Header Ads

विटामिन बी12


विटामिनों की अनोखी दुनिया समझेंगे तो खुद को उल्लू बनने से और कई बीमारियों से बचा लेंगे
कुछ विटामिनों की कमी के नतीजे सालों बाद उभरकर आते हैं तो कुछ की कमी चंद दिनों में ही अपना असर दिखा सकती है
मल्टीविटामिन की गोलियां और ऐसे ही अन्य ‘ट्रेस एलीमेंट (वे धातुएं जो शरीर के लिए जरूरी होती हैं)’ मिलाकर बनाई जाने वाली ताकत की गोलियों का एक मायावी बाजार दवाइयों की दुनिया में है. छोटी-मोटी कंपनियों से लेकर बड़ी दवाई कंपनियां भी इस तरह की गोलियां बेचने के धंधे में हैं. लोग भी अक्सर बिना किसी कारण, इन्हें यूं ही लेते रहते हैं और भ्रम में रहते हैं कि हम ताकत की गोलियां खा रहे हैं.

वैसे यह सही है कि विटामिनों की जरूरत शरीर के लगभग हर कार्य-व्यापार में है - एंजाइम्स की एक्टिविटी में, को-फैक्टर्स की एक्टिविटी में, शरीर के सेल्स के हर पल सक्रिय रहने के लिए, रक्त जमने के लिए - बहुत सारी शारीरिक गतिविधियों में इनका बड़ा ही महत्वपूर्ण रोल है. परंतु जब तक हमें डॉक्टरी जांच से यह ना पता चले कि शरीर में कौन-सा विटामिन कम होने से क्या खराबी हो रही है, तब तक यूं ही बेमतलब इन गोलियों को अंदाजे से खाने का कोई लाभ नहीं होने वाला. तो आइए पहले समझें कि वास्तव में विटामिंस होते क्या हैं और इनकी कमियों से हमें क्या-क्या हो सकता है.

विटामिंस और ट्रेस एलिमेंट्स आमतौर पर वे चीजें हैं जो शरीर के लिए हैं तो बेहद आवश्यक, लेकिन आमतौर पर वे या तो शरीर में बनती ही नहीं या बहुत कम मात्रा में बनती हैं. इसलिए इनका आपके भोजन में होना अत्यंत ही आवश्यक होता है. बहुत से विटामिन अलग-अलग भोज्य पदार्थों में अलग-अलग मात्रा में होते हैं. कई स्थितियां बड़ी रोचक हैं. जैसे विटामिन बी12 का उदाहरण लें. यह विटामिन हमारे नर्वस सिस्टम के लिए, हमारी चमड़ी के लिए, हमारे मुंह तथा आंतों की झिल्ली के लिए बहुत आवश्यक है परंतु यह प्राय: मीट, मछली, दूध, दही या पनीर में ही होता है. फल-सब्जियों में नहीं पाया जाता. इसका मतलब शाकाहारी लोगों के लिए, खासकर जिन्होंने दूध इत्यादि भी छोड़ दिया हो, उनको विटामिन बी12 नहीं मिल पाता. इसलिए शाकाहारियों, जो किसी कारण से दूध भी नहीं लेते, में धीरे-धीरे विटामिन बी12 की कमी पैदा हो सकती है.
विटामिनों में एक बात और खास है. कुछ विटामिन तो शरीर में पर्याप्त मात्रा में स्टोर रहते हैं और रोज की उनकी आवश्यकता भी इतनी मामूली होती है कि यदि वे विटामिन खाने में नहीं भी आ रहे हों तो भी सालों में जाकर उनकी कमी महसूस होती है. विटामिन बी का उदाहरण ही लें. अगर खाने में इसकी पर्याप्त मात्रा नहीं भी मिल रही हो तब भी इस विटामिन की कमी के कारण बीमारी पैदा होने में सालों लग जाते है. परंतु यदि फॉलिक एसिड का उदाहरण लें तो उसका स्टोर मात्र चंद सप्ताह का ही होता है. अगर खाने में फॉलिक एसिड न हो तो उसकी कमी कुछ समय में ही शरीर में आ जाती है. इस तरह से देखें तो विटामिनों की दुनिया बड़ी अनोखी है.

