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योग के 10 प्रमुख आसन


योग के 10 प्रमुख आसन और उनके लाभयोग

योग का अर्थ है जोड़ना। जीवात्मा का परमात्मा से मिल जाना, पूरी तरह से एक हो जाना ही योग है। योगाचार्य महर्षि पतंजली ने सम्पूर्ण योग के रहस्य को अपने योगदर्शन में सूत्रों के रूप में प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार, 'चित्त को एक जगह स्थापित करना योग है।
इस पोस्ट में हम कुछ आसान और प्राणायाम के बारे में बात करेंगे जिसे आप घर पर बैठकर आसानी से कर सकते हैं और अपने जीवन को निरोगी बना सकते हैं।



स्वस्तिकासन /Swastikasana 
स्थिति - स्वच्छ कम्बल या कपडे पर पैर फैलाकर बैठें। 
विधि- बाएं पैर को घुटने से मोड़कर दाहिने जंघा और पिंडली (calf, घुटने के नीचे का हिस्सा) और के बीच इस प्रकार स्थापित करेंकी बाएं पैर का तल छिप जाये उसके बाद दाहिने पैर के पंजे और तल को बाएं पैर के नीचे सेजांघ और पिंडली के मध्य स्थापित करने से स्वस्तिकासन बन जाता है। ध्यान मुद्रा मेंबैठें तथा रीढ़ (spine) सीधी कर श्वास खींचकर यथाशक्ति रोकें।इसी प्रक्रिया को पैर बदलकर भी करें।

लाभ - पैरों का दर्द, पसीना आना दूर होता है।पैरों का गर्म या ठंडापन दूर होता है... ध्यान हेतु बढ़िया आसन है।




गोमुखासन /Gomukhasana
विधि- दोनों पैर सामने फैलाकर बैठें। बाएं पैर को मोड़कर एड़ी को दाएं नितम्ब (buttocks) के पास रखें।दायें पैर को मोड़कर बाएं पैर के ऊपर इस प्रकार रखें की दोनों घुटने एक दूसरे के ऊपरहो जाएँ।दायें हाथ को ऊपर उठाकर पीठ की ओर मुडिए तथा बाएं हाथ को पीठ के पीछे नीचे सेलाकर दायें हाथ को पकडिये .. गर्दन और कमर सीधी रहे।एक ओ़र से लगभग एक मिनट तक करने के पश्चात दूसरी ओ़र से इसी प्रकार करें।

Tip- जिस ओ़र का पैर ऊपर रखा जाए उसी ओ़र का (दाए/बाएं) हाथ ऊपर रखें.

लाभ- अंडकोष वृद्धि एवं आंत्र वृद्धि में विशेष लाभप्रद है।धातुरोग, बहुमूत्र एवं स्त्री रोगों में लाभकारी है।यकृत, गुर्दे एवं वक्ष स्थल को बल देता है। संधिवात, गाठिया को दूर करता है।





गोरक्षासन /Gorakhshasana

विधि- दोनों पैरों की एडी तथा पंजे आपस में मिलाकर सामने रखिये।अब सीवनी नाड़ी (गुदा एवं मूत्रेन्द्रिय के मध्य) को एडियों पर रखते हुए उस पर बैठजाइए। दोनों घुटने भूमि पर टिके हुए हों।हाथों को ज्ञान मुद्रा की स्थिति में घुटनों पररखें।

लाभ- मांसपेशियो में रक्त संचार ठीक रूप से होकर वे स्वस्थ होती है.मूलबंध को स्वाभाविक रूप से लगाने और ब्रम्हचर्य कायम रखने में यह आसनसहायक है।इन्द्रियों की चंचलता समाप्त कर मन में शांति प्रदान करता है. इसीलिएइसका नाम गोरक्षासन है।


अर्द्धमत्स्येन्द्रासन /Ardha Matsyendrasana 
विधि:-दोनों पैर सामने फैलाकर बैठें. बाएं पैर को मोड़कर एडी को नितम्ब के पास लगाएं।बाएं पैर को दायें पैर के घुटने के पास बाहर की ओ़र भूमि पर रखें।बाएं हाथ को दायें घुटने के समीप बाहर की ओ़र सीधा रखते हुए दायें पैर के पंजे को पकडें।दायें हाथ को पीठ के पीछे से घुमाकर पीछे की ओ़र देखें।इसी प्रकार दूसरी ओ़र से इस आसन को करें।
लाभ:-मधुमेह (diabetes) एवं कमरदर्द में लाभकारी। 




योगमुद्रासन / Yoga Mudrasana

स्थिति- भूमि पर पैर सामने फैलाकर बैठ जाइए.

