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स्ट्रोक, ज़िंदगी पर लगा सकता है पूर्णविराम!


स्ट्रोक, ज़िंदगी पर लगा सकता है पूर्णविराम!

स्ट्रोक यानी पक्षाघात वह ख़तरनाक बीमारी है, जो धीरे-धीरे दुनिया को अपनी गिरफ़्त में ले रही है. आंकड़ों की मानें तो 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में मौत की दूसरी सबसे बड़ी वहज यही बीमारी है. कैसे पहचानें स्ट्रोक के लक्षण? कैसे बच सकते हैं आप इस बीमारी से? और क्या है दिल की बीमारी और स्ट्रोक का कनेक्शन जानें न्यूरोलॉजिस्ट डॉ अनिल वेंकटाचलम से. 

क्या है स्ट्रोक?


स्ट्रोक तब आता है, जब मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त प्रवाव थम जाता है. चूंकि रक्त के साथ हमारे शरीर में ऑक्सीजन पहुंचता है अत: रक्त प्रवाह थमने के चलते उस हिस्से में ऑक्सीजन की सप्लाई नहीं हो पाती. जिसके परिणामस्वरूप ब्रेन सेल्स बड़ी तेज़ी से मरने लगते हैं. कभी-कभी इसका प्रभाव प्राणघातक भी हो सकता है. आमतौर पर लोग स्ट्रोक के लक्षणों से अनजान होते हैं, जिसके कारण वक़्त रहते मेडिकल हेल्प नहीं मिल पाती और मामला गंभीर हो जाता है. आपके किसी परिचित या ख़ुद आपके साथ ऐसा न हो इसलिए आइए जानें इसके लक्षण और बचाव के कुछ उपाय.



स्ट्रोक के लक्षण 

स्ट्रोक के लक्षण को पहचाना और याद रखना बहुत आसान है. आप अंग्रेज़ी के शब्द FAST को याद रखकर स्ट्रोक के लक्षणों पर नज़र बनाए रख सकते हैं. 

F (फ़ेस): स्ट्रोक की स्थिति में व्यक्ति का चेहरा एक ओर लटक-सा जाता है. व्यक्ति हंस नहीं पाता. ऐसा लगता है कि उसकी आंखें और मुंह एक ओर लटक से गए हैं. 

A (आर्म): बहुत कोशिश करने के बाद भी दोनों आर्म्स यानीं बांहें उठा पाना संभव नहीं होता, ऐसा एक बांह में कमज़ोरी या सुन्नपन आने के कारण होता है. 

S (स्पीच): स्ट्रोक की स्थिति में व्यक्ति की ज़बान लड़खड़ाने लगती है. पूरे होशो-हवाश में होने के बावजूद बोलने में दिक़्क़त होती है. 


T (टाइम): स्ट्रोक के मामलों में टाइम यानी समय सबसे महत्वपूर्ण है. यदि आपको ऊपर के तीनों लक्षणों में से कुछ भी नज़र आए तो तुरंत ही उस व्यक्ति को किसी अच्छे अस्पताल ले जाएं. 




समय रहते सेहत पर दें ध्यान 


स्ट्रोक की स्थिति में ऊपर बताई बातों का ध्यान रखकर आप संभावित नुक़सान को काफ़ी हद तक कम कर सकते हैं. पर क्या यह बेहतर नहीं होगा कि इस तरह की किसी स्थिति को आने ही न दें! हालांकि आप अनुवांशिकता, लिंग, उम्र जैसे कारकों को नियंत्रित नहीं कर सकते, पर नीचे बताए गए क़दम आपको स्ट्रोक के ख़तरे से यक़ीनन दूर ले जाएंगे. 


1. ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखें 


हाई ब्लड प्रेशर से स्ट्रोक का ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है. इसलिए बेहतर होगा कि अपने रक्तचात को नियंत्रण में रखें. यदि आपको हाई ब्लड प्रेशर की समस्या हो तो नियमित रूप से चेकअप कराते रहें. 

2. वज़न पर भी कसें लगाम


कई शोधों में यह सामने आया है कि मोटापा बढ़ने के साथ ही स्ट्रोक की संभावना में भी वृद्धि होती है. अत: आपको मोटापे को क़ाबू में रखना बहुत ज़रूरी है. वैसी भी मोटापा कई दूसरे रोगों को अपने साथ ले आता है. इ‌सलिए भी उसपर लगाम कसना ज़रूरी है. 

