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महिलाओं के लिए भी डायबिटीज़ उतना ही ख़तरनाक है,

महिलाओं के लिए भी डायबिटीज़ उतना ही ख़तरनाक है, जितना पुरुषों के लिए

डायबिटीज़ एक ऐसी बीमारी है, जो हमारे ख़ून में शुगर अर्थात शर्करा के संतुलन और रेग्युलेशन को डिस्टर्ब कर देती है. इस समय दुनिया की क़रीब 246 मिलियन आबादी यानी 24 करोड़ 60 लाख लोग इस बीमारी से पीड़ित है. मोटे तौर पर एक लाइफ़स्टाइल डिज़ीज़ कहे जानेवाले डायबिटीज़ के महिलाओं और पुरुषों में होने की संभावना लगभग समान है. इस आधार पर कह सकते हैं कि दुनिया की लगभग 12 करोड़ 30 लाख महिलाएं डायबिटीज़ का शिकार हो चुकी हैं. लाइफ़स्टाइल चेंजेस के साथ डायबिटीज़ के मरीज़ों की संख्या में बढ़ोतरी ही देखने मिलनेवाली है. एक अनुमान के मुताबिक़ वर्ष 2025 तक इससे पीड़ित लोगों की संख्या 38 करोड़ तक पहुंच जाएगी. इसकी सबसे बुरी बात यह है कि इसका कोई स्थाई उपचार उपलब्ध नहीं है. इससे निपटने का केवल एक ही तरीक़ा है, वह है ब्लड शुगर पर नियंत्रण. 
ख़ैर हम आज बात करेंगे डायबिटीज़ का महिलाओं पर होनेवाले प्रभावों का. यह देखा गया है कि यह बीमारी महिलाओं की ज़िंदगी को थोड़ी और मुश्क़िल बना देती है. डायबिटिक महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. यह बीमारी महिला और उसके अजन्मे बच्चे तक को प्रभावित कर सकती है. प्रेग्नेंसी में जटिलता तो आती ही है, साथ ही गर्भपात या बच्चे में पैदाइशी विकार होने की संभावना भी अधिक होती है. जिन महिलाओं को डायबिटीज़ होता है, उन्हें उन महिलाओं की तुलना में कम उम्र में हार्ट अटैक की संभावना अधिक होती, जिन्हें डायबिटीज़ नहीं होता.
डॉ निखिल नासिकर, कंसल्टेंट डायबिटोलॉजिस्ट, केजे सोमैया हॉस्पिटल, सुपर स्पेशैलिटी सेंटर, महिलाओं में डायबिटीज़ के चलते होनेवाले कॉ‌म्प्लिकेशन्स के बारे में बता रहे हैं, ख़ासकर प्र‍ेग्नेंसी और मेनोपॉज़ के दौरान होनेवाले ख़तरों के बारे में. 
‍‍प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं को हो सकता है टेम्प्र‍ेरी डायबिटीज़

जिन महिलाओं को डायबिटीज़ नहीं भी है, उन्हें प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज़ होने की संभावना होती है. हालांकि कुछ महिलाओं में प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज़ होना टेम्प्रेरी है, लेकिन आगे चलकर ऐसी महिलाओं के टाइप 2 डायबिटीज़ होने की संभावना बढ़ जाती है. प्रेग्नेंसी के दौरान होनेवाने डायबिटीज़ में आमतौर पर किसी तरह के बाहरी लक्षण दिखाई नहीं देते. इसलिए महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज़ की जांच ज़रूर करानी चाहिए. प्रेग्नेंसी के दौरान होनेवाले डायबिटीज़ के चांसेस इन महिलाओं में अधिक होते हैं.

-जो प्रेग्नेंट होने से पहले ओवरवेट होती हैं. 

-यदि महिला प्रीडायबिटिक है, यानी उसका शुगर लेवल अधिक रहता है, पर डायबिटीज़ जितना नहीं. 

-परिवार में डायबिटीज़ का इतिहास हो. 

ऐसी महिलाओं को पूरी तरह नाउम्मीद नहीं होना चाहिए, क्योंकि ऐसे कंडिशन में भी हेल्दी प्रेग्नेंसी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. बेशक इसके लिए ख़ास ध्यान देना होगा. 

