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क्यों खड़े रहना एक बेहतरीन एक्सरसाइज़ है?

क्यों खड़े रहना एक बेहतरीन एक्सरसाइज़ है?
हम सभी जानते हैं कि चलना-फिरना भी एक तरह की एक्सरसाइज़ होती है, लेकिन सिर्फ़ खड़े रहने के बारे में आप के क्या विचार हैं? यदि आप आसान तरीक़े से फ़ैट बर्न करने के बारे में सोच रहे हैं, तो यह ख़बर आपके लिए ही है. यक़ीन मानिए बस खड़े रहना भी एक एक्सरसाइज़ है, जिसके अनगिनत फ़ायदे हैं.

बर्न होता है फ़ैट
जब आप बैठते हैं, तो आपके शरीर का मेटाबॉलिज़्म अलग तरीक़े से काम करता है, जबकि खड़े रहने से इसके काम करने का तरीक़ा बदल जाता है. अध्ययनों से पता चला है कि जब आप खड़े होते हैं, तो आपका शरीर फ़ैट बर्न करता है, लेकिन बैठने पर शरीर में फ़ैट इकट्ठा होता है. यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिसूरी के प्रोफ़ेसर मार्क हैमिल्टन का कहना है कि यदि आप लंबे समय तक खड़े नहीं होते, तो मांसपेशियों की रक्त वाहिनियों के वज़न घटानेवाले एंज़ाइम्स काम करना बंद कर देते हैं.
बीमारियों से बचाता है
यूरोपियन हार्ट जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, खड़े होने से आपके कोलेस्टेरॉल का स्तर सुधरता है, डायबिटीज़ और मोटापा नियंत्रण में रहते हैं. इस अध्ययन में 800 लोगों को शामिल किया गया था. उन प्रतिभागियों ने जब रोज़ाना अतिरिक्त 2 घंटे खड़ा रहना शुरू किया तब उनके डायबिटीज़ का लेवल 2 प्रतिशत और मोटापे का लेवल 11 प्रतिशत तक कम हो गया.

क्यों खड़े रहने से बर्न होती है कैलोरीज़?
अगर आप सोच रहे हैं कि सिर्फ़ खड़े रहने से आख़िर कैलोरी कैसे बर्न हो सकती है? तो इसका जवाब है कि जब आप खड़े होते हैं तो आपके पैर, पेट व बट की मांसपेशियों की एक्सरसाइज़ होती है, जिससे फ़ैट बर्न होता है. वहीं बैठने पर इतनी कैलोरी बर्न नहीं होती.

खड़े होना बनाम चलना
यदि आपको लगता है कि खड़े रहकर आप वॉक के फ़ायदे पा सकते हैं, तो आप ग़लत सोच रहे हैं. खड़े रहना वॉकिंग की जगह नहीं ले सकता. एक औसत नौजवान व्यक्ति के एक घंटे खड़े रहने से लगभग 190 कैलोरीज़ बर्न होती हैं, वहीं बैठे रहने से 130 कैलोरीज़ बर्न होती हैं. जबकि उतना ही समय चलने से आप की 320 कैलोरीज़ बर्न कर सकते हैं. हालांकि चलना हमेशा संभव नहीं हो सकता है, लेकिन आप इसकी कमी को ज़्यादा देर तक खड़ा रह कर पूरा कर सकते हैं.

आप अपनी सीट से दिन में कितनी बार उठते हैं?
यदि आप ऑफ़िस में कुर्सी पर बैठ कर काम करते हैं, तो आपको हर आधे घंटे में 10 मिनट के लिए उठना चाहिए. रोज़ाना के आठ घंटे की शिफ़्ट में आपको हर दिन 16 बार खड़े होना चाहिए.

खड़े होने के लिए हम क्या कर सकते हैं?
यदि आप अपने रोज़मर्रा के जीवन में खड़े होकर अपनी कैलोरीज़ बर्न करना चाहते हैं, तो आप इन कुछ उपायों को अपना सकते हैं:
-ऑफ़िस में अपने लिए एक स्टैंडिग डेस्क की तलाश करें और अपने आठ घंटे की शिफ़्ट में कम से कम दो घंटे खड़े होकर काम करें.

- चलते-चलते बात करें. यदि आप कॉन्फ्रेंस कॉल पर हैं, तो हेडसेट लगा लें और खड़े रहकर कॉल अटेंड करें. यदि आप कॉल के समय आसपास घूम सकते हैं तो यह और भी बेहतर होगा.

- खड़े होकर टीवी देखें. हालांकि यह सुनने में काफ़ी अटपटा लग रहा होगा, लेकिन कैलोरीज़ बर्न करने का यह एक अच्छा तरीक़ा है.

- दिन भर में आपको कितना खड़ा होना है, इसके लिए अपने रिस्ट वॉच या मोबाइल में अलार्म फ़िट करें, जो आपको समय-समय पर खड़ा होने के लिए याद दिलाएगा.



हार्ट फ़ेलियर सिर्फ़ पुरुषों की बीमारी नहीं है! आपका दिल भी दे सकता है जवाब

Women at equal risk of developing heart failure

ग्लोबल मेडकल जर्नल लांसेट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में हृदय रोगों में लगभग 50% की बढ़ोतरी हुई है. इस रिपोर्ट के अनुसार हृदय रोगों में भी हार्ट फ़ेलियर सबसे प्राणघातक है. यानी हृदय रोगों के चलते होनेवाली मौतों में सबसे अधिक मौतें हार्ट फ़ेलियर के चलते होती हैं. और दूसरी चौंकानेवाली बात यह रही कि दिल की बीमारियों को पुरुषों की बीमारी मानने की धारणा बिल्कुल सही नहीं है. ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि हृदय संबंधी बीमारियों के चलते महिलाओं और पुरुषों की मृत्यु का अनुपात लगभग बराबर है. आइए जानते हैं, क्या है हार्ट फ़ेलियर और कैसे आप इसके लक्षण पहचान सकती हैं. सबसे बड़ी बात, इससे बचाव के लिए क्या-क्या किया जा सकता है. और हां, आगे बढ़ने से पहले हम हार्ट फ़ेलियर और हार्ट अटैक दोनों के बीच के अंतर को भी समझ लेते हैं, क्योंकि जब भी दिल की बीमारी की बात की जाती है तो लोग उसे हार्ट अटैक से जोड़कर देखते हैं.

