़सान पहुंचता है. मरीज़ का पॉश्चर ख़राब हो जाता है. 
एएस में रीढ़ की हड्डी का जरूरत से ज्यादा विकास होता है, जिसके एक साथ मिलने से रीढ़ की हड्डी बहुत सख़्त हो जाती है. यह बीमारी प्रति 100 वयस्काें में से एक को होती है. एएस सामान्य रूप से वयस्काें को ज्यादा प्रभावित करती है. यह बीमारी ख़ासतौर पर टीनएजर्स काे अपना शिकार बनाती है. 20 से 30 साल की उम्र के लाेगाें काे भी एएस का ख़तरा हाेता है. यदि समस्या को समय रहते पहचान लिया गया तो दर्द और अकड़न को कंट्रोल किया जा सकता है. 

क्याें है यह ख़तरनाक?
सबसे बुरी बात यह है कि ज़्यादातर लाेगाें काे अपनी एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस की बीमारी का पता ही नहीं हाेता. चूंकि एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस से युवा अधिक प्रभावित हाेते हैं. उनमें से कई मरीज़ों को तो अंदाजा ही नहीं हाेता कि उन्हें इस तरह की बीमारी हाे सकती है. वे इस तरफ़ ध्यान देने में काफ़ी वक़्त लगा देते हैं. अब चूंकि उन्हें देर से अपनी इस बीमारी का पता चलता है, जिससे उनकी शारीरिक स्थिति और बदतर हो जाती है. इससे मरीजों पर भावनात्मक स्तर पर भी काफ़ी प्रभाव पड़ता है, जिससे उनके अपने पार्टनर और रिश्तेदारों से भी संबंध प्रभावित होते हैं. शारीरिक और भावनात्मक रूप से दर्द महसूस होने के कारण एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस के मरीज़ बीमारी के बढ़ने के साथ-साथ शारीरिक और भावनात्मक रूप से कई तरह की चुनौतियों का अनुभव करते हैं.

मुंबई के क्‍वेस्ट क्लीनिक के कंसल्‍टेंट फ़िज़िशियन डॉ सुशांत शिंदे के मुताबिक़,“बदक़िस्मती से भारत में एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस के मरीज़ों को काफ़ी देर से अपनी इस बीमारी का पता चलता है और वह इस बीमारी के होने के काफ़ी समय के बाद डॉक्टर या गठिया रोग के विशेषज्ञ के पास जाते हैं. मुझे अपने डॉक्टरी जीवन के दौरान यह अनुभव हुआ है कि अमूमन मरीज़ इस बीमारी के होने के 3 से 5 साल या उससे भी अधिक समय बाद डॉक्टर के पास इलाज के लिए जाते हैं. यही कारण है कि उनकी बीमारी, जाे शुरू में ही कंट्राेल हाे सकती थी, उन्हें काफ़ी परेशान करती है. वैसे बता दें कि एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस के मरीजों के इलाज के लिए कई प्रभावी विकल्प मौजूद हैं. हां, इसका इलाज लंबे समय तक चलता है. परंपरागत इलाज से ठीक न होने वाले मरीज़ों के इलाज में कुछ नई दवाइयां जैसे बायोलॉजिकल थेरैपी कारगर साबित हुई हैं और उसके काफ़ी बेहतर परिणाम देखने में सामने आए हैं.’’ 