मेनोपॉज़ और डायबिटीज़ के घातक कॉम्बिनेशन से रहें सतर्क 

मेनोपॉज़ अर्थात रजोनिवृत्ति के दौरान महिलाओं के शरीर में काफ़ी बदलाव आते हैं. आमतौर पर महिलाओं को मेनोपॉज़ के दौरान डायबिटीज़ होने की संभावना युवा महिलाओं की तुलना में बढ़ जाती है. वहीं यदि महिला पहले से ही डायबिटिक है तो मेनोपॉज़ के बाद समस्या बढ़ सकती है. शरीर में आनेवाले हार्मोनल बदलाव इंसुलिन के प्रोडक्शन को प्रभावित करते हैं. मेनोपॉज़ के दौरान महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन का स्तर कम हो जाता है, ओवरी अंडे बनाना बंद कर देती है. यदि महिला को पहले से ही डायबिटीज़ है तो काफ़ी हद तक संभव है कि उसे वेजाइनल इन्फ़ेक्शन्स परेशान करें.

इसके अलावा मेनोपॉज़ के कारण वज़न बढ़ने की समस्या और अधिक परेशान करती है. यदि महिला को पहले से ही डायबिटीज़ हो तो उसे इंसुलिन के डोज़ में बदलाव लाना पड़ता है या शरीर में आ रहे बदलावों से सामन्जस्य बिठाते हुए डायबिटीज़ कंट्रोल में रखने के लिए ओरल मेडिकेशन भी शुरू करना पड़ सकता है. 

डायबिटीज़ से बढ़ जाती है इन दूसरी समस्याओं की संभावना 

‌डायबिटीज़ से पीड़ित महिलाओं को हृदय रोग होने की संभावना डायबिटीज़ पी‌ड़ित पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक होती है. यदि महिला डायबिटीज़ के साथ-साथ मोटापे की समस्या से भी जूझ रही हो तो मामला और गंभीर हो जाता है.

आपने यह कई जगह पढ़ा होगा कि डायबिटीज़ का पुरुषों की सेक्शुऐलिटी पर प्रतिकूल असर पड़ता है. ज़्यादातर रिसर्च में महिलाओं की सेक्स लाइफ़ पर इस बीमारी के बारे में नहीं बताया जाता. पर जिस तरह पुरुषों की सेक्शुऐलिटी पर डायबिटीज़ का नकारात्मक असर पड़ता है, उसी तरह महिलाओं को भी डायबिटीज़ प्रभावित करता है. वेजाइना में लूब्रिकेशन की कमी के चलते इंटरकोर्स के समय डायबिटिक महिलाओं को तक़लीफ़ होती है. हालांकि अभी तक डायबिटीज़ के चलते महिलाओं को किन सेक्शुअल समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उसका व्यापक अध्ययन नहीं किया गया है. लेकिन नर्व डैमेज, वेजाइना के आसपास स्लो ब्लड फ़्लो, हार्मोनल चेंजेस, मूड स्विंग आदि का महिलाओं की सेक्स ड्राइव पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. 



इन लक्षणों से पहचानें, डायबिटीज़ की आहट 
हममें से ज़्यादातर लोगों को डायबिटीज़ होने की बात काफ़ी समय बाद पता चलती है. इन लक्षणों पर ग़ौर करके आप यह पता कर सकते हैं कि कहीं आपको डायबिटीज़ तो नहीं... ये लक्षण महिलाओं और पुरुषों दोनों में देखे जा सकते हैं. 

-सामान्य से अधिक भूख और प्यास लगना 

-बार-बार पेशाब लगना 

-बिना किसी वाज़िब कारण के वज़न बढ़ना या घटना 

-हमेशा थकावट-सी तारी रहना 

-आंखों से धुंधला दिखना 

-घाव का देरी से भरना 

-जी मिचलाना या उबकाई आना 

वज़न घटाने की चाहत रखनेवालों, इन 5 छोटी बातों के हैं बड़े फ़ायदे

गैजेट्स की स्क्रीन से नज़र हटाइए और उसे अपने आसपास घुमाइए, ऐसे कई लोग दिख जाएंगे, जो वज़न कम करने की जद्दो्जहद में लगे होंगे. मौजूदा लाइफ़स्टाइल को देखते हुए इस बात की भी काफ़ी संभावना है कि कि आप ख़ुद भी वज़न कम करने के लिए मेहनत कर रहे हों. यह मेहनत ‌जिम में भी हो सकती है या फिर अभी दिमाग़ तक ही पहुंची हो. अब और ज़्यादा भूमिका न बनाते हुए सीधी बात करते हैं और उन छोटी-छोटी बातों को अपनी डेली रूटीन में शामिल करने की कोशिश करते हैं, वज़न घटाने में जिनके बड़े फ़ायदे हो सकते हैं. 
1. सबसे पहले दिमाग़ी रूप से ख़ुद को मज़बूत बनाएं

