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आसन से लाभ


अर्ध- चक्रासन के लाभ और विधि

अर्धचक्रासन का अर्थ तथा करें कैसे अर्धचक्रासन में शरीर आधा चक्र बनाता है इसलिए इसे अर्धचक्रासन कहते हैं। लेकिन यह ध्यान रखें कि अर्धचक्रासन आधा नहीं बल्कि शरीर को संपूर्ण लाभ पहुंचाता है। इस आसन में सबसे अहम हमारी सांस लेने की क्रिया पर जोर देना होता है। इसकी एक वजह यह है कि अर्ध चक्रासन के दौरान सांस की गति में हेरफेर होने से हमारे स्वास्थ्य पर इसका गहरा असर पड़ सकता है। इसे सामान्यतः विशेषज्ञ की देखरेख की जरूरत नहीं पड़ती। बावजूद इसके इसमें लापरवाही बरतना सही नहीं है। इस आसन के तहत अपने पोस्चर का ख्याल रखना आवश्यक है। गलती करने से हड्डी पर असर दिखता है। यहां तक कि कमर को पीछे की ओर ज्यादा मोड़ने की कोशिश भी खतरनाक साबित हो सकती है। यह रीढ़ की हड्डी को प्रभावित कर सकता है।

विधि इस प्रकार
सर्वप्रथम सीधे खड़े हो जाइए। पैरों को पास,हाथों को पास अब हथेलियों को कमर पर रखिए ।अंगूठों को कमर के निचले हिस्से पर रखिएगा।
पीठ को सहारा दीजिए ।साँस लेते हुए पीछे की ओर झुकिए। कुछ देर रुकिये।
रुकने की स्थिति में साँस सामान्य बनाए रखेंगे। धीरे से वापिस आ जाइए

+-बीमारियों को दूर करे

बहरहाल अर्धचक्रासन के असंख्य लाभ हैं। कमरदर्द से लेकर मांसपेशियों तक को यह सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। इससे हमारे शरीर में लचीलापन तो आता ही है साथ ही हम सीधे होकर खड़े होना भी सीख जाते हैं। छाती बाहर की तरफ होती है और कंधे कड़े हो जाते हैं। दरअसल रोजमर्रा की दौड़-भाग में नोटिस करते हैं कि हम अकसर सामने की ओर झुककर काम करते हैं, बैठते हैं। नतीजतन हमारी कमर आगे की ओर झुक जाती है। जिससे कमरदर्द जैसी समस्याओं का जन्म होता है। ऐसी तमाम समस्याओं का निदान अकेले अर्धचक्रासन में समाहित है।

अर्धचक्रासन के फायदे
कमर दर्द, स्लिप डिस्क, सायटिका के रोगी भी कर सकते हैं।
इससे पीठ, गर्दन और कमर की मांसपेशियों को बल मिलता है।
इस आसन से कंधे चौड़े और छाती बाहर की तरफ हो जाती है।
अर्ध चक्रासन के जरिये हम सीधा चलना व बैठना सीख जाते हैं।

कमर दर्द, स्लिप डिस्क और सायटिका के मरीजों को तमाम आसन करने से बचना चाहिए। लेकिन यह एक ऐसा आसन है जिसे करने से उन्हें भी लाभ पहुंच सकता है। यही नहीं इसके नियमित करने से पीठ, गर्दन और कमर की मांसपेशियों को बल मिलता है। परिणामस्वरूप ज्यादा शारीरिक काम करने के बावजूद हमें थकन का एहसास कम होता है।
अर्धचक्रासन का एक लाभ मेरुदण्ड लचीली होती है ।सिर में रक्त संचार तेज होता है। कमर दर्द में लाभप्रद है। कमर की चर्बी को कम करता है।पेट के रोगों मे भी लाभ देता है। गर्दन की मासपेशीयाँ मजबूत होती हैं। यह भी है कि हम सीधे होकर चलना सीख जाते हैं। जिन लोगों का ज्यादातर काम कुर्सी पर बैठकर करने का होता है, उनके लिए यह आसन किसी वरदान से कम नहीं है। जब भी कमर में अकड़न हो, पीठ में दर्द हो या गर्दन दर्द से परेशान हो रही हो। इस आसन को एक बार कर लेने से इस तरह की समस्याओं से छुट्टी मिल जाती है। इस आसन की सबसे अच्छी बात यह है कि जब भी थकान महसूस करें तभी इस आसन को किया जा सकता है। इसके लिए विशेष समय की भी जरूरत नहीं होती और न ही जगह के चयन से सम्बंधित कोई समस्या है।

रखें सावधानी 

इस आसन को करते हुए यह ध्यान रखें कि कभी भी अपनी कमर को अतिरिक्त मोड़ने की चेष्टा न करें। इससे कमर में लचक आ सकती है। अपनी गर्दन कभी झटके से पीछे न ले जाएं। इससे गर्दन के अकड़ने की आशंका बढ़ जाती है। यह आसन शरीर को संतुलित बनाए रखना सिखाता है। इसलिए हमेशा अपने शरीर के संतुलन में फोकस करें। फिर चाहे वह कमर हो या गर्दन।

योग का फायदा तभी मिलता है जब इसे आप नियमित रूप से करते हैं, कोशिश यह करें कि योगासन सुबह के वक्‍त करें।

