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कमर का दर्द


कमर का दर्द –
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बढ़ती उम्र के साथ कमर में दर्द एक आम बात होती है लेकिन आज के दौर में यह समस्या हर उम्र के लोगों में घर बनाती जा रही है. मसलन बच्चे, युवा भी आज इस रोग से बुरी तरह जूझ रहे हैं. यह समस्या हो जाने पर पर चलना तो दूर हिलने डुलने में दिक्कते आती हैं. योग सहित चिकित्सा के कुछ साधन कमर दर्द में राहत पहुंचाने का काम करते हैं।

कमर दर्द का कारण
बदलते मौसम की वजह से कमरदर्द
कमर दर्द के लक्षण
पुरुषों में कमर दर्द
महिलाओं में कमर दर्द
कमर दर्द होने के पहले रोकथाम
कमर दर्द होने के बाद रोकथाम
एलोपैथ से कमर दर्द का इलाज़
यूनानी से कमर दर्द का इलाज़
आयुर्वेद से कमर दर्द का इलाज़ं
होम्योपैथ से कमर दर्द का इलाज़
कमर दर्द होने पर क्या करें क्या ना करें

कमर दर्द का कारण

एक सर्वे के मुताबिक़ देश के करीब 15 फ़ीसदी लोग किसी ना किसी समस्या के चलते कमर दर्द से परेशान हैं. इस तरह की समस्या के कई कारण हो सकते हैं.
अनियमित दिनचर्या से भी कमर में दर्द होने की संभावना बनी रहती है
ज्यादा देर एक जगह बैठकर काम करने से भी इस समस्या का होना आम बात है.
मोटापा इस तरह की समस्या का बड़ा कारण माना जाता है
हार्मोनल परिवर्तन भी कमर दर्द का कारण बन जाता है
पुरानी चोट भी इस तरह की समस्याओं को जन्म देती है
वात कफ और पित्त जैसी समस्याएं भी इसका कारण बन जाती है
किडनी रोग या आन्तरिक समस्याओं के चलते कमर दर्द हो सकता है
शरीर में यूरिक एसिड बढ़ जाने से यह समस्या हो सकती है

बदलते मौसम की वजह से कमरदर्द

सर्दियों के शुरू होते ही बूढ़े बुजुर्गों में कमर दर्द की समस्या होना शुरू हो जाती है. इसके अलावा युवा वर्ग भी इस मर्ज़ से नही बच पाता. सर्दियों में होने वाली कमरदर्द की सबसे बड़ी वजह होती है मांशपेशियों में संकुचन की वजह से यह समस्या बन जाती है. बायुमंद्लीय दबाव और अत्यधिक नमी के चलते नसों का संकुचन कमर में सूजन लाता है. इसके अलावा बारिश के महीनों में तेज हवा के चलते कमोवेश पुरवाई हवा के चलते पुरानी चोट का उभरना आम बात है. यदि कभी आपकी कमर में मोच या चोट लगी होती है तो इस मौसम में दर्द का बढ़ना स्वाभाविक हो जाता है.

कमर दर्द के लक्षण

कमर रीढ़ की हड्डियों पर टिकी होती है. रीढ़ की हड्डियों में दो डिस्क होती है जो शरीर के झटकों को सहन करती है.
कमर दर्द होने के दौरान रीढ़ की हड्डियों में संकुचन महसूस होता है
कमर के आसपास सूजन महसूस हो सकती है
कमर के आसपास नशों हड्डियों में पीड़ा का अनुभव होता है
कभी कभी दर्द कमर से होकर पैर तक पहुँच जाता है
इस रोग में वजन भी घटना शुरू हो सकता है
पेशाब में जलन पीड़ा या मल त्याग में परेशानी हो सकती है
नितम्बों में सुन्नता आ जाना या फिर बुखार का भी अनुभव हो सकता है

पुरुषों में कमर दर्द


पुरुषों में बढ़ता वजन कमर या पीठ दर्द का बड़ा कारण माना जाता है. शरीर के मध्य भाग में भारीपन से रीढ़ की हड्डियाँ कमजोर पड़ना शुरू हो जाती हैं. अर्थराइटिस ऐसा रोग है जो बुढ़ापे में एक आम रोग बनता जा रहा है लेकिन अब युवा पीढ़ी भी इसकी जद में आ चुकी है. एक सर्वे के मुताबिक़ धूम्रपान और अल्कोहोलिक पुरुष इसकी चपेट में ज्यादा आते हैं. किडनियों में यूरिक एसिड की मात्रा का जम जाना भी इस तरह के रोग का बड़ा कारण माना जाता है. इसके अलावा पुरानी चोट भी कभी कभार उभरकर सामने आ जाती है जिसके चलते यह समस्या हो जाती है

हमारे डॉक्टर से सलाह लें

महिलाओं में कमर दर्द


पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा कोमल होती हैं. कुछ आंतरिक संरचना के चलते महिलाएं पुरुषों से भिन्न होती हैं. गर्भावस्था के दौरान कमर दर्द एक आम समस्या है. एक सर्वे के मुताबिक़ 20 से 50 साल की उम्र में करोड़ों लोग इस समस्या का शिकार हो जाते हैं.

अधिकतर महिलायें श्वेतप्रदर-रक्तप्रदर जैसी बीमारी से परेशान रहती हैं। खान-पान, रहन-सहन तथा सामाजिक वातावरण के दुष्प्रभावों के कारण इन बीमारियों से ग्रस्त होकर नवयुवतियां धीरे-धीरे शारीरिक शक्ति खोने लगती हैं. इसके चलते कमर में दर्द का होना एक समस्या बन जाती है. महिलाओं में हार्मोनल असंतुलन एक बड़ी समस्या होती है जिसके चलते उन्हें यह कष्ट ज्यादा सहना पड़ता है.

आमतौर पर 12 साल यानि पीरियड के दौरान से लेकर करीब 50 साल की उम्र वाली महिलाओं को कमर दर्द सहन करना पड़ता है जबकि इसके बाद की उम्र वाली महिलाओं में अर्थराइटिस जैसे रोगों के लक्षण देखे जाते हैं.

कमर दर्द होने के पहले रोकथाम

कमर हमारी शारीरिक संरचना का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा होता है. उठने बैठने से लेकर चलने फिरने तक में इसका बड़ा योगदान होता है. इसमें दर्द ना हो इसके लिए कुछ टिप्स अपनाने महत्वपूर्ण होते हैं
अनियमित दिनचर्या से बचने की जरूरत होती है
किसी भी कुर्सी पर बैठकर लगातार काम करने से बचें
महिलाएं गर्भावस्था के दौरान विशेष ख़याल रखें
नियमित दिनचर्या अपनाएं
खानपान की गुणवत्ता बनाएं रखें
योगा और व्यायाम नियमित रूप से करें
आहार में प्रोटीन और विटामिन्स को प्रचुरता से शामिल करें
अल्कोहल या धूम्रपान से बचें

कमर दर्द होने के बाद रोकथाम

कमर में दर्द चाहे जिस वजह से हो जब यह पीड़ा देता तो बहुत दुखदाई हो जाता है. यदि आपकी कमर में दर्द शुरू हो गया है तो इससे बचने के लिए कई तरह के तरीके मौजूद हैं. आधुनिक दौर में चिकित्सा विज्ञान ने नए आयाम स्थापित किए हैं जिसके चलते कई तरह की चिकित्सा पद्धतियाँ मौजूद हैं. मसलन एलोपैथ, आयुर्वेद, यूनानी और होम्योपैथ.

