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योगासन से पाएं साफ और निर्मल त्वचा yog 26


योगासन से पाएं साफ और निर्मल त्वचा


नियमित तौर पर योग करने से ना सिर्फ आपका तनाव कम होता है, शरीर स्वस्थ बना रहता है और नींद अच्छी आती है बल्कि शरीर से विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं जिससे आपकी त्वचा में भी एक प्राकृतिक चमक आ जाती है। एक्सपर्ट्स की मानें तो योग की मदद से चर्म रोग से संबंधित समस्याएं जैसे कील-मुहांसे से छुटकारा मिलता है और हमारी त्वचा अंदर से साफ हो जाती है। एक नजर उन आसनों पर जिससे क्लियर स्किन पाने में मदद मिलती है-

शीर्षासन या हेडस्टैंड- इस आसन से हमारे शरीर में रक्त का उल्टा संचार होने लगता है यानी पैर से सिर तक जिससे हमारे चेहरे को एक स्वस्थ चमक मिलती है। इस आसन को नियमित रूप से करने से हमारी त्वचा झुर्रियों से मुक्त रहेगी।


उत्तानासन- ये भी एक ऐसा ही आसन है जिसमें हमारे शरीर में रक्त का संचार नीचे से ऊपर की ओर यानी हमारे चेहरे और स्कैल्प तक होता है।


हलासन- इस आसन के जरिए भी शरीर में ब्लड सर्क्युलेशन हमारे चेहरे और सिर की ओर बढ़ जाता है जिससे हमारे चेहरे पर एक गुलाबी चमक आती है।


सर्वांगासन या शोल्डर स्टैंड- इस आसन को क्वीन ऑफ आसन के तौर पर जाना जाता है और इसमें भी रक्त का संचार पैर से सिर की ओर होता है। इससे हमारी त्वचा साफ और झुर्रिरहित बनती है।


मत्स्यासन या फिश पोज- इस आसन को सर्वांगासन के ऑल्टरनेट के रूप में देखा जाता है। इस आसन में आपका पूरा शरीर नहीं सिर्फ सिर उल्टा होता है जिससे वहां खून का संचार बढ़ जाता है और त्वचा की लालिमा को बढ़ाता है।
योगासन से पाएं साफ और निर्मल त्वचा



नियमित तौर पर योग करने से ना सिर्फ आपका तनाव कम होता है, शरीर स्वस्थ बना रहता है और नींद अच्छी आती है बल्कि शरीर से विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं जिससे आपकी त्वचा में भी एक प्राकृतिक चमक आ जाती है। एक्सपर्ट्स की मानें तो योग की मदद से चर्म रोग से संबंधित समस्याएं जैसे कील-मुहांसे से छुटकारा मिलता है और हमारी त्वचा अंदर से साफ हो जाती है। एक नजर उन आसनों पर जिससे क्लियर स्किन पाने में मदद मिलती है-


शीर्षासन या हेडस्टैंड- इस आसन से हमारे शरीर में रक्त का उल्टा संचार होने लगता है यानी पैर से सिर तक जिससे हमारे चेहरे को एक स्वस्थ चमक मिलती है। इस आसन को नियमित रूप से करने से हमारी त्वचा झुर्रियों से मुक्त रहेगी।

उत्तानासन- ये भी एक ऐसा ही आसन है जिसमें हमारे शरीर में रक्त का संचार नीचे से ऊपर की ओर यानी हमारे चेहरे और स्कैल्प तक होता है।


हलासन- इस आसन के जरिए भी शरीर में ब्लड सर्क्युलेशन हमारे चेहरे और सिर की ओर बढ़ जाता है जिससे हमारे चेहरे पर एक गुलाबी चमक आती है।


सर्वांगासन या शोल्डर स्टैंड- इस आसन को क्वीन ऑफ आसन के तौर पर जाना जाता है और इसमें भी रक्त का संचार पैर से सिर की ओर होता है। इससे हमारी त्वचा साफ और झुर्रिरहित बनती है।


मत्स्यासन या फिश पोज- इस आसन को सर्वांगासन के ऑल्टरनेट के रूप में देखा जाता है। इस आसन में आपका पूरा शरीर नहीं सिर्फ सिर उल्टा होता है जिससे वहां खून का संचार बढ़ जाता है और त्वचा की लालिमा को बढ़ाता है। 


