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विलीस-इकबॉम डिजीज या रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम


विलीस-इकबॉम डिजीज या रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम
निचले पैरों की ज्यादा गतिशीलता रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम का संकेत हो सकती है। अगर आपको लगता है कि आप इससे पीड़ित हो हैं, तो डॉक्टर से जरूर मिलें।
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लगातार पैर हिलाने की इच्छा एक बीमारी का लक्षण हो सकती है। अगर लेटने पर अपने निचले पैरों को हिलाने की खूब इच्छा महसूस होती है तो शायद आप विलीस-इकबॉम डिजीज (Willis-Ekbom Disease) या रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम (Restless Legs Syndrome) से पीड़ित हैं।

इस रोग के मामले में समस्या यह है कि इसका कारण अभी भी अज्ञात है। पर यह तर्क दिया जाता है कि यह नर्वस सिस्टम की एक गड़बड़ी है। इस रोग के एक गंभीर रूप से दुनिया की 3% आबादी पीड़ित है।
विलीस-इकबॉम डिजीज या रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम


इस रोग के जोखिम से जुड़े कुछ कारण जरूर हैं, पर इसकी सटीक वजह अभी अज्ञात है।

कुछ आंकड़े बताते हैं कि ग्लोबल आबादी के लगभग 10% हिस्से में इससे जुड़े लक्षण दिखते हैं। यह भी मालूम है कि यह सभी उम्र के पुरुष और महिलायें, दोनों को प्रभावित करती है। हालांकि इसके लक्षण 40 साल की आयु के बाद तेज हो सकते हैं।

एनीमिया, किडनी फेल्योर और कुछ दवाएं इस सिंड्रोम के प्रकट होने का कारण बन सकती हैं। महिलाओं में गर्भावस्था भी इसका कारण बन सकती है।

वर्तमान में, यह माना जाता है कि यह स्थिति डोपामाइन एक्टिवेशन (dopamine activation) से जुड़ी है। यह न्यूरोट्रांसमीटर सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम के जरिये मूवमेंट और कोआर्डिनेशन के लिए जिम्मेदार है।

इस स्थिति को दो रूपों में बांटा गया है: प्राइमरी और सेकेंडरी। इसमें से पहला बिना किसी ज्ञात कारण वाला माना जाता है, जबकि दूसरा विशेष स्थितियों से जुड़ा होता है।


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कई तरह के भ्रामक लक्षण

रेस्टलेस लेग सिंड्रोम या चंचल पैरों वाला सिंड्रोम की समस्या यह है कि इसके लक्षण कई तरह के होते हैं और उन पर ध्यान देना मुश्किल होता है। कुछ मामलों में यह सिर्फ एक पैर को हिलाने की इच्छा के साथ प्रकट होता है। हालाँकि, इस स्थिति में दूसरी तकलीफ़देह अभिव्यक्तियाँ हो सकती हैं।

कुछ रोगी अपने पैरों में असुविधा और अप्रिय उत्तेजना की रिपोर्ट करते हैं। कभी-कभी यह असुविधा ऐंठन और झुनझुनी (cramps and tingling) में बदल सकती है। इनमें से कई लक्षण रात में ही आते हैं, इसलिए सो पाना मुश्किल बना देते हैं।

इससे दिन में थकान और उनींदापन रह सकता है। इसके अलावा, पैर को हिलाने की यह इच्छा सर्केडियन रिद्म से जुड़ा है। मतलब यह है कि स्थिति आमतौर पर दोपहर और शाम को बिगड़ जाती है।
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इस स्थिति वाले मरीज़ खराब नींद की गुणवत्ता के अलावा झुनझुनी और बेचैनी का शिकार होते हैं।
यहां इसके लक्षणों और संकेतों की एक सूची दी गई है:
आराम करते समय एक पैर को हिलाने की तीव्र इच्छा। इस स्थिति को रिफ्लेक्स या हाइपरएक्टिविटी के रूप में नहीं देखना चाहिए। वास्तव में, यह मूवमेंट आमतौर पर आराम करते समय होता है।
इसके लक्षण रात में उभरते हैं। डायग्नोसिस किये गए ज्यादातर रोगियों में दिन के दौरान पैरों को हिलाने की इच्छा नहीं होती है।
रात को पैरों में ऐंठन। नींद के दौरान समय-समय पर अंगों की हलचल होती है। यह अपने आपमें सिंड्रोम से जुड़ी एक और स्थिति है। रात को होने वाली यह ऐंठन नींद के दौरान भी हो सकती है।
हिलाने-डुलाने से राहत मिलती है। यदि आपको खुजली, बेचैनी या दर्द का अनुभव हो रहा है, तो भी हिलाने-डुलाने से झुनझुनी की सनसनाहट में राहत मिल सकती है।


संभावित इलाज
अगर आपको असुविधा महसूस हो तो अपने पैरों को हिलाने की कोशिश करनी चाहिए। बिस्तर से उठना और कुछ मिनटों के लिए चलना भी ठेक रहेगा। इसका नेगेटिव साइड यह है कि यह स्थिति जीवन की खराब गुणवत्ता की ओर ले जाती है। क्योंकि जो लोग इससे पीड़ित हैं, उन्हें रात में अच्छी नींद नहीं मिलती।

नींद की गुणवत्ता में सुधार के लिए विभिन्न इलाजों को आज़माना ज़रूरी है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण भी हैं जिन्हें अपनाकर कुछ सुधार का महसूस कर सकते हैं। कुछ एक्सपर्ट कॉग्निटिव बिहैविअरल थेरेपी की सलाह देते हैं। क्योंकि अक्सर यह सिंड्रोम मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक पहलुओं सेम जुड़ा होता है।

जो लोग मानते हैं कि वे चंचल पैरों वाले सिंड्रोम से पीड़ित हैं, उन्हें डॉक्टर की मदद लेनी चाहिए। हालांकि यह गैरज़रूरी लग सकता है, लेकिन इन लक्षणों का असर उम्र के साथ बिगड़ने लगता है। यहां तक ​​कि अगर कोई डायग्नोस्टिक टेस्ट नहीं है, तो भी मामले को एक प्रोफेशनल की निगाह में लाना चाहिए।

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