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त्रिदोष - ज्ञान


त्रिदोष - ज्ञान ( TRIDOSHA ) जैसा कि आपने अभी ऊपर पहा कि वात , पित्त और कफ इन तीनों को हो । कहते हैं तथा " धात " भी कहते हैं । धातु व मल यह उपरोक्त तीनों से दूषित होते । है इसलिए इनको दोष कहते हैं और यह देह को धारण करते हैं , इसलिए इनको धातु कहते हैं ।*

*( वात / वायु )*
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*समस्त दोषों में वात ( वायु ) ही प्रधान है । बिना वायु के संसार का कोई भी प्राणी क्षण - भर भी जीवित नहीं रह सकता । देहधारियों के लिए बाहरी व भीतरी दोनों वायुओं की आवश्यकता होती है । बाहरी वायु प्राणियों को जीवित और चैतन्य रखती है और भीतरी वायु शरीर के भीतर काम करती है । " वायु " अन्य दोषों तथा रस , रक्त , माँस , मेद आदि धातुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने वाली , शीघ्रगामी , रजोगुण युक्त , सूक्ष्म , हल्की , रूखी व चंचल है । श्वास का लेना व श्वास का छोड़ना इसी से होता है । यह धातुओं और इन्द्रियों की चतुराई पूर्वक रक्षा करती है तथा हृदय , इन्द्रियों व चित्त को धारण करती है । यह शीतल , नर्म और योगवाही है । ( अर्थात् जिसके साथ मिलती है , उसी के सदृश गुण प्रकाशित करती है । जैसे सूरज के साथ मिलती है , तो गर्मी करती है । चन्द्रमा के साथ मिलती है , तो शीतलता करती है । पित्त के साथ मिलकर पित्त - जैसे कार्य करती है और कफ के साथ । मिलकर कफ जैसे कार्य करती है । ) वायु कहीं रस को , कहीं रक्त को , कहीं वीर्य को और कहीं भोजन को पहुँचाती है । यह शरीर में सफाई करती है तथा मल - मूत्र को निकालकर बाहर फेंकती है । इस प्रकार इसके अनेक कार्य हैं । विशेष — जितने दोष व धातुएँ हैं , वे सब लूले - लँगड़े हैं । वायु उन्हें जहाँ ले जाती है , वे वहीं चले जाते हैं । जिस प्रकार वायु ( AIR ) बादलों को इधर - से - उधर व उधर - से - इधर ले जाती है और लाती है , उसी प्रकार शरीर के भीतर भी वायु यही काम करती है । इस सम्बन्ध में शास्त्र में लिखा है कि पित्त पंगु कफः पंगु पंगवो मलधातवः । | वायुना यत्र नीयन्ते तत्र गछन्ति मेघवत् ॥ अर्थात् - पित्त लँगड़ा है , कफ लँगड़ा है तथा सब मल व धातु लँगड़े हैं । वायु उन्हें जहाँ ले जाती है , वहीं ये मेघ ( बादलों ) की भाँति चले जाते हैं*