सेल्फ कांफिडेंस बढ़ाएँ


आत्म विश्वास सेहत और सफलता का आधार है। कमजोर आत्म विश्वास से बहुत सारी शारीरिक और मानसिक बीमारियों का जन्म होता है। आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए शरीर और मन में स्वस्थ्‍य अनुभव करना जरूरी है। आत्म विश्वास बढ़ाने के लिए कुछ योगा टिप्स।

मौन : योग में कहा गया है कि मौन से मन की शक्ति का विकास होता है। देखने और समझने की क्षमता बढ़ती है और संयम का जन्म होता है। दिन के 12 घंटे में सिर्फ एक घंटे के लिए मन के भीतर की प्रत्येक गतिविधि को रोक दें।


ध्यान : ध्यान का अभ्यास बहुत जरूरी है। यह मौन रहने में सहायक सिद्ध हो सकता है। यह अभ्यास प्रतिदिन कम से कम 10 मिनट के लिए अवश्य करना चाहिए। ध्यान आपके भीतर आंतरिक शक्ति का विकास करता है साथ ही यह शरीर के संताप को कम कर रोगों से लड़ने की शक्ति को बढ़ाता है। इससे आपके भीतर का विजन पॉवर बढ़ता है।


प्राणायाम : प्राणायाम में तीन-चार आवर्तक भस्त्रिका कुम्भक करना चाहिए। अनुलोम-विलोम कुम्भक के साथ 1:2:4 के अनुपात में करना चाहिए। प्राणायाम से शरीर को भरपूर ऑक्सिजन मिलती है जो सेल्फ कांफिडेंस बढ़ाने के लिए जरूरी है।


योगनिद्रा : आत्मविश्वास बनाए रखने के लिए 7 से 8 घंटे तक सोना आवश्यक है। यदि किसी चिंता के कारण नींद नहीं आ रही है तो योग निद्रा का अभ्यास करें।


योगासन : योगासन में ताड़ासन (आँखें बंद करके), संतुलित त्रिकोणासन, हनुमानासन, मेरुदंडासन, उत्कटासन, गरुड़ासन, बकासन, मयूरासन, उत्थितपद्मासन, पद्म मयूरासन, पद्म बकासन, धनुरासन, सर्वागासन और चक्रासन का अभ्यास किसी योग प्रशिक्षक के सानिध्य में करना चाहिए।


इसके लाभ : उक्त सभी योगा टिप्स से आपके भीतर आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाने लगेगी। आत्मशक्ति के बल पर आप किसी भी कार्य में तो सफल रहेंगे ही साथ ही आपका व्यवहार भी संतुलित रहेगा। आत्म विश्वास से शरीर में प्रतिरोधक क्षमता का विकास भी होता है।
मोटापे के लिए झूलन-ढुलकन आसन










मोटापे के लिए झूलन-ढुलकन आसन


झूलन-ढुलन आसन! आपने इस आसन का नाम कम ही सुना होगा। हालांकि बालपन में आपने यह आसन जरूर किया होगा। शरीर का आधार रीढ़ होता है। रीढ़ को मजबूत बनाने के लिए यह आसन बहुत अच्छा है। झूलन-लुढ़कन आसन को करने से रीढ़ की हड्डी और जोड़ पहले से ज्यादा लचकदार और मजबूत होते हैं।

झूलना-लुढ़कना आसन की विधि:- 

(अ)

* सबसे पहले पीठ के बल सीधा लेट जाएं। 

* अब दोनों पैरों को मोड़ते हुए वक्ष तक लाएं 

* दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसाकर घुटनों के पास पैरों को कसकर पकड़ें। 


-यह प्रारंभिक स्थिति है। 


(ब)

* अब शरीर को क्रमश: दाहिनी और बाईं ओर लुढ़काते हुए पैर के बगल के हिस्से को जमीन से स्पर्श कराएं। 


* 5 से 10 बार यह अभ्यास करें। 


* पूरे अभ्यास के समय श्वास-प्रश्वास को सामान्य रखें। 
* नितम्बों को जमीन से थोड़ा ऊपर रखते हुए उकडूं बैठें। 

* दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसाकर घुटनों के ठीक नीचे पैरों को कसकर पकड़ें। 