विधि-बाएं पैर को उठाकर दायीं जांघ पर इस प्रकार लगाइए की बाएं पैर की एडी नाभि केनीचे आये।दायें पैर को उठाकर इस तरह लाइए की बाएं पैर की एडी के साथ नाभि के नीचे मिल जाए।दोनों हाथ पीछे ले जाकर बाएं हाथ की कलाई को दाहिने हाथ से पकडें. फिर श्वास छोड़ते हुए।सामने की ओ़र झुकते हुए नाक को जमीन से लगाने का प्रयास करें. हाथ बदलकर क्रिया करें।पुनः पैर बदलकर पुनरावृत्ति करें।

लाभ- चेहरा सुन्दर, स्वभाव विनम्र व मन एकाग्र होता है।


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शीर्षासन करने का तरीका और लाभ

देखने में बड़ा आसान सा दिखने वाला शीर्षासन कठिन है और इससे मिलने वाले लाभ इतने सारे हैं कि उन्हें एक जगह लिखने और पढ़ने में बड़ा वक्त लग जाएगा। यूं समझ लीजिए कि शीर्षासन आसनों का अब्बा है। कहते हैं कि इस आसन का नियमित अभ्यास करने वाला व्यक्ति बूढ़ा नहीं होता। अगर आपको दिल की बीमारी या बीपी की परेशानी नहीं है तो इसे जरूर-जरूर करें और हां ध्यान रखें अगर बीपी वगैरा की दिक्कत है कतई न करें।
शीर्षासन कैसे करें


आपको सिर के बल खड़ा होना है। इसके लिए सबसे पहले एक कपड़े को गोलाई में मोड़ लें। आपने मजदूरों देखा होगा वो सिर पर भार उठाने से पहले कपड़े का गोल सा तकिया सिर पर रखते हैं, जैसा मटके को टिकाने में भी इस्तेमाल होता है। इस कपड़े को आपको सिर और जमीन के बीच में रखना है। अपनी उंगलियां आपस में फंसा लें और अपने सिर के ऊपरी हिस्से को पीछे से थाम लें। इसी पोजीशन में आपको अपने पैर सीधे करने हैं। शुरू में आप पैरों को सीधा न खोलें, घुटनों को मोड़ कर पंजे दीवार पर टिकाएं और इसी पोजीशन में थोड़ा अभ्यास कर लें। घुटने मोड़कर अगर आप टिक गए तो फिर धीरे-धीरे उन्हें सीधा कर लें। अभ्यास बढ़ाएं और कुछ देर इसी तरह से रहें। वैसे सिर के नीचे कपड़े की पोटली लगाना जरूरी नहीं है।

सावधानी बेहद जरूरी
इस आसन के साथ चंद सावधानियां बेहद जरूरी हैं। पहली तो ये कि बीपी के मरीज और दिल के रोगी इसे कतई न करें। आसन करने के बाद सीधे खड़े हो जाएं और हाथों को ऊपर करके मुट्ठियों को दस बार बंद करें तथा खोलें। ऊपर के शरीर की हल्की मालिश भी करें। इसके बाद आपने जितनी देर शीर्षासन किया है कम से उसके आधे समय श्वासन करें। याद रखें श्वासन करना जरूरी है। शीर्षासन करने के दौरान खून बड़ी तेजी से आपके दिल और दिमाग की तरफ भागता है। श्वासन करने से वह वापस धीरे-धीरे पूरे शरीर में लौट जाता है। यह आसन को महिला-पुरुष दोनों कर सकते हैं।
शीर्षासन के लाभ

– योग की किताबें कहती हैं कि इस अकेले आसन में हजारों आसनों के गुण हैं।
– आंखों की कमजोरी, बालों का पकना, बाल झड़ना व खून से जुड़े रोगों को यह दूर करता है।
– इसे करने से नजला जुकाम बड़ी जल्‍दी ठीक होता है।
– इसका सबसे अच्‍छा गुण ये है कि ये दिमाग से जुड़े रोग ठीक करने में बहुत कारगर पाया गया है।
– इस आसन को करने से दिमाग, दिल और शरीर के ऊपरी हिस्‍से में रक्‍त संचार बढ़ जाता है।
– योग की किताबें कहती हैं कि दिमाग में लगे तालु स्‍थान में चंद्रमा मौजूद है, जहां से मनुष्‍य के शरीर में
अमरित रस झरता रहता है जो लोग यह आसन करते हैं उनका सूर्य जो कि नाभि कें अंदर होता है उस रस को जलने नहीं होने देता। इसलिए इस आसन को नियमित करने वाले योगी बूढ़े नहीं होते।