विटामिनों की कमी हमारे शरीर में कई तरह से हो सकती है. एक तो यह कि हम जो खा रहे हैं उस खाद्य पदार्थ में वह विटामिन कम हो या न हो. बहुत गरीबी, भुखमरी, अकाल से पीड़ित लोग या शरणार्थी शिविरों में रह रहे लोगों में तो सभी तरह के विटामिन कम हो सकते है परंतु वे लोग भी जो अपनी समझ से बहुत अच्छा भोजन कर रहे है उनमें भी कई अन्य तरह से विटामिनों की कमी आ सकती है. उदाहरण के लिए नियासिन नाम का एक विटामिन है. इसकी कमी से पेलेगरा नाम की भयंकर बीमारी हो सकती है. यह ज्यादातर उन लोगों में होता है जो बस मक्के की रोटी ही खाते है. पेलेगरा की बीमारी में दस्त लगना, चमड़ी का रोग होना, (डर्मेटाइटिस), याददाश्त खराब हो जाना (डिमेंशिया) हो सकता है.

ऐसा भी होता है कि भोजन में पर्याप्त विटामिन हों परंतु अन्य किसी कारण से कोई विटामिन आंतों में पचता ही न हो, या फिर शरीर में जाकर वह किसी कारण नष्ट हो जाता हो, या फिर शरीर में उस विटामिन की आवश्यकता अचानक बहुत ज्यादा बढ़ गई हो (गर्भवती होने पर स्त्री के लिए फॉलिक एसिड की जरूरत बढ़ जाती है. वहीं जो लोग जो निरंतर डायलेसिस पर हैं, उनमें भी इसकी कमी हो जाती है) तब भी वह पर्याप्त खाने के बाद कम पड़ जाता है.


कई दवाइयां भी किसी विटामिन की कमी पैदा कर सकती हैं. मसलन गठिया रोग में दी जाने वाली एक बहुत कॉमन दवाई मिथिट्रेक्सेट है जिससे फॉलिक एसिड की कमी हो जाती है, या जब हम टीबी की दवाइयां लेते हुए आई ओमेक्स नाम की दवाई लेते हैं तब विटामिन बी6 की कमी हो जाती है. डॉक्टर वैसे तो टीबी के मरीजों को हमेशा इस विटामिन की गोली भी देते हैं पर कई बार मरीज यह नहीं लेता और उसे न्यूरोपैथी नाम की बीमारी हो सकती है.

विटामिन की कमी होने का खतरा किस-किस को हो सकता है?

एक तो मैंने बताया ही कि गरीबी, भुखमरी या अकाल में जहां खाना पर्याप्त ना हो, ऐसी पूरी की पूरी आबादी में विटामिन कम हो जाते हैं. ऐसे दुर्भाग्यशाली बच्चे जिनका जन्म बेहद कमजोर मां से हुआ हो, वृद्धों में या जिन लोगों की भूख बहुत कम हो गई है, इनके शरीर में भी विटामिन कम हो जाते हैं.

कोई खास दवा खाने से भी विटामिन कम हो सकते हैं और नियमिततौर पर छककर दारू पीने से तो शरीर में कई तरह के विटामिन कम हो जाते हैं. शराबियों में विटामिन सी, डी, बी12 और फॉलिक एसिड की कमी तो हो ही सकती है, लेकिन सबसे कॉमन है विटामिन बी1 की कमी.

अगर किसी शराबी को किसी वजह से ग्लूकोज की ड्रिप लगाई गई हो और डॉक्टर साथ में बी1 का इंजेक्शन देना भूल जाएं तो ऐसे में विटामिन बी1 की और कमी हो जाती है. ऐसे में संबंधित व्यक्ति के दिमाग पर हुआ असर जान तक ले सकता है. इस स्थिति को कोर्सेकॉफ साइकोसिस कहते हैं.

वैसे तो हमारे देश में धूप की कोई कमी नहीं है और इस लिहाज से विटामिन डी की कमी भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि शरीर इसे धूप के प्रभाव में निर्मित करता है. फिर भी यहां कई लोगों में विटामिन डी की कमी हो जाती है. कई लोग खासकर लड़कियां धूप से बचने के लिए सनस्क्रीन लोशन का इस्तेमाल करती हैं. नतीजन इनमें विटामिन डी की कमी होने की आशंका बढ़ जाती है. इसकी कमी का मतलब है – कमजोर हड्डियां. दर्द.

