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योग से सेहत को कितना फायदा?


योग एक परिचय



योग भारतीय वैदिक परंपरा की अमूल्य देन है योग का प्रारंभिक ज्ञान वैदिक दर्शन से ही प्राप्त हुआ है ऋग्वेद में सर्वप्रथम योग संबंधी विचारधारा का उल्लेख मिलता है वेद भारतीय अध्यात्म दर्शन की के प्रेरणा स्रोत हैं वेदों में ही मानव मुक्ति हेतु योग दर्शन के ज्ञान का प्रादुर्भाव मिलता है



उत्तान पादासन से तुरंत पेट अंदर


आधुनिकता की अंधी दौड़ में खान-पान, रहन-सहन, आचार-विचार और जीवन पद्धति के विकृत हो जाने से आज सारा समाज अनेक प्रकार के रोगों से ग्रस्त हैं। खासकर वह अपच, कब्ज, मोटापा, तोंद और अन्यपेट संबंधी बीमारियों से परेशान हो गया है। सभी के निदान के लिए लिए योग ही एकमात्र उपाय है। यहां प्रस्तुत है पेट को अंदर करने के लिए अचूक आसन उत्तान पादासन।

सावधानी : जब कमर में दर्द तथा मांसपेशियों में ऐंठन की शिकायत हो, उस समय इस आसन का अभ्यास नहीं करें। गर्भावस्था के दौरान महिलाएं अभ्यास न करें।

इस आसन को स्त्री पुरुष समान रूप से कर सकते हैं। छह सात वर्ष के बालक-बालिकाएं भी इसे कर सकते हैं। यह बहुत आसान आसन है एवं अधिक लाभदायक है। करने की शर्त यह कि आपको पेट और कमर में किसी प्रकार का कोई गंभीर रोग न हो। यदि ऐसा है तो किसी योग चिकित्सक से पूछकर करें। 

पहली विधि : पीठ के बल भूमि पर चित्त लेट जाएं। दोनों हथेलियों को जांघों के साथ भूमि पर स्पर्श करने दें। दोनों पैरों के घुटनों, एड़ियों और अंगूठों को आपस में सटाए रखें और टांगें तानकर रखें।

अब श्वास भरते हुए दोनों पैरों को मिलाते हुए धीमी गति से भूमि से करीब डेढ़ फुट ऊपर उठाएं अर्थात करीब 45 डिग्री कोण बनने तक ऊंचे उठाकर रखें। फिर श्वास जितनी देर आसानी से रोक सकें उतनी देर तक पैर ऊपर रखें।

फिर धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए पांव नीचे लाकर बहुत धीरे से भूमि पर रख दें और शरीर को ढीला छोड़कर शवासन करें।

आसन अवधि : इस आसन का प्रात: और संध्या को खाली पेट यथाशक्ति अभ्यास करें। जब आप श्वास को छाती में एक मिनट से दो तीन मिनट तक रोकने का अभ्यास कर लेंगे तब आपका आसन सिद्ध हो जाएगा।

इसका लाभ :
*इसके अभ्यास से पेट और छाती का थुलथुलापन, पेडू का भद्दापन दूर हो जाता है।
* पेट के स्नायुओं को बड़ा बल मिलता है जिससे कद बढ़ता है।
* इसे कहते रहने से पेट कद्दू की तरह कभी बड़ा नहीं हो सकता।
* यह आसन पेट का मोटापा दूर करने के अतिरिक्त पेट की आंतें सुदृढ़ कर पाचन शक्ति को बढ़ाता है।
* इस आसन के नियमित अभ्यास से गैस और अपच का नाश होता है।
* पूराने से पुराना कब्ज का रोग दूर होता है और खूब भूख लगती है।
* उदर संबंधी अनेक रोक नष्ट होते हैं।
* नाभि केंद्र जो बहत्तर हजार नाड़ियों का केंद्र है। उसे ठीक करने के लिए उत्तान पादासन सर्वश्रेष्ठ है।
* इसके अभ्यास द्वारा नाभि मंडल स्वत: ही ठीक हो जाता है।
*यदि नाभि जगह से हट गई हो तो गिरी हुई धरण पांच मिनट उत्तान पादासन करने से अपने सही स्थान पर आ जाती है।

दूसरी विधि : पीठ के बल भूमि पर चित्त लेटें। दोनों हाथों को नितम्बों से लगाकर कमर के ऊपर तथा नीचे का हिस्सा भूमि से लगभग एक फुट उपर उठाएं। केवल कमर का हिस्सा जमीन पर लगा रहे। इसमें संपूर्ण शरीर को कमर के बल पर तौलते हैं। जिसका प्रभाव नाभि स्थान पर अच्छा पड़ता है।

इस आसन से लाभ :
* मोटापा दूर करने के लिए यह रामबाण है।
* महिलाएं प्रसव के बाद स्वाभाविक स्थिति में आने के बाद करें तो पेडू का भद्दापन दूर हो सकता है।
* इस आसन के करने से हार्निया रोग नहीं होता। जिन्हें हार्निया हो भी गया हो तो इस आसन से यह रोग दूर हो जाता है।
* इससे घबराहट दूर हो जाती है। दिल की धड़कन, श्वास फूलना, आदि रोग भी दूर हो जाते हैं।
* सामान्य रूप से दस्त, पेचिश, मरोड़, खूनी दस्त, नसों की खराबी, आंत्र वृद्धि, जलोदर, पेट दर्द, कब्ज, फेफड़ों के रोग आदि अनेक रोग दूर होते हैं।
पेट-पीठ को स्वस्थ बनाए उष्ट्रासन


वर्तमान युग में हममें से अधिकांश व्यक्तियों की आम शिकायत या तो पीठ के बारे में होती है या पेट के बारे में। उष्ट्रासन के नियमित अभ्यास से इन दोनों परेशानियों से हम बच सकते हैं। 

उष्ट्रासन, वज्रासन समूह का आसन कहलाता है, क्योंकि यह आसन करने हेतु हमें सर्वप्रथम वज्रासन लगाना पड़ता है। वज्रासन लगाने के बाद घुटनों के बल खड़े हो जाते हैं। इसके पश्चात दोनों हाथों को सामने की ओर से ऊपर ले जाते हुए पीछे की ओर लाते हैं एवं उन्हें दोनों पैरों के टखनों के पास रखते हैं। टखनों के पास जब दोनों हाथों को रखते हैं तो ध्यान रखें कि हाथों के अँगूठे अंदर की ओर तथा चारों उँगलियाँ बाहर की ओर एक-दूसरे से सटी रहें। अंतिम अवस्था में पैरों की उँगलियाँ अंदर की ओर मुड़ी रहेंगी, दोनों हाथ टखनों पर रहेंगे, गर्दन तथा शरीर यथासंभव पीछे की ओर झुका रहेगा। साँस सामान्य रूप से चलती रहेगी। 

इस आसन के लाभ ही लाभ हैं। गर्दन में स्थित थॉयरॉयड ग्रंथि का व्यायाम होता है। मेरूदंड स्वस्थ रहता है, जिससे पीठ के दर्द से छुटकारा मिलता है। अमाशय ठीक तरह से काम करता है, जिससे पेट के विकार दूर होते हैं। इस आसन से गर्दन, पेट और कमर में जमा अनावश्यक चर्बी दूर होती है और ये अंग सुडौल बनते हैं। कुछ लोगों को वज्रासन करते समय प्रारंभ में दर्द हो सकता है, अतः वे वज्रासन में बैठने का समय धीरे-धीरे बढ़ाएँ। कुछ समय बाद यह दर्द जाता रहेगा।


पॉजीटिव सोच के लिए कपालभाति योग करें


एकांत में और आराम की स्थिति में किया जाने वाला योग है कपालभाती। इसे किसी भी उम्र के लोग कर सकते हैं। 

लाभ

डायबिटीज, जोड़ों का दर्द, आर्थराइटिस, सांस व पेट संबंधी रोग, कब्ज, मोटापा व तनाव जैसी बीमारियों को दूर करने के साथ ही सकारात्मक सोच विकसित होती है। दिल के रोगियों को धीमी गति से इस योग को करना चाहिए। 

कब करें 

यह योग खाली पेट सूर्योदय से पहले या सूर्यास्त के बाद 10-15 मिनट के लिए कर सकते हैं। इसे खाने के तुरंत बाद न करके 3 से 4 घंटे बाद शांत वातावरण व खुली हवा में आसन पर बैठकर करें। इस योग को जल्दबाजी में न करके क्रमानुसार ही करना चाहिए। 

