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चलिए, क्योंकि चलना ही ज़िंदगी है

चलिए, क्योंकि चलना ही ज़िंदगी है
क्या हम चलना भूल गए हैं?
मानव सभ्यता के शुरुआती दौर से ही चलना एक अनिवार्य काम था. चलना, दौड़ना, पीछा करना या जान बचाकर भागना... यह सब पाषाण युग से लेकर कृषि युग तक चलते रहे. औद्योगिक क्रांति और फिर संचार क्रांति ने सबकुछ पलट दिया. दुनिया 360° घूम गई या पूरी तरह से बदल गई. हम सबने न चलने और कम से कम मेहनत करने को अपनी सफलता का पैमाना बना लिया. कुर्सियों की दौड़ शुरू हुई और घरों में सोफ़ा संस्कृति विकसित हो गई. इन सबने हमारे शरीर को आलसी बनाया और दुर्भाग्य से वह बीमार होता चला गया. हम विश्व इतिहास की सबसे कम चलने वाली पीढ़ी हैं और हमारी आने वाली पीढ़ियां पता नहीं हमसे और कितना कम चलेंगी.
हम मनुष्यों के लिए चलना एक बेहतरीन इलाज है. मैं केवल चक्कर के रोगियों को छोड़कर सभी को चलने की सलाह देता हूं और उन्हें समझाकर चलने के लिए मना लेता हूं. मेरी सलाह मानकर वे चलना शुरू करते हैं और फिर अपनी सेहत में एक सुखद और आश्चर्यजनक बदलाव वे महसूस करते हैं. सेहत को लेकर हर संस्कृति और हर धर्म बहुत सजग रहे हैं और चलने का सभी ने बहुत गुणगान किया है. पैगम्बरों और महापुरुषों ने भी चलकर ख़ुद को स्वस्थ रखने का उपदेश अपने अनुयायियों को दिया है.
ख़ुश रहना है तो चलना है
जब हम चलते हैं तो हमारे रक्त का प्रवाह बढ़ता है, कोशिकाओं में गति होने लगती हैं, वे प्रसन्न हो जाती हैं, उल्लास मनाते हुए निरोगी हो जाती हैं. हमारी मांसपेशियों में गति होती हैं, वे लचीली बन जाती हैं, उनमें रक्त प्रवाह बढ़ता है जो कि विषैले पदार्थों को उनमें से निकालकर ले जाता है. जोड़ स्वस्थ होते हैं. आनंद देने वाले रसायन सैरेटोनिन का स्राव बढ़ता है जिससे हम ख़ुश रहने लगते हैं, हमारा तनाव दूर होता है, हम अवसाद से मुक्त होने लगते हैं. चलने या वर्कआउट करने से आंतों में गति (पेरिस्टालसिस मूवमेंट) होने लगती है जिससे हम कब्ज़, अपच, एसिडिटी जैसी समस्याओं से मुक्त होने लगते हैं. चलने से हम थकते हैं, और थकान नींद के लिए सबसे प्रभावी दवाई है इसलिए अनिंद्रा की समस्या भी इससे दूर होती है. जर्नल ऑफ़ क्लीनिकल स्लीप मेडिसिन में एक शोध प्रकाशित हुआ था जिसमें बताया गया था कि रोज़ाना वर्कऑउट करने या चलने वाले अनिद्रा के रोगियों में अनिद्रा की समस्या में 55% कमी हो जाती है.
चलने से कैलोरी बर्न होती है और हमारा अतिरिक्त वज़न कम होने लगता है. चलना मोटापे से युद्ध के ख़िलाफ़ एक प्रभावी शस्त्र है. पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च कहती है कि जो महिलाएं केवल 40 मिनट रोज़ाना वर्कआउट करती हैं तो वे साल भर में अपने वज़न का 10% कम कर लेती हैं. अगर आप 70 किलो की हैं तो एक साल में रोज़ाना केवल 40 मिनट मेहनत करने से आप 63 किलो की हो जाएंगी.
चलने से दिमाग़, किडनी और दिल स्वस्थ रहता है, हमारी नसों में बन चुके ब्लॉक हटते हैं, पथरी घुलती है. रोज़ाना चलने वालों में हृदय रोग का खतरा 27%, ब्रेन स्ट्रोक का खतरा 30% और अल्ज़ाइमर का खतरा 32% तक कम हो जाता है. रोज़ाना थोड़ी देर चलने या चहलक़दमी करने से कैंसर की संभावना भी काफी कम हो जाती है, जैसे-कोलन कैंसर 53% तक कम, प्रोस्टेट कैंसर 35% तक कम, गर्भाशय कैंसर 23%तक कम और अन्य कैंसर होने का ख़तरा भी 52% तक कम हो जाता है.