सर्वांगासन/ Sarvangasana

स्थिति:- दरी या कम्बल बिछाकर पीठ के बल लेट जाइए।
विधि:-दोनों पैरों को धीरे -धीरे उठाकर 90 अंश तक लाएं। बाहों और कोहनियों की सहायता सेशरीर के निचले भाग को इतना ऊपर ले जाएँ की वह कन्धों पर सीधा खड़ा हो जाए। पीठ कोहाथों का सहारा दें। हाथों के सहारे से पीठ को दबाएँ। कंठ से ठुड्ठी लगाकर यथाशक्ति करें।फिर धीरे-धीरे पूर्व अवस्था में पहले पीठ को जमीन से टिकाएं फिर पैरों को भी धीरे-धीरे सीधा करें।

लाभ:-थायराइड को सक्रिय एवं स्वस्थ बनाता है।मोटापा, दुर्बलता, कद वृद्धि की कमी एवं थकान आदि विकार दूर होते हैं। 





प्राणायाम / Pranayam 

प्राण का अर्थ, ऊर्जा अथवा जीवनी शक्ति है तथा आयाम का तात्पर्य ऊर्जा को नियंत्रित करनाहै। इस नाडीशोधन प्राणायाम के अर्थ में प्राणायाम का तात्पर्य एक ऐसी क्रिया से है जिसकेद्वारा प्राण का प्रसार विस्तार किया जाता है तथा उसे नियंत्रण में भी रखा जाता है। यहाँ 3 प्रमुख प्राणायाम के बारे में चर्चा की जा रही है:-

-अनुलोम-विलोम प्राणायाम / Anulom Vilom Pranayam 

विधि:-ध्यान के आसान में बैठें।बायीं नासिका से श्वास धीरे-धीरे भीतर खींचे।श्वासयथाशक्ति रोकने (कुम्भक) के पश्चात दायें स्वर से श्वास छोड़ दें।पुनः दायीं नाशिका से श्वासखीचें।यथाशक्ति श्वास रूकने (कुम्भक) के बाद स्वर से श्वास धीरे-धीरे निकाल दें।जिस स्वरसे श्वास छोड़ें उसी स्वर से पुनः श्वास लें और यथाशक्ति भीतर रोककर रखें. क्रिया सावधानीपूर्वक करें, जल्दबाजी ने करें।
लाभ:-शरीर की सम्पूर्ण नस नाडियाँ शुद्ध होती हैं।शरीर तेजस्वी एवं फुर्तीला बनता है।भूख बढती है।रक्त शुद्ध होता है।

सावधानी:-नाक पर उँगलियों को रखते समय उसे इतना नदबाएँ की नाक कि स्थिति टेढ़ीहो जाए।श्वास की गति सहज ही रहे।कुम्भक को अधिक समय तक न करें।

-कपालभाति प्राणायाम / Kapalbhati Pranayam 

विधि:-कपालभाति प्राणायाम का शाब्दिक अर्थ है, मष्तिष्क की आभा को बढाने वाली क्रिया।इसप्राणायाम की स्थिति ठीक भस्त्रिका के ही सामान होती है परन्तु इस प्राणायाम में रेचक अर्थातश्वास की शक्ति पूर्वक बाहर छोड़ने में जोड़ दिया जाता है।श्वास लेने में जोर ने देकर छोड़ने मेंध्यान केंद्रित किया जाता है।कपालभाति प्राणायाम में पेट के पिचकाने और फुलाने की क्रिया पर जोरदिया जाता है।इस प्राणायाम को यथाशक्ति अधिक से अधिक करें।

लाभ:-हृदय, फेफड़े एवं मष्तिष्क के रोग दूर होते हैं।कफ, दमा, श्वास रोगों में लाभदायक है।मोटापा, मधुमेह, कब्ज एवं अम्ल पित्त के रोग दूर होते हैं।मस्तिष्क एवं मुख मंडल का ओज बढ़ता है।

-भ्रामरी प्राणायाम / Bhramari Pranayama 

स्थिति:- किसी ध्यान के आसान में बैठें.

विधि:-आसन में बैठकर रीढ़ को सीधा कर हाथों को घुटनों पर रखें . तर्जनी को कान के अंदरडालें।दोनों नाक के नथुनों से श्वास को धीरे-धीरे ओम शब्द का उच्चारण करने के पश्चातमधुर आवाज में कंठ से भौंरे के समान गुंजन करें।नाक से श्वास को धीरे-धीरे बाहर छोड़ दे।पूरा श्वास निकाल देने के पश्चात भ्रमर की मधुर आवाज अपने आप बंद होगी।इस प्राणायामको तीन से पांच बार करें।
लाभ:-वाणी तथा स्वर में मधुरता आती है।ह्रदय रोग के लिए फायदेमंद है।मन की चंचलता दूर होती है एवं मन एकाग्र होता है।पेट के विकारों का शमन करती है।उच्च रक्त चाप पर नियंत्रण करता है।

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