* संपूर्ण शरीर को मेरूदंड पर आगे‌-पीछे लुढ़काएं। 


* अब आगे की ओर लुढ़कते समय पांवों पर बैठने की स्थिति में आने का प्रयत्न करें। 


* 5 से 10 बार आगे-पीछे लुढ़कें। 




फिर से (पुनश्च:) : इस आसन को करने के लिए लेट जाएं। दोनों पैरों को घुटनों से मोड़ लें। अब घुटनों को छाती की ओर ले जाएं और अपने हाथों से पैरों को घुटनों के पास से पकड़ लें। फिर श्वास भरें और आगे की ओर झूलते हुए श्वास छोड़ें। अब पीछे की ओर लुढ़कते हुए श्वास भरें। इस आसन को करने के दौरान सिर को बचाकर रखें। इस आसन को करते समय कोशिश करें कि आगे की ओर झूलते हुए आप पैरों के बल बैठ जाएं। इस प्रक्रिया को करने से पीठ के बल आगे-पीछे लुढ़कते-झूलते हुए रीढ़ के सभी जोड़ों का व्यायाम हो जाता।


सावधानी : इस आसन को करते समय रीढ़ को ज्यादा सुरक्षा देने के लिए मोटा कंबल बिछाएं। जिन लोगों को पहले से कमर या पीठ में दर्द की शिकायत हो उन्हें इस आसन से परहेज करना चाहिए।


आसन का लाभ :- यह आसन नियमित करने से पीठ, नितम्ब और कटि-प्रदेश की मालिश करता है और पीठ, कमर, नितंब की चर्बी को कम करता है।
योगा से हेयर केयर




बालों समस्या अब आम हो चली है। इसका कारण शहर का प्रदूषण, धूल, धुवां और दूषित भोजन-पानी। इस सबके कारण सिर से लेकर पांव तक त्वचा रुखी हो जाती है। रुखी त्वचा से जहां, डैंड्रफ और बालों से संबंधित अन्य रोग होते हैं वहीं यह चर्म रोग का कारण भी बन सकता है।


हालांकि बाल झड़ने का एक और कारण है- तनाव और अन्य मानसिक परेशानियां। आओ हम जानते हैं कि योग इस सबसे छुटकारा दिलाने में हमारी क्या मदद कर सकता है।


क्या करें : सबसे पहले साबुन का इस्तेमाल करना बंद कर हल्दी, बेसन, शिकाकाई आदि का उबटन बनाकर उसी से स्नान करें। फिर अच्छे से पुरे बदन की तेल मालिश करें। प्रतिदिन एक आंवला खाएं और निम्नलिखित योगासन करें।


व्रजासन, पवन मुक्तासन, उष्ट्रासन और शीर्षासन करें। उक्त आसनों के विलोम आसन भी करें। उसके बाद प्राणायाम में नियमित रूप से अनुलोम-विलोम करें।


योगा पैकेज : प्रदूषण से बचें। यौगिक आहार का सेवन करें। वज्रासन के बाद कुर्मासन करें फिर उष्ट्रासन करें। पवनमुक्तासन के बाद मत्स्यासन करें फिर कुछ देर विश्राम करने के बाद शीर्षासन करें। आसनों को करने के बाद अनुलोम-विलोम प्राणायम करें और फिर पांच मिनट का ध्यान करें।
प्राण, अपान और अपानवायु मुद्रा



मुद्राओं का जीवन में बहुत महत्व है। मुद्रा दो तरह की होती है पहली जिसे आसन के रूप में किया जाता है और दूसरी हस्त मुद्राएँ होती है। मुद्राओं से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ प्राप्त किया जा सकता है। यहाँ प्रस्तुत है प्राण, अपान और अपानवायु मुद्रा की विधि और लाभ।


प्राण मुद्रा : छोटी अँगुली (चींटी या कनिष्ठा) और अनामिका (सूर्य अँगुली) दोनों को अँगूठे से स्पर्श करो। इस स्थिति में बाकी छूट गई अँगुलियों को सीधा रखने से अंग्रेजी का 'वी' बनता है।


प्राण मुद्रा के लाभ : प्राण मुद्रा हमारी प्राण शक्ति को शक्ति और स्फूर्ति प्रदान करती है। इसके कारण व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है। यह मुद्रा नेत्र और फेंफड़े के रोग में लाभदायक सि‍द्ध होती है। इससे विटामिनों की कमी दूर होती है। इस मुद्रा को प्रतिदिन नियमित रूप से करने से कई तरह के लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं।