अब सवाल है कि हम शरीर में विटामिनों की कमी को कैसे पहचानें? ऐसा मान लें कि जब तकलीफें बहुत हों और बीमारी पकड़ में नहीं आ रही हो तो इस संभावना को जरूर ध्यान में रखें. विटामिनों की कमी से तमाम तरह की तकलीफें हो सकती हैं. मान लीजिए कोई व्यक्ति ऊपर से बहुत सेहतमंद दिख रहा है लेकिन उसे कमजोरी महसूस होती हो. या हाथ-पैर में झुनझुनी से रहती हो, चमड़ी के नीचे बड़े-बड़े चकत्ते आ गए हों या मुंह में बार-बार छाले होते हों, होंठ किनारे से कट जाते हों या हड्डियों में दर्द रहता हो तो ये सभी विटामिनों की कमी के लक्षण हैं. याद्दाश्त का तेजी से कम होना भी इसका एक प्रभाव हो सकता है.


अगर आप शाकाहारी हैं तो यह आलेख जरूर ही पढ़ें
विटामिन बी12 शरीर की सभी कोशिकाओं की सक्रियता में बेहद अहम भूमिका निभाता है और शाकाहारियों में इसके कम होने की ज्यादा आशंका होती है


इस कॉलम के तहत पिछले आलेख में हमने विटामिनों पर बात करते समय विटामिन बी12 के बारे में बस थोड़ी सी ही चर्चा की थी. अब उसी महत्वपूर्ण चर्चा को हम यहां आगे बढ़ाते हैं.

विटामिन बी12 हमारे शरीर की तमाम सेल्स, चाहे वे हमारी चमड़ी में हों, आंत में या मुंह में, की कार्यप्रणाली के लिए यह जरूरी विटामिन है. इन सभी सेल्स का नियंत्रण इनमें स्थित न्यूक्लियस के डीएनए और आरएनए द्वारा होता है. और इनके लिए यह एक अनिवार्य विटामिन है. बी12 न मिले तो यह न्यूक्लियस काम ही नहीं करेगा, इसीलिए इसकी कमी हो तो हर सेल ठीक से काम करना बंद कर देगी.

यही विटामिन बी12 हमारे नर्वस सिस्टम की कार्यप्रणाली को दुरुस्त रखने का काम भी करता है. यानी यह मस्तिष्क और शरीर की सारी तंत्रिकाओं में करंट के बहने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. तभी अगर इस विटामिन की कमी हो जाए तो हमें कई न्यूरोलॉजिकल प्रॉब्लम पैदा हो सकती हैं. फिर विटामिन बी12 उन सेल्स के मैच्योर होने में भी बहुत जरूरी कारक है जो हमारी हड्डियों में रहकर रक्त बनाते हैं. इसीलिए शरीर में बी12 न हो तो हमें एक अलग ही किस्म का एनीमिया हो सकता है जिसे मेगालोब्लास्टिक एनीमिया कहते हैं.

इस विटामिन का बेहद जरूरी संगी-साथी फॉलिक एसिड होता है. यह भी इन सारे कामों में बराबर का रोल अदा करता है. इसीलिए कई बार तो शरीर में बी12 की मात्रा ठीक-ठाक भी रही हो लेकिन यदि फॉलिक एसिड की कमी हो जाए तब भी वे बीमारियां आ सकती हैं जो आमतौर पर बी12 की कमी से हुई मानी जाती हैं.

दरअसल ये दोनों विटामिन एक संगत में काम करते हैं. इसीलिए डॉक्टर भी विटामिन बी12 की कमी वाले मरीज को अकेला बी12 न देकर हमेशा इसे फॉलिक एसिड के साथ ही देते हैं.

विटामिन बी12 केवल मांस, मछली, दूध और पनीर से ही प्राप्त होता है. यह न तो हरी सब्जियों में होता है, न फलों में, जैसा कि हमें प्राय: गलतफहमी रहती है. हां फॉलिक एसिड लगभग हर भोज्य पदार्थ में मौजूद होता है – सारी सब्जियों में और फलों में. मीट-मछली में भी यह पाया जाता है. परंतु इनकी दिक्कत यह है कि इन्हें देर तक गर्म करने पर इनका फॉलिक एसिड नष्ट हो जाता है.
ADVERTISEMENT


