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डिलीवरी के बाद बिना परेशानी ऐसे घटाएं वजन


डिलीवरी के बाद बिना परेशानी ऐसे घटाएं वजन

मां बनने की खुशी के बीच ही शरीर में आए नए बदलावों और बढ़े हुए वजन की मुश्किलों का भी सामना करना पड़ता है। आपके लिए अपने पुराने शेप को पाना जितना ज़रूरी है, उतना ही महत्वपूर्ण है वजन को सही तरीके से और धीरे-धीरे घटाना। तो आइए जानते हैं कि डिलीवरी के बाद कुछ ही महीनों में, किस तरह आप न केवल अच्छी दिख सकती हैं बल्कि अच्छा महसूस भी कर सकती हैं।

क्या होता है बेबी वेट?
गर्भावस्था के दौरान एक महिला का वजन औसतन 25 से 30 पाउंड बढ़ जाता है। यह वजन, बच्चे के भार, प्लेसेंटा, एमनियोटिक द्रव्य, ब्रेस्ट टिशू और शरीर में वसा के अतिरिक्त भंडारण को मिलाकर बनता है। अतिरिक्त फैट यानि वसा, स्तनपान और प्रसव के लिए ज़रूरी ऊर्जा के भंडार के रूप में काम करती है। इसी को 'बेबी फैट' कहा जाता है। बाद में यह डायबिटीज़, हृदयरोग और आगे आने वाली गर्भावस्था में मुश्किल का जोखिम पैदा कर सकती है। इससे धीरे-धीरे और व्यवस्थित तरीके से छुटकारा पाना ही सबसे सही तरीका है।

डिलीवरी के बाद कब शुरू करें वजन घटाना?



डिलीवरी के तुरंत बाद एमनियोटिक द्रव्य और अतिरिक्त पानी बाहर निकल जाने की वजह से, वजन 10 पाउंड तक घट जाता है। इसके बाद अगले कुछ दिनों में 5 पाउंड और कम होता है। डिलीवरी के 6 हफ्तों के बाद होने वाला चैक-अप करवा कर आप धीरे-धीरे वजन घटाने की शुरुआत कर सकती हैं। ध्यान रहे कि एक महीने में 2-3 पाउंड से ज़्यादा न घटाएं। यदि आपका सिजेरियन हुआ है तो बेहतर होगा कि आप व्यायाम शुरू करने से पहले थोड़ा इंतज़ार और करें। वजन कम करने का सबसे सुरक्षित और स्वस्थ तरीका है उसे धीरे-धीरे कम करना।

कितना व्यायाम है ज़रूरी?



आप घर के पास वाले पार्क में घूमने से शुरुआत कर सकती हैं। यदि इसके बाद आप अच्छा महसूस करती हैं या रक्तस्राव नहीं बढ़ता है तो अगले दिन आप थोड़ा और दूर तक घूम सकती हैं। 6 हफ्तों वाले चैक-अप के बाद, आप हफ्ते में 3 से 5 बार 20 से 30 मिनट के कार्डियो की शुरुआत कर सकती हैं।

याद रखें कि आधे घंटे तक एक स्ट्रॉलर को धक्का देने से भी 150 कैलोरी कम की जा सकती हैं। 15 मिनट तक सीढ़ियां चढ़ने और उतरने से भी ऐसा संभव है।

कैसा होना चाहिए डाइट प्लान?



विशेषज्ञ जन्म देने के तुरंत बाद डाइट पर न जाने की सलाह देते हैं। दिन में कई बार छोटे-छोटे आहार लेने से ब्लड शुगर का स्तर भी ठीक रहता है और आप ज़्यादा खाने से भी बच जाती हैं। प्राकृतिक खाद्य पदार्थों का सेवन करें जैसे आंवला, जो विटामिन सी का भंडार है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए केले और सेब जैसे फल खाएं। तुलसी और लेमनग्रास के साथ बनी एक कप ग्रीन टी से न केवल स्फूर्ति मिलेगी बल्कि स्वास्थ्य भी बेहतर होगा।

सब्ज़ियों और सूप जैसे अतिरिक्त पानी की मात्रा वाले खाद्य पदार्थों से कम कैलोरी मिलती हैं। यदि आप शिशु को स्तनपान कराती हैं (जिसमें भी प्रतिदिन 600 कैलोरी खर्च होती हैं) तो मछली या फ्लैक्स के बीजों का सेवन करके ओमेगा-3 फैटी एसिड भरपूर मात्रा में लें। यह आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ आपके बच्चे में एक स्वस्थ दिमाग और नर्वस सिस्टम के विकास में भी मदद करेगा।

नींद और आराम भी है ज़रूरी!



हाल के एक अध्ययन से पता चला है कि एक रात में पांच घंटे या उससे कम सोने वाली नई मांओं का बढ़ा हुआ वजन, उन माताओं की तुलना में ज़्यादा मुश्किल से घटता है जो रात में सात घंटों की नींद लेती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब आप थकी हुई होतीं है तो शरीर में कोर्टिसोल और अन्य तनाव संबंधित हार्मोन बनते हैं, जो आपके वजन को बढ़ा सकते हैं। पुरानी कहावत का पालन करते हुए जब भी बच्चा सोए तो आप भी आराम करें। डिलीवरी के बाद आसान योगासन, सांस से जुड़े व्यायाम और ध्यान लगाने से शरीर को सही शेप में लाने में काफी सहायता मिलती है।


