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कहीं आपके चिड़चिड़ेपन का कारण हार्मोन्स तो नहीं?


कहीं आपके चिड़चिड़ेपन का कारण हार्मोन्स तो नहीं?

क्या अक्सर आप ख़ुद को ख़राब मूड में, उदास या किसी पर बेवजह चिल्लाता हुआ पाती हैं? हो सकता है कि यह आपके हार्मोन्स की करतूत हो. हम एक्सपर्ट्स से बात करके हार्मोनल असंतुलन के कारण पता कर रहे हैं और जानने की कोशिश कर रही हैं कि कैसे आप इन महत्वपूर्ण रासायनिक संदेशवाहकों को नियंत्रण से बाहर होने से रोक सकती हैं. 

मीठे की चाह
यदि मीठा आपकी कमज़ोरी है तो आपको एक पूरी चॉकलेट बार खाने का परिणाम पता होगा. ‘‘ये चॉकलेट का कोको नहीं है, जो हार्मोन्स को छेड़ता है, बल्कि अतिरिक्त शक्कर और दूध इसके लिए दोषी हैं,’’ बताती हैं डॉ साधना सिंघल, ऑब्स्टेट्रिशियन और गायनाकोलॉजिस्ट, श्री बालाजी ऐक्शन मेडिकल इंस्टिट्यूट, दिल्ली. ‘‘शक्कर की अधिकता वज़न को बढ़ाती है, जो शरीर को इंसुलिन के प्रति बाधक बना सकता है. इंसुलिन वह हार्मोन्स है जो रक्तप्रवाह में शक्कर को प्रवाहित करता है और कोशिकाओं को क्रियाशील बनाता है.’’
इसका उपचार: संतुलित आहार का सेवन करें, जिसमें मल्टीविटामिन्स, मिनरल कॉम्पलेक्स (सोया, अंडे, पत्तेदार सब्ज़ियां) और ओमेगा-3 फ़ैटी एसिड्स (अलसी, साल्मन) के नैसर्गिक स्रोत शामिल हों. जब भी आपको मीठा खाने की ललक हो तो खाएं, लेकिन ध्यान रखें कि आप उसके साथ कुछ मात्रा में प्रोटीन भी ज़रूर लें. ‘‘चूंकि प्रोटीन सभी पौष्टिक पदार्थों में सबसे अधिक तृप्ति देनेवाला होता है, प्रोटीन के स्रोतों को शामिल करके आप कार्बोहाइड्रेट्स कम खाएंगी,’’ बताती हैं हैदराबाद की गायनाकोलॉजिस्ट डॉ मोना मेहरा. यह आपके ब्लड शुगर स्तर को नियंत्रित करेगा, इंसुलिन की प्रतिरोधकता को कम करेगा और हार्मोन्स पर नियंत्रण बनाए रखने में मदद करेगा.’’

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क्रैश डायट
भूखे रहने और क्रैश डायट्स से एस्ट्रोजन का स्तर काफ़ी नीचे आ जाता है. ‘‘क्रैश डायट के दौरान हमारा शरीर संचयित ऊर्जा का प्रयोग करने लगता है, चयापचय की दर में कमी आती है और हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं,’’ चेतावनी देती हैं डॉ सिंघल.
इसका उपचार: संतुलित डायट ही इसकी कुंजी है. वज़न कम करने के अपने लक्ष्य को वास्तविक रखें, जैसे-एक सप्ताह में एक किलो. उचित डायट और व्यायाम का नियमित रूप से पालन करें. ‘‘हमारे खानपान की आदतों और वज़न का हार्मोन्स के साथ गहरा संबंध है. हार्मोन्स हमारे शरीर की संपूर्ण वृद्घि और विकास, हड्डियों की वृद्घि, प्रौढ़ता, प्रजनन क्षमता, सतर्कता के स्तर, शक्कर पर नियंत्रण और भोजन की इच्छा को प्रभावित करते हैं,’’ बताती हैं डॉ मेहरा.