तो वे शाकाहारी लोग जो दूध, दही या पनीर भी नहीं लेते या नहीं ले पाते या बस कभी-कभी ही लेते हैं, उनमें विटामिन बी12 की कमी पैदा हो जाना एक आम स्वास्थ्य समस्या है. हमारे देश में एक बड़ी आबादी शाकाहारी है और अगर वह दूध-दही या पनीर भी नहीं लेती तो उसके लिए विटामिन बी12 की कमी का खतरा हमेशा रहता है. इसकी कमी के लक्षण अचानक सामने नहीं आते. बल्कि इसका तो अक्सर पता ही नहीं चल पाता क्योंकि डॉक्टर तक इस बारे में उस तरह से नहीं जानते या सोच पाते. इसी चक्कर में न जाने कितने विटामिन बी12 की कमी वाले लोगों का हमारे यहां डायग्नोसिस नहीं हो पाता.

क्या सिर्फ जरूरी भोजन की कमी से ही विटामिन बी12 की कमी हो सकती है?
ऐसा नहीं है. कई बार विटामिन बी12 और फॉलिक एसिड युक्त भोजन लेने के बाद भी शरीर में इनकी कमी हो सकती है. क्योंकि हो सकता है यह सब आपके शरीर में तो जा रहा हो लेकिन आपकी आंतों में न के बराबर पच पाता हो. एट्राफिक गैस्ट्राइटिस और परनीसियस एनीमिया जैसी जटिल बीमारियों में यह हो सकता है. ऐसे में बी12 की कमी हो सकती है. यही स्थिति पेट के ऑपरेशन में आंत का कुछ हिस्सा निकाल देने के बाद भी हो सकती है और आंतों में सूजन की बीमारी (इनफ्लेमटरी वाली बीमारियां) में भी.

शरीर में कभी-कभी फॉलिक एसिड की मांग जरूरत से बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. ऐसा अमूमन गर्भवती स्त्रियों और नियमित डायलिसिस वाले मरीजों के साथ होता है. साथ ही गठिया आदि बीमारियों के लिए कुछ विशेष दवाइयां देने पर भी शरीर में फॉलिक एसिड की गंभीर कमी हो जाती है. इसलिए इन सारी स्थितियों में डॉक्टर पहले फॉलिक एसिड की गोलियां भी दे देता है.

इन विटामिनों की कमी कैसे पहचानें?

कई ऐसी स्थितियां हैं जिनमें हमें इन विटामिनों की कमी का संदेह होना चाहिए. जैसे –

1. अगर हमें खून की ऐसी कमी (एनीमिया) हो जाए जो सामान्य तौर पर दिए जाने वाले आयरन कैप्सूल लेने से ठीक न हो पा रही हो

2. यदि हमें बहुत थकान लगती हो लेकिन आम जांचों द्वारा भी जिसका कोई कारण साफ न हो पा रहा हो

3. यदि हाथ-पांव में अकारण झुनझुनी होती हो

4. यदि मुंह में बार-बार छाले आ जाते हों

5. यदि हमारी जीभ के दाने सपाट होकर वह सपाट जैसी हो गई हो

6. यदि हमारे होंठ किनारे से कट-पिट जाते हों
7. यदि हमारी भूख खत्म हो रही हो और इसका कोई साफ कारण न मिल रहा हो

8. यदि स्मरण शक्ति कम हो रही हो और लगभग डिमेंशिया जैसी स्थिति पैदा हो रही हो

9. यदि किसी को ऐसा एनीमिया हो जिसके साथ हल्का पीलिया भी रहता हो.

10. यदि चमड़ी का रंग पीला सा होता जा रहा हो

11. यदि चलने में लड़खड़ाहट होती हो, गिरने का डर लगता हो

12. यदि बार-बार दस्त लगते हों और वे ठीक न हो रहे हों.



तो आपने यहां देखा कि ऐसी बहुत सी स्थितियां बनती हैं जिन्हें हम सामान्य कमजोरी मानकर छोड़ देते हैं, वे बी12 कमी से हो सकती हैं. ऐसी आशंका हो तो खून की एक मात्र जांच से इसका पता लगाया जा सकता है. और पता चल जाए तो फिर आसानी से इलाज भी संभव है.

इसके साथ यह भी याद रहे कि फॉलिक एसिड की कमी के कारण औरतों में बांझपन और नवजात शिशु में पैदाइशी होंठ या तालू कटा हुआ भी हो सकता है या न्यूरल डक्ट डिफेक्ट (मस्तिष्क या तंत्रिकातंत्र से जुड़ी बीमारियां) के साथ भी बच्चा पैदा हो सकता है.

