Header Ads

क्या अकेलापन आपको मौत की ओर धकेलता है? |


क्या अकेलापन आपको मौत की ओर धकेलता है? |
https://www.healthsiswealth.com/

आपने कभी महसूस किया है अपने साये को? वही तो है जो आपको अपने अस्तित्व से जोड़े रखता है। जी हां, कभी-कभी आपका साया ही आपका हमजोली बन जाता है। लेकिन यह मामला कभी-कभी तक ही सीमित रहना चाहिए। लेकिन जब आप एक लंबा समय अपने साए के साथ गुज़ारने लगते हैं तो फिर चिंता की बात हो जाती है। अकेलापन (Loneliness) मतलब जब सिर्फ आपके साथ आपका साया हो। क्या आप जानते हैं इससे अनेक बीमारियों का जन्म होता है। इस दौरान यदि आप डिप्रेशन के लक्षणों (Depression Symptoms) को पहचान लें तो किसी बड़ी समस्या से बचे रहते हैं। यदि कोई व्यक्ति अलग-थलग (isolation) महसूस करता है तो तुरंत उससे जुड़कर उसे राहत दें।
क्या है अकेलापन (LONELINESS)?

आप इसका अर्थ यह मत समझ लीजियेगा कि आप किसी स्थान पर अकेले हैं। अकेलापन (Loneliness) वह परिस्थिति है जब सबके बीच भी व्यक्ति नितान्त अकेलापन महसूस करता है। उसे हर बात में उदासी महसूस होती है। वह निरंतर चिंता में डूबा हुआ रहता है। ऐसी स्थिति कई बार बहुत खतरनाक मोड़ पर आकर खड़ी हो जाती है। जब अकेलेपन का शिकार व्यक्ति अपने आप को नुकसान पहुंचाने में भी नहीं चूकता। क्यों होती है अकेलेपन (Loneliness) की समस्या? इस के लिए क्या कारण ज़िम्मेदार हैं।
• अंतर्मुखी होना

जी हां यदि आप अंतर्मुखी हैं तो फिर एकाकीपन (Loneliness) के शिकार हो सकते हैं। अंतर्मुखी होना कोई गुनाह नहीं है। लेकिन यह आपको लोगों से बहुत दूर कर देता है। आपके इसी व्यवहार से आप सबसे अलग होते जाते हैं।
• पारिवारिक वातावरण

परिवार की स्थिति और वातावरण किसी व्यक्ति के व्यवहार में बहुत बड़ा योगदान देते हैं। परिवार में जितनी सकारात्मकता होगी आप पर उसका उतना ही अच्छा असर होगा। बेवजह के झगड़े, अशांति आपके जीवन में तनाव को जन्म देगी। इससे आप अवसाद के साथ अकेलेपन (Loneliness) के भी शिकार होंगे।
• सामाजिक स्थिति

सामाजिक रूप से आप कितने प्रबल हैं? लोगों से आपका ताल-मेल किस तरह का है? यह भी आपके अकेलेपन पर निर्भर करता है। आपकी आर्थिक स्थिति, आपका स्टेटस यह सभी आपकी सामाजिक दशा को सुनिश्चित करते हैं। सामाजिक अवेहलना या तिरस्कार भी अकेलेपन का कारण होता है।
अकेलपन से उपजे डिप्रेशन के लक्षण (DEPRESSION SYMPTOMS)
• हर समय उदास रहना 
• एक कमरे में अपने आप को बंद रखना 
• किसी से बात नहीं करना 
• थकान का बढ़ना
• बैचेनी और चिड़चिड़ापन 
• नींद में कमी आना 
• मन में बुरे विचार आना

आपको भी अपने से जुड़े व्यक्ति में डिप्रेशन के यह लक्षण (Depression Symptoms) नज़र आये तो तुरंत सतर्क हो जाइए।
अलगाव होना (ISOLATION)