कैसे करें

पालथी मारकर आसन पर बैठें। कमर सीधी रखें। हाथ घुटनों पर व हथेली ऊपर की ओर रखें। तर्जनी अंगुली को अंगूठे से मिलाएं। 3-4 मिनट तक नाक से सांस झटके से छोड़ें। पेट अंदर जाएगा। थकने पर आंखे बंद करें व नाक पर ध्यान केंद्रित कर दोहराएं



परफेक्ट फिगर के लिए करें त्रिकोणासन


यह आसन खड़े होकर किया जाता है। इस आसन में शरीर में अलग-अलग तीन कोण बनते हैं, इसलिए इसको त्रिकोणासन कहा जाता है।

विधि- खड़े होकर दोनों पैरो को अधिक से अधिक साइड में फैला दे। पैरों के पंजे सामने की ओर रहेंगे। अब दोनों हाथों को कन्धों के समानांतर साइड में उठा लें। लंबी-गहरी सांस भरें और सांस निकालते हुए कमर को बाई तरफ घुमाएं और आगे की ओर झुककर, उल्टे हाथ से सीधे पैर के पंजे को छूने की कोशिश करें। यदि पंजा आसानी से छू पाएं, तब हाथ की हथेली को पैर के पंजे के बाहर की तरफ ज़मीन पर टिका दें। साथ ही सीधा हाथ कंधे की सीध में आकाश की तरफ उठायें और ऊपर की ओर अधिक से अधिक खींचे। नीचे वाला हाथ नीचे की तरफ और ऊपर वाला हाथ ऊपर की तरफ खिंचा रहेगा। गर्दन को ऊपर की तरफ घुमाकर ऊपर वाले हाथ की ओर देखें। सांस की गति सामान्य रखते हुए इस आसन में यथाशक्ति रुके रहें। फिर सांस भरते हुए धीरे से वापस आ जाएं। इसी प्रकार दूसरी ओर बदलकर करें। दोनों ओर यह आसन तीन से चार बार कर लें।

सावधानियां- जितना आराम से कमर को आगे झुकाकर मोड़ सके उतना ही करें। जल्दबाजी और झटके से बचें। गर्दन दर्द, कमर दर्द, साईटिका दर्द, ऑस्टियोपोरोसिस में इसका अभ्यास न करें। साथ ही माईग्रेन, हाईपर एसिडिटी व हाई ब्लड प्रेशर में भी इसका अभ्यास न करें।



लाभ- यह आसन कमर व गर्दन की मांशपेशियों को लचीला बनाकर उसकी ताकत को बढ़ाने वाला है। इसके अभ्यास से पैरों, घुटनों, हैमस्ट्रिंग, पिंडलियों, हाथों, कन्धों व छाती की मांशपेशियां लचीली बनी रहती हैं। कूल्हे की हड्डी को मज़बूती देने वाला है त्रिकोणासन। पाचन तंत्र को बल मिलता है, कब्ज, गैस व डायबटीज़ को दूर करने वाला है। इसके निरंतर अभ्यास से शरीर पर चढ़ी हुई अनावश्यक चर्बी कम होने लगती है, जिससे मोटापा दूर होता है और शरीर सुडौल बना रहता है। यह शरीर की जकड़न-अकड़न को दूर कर पूरे शरीर में लचीलापन प्रदान करता है और शरीर को हल्का कर देता है। नर्वस सिस्टम को स्वस्थ कर यह आसन मन व मस्तिष्क को बल देने वाला है। बच्चों की लम्बाई को बढ़ाने में भी विशेष सहायक है।

दिमाग बनाना हो तेज तो नियमित करें योग


एक अध्ययन में पता चला है कि प्रतिदिन योग करना वयस्कों के लिए दिमाग को स्वस्थ और तरोताजा बनाए रखने में सहायक है। युवावस्था में दिमाग में रक्त का प्रवाह और संज्ञानात्मक कार्य अपने उच्चस्तर पर होता है। योग से होने वाले 20 सर्वोत्तम स्वास्थ्य लाभ एक अध्ययन के तहत 52 युवियों पर किए गए शोध में पता चला है कि दिमाग के अच्छे स्वास्थ्य और सुचारू रूप से काम करने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की उपलब्धता उन वयस्कों में उच्चस्तर पर होती है, जो प्रतिदिन नियमित रूप से योग करते हैं। 

न्यूजीलैंड में युनिवर्सिटी ऑफ ओटैगो में मनोविज्ञान की वरिष्ठ प्रवक्ता लियाना मैचाडो ने कहा, "हमारे शोध के अनुसार, नियमित रूप से शारीरिक योग करने से दिमाग भी सुचारू रूप से काम करता है। यह खासकर युवाओं के लिए फायदेमंद है।" जर्नल साइकोफिजियोलॉजी में प्रकाशित हुए शोध के अनुसार, नियमित योग से दिमाग में रक्त का प्रवाह और संज्ञानात्मक कार्य सुचारू रूप से चलते रहते हैं। नियमित रूप से 30-45 मिनट के लिये योग करने से आपके दिमाग के स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। यह आपके मूड को भी ठीक करता है। योग से नई तन्त्रिका कोशिकोओं के निर्माण होता है जिससे अल्ज़ीमर्स और पार्किन्सन्स जैसी बीमारियाँ दूर ही रहती हैं। योग से जीवन के उत्तरार्ध में विकसित होने वाले पागलपन जैसे लक्षणों से भी बचा जा सकता है। यही नहीं योग द्वारा आने वाले शाँति के अहसास से लगातार आने वाली चिन्ताये दूर होती हैं और आत्मविश्वास के बढ़ने से दिमाग से परेशानियाँ दूर होती हैं।



फेंफड़े शुद्ध करने के योगा टिप्स


व्यक्ति प्राकृतिक श्वास लेना भूल गया है। प्रदूषण और तनाव के कारण उसकी श्वास उखड़ी-उखड़ी और मंद हो चली है। यहां प्रस्तुत है श्वास को शुद्ध करने के योगा टिप्स।

1.जहां भी प्रदूषण भरा माहौल हो वहां केवली प्राणायाम करने लगें और उस प्रदूषण भरे माहौल से बच निकलने का प्रयास करें। यदि रूमाल साथ रखते हैं तो केवली की आवश्यकता नहीं।

2.बदबू से बचें, यह उसी तरह है जिस तरह की हम खराब भोजन करने से बचते हैं। बेहतर इत्र या स्प्रे का इस्तेमाल करें। श्वासों की बदबू के लिए आयुर्वेदिक इलाज का सहारा ले सकते हैं।

3.क्रोध, राग, द्वैष या अन्य नकारात्मक भाव के दौरान नाक के दोनों छिद्रों से श्वास को पूरी ताकत से बाहर निकाल कर धीरे-धीरे पेट तक गहरी श्वास लें। ऐसा पांच बार करें।

4.अपनी श्वासों पर विशेष ध्यान दें कि कहीं वह उखड़ी-उखड़ी, असंतुलित या अनियंत्रित तो नहीं है। उसे सामान्य बनाने के लिए अनुलोम-विलोम कर लें।

5.पांच सेकंट तक गहरी श्वास अंदर लेकर उसे फेंफड़ों में भर लें और उसे 10 सेकंट तक रोककर रखें। 10 सेकंट के बाद उसे तब तक बाहर छोड़ते रहें जब तक की पेट पीठ की तरफ ना खिंचाने लगे।

6.नाक के छिद्रों का हमेशा साफ-सुधरा रखें। चाहें तो जलनेती या सूतनेती का सहारा ले सकते हैं।

7.सुगंध भी प्राकृतिक भोजन है। समय-समय पर सभी तरह की सुगंध का इस्तेमाल करते रहने से मन और शरीर में भरपूर उर्जा का संचार किया जा सकता है।

उचित, साफ, स्वच्छ और भरपूर हवा का सेवन सभी तरह के रोग और मानसिक तनाव को दूर कर उम्र को बढ़ाता है।
कई समस्याओं का एक हल: कपालभाति


कपालभाति प्राणायाम नहीं बल्कि षट्कर्म का अभ्यास है। इसके लिए पालथी लगाकर सीधे बैठें, आंखें बंदकर हाथों को ज्ञान मुद्रा में रख लें। ध्यान को सांस पर लाकर सांस की गति को अनुभव करें और अब इस क्रिया को शुरू करें। इसके लिए पेट के निचले हिस्से को अंदर की ओर खींचे व नाक से सांस को बल के साथ बाहर फेंके। यह प्रक्रिया बार-बार इसी प्रकार तब तक करते जाएं जब तक थकान न लगे। फिर पूरी सांस बाहर निकाल दें और सांस को सामान्य करके आराम से बैठ जाएं।