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*वायु के प्रकार व रहने के स्थान । ( 1 ) उदान वायु - ये कण्ठ में रहती है । ( 2 ) प्राण वायु – ये हृदय में निवास करती है । ( 3 ) समान वायु - कोठे की अग्नि के नीचे , नाभि में रहती है । ( 4 ) अपान वायु – मलाशय में रहती है । ( 5 ) व्यान वायु – ये समस्त शरीर में व्याप्त रहती है ।*
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*वायु के कार्य ( 1 ) उदान वायु – यह वायु गले में घूमती है । इसी की शक्ति से मनुष्य बोलता वे गीत आदि गाता है । इस वायु के कुपित होने से कण्ठ के रोग उत्पन्न होते हैं । ( 2 ) प्राण वायु – यह वायु प्राणों को धारण करती है तथा सदैव मुख में चलती ह । यह वायु भोजन के अन्न को भीतर प्रवेश कराती है तथा प्राणों की रक्षा करती है । इस वायु के कुपित होने से हिक्का ( हिचकी ) और श्वास ( दमा ) आदि रोग उत्पन्न होते हैं । ( ३ ) समान वायु – यह वायु आमाशय व पक्वाशय में विचरण करती है एवं जठराग्नि से मिलकर अन्न को पचाती है और अन्न से उत्पन्न हुए मल - मूत्र आदि का पृथक् - पृथक् करती है । इस वायु के कुपित होने से मन्दाग्नि , अतिसार व वायुगौला ( हिस्टीरिया ) आदि रोग उत्पन्न होते हैं । ( 4 ) अपान वायु - यह वायु पक्वाशय में रहती है और मल , मूत्र , शुक्र ( वीर्य ) , गर्भ व आर्तव ( मासिक स्राव या रजः ) को निकालकर बाहर फेंकती है । इस वायु के कुपित होने से मूत्राशय व गुदा के रोग उत्पन्न होते हैं तथा शुक्रदोष , प्रमेह और व्यान वायु और अपान वायु के कोप से उत्पन्न होने वाले रोगों को उत्पन्न करती है । ( 5 ) व्यान वायु – यह वायु प्राणी / मनुष्य के सारे शरीर में विचरण करती है । यह वायु रस , स्वेद / पसीना और रक्त को बहाती है । चलना - फिरना , ऊपर को फेंकना , नीचे डालना , आँखें बन्द करना व आँखें खोलनाये क्रियायें इसी वायु के अधीन हैं । इस वायु के कुपित होने से समस्त शरीर के रोग उत्पन्न होते हैं । नोट - उपरोक्त पाँचों प्रकार की वायु - जब एक साथ कुपित हो जाती है तब नि : सन्देह शरीर का नाश कर देती है , अर्थात् मनुष्य की मृत्यु हो जाती है*