क्या करें यदि पार्टनर काे हाे एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस
युवा लाेगाें काे अचानक हाेनेवाली यह बीमारी अक्सर युवा दम्पतियाें की ज़िंदगी तबाह कर देती है. इस बीमारी से मरीज़ ताे परेशान हाेता ही है. घरवाले भी मानसिक रूप से प्रभावित हाेते हैं. वहीं मरीज़ पर दवाइयां ताे अपना असर करती ही हैं, पार्टनर का भावनात्मक सपाेर्ट भी अहम‌् हाेता है. ताे जानें, क्या कर सकते हैं यदि पार्टनर काे है एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस.
* आपको यह समझना चाहिए कि साथी को भावनात्मक साथ की ज़रूरत है 
आपके लिए यह समझना बहुत ज़रूरी है कि कब आपके साथी को मदद की ज़रूरत है और कब वह स्वतंत्र रहना चाहते हैं. आपको यह समझना चाहिए कि वह इस प्रक्रिया में आपसे किस तरह की मदद चाहते हैं. आप किस समय उनकी मदद बिना किसी झिझक और अपराधबोध के कर सकते हैं. शारीरिक विकलांगता के कारण आपके साथी, जो काम न कर सकते हों, उन शारीरिक कार्यों में उनकी मदद करने से जहां आपका तनाव कम होगा, वहीं संबंधों में भी नई ऊर्जा और उमंग का संचार होगा. इससे आपके पार्टनर को भी यह लगेगा कि केवल आप उनकी मदद नहीं कर रहे हैं, बल्कि आप रोमैंटिक रूप से उनके साथ जुड़े हुए हैं.

* पार्टनर के दर्द और उनके ठीक होने की प्रगति का ट्रैक रिकॉर्ड रखिए
कई मौक़े ऐसे आते हैं, जब एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस (एस) के मरीज़ निराशा, अवसाद और डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं. इस स्थिति में आपका एक साथी के तौर पर प्रोत्साहन और विश्वास उनका आप में प्यार और विश्वास पुख़्ता करने में मदद करेगा. आपको एक डायरी रखनी होगी, जिसमें आपको यह लिखना होगा कि आपके साथी को कब बेतहाशा दर्द हुआ और किन दिनों में उन्हें अपने दर्द से राहत मिली. आपको यह भी हिसाब रखना होगा कि कौन-सी दवाइयां उनके इलाज में कारगर साबित हुईं. आपको यह अच्छी तरह पता होना चाहिए कि आपके पार्टनर डॉक्टर की ओर से तय किए गए डाइट चार्ट के अनुसार स्वस्थ भोजन ले रहे हैं या नहीं. जब वह डॉक्टर के पास जाते हैं तो आप भी उनके साथ जाइए. आपको यह भी समझना होगा कि आपके पार्टनर को कब काउंसलिंग की ज़रूरत है. आपको अपना पार्टनर को यह यह भी बताना और समझाना होगा कि वह एएस की बीमारी से धीरे-धीरे उबर रहे हैं. कभी-कभी उनके लिए छोटे-मोटे जश्न या पार्टी भी आयोजित करनी होगी, जिससे उन्हें यह लगेगा कि आपके लिए वे स्पेशल हैं.
* पार्टनर के प्रति अपने प्यार को बार-बार जताना होगा
उनकी स्थिति के बावजूद उनके पास रहना और उनके साथ स्वस्थ संबंध रखना आपके लिए संभव होगा. दोनों पार्टनर को यह स्वीकार करना होगा कि उनकी प्रगाढ़ता अब पहले जैसी नहीं रहेगी. वह अपनी सुविधा के अनुसार आपस में यह फ़ैसला कर सकता है, कि कौन-सी स्थिति एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस से ग्रस्त उनके साथी के लिए ठीक होगी.
* बातचीत कर निकालें समाधान 
आपस में बातचीत न होने से कोई भी संबंध ख़राब हो सकता है, लेकिन तब यह स्थिति और भी ज़्यादा गंभीर होने की संभावना होती है, जब एक पार्टनर एंकिलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस से जूझ रहा हो. आप अपने पार्टनर की मदद कीजिए, जिससे वह अपनी भावनाएं खुलकर आपसे शेयर कर सकें और उनके साथ मिलकर ऐसी योजना बनाइए कि कैसे आप उनकी स्थिति को बेहतर ढंग से मैनेज करने के लिए उनके साथ मिलकर काम कर सकते हैं.

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