कपालभाति के बाद मन शांत, सांस धीमी व शरीर स्थिर हो जाता है। कुछ समय के लिए ध्यान की अवस्था में बैठे रहें। यह एक राउंड कपालभाति है। एक राउंड में जितनी बार आप आराम से सांस बाहर फेंक सकें उतना ही करें। इस प्रकार इसका तीन से चार राउंड अभ्यास कर लें।

सावधानी : यह अभ्यास सुबह खाली पेट शौचादि के बाद खुले वातावरण में करें। हाई बीपी, हृदय रोग में इसका अभ्यास गाइडेंस में करें। हर्निया, अल्सर व पेट का ऑपरेशन हुआ हो तो इसका अभ्यास न करें। महिलाओं को गर्भावस्था व मासिक धर्म के दिनों में यह अभ्यास नहीं करना चाहिए।



लाभ : अभ्यास के समय ध्यान को गिनती या घड़ी पर न रखें। बल्कि विचार करें कि निकलती हुई सांस अपने साथ अन्दर के विकारों को बाहर निकाल रही है।
- पेट के बार-बार अन्दर जाने से पाचन तंत्र के अंग जैसे अमाशय, आंतें, लीवर, किडनी, पैंक्रियाज आदि अंग स्वस्थ हो रहे हैं।
- इससे मोटापा, डायबटीज, कब्ज़, गैस, भूख ना लगना और अपच जैसे पेट के रोग ठीक होते हैं।
- यह बाल झड़ने से भी बचाता है।
- हृदय, फेफड़े, थायरॉयड व मस्तिष्क को बल मिलता है।
- खून में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़कर रक्त शुद्ध होने लगता है।
- महिलाओं में मासिक धर्म की अनियमितता, कष्टार्तव, श्वेत प्रदर, आदि को ठीक कर गर्भाशय व ओवरी को बल मिलता है।
- इसके अभ्यास से हार्मोंस संतुलित रहते हैं व शरीर में गांठे नहीं पड़ने देते।
- यह क्रिया शरीर का वज़न संतुलित रखने में भी मदद करती है।



स्मरण शक्ति एवं बौद्धिक क्षमता जीवन में प्रगति के लिए प्रमुख साधन माने जाते हैं. योग से मानसिक क्षमताओं का विकास होता है और स्मरण शक्ति पर भी गुणात्मक प्रभाव होता है. योग मुद्रा और ध्यान मन को एकाग्र करने में सहायक होता है. एकाग्र मन से स्मरण शक्ति का विकास होता है. प्रतियोगिता परीक्षाओं में तार्किक क्षमताओं पर आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं. योग तर्क शक्ति का भी विकास करता है एवं कौशल को बढ़ता है. योग की क्रियाओं द्वारा तार्किक शक्ति एवं कार्य कुशलता में गुणात्मक प्रभाव होने से आत्मविश्वास भी बढ़ता है



पेट की चर्बी घटाए धनुरासन


आज पूरी दुनिया मोटापे से परेशान है और इसके लिये लोक बहुत परेशान हैं। अगर आप बिना जिम जाए पेट की चर्बी को घटाना चाहते हैं तो, धनुरासन करें। धनुरासन से पेट की चर्बी कम होती है। धनु का अर्थ धनुष होता है। इस आसन में धनुषाकार आकृति बनाई जाती है। इसमें हाथों का उपयोग सिर, धड और टांगों को ऊपर खींचने के लिए प्रत्यंचा की तरह किया जाता है। शरीर को धनुष के समान टेड़ाकरके फ़ैलाने और शरीर को सशक्त बनाने की इस क्रिया से तरुणाई की प्राप्ति होती है। इससे सभी आंतरिक अंगों, माँसपेशियों और जोड़ों का व्यायाम हो जाता है। गले के तमाम रोग नष्ट होते हैं। पाचनशक्ति बढ़ती है। श्वास की क्रिया व्यवस्थित चलती है। मेरुदंड को लचीला एवं स्वस्थ बनाता है। सर्वाइकल, स्पोंडोलाइटिस, कमर दर्द एवं उदर रोगों में लाभकारी आसन है। स्त्रियों की मासिक धर्म सम्बधी विकृतियाँ दूर करता है। मूत्र-विकारों को दूर कर गुर्दों को पुष्ट बनाता है।

विधि- चटाई बिछा कर पेट के बल लेट जाएँ। श्वास को छोड़ते हुए दोनों घुटनों को एक साथ मोड़ें, एडियों को पीठ की ओर बढ़ाएं और अपनी बाँहों को पीछे की ओर तानें फिर बाएं हाथ से बाएं टखने को एवं दायें हाथ से दायें टखने को पकड़ लें। अब श्वास भरकर यथासम्भव उसे रोके रखें। अब सांसों को पूरी तरह निकाल दें और जमीन से घुटनों को उठाते हुए दोनों टाँगें ऊपर की ओर खींचें और उसी समय जमीन पर से सीने को उठायें। बांह और हाथ झुके हुए धनुष के समान शरीर को तानने में प्रत्यंचा के समान कार्य करते हैं। अब अपने सिर को ऊपर की ओर उठायें एवं यथासम्भव पीछे की ओर ले जाएँ । टाँगे ऊपर उठाते समय घुटनों के पास उन्हें सरकने न दें अन्यथा काफी ऊँचाई तक टाँगें उठ नहीं सकेंगी। अब टांगों घुटनों और टखनों को सटा लें। इस दौरान श्वास की गति तेज होगी लेकिन इसकी चिंता न करते हुए यथाशक्ति १५ सेकंड से १ मिनट तक रुकें और आगे- पीछे, दायें -बाएं शरीर को हिला डुला सकते हैं। अब श्वास छोड़ते हुए धीरे धीरे टखनों को भी छोड़ दें और दोनों टांगों को सीधी कर लें,किन्तु यह ध्यान रहे क़ि पहले घुटनों को जमीन पर रखें फिर तुड्डी को जमीन स्पर्श कराएँ और इसके बाद पैरों को छोड़ते हुए उन्हें जमीन तक धीरे धीरे आने दें। अपने कपोल को जमीन पर रखकर विश्राम करें। यह अभ्यास ५ सेकेण्ड से आरम्भ करें और प्रतिदिन समय को तब तक बढ़ाते रहें जब तक बिना किसी दबाव के १५ से ३० सेकेण्ड तक न हो जाये। इसे प्रातःकाल खाली पेट करें और अधिक से अधिक ३ बार कर सकते हैं। इस आसन के दौरान ध्यान विशुद्धि चक्र पर केन्द्रित होना चाहिए। जो व्यक्ति यक्ष्मा ,आंत उतरने की बीमारी या पेप्टिक अल्सर एवं उच्च रक्त चाप से ग्रस्त हों, वे इसे कदापि न करें। लाभ - यह आसन मेरुदंड को लचीला एवं स्वस्थ बनाता है। सर्वाइकल स्पांडिलाइटिस, कमर दर्द और पेट संबंधी रोगों में भी यह लाभकारी है। यह आसन स्‍त्रीरोग में भी लाभकारी है। यह आसान प्रसव के बाद पेट पर पड़ने वाली झुर्रियों को दूर करता है। साथ ही मासिकधर्म, गर्भाशय के रोग तथा डिम्‍बग्रंथियों के रोग खत्‍म हो जाते हैं। यह आसन गमर दर्द और गर्दन दर्द के लिये लाभकारी होता है। 


किस रोग में कौन से योग आसन कारगर

मोटापा : वैसे तो मात्र आंजनेय आसन ही लाभयायक सिद्ध होगा लेकिन आप करना चाहे तो ये भी कर सकते हैं- वज्रासन, मण्डूकासन, उत्तानमण्डूसकासन, उत्तानकूर्मासन, उष्ट्रासन, चक्रासन, उत्तानपादासन, सर्वागांसन व धनुरासन, भुजंगासन, पवनमुक्तासन, कटिचक्रासन, कोणासन, उर्ध्वाहस्तोहत्तातनासन और पद्मासन।

कमर और पेट की चर्बी घटाएं : ऑफिस में लगातार कुर्सी पर बैठे रहने या अन्य किसी कारण से अब अधिकतर लोगों के पेट निकल आए हैं और कमर पर भी अच्छी-खासी चर्बी चढ़ गई है। इस चर्बी को घटाने के लिए कटि चक्रासन के अलावा तोलांगुलासन भी उत्तम है, लेकिन आप चाहे तो ये आसन भी आजमा सकते हैं- वृक्षासन, ताड़ासन, त्रिकोणासन, पादस्तासन, आंजनेय आसन और वीरभद्रासन भी कर सकते हैं।