शवासन – विधि – लाभ


मृत शरीर जैसे निष्क्रिय होता है उसी प्रकार इस आसन में शरीर निष्क्रिय मुद्रा में होता है अत: इसे शवासन कहा जाता है. इस आसन का अभ्यास कोई भी कर सकता है. यह शरीर को रिलैक्स प्रदान करने वाला योग है.
विधि 
पीठ के बल लेट जाएं. इस अवस्था में पैर ज़मीन पर बिल्कुल सीधे होने चाहिए.
सांस छोड़ते हुए दोनों पैरों को अपनी अपनी दिशा में हल्का सा घुमाएं.
दोनों हाथों को शरीर के दोनो तरह हिप्स से 6 से 8 इंच की दूरी पर फैलाकर रखें. इस स्थिति में हथेलियों को छत की दिशा में रखें.
सांस छोड़ते हुए कंधे को ज़मीन से लगाएं और बांहों को कंधे से दूर ले जाएं.
आंखों को धीरे धीरे बंद करें और इस मुद्रा में 5 से 20 मिनट तक बने रहें.

लाभ 
थकान एवं मानसिक परेशानी की स्थिति में यह आसन शरीर और मन को नई उर्जा प्रदान करने वाला है.
मानसिक तनाव को दूर करने के लिए भी इस आसन का अभ्यास बहुत ही अच्छा होता है.
योग अभ्यास के दौरान सबसे अंत में इसका अभ्यास करना चाहिए इससे शरीर रिलैक्स हो जाता है.
सिर दर्द, अनिद्रा और चिंता की स्थिति में शवासन बहुत ही लाभप्रद होता है.



शीर्षासन – विधि – लाभ
विधि 
शीर्षासन करने के लिए के सबसे पहले दरी बिछा कर समतल स्थान पर वज्रासन की अवस्‍था में बैठ जाएं।
अब आगे की ओर झुककर दोनों हाथों की कोहनियों को जमीन पर टिका दें।
दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में जोड़ लें।
अब सिर को दोनों हथेलियों के मध्य धीरे-धीरे रखें। सांस सामान्य रखें।
सिर को जमीन पर टिकाने के बाद धीरे-धीरे शरीर का पूरा वजन सिर छोड़ते हुए शरीर को ऊपर की उठाना शुरू करें।
शरीर का भार सिर पर लें।
लाभ 
सेक्स उर्जा को ट्रांसफर्म करने का सबसे बेहतर आसन
आप चेहरे को लम्बे समय तक चमकदार और स्वस्थ बनाये रखना चाहते हैं तो यह बहुत कारगर है।
उल्टा खड़े होने की स्थिति में ताजा पोषण और ऑक्सीजन चेहरे की तरफ संचारित होते हैं जिससे त्वचा चमकदार हो जाती है।
शीर्षासन से सिर नीचे की ओर मुड़ जाता है जिससे चहरे में चमक आती है
सिर पर सफेद बाल अपने आप ही काले होने लग जाते हैं।
शीर्षासन करने से खून साफ होता है।
अवसाद की बीमारी दूर होती है, पाचनतंत्र स्‍वस्‍थ रहता है।
स्मरण शक्ति काफी अधिक बढ़ जाती है।

मयूरासन – विधि – लाभ

इसमें शरीर मोर की तरह आकार लेता है, इसलिए इसे मयूरासन कहते हैं।

विधि 
जमीन पर पेट के बल लेट जाइए।
दोनों पैरों के पंजों को आपस में मिलाइए।
दोनों घुटनों के बीच एक हाथ का अंतर रखते हुए दोनों पैरों की एड़ियों को मिलाकर गुदा को एड़ी पर रखिए।
फिर दोनों हाथों को घुटनों के अंदर रखिए ताकि दोनों हाथों के बीच चार अंगुल की दूरी रहे।
दोनों कोहनियों को आपस में मिला कर नाभि पर ले जाइए।
अब पूरे शरीर का वजन कोहनियों पर दे कर घुटनों और पैरों को जमीन से उठाये रखिए। सिर को सीधा रखिए।

लाभ 
यह आसन चेहरे पर लाली प्रदान करता है तथा उसे सुंदर बनाता है।
सामान्य रोगों के अलावा मयूर आसन से आंतों व अन्य अंगों को मजबूती मिलती है। मयूरासन से आमाशय और मूत्राशय के दोषों से मुक्ति मिलती है।
यह आसन फेफड़ों के लिए बहुत उपयोगी है।
यह आसन भुजाओं और हाथों को बलवान बनाता है।
यह आसन शरीर में रक्त संचार को नियमित करता है।
इस आसन का अभ्यास करने वालों को मधुमेह रोग नहीं होता। यदि यह हो भी जाए तो दूर हो जाता है।
पाचन क्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए मयूरासन करना चाहिए।
यदि आपको पेट संबंधी समस्याएं जैसे गैस बनना, पेट में दर्द रहना, पेट साफ ना होना इत्यादि होता है तो आपको मयूरासन करना चाहिए।
यह आसन पेट के रोगों जैसे-अफारा, पेट दर्द, कब्ज, वायु विकार और अपच को दूर करता है 

त्रिकोणासन – विधि – लाभ

त्रिकोण आसन का अभ्यास खड़ा रहकर किया जाता है.यह आसन पार्श्व कोणासन से मिलता जुलता है.इस योग से हिप्स, पैर, टखनों, पैरों और छाती का व्यायाम होता है.यह मु्द्रा कमर के लिए भी लाभप्रद है.इस मुद्रा का अभ्यास किस प्रकार करना चाहिए.इस मुद्रा की अवस्था क्या है एवं इससे क्या लाभ मिलता है आइये इसे देखें.