विटामिन बी12 की कमी हो जाए तो क्या करें?
सतर्क रहें. किसी डॉक्टर से पूरा इलाज लें. यह इलाज कई बार जीवनभर चलाने की आवश्यकता भी होती है.



विटामिन सी, डी और ई जितने जरूरी हैं, उतना ही जरूरी इनसे जुड़ी गलतफहमियों से बचना भी है
क्या आप भी मानते हैं कि विटामिन सी कैंसर से बचाता है या विटामिन ई त्वचा की चमक बढ़ाता है? ऐसा है तो आप यह आलेख जरूर ही पढ़ें
इन तीन विटामिनों को लेकर जनता में एक किस्म की अनोखी जागरूकता भी है और गलतफहमियां भी. मुझे लगता है कि इन विटामिनों के बारे में यहां कुछ बता दिया जाए ताकि कम से कम, गलतफहमियां तो हटें. ऐसा करने से, यदि साथ-साथ कुछ जागरूकता भी बढ़ जाए तब तो फिर क्या कहने!

विटामिन सी
विटामिन सी के बारे में मामा जी हमें बचपन में समझाते थे कि हरी मिर्च में ही सबसे ज्यादा विटामिन सी होता है क्योंकि इसे खाकर आदमी सीसी सीसी करने लगता है. वे ऐसा मजाक में कहते थे या वास्तव में इसे सच मानते थे पता नहीं, परंतु उनकी इस बात को हम कई वर्षों तक सही मानते रहे. हम तो बाद में सही बात समझ गए, लेकिन बहुत से लोगों का ऐसा बचपना बड़ी उम्र तक चलता रहता है. एक ऐसी ही गलतफहमी यह है कि नियमित विटामिन सी की गोली खाने से, गले और पेट के कैंसर की संभावना कम हो जाती है. यह गलत है, परंतु यह सच है कि यदि नित्य एक से दो ग्राम या इससे ज्यादा विटामिन सी अगर एक साथ ले लिया तो पेट में दर्द, दस्त और मितली हो सकती है. इसीलिए याद रहे कि जिनको पहले ही किडनी स्टोन हो चुका हो, या हो, उन्हें कभी लंबे समय तक विटामिन सी नहीं दिया जाता.

नारंगी, मौसमी, संतरा (सिट्रस फल) तथा हरी सब्जियों में (खासकर ब्रोकली), टमाटर और आलू में पर्याप्त मात्रा में विटामिन सी होता है. बुढ़ापे में, बहुत छोटी उम्र के बच्चों में, या जिनको पर्याप्त भोजन नहीं मिलता उनमें, और नियमित मद्यपान के शौकीनों में विटामिन सी की कमी अक्सर देखी जाती है.

विटामिन सी की कमी से क्या होगा?

आपको बहुत थकान लग सकती है. चमड़ी के नीचे खून के नीले धब्बे आ सकते है. मसूड़ों में सूजन और वहां से रक्तस्राव हो सकता है. वैसे तो इसकी कमी के कारण कहीं से भी ब्लीडिंग हो सकती है. और जो बच्चो में इसकी कमी हो तब तो उनकी हड्डियों के विकास पर भी इसका असर पड़ता है. विटामिन सी शरीर में एंटी-ऑक्सीडेंट गतिविधि का महत्वपूर्ण रोल अदा करता है. यह आंतों में आयरन तत्व के पाचन में भी मदद करता है. यह हमारे शरीर के पैकिंग मटेरियल को भी बनाता है. इस तरह देखें तो यह बहुत अच्छा विटामिन है पर इसे यूं ही नियमित न लें क्योंकि आपके खाने में वैसे भी पर्याप्त विटामिन सी होता है.
ADVERTISEMENT


विटामिन ई

कई लोग इस विटामिन को भी नियमित लेते रहते हैं. ऐसा न करें. आपके-हमारे भोजन में पर्याप्त विटामिन ई होता है. खासतौर पर सूरजमुखी के तेल में, सोयाबीन में, कॉर्न आयल में, फलों तथा सब्जियों में, मांस-मछली तथा नट्स में, और अनाज में भी पर्याप्त विटामिन ई मौजूद होता है. हां, लोगों के बीच एक भ्रम जरूर है कि नियमित विटामिन ई के कैप्सूल लेने से त्वचा की सौम्यता बढ़ जाती है या इससे हमारी उम्र लंबी हो जाएगी और सेक्स की ताकत तो ऐसी अंधाधुंध बढ़ जाएगी कि क्या कहने! ये सब भ्रम की बातें है. इनके चक्कर में इस विटामिन को फालतू में न लिया करें.

