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नवजात शिशुओं की 4 आम बीमारियां


नवजात शिशुओं की 4 आम बीमारियां और उनके बचाव और इलाज 

शिशु का दुनिया में आना माँ के साथ ही पूरे परिवार के लिए एक खुशी का मौका होता है और सभी को अपने छोटे से शिशु को घर ले जाने की बहुत जल्दी होती है। बच्चा होने की ख़ुशी के साथ ही माता पिता पर नई जिम्मेदारियां भी आ जाती हैं, क्योंकि शिशु बहुत नाजुक होता है और उसके बीमार होने की आशंका ज्यादा होती है। जन्म के समय नन्हे शिशुओं की बिमारियों से लड़ने की क्षमता (immunity in hindi) बहुत कम होती है और इसलिए आपको उनकी सेहत का विशेष ध्यान रखना चाहिए। आज के ब्लॉग में हम आपको चार आम नवजात शिशु के रोग, उनके उपचार व उनसे बचाव के घरेलू नुस्खे बता रहे हैं।

नवजात शिशु के रोग - बच्चे को बुखार की समस्या 
(Bache ko bukhar ki bimari)
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बुखार (bukhar) अपने आप में कोई बीमारी नहीं है, इसलिए अगर बच्चे को बुखार (baby ko bukhar) है तो उसे किसी प्रकार का संक्रमण या फ्लू हो सकता है। शिशु के शरीर का सामान्य तापमान 97.5 से 99 डिग्री तक होता है, अगर शिशु का तापमान इससे ज्यादा है तो बच्चे को बुखार (fever in hindi) हो सकता है।

डॉक्टर कहते हैं कि अगर बच्चे को हल्का बुखार (fever in hindi) है तो उसे दवा देने की ज़रूरत नहीं होती है, ऐसा बुखार अपने आप ठीक हो सकता है। मगर बच्चे को बुखार (fever in hindi) होने पर उसे एक बार डॉक्टर को ज़रूर दिखाएँ।

नवजात शिशु के रोग - बच्चे को बुखार क्यों होता है? 
(Bache ko bukhar kyun hota hai)
शिशु को संक्रमण होने की वजह से बुखार होता है।
शरीर में पानी की कमी से बच्चे को बुखार होता है।
ज्यादा गर्मी लगने से बच्चे को बुखार होता है।
वायरल संक्रमण जैसे फ्लू (flu in hindi) आदि होने की वजह से बच्चे को बुखार होता है।
शिशु को टीके (vaccination in hindi) लगने की वजह से बच्चे को बुखार होता है।
गलत दवाओं की वजह से बच्चे को बुखार होता है।
नवजात शिशु के रोग - बच्चे को बुखार के लक्षण क्या हैं? 
(Baby ko bukhar hone ke lakshan kya hai)

शिशु के शरीर का तापमान 100 डिग्री से ज्यादा होना
शिशु का काँपना
शिशु की आँखें सूजना
शिशु की आँखें व चेहरा लाल होना
शिशु को भूख ना लगना
शिशु का चिड़चिड़ा हो जाना
शिशु को ज्यादा पसीना आना

नवजात शिशु के रोग - बच्चे के बुखार का इलाज क्या है? 
(Bache ke bukhar ka ilaj kya hai)
बच्चे के बुखार का इलाज (fever treatment in hindi) करने के लिए सबसे पहले डॉक्टर यह जानने की कोशिश करते हैं कि बच्चे को बुखार (fever in hindi) क्यों हुआ है। इसके लिए वह आपसे शिशु की बीमारी के लक्षण पूछते हैं, अगर शिशु को फ्लू जैसा कोई संक्रमण (infection in hindi) है तो डॉक्टर शिशु को एंटीबायोटिक (antibiotic in hindi) दवाईयाँ देते हैं, कभी कभी बुखार (fever in hindi) कम करने के लिए शिशु को एंटीबायोटिक इंजेक्शन भी लगाया जाता है।

अगर शिशु के लक्षणों से बुखार (fever in hindi) की सही वजह के बारे में पता नहीं चलता है, तो डॉक्टरशिशु के रक्त की जाँच (blood test in hindi) करके रोग का पता लगाते हैं और फिर रोग का इलाज करते हैं।

नवजात शिशु के रोग - बच्चे को बुखार से कैसे बचाएं? 
(Baby ko bukhar se bachane ke upay kya hai)
शिशु को हाथ लगाने या उसे खाना खिलाने से पहले अपने हाथ साबुन से धोएं।
खाँसते और छींकते समय अपने मुँह पर रुमाल रखें।
बच्चे को सही समय पर सभी टीके (vaccination in hindi) लगवाएं।
शिशु के भोजन व खिलौनों की साफ सफाई का विशेष ध्यान रखें।
शिशु को ज़रूरत से ज्यादा कपड़े ना पहनायें।