रेडीमेड खाने की इच्छा
वो झटपट सूप, सिरियल्स (अनाज), टिन के डिब्बों की सब्ज़ियां, सॉसेज और मसालेदार गोश्त हो सकता है कि सुविधाजनक और सेहतमंद लगें, लेकिन कई बार प्रोसेस्ड फ़ूड्स में एक्सिटोटॉक्सिन्स या न्यूरोटॉक्सिकेंट्स मौजूद होते हैं. ये केमिकल्स नर्व सेल्स को नुक़सान पहुंचाते हैं. ‘‘ये केमिकल संभवत: एमएसजी, हाइड्रोलाइज़्ड वेजेटेबल प्रोटीन और एस्पैरटेट के रूप में हो सकते हैं,’’ चेतावनी देती हैं डॉ मेहरा. ‘‘इनकी वजह से हमारे शरीर में अतिरिक्त फ़ैट पैदा व जमा हो सकता है, जो महिलाओं में टेस्टोस्टरॉन के उत्पादन को घटाता है,’’ बताती हैं डॉ सिंघल. टेस्टोस्टरॉन मांसपेशियों और हड्डियों के वज़न की देखरेख करने में सहायता करता है और सेक्स की इच्छा को बढ़ाता है. जब ख़ून में टेस्टोस्टरॉन का स्तर बढ़ता है तो हड्डियों का घनत्व भी बेहतर होता है.
इसका उपचार: अपने क़रीबी मार्केट जाकर ताज़ा मांस और सब्ज़ियां ख़रीदें. ताज़ी हवा भी आपके लिए लाभकारी होगी. 
मनमर्ज़ी गोलियों का सेवन
कई लोग ख़ुद ही दवा खाने की बड़ी ग़लती करते हैं. ‘‘मल्टीविटामिन्स तथा डायट सप्लिमेंट्स और डायबिटीज़, हाइपरटेंशन और डिप्रेशन की दवाइयां किसी भी महिला के हार्मोनल स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं, क्योंकि इसमें एंडोक्राइन में गड़बड़ी पैदा करनेवाले कुछ केमिकल होते हैं,’’ कहती हैं डॉ सिंघल.
इसका उपचार: पौष्टिकता की कमी को फ़ाइबर्स और फ़ाइटोन्यट्रिएंट्स निहित डायट पर ध्यान केंद्रित कर नैसर्गिक रूप से ही पूरा करना चाहिए. नियमित एक्सरसाइज़ तनाव को कम करने में सहायता करता है. यदि इससे कोई फ़ायदा न हो तो डॉक्टर से सलाह लें, जो आपके लिए सही दवा और उसकी सही मात्रा निर्धारित करेंगे. 

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उनींदी रातें
महिलाओं में कभी-कभार इन्सोम्निया की समस्या होना सामान्य बात है, लेकिन जब तनाव का स्तर बढ़ जाता है तो यह समस्या तीव्र हो जाती है. ‘‘इन्सोम्निया में, हार्मोन्स को अपनी दुरुस्ती और पुनर्निर्माण के लिए समय नहीं मिल पाता और अंतत: इससे अनियमित मेन्स्ट्रुएशन और समय से पूर्व मेनोपॉज़ हो सकता है. ऐसी किसी भी स्थिति से बचने के लिए आपको शरीर को एक नियमित समय पर सोने की आदत डालनी चाहिए,’’ बताती हैं डॉ सिंघल.
इसका उपचार: यदि आप रात में ख़ुद को बिस्तर पर करवटें बदलते हुए पाती हैं तो उठकर कुछ मिनटों के लिए चलें या मेडिटेट करें. ‘‘ओवरीज़ एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रॉन का निर्माण करती हैं, जो नींद को प्रोत्साहित करनेवाले हार्मोंस हैं. मेन्स्ट्रुएशन के समय हार्मोंस के अनुपात में बदलाव बेचैन कर नींद से वंचित रख सकता है. साथ ही एस्ट्रोजन के घटते स्तर से आप प्राकृतिक और अन्य तनाव कारकों के प्रति अतिसंवेदनशील हो सकती हैं,’’ कहती हैं डॉ मेहरा. एक्सरसाइज़, मेडिटेशन, योग और गहरी सांसें लेना और ऑफ़िस में डेस्क पर की जानेवाली एक्सरसाइज़ेस हार्मोंस का ख़्याल रख सकती हैं. 

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ग़लत गर्भ निरोधक दवाइयां
‘‘हालांकि ज़्यादातर गर्भ निरोधक दवाइयां सुरक्षित मानी जाती हैं, पर कुछ दवाइयों में कृत्रिम हार्मोंस होते हैं, जिससे थाइरॉइड और सेक्स हार्मोंस को रोकनेवाले ग्लोब्यूलिन की वृद्घि का ख़तरा बढ़ जाता है और उपलब्ध टेस्टास्टरोन और थाइरॉइड हार्मोन्स को प्रभावी रूप से घट जाते हैं,’’ बताती हैं डॉ सिंघल. ‘‘ज़्यादातर प्रजनन को नियंत्रित करनेवाली गोलियां एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रॉन के यौगिकों के संयोग से बनाई जाती हैं,’’ बताती हैं डॉ मेहरा. ‘‘ये आपके शरीर के हार्मोन्स की तर्ज पर काम करते हैं, मुख्य रूप से जटिल हार्मोनल प्रजनन प्रणाली के भीतर सरवाइकल म्यूकस को मोटा कर और यूटरस की परत को पतला कर ओवरीज़ से अंडे निकलने से रोकते हैं. निरोधक दवाइयों का अत्यधिक सेवन विटमिन्स, मिनरल्स और ऐंटीऑक्सीडेंट्स के स्तर को कम कर तनाव को बढ़ाता है.’’ 
इसका उपचार: विभिन्न गर्भ निरोधक गोलियों में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रॉन का स्तर अलग-अलग होता है. अपने शरीर के अनुसार सही गोली चुनने के लिए अपने गायनाकोलॉजिस्ट से बात करें. 