विधि 
विश्राम की मुद्रा में खड़े हो जाएं.
दाएं पैर को 3 से 5 फीट फैलाएं.
बाएं पैर को 45 डिग्री और दाएं पैर को 90 डिग्री मोड़े.
सांस लेते हुए कंधों की ऊँचाई में बांहों को फैलाएं.इस स्थिति में हथेलियों को ज़मीन की दिशा में रखना चाहिए.
हिप्स को पीछे ले जाएं और शरीर के ऊपरी भाग को दायीं ओर लाएं.
सांस छोड़ते हुए दायी हथेली को दांए पैर के पीछे ले जाएं.
बाएं हाथ को छत की दिशा में ऊपर ले जाएं.
सिर को बायें हाथ की दिशा में घुमाकर देखें.इस अवस्था में मेरूदंड सीधा और गर्दन रिलैक्स होना चाहिए.
इस मुद्रा में 10 से 30 सेकेण्ड तक बने रहें.

लाभ 
आप नियमित रूप से त्रिकोण मुद्रा का अभ्यास करते हैं तो शरीर से तनाव दूर होता है और लचीलापन आता है
इस योग के अभ्यास से हिप्स ,पैर, टखनों एवं पैरो में दृढता आती है और इनमें लोच बना रहता है.
योग की इस मुद्रा से रीढ़ की हड्डियां सीधी रहती है एवं छाती फैलती है.

निर्माण 

जब कमर में तकलीफ या परेशानी हो उस समय इस योग का अभ्यास नहीं करना चाहिए.

सुप्त बद्धकोणासन योग – विधि – लाभ

विधि 
शवासन की मुद्रा में पीठ के बल लेट जाएं.
बांहों को शरीर के दोनों तरफ पैर की दिशा में फैलाकर रखें. इस स्थिति में हथेलियां छत की दिशा में रहनी चाहिए.
घुटनो को मोड़ें और तलवों को ज़मीन से लगाकर रखें.
दोनों तलवों को नमस्कार की मुद्रा में एक दूसरे के करीब लाकर ज़मीन से लगाएं.
जितना संभव हो ऐड़ियों को जंघा की ओर करीब लाएं.
इस मुद्रा में 30 सेकेण्ड से 1 मिनट तक बने रहें.
हाथों से दोनो जंघा को दबाएं और धीर धीरे सामान्य स्थिति में लौट आएं.

लाभ 

हिप्स एवं पेडु में मौजूद तनाव को दूर करने के लिए यह उत्तम व्यायाम होता है.

इस आसन से जंघाओं को रिलैक्स मिलता है.

पैरो में दर्द एवं थकान की स्थिति में इस आसन का अभ्यास लाभप्रद होता है. 

निर्माण
सुप्त बद्धकोणासन का अभ्यास करते समय कुछ सावधानियों का भी ख्याल रखना चाहिए. घुटनों में तकलीफ होने पर आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए. हिप्स एवं कमर में परेशानी की स्थिति में भी इस आसन का अभ्यास उचित नहीं होता है.

मयूरासन – विधि – लाभ

इसमें शरीर मोर की तरह आकार लेता है, इसलिए इसे मयूरासन कहते हैं।

विधि 
जमीन पर पेट के बल लेट जाइए।
दोनों पैरों के पंजों को आपस में मिलाइए।
दोनों घुटनों के बीच एक हाथ का अंतर रखते हुए दोनों पैरों की एड़ियों को मिलाकर गुदा को एड़ी पर रखिए।
फिर दोनों हाथों को घुटनों के अंदर रखिए ताकि दोनों हाथों के बीच चार अंगुल की दूरी रहे।
दोनों कोहनियों को आपस में मिला कर नाभि पर ले जाइए।
अब पूरे शरीर का वजन कोहनियों पर दे कर घुटनों और पैरों को जमीन से उठाये रखिए। सिर को सीधा रखिए।

लाभ 
यह आसन चेहरे पर लाली प्रदान करता है तथा उसे सुंदर बनाता है।
सामान्य रोगों के अलावा मयूर आसन से आंतों व अन्य अंगों को मजबूती मिलती है। मयूरासन से आमाशय और मूत्राशय के दोषों से मुक्ति मिलती है।
यह आसन फेफड़ों के लिए बहुत उपयोगी है।
यह आसन भुजाओं और हाथों को बलवान बनाता है।
यह आसन शरीर में रक्त संचार को नियमित करता है।
इस आसन का अभ्यास करने वालों को मधुमेह रोग नहीं होता। यदि यह हो भी जाए तो दूर हो जाता है।
पाचन क्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए मयूरासन करना चाहिए।
यदि आपको पेट संबंधी समस्याएं जैसे गैस बनना, पेट में दर्द रहना, पेट साफ ना होना इत्यादि होता है तो आपको मयूरासन करना चाहिए।
यह आसन पेट के रोगों जैसे-अफारा, पेट दर्द, कब्ज, वायु विकार और अपच को दूर करता है 


वज्रासन – विधि – लाभ

वज्रासन सामान्य रूप से बैठकर किया जाना जाने वाला योग है. इस योग में जंघाओं, घुटनों, पैरों एवं कोहनियों का व्यायाम होता है. इस मु्द्रा से शरीर का पीछला भाग संतुलित रहता है. शरीर को सुडौल बनाए रखने के लिए भी यह योग लाभप्रद होता है.