कोई भी लड़ाई सबसे पहले दिमाग़ में लड़ी जाती है. आप जो कुछ भी करना चाहते हैं, उसके लिए सबसे पहले अपने दिमाग़ को यक़ीन‌ दिलाएं. यही बात वज़न घटाने की आपकी लड़ाई के लिए भी बहुत ज़रूरी है. सबसे पहले ख़ुद पर यक़ीन करें और रोज़ाना दोहराएं ‘यह मुमक़िन है’. जी हां, जब आप सोच लेते हैं तो दुनिया का मुश्क़िल से मुश्क़िल लगनेवाला काम मुमक़िन हो जाता है. लेकिन हां, आपको सब्र रखना है. अगर आपने एक्सरसाइज़ या डायट या फिर दोनों ही शुरू कर दिया है तो यक़ीनन वज़न कम होगा, पर एक-दो हफ़्ते या महीने में ही आप अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे, ऐसा नहीं होगा. ज़रा सोचिए, यह जो आपका बढ़ा हुआ वज़न है, आपकी एक दिन, हफ़्ते या महीने की कमाई तो है नहीं. फिर आप भला सोच भी कैसे सकते हैं कि वज़न झटपट कम हो जाएगा. धैर्य के साथ मेहनत करते हुए सकारात्मक बने रहें. मेहनत का फल मीठा होता है. यह हम बचपन से सुनते आ रहे हैं. आपको भी इसका स्वाद चखने ज़रूर मिलेगा. दिमाग़ी रूप से ख़ुद को मज़बूत बनाने के क्रम में आप अपने घर की दीवार, मोबाइल या डेस्कटॉप स्क्रीन पर मोटिवेशन कोट्स लगाएं. या आप ऐसे फ़ोटोज़ भी लगा सकते हैं, जिस तरह आप ख़ुद का फ़ाइनल रूपांतरण चाहते हैं. 

2. टहलने को अपनी आदत बना लें, हल्का महसूस करेंगे

पैदल चलना वह आदत है, जो हमारी पीढ़ी में कम होती जा रही है. ऐसा नहीं है कि केवल वाहनों की उपलब्धता ही इसका सबसे बड़ा कारण है. हम टेक्नोलॉजी के इतने लती हो गए हैं कि हमारे पास वाक़ई समय कम हो गया है. जो समय आराम से टहलते हुए बिताना था, उसे हम स्क्रीन पर अपनी उंगलियां चलाते हुए बर्बाद करते हैं. वहीं दूसरा साइंटिफ़िक फ़ैक्ट यह है कि यदि आप रोज़ाना 30 मिनट की ब्रिस्क वॉकिंग करते हैं तो आपका वज़न मेंटेन रहता है. और ‌यदि इस 30 मिनट में 15 मिनट और जोड़ दें तो बढ़ा हुआ वज़न कम होने लगता है. सबसे मज़ेदार बात यह है कि आपको वज़न कम करने के इस तरीक़े को अपनाने के दौरान खानपान से बिल्कुल भी समझौता नहीं करना होगा. 