ज़हरीले मेकअप
यदि आपको अपने कॉस्मेटिक्स से प्यार है तो उसमें समाहित सामग्रियों की सूची पढ़ें. ऐसे प्रॉडक्ट न ख़रीदें, जिनमें पैराबिन्स और पैलेट्स (ऐंटीफ़ंगल एजेंट) हों. ‘‘जब ये रसायन आपकी त्वचा के संपर्क में आते हैं, तब ये थाइरॉइड के कुछ हार्मोंस को घटा देते हैं. कॉस्मेटिक्स, जो आप इस्तेमाल कर रही हों, वो मिथाइलपैराबिन्स, प्रोपाइल पैराबिन्स, प्रोपेलिन ग्लाइकोल, पैराफ़िन, पैलेट्स, आइसोप्रोपाइल अल्कोहल और सोडियम लॉरिल सल्फ़ेट जैसे केमिकल्स से मुक्त हों,’’ सलाह देती हैं डॉ सिंघल. ‘‘पैलेट्स एस्ट्रोजन की तरह काम नहीं करते, लेकिन वे बाक़ी हार्मोंस जो एस्ट्रोजन के संपर्क में आते हैं, के संतुलन को बिगाड़ सकते हैं, टेस्टोस्टरॉन के भी. जबकि पैराबिन्स त्वचा के भीतर प्रवेश कर शरीर में बेहद कमज़ोर एस्ट्रोजन की तरह व्यवहार कर सकते हैं-जो ब्रेस्ट कैंसर के लिए ज़िम्मेदार ग्रोथ हार्मोंस को सक्रिय कर सकते हैं,’’ बताती हैं डॉ मेहरा.
इसका उपचार: आप जिन भी मेकअप प्रॉडक्ट्स का प्रयोग करती हैं, उनका चुनाव सावधानीपूर्वक करें. ज़्यादातर मेकअप, स्किन-केयर और हेयर-केयर ब्रैंड्स ने ऐसे तत्वों से छुटकारा पा लिया है. फिर भी, ऑर्गैनिक प्रॉडक्ट्स अपनाना बेहतर होगा. 

खाने के बाद की जलन
डायट में अल्कलाइन/एसिड की मात्रा न केवल शरीर के पीएच स्तर को प्रभावित कर सकती है, बल्कि आपके हार्मोन्स को भी अस्वस्थ कर सकती है. ‘‘जब शरीर बहुत एसिडिक हो जाता है, तब ये हमारे मुख्य अंगों और हड्डियों से पोटैशियम, सोडियम, मैग्नेशियम और कैल्शियम जैसे मिनरल्स को निथारने लगता है और एसिड से लड़ने के लिए इसका इस्तेमाल करता है. यदि यह क्षति जारी रहती है तो हार्मोनल असंतुलन का ख़तरा बढ़ जाता है,’’ बताती हैं डॉ सिंघल.
इसका उपचार: शरीर के अल्कलाइन स्तर को बढ़ाएं-दिन में दो बार ताज़ा नींबू के साथ पानी पिएं, सोया और लीमा बीन्स खाएं और मसालेदार सब्ज़ियों और ब्रेड से दूर रहें.


कैफ़िन का ओवर लोड
इसमें कोई छुपी बात नहीं है कि कैफ़ीन हमें तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है, लेकिन इस पर निर्भर रहना आपके हार्मोंस के लिए अच्छी ख़बर नहीं है. ‘‘कॉफ़ी एस्ट्रोजन के स्तर को बदलकर, हार्मोंस से जुड़ी कुछ बीमारियों की संभावनाओं को बढ़ाता है,’’ कहना है डॉ मेहरा का. ‘‘कैफ़ीन शरीर को कोर्टिसोल के उत्पादन को बढ़ाने का संदेश देता है, जो आपकी बेचैनी को बढ़ा देता है.’’
इसका उपचार: अपने कॉफ़ी या चाय के सेवन को दिन में दो कप तक सीमित करें और इस बात का ध्यान रखें कि दूसरा कप शाम ५ बजे के बाद न पिएं.

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निकोटिन पर लगाम
‘‘जो लोग धूम्रपान करते हैं, उनमें बांझपन, अनियमित मेंस्ट्रुअल साइकल और समय से पूर्व मेनोपॉज़ का ख़तरा बढ़ जाता है. धूम्रपान कॉर्टिसोल, एंड्रोजेन्स, एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रॉन जैसे हार्मोन्स को परिवर्तित कर, हार्मोनल संतुलन में गड़बड़ी पैदा करता है और थाइरॉइड, पिट्यूटरी, एड्रेनल्स और ओवरीज़ जैसे एंड्रोक्राइन ग्लैंड्स पर प्रभाव डालता है,’’ कहती हैं डॉ मेहरा.
इसका उपचार: अभी, इसी समय सिगरेट को अलविदा कह दें.

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