अलगाव होना दो बातों पर निर्भर करता है। एक तो है आपकी खुद की सोच और दूसरा है दूसरों के द्वारा आपका आंकलन। बहुत बार आप अपनी निजी वजहों से भी अलग-थलग (isolation) पड़ जाते हैं। फिर कई बार आप दूसरों के द्वारा भी अलगाव के शिकार हो जाते हैं। इस कारण आप में डिप्रेशन के लक्षण (Depression Symptoms) उभरने लगते हैं। यदि सही समय पर इसका उपचार नहीं करवाया जाता है तो स्थिति गंभीर हो सकती है।
अकेलेपन को दूर करने के उपाय
• किताबों से दोस्ती करें
अकेलापन को दूर करने के लिए सबसे अच्छा है कि आप किताबों की दुनिया में खो जाएं। किताबे न सिर्फ आपको ज्ञान की नई राह दिखाएंगी बल्कि आपको बहुत कुछ अच्छा करने के लिए भी प्रेरित करेंगी। महपुरुषों के प्रेरक प्रसंग आप पढ़ें, इससे भी आपको अपने तनाव से बाहर निकलने में बहुत मदद मिलेगी। जब आप पढ़ने की आदत डालेंगे तो आपको लिखने की आदत भी होती जायेगी। इससे आपके अनुभव और विचारों को बांटने में भी आपको आसानी होगी।
• बच्चों के साथ समय बिताएं
तनाव को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप बच्चों के साथ अपना समय व्यतीत करें। बच्चों की दुनिया सबसे अलग होती है, वहां दुःख और परेशानी का तो नामोनिशान तक नहीं होता है। उनके साथ खेलना बातें करना आपको हर तरह से राहत देगा।
• अपनी पसंद का काम करें

अकेले रहने की जगह आप वो काम कीजिये जो आपको पसंद है, जैसे बागवानी कीजिये, संगीत सुनिए। इससे आपको बेवजह के विचार नहीं आयेंगे और आप ज़्यादा खुश रहेंगे।
• नए मित्र बनाइये

कुछ लोगों के लिए यह काम मुश्किल हो सकता है। जैसे हमने आपसे पहले भी कहा कि अंतर्मुखी लोग ज़्यादा घुलते-मिलते नहीं हैं। लेकिन नए लोगों से मिलकर आप अच्छी-अच्छी बातों को जानेंगे। इससे आपकी सोच का दायरा भी बढ़ेगा।

छोटे-छोटे उपाय आपको अकेलेपन (Loneliness) की समस्या से मुक्ति दिला सकते हैं। वैसे ज़रूरी भी है कि डिप्रेशन के लक्षण (Depression Symptoms) जैसे ही प्रकट हों आप सतर्क हो जाएं। यह सब आप पर ही निर्भर करता है।

शायद नही जानते होंगे आप अकेलापन होता है, खतरनाक या बेहद फायदेमंद



मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, सोशल एनिमल है। यानी वो अकेले जिंदगी बसर नहीं कर सकता। लोगों से घुलना-मिलना, उनके साथ वक़्त बिताना, पार्टी करना और मिल-जुलकर जश्न मनाना हमारी फितरत भी है और जरूरत भी। इसके विपरीत, अगर कोई अकेला रहता है, लोगों से मिलता-जुलता नहीं, उसके साथ वक़्त बिताने वाले लोग नहीं हैं, तो इसे एक बड़ी परेशानी समझा जाता है।यही वजह है कि अकेलेपन को सजा के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है। लोगों को जेलों में अकेले कैद करके रखा जाता है। दिमागी तौर पर बीमार लोगों को जंजीरों से बांधकर अकेले रखा जाता है।

अकेलापन इस कदर खतरनाक है कि आज तमाम देशों में अकेलेपन को बीमारी का दर्जा दिया जा रहा है।अकेलेपन से निपटने के लिए लोगों को मनोवैज्ञानिक मदद मुहैया कराई जा रही है।तो, क्या वाकई अकेलापन बहुत खतरनाक है और इससे हर कीमत पर बचना चाहिए? बहुत से लोग इसका जवाब ना में देना पसंद करते हैं। उन्हें पार्टियों में, किसी महफिल में या जश्न में शरीक होना हो, तो वो कतराने लगते हैं। महफिलों में जाना नहीं चाहते। लोगों से मिलने-जुलने से बचते हैं।

अकेले रहने से क्या हासिल? 
ऐसे बहुत से लोग हैं जो आज अकेले रहने की वकालत करते हैं। अमरीकी लेखिका एनेली रुफस ने तो बाकायदा 'पार्टी ऑफ वन: द लोनर्स मैनीफेस्टो' के नाम से किताब लिख डाली है। वो कहती हैं कि अकेले रहने के बहुत से मजे हैं। आप ख़ुद पर फोकस कर पाते हैं। अपनी क्रिएटिविटी को बढ़ा पाते हैं। लोगों से मिलकर फिजूल बातें करने या झूठे हंसी-मजाक में शामिल होने से बेहतर अकेले वक़्त बिताना।