एलोपैथ से कमर दर्द का इलाज़

एलोपैथ एक ऐसी चिकित्सा व्यवस्था है जिसके चलते इंसान को दर्द में फौरी राहत मिल जाती है. चोट लगने के चलते हो रहे कमर दर्द में कई तरह के दर्द नाशक क्रीम और स्प्रे बाजार में आसानी से मिल जाते हैं. इसके अलावा इस रोग में दर्दनिवारक दवाओं के अलावा एंटीबायोटिक का भी इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि दर्द में इस विधा से कुछ समय के लिए आराम मिल जाता है लेकिन बाद में दवाओं के दुष्परिणाम या साइड इफेक्ट शरीर पर बुरा असर डालते हैं.

यूनानी से कमर दर्द का इलाज़

यूनानी दवाएं कमर दर्द में सबसे ज्यादा असरदार होती हैं. इस चिकित्सा से करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य लाभ मिलता है यह बात कई शोध में कही गई है. कमर दर्द के लिए यूनानी में कई पद्धतियाँ इजाद की गई हैं मसलन डाइटोथेरेपी, फार्माकोथेरेपी और रेजिमेंटल थेरेपी प्रमुख हैं हालांकि इस विधा से इलाज़ के दौरान खानपान में कई तरह के परहेज भी करना पड़ता है.

आयुर्वेद से कमर दर्द का इलाज़

सदियों से हमारा देश आयुर्वेद का बड़ा ज्ञाता रहा है. वेदों पुराणों में आयुर्वेद की कई तकनीक आज भी मरीजों का समूल इलाज़ करने का दावा करती है. कमर दर्द में अश्वगंधा, शिलाजीत, नारियल तेल और अरंडी सहित दशमूल जैसी औषधियां बिना किसी साइड इफ्फेक्ट के राहत पहुंचाती हैं.

होम्योपैथ से कमर दर्द का इलाज़

ऐसा माना जाता है कि होम्योपैथ की दवाएं शरीर में मौजूद कई तरह के साइड इफेक्ट ख़त्म कर देती हैं. मसलन कमर दर्द चाहे जिस वजह से हो रहा हो इस विधा में कई तरह की दवाइयां मौजूद होती हैं. मसलन अर्निका क्रीम या केलनडुला ऑफिसिनसीड जैसी दवाइयों से कमर दर्द का उपचार किया जाता है. दवाओं का इस्तेमाल करने से पहले चिकित्सक की सलाह लेना महत्वपूर्ण होता है.

कमर दर्द होने पर क्या करें क्या ना करें

कमर या पीठ का दर्द होने पर कुछ बातों का ख़ास ख्याल रखना पड़ता है.
भोजन में वसा का कम से कम प्रयोग करें
दैनिक आहार में दूध फल और हरे पत्तेदार साग सब्जियों का सेवन करें
अंकुरित बीजों का सेवन करें
अल्कोहल को एकदम से ना कहें
धूम्रपान से बचें
ज्यादा मात्रा में पानी पीयें
दिनचर्या में सुधार करें/ नियमित करें
ज्यादा शारीरिक श्रम से बचें
नियमित योगा और व्यायाम करें
खाने के बाद कुछ दूर पैदल चलें
एक जगह बैठकर काम करने से बचें
किसी बी एक जगह ज्यादा देर तक खड़े ना हों
खट्टे और ज्यादा मीठे पदार्थों को खाने से बचें



एलोपैथिक दवाओं का पीठ के दर्द में होता है बेहद व्यापक असर



पीठ का दर्द एलोपैथिक दवा वास्तव में एक ऐसी आधुनिक औषधि है जो दर्द के दौरान तुरंत राहत तो देती ही है बल्कि काफी समय तक ऐसी समस्या का समाधान भी करती है। पीठ की समस्या से जूझ रहे लोग फौरी राहत के लिए जिस दवा का इस्तेमाल करते हैं उसी का नाम एलोपैथी है। इस तरह की दवाएं दर्द से राहत तो दिलाती ही हैं लेकिन बिना चिकित्सक की सलाह के ऐसी दवाएं शरीर को भारी नुकसान पहुंचा सकती है। पीठ शरीर का ऐसा हिस्सा है जो सीधे तौर पर कई लेयर हड्डियों का ऐसा ढांचा होता है जिसकी संरचना बेहद जटिल होती है। इससे जुड़ी हड्डियां आपस में ऐसा चेन बनाती हैं जो आपस में हृदय से लेकर फेफड़ों को सीधे तौर पर जोड़ती है।

सामान्य परिस्थितियों में होने वाला दर्द लापरवाही के चलते बड़े रोग में तब्दील हो ही जाता है। एक अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन द्वारा इस तरह की मर्ज की सबसे बड़ी खान पान और जीवनशैली को माना जाता है। भोजन में विसंगति के चलते शरीर में यूरिया की मात्रा के साथ ही हड्डियों को नुकसान पहुंचाने वाले अवशिष्ट पदार्थ जमना शुरू हो जाते हैं। वैसे तो दुनिया भर में इलाज की तमाम व्यवस्थाएं मौजूद हैं लेकिन आधुनिक उपचार की ऐलोपैथी दवा दर्द में तुरन्त राहत देने के साथ लंबे समय तक कारगर होती है। इस लेख से हम इस बात पर प्रकाश डालेंगे कि किस तरह से ऐसी दवाएं पीठ के दर्द में राहत देती हैं और इससे जुड़ी प्रमुख जटिलताओं पर भी चर्चा करेंगे।

पीठ दर्द से संबंधित प्रमुख जटिलताएं

किसी भी जगह ज्यादा देर तक बैठकर काम करने की आदत हो या दफ्तरों में काम को निपटाने में लोग अपनी दिनचर्या में इस तरह मशगूल हो चुके हैं कि पता ही नही चलता कि जीवनशैली किस तरफ जा रही है। जीवन में तनाव के चलते नींद ना पूरी होने की वजह से हड्डियों का कमजोर होना स्वाभाविक है। खान पान के सटीक प्रयोग ना करने से हड्डियां कमजोर होने लगती हैं। काफी देर तक एक करवट के साथ सोने से भी हड्डियों पर दबाव पड़ने से प्लेट या लिगामेंट कठोर होने लगता है और उनमें सूजन आने लगती है। इस तरह से चोट या मांसपेशियों में या फिर नर्म ऊतकों की क्षति के साथ ही जोड़ों में मौजूद फ्लूड की कमी होने लगती है।

भोजन में दोष की वजह से हड्डियों में यूरिक एसिड की अधिकता होने से संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा पीठ का दर्द फेफड़ों के संक्रमण की सबसे बड़ी वजह बनता है। सीने में कफ जमने से सीने की हड्डियां संक्रमण का शिकार हो जाती हैं। हल्के दर्द के दौरान गफलत बरतने पर अक्सर ट्यूबरक्लोसिस जैसी बीमारी से पीठ की समस्या काफी बढ़ जाती है। एक सर्वे के मुताबिक दुनिया में हर साल ट्यूबरक्लोसिस जैसी जटिल समस्या से करोड़ों लोग प्रभावित होते हैं। बढ़ता प्रदूषण इस तरह की बीमारी की सबसे बड़ी वजह माना जाता है।
पीठ का दर्द एलोपैथी दवा के फायदे