यह है अंतर हार्ट अटैक और हार्ट फ़ेलियर में
हार्ट अटैक और हार्ट फ़ेलियर दोनों ही दिल की बीमारियों के नाम हैं. दोनों अलग-अलग बीमारियां हैं. भले ही दोनों सुनने में एक जैसी लगें पर उनमें सबसे बुनियादी फ़र्क़ यह है कि जहां हार्ट अटैक अचानक होनेवाली समस्या है, वही हार्ट फ़ेलियर एक ऐसी बीमारी है, जो आपके दिल को धीरे-धीरे अपनी गिरफ़्त में लेती है. हार्ट अटैक तब आता है, जब हृदय की ओर जानेवाली किसी धमनी में ब्लॉकेज हो जाता है और हृदय तक रक्त नहीं पहुंच पाता. जिसके चलते हृदय को ऑक्सीजन की सप्लाई नहीं हो पाती और हार्ट की मसल्स मरने लगती हैं. वहीं हार्ट फ़ेलियर धीरे-धीरे अपना प्रभाव दिखाता है. सबसे पहले हृदय की मसल्स कमज़ोर पड़ने लगती हैं, जिससे हृदय की ब्लड ‌पम्पिंग क्षमता कम हो जाती है. समय के साथ मामला बिगड़ने लगता है. हां, यहां आपके पास दवाइयों की मदद से लंबी और बेहतर ज़िंदगी जीने का विकल्प है. कभी-कभी हार्ट अटैक भी हार्ट फ़ेलियर का कारण बनता है. दरअस्ल, हार्ट अटैक का धक्का झेलने के बाद हार्ट की पम्पिंग क्षमता कमज़ोर हो जाती है.







क्या हैं हार्ट फ़ेलियर के कारण?
कोरोनरी आर्टरी डिज़ीज़ यानी धमनियों में फ़ैट्स डिपॉज़िट हो जाने के कारण उनका संकुचित हो जाना हार्ट फ़ेलियर ही नहीं, हार्ट अटैक का भी एक प्रमुख कारण है. वसा या दूसरी चीज़ों के प्लाक के जमा हो जाने के कारण धमनियां संकरी और कठोर हो जाती हैं. जब लंबे समय तक संकरी धमनी से रक्त संचार का काम चलता है, तब हृदय को पर्याप्त मात्रा में रक्त नहीं मिल पाता और वह फ़ेल होने की ओर बढ़ता है. इसके अलावा दूसरे कई कारण हैं, जो हार्ट फ़ेलियर को बढ़ावा देते हैं, जैसे-हार्ट वॉल्व डिज़ीज़, इन्फ़ेक्शन, हृदय की कोई पैदाइशी समस्या, अनियमित हार्टबीट, कार्डियोमायोपैथी (हार्ट के मसल्स की समस्या), एचआईवी/एड्स, कीमोथेरैपी, थायरॉइड की समस्या, बहुत अधिक शराब का सेवन, फेफड़ों के रोग, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़ आदि.

इन लक्षणों को न करें नज़रअंदाज़
-एड़ी, पैरों और पेट में सूजन
-लेटते समय सांस लेने में तक़लीफ़, सांस लेने के लिए तकिया ऊपर करने की ज़रूरत पड़ना
-लगातार थकावट बनी रहना
-सांस फूलना या सांस लेने में कठिनाई और तक़लीफ़
महिलाएं और हृदय रोगों के चेतावनी भरे लक्षण
हमारे देश में लगभग 10 मिलियन यानी एक करोड़ लोग हार्ट फ़ेलियर की समस्या का सामना कर रहे हैं. महिलाओं और पुरुषों में इस बीमारी का जोखिम समान है. पर चूंकि महिलाएं अक्सर अपने स्वास्थ्य को लेकर उतनी सजग और जागरूक नहीं होतीं, इसलिए वे इसके लक्षण और ख़तरों को पहचानने में चूक कर जाती हैं. इस बारे में बताते हुए डॉ देवकिशिन पहलजानी, इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट, ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल, मुंबई कहते हैं,‘‘भारत को हृदय रोगों के प्रति सचेत हो जाना चाहिए, इसके पर्याप्त कारण हैं. पारंपरिक रूप से हृदय रोगों को पुरुषों की समस्या समझा जाता रहा है, लेकिन हमें पता होना चाहिए कि महिलाएं भी बड़ी संख्या में हृदय रोगों से पीड़ित हो रही हैं. सभी हृदय रोगों में हार्ट फ़ेलियर का प्रबंधन और परिणाम पुरुषों और महिलाओं में अलग-अलग हो सकता है, क्योंकि महिलाओं में अक्सर इस रोग की उपेक्षा की जाती है. मेरे पास प्रति माह आनेवाले हृदय रोगियों में से लगभग 40 प्रतिशत महिलाएं हैं. अधिकांश महिलाएं हार्ट फ़ेलियर के चेतावनी भरे लक्षणों को नहीं पहचानतीं, ख़ासतौर से जब तक उनका स्वास्थ्य और जीवन संकट में नहीं आ जाता. यह चिंता का विषय है.’’


महिलाएं क्यों हो रही हैं हार्ट फ़ेलियर का शिकार?
महिलाओं में हार्ट फ़ेलियर समेत दूसरी हृदय संबंधी बीमारियों के बढ़ने के कारणों को समझने के लिए इन बातों पर ग़ौर करना होगा.
* ‌नियमित रूप से ब्लड प्रेशर न चेक कराना: पुरुषों की तुलना में हार्ट फ़ेलियर वाली महिलाओं में हाई ब्लड प्रेशर होना अधिक आम है, लेकिन भारतीय महिलाएं नियमित रूप से ब्लड प्रेशर चेक नहीं करवाती हैं और इसलिए यदि उन्हें हाई ब्लड प्रेशर की समस्या हो तो भी उससे अनजान रहती हैं. हाई ब्लड प्रेशर ऐसी स्थिति है, जिसमें हृदय को सामान्य से अधिक काम करना पड़ता है. यदि इसका उपचार न हो, तो आर्टरीज़ को क्षति पहुंचती है और हार्ट फ़ेलियर की संभावना दोगुनी हो जाती है.
* डायबिटीज़ की दवाएं भी हैं कारण: डायबिटीज़ में हाई ब्लरड ग्लू कोज़ लेवल के चलते उन रक्त वाहिकाओं और नसों को क्षति पहुंच सकती है, जो आपकी हृदय और रक्त वाहिकाओं को नियंत्रण करती हैं. डायबिटीज़ से पीड़ित 30 से 60 वर्ष की महिलाओं में इस आयु वर्ग के पुरुषों की तुलना में हार्ट फ़ेलियर की संभावना दोगुनी होती है. दरअस्ल, डायबिटीज़ से पीड़ित महिलाएं हार्ट फ़ेलियर के लक्षणों को नहीं पहचान पाती हैं, क्योंकि डायबिटीज़ के उपचार के कारण हार्ट फ़ेलियर के लक्षण छुप जाते हैं. वे डॉक्टर के पास तब जाती हैं, जब बीमारी एड्वांस्ड स्टेज में पहुंच चुकी होती है.