3. आप कैलोरी इनटेक पर ध्यान दें, बाक़ी शरीर अपना ख़्याल ख़ुद ही रख लेगा 

जिस अनुपात में बदले हुए समय में हमारा शारीरिक श्रम कम हुआ है, कैलोरी इनटेक में कोई ख़ास कमी नहीं आई है. और नतीजा है मोटापा, जिससे बहुसंख्यक शहरी जनसंख्या परेशान है. कैलोरी कंट्रोल करने का सबसे मुफ़ीद तरीक़ा है दिन में तीन बड़े मील्स, जैसा कि ज़्यादातर भारतीय करते हैं, के बजाय 5-6 बार थोड़ा-थोड़ा खाएं. ऐसा करने से फ़ायदा यह होता है कि आपको अचानक से बहुत ज़्यादा खाने की इच्छा नहीं सताती. यानी ओवर ईटिंग की संभावना कम हो जाती है. इस तरीक़े से आप लगभग 30% कैलोरी इनटेक कम कर देते हैं. आप जो कुछ खा रहे हैं, उसे डायरी में नोट करते चलें. खानपान का रिकॉर्ड रखकर भी आप कैलोरी पर नियंत्रण रख सकते हैं. कैलोरी पर नियंत्रण रखने के लिए चाय, कॉफ़ी बनाने के लिए और पीने के लिए लो-फ़ैट मिल्क का इस्तेमाल करें. इसमें कैल्शियम अधिक होता है, कैलोरीज़ कम. अधिक से अधिक घर का खाना खाने की कोशिश करें, क्योंकि बाहर के खाने में कैलोरीज़ और फ़ैट्स की मात्रा काफ़ी अधिक होती है. एक ज़रूरी बात यह भी है कि खाना धीरे-धीरे खाएं. ऐसा करने पर जब आपका पेट भर जाएगा तो ब्रेन सिग्नल दे देगा. 

4. भूख को पानी पिला पिलाकर मारें 

यदि सेहतमंद तरीक़े से वज़न कम करना चाहते हैं तो ख़ूब पानी पिएं, इसके दो फ़ायदे हैं पहला तो आप भरपूर हाइड्रेटेड रहेंगे, दूसरा फ़ायदा यह कि आपको भूख कम लगेगी. कम से कम छद्म भूख तो बिल्कुल भी नहीं सताएगी. छद्म भूख वह बला है, जो प्यास को भी भूख लगने का आभास कराती है. पर्याप्त पानी पीकर भी आप रोज़ाना 200 से 250 कैलोरीज़ का सेवन कम कर लेते हैं. डायरेक्ट पानी पीने के साथ-साथ आप पानी का सेवन इनडायरेक्ट तरीक़े से भी कर सकते हैं. वह होगा वॉटर रिच फ़ूड की मात्रा बढ़ाने से. टमाटर, लौकी, खीरा जैसी सब्ज़ियां और तरबूज, संतरा, रस्पबेरी, स्ट्रॉबेरी आदि को खानपान में शामिल करने से न केवल आपको भूख कम लगेगी, बल्कि कैलोरी इनटेक में भी कमी आएगी. 

5. ये तरीक़े भी आएंगे काम 

यदि आपको जिम जाना पसंद नहीं है तो अपनी पसंद की आउटडोर ऐक्टिवटी को समय दें. यदि कोई खेल पसंद हो तो खेलें. हफ़्ते में एक बार घर की अच्छे से साफ़-सफ़ाई करने या अपनी कार/बाइक को धोने से भी काम बन जाएगा. आप न केवल अच्छा महसूस करेंगे, बल्कि आपकी बढ़िया एक्सरसाइज़ भी हो जाएगी. यदि आपको डांस में रुचि हो तो समझिए वज़न कम करने का अचूक फ़ॉर्मूला आपके पास है. डांस करें और वज़न को नियंत्रण में रखें.

अनिद्रा की गिरफ़्त में है हिंदुस्तान, मुंबईकर हैं सबसे अधिक परेशान
वर्तमान समय में अनिद्रा एक आम समस्या हो गई है, जिसे अधिकतर लोग अनेदखा करते जा रहे हैं. लेकिन अब इस समस्या को गंभीरता से लेने का समय आ गया है, क्योंकि यह आपकी सेहत को बुरी तरह से प्रभावित कर रही है. अनिद्रा को लेकर वेकफ़िट नामक कंपनी ने ग्रेट इंडियन स्लीप स्कोर्ड 2019 नामक सर्वे के ज़रिए चौंकानेवाले खुलासे किए हैं. जिसमें उन्होंने लोगों की नींद का पैटर्न समझने की कोशिश की है. इस सर्वे में मुंबई सहित दिल्ली, हैदराबाद, बैंगलोर के 15 हजार से ज़्यादा लोग शामिल थे. इस सर्वे के रिपोर्ट पर नज़र डालें तो सभी शहरों के लोग अनिद्रा की गंभीर समस्या से परेशान हैं, लेकिन मुंबई इसमें पहले स्थान पर है और दूसरा स्थान दिल्ली का है. डॉक्टरों की मानें तो, यह समस्या तेज़ी से विकसित हो रहे शहरी इलाक़ों में अधिक पनप रही है. भविष्य की चिंता और काम के बढ़ते बोझ के कारण लोगों में अनिद्रा की समस्या बढ़ रही है.