पीठ का दर्द एलोपैथी दवा वास्तव में एक ऐसी औषधि है जो शरीर पर तुरंत राहत देने का काम करता है। चिकित्सक इस प्रकार की दवाओं का इस्तेमाल मरीज की मौजूदा स्थिति के हिसाब से तय करता है। यदि सामान्य स्थिति के चलते दर्द हो रहा होता है तब चिकित्सक सामान्य पेनकिलर के साथ मरीज को हल्की एक्सरसाइज की सलाह देते हैं। इस तरह के उपायों से मरीज को आराम मिलता है। यदि इस तरह की दवा हल्का चोट या मोच जैसी दर्द को सही ना करने का कारण बनती है तब चिकित्सक एक्सरे से लेकर कई तरह के बायोस्कोपी की सलाह देते हैं। इसके साथ ही खून के कुछ नमूनों के साथ जांच के लिए कहा जाता है। खून की जांच में आये रिपोर्ट के साथ ही चिकित्सक दवा आरम्भ करता है। हालांकि मर्ज किस तरह जी है इस बात को जानने के साथ ही डॉक्टर कई तरह के एन्टी ऑक्सीडेंट के साथ एलर्जी को दूर करने वाली दवाओं के सेवन की साल देते हैं। इसके अलावा कफ और वात रोगों को दूर कर पीठ के दर्द को समाप्त करने के लिए कुछ सीरप के इस्तेमाल की भी सलाह दी जाती है।

इसके साथ मैरेज को कई सप्ताह तक लगातार दवाओं के सेवन की सलाह दी जाती है। यदि मरीज का पीठ ट्यूबरक्लोसिस की वजह से दर्द से कराह रहा हो तब चिकित्सक डॉट जैसी आधुनिक प्रणाली की दवाओं की सलाह देते हैं। हालांकि इस तरह के उपचार माध्यम काफी लंबे वक्त तक चलाये जाते हैं। जब दवा से मरीज को पीठ की समस्या से राहत नही मिलती तब आखिरी विकल्प शल्य चिकित्सा की बचती है। हालांकि यह प्रक्रिया काफी जटिल और कष्टकारी होती है लेकिन उपचार के बाद मरीज लंबे समय तक स्वास्थ्य लाभ उठा सकता है। इसके साथ ही कुछ परिस्थितियों में मरीज को पूरी जिंदगी दवाओं पर निर्भर रहना पड़ता है।
पीठ का दर्द एलोपैथी दवा सम्बंधित जरूरी सलाह/ सुझाव

एलोपैथी एक ऐसी चिकित्सा व्यवस्था है जो तेज दर्द के समय तुरंत राहत देकर सकून देती है। या दुनिया की सर्वमान्य दवा मानी जाती है। इस चिकित्सा सेवा की अपनी कुछ दुश्वारियां भी होती हैं। एलोपैथिक दवाओं का ओवर डोज़ बेहद खतरनाक होता है। इस स्थिति में इंसान का जीवन खतरे में पड़ जाता है। इसके अलावा इसकी मात्रा का सेवन कम करने पर दवा शरीर पर असर नही करती। ज्यादा मात्रा में पेनकिलर या फिर एन्टी बायोटिक दवाओं के सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटने लगती है। जब भी एलोपैथी चिकित्सा विधा की दवाओं का इस्तेमाल करें, पंजीकृत चिकित्सक की सलाह जरूर ले लें।



हर बार सामान्य नहीं होता पीठ का दर्द, यूनानी दवा से इलाज हो सकता है बेहद कारगर



पीठ का दर्द यूनानी दवा वाकई हड्डियों के दर्द में बेहद लाभदायक होते हैं। वैसे तो पीठ में इस तरह के दर्द बेहद सामान्य होते हैं जो हल्की चोट या दबाव के बाद आरम्भ हो सकते हैं। ज्यादा देर तक झुककर बैठने की आदत या फिर झुककर खड़े होने की लत पीठ में रक्त संचार कम कर दर्द का कारण बन सकती है। हालांकि ऐसी परिस्थितियों में हल्का मसाज त आदत में सुधार के साथ ही दर्द में राहत प्राप्त हो जाती है। सामान्य स्थिति वाले दर्द समय पर उपचार के बाद ठीक होने लगते हैं लेकिन अक्सर इस तरह के दर्द की अनदेखी करना भारी पड़ सकता है। पीठ की संरचना ऐसी होती है जो हड्डियों के अलग- अलग कण्डरा या पिंडलियों से आपस में जुड़ी होती है। रीढ़ की हड्डी में मौजूद प्लेट में किसी भी वजह से आई विषमता से भी ऐसी समस्या उत्पन्न होने लगता है।

पीठ पर भारी वजन उठाने या फिर लगातार बोझ ढोने वाले लोगों में यह समस्या बेहद आम रूप धारण नर लेती है। दुनिया में वैसे तो कई उपचार माध्यमों से इस तरह के दर्द का इलाज किया जाता है लेकिन हर्बल पर आधारित यूनानी दवा के पीठ दर्द में क्या फायदे होते है, और इसकी जटिलताएं क्या होती हैं इस बात की चर्चा आवश्यक है। इस लेख के माध्यम से हम कुछ ऐसे बिंदुओं पर चर्चा करने वाले हैं।

पीठ के दर्द से संबंधित जटिलताएं

शरीर हड्डियों का ऐसा जाल होता है जिसके बिना शरीर की संरचना का निर्माण की कल्पना भी बेमानी होती है। पीठ शरीर का ऐसा भाग होता है जिसकी संरचना में सीने की हड्डियों का अहम रोल होता है। पीठ की पिंडलियों का सीधा संबंध हृदय और फेफड़ों के अलावा रीढ़ की हड्डी जुड़ा होता है। रीढ़ की हड्डी में किसी भी वजह से लगी चोट पीठ दर्द की वजह बन जाती है। हड्डियों की मांसपेशियों में चोट या लिगामेंट में सूजन के चलते जोड़ों में मौजूद ऊतकों में खिंचाव का अहसास होता है। पीठ की समस्या के चलते इंसान की जीवनशैली काफी प्रभावित होती है। कई बार चोट लगने के कुछ दिन बाद दर्द का उभार होता है। इस तरह के दर्द कई रूपों में अलग- अलग रोगों की वजह बन सकते हैं। पीठ की समस्या वैसे तो कई रोगों का जनक होती है लेकिन ट्यूबरक्लोसिस या गांठ का बनना बेहद खतरनाक स्थिति होती है। इस तरह के मर्ज में इलाज काफी लंबा चलता है। रोग की मौजूदा स्थिति पर यह बात ज्यादा लागू होती है।
पीठ का दर्द यूनानी दवा के लाभ

पीठ का दर्द यूनानी दवा वास्तव में बेहद लाभ वाली चिकित्सा मानी जाती है। यूनानी हड्डियों के रोगों को जड़ से समाप्त करने की कूबत रखती है यह कहना कतई गलत नही होगा। वैसे यह बात कई स्वास्थ्य शोधों में सिद्ध हो चुकी है। यूनानी एक ऐसी हर्बल आधारित चिकित्सा व्यवस्था है जिसके दुष्परिणाम ना के बराबर होते हैं। पीठ में दर्द के दौरान चिकित्सक इंसान की मर्ज के लिहाज से इलाज या उपचार करना आरम्भ करता है। इलाज के दौरान उम्र का भी ख्याल रखा जाता है। यदि दर्द हल्की चोट या मोच की वजह से है तब मेथी दाना से बनाते पेस्ट को लगाने जी सलाह दी जा सकती है। इसके अलावा भी कुछ हर्बल आधारित कैप्सूल या टेबलेट के साथ तेल मालिश की सलाह दी जाती है। आम तौर पर एक या दो सप्ताह इलाज के बाद दर्द में लाभ मिलना शुरू होने लगता है। यदि दर्द बढ़ती उम्र के लिहाज से हो रहा हो तब हकीम शरीर में कैल्शियम की मात्रा बढ़ाने वाली दवाओं के सेवन की सलाह देते हैं। बढ़ती उम्र के साथ हड्डियों का कठोर होना स्वाभाविक होता ही है बल्कि उम्र के साथ हड्डियों में कैल्शियम की जरूरी आपूर्ति बाधित हो जाती है। इसके अलावा सबसे जटिल रोग कफ जमने या फिर ट्यूबरक्लोसिस जैसे रोगों में होती है।