* प्रेग्नेंसी के लक्षण कर देते हैं कन्फ़्यूज़: नॉर्मल प्रेग्नेंसी के लक्षण और संकेत हार्ट फ़ेलियर के लक्षणों और संकेतों से काफ़ी हद तक मिलते हैं. प्रेग्नेंसी के दौरान या उसके कुछ समय बाद महिलाओं में हार्ट फ़ेलियर जैसी समस्याएं नहीं होतीं. ऐसे में यदि आगे चलकर हार्ट फ़ेलियर के लक्षण दिखे तो जानकारी के अभाव में महिलाएं उन्हें सामान्य मानकर नज़रअंदाज़ कर देती हैं. वैसे प्रेग्नेंसी और हार्ट फ़ेलियर का एक नाता यह भी है कि जिन महिलाओं का बार-बार गर्भपात होता है, आगे चलकर उनमें हार्ट फ़ेलियर का अधिक जोखिम होता है.
* मेनोपॉज़ सीधे तो नहीं, पर हार्ट फ़ेलियर के लिए ज़िम्मेदार है: हालांकि अभी तक मेनोपॉज़ के चलते हृदय रोग होने का कोई डायरेक्ट संबंध सिद्ध नहीं किया जा सका है, पर बढ़ती उम्र में हार्ट फ़ेलियर की संभावना बढ़ती तो है. मेनोपॉज़ के बाद प्राकृतिक हार्मोन एस्ट्रोजन का कम होना हृदय रोग का एक कारक हो सकता है. ऐसा माना जाता है कि एस्ट्रोजन आर्टरी की दीवार की अंदरूनी परत को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है और रक्त वाहिकाओं को लचीला बनाने में मदद करता है. अर्थात रक्त के प्रवाह के दौरान वाहिकाएं ज़रूरत के मुताबिक़ फैल सकती हैं. इस आधार पर हम कह सकते हैं कि जिन महिलाओं का मेनोपॉज़ जल्दी हो जाता है, उन्हें हार्ट फ़ेलियर का ख़तरा दूसरी महिलाओं की तुलना में अधिक होता है.
क्या करें हार्ट फ़ेलियर से
हार्ट फ़ेलियर के अलग-अलग मामलों में उपचार का तरीक़ा अलग-अलग होता है. कार्डियोलॉजिस्ट मरीज की कंडिशन के अनुसार दवाइयां या ट्रीटमेंट सुझाते हैं. आप अपनी जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव लाकर भी हार्ट फ़ेलियर के ख़तरे को कम कर सकते हैं. ऐसे बदलावों में शामिल हैं-स्मोकिंग छोड़ना, शराब की मात्रा कम करना, वज़न घटाना, नमक कम खाना और नियमित रूप से व्यायाम करना. इनसे आपका ‌हृदय मज़बूत बनता है.


क्या, पानी से भी बढ़ता है वज़न!
आप वज़न कम करने के लिए कितने भी टिप्स आज़मा लें, पर कई ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से आपकी कोशिशें क़ामयाब नहीं होती हैं. इन कारणों में आप का सही आहार ना लेना, वज़न बढ़ने के सही कारण को नहीं समझ पाना, सही एक्सरसाइज़ ना करना आदि शामिल हो सकते हैं. इनसे वज़न कम करने का टास्क काफ़ी मुश्क़िल बन जाता है. अगर आप हर समय ब्लॉटेड फ़ील कर रहे हों तो हो सकता है वॉटर वेट आपके वज़न के न कम होने की वजह हो. इस आलेख में हम आपको वॉटर वेट के कारणों के साथ, उसे रोकने के उपायों के बारे में भी जानकारी दे रहे हैं.

वॉटर वेट क्या है?
जब फ़्लूइड, टिशू में इकट्ठा हो जाता है, तो वही सूजन का कारण बन जाता है. वॉटर वेट, वह हिस्सा होता है, जहां शरीर फ़्लूइड इकट्ठा करता है और आमतौर पर यह किडनी के आसपास ही इकट्ठा होता है. फ़्लूइड को बाहर फ़्लश करने के बजाय हमारा शरीर इसे अंगों और त्वचा के बीच इकट्ठा करके रखता है, जो आपको असहज बनाता है. वॉटर वेट से वज़न बढ़ना आपका वास्तविक वज़न नहीं होता.