विटामिन ई की कमी

इस विटामिन की कमी केवल तब पैदा हो सकती है जब हम आंतों की बीमारी के कारण भोजन में मौजूद विटामिन ई को पचा न सकें. किसी ऑपरेशन में यदि छोटी आंत का, कोई लंबा सा टुकड़ा कभी निकालना पड़ा हो तब भी इसका पाचन नहीं हो पाता.

विटामिन ई कम हो जाए तो क्या होता है?
यदि विटामिन ई घट जाये तो हमारी नर्व और मांसपेशियां कमजोर हो जाती है. हमारा बैलेंस बनाये रखने वाली नसें बिगड़ सकती है जिसके कारण हम चलने में लड़खड़ाने लग जाते हैं. इसकी कमी से हमारी आखों की मांसपेशियों में लकवा तक हो सकता है. इसकी कमी आंख के पर्दे (रेटिना) में बीमारी पैदा कर सकती है. आंख के डॉक्टर, न्यूरोलॉजिस्ट और फिजीशियन ऐसी स्थिति में आपको विटामिन ई देते हैं लेकिन तब, कभी-कभी इसका बहुत हाई डोज भी देना पड़ता है. विटामिन ई की कमी के कारण कभी-कभी बच्चों में एक पैदाइशी बीमारी (एबीटालाईपोप्रोटीनीमिया) भी हो सकती है.


यह एक गलतफहमी ही है कि नियमित विटामिन ई के कैप्सूल लेने से कैंसर या दिल की बीमारी की रोकथाम होती है. अभी तक तो किसी भी रिसर्च स्टडी से यह बात सिद्ध नहीं हो पाई है.

विटामिन डी
मीडिया और आपसी बातचीत में विटामिन डी की इतनी चर्चा होती रहती है कि उससे इसके विषय में जागरूकता न बढ़कर, एक किस्म का कुहासा सा ही बन गया है. पहले तो यह जानें कि विटामिन डी वास्तव में विटामिन न होकर एक हार्मोन है. जबकि विटामिन वे पदार्थ होते हैं जो हमारे शरीर में (लगभग) नहीं बनते. इन्हें हम भोजन से ही प्राप्त करते हैं. इस तथ्य के विपरीत विटामिन डी, सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों द्वारा हमारी चमड़ी के नीचे खूब बनता है. वैसे यह हमारे कई भोज्य पदार्थों में भी पर्याप्त मात्रा में मौजूद होता है. दूध, दही, पनीर, फिश, ऑयल और अंडे की पीली जर्दी में काफी मात्रा में विटामिन डी रहता है.

परंतु एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि जो विटामिन डी आपकी चमड़ी के नीचे बनता है, या फिर भोजन से प्राप्त होता है, वह सक्रिय विटामिन डी नहीं होता. इसका मतलब यह है कि वह सीधा हमारे शरीर में काम नहीं आ सकता. जब तक यह विटामिन डी हमारे शरीर में अपनी सक्रिय अवस्था में परिवर्तित नहीं हो जाता तब तक यह बेकार है. तो फिर यह सक्रिय कैसे होता है? उसकी एक लंबी प्रक्रिया है. पहले यह हमारे रक्त में प्रवेश करके लीवर में पहुंचता है, फिर बाद में किडनी में पहुंचकर वहां फाइनली सक्रिय विटामिन डी बन पाता है जिसे 1,25(OHOHOH)4D3 कहते हैं. जब तक यह न बने, विटामिन डी काम नहीं करता. इसलिए, लीवर तथा किडनी के रोगियों में विटामिन डी की कमी हो जाती है. ऐसी दवाइयां भी जो लीवर में जाकर विटामिन डी का सक्रिय होना रोकती हैं (जैसे कि मिर्गी के दौरे में इस्तेमाल होने वाली बार्बीचुरेट और एप्टोइन नाम की दवाई) विटामिन डी की कमी पैदा कर देंगी.


विटामिन डी का काम क्या है?