एक बार फिर कहूंगा, चलना ही ज़िंदगी है
पूरे विश्व की लगभग 90% आबादी व्यायाम नहीं करती. मजदूरों को छोड़ दिया जाए तो हम सभी इंसान बहुत घातक आराम का जीवन जी रहे हैं. हम चिकित्सकों के पास लगी हुई लाइन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आधी हो जाए अगर लोग सिर्फ़ आधा घंटा रोज़ चलना शुरू कर दें तो. मैं अपने रोगियों से पूछता हूं कि आप आख़िरी बार 3 से 4 किलोमीटर कब चले या दौड़े थे तो अधिकांश सोचते ही रहते हैं लेकिन उन्हें याद नहीं आता कि उन्होंने यह सामान्य-सा काम कब किया था. फिर मैं जवाब देता हूं कि अगर आप यह काम रोज़ाना करते तो शायद आपको मेरी और मेरे द्वारा लिखी दवाइयों की ज़रूरत ही न पड़ती.
आपको चलने और काम करने के इतने फ़ायदे देखकर लग रहा होगा कि आप भी आज से ही जिम जॉइन कर लेंगे या फिर कल से मॉर्निंग वॉक पर जाने लगेंगे लेकिन यह रूटीन या जिम जाना विश्व के 90% लोग छः महीने में ही छोड़कर उसी पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं. तो आप क्या करें? मेरी राय है कि आप मेरी कुछ सलाह मान लें ताकि आप जीवनभर चलना और मेहनत करना जारी रख सकते हैं, क्योंकि हमें स्वस्थ तो जीवनभर रहना है ना.
तो आज से चलिए... क्योंकि चलना ही ज़िंदगी है...एक सेहतमंद ज़िंदगी जिसके आप हक़दार हैं.


सेहत से जुड़ी पांच बड़ी ग़लतफ़हमियां, जिनका इलाज सबसे पहले होना चाहिए!
सेहत एक अनिवार्य विषय है और भ्रांतियां जीवन का एक सच. हम भ्रांतियों में ही कई बार जीवन बिता देते हैं. चिकित्सा को लेकर मैंने देखा है कि लोगों को अनगिनत भ्रांतियां हैं और उन्हें ठीक करवाने में कोई उत्सुक भी नज़र नहीं आता. मैं अब तक अपनी प्रैक्टिस में हज़ारों लोगों से मिला और मुझे एक भी रोगी ऐसा नहीं मिला जो किसी ना किसी भ्रांति से लिपटा हुआ नहीं था. तो आइए जानते हैं कि स्वास्थ्य को लेकर क्या-क्या भ्रांतियां हैं जनमानस में.
1. बीमारियां हमारी शत्रु हैं
सबसे बड़ी भ्रांति अगर चिकित्सा जगत में कुछ है तो वह यही है. इससे बड़ी कोई भ्रांति नहीं. प्रिय पाठकों मेरा यक़ीन कीजिए कि बीमारियां हमारी मित्र हैं. मैं यहां जानलेवा बीमारी जैसे कैंसर, एड्स, हार्टअटैक आदि के बारे में नहीं कह रहा हूं, लेकिन अन्य समस्या जैसे उल्टी, दस्त, खांसी, बुख़ार हमारे शरीर के लिए अमृत हैं. यह शरीर से ज़हर को निकालते हैं. अच्छा आप जब कोई दूषित भोजन करते हैं तो शरीर क्या करता है? यही ना कि वह उसे उल्टी या दस्त के माध्यम से जल्दी से बाहर निकाल देता है. क्या उसने ग़लत किया? क्या अगर वह ऐसा ना करता तो आपके लिए अच्छा होता? क्या यहां उल्टी दस्त आपके दुश्मन हैं? नहीं प्रिय पाठकों, उल्टी दस्त तो शरीर की रक्षा कर रहे हैं.
शरीर का तापमान बढ़ता है तो बैक्टीरिया और वायरस की ग्रोथ कम हो जाती है. यह इंफ़ेक्शन को रोकने का प्राकृतिक उपाय है. तो क्या बुख़ार हमारा दुश्मन हो गया?