वॉटर गेन के मुख्य कारण
वॉटर गेन के मुख्य कारणों में नमक और कार्ब्स शामिल हैं. अधिक नमक खाने की वज़ह से सोडियम पानी के साथ शरीर में घुलकर अटक-सा जाता है. अतः आप जितनी अधिक मात्रा में नमक का सेवन करेंगे वॉटर वेट बढ़ने की संभावना उतनी ही अधिक रहेगी. अधिक कार्ब्स का सेवन भी हमें इसी तरह से प्रभावित करता है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार जब हम अधिक मात्रा में कार्ब्स खाते हैं, तो हमारा शरीर उसे तुरंत एब्ज़ॉर्ब नहीं करता और उसे ग्लाइकोजन के रूप में इकट्ठा करता है. ग्लाइकोजन अधिक पानी एब्ज़ॉर्ब करता है, जिससे वॉटर वेट बढ़ने की संभावना रहती है.
वॉटर वेट के और दूसरे कारण
कुछ दवाएं: कुछ दवाओं के सेवन से शरीर में फ़्लूइड निकलने की बजाय शरीर में ही अटका रह जाता है. विशेष रूप से इसमें हाई ब्लड प्रेशर, ऐंटी-इन्फ़्लैमेटरी और डायबिटीज़ की कुछ दवाएं शामिल हैं, जो फ़्लूइड को अवरुद्ध करती हैं. ऐसी दवाएं लेते समय अपने हेल्थ एक्स्पर्ट से जान लें कि कहीं आप की दवाएं वॉटर वेट गेन की वजह तो नहीं बन रही हैं.
ख़राब रक्त संचारः वॉटर वेट गेन का एक अन्य कारण ख़राब रक्त संचार भी हो सकता है. हमारे पैर की नसों के वॉल्व, हृदय की ओर होनेवाले रक्त प्रवाह में मदद करते हैं. लेकिन जब रक्त संचार ख़राब होता है, तो शरीर के निचले हिस्से में रक्त ठीक तरह से प्रवाहित ही नहीं हो पाता है, जिससे शरीर में फ़्लूइड का रिटेंशन होने लगता है.
गर्भावस्थाः प्रेग्नेंसी भी वॉटर वेट गेन करने का एक कारण हो सकती है. आमतौर पर गर्भवती महिलाएं जब डिलिवरी डेट के क़रीब होती हैं तो उनके हाथ, पैर, चेहरे और टखनों में सूजन आ जाती है. यह वॉटर वेट के कारण ही होता है. आप अपने बदलते हार्मोन को दोष दे सकती हैं, लेकिन बढ़ता पेट भी इसमें शामिल है. यह रक्त वाहिनियों पर दबाव डालता है और फ़्लूइड टिशू में जमा होता है, जिसे वापस पाने के लिए रक्त वाहिनियों को मशक़्क़त करनी पड़ती है. गर्भावस्था के दौरान सूजन, दर्द का कारण बनती है, जो चिंता का विषय है. गर्भवती महिला को तत्काल इसका इलाज करवाना चाहिए.

वॉटर वेट गेन को कैसे रोकें?
आप वॉटर वेट को रोक सकते हैं, जिसके लिए आप को कुछ बातों का ध्यान रखना होगा.
- नमक के अधिक सेवन से बचें.
-ज़्यादा पानी पिएं. अगर आप कम पानी पीते हैं तो यह आप के शरीर को प्रभावित करता है.
-अधिक चाय, कॉफ़ी और शराब के सेवन से बचें.
-नियमित रूप से एक्सरसाइज़ करें, जिससे आप का वज़न कम होगा.
-हाइड्रेटिंग खाद्य पदार्थ खाएं.

नाेट: आलेख में दी गई सलाहों पर अमल करने से पहले अपने फ़िज़िशन से ज़रूर कंसल्ट करें.


इन 9 तरीक़ों से करें डिजिटल डिटॉक्स
सुबह सोकर उठते ही आप सबसे पहले क्या करते हैं? वह बीते दौर की बात हो गई है, जब हम उठते ही सबसे पहले नित्यकर्म से निवृत्त हुआ करते थे. ख़ुद पर और अपने आसपास के लोगों पर ज़रा-सा ध्यान देकर आप पाएंगे कि ज़्यादातर लोग उठते ही सबसे पहले अपने स्मार्ट फ़ोन का मुंह देखते हैं. सस्ते स्मार्टफ़ोन और उससे भी सस्ते डेटा ने हमें दूर रहनेवाले अपनों से तो जोड़ दिया है, पर हमें ख़ुद से दूर कर दिया है. हमें सोशल मीडिया पर अपनी आवाज़ उठाने की स्पेस तो दी है, पर कुछ नया सोचने-समझने की दिमाग़ की जगह को कैप्चर कर लिया है. हम मल्टी-टास्कर तो बन गए हैं, पर किसी एक काम में मास्टर नहीं रहे हैं. कुछ न करते हुए भी हम व्यस्त रहने लगे हैं.
अपने स्मार्टफ़ोन के स्क्रीन पर पूरी दुनिया की ख़बर लेना बड़ा ही आसान और आनंददायक लग सकता है, पर जो चीज़ हमें आनंददायक लगती है वह हमें कब अपने गिरफ़्त में लेकर अपनी आदी बना ले, पता ही नहीं चलता. आज के दौर में टेक्नोलॉजी ने हमें आदी बना दिया है. हमें पता ही नहीं कि हम इस लत यानी एडिक्शन की क्या क़ीमत चुका रहे हैं. गर्दन का दर्द, उंगलियों और आंखों की समस्या तो बस कुछ ऐसे साइड इफ़ेक्ट हैं, जो दिखते हैं. ध्यान केंद्रित करने की हमारी क्षमता कम हो गई है, हम पहले से अधिक बेसब्र हो गए हैं, तनाव भी अब अधिक सताता है... जैसी बातों को हम भले ही टेक्नोलॉजी की लत को दोषी न ठहराएं, पर ये हैं तो इसी के साइड इफ़ेक्ट.
इसके साथ ही यह बात भी माननी पड़ेगी कि हम लाख चाहे टेक्नोलॉजी को बुरा समझें, पर उससे पूरी तरह अलग हो पाना संभव नहीं है. यहां संभव की जगह प्रैक्टिकल शब्द यूज़ करें तो ज़्यादा अच्छा होगा. एक्स्पर्ट्स की मानें तो आपको अपने फ़ोन से पूरी तरह दूर जाने की ज़रूरत नहीं है, बस उसके टच स्क्रीन को थोड़ा कम टच किया करें. आइए जानते हैं, टेक्नोलॉजी से सुरक्षित दूरी बनाने यानी टेक डिटॉक्स या डिजिटल डिटॉक्स के कुछ प्रैक्टिकल तरीक़े.