3. कोलेस्टेरॉल लेवल को लेकर जागरूक रहें 


लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन कोलेस्टेरॉल (एलडीएल) की रक्त नलिका संकुचित हो जाती है, परिणामस्वरूप हार्ट अटैक और स्ट्रोक की संभावना बढ़ जाती है. इस ख़तरे को देखते हुए यह बेहद आवश्यक हो जाता है कि आप डायट या डॉक्टर की सलाह पर दी गई दवाइयों के माध्यम से कोलेस्टेरॉल के स्तर को सामान्य बनाएं रखें. 

4. शारीरिक गतिविधियों को नज़रअंदाज़ न करें 


नियमित व्यायाम करने से वज़न कम होता है और ब्लड प्रेशर भी नियंत्रण में रहता है. इसके अलावा स्ट्रोक की संभावना भी घटती है. कितने भी व्यस्त क्यों न हों, व्यायाम के लिए समय ज़रूर निकालें. यदि आपको जिम में एक्सरसाइज़ करने में बोरियम महसूस होती हो तो रोज़ाना 30 मिनट तक वॉक करना शुरू करें. या अपनी पसंद की किसी शारीरिक गतिविधि में ख़ुद को व्यस्त रखें. 

5. शराब का सेवन घटा दें


यदि आप अपनी ज़िंदगी को बढ़ाना चाहते हैं तो शराब के सेवन को घटाना बहुत ज़रूरी है. कई शोधों में यह प्रमाणित हो चुका है ‌कि रोज़ाना दो ड्रिंक से ज़्यादा लेनेवालों में स्ट्रोक का ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है. 

6. दिल की बीमारियों को न करें अनदेखा 


हृदय संबंधी गड़बड़ियों के कारण ब्लड क्लॉट्स यानी रक्त के थक्के बन सकते हैं, जो रक्त धमनियों को ब्लॉक कर सकते हैं या मस्तिष्क तक पहुंच सकते हैं. ऐट्रियल फ़ाइब्रिलेशन यानी अनियमित या तेज़ हार्ट रेट के कारण भी स्ट्रोक का ख़तरा बढ़ जाता है. अत: हृदय संबंध‌ी किसी भी गड़बड़ी को अनदेखा करने की सोचें भी न. 

7. डायबिटीज़ को कंट्रोल में रखें 

हाई ब्लड शुगर से रक्त धमनियों को नुक़सान पहुंचता है और उनमें क्लॉट्स बन सकते हैं. वहीं यदि स्ट्रोक के समय ब्लड शुगर हाई हो तो दिमाग़ को होनेवाला नुक़सान कई गुना अधिक तथा प्राणघातक हो जाता है. यदि आप डायबिटीज़ को कंट्रोल में रखेंगे तो स्ट्रोक से संबंधित कॉम्प्लिकेशन्स कम हो जाएंगे. 

8. ‌धूम्रपान को कहें ‘ना’ 


स्मोकिंग से रक्त गाढ़ा हो जाता है, धमनियों में प्लाक जमा होने लगता है. और ज़ा‌हिर है, इससे स्ट्रोक का ख़तरा भी बढ़ता है. यानी बेहतर सेहत के लिए धूम्रपान को अलविदा कहने में ही भलाई है. 


नोट: डॉ अनिल वेंकटाचलम, कन्सल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट, केजे सोमैया हॉस्पिटल, सुपर स्पेशैलिटी सेंटर के इनपुट्स पर आधारित



हस्तमैथुन के सेहत से जुड़े 5 फ़ायदे




हमारे देश में सेक्स को बातचीत के लिए वर्जित विषयों में एक माना जाता है. और इसमें भी हस्तमैथुन को सबसे उपेक्षित पहलू कहा जा सकता है. हाल के दिनों में हमारी फ़िल्मों में सेक्स के इस उपेक्षित पहलू पर काफ़ी बात की गई है. फ़िल्म वीरे दी वेडिंग में स्वरा भास्कर और लस्ट स्टोरीज़ में कियारा आडवाणी के किरदारों के ज़रिए बॉलिवुड ने सेक्शुअल संतुष्टि के इस तरीक़े को चर्चा में ला दिया है. कई लोग इसे सेक्स का न केवल आनंददायक, बल्कि सुरक्षित तरीक़ा भी मानते हैं. आइए जानते हैं हस्तमैथुन करने के ५ सेहतमंद कारण, ताकि आपको किसी भी तरह की गिल्ट न फ़ील हो, जैसा कि अमूमन होता है. 