वहीं ब्रिटिश रॉयल कॉलेज ऑफ जनरल प्रैक्टिशनर्स कहता है कि अकेलापन डायबिटीज जैसी भयानक बीमारी है। इससे भी उतने ही लोगों की मौत होती है, जितनी डायबिटीज की वजह से। अकेलापन हमारे सोचने-समझने की ताकत को कमजोर करता है। अकेला रहना हमारी अक़्लमंदी पर बुरा असर डालता है। बीमारियों से लड़ने की हमारी क्षमता कम होती है।

अकेले रहने से बढ़ती है क्रिएटिविटी

तन्हा रहना, पार्टियों से दूरी बनाना और मित्रों से मिलने में आना-कानी करना अगर ख़ुद का फैसला है, तो ये काफी फायदेमंद हो सकता है।अमरीका की सैन जोस यूनिवर्सिटी के ग्रेगरी फीस्ट ने इस बारे में रिसर्च की है। फीस्ट इस नतीजे पर पहुंचे कि ख़ुद के साथ वक़्त बिताने से आपकी क्रिएटिविटी को काफी बूस्ट मिलता है। इससे आपकी ख़ुद-ऐतमादी यानी आत्मविश्वास बढ़ता है। आजाद सोच पैदा होती है। नए ख्यालात का आप खुलकर स्वागत करते हैं।
जब आप कुछ वक़्त अकेले बिताते हैं तो आपका जहन सुकून के पलों का बखूबी इस्तेमाल करता है। शोर-शराबे से दूर तन्हा बैठे हुए आपका जहन आपकी सोचने-समझने की ताकत को मजबूत करता है। आप पुरानी बातों के बारे में सोचकर अपनी याददाश्त मजबूत करते हैं।अकेले क्यों रहना चाहते हैं लोग? 
अमरीका की ही बफैलो यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक जूली बोकर के रिसर्च से फीस्ट के दावे को मजबूती मिली है।जूली कहती हैं कि इंसान तीन वजहों से लोगों से घुलने-मिलने से बचते हैं। कुछ लोग शर्मीले होते हैं इसलिए दूसरों से मिलने-जुलने से बचते हैं। वहीं कुछ लोगों को महफिलों में जाना पसंद नहीं होता। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो मिलनसार होने के बावजूद अकेले वक़्त बिताना पसंद करते हैं।

जूली और उनकी टीम ने रिसर्च में पाया कि जो लोग ख़ुद से अकेले रहना पसंद करते हैं, उनकी क्रिएटिविटी बेहतर होती जाती है। अकेले रहने पर वो अपने काम पर ज़्यादा ध्यान दे पाते हैं। अपनी बेहतरी पर फोकस कर पाते हैं। नतीजा उनकी क्रिएटिविटी बढ़ जाती है।

धर्मों में अकेले तप, चिंतन-मनन की सलाह
वैसे, अकेलेपन के फायदे बताने वाले ये मनोवैज्ञानिक कोई नई चीज नहीं बता रहे हैं। हिंदू धर्म से लेकर बौद्ध धर्म तक, बहुत से मजहब हैं जो अकेले तप करने और चिंतन-मनन करने की सलाह देते हैं। असल में अकेले रहने पर हमारा दिमाग आराम की मुद्रा में आ जाता है। वो आरामतलबी के इस दौर में याददाश्त को मजबूत करने और जज़्बात को बेहतर समझने में जुट जाता है। वहीं आप किसी के साथ होते हैं, तो आपका ध्यान बंटता है। आपके जहन को सुकून नहीं मिल पाता।

ग्रेगरी फीस्ट कहते हैं कि लोग अगर खुद से अकेले रहना, तन्हाई में वक़्त बिताना पसंद करते हैं। तो ये उनके लिए ज़्यादा फायदेमंद है। लेकिन महफिलों के आदी लोग अकेलेपन के शिकार हों, ये परेशानी की बात है। अच्छा हो कि हम गिने-चुने दोस्त ही बनाएं। उनके साथ ही क्वालिटी टाइम बिताएं। बनिस्बत इसके कि हम रोजाना पार्टियां करें, महफिलें सजाएं। बीच-बीच में थोड़ा वक़्त तन्हाई में बिताएं। ख़ुद पर फोकस करें,चिंतन-मनन करें। ये तालमेल बनाना हमारे लिए सबसे ज़्यादा अच्छा साबित होगा।
वहम है अकेलापन
किसी भी वजह से खुद को अकेला महसूस कर रही हैं तो आइए आप को आप के भीतर छुपे स्वच्छंद इंसान से रूबरू कराते हैं.