नवजात शिशु के रोग - बच्चे को टाइफाइड होना 
(Baby ko typhoid hona)

टाइफाइड (typhoid in hindi) एक संक्रामक रोग है जो आमतौर पर प्रदूषित पानी या भोजन की वजह से फैलता है। टाइफाइड (typhoid in hindi) शिशुओं की एक आम बीमारी है, लेकिन अगर सही समय पर टाइफाइड का इलाज ना किया जाए तो यह शिशु के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। टाइफाइड (typhoid in hindi) रोग बैक्टीरियम सालमोनेला टाइफी (bacterium salmonella typhi in hindi) नामक एक जीवाणु की वजह से होता है।

नवजात शिशु के रोग - नवजात शिशु को टाइफाइड क्यों होता है? 
(Bache ko typhoid kyu hota hai)

टाइफाइड (typhoid in hindi) रोग की मुख्य वजह प्रदूषित पानी और भोजन होता है।
जीवाणु दूषित जल व खाने के जरिए शरीर में जाकर शिशु को बीमार कर देता है।

नवजात शिशु के रोग - नवजात शिशु को टाइफाइड होने के लक्षण क्या होते हैं? 
(Baby ko typhoid hone ke lakshan kya hote hai)
शिशु को एक हफ़्ते से ज्यादा समय तक 104 डिग्री फारेनहाइट से ज्यादा बुखार (fever in hindi) होना
शिशु को बहुत थकान होना
शिशु के गले में सूजन
शिशु की जीभ पर सफेद पदार्थ जमना
शिशु के पेट में दर्द व सूजन
शिशु को भूख ना लगना
शिशु का वजन कम होना
पेट के ऊपरी हिस्से पर लाल लाल निशान होना

नवजात शिशु के रोग - बच्चे के टाइफाइड का इलाज क्या है? 
(Bache ke typhoid ka ilaj kya hai)

डॉक्टर शिशु के टाइफाइड (typhoid in hindi) के लक्षणों की जाँच करके यह पता लगाने की कोशिश करते हैं, कि शिशु के लिए कौनसा इलाज सबसे बेहतर रहेगा। लक्षणों के आधार पर डॉक्टर शिशु को एंटीबायोटिक दवाईयाँ देते हैं, बच्चे को डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही दवा दें (typhoid treatment in hindi)।

अगर तीन से चार दिनों में बच्चे की तबियत में सुधार ना आये, तो उसे दोबारा डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए। दो वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों को टाइफाइड का टीका (thyphoid vaccination in hindi) लगाया जाता है और छह वर्ष से ज्यादा आयु के बच्चों को टाइफाइड की दवा पिलाई जाती है।

नवजात शिशु के रोग - बच्चे को टाइफाइड से कैसे बचाएं? 
(Baby ko typhoid se bachane ke upay kya hai)

बच्चे को पानी, अच्छी तरह उबालकर, ठंडा करके ही पिलायें, इससे टाइफाइड (typhoid in hindi) के जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।
शिशु को कम से कम दो साल तक स्तनपान (stanpan) करवाएं, इससे शिशु की बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। अगर आपने शिशु का स्तनपान बंद कर दिया है तो, शिशु को पौष्टिक भोजन खिलाएं।
अगर शिशु ठोस खाना खाने लगा है, तो उसे फल और सब्जियां अच्छी तरह धोकर ही खिलायें।
घर को साफ रखें और शिशु को खाना खिलाने से पहले हाथ ज़रूर धोएं।
बिना हाथ धोये किसी को शिशु को छूने या गोद में लेने ना दें।

नवजात शिशु के रोग - नवजात शिशु को निमोनिया होना 
(Baby ko pneumonia hona)

नवजात शिशु के फेफड़े जन्म के समय पूरी तरह विकसित नहीं होते हैं और इसके साथ ही शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता (immunity in hindi) भी कम होती है। ऐसे में शिशु को निमोनिया (pneumonia in hindi) या फेफड़ों में संक्रमण होने की आशंका ज्यादा होती है।