विधि 
घुटने टेक कर ज़मीन पर बैठें. घुटनों के ऊपरी भाग हिप्स से लगे हों और तलवों के ऊपरी भाग ज़मीन से लगे हों.
सांस छोड़ते हुए अपने एड़ियों पर बैठें.
अपने हाथों को जंघाओं के ऊपर घुटनो के करीब रखें.
कंधे व शरीर के ऊपरी भाग आरामदायक स्थिति में होने चाहिए और मेरूदंड सीधा एवं तना होना चाहिए.
सिर को सीधा रखें और सामने देखना चाहिए.
इस मु्द्रा में 30 सेकेंड से 1 मिनट तक बने रहें.

लाभ 
जिन्हें पीठ में और कमर में पीड़ा रहती है उनके लिए वज्रासन बहुत ही लाभप्रद योग है
ध्यान मुद्रा के लिए भी वज्रासन बहुत ही लाभप्रद है क्योंकि इससे मेरूदंड सीधा होता है
शरीर का ऊपरी भाग रिलैक्स महसूस करता है.

निर्माण 

जब घुटनों अथवा टखनों में किसी प्रकार की परेशानी हो उस समय वज्रासन का अभ्यास नहीं करना चाहिए.



योग से गैस की दिक्कत को यूं करें गायब

पेट गैस को अधोवायु बोलते हैं। इसे पेट में रोकने से कई बीमारियां हो सकती हैं, जैसे एसिडिटी, कब्ज, पेटदर्द, सिरदर्द, जी मिचलाना, बेचैनी आदि। लंबे समय तक अधोवायु को रोके रखने से बवासीर भी हो सकती है। आयुर्वेद कहता है कि आगे जाकर इससे नपुंसकता और महिलाओं में यौन रोग होने की भी आशंका हो सकती है।

गैस बनने के लक्षण 
पेट में दर्द, जलन, पेट से गैस पास होना, डकारें आना, छाती में जलन, अफारा। इसके अलावा, जी मिचलाना, खाना खाने के बाद पेट ज्यादा भारी लगना और खाना हजम न होना, भूख कम लगना, पेट भारी-भारी रहना और पेट साफ न होने जैसा महसूस होना।

शराब पीने से, मिर्च-मसाला, तली-भुनी चीजें ज्यादा खाने से, बींस, राजमा, छोले, लोबिया, मोठ, उड़द की दाल, फास्ट फूड, ब्रेड और किसी-किसी को दूध या भूख से ज्यादा खाने से। खाने के साथ कोल्ड ड्रिंक लेने से। इसमें गैसीय तत्व होते हैं। तला या बासी खाना।

लाइफस्टाइल 
टेंशन रखना। देर से सोना और सुबह देर से जागना। खाने-पीने का टाइम फिक्स्ड न होना।

बाकी वजहें 
लीवर में सूजन, गॉल ब्लेडर में स्टोन, फैटी लीवर, अल्सर या मोटापे से। डायबीटीज, अस्थमा या बच्चों के पेट में कीड़ों की वजह से। अक्सर पेनकिलर खाने से। कब्ज, अतिसार, खाना न पचने व उलटी की वजह से।

गैस में योग 

– कपालभाति व अग्निसार क्रिया, उत्तानपादासन, पवनमुक्तासन, हृदयस्तम्भासन, नौकासन, मंडूकासन, अर्द्धमत्स्येंद्रासन, पश्चिमोत्तानासन, वज्रासन व उडियान बंध आसन करने से आराम मिलता है।
– आमतौर पर नाभि हिलने से भी पेट में गैस बनने लगती है। पहले उसे ठीक कर लें। उसके लिए पादागुष्ठनासा स्पर्श आसन करें।
आसन करते वक्त बरतें सावधानी

बीपी और दिल के मरीज कपालभाति बहुत धीरे-धीरे करें। जिनका हाल में पेट का ऑपरेशन हुआ हो, वे यह क्रिया न करें। पेट का ऑपरेशन, हर्निया और कमर दर्द में अग्निसार क्रिया न करें। हाई बीपी या कमर दर्द हो तो उत्तानपादासन एक पैर से करें। घुटनों में दर्द हो तो वज्रासन व मंडूकासन नहीं करना चाहिए।