कमर दर्द : मकरासन, भुजंगासन, हलासन और अर्ध-मत्स्येन्द्रासन के अभ्यास से कमर का दर्द मिट जाता है।

कब्ज आज का महारोग है। यह अनियमित भोजन, मांस, फास्ट-फूड मैदा, धूम्रपान, मदिरा आदि का सेवन करने से होती है। इसके अलावा तनाव और अनिद्रा भी इसके कारण हैं। योगाभ्यास के विभिन्न आसनों और मुद्राओं के माध्यम से हम इस रोग से छुटकारा पा सकते हैं।

कब्ज रोग के लिए : वज्रासन, सुप्तवज्रासन, मयूरासन, पश्चिचमोत्तानासन, धनुरासन मत्स्यासन, कूर्मासन, चक्रासन, योग मुद्रा और अग्रिसार क्रिया लाभदायक रहती हैं।

झड़ते बालों के लिए : बालों के झड़ने का कारण है शहर का प्रदूषण, धूल, धुआं और दूषित भोजन-पानी। इसके अलावा तनाव और अवसाद। प्रदूषण से त्वचा रूखी हो जाती है रूखी त्वचा में डैंड्रफ हो जाते हैं और यह रूखी त्वचा चर्म रोग का कारण भी बन सकती है।

ये करें : वज्रासन के बाद कुर्मासन करें फिर उष्ट्रासन करें। पवनमुक्तासन के बाद मत्स्यासन करें फिर कुछ देर विश्राम करने के बाद शीर्षासन करें। आसनों को करने के बाद अनुलोम-विलोम प्राणायम करें और फिर पांच मिनट का ध्यान करें।

तनाव भरा जीवन, नशे की प्रवृत्ति और प्रदूषण भरे माहौल में पुरुषों की सेक्स लाइफ का स्तर लगातर गिरता जा रहा है। कहते हैं कि सुखी जीवन के लिए सेक्स के प्रति संतु‍ष्टि होना आवश्यक है, जिससे जीवन के द्वंद्व मिटते हैं। 

सेक्स लाइफ में सुधार के त्रिस्तर : शरीर, प्राण और मन अर्थात आसन से शरीर, प्राणायम से प्राण और ध्यान से मन में शांति और शक्ति संचार होता है। आप यदि प्रतिदिन सूर्यनमस्कार करेंगे तो फायदा होगा।


गैस की दिक्कत को यूं करें गायब


पेट गैस को अधोवायु बोलते हैं। इसे पेट में रोकने से कई बीमारियां हो सकती हैं, जैसे एसिडिटी, कब्ज, पेटदर्द, सिरदर्द, जी मिचलाना, बेचैनी आदि। लंबे समय तक अधोवायु को रोके रखने से बवासीर भी हो सकती है। आयुर्वेद कहता है कि आगे जाकर इससे नपुंसकता और महिलाओं में यौन रोग होने की भी आशंका हो सकती है।
गैस बनने के लक्षण 
पेट में दर्द, जलन, पेट से गैस पास होना, डकारें आना, छाती में जलन, अफारा। इसके अलावा, जी मिचलाना, खाना खाने के बाद पेट ज्यादा भारी लगना और खाना हजम न होना, भूख कम लगना, पेट भारी-भारी रहना और पेट साफ न होने जैसा महसूस होना। 

किससे बनती है गैस 



खानपान 
शराब पीने से।, मिर्च-मसाला, तली-भुनी चीजें ज्यादा खाने से। बींस, राजमा, छोले, लोबिया, मोठ, उड़द की दाल, फास्ट फूड, ब्रेड और किसी-किसी को दूध या भूख से ज्यादा खाने से। खाने के साथ कोल्ड ड्रिंक लेने से। इसमें गैसीय तत्व होते हैं। तला या बासी खाना। 

लाइफस्टाइल 
टेंशन रखना। देर से सोना और सुबह देर से जागना। खाने-पीने का टाइम फिक्स्ड न होना। 

बाकी वजहें 
लीवर में सूजन, गॉल ब्लेडर में स्टोन, फैटी लीवर, अल्सर या मोटापे से। डायबीटीज, अस्थमा या बच्चों के पेट में कीड़ों की वजह से। अक्सर पेनकिलर खाने से। कब्ज, अतिसार, खाना न पचने व उलटी की वजह से। 

मुद्रा विज्ञान 
अपान मुद्रा : यह मुदा अंगूठे के अग्रभाग को मध्यमा (दूसरी उंगली) और अनामिका (तीसरी उंगली) के अग्रभाग से छुआने से बनती है। इसमें तर्जनी (पहली उंगली) और कनिष्ठिका (चौथी उंगली) सीधी खड़ी रहेंगी। यह मुद्रा चलते-फिरते उठते-बैठते-लेटे कभी भी कर सकते हैं। रोज एक से 45 मिनट तक कर सकते हैं। गैस रिलीस न हो रही हो तो इस मुद्रा को अपनाने से कुछ ही मिनटों में असर दिख जाता है। 

योग 
वज्रासन : खाने के बाद घुटने मोड़कर बैठ जाएं। दोनों हाथों को घुटनों पर रख लें। 5 से 15 मिनट तक करें। 
गैस पाचन शक्ति कमजोर होने से होती है। यदि पाचन शक्ति बढ़ा दें तो गैस नहीं बनेगी। योग की अग्निसार क्रिया से आंतों की ताकत बढ़कर पाचन सुधरेगा। 

कितनी देर करें 
एक सिटिंग में 30 सेकंड तक करें। लेकिन एक बार में ही नहीं, 



प्राणायाम से दूर होते हैं ये रोग


चरक ने वायु को मन का नियंता एवं प्रणेता माना है। आयुर्वेद अनुसार काया में उत्पन्न होने वाली वायु है उसके आयाम अर्थात निरोध करने को प्राणायाम कहते हैं। आओ जानते हैं कैसे करें प्राणायाम और कौन-सा रोग मिटेगा प्राणायाम से...

प्राणायाम के पांच फायदे जानना जरूरी

प्राणायाम की शुरुआत : प्राणायाम करते समय 3 क्रियाएं करते हैं- 1.पूरक, 2.कुंभक और 3.रेचक। इसे ही हठयोगी अभ्यांतर वृत्ति, स्तम्भ वृत्ति और बाह्य वृत्ति कहते हैं।

(1) पूरक- अर्थात नियंत्रित गति से श्वास अंदर लेने की क्रिया को पूरक कहते हैं। श्वास धीरे-धीरे या तेजी से दोनों ही तरीके से जब भीतर खींचते हैं तो उसमें लय और अनुपात का होना आवश्यक है।

(2) कुंभक- अंदर की हुई श्वास को क्षमतानुसार रोककर रखने की क्रिया को कुंभक कहते हैं। श्वास को अंदर रोकने की क्रिया को आंतरिक कुंभक और श्वास को बाहर छोड़कर पुन: नहीं लेकर कुछ देर रुकने की क्रिया को बाहरी कुंभक कहते हैं। इसमें भी लय और अनुपात का होना आवश्यक है।

(3) रेचक- अंदर ली हुई श्वास को नियंत्रित गति से छोड़ने की क्रिया को रेचक कहते हैं। श्वास धीरे-धीरे या तेजी से दोनों ही तरीके से जब छोड़ते हैं तो उसमें लय और अनुपात का होना आवश्यक है।

पूरक, कुंभक और रेचक की आवृत्ति को अच्छे से समझकर प्रतिदिन यह प्राणायाम करने से कुछ रोग दूर हो जाते हैं। इसके बाद आप भ्रस्त्रिका, कपालभाती, शीतली, शीतकारी और भ्रामरी प्राणायाम को एड कर लें।

योगकुडल्योपनिषद के अनुसार प्राणायाम से गुल्म, जलोदर, प्लीहा तथा पेट संबंध सभी रोग पूर्ण रूप से खत्म हो जाते हैं। प्राणायाम द्वारा 4 प्रकार के वात दोष और कृमि दोष को भी नष्ट किया जा सकता है। इससे मस्तिष्क की गर्मी, गले के कफ संबंधी रोग, पित्त-ज्वर, प्यास का अधिक लगना आदि रोग भी दूर होते हैं।

नाड़ी शोधन के लाभ : नाड़ी शोधन के नियमित अभ्यास से मस्तिष्क शांत रहता है और सभी तरह की चिंताएं दूर हो जाती हैं। 3 बार नाड़ी शोधन करने से रक्त संचार ठीक तरह से चलने लगता है। इसके नियमित अभ्यास से बधिरता और लकवा जैसे रोग भी मिट जाते हैं। इससे शरीर में ऑ‍क्सीजन का लेवल बढ़ जाता है।