फ़ायदा नंबर 1: घटता है तनाव 

न्यू यॉर्क की गायनाकोलॉजिस्ट और किताब द कम्प्लीट ए टू ज़ी फ़ॉर योर वी की लेखिका एलेशिया ड्वेक के अनुसार जब आप शारीरिक या मानसिक तनाव का अनुभव कर रहे हों तब हस्तमैथुन करने से तनाव कम होता है. इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि हस्तमैथुन से कई सारे न्यूरोट्रान्स्मीटर्स रिलीज़ होते हैं, जैसे-सेरोटॉनिन, एन्डॉर्फ़िन और ऑक्सिटोसिन. जहां सेरोटॉनिन आपको शांत करता है, वहीं एन्डॉर्फ़िन दर्द कम करने में मददगार है. जबकि ऑक्सिटोसिन को लव हार्मोन कहा जाता है, यह आपको रिलैक्स महसूस कराता है. 





फ़ायदा नंबर 2: बेहतर होता है रक्त संचार

तनाव घटने से आपके दिल की सेहत बेहतर होती है. इसके अलावा डॉ ड्वेक के अनुसार हस्तमैथुन करते समय हमारे जननांगों में रक्त का संचार बढ़ता है. इससे वहां की टिशूज़ सेहतमंद बनते हैं. जननांगों के आसपास रक्त का संचार बढ़ना उन महिलाओं के लिए अच्छा होता है, जो मेनोपॉज़ की उम्र के क़रीब पहुंच रही हैं. दरअस्ल, वे महिलाएं वेजाइनल ड्राइनेस और इंटरकोर्स के दौरान काफ़ी दर्द होने जैसी समस्याओं का सामना कर रही होती हैं. जब उनके जननांगों के पास ब्लड स्प्लाई बढ़ती है तो उन्हें मेनोपॉज़ के इन लक्षणों से काफ़ी हद तक राहत मिलती है. कुछ रिसर्च में यह पाया गया है कि हस्तमैथुन से पीरियड्स के दौरान होनेवाले दर्द में भी कमी आती है. हालांकि अभी इसपर और शोध बाक़ीय है. 





फ़ायदा नंबर 3: पार्टनर के साथ आपका सेक्स संबंध बेहतर होता है 

यदि आप ख़ुद को संतुष्ट करने के इस तरीक़े को अपनाती हैं और इसका सही फ़ायदा लेना जानती हैं तो इसका सकारात्मक व सेहतमंद असर पार्टनर के साथ सेक्स संबंध बनाने के दौरान भी दिखाई देता है. हस्तमैथुन करनेवाली महिलाएं पार्टनर के साथ संबंध बनाने के दौरान तनावमुक्त होकर सेक्स का आनंद उठा सकती हैं, क्योंकि वे उस संबंध में संतुष्टि को लेकर अव्यवहारिक उम्मीद नहीं रखतीं. जब उम्मीदों का बोझ नहीं होता तो वे सेक्स का भरपूर आनंद उठाती हैं. वे जानती हैं कि उन्हें अच्छा महसूस कराने की पूरी ज़िम्मेदारी पार्टनर की नहीं है. उन्हें क्या चाहिए वे ख़ुद भी जानती हैं. इस तरह कह सकते हैं कि हस्तमैथुन आपके सेक्शुअल रिश्तों के लिहाज़ से भी सेहतमंद है. 