इस रोग से हड्डियों की मांसपेशियों में मौजूद नर्म ऊतकों और फ्लूड को कीड़े या बैक्टीरिया खाना या चाटना शुरू कर देते हैं। यदि समय से यूनानी चिकित्सा की दवाएं इस तरह के रोगियों पर आजमाई जाएं तो उपचार काफी आसान हो जाता है। यूनानी दवाओं का असर शरीर पर तभी होता है जब दवा के साथ बताये गए परहेजों को अमल में लाया जाए। अधिक खट्टे या तीखे लाल मिर्च जैसे खाद्य पदार्थ हड्डियों के लिए दुश्मन का काम करते हैं। हड्डियों में मौजूद यूरिक एसिड से जमाव पैदा कर रहे निकिल जैसे तत्वों को बाहर निकालने के लिए यूनानी दवाएं काफी असरदार होती हैं। गठिया या फिर अर्थराइटिस जैसी जटिल परिस्थितियों में कई तरह की हर्बल यूनानी दवायें उपयोग के लिए मरीज को दी जाती हैं। यूनानी दवाएं वास्तव में लाभ तो पहुंचाती हैं लेकिन तेज दर्द के दौरान ऐसी दवाओं का असर शरीर पर ना के बराबर होता है।
पीठ का यूनानी दवा संबंधित जरूरी सलाह/ सुझाव

पीठ का दर्द यूनानी दवा वास्तव में लाभदायक होती है लेकिन इसके साथ परहेज बेहद आवश्यक है। यदि मरीज को समय से स्वस्थ होना है तो परहेज आवश्यक होता है। इसके अलावा चिकित्सक की सलाह के बगैर किसी भी तरह की दवा का सेवन शरीर को बेहद नुकसान पहुंचा सकता है इस तरह की दवाओं के साथ अन्य विधा की दवाओं का सेवन सही नही होता। ऐसी स्थिति में चिकित्सक की सलाह पर दवाओं का सेवन करें। दो विधा की दवाएं आपस में अभिक्रिया कर सकती हैं जिसकी वजह से रोगी की जान तक जाने का खतरा बन जाता है।



होम्योपैथी चिकित्सा दिला सकती है पीठ के दर्द में स्थाई समाधान!



एक सर्वे बताता है कि पीठ का दर्द होम्योपैथी दवा वास्तव में काफी कारगर साबित हो रही है। यह जरूरी नही कि ऐसी समस्या के पीछे हर बार किसी बड़े रोग की ही वजह हो। पीठ पर ज्यादा वजनी या गलत आकार का बैग लादकर घंटों पैदल चलने की आदत से भी ऐसी समस्या होने के चांस बढ़ जाते हैं। ज्यादा देर तक एक जगह उकडू बैठने या फिर देर तक करवट लेकर लेटने से भी पीठ में समस्या होना शुरू हो जाता है। पीठ की कण्डरा में सूजन या फिर प्लेटों के नर्म ऊतकों में संक्रमण होने से भी दर्द बढ़ जाता है। हालांकि कई ऐसी चिकित्सकीय परिस्थितियों से लोगों का सामना होता है जिनसे कई बार लोग अनजान रहते हैं। एक स्वास्थ्य सर्वे की मानें तो खान पान के दोष के चलते करीब 90 फीसदी इस तरह के मरीज रोगों का शिकार होते हैं। इसके अलावा नींद कम लेने वाले लोग भी अवसाद का शिकार होकर दर्द का शिकार हो जाते हैं। दुनिया में उपचार की कई पद्धतियां मौजूद हैं लेकिन होम्योपैथी की तरफ लोगों का रुझान बढ़ा है। इस लेख को लिखने का मुख्य मकसद इस बात पर प्रकाश डालने का है कि किस तरह से यह जर्मन तकनीक पीठ के दर्द में राहत पहुंचाती है, और इस तरह की मर्ज की मुख्य जटिलता क्या है इस बात पर भी फोकस करेंगें।

पीठ का दर्द संबंधित प्रमुख जटिलताएं

पीठ शरीर का ऐसा हिस्सा है जिसकी संरचना हड्डियों के जाल की तरह होती है। इसका सीधा संबंध हृदय सीना, और फेफड़ों के अलावा रीढ़ की हड्डी से होता है। रीढ़ की हड्डी में किसी भी वजह से लगी चोट पीठ दर्द का कारण बन जाती है। कण्डरा में चोट या लिगामेंट में सूजन के चलते हड्डियों में मौजूद मांसपेशियों में खिंचाव महसूस होता है। इस प्रकार की समस्या के चलते इंसान को अपनी दैनिक दिनचर्या करने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। कई बार चोट लगने के कुछ दिन बाद दर्द का उभार होता है। इस तरह के दर्द कई रूपों में अलग- अलग रोगों की वजह बन सकते हैं। पीठ की समस्या वैसे तो कई रोगों का जनक होती है लेकिन ट्यूबरक्लोसिस या गांठ का बनना बेहद खतरनाक स्थिति होती है। इस तरह के मर्ज में इलाज काफी लंबा चलता है। रोग की मौजूदा स्थिति पर यह बात ज्यादा निर्भर करती है कि ऊSकी मौके पर स्थिति क्या है। ट्यूबरक्लोसिस जैसी स्थिति में इंसान के सीने में दर्द के अलावा कई तरह की समस्या का सामना करना पड़ता है। अक्सर ऐसे इलाजों में आधुनिक युग की दवाओं के सहारे 80 फीसदी लोग स्वास्थ्य लाभ उठाते हैं।
पीठ का दर्द होम्योपैथी दवा के फायदे