मुंबई वाले अधिक परेशान
सर्वे के अनुसार अनिद्रा की शिकायत सबसे ज़्यादा मुंबईकरों को है. तक़रीबन 81 प्रतिशत मुंबईकर इसके शिकार हैं. वहीं बाक़ी बचे लोग भी कई अन्य कारणों से ठीक से नींद नहीं ले पाते हैं. सर्वे में मुंबई के लिए दिए आंकड़ों की माने तो केवल 2 प्रतिशत लोग ही रात में 11 से 1 बजे के बीच अच्छे से सो पाते हैं. वहीं 36 प्रतिशत ऐसे लोग हैं जो 7 घंटे से भी कम सो पाते हैं. कम सोने की वजह से 78 फ़ीसदी मुंबईकर को हफ़्ते में एक से तीन दिन तक अपने वर्कप्लेस पर नींद आती है. 90 फ़ीसदी लोग ऐसे भी हैं जो रात को नींद से 1-2 दो बार उठ जाते हैं. रही इससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं की बात तो नींद नहीं पूरी होने के कारण 52 फ़ीसदी लोगों को पीठदर्द की समस्या होती है. इस सर्वे में मुंबई से कुल 1,500 लोगों को शामिल किया गया था. डॉक्टरों की मानें तो, अच्छी सेहत के लिए हर रोज़ कम से कम 7.30-8 घंटे नींद लेना ज़रूरी होता है.


दूसरे नंबर पर राजधानी
दिल्ली में 80 फ़ीसदी लोग अनिद्रा के शिकार हैं और वजह लगभग मुंबई की समस्या जैसी ही है. दिल्ली सर्वे में 1,700 लोगों को शामिल किया गया था और अनिद्रा के कारणों का पता लगाने की कोशिश की गई. सर्वे में दिए गए आंकड़ों की मानें तो दिल्ली में 52 फ़ीसदी लोग रात में 11 बजे से 1 बजे के बीच सोते हैं. जबकि 31 फ़ीसदी लोग 7 घंटे से भी कम नींद लेते हैं. 77 फ़ीसदी लोगों को हफ़्ते में 1-2 दिन अपने वर्कप्लेस पर नींद आती है. 88 फ़ीसदी लोग रात को 1-2 बार नींद से उठ जाते हैं, जबकि 47 फ़ीसदी लोग पीठदर्द की समस्या से परेशान रहते हैं.

थोड़ा रिलैक्स है बैंगलोर
सर्वे के आंकड़ों में बैंगलोर सिटी थोड़ी रिलैक्स नज़र आई, फिर भी समस्या गंभीर है. इस सर्वे में बैंगलोर के 5,000 लोगों को शामिल किया गया और यहां भी नतीजा निराशाजनक ही निकला. 54 फ़ीसदी लोग रात 11 बजे से 1 बजे के बीच सोते हैं, जबकि 7 घंटे से कम सोने वाले 25 फ़ीसदी हैं. हर पांच में से एक व्यक्ति अनिद्रा की समस्या से जूझ रहा है जो कि राष्ट्रीय औसत से ज़्यादा है. वहीं 11 फ़ीसदी लोग रोज़ ही काम के समय नींद महसूस करते हैं, जबकि 82 फ़ीसदी लोग हफ़्ते में 1 से तीन नींद में होते हैं, जो राष्ट्रीय औसत, 80 फ़ीसदी से ज़्यादा है. बैंगलोर के 90 लोग फ़ीसदी रात को 1-2 बार नींद से उठ जाते हैं और 46 फ़ीसदी लोगों को पीठदर्द की समस्या है.
हैदराबाद भी कतार में
अनिद्रा की समस्या ने हैदराबाद को भी चपेट में लिया है. मुंबई के बाद यह दूसरा शहर है, जहां 48 फ़ीसदी लोग रात 11 बजे से 1 बजे के बीच सोते हैं, जबकि 25 फ़ीसदी लोग 7 घंटे से भी कम सोते हैं. 79 फ़ीसदी लोग ऐसे हैं जो अनिद्रा के शिकार हैं. सप्ताह में 1-3 दिन तक 81 फ़ीसदी लोगों को नींद आती है और 89 फ़ीसदी लोगों की रात में 1-2 बार नींद टूट जाती है. नींद पूरी नहीं होने के कारण 45 फ़ीसदी लोगों को पीठदर्द की समस्या रहती है. इस सर्वे में हैदराबाद के 2,000 लोगों को शामिल किया गया था.