समय पर विवाह न हो पाने, जीवनरूपी सफर में हमसफर द्वारा बीच में ही साथ छोड़ देने या पतिपत्नी में आपसी तालमेल न हो पाने पर जब तलाक हो जाता है तो ऐसी स्थिति में एक महिला अकेले जीवन व्यतीत करती है. लगभग 1 दशक पूर्व तक इस प्रकार अकेले जीवन बिताने वाली महिला को समाज अच्छी नजर से नहीं देखता था और आमतौर पर वह पिता, भाई या ससुराल वालों पर निर्भर होती थी. मगर आज स्थितियां इस के उलट हैं. आज अकेली रहने वाली महिला आत्मनिर्भर, स्वतंत्र और जीवन में आने वाली हर स्थिति का अपने दम पर सामना करने में सक्षम है.

‘‘यह सही है कि हर रिश्ते की भांति पतिपत्नी के रिश्ते का भी जीवन में अपना महत्त्व है, परंतु यदि यह रिश्ता नहीं है आप के साथ तो उस के लिए पूरी जिंदगी परेशान और तनावग्रस्त रहना कहां तक उचित है? यह अकेलापन सिर्फ मन का वहम है और कुछ नहीं. इंसान और महिला होने का गौरव जो सिर्फ एक बार ही मिला है उसे मैं अपने तरीके से जीने के लिए आजाद हूं,’’ यह कहती हैं एक कंपनी में मैनेजर 41 वर्षीय अविवाहिता नेहा गोयल. वे आगे कहती हैं, ‘‘मैं आत्मनिर्भर हूं. अपनी मरजी का खाती हूं, पहनती हूं यानी जीती हूं.

घर की स्थितियां कुछ ऐसी थीं कि मेरा विवाह नहीं हो पाया, परंतु मुझे कभी जीवनसाथी की कमी नहीं खली, बल्कि मुझे लगता है कि यदि मेरा विवाह होता तो शायद मैं इतनी आजाद और बिंदास नहीं होती. तब मेरी उन्नति में मेरी जिम्मेदारियां आड़े आ सकती थीं. मैं अभी तक 8 प्रमोशन ले चुकी हूं, जिन्हें यकीनन परिवार के चलते नहीं ले सकती थी.’’ केंद्रीय विद्यालय से प्रिसिंपल पद से रिटायर हुईं नीता श्रीवास्तव का अपने पति से उस समय तलाक हुआ जब वे 45 वर्ष की थीं और उन का बेटा 15 साल का. वे कहती हैं, ‘‘कैसा अकेलापन? मैं आत्मनिर्भर थी.

अच्छा कमा रही थी. बेटे को अच्छी परवरिश दे कर डाक्टर बनाया. अच्छा खाया, पहना और खूब घूमी. पूरी जिंदगी अपनी शर्तों पर बिताई. कभी मन में खयाल ही नहीं आया कि मैं अकेली हूं. जो नहीं है या छोड़ गया है, उस के लिए जो मेरे पास है उस की कद्र न करना कहां की बुद्धिमानी है?’’

रीमा तोमर के पति उन्हें उस समय छोड़ गए जब उन का बेटा 10 साल का और बेटी 8 साल की थी. उन की उम्र 48 वर्ष थी. पति डीएसपी थे. अचानक एक दिन उन्हें अटैक आया और वे चल बसे. अपने उन दिनों को याद करते हुए वे कहती है, ‘‘यकीनन मेरे लिए वे दिन कठिन थे. संभलने में थोड़ा वक्त तो लगा पर फिर मैं ने जीवन अपने तरीके से जीया.

आज मेरा बेटा एक स्कूल का मालिक है और बेटी अमेरिका में है. पति के साथ बिताए पल याद तो आते थे, परंतु कभी किसी पुरुष की कमी महसूस नहीं हुई. मैं अपनी जिंदगी में बहुत खुश थी और आज भी हूं.’’ मनोवैज्ञानिक काउंसलर निधि तिवारी कहतीं हैं, ‘‘अकेलापन मन के वहम के अलावा कुछ नहीं है. कितनी महिलाएं जीवनसाथी और भरेपूरे परिवार के होते हुए भी सदैव अकेली ही होती हैं. वंश को बढ़ाने और शारीरिक जरूरतों के लिए एक पति की आवश्यकता तो होती है, परंतु यदि मन, विचार नहीं मिलते तो वह अकेली ही है न? इसलिए अकेलेपन जैसी भावना मन में कभी नहीं आने देनी चाहिए.’’