भस्त्रिका के लाभ : प्रतिदिन 5 मिनट भस्त्रिका प्राणायाम करने से रक्त शुद्ध हो जाता है। सर्दी-जुकाम और एलर्जी दूर हो जाती है। मस्तिष्क को फिर से उर्जा प्राप्त होती है।

कपालभाती प्राणायाम : कपालभाती से गैस, कब्ज, मधुमेह, मोटापा जैसे रोग दूर रहते हैं और मुखमंडल पर तेज कायम हो जाता है।

बाह्म प्राणायाम : 5 बार बाह्य प्राणायाम करने से मन की चंचलता दूर हो जाती है। इसके अलावा उदर रोग दूर होकर जठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है।

अनुलोम-विलोम : 10 मिनट अनुलोम-विलोम करने से सिरदर्द ठीक हो जाता है। नकारात्मक चिंतन से चित्त दूर होकर आनंद और उत्साह बढ़ जाता है।

भ्रामरी प्राणायाम : 11 बार भ्रामरी करने से जहां तनाव दूर होता है वहीं रक्तचाप और हृदयरोग में लाभ मिलता है। इससे अनिद्रा रोग में भी लाभ मिलता है।

उज्जायी प्राणायाम : 5 बार उज्जायी करने से कफ का निदान होकर गला मधुर हो जाता है। सर्दी-जुकाम में भी यह लाभदायक है। इसके नियमित अभ्यास से हकलाना ठीक हो जाता है।

सीत्कारी : 11 बार सीत्कारी करने से पायरिया दूर हो जाता है और दांत का कोई भी रोग नहीं होता।

शीतली : इस प्राणायाम से पित्त, कफ, अपच जैसी बीमारियां बहुत जल्द समाप्त हो जाती हैं। योग शास्त्र के अनुसार लंबे समय तक इस प्राणायाम के नियमित अभ्यास से व्यक्ति पर जहर का भी असर नहीं होता। 11 बार शीतली कर भूख-प्यास पर कंट्रोल किया जा सकता है और मुंह व गले के रोग सहित पित्त संबंधी रोग भी मिट जाते हैं। इससे शरीर शीतल बना रहता है।

कमर दर्द के लिए योगासन


कमर का दर्म कमर तोड़ देता है। कमर का दर्द असहनीय होता है। पीठ दर्द, कमर दर्द, सरवाइकल और कमर से जुड़ी अन्य समस्याएं आम हो गई है। डॉक्टर भी कहते हैं कि इसका सबसे अच्छा इलाज योग ही है। आओ जानते हैं कि वह कौन से आसन हैं जिससे कमर का दर्द ठीक हो जाता है। ये चार आसन है- मकरासन, भुजंगासन, हलासन और अर्ध मत्येन्द्रासन। 

1.मकरासन ( makarasana ) : मकरासन की गिनती पेट के बल लेटकर किए जाने वाले आसनों में की जाती है। इस आसन की अंतिम अवस्था में हमारे शरीर की आकृति मगर की तरह प्रतीत होती है इसीलिए इसे मकरासन कहते हैं। मकरासन से जहां दमा और श्वांस संबंधी रोग समाप्त हो जाते हैं वहीं यह कमर दर्द में रामबाण औषधि है।
2.भुजंगासन ( bhujangasana ) : भुजंगासन की गिनती भी पेट के बल लेटकर किए जाने वाले आसनों में की जाती है। इस आसन की अंतिम अवस्था में हमारे शरीर की आकृति फन उठाए सांप की तरह प्रतीत होती है इसीलिए इसे भुजंगासन कहते हैं।

3.हलासन ( halasana ) : दो आसन पेट के बल करने के बाद अब पीठ के बील किए जाने वाले आसनों में हलासन करें। हलासन करते वक्त शरीर की स्थित हल के समान हो जाती है इसीलिए इसे हलासन कहते हैं।

4.अर्ध-मत्स्येन्द्रासन ( ardha matsyendrasana ) : यह आसन सबसे महत्वपूर्ण है। कहते हैं कि मत्स्येन्द्रासन की रचना गोरखनाथ के गुरु स्वामी मत्स्येन्द्रनाथ ने की थी। वे इस आसन में ध्यानस्थ रहा करते थे। मत्स्येन्द्रासन की आधी क्रिया को लेकर ही अर्ध-मत्स्येन्द्रासन प्रचलित हुआ।






योगा से हेयर केयर


बालों समस्या अब आम हो चली है। इसका कारण शहर का प्रदूषण, धूल, धुवां और दूषित भोजन-पानी। इस सबके कारण सिर से लेकर पांव तक त्वचा रुखी हो जाती है। रुखी त्वचा से जहां, डैंड्रफ और बालों से संबंधित अन्य रोग होते हैं वहीं यह चर्म रोग का कारण भी बन सकता है।

हालांकि बाल झड़ने का एक और कारण है- तनाव और अन्य मानसिक परेशानियां। आओ हम जानते हैं कि योग इस सबसे छुटकारा दिलाने में हमारी क्या मदद कर सकता है।

क्या करें : सबसे पहले साबुन का इस्तेमाल करना बंद कर हल्दी, बेसन, शिकाकाई आदि का उबटन बनाकर उसी से स्नान करें। फिर अच्छे से पुरे बदन की तेल मालिश करें। प्रतिदिन एक आंवला खाएं और निम्नलिखित योगासन करें।

व्रजासन, पवन मुक्तासन, उष्ट्रासन और शीर्षासन करें। उक्त आसनों के विलोम आसन भी करें। उसके बाद प्राणायाम में नियमित रूप से अनुलोम-विलोम करें।

योगा पैकेज : प्रदूषण से बचें। यौगिक आहार का सेवन करें। वज्रासन के बाद कुर्मासन करें फिर उष्ट्रासन करें। पवनमुक्तासन के बाद मत्स्यासन करें फिर कुछ देर विश्राम करने के बाद शीर्षासन करें। आसनों को करने के बाद अनुलोम-विलोम प्राणायम करें और फिर पांच मिनट का ध्यान करें।



पेट, कमर और पीठ के लिए करें योगा

यदि आपका पेट थुलथुल हो रहा है, कमर मोटी हो चली है या पीठ दुखती रहती है, तो योग की यह हल्की-फुल्की एक्सरसाइज करें। ‍इस एक्सरसाइज के नियमित अभ्यास करते रहने से निश्चितरूप से जहां पेट फ्लैट हो जाएगा वहीं कमर भी छरहरी हो जाएगी।

योगा एक्सरसाइज:
स्टेप 1- दोनों पैरों को थोड़ा खोलकर सामने फैलाए। दोनों हाथों को कंधों के समकक्ष सामने उठाकर रखें। फिर दाहिनें हाथ से बाएं पैर के अंगूठे को पकड़े एवं बाएं हाथ को पीछे की ओर ऊपर सीधा रखें, गर्दन को भी बाईं ओर घुमाते हुए पीछे की ओर देखने का प्रयास करें। इसी प्रकार दूसरी ओर से करें। इन दोनों अभ्यासों से कमर दर्द व पेट स्वस्थ होता है तथा कमर की बढ़ी हुई चर्बी दूर होती है, परन्तु जिनको अत्यधिक कमर दर्द है वे इस अभ्यास को न करें।

स्टेप 2- दोनों हाथों से एक दूसरे हाथ की कलाई पकड़कर ऊपर उठाते हुए सिर के पीछे ले जाएं। श्वास अन्दर भरते हुए दाएं हाथ से बाएं हाथ को दाहिनी ओर सिर के पीछे से खीचें। गर्दन व सिर स्थिर रहे। फिर श्वास छोड़ते हुए हाथों को ऊपर ले जाएं। इसी प्रकार दूसरी ओर से इस क्रिया को करें।

स्टेप 3- घुटने और हथेलियों के बल बैठ जाएं। जैसे बैल या बिल्ली खड़ी हो। अब पीठ को ऊपर खिठचें और गर्दन झुकाते हुए पेट को देखने का प्रयास करें। फिर पेट व पीठ को नीचे खिंचे तथा गर्दन को ऊपर उठाकर आसमान में देंखे। यह प्रक्रिया 8-12 बार करें।

एक्सट्रा टिप्स:
आहार संयम : सर्वप्रथम तो अपना आहार बदलें। पानी का अधिकाधिक सेवन करें, ताजा फलों का रस, छाछ, आम का पना, जलजीरा, बेल का शर्बत आदि तरल पदार्थों को अपने भोजन में शामिल करें। ककड़ी, तरबूज, खरबूजा, खीरा, संतरा तथा पुदीने का भरपूर सेवन करें तथा मसालेदार या तैलीय भोज्य पदार्थ से बचें। हो सके तो दो भोजन कम ही करें।