सोने से पहले 90 फ़ीसदी लोग चेक करते हैं गैजेट्स
वेकफ़िट द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार 90 फ़ीसदी लोग सोने से पहले मोबाइल, लैपटॉप और टीवी जैसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का प्रयोग करते हैं. मनोरोग विशेषज्ञों के अनुसार यह एक तरह से स्क्रीन ऐडिक्शन है, जो लोगों को अपनी गिरफ़्त में लेते जा रहा है. लोग देर रात तक वेब सिरीज़, गेम, फ़िल्में, सोशल मीडिया आदि देखते रहते हैं. सोने से ठीक पहले स्क्रीन देखने की वजह से ब्रेन ऐक्टिव हो जाता है और इससे नींद के लिए ज़रूरी मेलाटोनिन नामक रसायन प्रभावित होता है. सर्वे में 23 फ़ीसदी लोगों ने बताया कि वो घरेलू और ऑफ़िस के काम या पैसों से जुड़ी परेशानियों को लेकर चिंतित रहते हैं, जिससे उन्हें जल्दी नींद नहीं आती है.



एंग्ज़ायटी, डिप्रेशन और स्ट्रेस हैं मुख्य कारण
साइकोलॉजिस्ट आरती श्रॉफ के अनुसार वैसे तो अनिद्रा की कई वजहें हो सकती हैं, लेकिन डिप्रेशन, एंग्ज़ायटी और स्ट्रेस मुख्य कारणों में से हैं. शहरी इलाकों में अनिद्रा की शिकायत सबसे आम है और यह साल दर साल बढ़ती ही जा रही है. डिप्रेशन में अक्सर नींद की समस्या हो जाती है, जिसे नज़रअंदाज़ करना हमारे लिए मुश्क़िल खड़ा कर सकता है. इसके पीछे बड़ी मानसिक समस्या भी हो सकती है. इसके अलावा एक और बड़ा कारण सामने आ रहा है, वह है स्क्रीन एडिक्शन.


स्लीप हाइजीन मेंटेन करें
साइकियाट्रिस्ट राहुल घाड़गे की मानें तो आज के समय में अनिद्रा के मुख्य कारणों में इलेक्टॉनिक गैजेट्स शामिल हैं. यह आपके सोचने की प्रक्रिया को बहुत ज़्यादा बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे आप सोते समय भी कुछ ना कुछ सोचते रहते हैं और वह आप के नींद को बहुत अधिक प्रभावित करती है. दूसरी परेशानी डिप्रेशन और एंग्ज़ायटी. डिप्रेशन में व्यक्ति नकारात्मक बातें सोचता है और एंग्ज़ायटी में ऐसी बातें सोचता है, जो नहीं हो सकती या होने का एक फ़ीसदी चांस रहता है. लोग स्लीप हाइजीन मेंटेन नहीं करते और अलग-अलग समय पर सोते हैं, जो नींद की परेशानी को बुलावा देता है.
वेकफ़िट के सह-संस्थापक अंकित गर्ग के अनुसार नींद नहीं आने की वजह से कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं, जैसे उच्च रक्तचाप से लेकर बेचैनी तक की समस्या. सर्वे से हमें पता चल रहा कि किस तरह से लोग इन समस्याओं को अनदेखा करते हैं. सबसे दुखद यह है कि अधिकतर भारतीय अनिद्रा की इस बीमारी को बीमारी ही नहीं मानते. मुझे लगता है कि इस समस्या के बारे में जागरूकता लाने की ज़रूरत है.