1. सबसे पहले नोटिफ़िकेशन को नोटिस थमाएं
वह पुश नोटिफ़िकेशन्स ही हैं, जो फ़ोन की तरफ़ से आपका ध्यान हटने नहीं देते. हालांकि वे तो आपको अपडेट देने का अपना काम ही कर रहे हैं, पर पूरी ईमानदारी से किया जा रहा उनका काम आपको कोई दूसरा काम नहीं करने देता. जैसे ही कोई नोटिफ़िकेशन आता है, आपके हाथ काम छोड़कर फ़ोन चेक करने लग जाते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार यदि आप आधे घंटे में पांच बार नोटिफ़िकेशन्स के प्रभाव में आकर अपने फ़ोन को हाथ लगाते हैं तो समझिए ‌नोटिफ़िकेशन आपका दुश्मन बन गया है. आपको तुरंत जितना संभव हो सके, उतने नोटिफ़िकेशन्स टर्न ऑफ़ कर देना चाहिए. यक़ीन मानिए, यदि आपको देश-दुनिया की ख़बर थोड़ी देर से मिलेगी तो पहाड़ नहीं टूट जाएगा. आज भी लोग अति महत्वपूर्ण ख़बरें देने के लिए फ़ोन ही करते हैं.

2. फ़ोन को थोड़ा कम अट्रैक्टिव बनाएं
यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह ख़ूबसूरत चीज़ों की ओर अट्रैक्ट होता है. यदि आपने फ़ोन को चटक रंगों के कवर में संभालकर रखा है तो बहुत संभव है कि आपकी नज़र बार-बार उस ओर जाए. यही बात उसके स्क्रीन के रंग और सेटिंग पर भी लागू होती है. कोई बहुत अच्छी फ़ोटो आपने अपनी वॉल पर रखी है तो आप उसे देखने के चक्कर में फ़ोन में कब घुस जाएंगे पता ही नहीं चलेगा. आप अपने फ़ोन का वॉलपेपर कम अट्रैक्टिव या ब्लैक ऐंड वाइट रख सकते हैं.

3. खाने के दौरान फ़ोन रख दें दूर
आपने देखा होगा खाने की टेबल पर फ़ोन ने भी अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है. रेस्तरां आदि में तो लोग खाते हुए फ़ोन में घुसे पड़े रहते हैं. यह अलग बात है कि वे ख़ुद नहीं जानते कि फ़ोन में आंखें गड़ाए और उसपर उंगलियां घुमाते हुए वे करना क्या चाहते हैं. आजकल पुराने दोस्त वैसे तो ज़्यादा मिल नहीं पाते, पर कभी ग़लती से चाय पीने के लिए मिल भी गए तो एक-दूसरे की ओर देखकर बातचीत करने के बजाय फ़ोन में देखते रहते हैं. साइकोलॉजिस्ट का कहना है कि खाने की टेबल पर फ़ोन पड़ा हो तो हम भले ही उसकी ओर ध्यान न दें, पर वहां मौजूद लोगों से हमारे इंटरैक्शन की क्वॉलिटी पर फ़र्क़ पड़ता है. हम जितनी ऊर्जा फ़ोन में लगाते है, लोगों से मिलते समय हमारी गर्मजोशी उतनी कम हो जाती है. तो उम्मीद है आप समझ ही गए होंगे कि अगली बार क्या करना है.

4. हर दिन कुछ घंटे ‘टेक-फ्री आवर’ के रूप में आरक्षित रखें
हालात तो इतने बुरे हो गए हैं कि हममें से ज़्यादातर लोग अपने स्मार्टफ़ोन के बिना अधूरा महसूस करने लगते हैं. इसका अंदाज़ा इस बात से लगाएं, जिस दिन आप ऑफ़िस से निकलते समय फ़ोन घर पर भूल जाते हैं. दिनभर सोचते रहते हैं न जाने किसका फ़ोन या मैसेज आया होगा. जितने फ़ोन या मैसेज आपको औसतन आते नहीं, उससे भी ज़्यादा आप अपने फ़ोन को मिस करते हैं. फ़ोन के इस मोह-माया से बचने के लिए हर दिन कुछ घंटे ऐसे तय करें, जब चाहे जो हो जाए फ़ोन की ओर देखना तक नहीं है. आपको अपनी ज़िंदगी में सुखद बदलाव देखकर आश्चर्य न हो तो कहना. कम से कम एक हफ़्ते तक अपने इरादे पर टिके रहकर तो देखें. 
5. फ़ोन को बेडरूम से बाहर का रास्ता दिखाएं
ज़्यादातर लोग बेडरूम में सिरहाने फ़ोन रखने का बहाना यह बनाते हैं कि ऐसा अलार्म लगाने के लिए किया है. लेकिन जब उनकी नज़र बगल में रखे फ़ोन पर पड़ती है तो वे स्क्रीन पर स्क्रोल करना शुरू कर देते हैं. यदि बेडरूम में फ़ोन रखने का आपका भी यही बहाना हो तो बेहतर होगा कि आप कोई अलार्म क्लॉक ख़रीद लें. बेडरूम में फ़ोन पर समय बिताने के बजाय, अपने पार्टनर पर ध्यान दें. अपने बेडरूम को नो-टेक ज़ोन बनाकर आप न केवल पार्टनर से बेहतर नज़दीकी का अनुभव करेंगे, बल्कि अच्छी नींद भी पाएंगे.

6. पेपर से फिर करें प्यार
इन दिनों टेक्नोलॉजी के चलते लोगों की रीडिंग हैबिट में बड़ा बदलाव देखने मिल रहा है. प्रिंटेड किताबें या पेपर पढ़ने की जगह लोग टैबलेट या मोबाइल पर ही पढ़ने लगे हैं. लेकिन आपने ख़ुद अनुभव किया होगा, ऑनलाइन पढ़ते समय आपका दिमाग़ काफ़ी डिस्ट्रैक्टेड फ़ील करता है. वहीं जब आप प्रिंटेड पेपर या किताबें पढ़ता है तो आपका मस्तिष्क स्थिर रहता है और सूचनाओं को बेहतर ढंग से एब्ज़ॉर्ब करता है. इसलिए यदि आपने न्यूज़पेपर का सब्स्क्रिप्शन बंद कर दिया है तो समय आ गया है उसे रीन्यू कराने का. और हां, किताबों से दोस्ती भी आपको टेक्नोलॉजी के दुष्चक्र में फंसने से बचाएगी.