योगासन : प्रतिदिन सवेरे सूर्य नमस्कार का अभ्यास करें। कपालभाति और भस्त्रिका के साथ ही अनुलोम-विलोम करें। खड़े होकर किए जाने वाले योगासनों में त्रिकोणासन, कटिचक्रासन, ताड़ासन, अर्धचंद्रासन और पादपश्चिमोत्तनासन करें।

बैठकर किए जाने वाले आसनों में उष्ट्रासन, अर्धमत्स्येंद्रासन, सिंहासन, समकोणासन, ब्रम्ह मुद्रा और भारद्वाजासन करें। लेटकर किए जाने वाले आसनों में नौकासन, विपरीत नौकासन, भुजंगासन, धनुरासन और हलासन करें। बंधों में जालंधर और उड्डियान बंध का अभ्यास करें।



शरीर और मन की शांति के लिये बालासन


माना जाता है कि मां की कोख से अच्‍छी आराम की जगह और कोई नहीं होती। तभी तो जब आप इस अवस्‍था में कभी लेटते हैं तो शरीर और दिमाग दोनों को ही आराम पहुंचता है। बालासन योग का अभ्‍यास आप अपने शरीर को आरामदायक स्थिति में लाने के लिए कर सकते हैं। इस आसन से मेरूदंड और कमर में खींचाव होता है और इनमें मौजूद तनाव दूर होता है। बालाअसन करने के फायदे- यह पीठ, कंधे और गर्दन के तनाव को दूर करता है। शरीर के भीतरी अंगो में लचीलापन लाता है। अगर गर्दन और कमर में दर्द रहता है तो वह भी ठीक हो जाता है। शरीर और दिमाग को शांति देता है। घुटनों और मासपेशियों को स्‍ट्रेच करता है।
सावधानी जिन लोगों को उच्च रक्तचाप की समस्या हो अथवा घुटनों में परेशानी हो उन्हें इस योग का अभ्यास नहीं करना चाहिए। योग क्रिया - स्टेप 1 पलथी लगाकर बैठें स्टेप 2 अपने ऐड़ियों पर बैठें और शरीर के ऊपरी भाग को जंघाओं पर टिकाएं स्टेप 3 सिर को ज़मीन से लगाएं स्टेप 4 अपने हाथों को सिर से लगाकर आगे की ओर सीधा रखें और हथेलियों को ज़मीन से लगाएं स्टेप 5 अपने हिप्स को ऐड़ियों की ओर ले जाते हुए सांस छोड़े स्टेप 6 इस अवस्था में 15 सेकेण्ड से 2 मिनट तक रहें
मिर्गी रोग को जड़ से खत्म करते हैं ये योगासन


मिर्गी के लिए योग : मिर्गी एक दिमागी बीमारी है जिसमें रोगी को अचानक दौरा पड़ने लगता है। दौरा पड़ने पर व्यक्ति का दिमागी संतुलन बिगड़ जाता है और उसका शरीर अकड़ जाता है। मिर्गी के रोग को ठीक करने के लिए रोगी कई तरह के इलाज करवाते हैं लेकिन कई बार इससे दौरे पड़ने की स्थिति में फर्क नहीं पड़ता। ऐसे में योगासन करके मिर्गी की समस्या को जड़ से खत्म किया जा सकता है। आइए जानिए ऐसे ही कुछ योग क्रियाओं के बारे में



प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली क्या है ?

प्राकृतिक−चिकित्सा−प्रणाली का अर्थ है प्राकृतिक पदार्थों विशेषतः प्रकृति के पाँच मूल तत्वों द्वारा स्वास्थ्य−रक्षा और रोग निवारण का उपाय करना। विचारपूर्वक देखा जाय तो यह कोई गुह्य विषय नहीं है और जब तक मनुष्य स्वाभाविक और सीधा−सादा जीवन व्यतीत करता रहता है तब तक वह बिना अधिक सोचे−विचारे भी प्रकृति की इन शक्तियों का प्रयोग करके लाभान्वित होता रहता है। पर जब मनुष्य स्वाभाविकता को त्याग कर कृत्रिमता की ओर बढ़ता है, अपने रहन−सहन तथा खान−पान को अधिक आकर्षक और दिखावटी बनाने के लिये प्रकृति के सरल मार्ग से हटता जाता है तो उसकी स्वास्थ्य−सम्बन्धी उलझनें बढ़ने लगती हैं और समय−समय पर उसके शरीर में कष्टदायक प्रक्रियाएँ होने लगती हैं, जिनको ‘रोग’ कहा जाता है। इन रोगों को दूर करने के लिये अनेक प्रकार की चिकित्सा−प्रणालियाँ आजकल प्रचलित हो गई हैं जिनमें हजारों तरह की औषधियों, विशेषतः तीव्र विषात्मक द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है। इन तीव्र दवाओं से जहाँ कुछ रोग अच्छे होते हैं वहाँ उन्हीं की प्रतिक्रिया से कुछ अन्य व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और संसार में रोगों के घटने के बजाय नित्य नवीन रोगों की वृद्धि होती जाती है। इस अवस्था को देख कर पिछले सौ−डेढ़−सौ वर्षों के भीतर योरोप अमरीका के अनेक विचारशील सज्जनों का ध्यान प्राकृतिक तत्वों की उपयोगिता की तरफ गया और उन्होंने मिट्टी, जल, वायु, सूर्य−प्रकाश आदि के विधिवत् प्रयोग द्वारा शारीरिक कष्टों, रोगों को दूर करने की एक प्रणाली का प्रचार किया। वही इस समय प्राकृतिक चिकित्सा या ‘नेचर क्योर’ के नाम से प्रसिद्ध है।

पर यह समझना कि प्राकृतिक−चिकित्सा प्रणाली का आविष्कार इन्हीं सौ−दो−सौ वर्षों के भीतर हुआ है, ठीक न होगा। हमारे देश में अति प्राचीन काल से प्राकृतिक पंच−तत्वों की चमत्कारी शक्तियों का ज्ञान था और उनका विधिवत् प्रयोग भी किया जाता था। और तो क्या हमारे वेदों में भी, जिनको अति प्राचीनता के कारण अनादि माना जाता है और जिनका उद्भव वास्तव में वर्तमान मानव सभ्यता के आदि काल में हुआ था प्राकृतिक चिकित्सा के मुख्य−सिद्धान्तों का उल्लेख है। ऋग्वेद का एक मंत्र देखिये—
आपः इद्वा उ भेषजीरापो अमीवचातनीः।आपः सर्वस्य भेषजीस्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्॥ (10−137−6)

“जल औषधि रूप है, यह सभी रोगों को दूर करने वाली महान औषधि के तुल्य गुणकारी है। यह जल तुमको औषधियों के समस्त गुण (लाभ) प्राप्त करावे।”

इस तरह के वचन ऋग्वेद और अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर मिलते हैं। साथ ही सूर्य−प्रकाश तथा वायु के आरोग्यप्रदायक गुणों का भी उल्लेख मिलता है। तामिल भाषा में वेदों के समान ही पूजनीय माना जाने वाले ‘कुरल’ नामक ग्रन्थ में प्राकृतिक चिकित्सा की विधियों की बड़े उत्तम ढंग से शिक्षा दी गई हैं। यह ग्रन्थ दो हजार वर्ष से अधिक पुराना है। इसी प्रकार योरोप के सर्वप्रथम चिकित्साशास्त्री माने जाने वाले ‘हिप्पोक्रेट्स’ ने मनुष्यों को स्वास्थ्य विषयक उपदेश देते हुये स्पष्ट लिखा है “तेरा आहार ही तेरी औषधि हो और तेरी औषधि तेरा आहार हो।” आजकल भी प्राकृतिक चिकित्सकों का एक बहुत बड़ा सिद्धांत यही है कि आहार ही ऐसा दिया जाय जो औषधि का काम दे और जिससे शरीर के विकार स्वयं दूर हो जायें। हिप्पोक्रेट्स का सिद्धान्त पूर्णतया भारतीय विद्वानों के मत से मिलता हुआ है, और उसे भारतवर्ष की विद्याओं का ज्ञान हो तो कोई आश्चर्य भी नहीं। क्योंकि उस ढाई हजार पुराने युग में भारत की सभ्यता और संस्कृति का संसार के सभी भागों में प्रचार हो चुका था।
इस प्रकार जब तक मनुष्य प्रकृति की गोद में पलते−खेलते थे, उनका रहन−सहन भी प्राकृतिक नियमों के अनुकूल था तो वे अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति प्राकृतिक ढंग से ही करते थे। पर मध्यकाल में जब बड़े−बड़े राज्यों और साम्राज्यों की स्थापना हो गई तो बड़े आदमियों के रहन−सहन में भोग विलास की अधिकता होने लगी और उसकी पूर्ति के लिये भाँति−भाँति के कृत्रिम उपायों का प्रयोग भी बढ़ने लगा। साधारण लोग भी उनकी नकल करके नकली चीजों को अधिक सुन्दर और आकर्षक समझने लगे, जिसके फल से लोगों का स्वास्थ्य निर्बल पड़ने लगा, तभी तरह−तरह के रोगों की वृद्धि होने लगी। जब काल क्रम से यह अवस्था बहुत बिगड़ गई और संसार की जनसंख्या तरह−तरह के भयानक तथा गन्दे रोगों के पंजे में फँस गई तो विचारशील लोगों का ध्यान इसके मूल कारण की तरफ गया और उन्होंने कृत्रिम आहार−बिहार की हानियों को समझ कर “प्रकृति की ओर लौटो” (बैक टू नेचर) का नारा लगाया।