इस बीमारी में शिशु के फेफड़ों में पस या मवाद इकट्ठा हो जाता है जिससे रक्त में सही मात्रा में ऑक्सीजन (oxygen in hindi) नहीं पहुंच पाती। अगर शिशु की इस बीमारी का ठीक से इलाज ना करवाया जाए, तो इससे शिशु के स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान हो सकता है।
सही इलाज से निमोनिया (pneumonia in hindi) एक से दो हफ़्तों में ठीक हो जाता है, लेकिन कुछ मामलों में निमोनिया को ठीक होने में चार से छह हफ्ते तक लग सकते हैं।

नवजात शिशु के रोग - बच्चे को निमोनिया क्यों होता है? 
(Bache ko pneumonia kyun hota hai)

निमोनिया (pneumonia in hindi) की समस्या एक तरह के कीटाणुओं (वायरस, फफूंदी (fungus in hindi), जीवाणु (bacteria in hindi) और परजीवी (parasites in hindi) की वजह से होती है। शिशुओं में निमोनिया (pneumonia in hindi) की मुख्य वजह वायरस होता है। निमोनिया (pneumonia in hindi) की शुरुआत नाक व गले के संक्रमण से होती है और धीरे धीरे निमोनिया फेफड़ों तक पहुंच जाता है।

नवजात शिशु के रोग - बच्चे को निमोनिया होने के लक्षण क्या हैं? 
(Baby ko pneumonia hone ke lakshan kya hai)
शिशु का तेज साँसे लेना
शिशु का घरघराहट की आवाज़ के साथ साँस लेना
शिशु को बुखार होना
शिशु को खाँसी व कफ की समस्या होना
शिशु की नाक बहना
शिशु का शरीर काँपना
शिशु को उल्टी (vomiting in hindi) होना
शिशु की छाती में दर्द होना
शिशु का गुमसुम रहना
शिशु को भूख कम लगना
गंभीर स्थिति में शिशु के होठों और नाखूनों का सलेटी या नीला दिखना

नवजात शिशु के रोग - शिशु के निमोनिया का इलाज क्या है? 
(Bache ke pneumonia ka ilaj kya hai)


शिशु को निमोनिया से बचाने के लिए निमोनिया का टीका (pneumonia vaccination in hindi) लगाया जाता है। डॉक्टर शिशु की जाँच करके निमोनिया की वजह पता करते हैं, अगर शिशु को वायरस (virus in hindi) की वजह से निमोनिया (pneumonia in hindi) हुआ है, तो उसे दवाई नहीं दी जाती है, इस तरह का निमोनिया अपने आप ठीक हो जाता है।

लेकिन अगर शिशु को बैक्टीरिया (bacteria in hindi) की वजह से निमोनिया (pneumonia in hindi) हुआ है, तो डॉक्टर उसे नवजात शिशुओं के लिए बनी एंटीबायोटिक दवाईयाँ देते हैं। शिशु को ज्यादा तेज बुखार और साँस लेने में परेशानी होने की स्थिति में उसे अस्पताल में भर्ती किया जा सकता है।
नवजात शिशु के रोग - शिशु को निमोनिया से बचाने के उपाय 
(Baby ko pneumonia se bachane ke upay kya hai)
शिशु को निमोनिया का टीका (pneumonia vaccination in hindi) लगाने से कुछ प्रकार के निमोनिया से सुरक्षित रखा जा सकता है,यह टीका बच्चे के जन्म के 6 हफ्ते के बाद लगता है।
शिशु को बीमार लोगों से दूर रखें।
शिशु को छूने से पहले हाथ अच्छी तरह धोयें और बिना हाथ धोये किसी को शिशु को हाथ ना लगाने दें।
शिशु के बिस्तर और खिलौनों को नियमित रूप से साफ करें।
शिशु को फ्लू का टीका (flu vaccination in hindi) ज़रूर लगवाएं, क्योंकि फ्लू की बीमारी निमोनिया (pneumonia in hindi) में बदल सकती है।
शिशु के आसपास किसी को धूम्रपान (बीड़ी, सिगरेट आदि) ना करने दें।
शिशु के कपड़े, खाने के बर्तन आदि चीजें किसी के साथ साझा ना करें।
शिशु को अच्छी तरह स्तनपान (breastfeeding in hindi) करवाएं।

नवजात शिशु के रोग - नवजात शिशु में पीलिया रोग होना 
(Baby ko jaundice in hindi)