मिर्गी, चिंता से नहीं इलाज से जाएगी
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मिर्गी रोग एक तरह का न्यूरोलॉजिकल डिस्ऑर्डर है जिसका इलाज संभव है. लेकिन जागरूकता की कमी के कारण अधिकतर मरीज इलाज नहीं कराते हैं. मिर्गी का दौरा लगभग दो से तीन मिनट के लिए पड़ता है. उस दौरान मरीज के मुंह से झाग निकलता है, शरीर अकड़ जाता है, झटका महसूस होता है, दांत भिंच जाते हैं. मिर्गी का दौरा एक दिन के बच्चे से लेकर सौ साल के बुज़ुर्ग तक को पड़ सकता है. यह रोग आंशिक और पूर्ण दो तरह का होता है. आंशिक मिर्गी में मस्तिष्क का एक भाग और पूर्ण मिर्गी में मस्तिष्क के दोनों भाग प्रभावित होते हैं.
नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ हेल्थ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में कुल जनसंख्या का एक प्रतिशत भाग अर्थात कुल 1.3 करोड़ लोग मिर्गी से पीड़ित हैं. वहीं पूरे विश्व में लगभग 6 करोड़ लोगों को मिर्गी अपना शिकार बना चुकी है. भारत में यह बीमारी शहरों की अपेक्षा ग्रामीण इलाक़ों में अधिक पाई जाती है. एनआईएच के आंकड़ों के अनुसार इसका प्रतिशत 1.9 है. मिर्गी में पीड़ित को होश और बेहोशी दोनों हालत में झटके आते हैं, जिसकी वजह से कुछ समय के लिए उसकी याददाश्त चली जाती है. यदि किसी रोगी में 3 बार से अधिक झटकों की हिस्ट्री मिलती है, तो उसे मिर्गी का रोगी कहा जाता है.

60 प्रतिशत मिर्गी पीड़ितों को इस रोग के होने की वजह का पता नहीं होता है, जबकि 40 प्रतिशत रोगियों में सिर की चोट, दिमाग़ का इंफ़ेक्शन, दिमाग़ का विकास ठीक से न होना, दिमाग़ में रक्त स्राव होना या ऑक्सिजन की कमी होना, दिमाग़ में ट्यूमर,अल्ज़ाइमर डिज़ीज़ और रक्त में शुगर, कैल्शियम, मैग्नीशियम और हिमोग्लोबिन की कमी के कारण होता है.
बचाव एवं उपचार
पोषक आहार लें.
धूप में निकलते समय धूप के चश्में पहनें एवं शरीर को ढक के रखें.
रात में पर्याप्त मात्रा में नींद लें.
ओमेगा-3 फ़ैटी एसिड से भरपूर भोजन लें, जैसे-अलसी के बीज, अखरोट, मछली, अंकुरित धान आदि.
रोज़ाना नाश्ता करना ना भूलें.
बहुत ठंडे या गर्म पानी से न नहाएं.
कुनकुना पानी पिएं.
तेल के स्थान पर कुछ साल पुराना गाय का घी प्रयोग करें.
सोते समय एवं सुबह नाक में पोषक तेल या घी डालें, जैसे बादाम का तेल, गाय का घी, अणु का तेल आदि.
किसी अच्छे आयुर्वेद विशेषज्ञ की निगरानी में वचा, शंखपुष्प, कुष्मांड (पेठा) मुलैठी जटामांसी, तगर और ब्राह्मी आदि आयुर्वेदिक दवाओं का प्रयोग करें.
उदसलीव, शुद्ध हींग आदि दवाओं को गले में लटकाने से भी मिर्गी के रोगियों को लाभ होता है.

माना कि मस्तिष्क या दिमाग़ हमारे शरीर की सर्वशक्तिमान शक्ति है जो सभी अंगों को नियंत्रित करता है, लेकिन हृदय के बिना अपाहिज है. हृदय के द्वारा ही मस्तिष्क में रक्त पहुंचता है, जो उसे पोषण प्रदान करता है. यदि हम चाहते हैं कि दिमाग़ अपना कार्य सुचारू रूप से करता रहे तो हृदय को स्वस्थ रखना होगा. इसलिए मिर्गी के रोगी को हॉर्ट टॉनिक, पार्थयारिष्ट और ख़ून बढ़ाने वाले हिमाटेनिक्स दें, ताकि मस्तिष्क को अच्छा पोषण एवं ऑक्सिजन मिले और वह अपना काम सुचारू रूप से करता रहे.

-यहां बताए गए किसी भी नुस्ख़े को आज़माने से पहले अपने फ़िज़िशियन से सलाह लें.


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