पीठ का दर्द होम्योपैथी दवा का असर तुरंत तो नही होता बल्कि आगे चलकर नियमित उपयोग व्यापक असर दिखाता है। होम्योपैथी चिकित्सक सबसे पहले रोगी की वर्तमान स्थिति के अनुसार हल्की दवाओं के सेवन की सलाह देता है। हल्की दवाएं कुछ दिन खाने या पीने के बाद यदि मर्ज में आराम नही मिलता तब रोगी को कुछ ऐसी दवाओं के सेवन की सलाह दी जाती है जिससे रोग में एक बार उभार महसूस हो। हालांकि अलग मामलों चिकित्सक अलग तरह से इलाज प्रक्रिया अपनाता है। यह जरूरी नही कि हर होम्योपैथी चिकित्सक एक ही तरह की चिकित्सकीय विधा अपनाये।
रोग या दर्द के उभार के साथ डॉक्टर ऐसी दवा के सेवन की सलाह देता है जो काफी लंबे समय तक खाने या पीनी पड़ती है। ब्रायोनिया जैसी दवाएं जो दर्द कम करने में ऐ जाती है, इनका निरंतर प्रयोग शरीर से गठिया या अर्थराइटिस जैसे रोगों को जड़ से समाप्त करने का काम करता है। होम्योपैथी उपचार माध्यम की दवाएं काफी लंबे उपचार के बाद शरीर में असर दिखाने का काम करती हैं। इस उपचार पद्धति में कई तरह के परहेज बताये जाते हैं जो अलग- अलग चिकित्सक की अलग- अलग राय की तरह होते हैं। कुछ चिकित्सक लहसुन और प्याज को दवा के समय बिल्कुल भी छोड़ने की सलाह देते हैं। यदि दवा के समय किसी भी स्थिति में परहेज ना किया गया तो ऐसी दवाएं किसी भी कम की नही होती हैं। इसके अलावा खट्टे पदार्थों के सेवन से भी परहेज की सलाह दी जाती है। ज्यादा तैलीय भोजन या जंक फूड का सेवन मर्ज को कम करने की जगह बढ़ाने का काम करता है। ऐसी दवाओं की अपनी कई तरह की विसंगतियां भी होती हैं। हर होम्योपैथी चिकित्सक मरीज को भोजन के आधे घंटे बाद ही दवा के इस्तेमाल की सलाह देता है। विसंगति इस तरह की उपचार माध्यम में कुछ इस तरह की होती है कि ऐसी दवाएं दर्द के समय किसी काम की नही होती हैं और दवाएं काफी लंबे समय तक चलती हैं। होम्योपैथी उपचार माध्यम में चिकित्सक और मरीज दोनों को काफी धैर्य की जरूरत होती है।
पीठ का दर्द होम्योपैथी दवा संबंधित जरूरी सुझाव/सलाह
होम्योपैथी चिकित्सा के पीठ दर्द में बेहद लाभ होते हैं लेकिन इसकी विसंगतियां भी कम नही होती हैं। तुरन्त दर्द या तेज दर्द के दौरान ऐसी दवाएं किसी काम की नही होती। यदि इस तरह की दवा के साथ किसी अन्य दवा का इस्तेमाल बिना चिकित्सक की सलाह के किया जाए तो बेहद खतरनाक हो सकता है। यह दवाएं शरीर में बड़ी तेजी से अभिक्रिया करती हैं। इसके अलावा ज्यादा मात्रा में दवा लेने से शरीर को बेहद नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। होम्योपैथी चिकित्सा की दवाएं बिना परहेज के किसी भी काम की नही होती हैं। जब भी होम्योपैथी दवा का इस्तेमाल करें अपने चिकित्सक की सलाह जरूर ले लें।
पैर दर्द में होम्योपैथी दवा से उपचार कुछ इस तरह देता है लाभ


पैर दर्द की होम्योपैथी दवा के बारे में इसलिए भी जानना आवश्यक होता है क्योंकि इस तरह की उपचार विधा की दवाएं कई तरह के साइड इफेक्ट और एलर्जी को समाप्त कर देती हैं। पैरों के बिना सम्मानजनक जीवन की कल्पना बेमानी होती है। गठिया बाई से लेकर अर्थराइटिस जैसी समस्या, पैरों के जोड़ों में आमतौर से होने रोग होते हैं। कूल्हे से लेकर तलवों तक कई ऐसे जोड़ होते हैं जिनका सीधा संबंध रीढ़ की हड्डियों से होता है। कूल्हे से लेकर घुटने टेक जाने वे हड्डी में 3 प्रकार के प्लेट होते हैं। इन प्लेटों से जुड़ी मांसपेशियों में संक्रमण या फिर खिंचाव आने को स्थिति में दर्द बढ़ ही जाता है।

हालांकि कुछ मामलों में पैर के दर्द बेहद सामान्य होते हैं। सामान्य परिस्थितियों वाले दर्द हल्का मसाज करने के बाद आसानी से स्वतः समाप्त हो जाते हैं। पैर के जोड़ घुटने सहित अन्य जगहों ओर तेज चोट या फिर अनुवांशिक स्थितियों के चलते कई बार जटिल दर्द का शिकार हो जाते हैं। वैसे दुनिया मे कई उपचार पद्धतियां मौजूद हैं लेकिन इन्हीं में एक दवा जर्मन पद्धति की होम्योपैथी भी है। इस लेख से हम यह बताने की कोशिश कर रहें हैं कि पैरों की समस्या में ऐसी दवाओं की क्या उपयोगिता होती है, साथ ही इस बात को जानने की भी कोशिश रहेगी कि इस तरह के रोगों की जटिलताएं किस तरह लोगों को गंभीर परेशानी में डाल देती हैं।

पैर दर्द से संबंधित जटिलताएं

एक्सीडेंट के दौरान हुई हड्डी की फ्रैक्चर एक ऐसी समस्या होती है जिससे हड्डियों के मजबूत लेयर या प्लेट टूट जाते हैं। हड्डियों के टूटने के साथ ही उससे जुड़ी मांसपेशियों के खिंचाव से स्थिति बेहद जटिल हो जाती है। पैरों की हड्डी के चटकने के साथ ही जोड़ों के फ्लूड भी सूख जाते हैं या फिर संक्रमित हो उठते हैं। इस तरह से शल्य क्रिया कर मरीज की हड्डियों को रिपेयर किया जाता है। इस तरह कई बार स्थिति ऐसी होती है कि यह समस्या गठिया या अर्थराइटिस में तब्दील होने लगती है। संक्रमण के चलते मरीज को आजीवन दवाओं के सहारे जीना पड़ता है। हालांकि चोट के अलावा भी कई ऐसी जटिलताएं हैं जिनसे मरीज को बेहद परेशानी होती है। कुछ आंतरिक रोगों मसलन किडनी में संक्रमण के चलते भी पैरों के दर्द का खतरा बढ़ जाता है। पेशाब में जलन के साथ मूत्र मार्ग में संक्रमण के चलते रीढ़ की हड्डियां प्रभावित होती हैं। इन सबकी वजहों से पैरों संबंधित समस्याएं बेहद जटिल स्थिति में पहुंच जाती हैं। पैर दर्द की होम्योपैथी दवा वाकई बेहद असर पहुँचाती है लेकिन इलाज काफी लंबा चलता है।
होम्योपैथी दवा से पैर दर्द में लाभ
पैर दर्द की होम्योपैथी दवा के रूप में जर्मन तकनीक की दवाओं का असर व्यापक तौर पर सकारात्मक असर डालता है। दवाओं की बात करें तो पैर की समस्या जैसे गठिया या अर्थराइटिस रोगों में यह दवाएं काफी लाभ की होती हैं। हालांकि कुछ मामलों में जब घुटने में गठिया की वजह से दर्द हो रहा हो तब ब्रायोनिया नामक जर्मन तकनीक की जेनरिक दवा का प्रयोग होम्योपैथी में काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। इसके अलावा होम्योपैथी चिकित्सक, मरीज की मौजूदा उम्र के हिसाब से दवाओं के सेवन की सलाह देता है। उम्र, लिंग और मौजूद स्थिति के हिसाब से ही जर्मन तकनीक की होम्योपैथी दवाएं उपयोग के लिए दी जाती हैं। द्रव सहित खाने के लिए टेबलेट और चीनी की गोली जैसी दवाओं का असर वाकई काफी अच्छा होता है। पैर के रोगों से पीड़ित लोगों पर हुए एक सर्वे के मुताबिक यह दवाइयां असर तो करती हैं लेकिन इनमें काफी लंबा वक्त भी लग जाता है। होम्योपैथी चिकित्सा में शरीर में मौजूद किसी भी तरह की एलर्जी को जड़ से समाप्त करने केई कूबत होती है।

होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति की दवाएं मर्ज के लिहाज से काफी लंबे वक्त तक चलती हैं। हालांकि यह बात मरीज की मौके की स्थिति पर निर्भर करता है गठिया या फिर अनुवांशिक कारणों से हीन वाले पैर दर्द में होम्योपैथी दवा काफी लंबे समय तक उपयोग की जाती है। मरीज और चिकित्सक दोनों को इस माध्यम की दवाओं के साथ उपचार में धैर्य की जरूरत होती है। इस उपचार माध्यम की सबसे बड़ी खासियत है परहेज। यदि इसे अमल में ना लाया जाए तो रोग समाप्त होने के मौके कम हो जाते हैं। कलाई का उपचार करने से पहले होम्योपैथी चिकित्सक कुछ ऐसी दवा के सेवन की सलाह देते हैं जिससे मर्ज उभरती है। मर्ज के उभरने के साथ ही उसका सटीक उपचार किया जाता है। होम्योपैथी दवा प्लाज्मा में जाकर क्षतिग्रस्त ऊतकों को रिपेयर तो करता ही है बल्कि संक्रमण को भी स्थाई समाधान देने का काम करता है। गठिया सहित पुरानी चोट के उभरने का मामला हो या फिर वात या कफ वृद्धि की वजह से दर्द हो तब भी ऐसी दवाएं काफी काम की होती हैं।
पैर दर्द की होम्योपैथी दवा संबंधित जरूरी सुझाव

पैर दर्द की होम्योपैथी दवा वाकई काफी लाभकारी होती हैं लेकिन इनकी जटिलताओं के बारे में भी जानना जरूरी है। इस तरह की दवाइयां काफी देर बाद असर करती हैं। पैर में तेज दर्द के दौरान ऐसी दवाइयां किसी भी काम की नही होती। यदि ऐसा कहा जाए कि दर्द को समाप्त करने में या फौरी राहत देने में इस दवा का कोई असर नही होता। इसके अलावा यदि आप इस दवा के साथ एलोपैथ या किसी अन्य दवा का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो तुरंत अपने चिकित्सक की सलाह लें। ऐसी दवाइयां अन्य दवाओं के साथ अभिक्रिया कर शरीर को हानि पहुंचा सकती हैं।



ऐसे आहारों का चयन मिटा सकता है कलाई दर्द जैसी समस्या


किसी भी तरह एक दूसरे से एक कदम आगे रहने की चाहत ने बेतहाशा भागती इंसानी जिंदगी को रोबोट बना रखा है। खान पान की त्रुटियों के चलते हड्डियों के जोड़ों में समस्या एक बड़ा कारण बनती जा रही है। कलाई दर्द का आहार जानने और उसका सटीक सेवन करने के बाद वास्तव में ऐसी समस्याओं पर काफी हद तक लगाम लगती है। भागती जिंदगी के साथ अक्सर इंसान अपने खान पान से समझौता कर बैठता है। इस स्थिति में कलाई के दर्द जैसी समस्याओं के साथ शरीर मे कई अन्य विकृतियों का प्रादुर्भाव शुरू होता है। एक सर्वे की मानें तो दुनिया मे हड्डियों से संबंधित अधिकांश रोग आहार सम्बंधित दुर्गुणों की वजह से ही पनपते हैं। वास्तव में मिलावटी भोजन सामग्री उस मीठे जहर के समान होती है जो अच्छी तो बहुत लगती है लेकिन धीरे- धीरे ही सही लेकिन जीवन को असमय काल के गाल में पहुंचा कर ही दम लेती है। हाथों के सबसे छोर पर स्थित भाग जो उंगलियों से जुड़ा होता है, इसका सीधा संबंध हृदय की मांसपेशियों से होता है। हाथों के जोड़ कलाई में दर्द वैसे तो एक सामान्य स्थिति होती है जो हल्के खिंचाव या फिर चोट के बाद प्रकट हो जाती है। कई बार चोट या फिर आंतरिक हड्डी रोग गठिया या फिर कई अन्य विकारों के प्रकट होने का कारण बनते हैं।

हाथों के इस जोड़ में दर्द हो जाने पर इंसान को अपनी जीवनशैली में सुधार के साथ खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता में सुधार लाने की बेहद जरूरत होती है। रोजमर्रा के आहार की विकृति से ही इंसान के खून में बढ़ा यूरिया का स्तर हड्डियों को बेहद कमजोर बना देता है जिसकी वजह से घर्षण उत्पन्न होता है। घर्षण के फलस्वरूप हड्डियों के जोड़ में मौजूद फ्लूड सूखने के खतरा बढ़ जाता है। इस लेख के माध्यम से हथेलियों की समस्या में आहार संबंधित कुछ अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डालने की कोशिश है। वास्तव मे कुछ चीजों को अमल में लाकर दर्द जैसी समस्या पर लगाम लगाया जा सकता है।

हथेली दर्द में लहसुन के लाभ


लहसुन दुनिया का ऐसा प्राकृतिक दर्द निवारक है जिसका प्रयोग आयुर्वेद और यूनानी दवाओं के निर्माण में भी किया जाता है। लहसुन की एक कली को छीलकर खाली पेट सेवन करने से वात और पित्त जैसी समस्या दूर हो जाती है। इसके अलावा लहसुन की 2 से 3 कलियों को हल्का कूटकर पानी मे उबालकर सूप की तरह इस्तेमाल करने से हड्डियों में दर्द दूर तो होता ही है बल्कि शरीर में कैल्शियम की आपूर्ति भी होती है। खान पान में लहसुन का सेवन शरीर से यूरिक एसिड जैसे तत्वों को बाहर निकलकर हड्डियों को मजबूत बनाता है।
हथेली दर्द में हरी पत्तेदार साग सब्जियों के लाभ


शरीर का ढाँचा ही हड्डियों से निर्मित है। अक्सर खान पान में विकृति के चलते हथेली दर्द के लक्षण उत्पन्न होना शुरू हो जाते है। लगभग हर मौसम में पालक और बथुआ जैसे साग बाजार में भारी मात्रा में उपलब्ध होते हैं। पालक और बथुआ जैसे साग में कैल्शियम और आयरन जैसे तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इनके सेवन से शरीर को कैल्शियम की आपूर्ति तो होती ही है बल्कि शरीर मे मौजूद हानिकारक तत्व समाप्त होकर बाहर निकल जाते हैं। साग के सेवन से आंत में मौजूद कीड़े भी समाप्त हो जाते हैं। हरी पत्तेदार गोभी का सेवन भी कैल्शियम की भरपूर मात्रा प्रदान करता है। पालक और बथुए को साग के रूप में लेने के अलावा जूस बनाकर सेवन करने से काफी लाभ मिलता है।
कलाई दर्द में मौसमी फलों के लाभ


हथेली दर्द में आहार के लिए मौसमी फलों का बेहद महत्वपूर्ण योगदान होता है। मौसमी फलों के सीधे सेवन करने से या उनके जूस पीने से हड्डियों के जोड़ मजबूत होते हैं और शरीर से अवशिष्ट पदार्थ बाहर निकल जाता है। मौसमी, अनार, सेब संतरा और चुकंदर जैसे फलों के नियमित सेवन करने से हथेली के दर्द दूर होने लगते हैं और उनमें मजबूती आती है।
कलाई दर्द में दूध के लाभ


दूध में मौजूद कैल्शियम के साथ कई पोषक तत्व हड्डियों को मजबूत बनाते हैं। रोजाना सुबह शाम दूध की निश्चित मात्रा का रोजाना सेवन कलाई के दर्द में काफी राहत पहुंचाता है। दूध के साथ शहद का इस्तेमाल हड्डियों के जोड़ों के लिए बेहद लाभदायक होता है।
हथेली दर्द में आहार संबंधित जरूरी सुझाव

भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान भोजन से समझौता कर जल्दबाजी के चक्कर मे जंक फूड का बेतहाशा इस्तेमाल कर रहा है। इंसान की यह आदत उसे ऐसे ही कई रोगों की चपेट में ले लेती है। इसके सेवन से मोटापा जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है जो हथेली में दर्द का बड़ा कारण मानी जाती है। कभी भी मामूली दर्द के दौरान तुरंत राहत पहुंचाने वाली दवाओं का इस्तेमाल बिना चिकित्सक की सलाह लिए नही करना चाहिए। इंसान को अपनी उम्र के साथ वजन के लिहाज से उतनी कैलोरी ऊर्जा का ही ग्रहण करना चाहिए जिससे उसमें मोटापा जैसा लक्षण उत्पन्न ना हो सके। खान पान के साथ एक स्वस्थ मनुष्य को पानी पीने की जरूरत होती है। पानी पीने से शरीर मे मौजूद टॉक्सिन्स तो बाहर निकलते ही हैं बल्कि यूरिक एसिड भी बाहर निकल जाता है। हथेली दर्द में आहार के साथ नियमित रूप से नीद पूरी करें। कम से कम 8 घंटे सोना आवश्यक होता है। नीद के अभाव में अवसाद जैसी स्थिति हड्डियों को कमजोर बना देती है। आहार के साथ नियमित दिनचर्या और योग के कुछ उपायों को अपनाकर काफी हद तक ऐसी समस्याओं से बचा जा सकता है



जानिए उंगली दर्द में होम्योपैथी उपचार कितना है कारगर


उंगली दर्द में होम्योपैथी उपचार माध्यम कितना कारगर है यह जानकारी बेहद महत्वपूर्ण है। आज के दौर में जर्मन तकनीक द्वारा विकसित इस उपचार माध्यम का प्रयोग पूरी दुनिया बड़े व्यापक पैमाने पर कर रही हूं। एक तरफ जहां फौरी राहत वाली आधुनिक दवाओं के जमकर इस्तेमाल से लोगों को भयानक साइड इफेक्ट का सामना करना पड़ रहा है तो दूसरी तरफ ऐसी दवाइयां साइड इफेक्ट को काफी हद तक कम करने का दावा करती हैं। वैसे आज के दौर में खान पान की विकृति के चलते हड्डियों के जोड़ों में यूरिक एसिड का जमाना एक साधारण प्रक्रिया का हिस्सा हो चला है।

एक जमाना था जब गठिया और अर्थराइटिस जैसे रोग बुढ़ापे में होने वाली समस्या के तौर पर जाने जाते थे लेकिन बदलते आधुनिक जीवनशैली ने इंसान की हड्डियों पर बेहद प्रतिकूल असर डाला है। बात उंगली से संबंधित रोगों का इलाज होम्योपैथी से करें तो यह लेख आपको बहुत सी ऐसी जानकारी देगा जिससे आपको पता चलेगा कि आखिर कितना फायदेमंद है होम्योपैथी उपचार विधा।

होम्योपैथी उपचार और उंगली दर्द में उसके फायदे

जर्मन तकनीक से विकसित उपचार माध्यम होम्योपैथी का नाम सामने आते ही लोगों को लगता है कि यह कोई नुस्खा या घरेलू उपाय है। कमोवेश यह तथ्य सही नही है। जर्मन तकनीक से कई द्रव्यों द्वारा तपाकर तैयार की गई इन दवाओं का दुनिया भर में हड्डी रोगों के इलाज के लिए तेजी से चलन में आया है। दरअसल उंगली दर्द से परेशान मरीज के मर्ज की क्या वजह है? क्या वह सामान्य परिस्थितियों वाला दर्द है? या फिर किसी गंभीर मर्ज के कारण दर्द उत्पन्न हो रहा है, यह बात चिकित्सक जांच के बाद ही तय कर पाता है। होम्योपैथी में मरीज को उम्र के हिसाब से कुछ द्रव्यों को पानी मे मिलाकर पीने के साथ ही शुगर कैंडी की कुछ डिब्बा बंद छोटी गोलियों में दवा मिलाकर खाने के लिए दिया जाता है।

इन दवाओं का इस्तेमाल और मात्रा मरीज की मौके की स्थिति क्या है तह जानकर दी जाती है। हालांकि इस उपचार में मरीज का इलाज बेहद लंबा चलता है। यह 1 महीने से लेकर ताउम्र तक चलने वाला उपचार माध्यम है। इसके उपचार का सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू परहेज होता है। यदि मरीज दवा के साथ चिकित्सक द्वारा बताई गई चीजों का परहेज नही करता तो दवाओं का शरीर पर असर ना के बराबर होता है।

कई शोधों पर आधारित एक खबर के मुताबिक होम्योपैथ चिकित्सा विज्ञान में आधुनिक दवाओं का साइड रोकने की क्षमता होती है। उंगली दर्द में कई बार स्थिति के हिसाब से कुछ द्रवों द्वारा मसाज के लिए भी कहा जाता है। हालांकि इस तरह की उपचार विधा काफी लंबी चलती है जिसमें मरीज और रोगी दोनों को धैर्य की जरूरत होती है लेकिन सटीक उपचार के बाद काफी राहत भी देखी गई है। एक होम्योपैथी चिकित्सक मरीज की मौके की स्थिती और रोग के आधार पर सबसे पहले वैसे ही रोग के लक्षण प्रकट होने वाली दवाओं के सेवन की सलाह देते हैं। यदि मरीज के उंगली में दर्द और सूजन है और उसकी वजह से परेशानी हो रही है तब चिकित्सक उसी मर्ज को उभारने वाली दवाओं के सेवन की सलाह देंगे। यदि दवा के सेवन के साथ ही अमुक रोग के लक्षण प्रकट होते हैं तब दवा से मर्ज के ठीक होने के चांसेज बढ़ जाते हैं।
होम्योपैथी चिकित्सा संबंधित जटिलताएं

उंगली दर्द का होम्योपैथी दवा के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली इस विधा की कुछ जटिलताएं भी होती हैं। इस बात में दम है कि हड्डियों से यूरिक एसिड बाहर निकलकर मांसपेशियों को मजबूत बनाने का काम होम्योपैथी करता है लेकिन इसकी विसंगतियों के बारे में जानना भी जरूरी है। होम्योपैथी एक आइए उपचार विधा है जिसके साथ यदि चिकित्सक द्वारा बताई गई सावधानी या फिर परहेज ना बरता जाए तो ऐसी दवाइयां किसी काम की नही होती। मरीज चाहे कई साल तक इस दवा का प्रयोग करे फिर भी परहेज के अभाव में दवा का असर नही होता। यदि आपको किसी कारणवश उंगली में तेज दर्द हो रहा हो तो इस स्थिति में ऐसी दवाओं का असर नही होता। कुल मिलाकर उंगली दर्द के समय होम्योपैथी दवाएं फौरी राहत देने में नाकाम होती हैं। इस उपचार माध्यम में शल्य चिकित्सा का कोई भी साधन मौजूद नही होता। होम्योपैथी उपचार माध्यम में कैल्शियम की आपूर्ति करने का माद्दा भी नही होता। कि बार उंगली की या हड्डियों से संबंधित परेशानी कुपोषण या फिर शरीर मे कैल्शियम की भारी कमी की वजह से भी हो जाती है। इस तरह की कमी को इस उपचार माध्यम द्वारा ठीक नही किया जा सकता।
उंगली दर्द में होम्योपैथी दवा के इस्तेमाल संबंधित जरूरी सलाह