अकेली औरतें ज्यादा सफल कुछ समय पूर्व एक दैनिक पेपर में एक सर्वे प्रकाशित हुआ था जो अविवाहित, तलाकशुदा और विधवा महिलाओं पर कराया गया था. उस के अनुसार:

अकेली रहने वाली 93% महिलाएं मानती हैं कि उन का अकेलापन गृहस्थ महिलाओं की तुलना में जीवन के सभी क्षेत्रों में सफल रहने में अधिक सहायक सिद्ध हुआ है. इस से उन्हें आजादी से जीवन जीने का अधिकार मिला है.

65% महिलाएं जीवन में पति की आवश्यकता को व्यर्थ मानती हैं और वे विवाह के लिए बिलकुल भी इच्छुक नहीं हैं. द्य आवश्यकता पड़ने पर विवाह करने के बजाय इन्होंने किसी अनाथ बच्चे को गोद लेना अधिक अच्छा समझा.

इन्हें कभी खालीपन नहीं अखरता. ये अपनी रुचि के अनुसार सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती है और आधुनिक मनोरंजन के साधनों का लाभ उठाती हैं. चिंतामुक्त हो कर जी भर कर सोती हैं.

इस सर्वेक्षण के अनुसार एकाकी जीवन जीने वाले पुरुषों की संख्या महिलाओं की संख्या के अनुपात में बहुत कम है.

बढ़ रहा सिंगल वूमन ट्रैंड

पिछले दशक से यदि तुलना की जाए तो एकाकी जीवन जीने वाली महिलाओं की संख्या में 39 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. विदेशों में अकेले जीवन जीने वाली महिलाओं की उपस्थिति समाज में बहुत पहले से ही है, साथ ही वहां वे उपेक्षा और उत्पीड़न की शिकार भी नहीं होतीं. भारतीय समाज में 1 दशक में महिलाओं की स्थिति में तेजी से सुधार हुआ है. हाल ही में आई पुस्तक ‘आल द सिंगल लेडीज अनमैरिड वूमन ऐंड द राइज औफ एन इंडिपैंडैंट नेशन’ की लेखिका रेबेका टेस्टर के अनुसार 2009 के अनुपात में इस दशक में सिंगल महिलाओं की बढ़ती संख्या समाज में उन के महत्त्व का दर्ज कराती है.

यह सही है कि हर रिश्ते की अपनी गरिमा और महत्त्व होता है. अकेलापन सिर्फ मन का वहम तो है, परंतु इस के लिए सब से आवश्यक शर्त है महिला की आत्मनिर्भरता और आत्मशक्ति का मजबूत होना, क्योंकि यदि वह आत्मनिर्भर नहीं है तो उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पराधीन होना होगा. पराधीनता तो सदैव कष्टकारी ही होती है. आत्मनिर्भरता की स्थिति में उस पर किसी का दबाव नहीं होता और अपने ऊपर उंगली उठाने वालों को भी मुंहतोड़ जवाब दे पाने में सक्षम होती है. ‘‘अकेले रहने वाली महिलाओं को अपनी आत्मशक्ति को मजबूत रखना चाहिए. जो जिंदगी आप ने चुनी है उस में खुश रहना चाहिए. कभी किसी को अपने पति के साथ देख कर मन को कमजोर करने वाले विचार नहीं आने चाहिए,’’ 

जब भी कभी ऐसा अवसर जीवन में आता है तो इसे सिर्फ अपने मन का वहम मानें और सचाई को स्वीकार कर के जीवन को आगे बढ़ाएं. जिंदगी जिंदादिली का नाम है न कि किसी के सहारे का मुहताज होने का. स्वयं को अंदर से मजबूत कर के अपनी शक्ति को सामाजिक और रचनात्मक कार्यों में लगाना चाहिए. साथ ही कुछ ऐसे संसाधनों को भी खोजना चाहिए जिन में आप व्यस्त रहें.
सावधान! अकेले रहने से ज्यादा खतरनाक है अकेलेपन का अहसास
अकेलेपन से बढ़ जाता है मौत का खतरा