*वायु कोप के कारण “ चरक संहिता के अनुसार - रूखे , हल्के व शीतल पदार्थों के सेवन , अधिक परिश्रम , अधिक वमन होना , अधिक जुलाब लेना , आस्थापन का अतियोग , मल - मूत्र , जंभाई आदि शारीरिक वेगों को रोकना , व्रत - उपवास , चोट लगना , अति स्त्री सम्भोग करना , घबराहट , चिन्ता / फिक्र ( टेन्शन ) की अधिकता , खून का निकलना , रात्रि जागरण तथा शरीर को बेकायदे टेढ़ा - तिरछा करना ये सभी वायु कोप के कारण हैं । “ हरित संहिता के अनुसार - कसैले व शीतल पदार्थों का सेवन , अधिक खाना , अधिक चलना , अधिक बोलना , अधिक भय / डर करना , रूखी , कडवी व चटपटी चीजों का अत्यधिक सेवन , ऊँट , घोडा , हाथी , रथ पालकी ( आजकल के समय में साइकिल , मोटर साइकिल , बस , टैक्सी ,कार, रेलगाड़ी ) आदि की अधिक सवारी करना सर्दी के दिनों में , बादलों से घिरे दिनों में , दोपहर बाद ( सूरज ढलना आरम्भ हो जाने के बाद ) स्नान करना , मसूर , मटर , मठ , जौ , ज्वार , मोटे चावल , शीतल अन्न , बथुआ , प्याज , गाजर आदि अन्न व शाकों का अधिकता से खाना वायु कुपित होने के कारण है । इनकी अधिकता से ( विशेषकर वात ' प्रकृति के लोगों को ) बचना आवश्यक है । रूखे , कड़वे , कसैले , चटपटे खाद्य पदाथ , बासी भोजन , ठंडा भात , व्रत - उपवास , अधिक स्त्री सहवास , अधिक तैरना ( तैराकी ) से बचना ही श्रेयस्कर है । वर्षा ऋतु में या किसी भी क्रतु में जब बादल छा रहे हों , तो चाय का कोप होता । है ; क्योंकि यह वायु कोप का समय है । अतः ऐसे वक्त में कम नहाना , गर्म साना । और गर्म कपड़े पहनना श्रेयस्कर है*
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*वायु कोप के लक्षण - वायु कुपित होने पर “ चरक संहिता के अनुसार नीचे लिखे लक्षण होते हैं - अंग - भेद , अनिवार्य तृषा , मर्दन सदृश पीडा , कप , सुई चुभोने सदृश पीड़ा , रस्सी से बाँधने सदृश पीड़ा , मल की कठोरता , शरीर की रंगत लाल हो जाना , मुख का स्वाद कसैला होना , साँस न आना , शरीर सखना , शल , शरीर का सो जाना , शरीर का सिकुड़ना , शरीर का रह जाना इत्यादि । मामूली रूप से इन लक्षणों को इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि वायु का कोप होने से शरीर में थकान - सी अनुभव होने लगती है , मल - मूत्र कम होते हैं , आँखों में नशा सा अनुभव होता है , अनिद्रा ( नींद न आना ) हो जाती है , पेट फूल जाता है , जोड़ों / सन्धियों में दर्द होता है , पीठ का बासा ( मेरुदण्ड ) दुखने लगता है । सिर , छाती और कनपटियों में दर्द होता है*
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*वायु को शान्त करने के उपाय - कुपित वायु की मीठे , खट्टे , खारे , चिकने और गर्म द्रव्यों द्वारा चिकित्सा किये जाने का विधान है । रोगी को पसीना दिलाना , तेल की मालिश करना तथा जिस स्थान पर हवा कम आती हो , ऐसे स्थान में रोगी को सुलाना , भारी भोजन कराना , गोतामार के नहलाना , सिर में तेल लगाना गुनगुना जल , गेहू , मूग , घी , नया उदड़ , लहसुन , मुनक्का , मीठा अनार , डाल के पके आम , आँवले . कैथ , स्वस्थ देशी ( विशेषकर काली ) गाय का छना हुआ मूत्र , हरड , पका ताड़फल , मिश्री , गाय का दूध और सेंधा नमक भाई राजीव दीक्षित जी के अनुसार जीवन भर वात की चिकित्सा न करनी पड़े तो शुद्ध तेल कच्ची घाणी का सेवन करें व रिफाइंड व वनस्पति तेल से जितना नफरत कर सकते हैं जरूर करें , दालचिनी,मेथी,गौमुत्र,चुना इत्यादि वायु कोप को शान्त करते हैं*
*वायु क्षय / ह्रास ( कमी ) के लक्षण - “ सश्रुत संहिता " के मतानुसार - मन्द चेष्टा , शरीर में शिथिलता , उदासी , कम बोलना , प्रसन्नता की कमी , स्मरण की शक्तिहीनता आदि । “ चरक संहिता " ( सूत्र स्थानानुसार ) - वायु के क्षीण होने से कुपित पित्त यदि कफ की चाल रोक दें तो तन्द्रा , भारीपन और ज्वर होता है । वायु के क्षीण होने पर - प्रलाप , भारीपन , तन्द्रा , निद्रा , थुक में कफ व पित्त का आना तथा नाखून गिरना - ये लक्षण होते हैं । शास्त्र में ऐसा भी लिखा है । वायु वृद्धि के लक्षण – जिस प्रकार वायु की कमी होती है , उसी प्रकार वायु की वृद्धि भी होती है । चमड़े ( Skin ) की कठोरता , दुबलापन शरीर का फड़कना , गर्मी की इच्छा , नींद का आना , निर्बलता , मल का सूख जाना तथा मल का कम होना - ये वायु वृद्धि होने के लक्षण हैं*