सक्रिय विटामिन डी हमारी आंतों पर, हड्डियों में, पैराथायराइड ग्लैंड पर, चमड़ी और बालों के सेल्स पर, प्रोस्टेट कैंसर और ब्रेस्ट कैंसर के सेल पर भी असर करता है. इन सभी सेल्स में विटामिन डी रिसेप्टर बने होते है. विटामिन डी इन रिसेप्टरों पर चिपक जाता है और फिर अंदर घुसकर जैसा उस अंग का काम हो, उसी के अनुसार वहां काम करता है. आंतों में इसका काम भोजन के कैल्शियम को पचाने में मदद करना है. हड्डी में इसका काम उसे मजबूती देना है. विटामिन डी पैराथायराइड के सेल्स को बढ़ने से रोकता है. इसकी कमी से यूं बाल तो नहीं झड़ते परंतु यह कहीं ना कहीं, चमड़ी और बालों के स्वास्थ्य में भी जरूर मदद करता है.

विटामिन डी की कमी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल
हिंदुस्तान में जब सब तरफ इतनी धूप है, फिर भी यहां विटामिन डी की कमी वाले इतने मरीज आखिर क्यों हैं? इसका कारण समझिए. हम भारतीयों की चमड़ी में रंग पैदा करने वाले मेलेनिन सेल ज्यादा होते है. तभी हम गहरे रंग के लोग हैं.



इसी कारण, अल्ट्रावायलेट किरणें इतनी आसानी से हमारी चमड़ी में प्रवेश नहीं कर पातीं. वहीं दूसरी तरफ कई लोग खासकर लड़कियां धूप से बचने के लिए सनस्क्रीन लोशन का इस्तेमाल करती हैं. नतीजतन इनमें विटामिन डी की कमी होने की आशंका बढ़ जाती है. यह तो हुआ एक कारण. दूसरा कारण यह भी है कि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है वैसे-वैसे विटामिन डी का बनना और उसका पचना दोनों कम होते जाते हैं. कुछ दवाइयां भी लीवर में विटामिन डी को सक्रिय होने से रोकती हैं. फिर गुर्दे की बीमारियों (जैसे कि नेफ्रोटिक सिंड्रोम इत्यादि) में भी शरीर में विटामिन डी की कमी हो जाती है. यदि लीवर या आंतों की किसी बीमारी के कारण भोजन में मौजूद वसा (फैट) पच न पाए तो साथ-साथ विटामिन डी भी नहीं पच पाता क्योंकि विटामिन डी एक फैट सॉल्यूबल विटामिन है.

विटामिन डी कम होने पर क्या-क्या बीमारियां हो सकती हैं?
अगर विटामिन डी की थोड़ी सी ही कमी हो तो प्राय: इससे कोई विशेष तकलीफ नहीं होती और ऐसे में, यूं ही रुटीन में किए किसी टेस्ट में यदि विटामिन डी की कमी निकल आए तो आपको हैरानी भी सकती है. हां, लेकिन इसकी यही कमी और ज्यादा बढ़ जाती है तब जरूर हड्डियों में दर्द, हड्डियों का कमजोर होना, पैरों और हाथों की मांसपेशियों का कमजोर होना, खासकर जांघ और बाहों की मसल्स में ताकत का कम होना, यह सब हो सकता है. कभी तो हड्डियां इतनी कमजोर तक हो जाती हैं कि फिर एक मामूली सी चोट में भी हमें फ्रैक्चर हो सकता है. कई बार तो पता भी नहीं चलता और रीढ़ की हड्डियों में कई जगह फ्रैक्चर हो जाते हैं.
विटामिन डी की कमी यदि बच्चों में हो तो रिकेट्स नाम की बीमारी पैदा हो जाती है. बड़ों में आस्टियोमेलेसिया और आस्टियोपोरोसिस हो सकता है. ये दोनों ही बीमारियों में मूल मुद्दा हड्डियों के कमजोर हो जाने का होता है.

विटामिन डी की कमी से आखिर बचें कैसे और कमी हो ही जाए तो फिर क्या करें?