पानी खाइए, खाना पीजिए 
यानी खाना इतना चबा लें कि बिल्कुल पानी की तरह तरल बनने पर ही पेट में उतरें, नहीं तो दांतों का काम आंतों को करना पड़ता है। अच्छी तरह चबाया हुआ खाना अंदर जाएगा तो आंतों पर लोड कम पड़ेगा और खाना जल्दी पचेगा। जबकि पानी को इतना धीरे घूंट-घूंट कर पीएं, जैसे खा रहे हों। इससे पानी के साथ अंदर जाने वाली हवा पेट में नहीं जा पाती और पेट गैस से भरता नहीं है।
– सुबह दांत साफ करते वक्त तालू को साफ करने से अंदर रुकी हुई गैस निकल जाती है और आंखों की रोशनी भी बढ़ती है।
– हर तीन घंटे में कुछ खा लें, लेकिन ठूंसकर न खाएं, खाने के साथ पानी न पीएं, दिन में तीन-चार बार गर्म पानी पीएं, खाकर एकदम न सोएं, एक्टिव लाइफ स्टाइल रखें, एक जगह ज्यादा देर बैठे न रहें।
– एक्सर्साइज करें, इससे गैस की आशंका काफी हद तक कम हो जाती है।

क्या खाएं 
– फ्रूट और सब्जियां ज्यादा-से-ज्यादा खाएं। सब्जियों को ज्यादा तलें नहीं।
– साबुत की बजाय धुली व छिलके वाली दालें खाएं।
– सोयाबीन की बड़ियां खाएं।
– दही व लस्सी का प्रयोग करें।
– नीबू-पानी-सोडा, नारियल पानी, शिकंजी या बेल का शर्बत पीना अच्छा है।
– आइसक्रीम और ठंडा दूध ले सकते हैं।
– बादाम व किशमिश लें, पर काजू कम मात्रा में लें।
– सौंफ, हींग, अदरक, अजवायन व पुदीने का प्रयोग करना अच्छा है।
-मोटा चावल खाएं। यह कम गैस बनाता है, जबकि पॉलिश वाला चावल ज्यादा गैस बनाता है। पुलाव के बजाय चावल उबालकर खाएं।
– खाना सरसों के तेल में पकाएं। देसी घी भी ठीक है, लेकिन मात्रा सीमित रखें। वनस्पति घी और रिफाइंड से बचें।
इनसे बचें 
– तेल-मक्खन व क्रीम आदि ज्यादा न लें।
– मैदे और रिफाइंड आटे से बनी चीजें और बेकरी प्रॉडक्ट जैसे कुलचे, पूरी, ब्रेड पकौड़ा, छोले-भटूरे, परांठे, बंस, बिस्कुट, पैटीज, बर्गर व फैन आदि कम खाएं।
– नमकीन, भुजिया, मट्ठी कम खाएं।
-चना, राजमा, उड़द व मटर आदि का प्रयोग कम करें। इन्हें बनाने से पहले भिगो लें। जिस पानी में भिगोएं, उसको इस्तेमाल करके के बजाय फेंक दें।
– चाय-कॉफी ज्यादा न पीएं। खाली चाय पीने से भी गैस बनती है।
– गर्म दूध भी गैस बनाता है। अल्सर वाले ठंडा दूध लें।
– सॉफ्ट-ड्रिंक्स या कोल्ड-ड्रिंक्स न पीएं।
– मोटी इलायची, तेजपत्ता, लौंग, जावित्री, जायफल आदि साबुत मसाले तेज गंध होने से पेट को नुकसान पहुंचाकर गैस की वजह बनते हैं। इन्हें पीसकर और कम मात्रा में लें।
– राजमा, छोले, उड़द, लोबिया या साबुत दालों से गैस बन सकती है।
– अरबी-भिंडी और राजमा से परहेज रखें।
– कच्चा लहसुन, कच्चा प्याज व अदरक भी गैस बनाता है।
– मूली-खीरे आदि से गैस की शिकायत हो तो उनका परहेज करें।
– अगर खाने का ज्यादातर हिस्सा फैट या कार्बोहाइड्रेट से आता है यानी रोटी, आटा व बेसन आदि ज्यादा खाते हैं तो गैस ज्यादा बनेगी।
– संतरा व मौसमी आदि एसिडिक फलों के रस से गैस बनती है। जूस के बजाय ताजे फल खाएं।
– खाली पेट दूध पीने और खाली पेट फल खासकर सेब और पपीता खाने से गैस बनती है।
शिथिलीकरण व्यायाम

शारीरिक स्वास्थ्य और विकास के लिए लचकदार व मजबूत रीड की आवश्यकता होती है बचपन से यदि हम अपनी मांसपेशियों तक तथा रीढ़ की हड्डियों को तुरंत आवश्यकता प्रदान कर सके तो आंतरिक बल से परिपूर्ण स्वास्थ्य शरीर की आधारशिला तैयार होगी विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित किया गया है विकास होता है लिखने में सहायता मिलती है जिससे अधिक समय तक आ सकता है