*वायु का समय - वृद्धावस्था में वायु का जोर होता है । इसीलिए इस अवस्था में प्रायः वायु का कोप होता है , किन्तु जो इस अवस्था में सचेत / सावधान रहते हैं और वायु कोपहारी आहार - विहारों से बचते हैं / परहेज रखते हैं तथा वायू शमन करने वाले आहार - विहारों का सेवन करते हैं , वे सदैव स्वस्थ और सुखी रहते हैं । दिन व रात्रि का अन्त ( अर्थात् दिन व रात के 2 बजे के बाद का समय ) “ वायु का समय होता है । इसी प्रकार भोजन पच चुकने के बाद भी वायु का समय होता है । बरसात - वायु कोप का मुख्य समय है । हेमन्त व शिशिर ऋतु में भी वायु का कोप होता है और साथ ही समस्त शरीर में रूखापन भी होता है । । “ हरित संहिता के अनुसार - कार्तिक , अगहन , माघ , आषाढ़ और हेमन्त ऋतु में तथा छहों ऋतुओं की सन्धियों ( नोट - एक ऋतु का अन्त और दूसरों का आरम्भ होने को " ऋतुसन्धि ' कहते हैं । ) के समय वाय साविष अर्थात जहरीली होती है।*

*वात प्रकृति वाले व्यकित के लक्षण

1. शारीरिक गठन - वात प्रकृति का शरीर प्राय: रूखा, फटा-कटा सा दुबला-पतला होता है, इन्हें सर्दी सहन नहीं होती।

2. वर्ण - अधिकतर काला रंग वाला होता है ।

3. त्वचा - त्वचा रूखी एवं ठण्डी होती है फटती बहुत है पैरों की बिवाइयां फटती हैं हथेलियाँ और होठ फटते हैं, उनमें चीरे आते हैं अंग सख्त व शरीर पर उभरी हुर्इ बहुत सी नसें होती हैं ।

4. केश - बाल रूखे, कड़े, छोटे और कम होना तथा दाढ़ी-मूंछ का रूखा और खुरदरा होना ।

5. नाखून - अंगुलियों के नाखूनों का रूखा और खुरदरा होना ।

6. आंखें - नेत्रों का रंग मैला ।

7. जीभ - मैली

8. आवाज - कर्कश व भारी, गंभीरता रहित स्वर, अधिक बोलता है ।

9. मुंह - मुंह सूखता है ।

10. स्वाद - मुंह का स्वाद फीका या खराब मालूम होना ।

11. भूख - भूख कभी ज्यादा कभी कम, पाचन क्रिया कभी ठीक रहती है तो कभी कब्ज हो जाती है, विषम अग्नि, वायु बहुत बनती है ।

12. प्यास - कभी कम, कभी ज्यादा ।

13. मल - रूखा, झाग मिला, टूटा हुआ, कम व सख्त, कब्ज की प्रवृत्ति ।

14. मूत्र - मूत्र का पतला जल के समान होना या गंदला होना, मूत्र में रूकावट की शिकायत होना ।
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15. पसीना - कम व बिना गन्ध वाला पसीना ।

16. नींद - नींद कम आना, ज्यादा जम्हाइयां आना, सोते समय दांत किटकिटाने वाला ।

17. स्वप्न - आकाश में उड़ने के सपने देखना ।

18. चाल - तेज चलने वाला होता है ।

19. पसन्द - नापसन्द - सर्दी बुरी लगती है, शीतल वस्तुयें अप्रिय लगती हैं, गर्म वस्तुओं की इच्छा अधिक होती है मीठे, खटटे, नमकीन पदार्थ विशेष प्रिय लगते हैं ।

20. नाड़ी की गति - टेढ़ी-मेढ़ी (सांप की चाल के समान) चाल वाली प्रतीत होती है, तेज और अनियमित नाड़ी

*कफ को संतुलित रखने हेतु :- गुड़ ,शहद,गौमूत्र,त्रिफला
वात को संतुलित रखने हेतु :- शुद्ध तेल , गौमूत्र, त्रिफला
पित को संतुलित रखने हेतु :- देशी गाय का घी , गौमूत्र ,त्रिफला

अमर शहीद राष्ट्रगुरु, आयुर्वेदज्ञाता, होमियोपैथी ज्ञाता स्वर्गीय भाई राजीव दीक्षित जी के सपनो (स्वस्थ व समृद्ध भारत) को पूरा करने हेतु अपना समय दान दें
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