यदि हम भारतीय धर्म और संस्कृति की दृष्टि से इस चिकित्सा−प्रणाली की व्याख्या करें तो हम कह सकते हैं कि मनुष्य के स्वास्थ्य और रोगों के भीतर भगवान की दैवी शक्ति ही काम कर रही है। व्यवहारिक क्षेत्र में यह रोगों और व्याधियों के निवारण के लिये केवल उन्हीं आहारों तथा पञ्च तत्वों का औषधि रूप में प्रयोग करना बतलाती है जो सर्वथा प्रकृति के अनुकूल हैं। इस प्रकार इस चिकित्सा के छह विभाग हो जाते हैं−मानसिक चिकित्सा, उपवास, सूर्य−प्रकाश−चिकित्सा, वायु चिकित्सा, जल चिकित्सा, आहार अथवा मिट्टी चिकित्सा।

आजकल जिस डाक्टरी चिकित्सा−पद्धति का विशेष प्रचलन है उसका उद्देश्य किसी भी उपाय से रोग में तत्काल लाभ दिखला देना होता है, फिर चाहे वह लाभ क्षण स्थायी−धोखे की टट्टी ही क्यों न हो। हम देखते हैं कि अस्पतालों में एक−एक रोगी को महीनों तक प्रतिदिन तीव्र इंजेक्शन लगते रहते हैं, पर एक शिकायत ठीक होती है तो दूसरी उत्पन्न हो जाती है। पर पीड़ा के कुछ अंशों में मिटते रहने के कारण लोग इस बाह्य चिह्नों की चिकित्सा के फेर में पड़े रहते हैं। इसके विपरीत प्राकृतिक चिकित्सा में रोगों के विभिन्न नामों तथा रूपों की चिन्ता न करके उनके मूल कारण पर ही ध्यान दिया जाता है और उसी को निर्मूल करने का प्रयत्न किया जाता है। इतना ही नहीं इस चिकित्सा का वास्तविक लक्ष्य केवल शारीरिक ही नहीं वरन् मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य प्राप्त कराना भी माना गया है, क्योंकि मानसिक तथा आध्यात्मिक सुधार के बिना शारीरिक स्वास्थ्य स्थायी नहीं हो सकता। इसलिये भारतीय चिकित्सा प्रणाली में जहाँ शुद्ध आहार−बिहार का विधान है वहाँ उच्च और पवित्र जीवन व्यतीत करने पर भी जोर दिया गया है। प्राकृतिक चिकित्सा के तत्व का यथार्थ रूप में हृदयंगम करने वाला व्यक्ति गीता के “कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” वाले वाक्य पर पूर्ण श्रद्धा रखकर ‘सत्य−आचरण’ को ध्यान रखता है और फल को भगवान के ऊपर छोड़ देता है। सत्य−आचरण वाला व्यक्ति प्रथम तो रोगी ही नहीं होगा और यदि किसी गलती या दुर्घटना से हो भी गया तो उसी आचरण के प्रभाव से रोग का निवारण शीघ्र ही हो जायेगा। रोग की अवस्था में यह ‘सत्य−आचरण’ उपवास शुद्ध वायु, प्रकाश, जल स्नान तथा औषधि रूप आहार का प्रयोग करना ही हो सकता है, इन साधनों से हम सब प्रकार के रोगों की सफलतापूर्वक चिकित्सा करने में सक्षम हो सकते हैं।
आगे चलकर जब रोगों के कारण और स्वरूप पर विचार करते हैं तो मालूम होता है कि रोग जीवित शरीर में ही उत्पन्न हो सकता है। जीवित शरीर एक मशीन या यंत्र की तरह है जिसका संचालन एक सूक्ष्मशक्ति (प्राण) द्वारा होता है। यही शक्ति भौतिक पदार्थों का सार ग्रहण करके उससे शरीर का निर्माण कार्य करती रहती है और दूसरी ओर इसी के द्वारा सब प्रकार के आहार से बचे हुये निस्सार मल रूप अंश का निष्कासन किया जाता है। ये दोनों क्रियाऐं एक दूसरे से सम्बन्धित हैं और इन दोनों के बिना ठीक तरह सञ्चालित हुये न तो जीवन और न स्वास्थ्य स्थिर रह सकता है। पर हम देखते हैं कि अधिकाँश लोग ग्रहण करने की—भोजन की क्रिया के महत्व को तो कुछ अंशों में समझते हैं और अपनी बुद्धि तथा सामर्थ्य के अनुसार पौष्टिक, शक्ति प्रदायक, ताजा, रुचिकारक भोजन की व्यवस्था करते हैं, पर निष्कासन की क्रिया के महत्व को समझने वाले और उस पर ध्यान देने वाले व्यक्तियों की संख्या अत्यन्त न्यून है। लोग समझते हैं कि उत्तम भोजन को पेट में डाल लिया जायेगा तो वह लाभ ही करेगा। पर यह भोजन यदि नियमानुसार परिमित मात्रा में पथ्य−अपथ्य का ध्यान रख कर न किया जायेगा तो निष्कासन की क्रिया का बिगड़ जाना अवश्यम्भावी है। उसके परिणामस्वरूप शरीर के भीतर मल और विकार जमा होने लगते हैं और स्वास्थ्य का संतुलन नष्ट हो जाता है।

यह विकार या विजातीय द्रव्य शरीर के स्वाभाविक तत्वों के साथ मिल नहीं पाता और एक प्रकार का संघर्ष अथवा अशान्ति उत्पन्न कर देता है। हमारी जीवनी−शक्ति यह कदापि पसन्द नहीं करती कि उस पर विजातीय द्रव्य का भार लादकर उसके स्वाभाविक देह−रक्षा के कामों में बाधा उपस्थित की जाय। वह हर उपाय से उसे शीघ्र से शीघ्र बाहर निकालने का प्रयत्न करती है। यदि वह उसे पूर्ण रूप से निकाल नहीं पाती तो ऐसे अंगों में डाल देने का प्रयत्न करती है जो सबसे कम उपयोग में आते हैं और जहाँ वह कम हानि पहुँचा कर पड़ा रह सकता है। इस प्रकार जब तक जीवनी−शक्ति विजातीय द्रव्य के कुप्रभाव को मिटाती रहती है तब तक हमें किसी रोग के दर्शन नहीं होते। पर जब हम बराबर गलत मार्ग पर चलते रहते हैं और विजातीय द्रव्य का परिमाण बढ़ता ही जाता है, तो लाचार होकर जीवनी शक्ति को उसे स्वाभाविक मार्गों के बजाय अन्य मार्गों से निकालना पड़ता है। चूँकि यह कार्य नवीन होता है, हमारे नियमित अभ्यास और आदतों के विरुद्ध होता है, इस लिये उससे हमको असुविधा, कष्ट, पीड़ा का अनुभव होता है और हम उसे ‘रोग’ या बीमारी का नाम देते हैं। पर वास्तविक रोग तो वह विजातीय द्रव्य या विकार होता है जिसे हम अनुचित आहार−विहार द्वारा शरीर के भीतर जमा कर देते हैं। ये कष्ट और पीड़ा के ऊपरी चिह्न तो हमारी शारीरिक प्रकृति अथवा जीवनीशक्ति द्वारा उस रोग को मिटाने का उपाय होते हैं। अगर हम इस तथ्य को समझ कर तथा कष्ट और पीड़ा को प्रकृति की चेतावनी के रूप में ग्रहण करके सावधान हो जायें तो रोग हमारा कुछ भी अनिष्ट नहीं कर सकता। उस समय हमारा कर्तव्य यही होना चाहिये कि हम प्रकृति के काम में किसी तरह का विघ्न बाधा न डालें वरन् अपने गलत रहन−सहन को बदलकर प्राकृतिक−जीवन के नियमों का पालन करने लगें। इससे विजातीय द्रव्य के बाहर निकालने के कार्य में सुविधा होगी और हम बिना किसी खतरे के अपेक्षाकृत थोड़े समय में रोग−मुक्त हो जायेंगे। संक्षेप में यही प्राकृतिक चिकित्सा का मूल रूप है, जिसको उपवास, मिट्टी और जल के प्रयोग, धूप−स्नान आदि कितने ही विभागों में बाँट कर सर्वसाधारण को बोधगम्य बनाने का प्रयत्न किया गया है।