प्राणायाम

प्राण शब्द जीवन का पर्यायवाची है जब तक शरीर में प्राण हैं तब तक जीवन है और जैसे ही प्राण शरीर को छोड़ देते हैं शरीर मृत्यु पर हो जाता है यहां प्राण का तात्पर्य प्राणवायू से है उपनिषद एक मान्यता के अनुसार जब प्यारी संसार में आता है तो वह निश्चित मात्रा में स्वास्थ्य लेकर आता है और उतनी ही स्वास्थ्य तक जीवित रहता है यह सत्य है कि प्राणी का जीवन 19 वर्षों तक ही सीमित है प्राणी अपने शरीर की रचना के अनुसार ही श्वास तेजी अधीर ग्रहण करता है कुछ प्राणी श्वास बहुत धीरे धीरे ग्रहण करते हैं और कुछ लंबी आयु के होते हैं तो कुछ प्यारी श्वास तेजी से ग्रहण करने के कारण अल्पायु ही प्राप्त करते हैं इस प्राण वायु के जिस प्राणी प्राणी श्वास द्वारा अंदर खींचता है एवं बाहर निकालता है नियंत्रण को प्राणायाम कहते हैं प्राणायाम दो शब्द प्राण एवं आयाम से मिलकर बना है रावण का अर्थ है प्राणवायू जीवनदायिनी शक्ति दिव्य ऊर्जा कारण स्वास्थ्य आदि से है चौथा आयाम का अर्थ निरंतर संकुचन विस्तार से है इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रणाम एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा प्राण वायु का विस्तार किया जा सकता है जिससे दूसरे शब्दों में प्राणायाम ऐसा विज्ञान है जिसके द्वारा मनुष्य अपनी आयु का विस्तार कर सकता है पर जो कि जीवन शक्ति के रूप में समस्त प्राणियों के भीतर विद्यमान रहता है उसी प्रकार की विजय विजय पाई प्राणायाम का उद्देश्य है समानता प्राणायाम अभ्यास की तीन अवस्थाएं होती हैं जिंहें पूरक रेचक कुंभक कहते हैं एवं ही रंग दो प्रकार की होती है श्वास को भीतर अथवा बाहर रोक नही प्राणायाम का वास्तविक अर्थ है इसे प्राणायाम विश्वास की लंबाई कहते हैं का विस्तार होता है ना शास्त्रों द्वारा फेफड़ों में वायु को खींचकर भरने की प्रक्रिया कहलाती है तथा वायु को नाथद्वारा बाहर फेंकने की प्रक्रिया कहलाती है धारण करने की प्रक्रिया कहलाती है जब वह आ जाए तो इसे कहते हैं तथा को निष्कासित कर के रखा जाए तो इसे कहते हैं महर्षि पतंजलि साधना पतंजलि में प्राणायाम चौथा सोपान है यम नियम आसन से पहले आते हैं तथा प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि इसके पीछे योग साधना का उद्देश्य शारीरिक मानसिक स्थापित करना है आत्मा शरीर से छूटकर स्थिति को प्राप्त हो जाए तथा प्रत्याहार ध्यान अभ्यास के साधन है जबकि प्राणायाम दोनों के बीच का शरीर और मन दोनों का महत्व होता है प्राणायाम साधना सिद्धि के दो मार्ग है मार्ग में हम ग्रह होता है साधना आती है अधिक समय तक का अभ्यास करते हुए साधना करते हैं जबकि दूसरे अभ्यास करते हैं भूत होने वाला है लेकिन गलत अभ्यास द्वारा इसके खतरे की अधिक हैं जबकि दूसरा माल है जिसमें धीरे धीरे लाभ प्राप्त होता है हम यहां दूसरे मार का ही अनुसरण करेंगे जिससे प्राणायाम के गलत अभ्यास से होने वाली हानियों से बचा जा सके
पढ़ाई का सही वक्त


पढ़ाई के लिए रूटीन जब भी बनाए तो सुबह का समय को ज़्यादा महत्व दे. सुबह का वक्त सबसे अच्छा है पढ़ने के लिए। इस समय माइंड पूरा फ्रेश रहता हैं और ग्रॅसपिंग पावर ज़्यादा होती हैं। दिन का 5 घंटा और सुबह का 1 घंटा बराबर हैं।

बोर्ड की परीक्षाएं अब खत्म हो गई हैं और जेईई मेन एग्जाम का वक्त करीब है. ऐसे में इस लक्ष्य के लिए पूरी तरह से तैयार होकर इम्तिहान में उतरने का समय है. जेईई मेन की ऑफलाइन परीक्षा 8 अप्रैल को होगी, जबकि ऑनलाइन परीक्षा 15 और 16 अप्रैल को होगी. अब इस परीक्षा में काफी कम दिन बचे हैं और सिलेबस काफी बड़ा है. जाहिर तौर पर आपको इससे जुड़ी तकरीबन सभी चीजें समेटने की भी जरूरत होगी. अगर आप बेहतर रणनीति के साथ और सावधानी बरतते हुए तैयारी करते हैं, तो आपकी कड़ी मेहनत रंग लाएगी.

ऐसे में आप कैसे तय करेंगे कि आखिरी वक्त में सिलेबस से जरूरी चीजें छांटकर किस तरह पढ़ाई करनी है? हम आपको टॉपर्स और एक्सपर्ट्स से टिप्स और दिशा-निर्देश मुहैया करा रहे हैं, ताकि परीक्षा से पहले कुछ आखिरी दिनों का बेहतर से बेहतर उपयोग किया जा सके.
याद रखें कि जेईई मेन के जवाब के बारे में 24 अप्रैल को ऐलान किया जाएगा, जबकि जेईई मेन का रिजल्ट 30 अप्रैल को आएगा. आपको जेईई एडवांस के लिए क्वालिफाई करने की खातिर जेईई मेन में सफलता हासिल करनी होगी. जेईई एडवांस की परीक्षा 20 मई को होगी.