7. स्क्रीन टाइम पर लगाएं लगाम
ऐसा अक्सर होता है कि हम जब किसी ज़रूरी काम से स्मार्टफ़ोन या लैपटॉप के स्क्रीन पर नज़र गड़ाते हैं, तब वह काम पूरा होते-होते हम बिना ज़रूरत स्क्रोल कर चुके होते हैं. गूगल पर सर्च करते हुए फ़ेसबुक होते हुए इंस्टाग्राम तक पहुंच जाने में देर नहीं लगती. ऐसा करके हम अपने दिमाग़ को कन्फ़्यूज़ कर देते हैं. बहुत से लोगों की तो यह शिकायत है कि वे ऑनलाइन ब्राउज़िंग शुरू करने के बाद भूल जाते हैं कि आख़िर वे ब्राउज़िंग कर क्यों रहे हैं. हमें अपने ओरिजिनल टास्क पर लौटने के लिए अपने दिमाग़ को एकाग्राचित करने में काफ़ी समय लग जाता है. तो बेहतर होगा कि आप स्क्रीन टाइम पर लगाम लगाने की दिशा में सजग होकर प्रयास करें. आपको अपनी प्रोडक्टिविटी में बढ़ोतरी देखने मिलेगी.
8. यदि सही मायने में सोशल बनना चाहते हैं तो सोशल मीडिया को बाय-बाय कह दें
फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम और वॉट्सऐप जैसे प्लैटफ़ॉर्म्स हमें दूर-दराज़ के लोगों से जोड़ने में मदद करते हैं, लेकिन रिसचर्स की मानें तो हम सोशल मीडिया पर जितना समय बिताते हैं, उतना बुरा महसूस करते हैं. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हम वहां दोस्तों और रिश्तेदारों का केवल ख़ुशहाल वर्ज़न देखते हैं. हमें लगने लगता है कि हमारी ज़िंदगी कितनी दु‌खियारी है. यदि आप सही मायने में ख़ुश रहना चाहते हैं तो दोस्ती की ज़िंदगी का आकलन वर्चुअल वर्ल्ड से करने के बजाय असल ज़िंदगी से करें. सोशल मीडिया पर भी ऐसे लोगों को अनफ़ॉलो कर दें, जिनके पोस्ट्स देखकर आपको बुरा महसूस होता है. अनचाहे लोगों को ब्लॉक, म्यूट, अनफ़ॉलो, अनफ्रेंड या डिलीट करने में झिझकें नहीं. ऐसा करके आप न केवल अपना समय बचाएंगे, बल्कि सुकून भी कमाएंगे.
9. अपने शरीर की ओर ध्यान देना शुरू करें
ज़्यादातर शहरी लोगों का दिन में आधे से ज़्यादा समय स्क्रीन पर घूरते हुए बीतता है. इसका नतीजा हमारे शरीर को भुगतना पड़ता है. आंखों में खुजली, ड्रायनेस या दर्द के साथ-साथ सिरदर्द जैसी समस्याएं हमें बताती हैं कि आप शरीर के साथ ज़्यादती कर रहे हैं. इससे बचने के लिए 20-20 का रूल अपनाएं. यानी 20 मिनट तक स्क्रीन को देखने के बाद अगले 20 मिनट तक उसकी ओर देखें तक नहीं. फ़ोन पर टेक्स्ट पढ़ते समय उसे उठाकर आंखों की सीध में रखें, बजाय गर्दन झुकाकर पढ़ने के, इस तरह आप टेक्स्ट नेक से बच सकते हैं. फ़ोन से रेग्युलर ब्रेक लेकर टेक्स्ट नेक, स्मार्टफ़ोन थम्ब जैसी समस्याओं से दूर रह सकते हैं. फ़ोन से नियमित ब्रेक आपको शरीर का बेहतर ध्यान रखने में मदद करेगा.

नोट: अब इतना बड़ा लेख लिख मारा है तो मुझे ख़ुद भी इन सुझावों पर अमल करना शुरू करना पड़ेगा! वैसे इस लेख को लिखने के ‌लिए रॉ मटेरियल अपने स्मार्टफ़ोन पर स्क्रोल करते हुए जुटाया था.




क्या सेहत को मोटापे से जोड़कर देखना सही है?
अक्सर लोग सेहत को मोटापे से जोड़कर देखते हैं. पर क्या ये सही है? इस बात की पड़ताल कर रही है फ़ेमिना. 
‘मोटे लोग सेहतमंद हो सकते हैं’
डॉ अभय अग्रवाल, लेपरोस्कोपिक बैरिऐट्रिक सर्जन व मेडिकल डायरेक्टर, सेंटर फ़ॉर ओबीसिटी कंट्रोल, मुंबई
‘‘यह सोचना कि कोई मोटा है तो सेहतमंद नहीं है, बिल्कुल ग़लत है, क्योंकि यदि मोटे होने के बावजूद आप ऊर्जावान महसूस करते हैं, सारे काम आसानी से कर लेते हैं और आपको ब्लडप्रेशर या डायबिटीज़ की समस्या नहीं है तो आप सेहतमंद हैं. पर ये बात भी सही है कि हमें फ़िट रहने के लिए अपने वज़न को नियंत्रित रखना चाहिए. ऊंचाई के अनुसार आपका जितना वज़न होना चाहिए यदि आपका वज़न उससे 10% तक ज़्यादा या कम है तो भी आपको फ़िट माना जाता है. पर यदि वज़न इस सीमा से भी ज़्यादा हो गया है तो हर बढ़े हुए एक किलोग्राम वज़न के साथ ही डायबिटीज़ होने की संभावना 5-10 प्रतिशत तक बढ़ जाती है. किसी व्यक्ति की फ़िटनेस को आंकने के लिए बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई), बॉडी फ़ैट पर्सेंटेज (शरीर में वसा का प्रतिशत) और वेस्ट सरकम्फ्रेंस (कमर की परिधि) का आकलन किया जाता है और इसके लिए अब हम विदेशी मानकों पर निर्भर नहीं हैं. भारतीय मानकों के अनुसार महिलाओं का बॉडी फ़ैट पर्सेंटेज ३५ व पुरुषों का २२ से कम होना चाहिए. वहीं महिलाओं की वेस्ट सरकम्फ्रेंस 80 सेंटी मीटर व पुरुषों की 90 सेंटी मीटर से कम होनी चाहिए. दूसरी ओर आजकल युवाओं को लगता है कि यदि वे पतले हैं, आकर्षक नज़र आ रहे हैं तो स्वस्थ भी हैं. लेकिन यह बात बिल्कुल सही नहीं है. कई लोग अनुवांशिक रूप से पतले होते हैं तो कई लोग ऊंची चयापचय (मेटाबॉलिज़्म) की दर की वजह से, लेकिन कई लोग तनाव, सेहतमंद खाना न खाने, हाइपर थायरॉइड या डायबिटीज़ के चलते भी पतले हो जाते हैं. इन्हें भला कैसे सेहतमंद कहा जा सकता है?’’
‘मोटापा बीमारियों की संभावनाओं को बढ़ा देता है’