फ़ायदा नंबर 4: बढ़ता है आपका सेक्स ड्राइव 

यह पुरानी धारणा है कि जब आप ज़्यादा हस्तमैथुन करती हैं तो पार्टनर के साथ उतनी सेक्शुअली उत्तेजित महसूस नहीं करतीं. जबकि सच्चाई इसके विपरीत है. आप ख़ुद को जितना ज़्यादा संतुष्ट करती हैं, आपका शरीर इसकी मांग उतनी ज़्यादा करता है. आपके शरीर को पता होता है कि सेक्शुअल प्लेशर कैसे महसूस करना है. इतना ही नहीं इस बात की संभावना बढ़ती है कि आप आर्गैज़्म का अनुभव कर सकें. यह सारी बातें इस ओर इशारा कर रही हैं कि हस्तमैथुन का आपकी सेक्स ड्राइव पर सकारात्मक असर पड़ता है. यहां चिंता की बात तब होती है, जब आप संतुष्टि की इस अकेली यात्रा की आदी हो जाएं और पार्टनर की अहमियत को भूल जाएं. वैसे भी यह तो हम सभी जानते हैं कि अति हर चीज़ की वर्जित है.


फ़ायदा नंबर 5: आपको अच्छी नींद आती है

यह तो हम सभी जानते हैं कि ऑर्गैज़्म के बाद कितनी अच्छी नींद आती है. दरअस्ल, सेक्स आपका मानसिक तनाव कम करता है और शरीर को थका देता है, जिससे नींद जल्दी आती है. इससे कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आपने आर्गैज़्म का अनुभव पार्टनर के साथ सेक्स करने के दौरान किया हो या हस्तमैथुन से. आप रिलैक्स्ड महसूस करते हैं, जिससे अच्छी नींद आती है. कई शोधों में कहा गया है कि जिस तरह कुछ लोग किताब पढ़कर अच्छी नींद पाते हैं, हमारे मन पर हस्तमैथुन का भी लगभग वैसा ही असर होता है.

कहीं आपका दिल बीमार तो नहीं?





दिल... यह शब्द सुनने में कितना छोटा-सा है ना, पर इसका फैलाव कितना बड़ा और गहरा! कवियों की अनगिनत कल्पनाओं से लेकर फ़िल्मों के हज़ारों हज़ार गीतों तक इस दिल को जितना समझने की कोशिश की गई, ये उतना ही अबूझ बना रहा, लेकिन आधुनिक विज्ञान हौले-हौले इस अबूझ दिल की गिरहें खोल रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताज़ा आंकड़ों पर अगर नज़र डालें, तो दिल कांप ही उठे... इन आंकड़ों में दिल एक ख़तरा बनकर जो धड़क रहा है. ऐसे में क्या ये ज़रूरी नहीं कि हम कविताओं और गीतों के परे दिल का हाल जानें, समझें और उसे सहेजें?









ख़तरे में हैं भारतीय दिल 

ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित एक रिपोर्ट कहती है कि हृदयरोग ने भारत को जिस बेरहमी से अपने पंजों में जकड़ा है, वह कोई सामान्य बात नहीं है. इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2001 से 2003 के बीच सीएचडी यानी कोरोनरी हार्ट डिज़ीज़ से कुल 17% मौतें हुईं, जिनमें मरने वाले 26% वयस्क थे. वर्ष 2010 से 2013 के बीच यह आंकड़ा बढ़ा और कुल 23% मौतें हुईं, जिनमें मरने वाले 32% वयस्क थे. मेडिकल सुविधाओं के बढ़ने के बावजूद वर्ष 2013 से 2017 के बीच यह दर और तेज़ी से बढ़ी और 15 से 35 साल के लोगों में हृदय रोग का ग्राफ़ तेज़ी से ऊपर आ गया. डॉक्टर्स की मानें तो भारत में हृदय रोग की औसत उम्र 52-59 साल है, लेकिन यह उम्र लगातार घट रही है और हर साल हृदयरोग से होने वाली मौतों का ग्राफ़ बढ़ रहा है. लखनऊ के किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के हृदय-रोग विशेषज्ञ ऋषि सेठी ने पिछले दिनों हृदय रोग पर एक किताब जारी की है. इस किताब के मुताबिक़ दुनिया में हर 1 लाख पर लगभग 235 लोग हृदय रोग की चपेट में हैं, लेकिन भारत में यह आंकड़ा 1 लाख पर 272 का है. इस हिसाब से पूरी दुनिया में सबसे अधिक दिल के मरीज़ भारत में हैं और भारत में होने वाली 25% मृत्यु का कारण अकेला हृदय रोग है. 