परीक्षा के लिए आखिरी दौर की तैयारी के तहत जेईई मेन का प्रवेश पत्र (एडमिट कार्ड) डाउनलोड करना नहीं भूलें. यह एक बेहद अहम दस्तावेज है, जो परीक्षा हॉल में आपका प्रवेश सुनिश्चित करेगा. इसका एक रंगीन प्रिंटआउट लेकर इसे अपने पास रखें. साथ ही, यह भी सुनिश्चित करें कि आपके मेल बॉक्स या गूगल ड्राइव और हार्ड डिस्क में इसकी एक कॉपी सेव हो. इसकी वजह यह है कि आपको एडमिशन के वक्त इसकी जरूरत पड़ेगी और मुमकिन है कि उस वक्त एडमिट कार्ड डाउनलोड करने का विकल्प नहीं हो.

जेईई मेन में सफल होने के लिए आखिरी वक्त की तैयारी वाले टिप्स

सिलेबसः जेईई मेन सिलेबस देखने पर आपको थोड़ा सा डर लगेगा. हालांकि, अगर आप बारीकी से इसका मुआयना करेंगे, तो पाएंगे कि ज्यादातर टॉपिक की पढ़ाई आप कर चुके हैं. मसलन कुछ आप 11वीं क्लास में पढ़ चुके होंगे और कुछ 12वीं क्लास में. आपने हाल में बोर्ड की अपनी परीक्षा दी है, लिहाजा आपको सिर्फ इसे दोहराने की जरूरत होगी.

शॉर्ट नोट्स बनाने में आलस न करेंः अहम फॉर्मूलों को नोट करना बेहतर कदम होगा, ताकि ये रिवीजन के लिए आसानी से उपलब्ध हो सकें. फॉर्मूलों के अलावा उन प्वाइंट्स और अहम चीजों को नोट कर लें, जिन्हें आखिरी वक्त में आपको सरसरी तौर पर देखने की जरूरत होगी. परीक्षा से पहले ये चीजें अच्छे संसाधन और साथी साबित होंगी.

वेटेज के हिसाब से टॉपिक को छांटेंः परीक्षा से ठीक पहले का वक्त शॉर्टकट से तैयारी करने का मौका होता है. तब तक आपको पता लग चुका होता है कि फलां टॉपिक अन्य के मुकाबले ज्यादा अहम है. लिहाजा, ज्यादा महत्वपूर्ण टॉपिक पर ज्यादा फोकस करें और कम अहम पहलुओं पर ज्यादा समय खर्च नहीं करें. हालांकि, अपनी क्षमता और वक्त से हिसाब से ज्यादा से ज्यादा टॉपिक को समेटने की कोशिश करें.

पिछले साल के पेपर और मॉक टेस्ट पर भी ध्यान जरूरीः परीक्षा के सवाल का पैटर्न कैसा होगा, इसे बेहतर तरीके से समझने की जरूरत है. जेईई मेन परीक्षा के पैटर्न की ठीक तरीके से जांच-परख कर लें. हर रोज जेईई मेन का सैंपल पेपर या मॉक टेस्ट के पेपर लें और उसे हल करने की कोशिश करें. उसके बाद इस बात की पड़ताल करें कि गलती कहां हुई. साथ ही, इसे मुस्तैदी के साथ दोहराएं भी. ये दोनों काम भी बेहद जरूरी हैं. हर कोई गलती करता है. इन्हीं उपायों के जरिये हम परीक्षा की चुनौतियों से कारगर तरीके से निपट सकते हैं. ये उपाय ही सफल उम्मीदवारों को बाकियों से अलग करते हैं.

जो टॉपिक आप जानते हैं, उस पर पकड़ और मजबूत करेंः वैसे टॉपिक्स को कभी नजरअंदाज नहीं करें, जिन पर आपकी मजबूत पकड़ है. इसे छोड़कर नए टॉपिक (जिसे आप नहीं जानते हैं) की तरफ बढ़ना गलत कदम साबित हो सकता है. अति आत्मविश्वास के चक्कर में नहीं पड़ें और मजबूत पकड़ वाले टॉपिक्स पर अपनी समझ और बेहतर करें, ताकि इस बारे में पूछा गया कोई भी सवाल आपसे नहीं छूटे. परीक्षा के लिए आखिरी दौर की तैयारी में वैसे टॉपिक्स को छूने से बचें, जिनके बारे में आपको कुछ नहीं पता है. यह नुकसानदेह हो सकता है, क्योंकि आप अपना बेशकीमती समय उस चीज को सीखने में गंवा देंगे, जिसके बारे में आपको बिल्कुल पता नहीं है. इस दौरान आप उन टॉपिक्स को दोहरा सकेंगे जो आप अच्छे से जानते हैं. आखिरी वक्त में नए टॉपिक्स में हाथ लगाना समय और ऊर्जा की बर्बादी होगी.

मंथन करें, दोहराएं, मंथन करें: टॉपर्स अपने हर परफॉर्मेंस का विश्लेषण या मंथन करते हैं और उन चीजों पर मेहनत करते हैं और उसे दोहराते हैं, जिनमें वे कमजोर होते हैं. टॉपर्स की सफलता का यही मंत्र होता है.