अपान मुद्रा : मध्यमा और अनामिका दोनों को आपस में मिलाकर उनके शीर्षों को अँगूठे के शीर्ष से स्पर्श कराएँ। बाकी दोनों अँगुलियों को सीधा रखें।


अपान के लाभ : इस मुद्रा को करने से मधुमेह, मूत्र संबंधी रोग, कब्ज, बवासीर और पेट संबंधी रोगों में लाभ मिलता है। गर्भवती महिलाओं के लिए यह मुद्रा लाभदायक बताई गई है। अपान वायु का संबंध पृथ्वी तत्व और मूलाधार चक्र से है। 


अपान वायु मुद्राः अँगूठे के पास वाली पहली उँगली अर्थात तर्जनी को अँगूठे के मूल में लगाकर मध्यमा और अनामिका को मिलाकर उनके शीर्ष भाग को अँगूठे के शीर्ष भाग से स्पर्श कराएँ। सबसे छोटी उँगली (कनिष्ठिका) को अलग से सीधी रखें। इस स्थिति को अपान वायु मुद्रा कहते हैं।

अपान वायु मुद्रा के लाभ : हृदय रोगियों के लिए यह मुद्रा बहुत ही लाभदायक बताई गई है। इससे रक्तचाप को ठीक रखने में सहायता मिलती है। पेट की गैस एवं शरीर की बेचैनी इस मुद्रा के अभ्यास से दूर होती है। आवश्यकतानुसार हर रोज 20 से 30 मिनट तक इस मुद्रा का अभ्यास किया जा सकता है।



।।ॐ।।योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:।।ॐ।।

योग से चित्त वृत्तियों का निरोध किया जा सकता है। चित्त में ही रोग और शोक उत्पन्न होते हैं जो शरीर, मन और मस्तिष्क को क्षतिग्रस्त कर देते हैं। सदा खुश और हंसमुख रहना जीवन की सबसे बड़ी सफलता होती है।


पतंजलि से श्रेष्‍ठ मनोवैज्ञानिक खोजना मुश्‍किल है। पतंजलि कहते हैं कि इस 'चित्त' को समझो, तो रोग और शोक की जड़ का पता चलेगा। पतंजलि मानते हैं कि सभी रोगों की शुरुआत चित्त की अतल गहराई से होती है। शरीर और मस्तिष्क पर उसका असर बाद में नजर आता है। चित्त का अर्थ है अंत:करण। योग में ‍बुद्धि, अहंकार और मन इन तीनों को मिलाकर 'चित्त' कहा गया है।


मन को जानने को ही मनोविज्ञान कहते हैं, लेकिन अब आप सोचें मन से बढ़कर तो चित्त है। चित्त पर चिपकते रहते हैं जीवन के सुख, दुख और अच्छे-बुरे घटना क्रम। चित्त हमारी पांचों इंद्रियों (आंख, कान, जिभ, नाक और यौनांग) से राग, द्वेष आदि अच्छाइयां, बुराइयां और प्रकृति ग्रहण करता है।


वृत्तियां पांच प्रकार की होती है:- (1)प्रमाण, (2)विपर्यय, (3)विकल्प, (4)निद्रा और (5)स्मृति। कर्मों से क्लेश और क्लेशों से कर्म उत्पन्न होते हैं- क्लेश पांच प्रकार के होते हैं- (1)अविद्या, (2)अस्मिता, (3)राग, (4) द्वेष और (5)अभिनिवेश। इसके अलावा चित्त की पाँच भूमियां या अवस्थाएं होती हैं। (1)क्षिप्त, (2)मूढ़, (3)विक्षित, (4)एकाग्र और (5)निरुद्ध। ऊपर लिखें एक-एक शब्द और उनके अर्थ को समझने से स्वयं के चित्त को समझा जा सकता है। चित्त को समझने से रोग और शोक स्वत: ही हटने लगते हैं।

(1) प्रमाण : प्रमाण के तीन प्रकार है- प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द। यही शुद्ध चित्त वृत्ति है कि हम जैसा देख रहे हैं वैसा ही व्यक्त कर रहे हैं। कुछ लोग उसमें लाग-लपेट कर व्यक्त करते हैं जिससे भीतर अविश्वास पनपता है। 


(2) विपर्यय : विपर्यय को मिथ्याज्ञान कहते हैं। इसके अंतर्गत संशय या भ्रम को ले सकते हैं। जैसे रस्सी को देखकर हम उसे सांप समझने की भूल करते रहें। यह भी भयभीत रहने का मनोविज्ञान है। 