योगासनों का सबसे बड़ा गुण


यह हैं कि वे सहज साध्य और सर्वसुलभ हैं। योगासन ऐसी व्यायाम पद्धति है जिसमें न तो कुछ विशेष व्यय होता है और न इतनी साधन-सामग्री की आवश्यकता होती है। योगासन अमीर-गरीब, बूढ़े-जवान, सबल-निर्बल सभी स्त्री-पुरुष कर सकते हैं। आसनों में जहां मांसपेशियों को तानने, सिकोड़ने और ऐंठने वाली क्रियायें करनी पड़ती हैं, वहीं दूसरी ओर साथ-साथ तनाव-खिंचाव दूर करनेवाली क्रियायें भी होती रहती हैं, जिससे शरीर की थकान मिट जाती है और आसनों से व्यय शक्ति वापिस मिल जाती है। शरीर और मन को तरोताजा करने, उनकी खोई हुई शक्ति की पूर्ति कर देने और आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से भी योगासनों का अपना अलग महत्त्व है।



मयूरासन


इस आसन में आकृति मोर के समान बनती है इसलिए इसे मयूरासन कहते हैं। इस आसन को प्रतिदिन करने से कभी मधुमेह रोग के आप शिकार नही होते।

विधि- 

सर्वप्रथम स्थिति में आएँगे ।पैरों को सामने की और सीधा कर बैठेंगे ।अब वज्रासन में आ जाइए। घुटनों में फासला करते हुए आगे की और झुकेंगे।
दोनों हथेलियों को ज़मीन पर घुटनो के बीच में रखिए। उंगलियाँ पीछे की और रहेंगी ।कोहनियों को मोड़ते हुए नाभि के पास सटाइए। सिर को ज़मीन से लगा लीजिए। अब पैरों को पीछे की ओर ले जाइए और शरीर को उपर उठाकर ज़मीन के सामने समानांतर संतुलन बनाए रखिए।
कुछ देर ५-१० सेकेंड रुकने के बाद स्थिति में आ जाए ,साँस सामान्य बनाए रखे।

सावधानी -हृदय रोग, अल्सर और हार्निया रोग में न करें।



लाभ-

पाचन तंत्र को मजबूत करता है। क़ब्ज़ में लाभदायक। पैन्क्रियास को सक्रिय रखता है ।फेफड़े अधिक सक्रिय बने रहते हैं ।पेट की चर्बी को घटाता है । हाथों, कलाईयों व कंधो को मजबूत करता है।गुर्दों व मूत्राशय के रोगों में भी लाभकारी।

इस आसन में आकृति मोर के समान बनती है इसलिए इसे मयूरासन कहते हैं। इस आसन को प्रतिदिन करने से कभी मधुमेह रोग के आप शिकार नही होते।



योग से सेहत को कितना फायदा?


आना ट्रोएकेस: हम जानते हैं कि आजकल ज्यादातर बीमारियों का तनाव से कुछ ना कुछ संबंध होता है. रोजमर्रा के जीवन का तनाव शरीर के कई हिस्सों, हृदय के रोग से लेकर शरीर के पूरे प्रतिरोधी तंत्र पर पड़ता है. हजारों सालों से योग में इन तनावों से निपटने के तरीकों का विकास हुआ है, जिनसे जीवन में तनाव से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके.

किन बीमारियों में योग के फायदे सिद्ध हो चुके हैं?

सभी तनाव संबंधी बीमारियों में इसके फायदे सिद्ध हो चुके हैं. इसमें उच्च रक्तचाप, ऑटो इम्यून डिसऑर्डर, अवसाद, घबराहट और बर्नआउट जैसी कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम की परेशानियां भी शामिल हैं. पीठ और गर्दन के दर्द से लेकर विचलित करने वाले बोवेल सिंड्रोम में भी इससे फायदा होता है. योग से केवल लक्षण ही नहीं, मूल बीमारी भी ठीक हो जाती है.

योग का शरीर पर किस तरह का प्रभाव पड़ता है?

योग का सबसे प्रमुख पक्ष है सांस और गति के बीच तालमेल स्थापित होना, जिससे शांति और विश्राम की स्थित में पहुंचा जाता है. तनाव की स्थिति में हमारा सिंपेथेटिक नर्वस सिस्टम सक्रिय रहता है. तनाव और उसके साथ आने वाली थकावट की अनुभूतियों का असर कम करने के लिए हमें तनाव के चक्र को नियमित रूप से तोड़ने की जरूरत होती है. योगाभ्यास कर शांति और विश्राम की स्थिति में आने से हमें खुद के बारे में अच्छी अनुभूति होती है. यह विचार कि हम खुद पर नियंत्रण के लिए कुछ कर सकते हैं, तनाव के असर को कम करता है. और इस तरह तनाव की अनुभूति कम तनावपूर्ण लगने लगती है.

स्वास्थ्य लाभ के लिए कितनी बार और कैसे योग का अभ्यास करना चाहिए?
योग में ध्यान का होना बेहद जरूरी है यानि आपको सजग रहना चाहिए. नियमित रूप से और मध्यम स्तर पर अभ्यास करने से सेहत को सबसे अधिक लाभ होता है. आप चाहें तो हफ्ते में तीन से पांच बार, पंद्रह से बीस मिनट तक अभ्यास कर सकते हैं, जिससे आपकी सेहत सुधरेगी. हफ्ते में एक दिन अगर और लोगों के साथ कोई योग क्लास कर पाएं तो उसका अपना ही आनंद है.

किन लोगों को योग नहीं करना चाहिए?

मैं आमतौर पर किसी तरह की मनोविकृति के शिकार लोगों को पहले विशेष प्रशिक्षित मनोचिकित्सक के पास भेजती हूं. दूसरी किसी तरह भी की शारीरिक समस्या में योग को उस व्यक्ति की जरूरत के अनुसान ढाला जा सकता है. अपने योग शिक्षक को पहले ही अपनी सेहत से जुड़ी जरूरी बातों और जरूरतों के बारे में जानकारी दे देनी चाहिए. मेरे पिछले कुछ महीने व्हीलचेयर पर कास्ट पहने हुए बीते हैं, फिर भी इस सारे समय मैं योग सिखा पाई हूं.

आना ट्रोएकेस चार दशक से भी अधिक समय से योग सिखा रही हैं. पिछले 30 सालों से वे योग शिक्षिकाओं को ट्रेन कर रही हैं. योग पर लिखी इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. अगस्त 2015 में तनाव और योग के संबंध पर ट्रोएकेस की नई किताब “एंटी-स्ट्रेस-योगा” प्रकाशित होने वाली है.


पीरियड्स के दौरान सेक्स करने से नुकसान नहीं बल्कि होते हैं फायदे


वाशिंगटन। आमतौर पर महिलाओं के पीरियड्स को लेकर यह धारणा बनी हुई है कि इस दौरान यौन संबंध नहीं बनाने चाहिए। लेकिन वास्‍तविक तौर पर यह धारणा पूरी तरह से गलत है।

दरअसल सभी महिलाएं अपने जीवन में मासिक धर्म का सामना करती हैं। इस बारे में ज्‍यादातर महिलाओं को यह नहीं मालूम होता है कि उन्‍हें पीरियड्स के दौरान यौन संबंध क्‍यों नहीं बनाने चाहिए। लेकिन वे इस दौरान सेक्‍स करने का खिलाफ ही रहती हैं।

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एक रिपोर्ट में महिलाओं के मासिक धर्म को लेकर कई खुलासे हुए हैं। इस रिपोर्ट में पीरिएड्स में सेक्‍स करने के नुकसान नहीं बल्‍िक फायदे बताए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, कई पार्टनर पीरियड्स के दौरान यौन संबंध बनाना अधिक पसंद करते हैं।

शोधकर्ता बताते हैं कि पीरियड्स के दौरान महिलाओं के प्राइवेट पार्ट में गिलापन रहता है इसलिए सेक्‍स करने में बाकी दिनों की अपेक्षा ज्‍यादा असानी होती है।



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