सप्ताह में कम से कम तीन दिन धूप (हो सके तो दोपहर दो से तीन बजे के बीच) में, 10 से 15 मिनट तक पीठ, बाहें, गर्दन, तथा चेहरा उघाड़कर बैठें या लेटें. सनस्क्रीन लोशन के नियमित इस्तेमाल से बचें. दूध, दही, पनीर, इत्यादि का सेवन नियमित करें.
थकान बहुत लगती हो, जमीन पर बैठ जाएं तो खड़े होने में कमर तथा जांघों में कमजोरी लगती हो, हड्डियों और मांसपेशियों में बहुत दर्द होता हो तो खून की जांच द्वारा विटामिन डी जरूर चेक कराएं. यदि विटामिन डी का स्तर सामान्य से कम निकले तो किसी अच्छे डॉक्टर की सलाह से नियमित विटामिन डी, कैल्शियम और अन्य दवाइयां लें.



जानिये ऐसे विटामिन और मिनरल्‍स के बारे में जिनके सप्‍पलीमेंट्स लेने जरुरी नहीं


हम सभी जानते हैं कि स्वस्थ शरीर के लिए हमें कुछ विटामिन्स और मिनरल्स लेने की आवश्यकता होती है। विभिन्न कार्यों को करने के लिए शरीर को इनकी आवश्यकता होती है परन्तु शरीर पर्याप्त मात्रा में इनका उत्पादन नहीं कर पाता।

हालाँकि हाल ही में की गयी खोज के अनुसार यह पता चला है कि हमारे शरीर को कुछ विटामिन्स और सम्पूरकों की आवश्यकता नहीं होती। मिनरल्स और विटामिन्स को अक्सर माइक्रोन्यूट्रियंट कहा जाता है क्योंकि शरीर को बहुत कम मात्रा में इनकी आवश्यकता होती है।





कैल्शियम, विटामिन डी और के, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस आपकी हड्डियों को टूटने से बचाता है। विटामिन डी पाचन तंत्र से होकर जाने वाले खाद्य पदार्थों से कैल्शियम अवशोषित करने में सहायक होता है न कि हड्डियों से ।





अनेक बी विटामिन्स कुछ को एंजाइम्स के मुख्य घटक होते हैं जो खाद्य पदार्थों से उर्जा प्राप्त करने में सहायक होते हैं। विटामिन बी6, बी12 और फोलिक एसिड, एमिनो एसिड को पचाने में सहायक होते हैं जो कोशिकाओं के गुणन में सहायक होता है।

आम धारणा के विपरीत पानी में घुलनशील कुछ विटामिन्स शरीर में लंबे समय तक रहते हैं। आपका लीवर कई वर्षों तक विटामिन बी12 की आपूर्ति करता है।



आइए उन विटामिन्स और मिनरल्स के बारे में जाने जिन्हें लेने की आवश्यकता नहीं होती। सबसे पहला है कैल्शियम के सप्लीमेंट्स। अक्सर महिलाओं को मज़बूत हड्डियों के लिए कैल्शियम के सप्लीमेंट्स लेने के लिए कहा जाता है।


वर्तमान में की गयी खोज के अनुसार इसके कारण किडनी में स्टोन, धमनियों का कड़ा होना और हार्ट संबंधी समस्याएं होने की संभावना होती है। इसके बजाय फिश, हरी पत्तेदार सब्जियां और बादाम का सेवन करें। इनमे कैल्शियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। गुर्दे की पथरी में रामबाण का इलाज करेगा एप्‍पल साइडर वेनिगर

वर्तमान खोज के अनुसार विटामिन ई के कारण कैंसर हो सकता है। पहले अल्जाइमर, मोतियाबिंद, दिल की बीमारी आदि बीमारियों से बचने के लिए विटामिन ई लेने की सलाह दी जाती थी।

आयोडीन के सप्लीमेंट्स लेने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह अवश्य लें क्योंकि आयोडीन की थोड़ी भी अधिक मात्रा से हाइपोथाइरोइडिज्म के शिकार हो सकते हैं। अत: आयोडीन की मात्रा लेते समय सावधान रहे।



आयरन सप्लीमेंट्स लीवर और अन्य अंग जैसे पेन्क्रियास और हार्ट को नुकसान पहुंचा सकते हैं। अत: डॉक्टर की सलाह लें और देखें कि क्या वास्तव में आपको आयरन के सप्लीमेंट्स लेने की आवश्यकता है या नहीं।

विटामिन बी6 संपूरक से नसों में असामान्य उत्तेजना उत्पन्न होती है। अत: कोई भी संपूरक लेने से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।

कोई टिप्पणी नहीं

Healths Is Wealth. Blogger द्वारा संचालित.