मरीज को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि जब भी वह दवाओं का इस्तेमाल करें तब चिकित्सक की सलाह पर ही करें। होम्योपैथी दवाओं का रिएक्शन आधुनिक दवाओं के साथ बहुत ही तेजी से होता है। यदि किसी वजह से मरीज को होम्योपैथी चिकित्सा के दौरान एलोपैथी दवाओं के इस्तेमाल की जरूरत पड़े तब तुरंत अपने चिकित्सक की सलाह लें। यदि बिना पूछे दवाइयों का सेवन किया गया तो वह जीवन के लिए घातक साबित हो सकता है।
पैरों के दर्द में आयुर्वेदिक दवाओं के ऐसे प्रयोग देते हैं बेहतर लाभ


शरीर की संरचना में पैरों का बेहद महत्वपूर्ण योगदान होता है। आज हम पैर के दर्द की आयुर्वेदिक दवा की बात क्यों कर रहे हैं, यह भी बेहद दिलचस्प है। आधुनिक युग में दवाओं के दुष्परिणामों से दुखी लोग आयुर्वेद जैसे हर्बल उपचार की तरफ भाग रहे हैं, जिसके साइड इफेक्ट ना के बराबर हों। आज के युग मे इंसान प्रदूषण सहित कई अन्य विसंगतियों के चपेट में है जिसके चलते वह खतरनाक रोगों की चपेट में आ रहा है। पैरों के जोड़ों में दर्द भी इन्हीं समस्याओं के चलते होता है। दर्द का उपचार आधुनिक तकनीक वाली दवाओं से कर चुके होते हैं और इस प्रक्रिया में कई दुष्परिणाम सामने आने से आयुर्वेदिक दवा की तरफ रुख करते हैं। यह एक ऐसा माध्यम है जो परंपरागत होने के साथ पूरी तरह जड़ी बूटियों पर आधारित होता है। पैरों की सबसे अहम जोड़ घुटनों में दर्द कई बार गठिया या अर्थराइटिस जैसी गम्भीर बीमारियों की वजह बन जाता है

एक हेल्थ सर्वे की मानें तो पता चलता है कि भारत जैसे देश मे 30 से 50 साल की उम्र वर्ग वाले लोग इस तरह की समस्याओं से पीड़ित रहते हैं। हालांकि इस तरह की समस्याओं के कई अन्य कारण भी होते हैं। पैरों के दर्द में आयुर्वेद की दवा किस तरह काम करती है और इस रोग से सम्बंधित क्या जटिलताएं हो सकती हैं इस लेख के माध्यम से जानने की कोशिश करेंगे।

पैर के दर्द से संबंधित जटिलताएं

वैसे तो पैरों के दर्द आमतौर पर चोट, मोच या फिर अनुवांशिक कारणों से उत्पन्न होनी वाली समस्या है। आज के दौर में जब दुनिया प्रगति के पथ पर अग्रसर है तब भी कुपोषण जैसी समस्याओं का जारी रहना दुखद है। कुपोषण के चलते शरीर मे लगातार घटते खून का स्तर भी इस तरह की बीमारियों का बड़ा कारण माना जाता है। कई बार घुटनों या पैर का दर्द का सीधा संबंध हृदय रोगों से होता है। इसके अलावा पैर दर्द की जटिलताओं में मधुमेह और मोटापा भी बड़ा कारक बनता है। मधुमेह से ग्रस्त लोगों की हड्डियों में लगातार घर्षण पैरों को प्रभावित करता है। कई बार रोगी की स्थिति गंभीर हो जाने पर शल्य चिकित्सा के द्वारा उपचार किया जाता है लेकिन नर्म ऊतकों की क्षति के चलते कई बार घुटनों की कटोरी का ऑपरेशन तक करना होता है।
पैरों के दर्द में आयुर्वेदिक दवा के लाभ

पैर दर्द की आयुर्वेदिक दवा से उपचार के लिए हिंदुस्तान, दुनिया भर में अग्रणी भूमिका का निर्वहन सदियों से करता आया है। सदियों से हमारे पूर्वजों ने जड़ी बूटियों के माध्यम से कई असाध्य रोगों पर काबू पाया है। आयुर्वेदिक दवाओं के कुछ नुस्खे ऐसी समस्याओं में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं। अर्जुनारिष्ट एक ऐसी प्राकृतिक औषधि है जो आयुर्वेद में शरीर के किसी भी हिस्से का दर्द के इलाज के लिए प्रयोग की जाती है। इसके अलावा एक चम्मच अश्वगंधा पाउडर के साथ एक गिलास गुनगुने दूध या पानी का सेवन काफी लाभदायक होता है। दूध में मौजूद कैल्शियम जहां हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है तो अश्वगंधा पाउडर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास कर हड्डियों को नई ऊर्जा प्रदान करता है।

इसके अलावा अशोक की छाल दर्द में बेहद असरदार होती है। यदि मरीज को गठिया की वजह से दर्द का अनुभव होता है तो अशोक की छाल को लेकर करीब 1 लीटर पानी में अच्छे से उबाल लें। जब पानी का एक चौथाई हिस्सा बच जाए तो इसे ठंडा कर लें। अब इस पेय को नियमित रूप से सुबह शाम 2 चम्मच की मात्रा में सेवन करें। ऐसा करने से गठिया बाई की समस्या से राहत मिलती है। इसके अलावा अशोक वृक्ष के पत्तों को पीसकर घुटने में सूजन वाली जगह लेप करने से दर्द में बेहद आराम प्राप्त होता है। इसके अलावा अदरक का सेवन भी गठिया सहित अन्य पैरों के जोड़ों से संबंधित रोगों में काफी लाभदायक होता है। अदरक को सलाद सहित अन्य रूपों में सेवन करने से दर्द में खास लाभ मिलता है। इसमें मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट तत्व जोड़ों में दर्द तो ठीक करते ही हैं बल्कि पसीने के माध्यम से यूरिक एसिड भी बाहर निकल जाते हैं। इस तत्व का सेवन चाय या फिर काढ़े के रूप में प्रयोग करने से भी पैर के दर्द दूर होने लगते हैं।

आयुर्वेदिक दवा एक ऐसा प्राकृतिक उपाय है जिसका किसी भी तरह का कोई भी साइड इफेक्ट देखने को नही मिलता। दुर्लभ जड़ी बूटियों की सहायता से विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम ऐसी दवा तैयार करती है जिससे कि पैर की समस्या में लाभ प्राप्त हो सके।
पैर दर्द में आयुर्वेदिक दवाओं संबंधित जरूरी सलाह

पैर दर्द की आयुर्वेदिक दवा वाकई काफी असरदार होती है। दर्द के दौरान तुरंत लाभ के लिए ऐसी दवाएं ज्यादा असरदार तो नही होती लेकिन इनके निरंतर प्रयोग या सेवन करने से हड्डियों को बेहद लाभ मिलता है। पैरों की समस्या के लिए आयुर्वेद द्वारा इलाज अहम तो होता ही है लेकिन कई बार लोग बिना सलाह के ही ऐसी दवाओं का इस्तेमाल शुरू कर देते हैं। बिना चिकित्सक की सलाह के दवाओं का सेवन नुकसान तो पहुंचाता ही है बल्कि कई बार रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी भी आने लगती है। आयुर्वेदिक दवाओं के वैसे तो किसी भी प्रकार के साइड इफेक्ट या दुष्प्रभाव देखने को नही मिलते लेकिन इसके सेवन से पहले चिकित्सक की सलाह बेहद महत्वपूर्ण होती है। दवाएं तो मर्ज के लिए एक ही होती है लेकिन उम्र और मरीज की मौजूदा उम्र के लिहाज से इनकी मात्रा अलग- अलग होती है।





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