क्या यह कोई असामान्य स्थिति है? 

सच पूछा जाए तो नहीं, इन दिनों जीवन पर साइकोलॉजिकल स्ट्रेस इतना ज़्यादा है, जीवनशैली इस क़दर बेतरतीब है और हाइपर टेंशन और डायबिटीज़ जैसे ख़तरे इतने बढ़े हुए हैं कि पहले जो बीमारियां पचास साल के व्यक्ति को अपना शिकार बना रही थीं, वो अब 20-25 साल के युवा को भी घेर रही हैं. एशियन हार्ट इंस्टिट्यूट में कार्डियोलोजी ऐंड रीहैबिलिटेशन के हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट और सीनियर इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ नीलेश गौतम कहते हैं,“हृदयरोग की स्थिति का पहला इशारा हमारी जीवनशैली की ओर होता है. हमें यह देखना चाहिए कि कहीं हम आरामतलब दिनचर्या के शिकार तो नहीं हैं? हमारी खाने की आदतें बिगड़ी हुई तो नहीं है? क्या हमारे भोजन में पोषक आहार की कमी है? कहीं हम एक्सरसाइज़ से परहेज़ तो नहीं करते? कहीं हमें शराब, तंबाकू और धूम्रपान की लत तो नहीं? पर्याप्त नींद ले रहे हैं कि नहीं? कहीं हमने अनियंत्रित तनाव तो नहीं पाल रखा है? कहीं हमारा शुगर लेवल और कोलेस्टेरॉल तो बढ़ा हुआ नहीं है? इन दिनों फ़ाइबर्स रहित फ़ास्ट फ़ूड यानी पिज़्ज़ा, बर्गर, नूडल्स और कोल्ड ड्रिंक खाने का विकल्प बन गए हैं. शारीरिक श्रम कम किया जा रहा है और तनाव ज़्यादा लिया जा रहा है, ऐसे में बीमारियों का बढ़ना अस्वाभाविक नहीं है.” 





कैसा होता एक स्वस्थ दिल? 

स्वस्थ दिल का मतलब है सामान्य रूप से अपनी भूमिका निभाता हुआ दिल. माने जिसकी धड़कन हर मिनट 60 से 80 हो. ब्लड प्रेशर 120/80 एमएमएचजी हो और व्यक्ति सीने में दर्द, सांस रुकने या थकान जैसी तक़लीफ़ें महसूस किए बिना अपने दैनिक काम सामान्य रूप से कर पा रहा हो. डॉ प्रफुल्ल केरकर, कार्डियोलॉजिस्ट, एशियन हार्ट इंस्टिट्यूट मुंबई कहते हैं,“मेडिकल साइंस की भाषा में एक स्वस्थ दिल वो है, जिसकी पम्पिंग इस तरह हो रही हो कि पूरे शरीर में भरपूर मात्रा में ख़ून पहुंच रहा हो, ताकि शरीर के सारे अंग सही ढंग से काम कर सकें. दिल का सही ढंग से पम्प करना बाक़ी अंगों के अलावा दिमाग़ के लिए भी ज़रूरी है. लेकिन अगर चलते हुए, एक्सरसाइज़ करते हुए सांस लेने में दिक़्क़त होती है, वज़न अचानक बढ़ गया है, पैरों व टखनों में सूजन है, आप थकान व कमज़ोरी महसूस कर रहे हैं और दो-तीन तकिया लेकर सोते हैं, तो हो सकता है कि आपको दिल का मर्ज़ लगा हो.” लाइफ़स्टाइल की बिगड़ी हुई चाल ने हमारे दिल का हाल-बेहाल किया हुआ है. 