खांसी ना होती तो हम हज़ारों रुपए ख़र्च करके भी अपने फेफड़ों से बलगम या कफ़ नहीं निकाल पाते. खांसी फेफड़ों की महारक्षक है, मेरा विश्वास कीजिए. इसी तरह छींक भी हमारे श्वसन तंत्र की रक्षक है और हमारी हिफ़ाज़त करती है.

2. दर्द निर्दयी होता है
अक्सर रोगी अपने दर्द का इलाज करने के लिए लंबे-लंबे समय तक घातक पेनकिलर खाते रहते हैं, जबकि दर्द तो आपका हमदर्द था. दर्द ही तो बता रहा था कि कोई समस्या है जिसे तुरंत ठीक किया जाना चाहिए. आपके शरीर में मौजूद हीलिंग पावर आपको बिना बताए कई रोगों और समस्याओं को ठीक कर देती है. जब उसे आपकी भी सक्रिय या ऐक्टिव मदद की ज़रूरत होती है तो वह सिग्नल भेजती है कि आप भी इस समस्या को ठीक करने में सहयोग करें. लेकिन आप उन सिग्नल्स को ही दुश्मन समझकर मारने लगते हैं. घुटने में दर्द नहीं होगा तो आपको कैसे पता चलेगा कि वह ख़राब हो रहा है? किडनी में दर्द ना हो तो आपको कैसे पता चलेगा कि उसमें पथरी है? दिल में दर्द ही ना हो तो हार्टअटैक कितना ज़्यादा जानलेवा हो जाएगा कभी सोचा है आपने? तो इसलिए दोस्तों दर्द को निर्दयी नहीं अपना हमदर्द समझिए. समझें कि वह क्या बताना चाहता है, समझें कि आपको अब क्या करना चाहिए ताकि यह अलार्म बंद हो.
3. रोगों के लक्षण ही असली रोग हैं
मैंने ऐसे अनगिनत डॉक्टर देखें हैं जो कि लक्षणों की ही चिकित्सा करते रहते हैं जबकि मूल समस्या तो रोग है. आजकल की प्रचलन में आई चिकित्सा पद्धति तो दुर्भाग्य से लक्षणों के उपचार पर ही निर्भर है. लक्षणों को दबाकर हम रोगों को लाइलाज कर रहे हैं और छोटी बीमारियों को बाद में विकराल रोग के रूप में भुगत रहे हैं.
4. सामान्य बातों को रोग समझ लेना
हर डॉक्टर के पास रोज़ाना ऐसे रोगी आते ही हैं, जो सामान्य बातों को रोग समझकर कई दिनों से इलाज के लिए भटक रहे होते हैं. रोज़ाना मल त्याग होना ही चाहिए नहीं तो कब्ज़ है यह एक आम भ्रांति है जबकि दो या तीन दिन में एक बार मल का आना भी नॉर्मल है. इस बात को जाने बगैर सालों तक लोग कब्ज़ के चूर्ण खाते रहते हैं और अपनी आंतों को ख़राब करते रहते हैं. क्या अंधेरे में नहीं दिखने को आप रोग मानेंगे? नहीं ना, तो ऐसे ही इन सामान्य बातों को भी रोग मत मानिए जैसे-खाना खाने के बाद टॉयलेट जाने को प्रवृत्ति, ज़्यादा काम करके थक जाना, कभी-कभी दौड़ने पर सांस फूल जाना, कभी/कभी मसल्स का फड़कना, ज़्यादा चलने के बाद पैरों का दुखना सामान्य बात है.
5. रोग केवल दवाओं से ही ठीक होते हैं
चिकित्सा को लेकर यह भी एक बड़ी भ्रांति है कि रोग केवल दवाओं से ही ठीक होते हैं. मेरा भरोसा कीजिए पाठकों दवाओं से ज़्यादा रोग दुनिया में दूसरी चीजों से ठीक होते हैं, जैसे-सकारात्मक सोच, यात्रा, धार्मिक कार्य, आराम, नींद, योगा, कसरत आदि रोज़ाना करोड़ों लोगों की बीमारियां ठीक भी कर रहे हैं और बीमार होने से बचा भी रहे हैं. केवल दवाओं से ही इलाज के बारे में सोचना बताता है कि डॉक्टर को चिकित्सा विज्ञान का पूरा ज्ञान नहीं है. आपने स्वयं कई बार कहा होग या कई बार सुना भी होगा कि डॉक्टरों की रोगियों से प्रेमपूर्वक बातचीत ही रोगियों के आधे रोग दूर कर देती है.

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