परीक्षा की रणनीति तैयार करें: इस पूरी प्रक्रिया में परीक्षा से जुड़ी रणनीति तैयार करना नहीं भूलें. कई लोग इस चीज की उपेक्षा कर देते हैं, लेकिन यह बेहद अहम है. तीन घंटे की पूरी अवधि को प्रति सवाल मिनट में बांट दें यानी एक सवाल पर कितना मिनट वक्त देना है. अगर आप सवाल के लिए तय समयसीमा को पार कर जाते हैं, तो अगले सवाल की तरफ बढ़ जाएं और उसे हल करने के बाद अगर समय मिले, तो फिर से अनसुलझे सवाल की तरफ वापस आ सकते हैं. परीक्षा में नेगेटिव मार्किंग का मतलब यह है कि आपको वैसे सवालों को हल करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, जिसके बारे में आपको जानकारी नहीं है या जिसके बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कह सकते. बहरहाल, आप आखिरी सवाल तक पहुंचने की कोशिश करें, चाहे इसके कारण आपको वैसे कुछ सवालों को क्यों न छोड़ना पड़े, जिनके जवाब आप नहीं दे पाए.

एक निश्चित समय पर थोड़ा ब्रेक लें: अगर लगातार लंबे समय तक पढ़ाई करते रहेंगे, तो आपको थकान और सुस्ती का अहसास हो सकता है. पढ़ाई के दौरान थोड़े-थोड़े वक्त के बाद ब्रेक लेते रहना जरूरी होता है. ब्रेक के दौरान खुद को तरोताजा करने के लिए आप संगीत सुन सकते हैं, टहल सकते हैं, ध्यान लगा सकते हैं या फिर से दोस्तों से बातचीत भी कर सकते हैं. कहने का मतलब यह है कि इन गतिविधियों के जरिये आप खुद को आराम की अवस्था में पहुंचा सकते हैं.

सोशल मीडिया और भटकाव संबंधी अन्य चीजों से भी बचने की हर मुमकिन कोशिश करें: परीक्षाएं सिर पर हैं, लिहाजा सोशल मीडिया, इंटरनेट या इस तरह की अन्य चीजों के कारण अपनी तमाम मेहनत पर पानी नहीं फेरें.

किसी से खुद की तुलना करना से बचें: किसी अन्य से तुलना करना ठीक नहीं है और इससे हौसला कमजोर पड़ता है और तैयारी के लिए प्रेरणा भी नहीं मिल पाती. इसे अपने ऊपर बिल्कुल हावी होने नहीं दें.

स्वस्थ रहें: आप अच्छे से परीक्षा दे सकें, इसके लिए बेहतर भोजन करना और पर्याप्त नींद लेना जरूरी है. लिहाजा, आप सेहतमंद खाना खाएं और जमकर सोएं. इस दौरान जंक फूड खाने से पूरी तरह परहेज करें. साथ ही, अगर आप ठीक से नींद नहीं लेते हैं, तो आप चिड़चिड़े हो जाएंगे.

परीक्षा सेंटर के ठिकाने के बारे में पहले से पता कर लेंः यह काम आखिरी वक्त के लिए नहीं छोड़ें. एक दिन पहले जाकर यह पता कर लें कि परीक्षा सेंटर कहां पर है, ताकि परीक्षा के दिन आपको सेंटर ढूंढने में इधर-उधर नहीं भटकना पड़े. उसके बाद इसी हिसाब से आप परीक्षा के दिन का कार्यक्रम तैयार कर सकते हैं.
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परीक्षा किट तैयार रखें: याद रखें कि आपको परीक्षा हॉल में जेईई मेन के एडमिट कार्ड के अलावा कुछ और ले जाने की इजाजत नहीं होगी. एडमिट कार्ड यानी प्रवेश पत्र में कई तरह के निर्देश होते हैं. लिहाजा इसे पहले ही पढ़ लें और उसी के हिसाब से नियमों का पालन करें. परीक्षा के लिए पैड ले जाने की इजाजत होती है. ऐसे में यह सुनिश्चित करें कि पैड साफ-सुथरा हो यानी इस पर कुछ लिखा नहीं होना चाहिए. कलम परीक्षा हॉल में दिए जाएंगे. परीक्षा से पहले बायोमेट्रिक जांच भी हो सकती है. साथ ही, परीक्षा में नकल रोकने के लिए मेटल डिटेक्टर भी लगाए जाएंगे.

जेईई एडवांस में सफल होने के लिए आपको क्या करना चाहिए?
अगर आप जेईई एडवांस के पिछले साल के कट ऑफ के आंकड़ों को देखें, तो आपको क्वॉलिफाई करने के लिए 81 अंकों की जरूरत होगी. इसका मतलब हर विषय में आपको करीब 27 अंक मिलने चाहिए यानी अगर आप 8 सवाल सही करते हैं, तो आपको जरूरी अंक हासिल हो जाएंगे. हालांकि, यह ध्यान रखें कि इसके जरिये आपको सिर्फ क्वॉलिफाइंग अंक मिलेंगे. फर्ज कीजिए कि अगर 12 लाख छात्र-छात्राएं इस परीक्षा में शामिल होते हैं, तो इससे जुड़ी सीट हासिल करने के लिए आपको ज्यादा अंकों की जरूरत होगी. बहरहाल, सफलता के लिए शुभकामनाएं!

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