‘‘स्वास्थ्य से जुड़े कई शोधों से ये बात सामने आई है कि मोटापा कई बीमारियों की संभावनाओं को बढ़ा देता है, जिसे हम नकार नहीं सकते. पर इसका ये मतलब नहीं है सभी पतले लोग सेहतमंद हैं या फिर यदि कोई मोटा है तो वो सेहतमंद नहीं हो सकता. डायबिटीज़, ब्लडप्रेशर जैसी समस्याएं पतले लोगों को भी होती हैं और मोटे लोगों को भी. पर वज़न बढ़ने के साथ या यूं कहा जाए कि मोटापे के साथ-साथ डायबिटीज़ के होने की संभावना भी बढ़ती जाती है. इसी तरह जोड़ों में दर्द की समस्या पतले व मोटे दोनों ही लोगों को हो सकती है, पर यदि आपका वज़न ज़्यादा है तो आपकी हड्डियों पर अतिरिक्त भार पड़ेगा और ये ज़्यादा दर्द का कारण बन सकता है. अत: सेहतमंद रहने के लिए सही जीवनशैली अपनाना और सेहत से जुड़े हर पहलू पर ध्यान देना ज़रूरी है.
‘‘यदि भारतीय महिलाओं के संबंध में बात करूं तो पश्चिमी देशों की तुलना में भारतीय महिलाओं की ऊंचाई कम होती है और उनकी तुलना में वे हमेशा ही थोड़ी मोटी नज़र आती हैं. सदियों से उनका फ़िगर ऐसा ही रहा है, पर वे हमेशा से ही चुस्ती-फुर्ती से घर-बाहर के काम करती रही हैं. ये बताने का मक़सद ये है कि यदि आप सेहत के मानदंडों से थोड़ी मोटी हैं या फिर आपका वज़न थोड़ा ज़्यादा है, लेकिन फिर भी अपने सभी काम बिना थके मुस्तैदी से कर लेती हैं तो आप सेहतमंद हैं. फिर भी ये ज़रूरी है कि अपने वज़न पर नियंत्रण रखा जाए, क्योंकि जहां मोटापे की वजह से कई बीमारियों के होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं, वहीं बढ़े हुए वज़न के चलते कुछ बीमारियों में आपको ज़्यादा तकलीफ़ उठानी पड़ सकती है.’’


महिलाएं सोरायसिस को न करें इग्नोर, क्योंकि...
शरीर पर जगह-जगह लाल धब्बे या पैचेज़ बन जाना और उनमें खुजली होना यानी सोरायसिस लंबे समय तक बने रहनेवाला एक ऑटोइम्यून डिज़ीज़ है. यह शरीर के कुछ हिस्सों या किसी-किसी मामले में ज़्यादातर हिस्सों को प्रभावित कर सकता है. हालांकि इसकी सबसे अच्छी बात यह है कि यह संसर्गजन्य यानी छुआछूत से फैलनेवाला रोग नहीं है, पर इससे त्वचा इतनी ख़राब दिखने लगती है कि व्यक्ति का आत्मविश्वास कहीं खो सा जाता है.
क्लीयर अबाउट सोरायसिस एक वैश्विक सर्वेक्षण से पता चला कि भारत में 66% लोगों को अपनी त्वचा के कारण भेदभाव और अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ता है. वहीं यदि सोरायसिस से पीड़ित महिला हो तो उसका जीवन और भी मुश्क़िल हो जाता है. त्वचा की यह समस्या आपके आत्मविश्वास पर हमला करती है और आपके सामाजिक जीवन को तहस-नहस कर सकती है. इस समस्या के विभिन्न पहलुओं पर जानकारी दे रही हैं डॉ शेनाज़ आरसीवाला, स्किन स्पेशलिस्ट, सैफ़ी हॉस्पिटल और प्रिंस अली ख़ान हॉस्पिटल, मुंबई और मेडिकल डायरेक्टर, रीन्यूडर्म सेंटर स्किन हेयर लेज़र्स ऐंड एस्थेटिक्स, मुंबई.
डॉ आरसीवाला के मुताबिक़ आमतौर पर महिलाएं शुरुआत में सोरायसिस के लक्षणों को त्वचा की आम समस्या समझकर क्रीम और मॉइस्चराइज़र का उपयोग करती हैं. अधिकांश महिलाएं सामाजिक भेदभाव, शर्म और विरक्ति के भय से इसके बारे में बात करने से हिचकिचाती हैं. इस समस्या का इलाज तभी संभव है, जब इसकी पहचान कर ली जाए. आइए, समझते हैं क्या है सोरायसिस और इससे कैसे बचा जा सकता है.
क्या है सोरायसिस?
सोरायसिस में प्रतिरोधक तंत्र ग़लती से त्वचा की स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला शुरू कर देता है, त्वचा की कोशिकाओं की उत्पत्ति को बढ़ा देता है और त्वचा की मृत कोशिकाएं तेज़ीक से त्वचा की सतह पर आ जाती हैं. इससे त्वचा पर उभरे, पपड़ीदार, खुजली वाले, शुष्क और लाल चकत्ते हो जाते हैं, जिनकी परत चमकदार होती है, यह आमतौर पर सिर, कोहनी, घुटने, कमर, हाथ, पैर, नाखून, जननांग और त्वचा की सिलवट पर होते हैं.
अभी तक सोरायसिस होने का सही-सही कारण ज्ञात नहीं है, लेकिन आमतौर पर माना जाता है कि अनुवांशिक कारक, तनाव, त्वचा की चोट और ख़राब प्रतिरोधक तंत्र इसके कारण हैं. क्षतिग्रस्त त्वचा के एरिया के आधार पर सोरायसिस की तीन अवस्थाएं होती हैं. शरीर के 3 प्रतिशत से कम भाग पर मौजूद सोरायसिस को हल्का माना जाता है और शरीर के 3 प्रतिशत से 10 प्रतिशत भाग पर मौजूद सोरायसिस को मध्यम माना जाता है, जबकि 10 प्रतिशत से अधिक भाग प्रभावित होने पर इसे गंभीर माना जाता है.