समय-पूर्व प्रसव (premature delivery in hindi) से पैदा हुए नवजात शिशु में पीलिया (jaundice in hindi) की बीमारी बेहद आम है। इसके अलावा आम बच्चों (समय पर पैदा हुए बच्चों) में भी पीलिया की समस्या अक्सर देखने को मिलती है। पीलिया रोग में शिशु की त्वचा, नाखून व आँखों के सफेद भाग का रंग पीला हो जाता है। यह खून में बिलिरुबिन (bilirubin in hindi) नामक तत्व की ज्यादा मात्रा होने की वजह होता है।

नवजात शिशु के रोग - नवजात शिशु को पीलिया क्यों होता है? 
(Bache ko piliya kyu hota hai)

शिशु के खून की लाल रक्त कोशिकाओं (red blood cells in hindi) के टूटने की वजह से बिलिरुबिन (bilirubin in hindi) नामक पदार्थ बनता है, जिसे लिवर खून से हटाने का काम करता है। शिशु का लिवर अविकसित होने की वजह से खून को अच्छी तरह साफ नहीं कर पाता और शिशु के खून में बिलिरुबिन (bilirubin in hindi) की मात्रा बढ़ने की वजह से नवजात शिशु में पीलिया (jaundice in hindi) की समस्या पैदा हो जाती है।
कई बार माँ का शरीर गर्भ में पल रहे शिशु की रक्त कोशिकाओं को नष्ट करने लगता है, इससे शिशु जन्म के समय से ही पीलिया रोग (jaundice in hindi) से ग्रस्त होता है।
अगर शिशु ने जन्म के समय खून निगल लिया हो, तो नवजात शिशु में पीलिया (jaundice in hindi) की समस्या हो सकती है।

नवजात शिशु के रोग - नवजात शिशु में पीलिया रोग के लक्षण क्या हैं? 
(Baby ko piliya hone ke lakshan kya hote hai)
त्वचा और आँखों का पीला रँग
शौच का रंग हल्का पीला या सफेद होना
शिशु का ठीक से स्तनपान (breastfeeding in hindi) ना करना
शिशु का थका हुआ रहना
शिशु का पतली आवाज़ में रोना

नवजात शिशु के रोग - नवजात शिशु में पीलिया की समस्या का इलाज क्या है? 
(Bache ka piliya kaise thik hoga)

नवजात शिशु में पीलिया का इलाज (jaundice treatment in hindi) शुरू करने से पहले डॉक्टर नवजात शिशु के रक्त की जाँच करते हैं, ताकि उसके खून में बिलिरुबिन (bilirubin in hindi) की मात्रा का पता लग सके, इसके बाद डॉक्टर पीलिया का इलाज (jaundice treatment in hindi) शुरू करते हैं। शिशु के पीलिया का इलाज निम्न तरह से किया जा सकता है -


उचित जाँच करवा कर आप नवजात शिशु में पीलिया (jaundice in hindi) की समस्या का शुरुआती अवस्था में ही इलाज करवा सकती हैं।


नियमित स्तनपान (stanpan) करवाना - नवजात शिशु में पीलिया के लक्षण दिखाई देने पर शिशु को पर्याप्त मात्रा में दूध पिलाने की कोशिश की जाती है, इससे शिशु ज्यादा पेशाब व शौच करता है और इसके ज़रिये खून से बिलिरुबिन (bilirubin in hindi) बाहर निकलने लगता है।


फोटोथेरेपी (phototherapy in hindi) - इस रोग के साथ पैदा हुए नवजात शिशु में पीलिया का इलाज (jaundice treatment in hindi) फोटोथेरेपी से किया जाता है। शिशु को डायपर और आँखो पर विशेष मास्क पहनाकर विशेष नीली रौशनी में बिना कपड़ों के रखा जाता है। ये रौशनी बिलिरुबिन को ल्युमिरुबिन (lumirubin in hindi) नामक कम हानिकारक पदार्थ में बदल देती है, इससे शिशु के खून में बिलिरुबिन कम हो जाता है और नवजात शिशु में पीलिया (jaundice in hindi) की समस्या कम होने लगती है।

खून चढ़ाना - नवजात शिशु में पीलिया (jaundice in hindi) के गम्भीर मामलों में जब इलाज के सभी तरीके असफल हो जाते हैं, तब शिशु के शरीर में बिलिरुबिन की मात्रा तेजी से घटाने के लिए उसे खून चढ़ाया जाता है।

हर माँ अपने बच्चे को हमेशा हँसता खिलखिलाता हुआ देखना चाहती है, इसलिए शिशु के बीमार होने पर माँ बहुत परेशान हो जाती है। बीमार होना शिशु के विकास का एक अहम भाग है, इसलिए शिशु के बीमार होने पर परेशान होने के बजाय उसकी उचित देखभाल करें।

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