(3) विकल्प : शब्द ज्ञान से उपजा सत्यशून्य ज्ञान जिसे 'कल्पना' मात्र माना गया है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कि खरगोश के सिर पर सिंग की कल्पना की जाए। कल्पना में जीने वाले लोगों की ही संख्या अधिक है। कल्पना में जीते रहने से भी कई प्रकार के मनोरोग उत्पन्न होते हैं और व्यक्ति वर्तमान से कट कर दुखों को निर्मित कर लेता है। 


(4) निद्रा : निद्रा ज्ञान का अभाव मानी जाती है, किंतु इसके अस्तित्व और वृत्तित्व में संदेह नहीं किया जा सकता क्योंकि सोते वक्त नहीं, जागने पर व्यक्ति को भान होता है कि उसे खूब गहरी नींद आई। ‍नींद में भी चित्त की समस्त वृत्तियां सक्रिय रहती है तभी तो अच्छे और बुरे स्वप्न आते हैं। 


(5) स्मृति : संस्कारजन्य ज्ञान है। इसके कई विस्तृत पहलू है। इससे भी कई तरह के मनोरोग उत्पन्न होते हैं। अच्छी या बुरी घटनाओं की स्मृति रहने से क्लेश उत्पन्न होते हैं। 

(1) अविद्या : अनित्य, अशुचि, दुख तथा अनात्म में नित्य, शुचि, सुख और आत्मबुद्धि रखना अविद्या है, यह विपर्यय या मिध्याज्ञान हैं। 


(2) अस्मिता : पुरुष (आत्मा) और चित्त नितांत भिन्न हैं दोनों को एक मान लेना अस्मिता है। 


(3) राग : सेक्स के बजाय हम इसे राग कहते हैं। विषय सुखों की तृष्णा या आसक्ति राग है। 


(4) द्वेष : सुख के अवरोधक और दुख के उत्पादक के प्रति जो क्रोध और हिंसा का भाव है उसे द्वेष कहते हैं। 


(5) अभिनिवेश : आसक्ति और मृत्यु का भय स्वाभाविक रूप से सभी प्राणियों में विद्यमान रहता है। 





चित्त की अवस्थाएँ: 




(1) क्षिप्त : क्षिप्त चित्त रजोगुण प्रधान रहता है। ऐसे व्यक्ति बहुत ज्यादा व्यग्र, चंचल, अस्थिर और विषयोन्मुखी रहते हैं। यह सुख-दुख में तूफान से घिरी नाव की तरह है। 


(2) मूढ़ : मूढ़ चित्त तमोगुण प्रधान है। ऐसा व्यक्ति विवेकशून्य, प्रमादी, आलसी तथा निद्रा में पड़ा रहता है या विवेकहीन कार्यो में ही प्रवृत्त रहता है। 


(3) विक्षिप्त : विक्षिप्त का अर्थ विशेष रूप से क्षिप्त, अर्थात अधिक क्षिप्त नहीं, लेकिन क्षिप्त से उत्तम। विक्षिप्त चित्त में सत्वगुण की अधिकता होती है, लेकिन कभी-कभी रजोगुण भी जोर मारता है। 


(4) एकाग्र : चित्त की चौथी अवस्था में यहाँ रज और तम गुण दबे रहते हैं और सत्व की प्रधानता रहती है। चित्त बाहरीवृत्तियों से रहित होकर ध्येयवृत्ति पर ही स्थिर या एकाग्र रहता है। लक्ष्य के प्रति एकाग्र रहता है। 

(5) निरुद्ध : इस अवस्था में वृत्तियों का कुछ काल तक निरोध हो जाता है, किंतु उसके संस्कार बने रहते हैं। 

उक्त पाँच अवस्थाओं में से प्रथम तीन अवस्थाओं को समझना आवाश्यक है क्योंकि यही सारे मनोरोग और शारीरिक रोग की जड़ का हिस्सा है। चित्त वृत्तियों को समझने से ही क्लेश और अवस्थाएं समझ में आती है। जो व्यक्ति योगश्चित्तवृत्ति को समझता है वही उसका निरोध भी कर सकता है। अर्थात स्वयं को समझने के लिए स्वयं के चित्त को समझना आवश्यक है जिससे रोग और शोक का निदान होता है।

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