तेरा दिल कि मेरा दिल

आमतौर पर दिल से जुड़ी बीमारियों को पुरुषों से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन डॉ केरकर कहते हैं,“अब यह बात पुरानी हो चुकी है. मेडिकल फ़ील्ड के मौजूदा तथ्य ये बता रहे हैं कि महिलाएं भी इस गंभीर समस्या से अछूती नहीं हैं. होता ये है कि महिलाएं अपनी सेहत को नज़रअंदाज़ किए रहती हैं. कई बार उन्हें लक्षण महसूस भी होते हैं, लेकिन वे समझ नहीं पातीं, या उन्हें सामान्य तौर पर लेती रहती हैं, जिस वजह से स्थिति बाद में एडवांस लेवल पर पहुंच जाती है. पहले यह माना जाता था कि महिलाओं में हृदय रोग का रिस्क मेनोपॉज़ के बाद प्रकट होता है, लेकिन अब ऐसा नहीं है, क्योंकि फ़ीमेल्स की लाइफ़स्टाइल भी बहुत बदली है और इसीलिए अब उनको हार्ट डिज़ीज़ मेनोपॉज़ से पहले भी परेशान कर रही है. पुरुषों के मुक़ाबले महिलाएं डायबिटीज़ का शिकार अधिक होती हैं. डायबिटीज़ में हार्ट अटैक का अंदेशा ही नहीं होता, उन्हें साइलेंट हार्ट अटैक होता है और बचने की संभावना भी कम होती है. यह सच है कि जो महिलाएं गर्भनिरोधक दवाएं ले रही हैं, धूम्रपान की आदी हैं, बेतरह तनाव में जी रही हैं और एक्सरसाइज़ से आंख चुराती हैं, उनमें हृदय रोग की आशंका 20% बढ़ जाती है.”




हार्ट अटैक बनाम हार्ट फ़ेलियर

अक्सर लोग हार्ट अटैक और हार्ट फ़ेलियर को एक चीज़ समझ लेते हैं, देखा जाए तो दोनों में बहुत मामूली फ़र्क़ है. हार्ट अटैक में दिल को रक्त और ऑक्सिजन नहीं मिल पाता, जिससे दिल की मांसपेशियां क्षतिग्रस्त होने लगती हैं और सीने में अचानक तेज़ दर्द उठता है. जबकि हार्ट फ़ेलियर में दिल की मांसपेशियों के कमज़ोर होने की वजह से ठीक से रक्त पम्प नहीं कर पाता. इस स्थिति में मरीज़ को सांस लेने में दिक़्क़त होने लगती है. पैरों और टखनों पर सूजन आ सकती है. यह स्थिति दिमाग़ी तौर पर भी व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है. हार्ट फ़ेलियर का सबसे चिंताजनक पहलू ये है कि इस स्थिति में रोगी को दिल में कोई दर्द महसूस नहीं होता, यह बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है, जबकि हार्ट अटैक में अचानक दर्द का तेज़ हमला होता है, जिसका इलाज न किया जाए तो रोगी की जान भी जा सकती है. लोगों की सलाह पर या गूगल ज्ञान के आधार पर अपना इलाज ख़ुद न करें. वज़न या सूजन कम करने के लिए सलाह में सुझाई गई दवा न लें. 






दिल की बीमारी से बचा सकता है आहार का ख़्याल

दुनियाभर के स्वास्थ्य विशेषज्ञ उच्च रक्तचाप से बचाव के लिए फलों के सेवन पर ज़्यादा ज़ोर देने लगे हैं. बहुत-सी रिसर्च यह निष्कर्ष दे चुकी हैं कि उच्च रक्तचाप से ग्रस्त मरीज़ फलों और सब्ज़ियों से युक्त कम वसावाला आहार लेकर अपनी बीमारी को कंट्रोल कर सकते हैं. आहार विशेषज्ञों की मानें तो अधिकतर फलों तथा सब्ज़ियों में मौजूद फ़ाइबर रक्त धमनियों में थक्कों के जमाव को कम करता है, जबकि उनमें मौजूद पोटैशियम से ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में मदद मिलती है. फलों तथा सब्ज़ियों में एक और महत्वपूर्ण तत्व पाया जाता है- फ़ोलेट. जो दिल की बीमारियों के कारक होमोसिस्टीन के स्तर को कम करता है. वसा तथा कोलेस्टेरॉल की मात्रा कम होने की वजह से फल और सब्ज़ियां रक्त धमनियों की दीवारों को भी मोटा होने से रोकती हैं. लेकिन आहार के साथ कोई भी प्रयोग आहार विशेषज्ञ की सलाह के बिना न करें, क्योंकि वही तय कर सकते हैं कि आपके लिए कौन-सा आहार उचित या अनुचित है. 







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