कैसे पहचानें सोरायसिस के लक्षण?
अबनॉर्मल सेल ग्रोथ वाली त्वचा समस्या सो‌रायसिस के साथ सबसे बड़ी दिक़्क़त यह है कि समय-समय पर इसके लक्षण आते-जाते रहते हैं. अलग-अलग व्यक्तियों में इसके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं. फिर भी इसके कुछ आम लक्षण ये हैं...
* फटी हुई या रूखी-सूखी त्वचा
* क्रैक्स से ख़ून निकलना
* स्किन पर लगातार खुजली होना
* जोड़ों में सूजन और दर्द
* त्वचा पपड़ीदार होना या लाल-लाल चकत्ते बनना

क्या होता है इसका प्रभाव?
सोरायसिस का व्यक्ति पर मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक तथा आर्थिक दुष्प्रभाव होता है. एक शोध के अनुसार, पुरुषों की तुलना में महिलाओं को सोरायसिस के भावनात्मक और सामाजिक प्रभावों से अधिक जूझना पड़ता है. रिपोर्ट्स की मानें तो सोरायसिस लगभग 20 प्रतिशत महिलाओं के जीवन को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है, जबकि पुरुषों में केवल बारह प्रतिशत के साथ ही ऐसा होता है.
आत्मविश्वास की कमी और परिवार तथा मित्रों के सहयोग की अनुपस्थिति के कारण कई महिलाएं मान लेती हैं, कि अब उनकी त्वचा कभी अच्छी नहीं हो सकती. भारत में कई महिलाओं की सही जांच नहीं हो पाती है, जिसके चलते सही उपचार और देखभाल से वंचित रह जाती हैं.
इसके दूसरे प्रभावों में देखें तो सोरायसिस के चलते आर्टरीज़ यानी धमनियों में कैल्शियम का जमाव होने लगता है. जिससे हृदय रोगों का भी ख़तरा बढ़ जाता है. कुछ शोधों में डायबिटीज़ और सोरायसिस के बीच संबंध होने की बात जाती रही है.


करें जीवनशैली में ये 5 बदलाव
सोरायसिस के रोगियों के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि इस रोग के उपचार की गंभीरता अलग-अलग लोगों में भिन्न-भिन्न होती है, उसी अनुसार सभी का इलाज भी अलग-अलग होता है. चिकित्सा क्षेत्र में प्रगति और पहुंच के कारण भारत में सर्वश्रेष्ठ उपचार उपलब्ध हैं. ऐसी महिलाओं को सलाह है कि वे विश्वसनीय त्वचा रोग विशेषज्ञों से परामर्श लें, जो उन्हें इस रोग का प्रभावी उपचार प्रदान कर सकते हैं. साथ ही आप अपनी जीवनशैली में ये छोटे-छोटे बदलाव लाकर मनचाहा नतीजा पा सकती हैं.
1. तनाव और चिंता को रखें दूर: तनाव से दूर रहने की कोशिश करें, क्योंकि इससे सोरायसिस बढ़ सकता है. शांत और संयमित रहने के लिए सांसों के व्यायाम, योग और ध्यान करें. चूंकि सोरायसिस के रोगियों को डिप्रेशन में जाने का जोखिम रहता है, इसलिए उन्हें अपने मेंटल हेल्थ पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए.
2. स्मोकिंग और शराब से करें तौबा: स्मोक करने से सोरायसिस होने की संभावना दोगुनी हो जाती है. स्मोकिंग की तरह ही शराब पीने से भी प्रतिरोधक तंत्र प्रभावित होता है. सोरायसिस के रोगियों को स्मोकिंग और ड्रिंकिंग से तौबा कर लेनी चाहिए.
3. त्वचा की साफ़-सफ़ाई है ज़रूरी: यदि आपको सोरायसिस है तो त्वचा की साफ़-सफ़ाई पर ख़ास ध्यान दें. रोज़ नहाएं, पर हां ध्यान रखें बहुत गर्म पानी से स्नान न करें, क्योंकि इससे त्वचा शुष्क हो सकती है, गुनगुने पानी का उपयोग करें. नहाने के बाद शरीर को टॉवेल से धीरे-धीरे पोछें. बेबी सोप का इस्तेमाल करें. लूफ़ा या एक्सफ़ोलिएशन से बचें, क्योंकि इससे त्वचा के टिशूज़ क्षतिग्रस्त हो सकते हैं. नहाने के बाद मॉइस्चराइज़ करें और अपनी त्वचा को पूरे दिन मॉइस्चराइज़्ड रखें.
4. सेहतमंद खाएं और ऐक्टिव रहें: ख़ूब सारी ताज़ी सब्ज़ियों और फलों वाला पोषक आहार लें. तेलयुक्त और जंक फूड से बचें. सोरायसिस के रोगियों को अपनी दैनिक चर्या में नियमित व्यायाम भी शामिल करना चाहिए. घूमने, योग और डांस आदि से सक्रिय रहने में मदद मिलती है और सकारात्मक विचार आते हैं.
5. ख़ूब सारा पानी पिएं: कम पानी पीने से ‌डीहाइड्रेशन हो सकता है, जिसके चलते आपकी त्वचा रूखी-सूखी हो सकती है. इससे आपके शरीर में टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं. सोरायसिस होने पर लोशन आदि तो केवल बाहरी त्वचा को मॉइस्चराइज़ रखते हैं. अंदर से हाइड्रेटेड रहने के लिए पानी पीना बहुत ज़रूरी है. यह सुनिश्चित करें कि आप रोज़ाना कम से कम 8 से 10 ग्लास पानी ज़रूर पिएं.

ख़ूब सारी ताज़ी सबिज़यों और फलों वाला पोषक आहार लें. तेलयुक्त और जंक फूड से बचें. सोरायसिस के रोगियों को अपनी दैनिक चर्या में नियमित व्यायाम भी शामिल करना चाहिए. घूमने, योग और नृत्य से सक्रिय रहने में मदद मिलती है और सकारात्मक विचार आते हैं.



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