एक नए शोध में पता चला है कि अकेलेपन का अहसास अकेले रहने से अधिक खतरनाक है और जो लोग अकेलापन महसूस करते हैं, उनमें खराब मानसिक स्वास्थ्य, दिल संबंधी बीमारियों के होने की संभावना ज्यादा होती है और वे अकेले रहने वालों की तुलना में मरते भी जल्दी हैं। निष्कर्षो से पता चलता है कि अकेलापन महिलाओं में मृत्यु के दोगुने जोखिम से जुड़ा है और पुरुषों में भी इसका खतरा दोगुना होता है।
अकेला महसूस करने वाले पुरुषों और महिलाओं में अकेलापन नहीं महसूस करने वालों की तुलना में तीन गुना चिंता और अवसाद के लक्षण होने की संभावना होती है और इनके जीवन का गुणवत्ता स्तर काफी कम होता है।
कोपेनहेगन विश्वविद्यालय अस्पताल के डॉक्टरेट की छात्र एनी विनगार्ड क्रिस्टेनसेन ने कहा, "अकेलापन दिल संबंधी बीमारियों वाले मरीजों व अकेले रहने वाले पुरुषों व महिलाओं में समयपूर्व मौत, खराब मानसिक स्वास्थ्य व कम गुणवत्ता वाले जीवन की भविष्यवाणी करता है।"
इस शोध को वार्षिक नर्सिग कांग्रेस यूरोहर्टकेयर 2018 में प्रस्तुत किया गया।
इस शोध में इस बात का पता किया गया कि क्या खराब सामाजिक नेटवर्क 13,463 मरीजों के बदतर नतीजों से जुड़ा है। इन मरीजों को इस्कैमिक दिल का रोग, एरिथिमिया, हर्ट फेल्योर व हर्ट वाल्व रोग आदि हैं।
इसमें पाया गया कि उनके दिल संबंधी बीमारियों के बावजूद उनमें अकेलेपन का अहसास उनके खराब नतीजों से जुड़ा था।

शरीर और मन दोनों के लिए खतरनाक है अकेलापन

इससे पहले इंसान इतना अकेला कभी नहीं था, जितना अब है। भले ही वह भीड़भाड़ वाले बंद शहरों में रहता हो, या जेब में पड़े उसके फोन में कितने ही दोस्तों के कॉन्टैक्ट्स क्यों न हों।


स्मोकिंग, मोटापा आदि से सेहत को होने वाले नुकसान के बारे में लोग अकसर बात करते हैं। लेकिन, एक गंभीर परिस्थिति है जो इन सबसे ज्यादा खतरनाक है और उसपर कोई चर्चा भी नहीं होती है। वह है 'अकेलापन'. इससे पहले इंसान इतना अकेला कभी नहीं था, जितना अब है। भले ही वह भीड़भाड़ वाले बंद शहरों में रहता हो, या जेब में पड़े उसके फोन में कितने ही दोस्तों के कॉन्टैक्ट्स क्यों न हों। वाइस एडमिरल विवेक एच. मूर्ति बताते हैं कि यह लोगों की आयु और प्रॉडक्टिविटी पर भी असर डालती है। मूर्ति इस साल अप्रैल तक यूएसए के सर्जन जनरल रहे हैं। 



मूर्ति बताते हैं कि दफ्तरों में कर्मचारी और आधे से ज्यादा सीईओ अकेला महसूस करते हैं। जिन लोगों के करीबी दोस्त होते हैं, उनकी संख्या लगातार घट रही है। अकेलापन हमेशा अकेले होने को ही नहीं कहते। हो सकता है कि आपके आसपास कई लोग हों, लेकिन फिर भी आप खुद को अकेला महसूस करें, तो आप अकेलेपन का शिकार हैं।
यह खतरनाक क्यों है? 
कई सालों में हमारे दिमाग में सोशल कनेक्शन की जरूरत पैठ बना चुकी है। इस तरह की सुरक्षा की भावना की कमी से स्ट्रेस होता है। इससे कॉर्टिसॉल हॉर्मोन की मात्रा बढ़ जाती है और शरीर में सूजन आ जाती है। इससे हार्ट डिजीज, डिप्रेशन और मोटापा का भी खतरा बढ़ता है। शारीरिक नुकसान के अलावा, इससे फैसले लेने की क्षमता, प्लानिंग और भावनात्मक नियंत्रण पर भी असर पड़ता है।

कोई टिप्पणी नहीं

Healths Is Wealth. Blogger द्वारा संचालित.