गर्भवती महिलाओं को रखनी चाहिए ये सावधानियां 




प्रारंभ से ही डॉक्टर से संपर्क करें। समय-समय पर अपनी जांच करती रहें और पूरी तरह डॉक्टरी निर्दशन में चलें। समीप के मातृ-केन्द्र, अस्पताल या प्राइवेट क्लीनिक में अपना नाम रजिस्टर्ड करा लें। वहां डॉक्टर द्वारा खून पेशाब, रक्तचाप, वजन, पोषण आदि की जांच होते रहने से गर्भवती को बहुत लाभ होगा। शरीर में यदि किन्हीं तत्त्वों की कमी है, गर्भवती को कोई रोग है, तो उसका निदान व इलाज समय पर किया जा सकेगा। वह डॉक्टरी सलाह से उचित भोजन, टॉनिक व दवाएं ले सकेगी। खून की जांच से पता चल जाएगा कि गर्भवती में खून की कमी तो नहीं है? साथ ही उसके ब्लड-ग्रुप का भी पता चल जाएगा और समय पर खून देने की आवश्यकता पड़े तो उसका पहले से इंतजाम किया जा सकेगा। जिन महिलाओं में खून आर. एच. नेगेटिव है, उनके शिशु की पीलिया या अन्य जटिलता से मृत्यु हो जाने का डर रहता है। समय से पूर्व आर. एच. नेगेटिव पता चल जाने की सावधानी बरती जा सकती है और शिशु में नया खून ‘ट्रांसफ्यूजन’ करा कर उसकी प्राण-रक्षा की जा सकती है। 
जांच में आर.एच. नेगेटिव मिलने पर बच्चा होने के तीन दिन के भीतर मां को एक इंजेक्शन ( जो महंगा होता है व तीन-चार सौ में आता है ) देकर अगले बच्चे की सुरक्षाकी जा सकती है। खून की जांच से यौन रोग का भी समय से पूर्व पता लगा लिया जाता है। और समय रहते उसका उपपचार कर शिशु को विकृतियों से बचा लियाजाता है। इसके अलावा समय-समय पर वजन लेकर डॉक्टर यह भी बता सकेगी कि गर्भ में शिशु का विकास ठीक हो रहा है कि नहीं? इस प्रकार वजन, खुराक, रक्तचाप, बीमारियों और संभावित जटिलताओं पर नियंत्रण रखने में सहायता मिलेगी और प्रसव सामान्य, सरल व कष्टरहित, जच्चा-बच्चा के लिए हानिरहित कराया जा सकेगा। 
कई महिलाएं पहले बच्चों की संख्या सही नहीं बतातीं, तो अपेक्षि/त सावधानी से वंचित रख समय पर डॉक्टर को कठिनाई में डाल देती हैं, जो स्वंय उनके हित में ठीक नहीं होता। पहले बच्चे के समय भी प्रसव कुछ कठिन होता है, दूसरे पूर्व इतिहास न होने से प्रसूता की विशेष प्रकृति का भी ज्ञान नहीं होता, तीसरे अनेक बार नई मां मनोवैज्ञानिक रूप से इसके लिए तैयार नहीं होती और भयाक्रांत होती हैं, जिससे प्रसव में कठिनाई व जटिलताएं पैदा होती हैं। तो यह बहुत आवश्यक है कि पहला बच्चा अस्पताल में ही हो या घर पर कुशल प्रशिक्षित दाई द्वारा, ताकि समय पर कोई जटिलता पैदा होनेपर उसे संभाला जा सके। 
यदि ये आवश्यक सावधानियां बरती जाएं और ठीक खुराक ली जाए, तो आजकल डॉक्टरी विज्ञान ने प्रसव को इतना सरल व हानिरहित व सरल बना दिया है कि भय या चिंता की कोई बात नहीं। नई माताओं को भी भय, चिंता से मुक्त होकर इसका सामना करना चाहिए और प्रसन्नता व गौरव से होने वाले शिशु की प्रतीक्षा करनी चाहिए। वैसे भी गर्भावस्था कोई बीमारी नहीं है, न ही इसका स्त्री के स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, बल्कि बहुत बार तो मातृत्व के बाद नारी का सौंदर्य अधिक निखरता है। अतः चिंतारहित प्रसन्न मन से इसके लिए स्वयं को तैयार करना चाहिए। यह मानसिक तैयारी और डॉक्टर से सहयोग भी प्रसव को सामान्य बनाने में मदद करता है। गर्भ में शिशु की सुरक्षा, उसका अच्छा शारीरिक-मानसिक विकास और प्रसव के बाद मां की दूध पिलाने की क्षमता इससे प्रभावित होती है। यह बात भी प्रत्येक मां को याद रखनी चाहिए। 
घर के कामकाज के साथ हलके व्यायाम करना या सुबह-शाम टहलना भी चाहिए, ताकि स्वच्छ हवा, धूप मिले और खाना ठीक हजम हो। धूप से विटामिन ‘डी’ मिलती है, जो मां और शिशु की हड्डियों के लिए आावश्यक है। स्वच्छ हवा से अनेक बीमारियों से बचाव होता है। गर्भवती के लिए ठहलना सर्वोत्तम व्यायाम है। पर आंरभिक दिनों में और अंतिम दिनों में अधिक दूरी तक टहल कर थकना ठीक नहीं। यों भी अधिक परिश्रम के थकाने वाले कामों से बचना चाहिए। भारी वजन उठाने, लंबी यात्रा करने, दौड़-कूद करने तथा लंबे समय तक सीधे खड़े रहने से बचना जरूरी है। प्रथम तीन महीनों में और अंतिम दिनों तो इन बातों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। यदि पहले गर्भावस्था हो चुका हो, तो कामकाज व विश्राम के बारें में डॉक्टर की राय से ही चलना ठीक होगा। 
गर्भवती के कपड़े ढीले व सुविधाजनक हों। पेट पर नाड़ा कस कर नहीं बांधना चाहिए, न ही तंग कपड़े पहनने चाहिए। 


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