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l पवनमुक्‍तासन पेट में गैस की समस्‍या में रामबाण




लगातार बैठ कर काम करने और खाना-पानी लेने में जरूरी सावधानी नहीं बरते जाने के कारण गैस की समस्या आज आम हो गई है। इससे बचाव जरूरी है और कुछ यौगिक क्रियाओं का अभ्यास भी।

आजकल के मशीनी युग की भागदौड़ से गैस की शिकायत एक आम समस्या बन गई है। हालांकि गांवों में भी इस समस्या से पीडित लोगों की संख्या कम नहीं, लेकिन शहर में रहने वाला प्राय: हर व्यक्ति गैस की परेशानी से पीडित है।
कैसे करें पवनमुक्‍तासन

पवनमुक्‍तासन अपने नाम के अनुरूप है यानी यह पेट से गैस आदि की समस्‍या को दूर करता है। जिनको पेट में गैस की समस्‍या होती है उन्‍हें पवनमुक्‍तासन करना चाहिये। इस योग की क्रिया द्वारा शरीर से दूषित वायु को शरीर से मुक्त किया जाता है। शरीर में स्थित पवन (वायु) यह आसन करने से मुक्त होता है। इसलिए इसे पवनमुक्तासन कहा जाता है। इसे करने के सही तरीके और इससे होने वाले दूसरे फायदों के बारे में हम आपको बताते हैं।


कैसे करें पवनमुक्‍तासन

इस आसन को करने के लिए भूमि पर चटाई बिछा कर पीठ के बल लेट जायें। फिर सांस भर लीजिए। अब किसी भी एक पैर को घुटने से मोडि़ये, दोनों हाथों की अंगुलियों को परस्पर मिलाकर उसके द्वारा मोड़े हुए घुटनों को पकड़कर पेट के साथ लगा दें। फिर सिर को ऊपर उठाकर मोड़े हुए घुटनों पर नाक लगाएं। दूसरा पैर जमीन पर सीधा रखें। इस क्रिया के दौरान श्वांस रोककर कुम्भक चालू रखें। सिर और मोड़ा हुआ पैर भूमि पर पहले की तरह रखने के बाद ही रेचक करें। दोनों पैरों को बारी-बारी से मोड़कर यह क्रिया करें। दोनों पैर एक साथ मोड़कर भी यह आसन किया जा सकता है।

धनुरासन भी है जरूरी


पवनमुक्तासन के अभ्यास के बाद धनुरासन का अभ्यास अवश्य करें। इसमें पेट के बल जमीन पर लेट कर दोनों पैरों को घुटनों से मोड़ लें। दोनों पैरों के पंजों को हाथों से पकड़ कर घुटने, जांघों, सिर एवं छाती को जमीन से ऊपर उठाएं। इस स्थिति में आरामदायक समय तक रुक कर वापस पूर्व स्थिति में आएं। यह धनुरासन है।

पवनमुक्तासन के फायदे
यह आसन उदर यानी पेट के लिए बहुत ही फायदेमंद है। इस योग से गैसटिक, पेट की खराबी में लाभ मिलता है। पेट की बढ़ी हुई चर्बी के लिए भी यह बहुत ही फायदेमंद आसन है। कमर दर्द, साइटिका, हृदय रोग, गठिया में भी यह आसन लाभकारी है। स्त्रियों के लिए गर्भाशय सम्बन्धी रोग में पावनमुक्तासन काफी फायदेमंद है। इस आसन से मेरूदंड और कमर के नीचे के हिस्से में मौजूद तनाव दूर होता है।
थोड़ी सावधानी जरूरी
पवनमुक्तासन करने में भी थोड़ी सावधानी जरूरी है। जिन लोगों को कमर दर्द की शिकायत हो उन्हें यह आसन नहीं करना चाहिए अगर करना हो तो कुशल प्रशिक्षक की देख रेख में करना चाहिए। जिनके घुटनों में तकलीफ हो उन्हें स्वस्थ होने के बाद ही यह योग करना चाहिए। हार्निया से प्रभावित लोगों को भी स्वस्थ होने के बाद ही यह योग करना चाहिए। स्त्रियों को मासिक के समय यह योग नहीं करना चाहिए।

पेट की समस्‍या से परेशान हैं या फिर पेट में अधिक चर्बी जमा हो गई है तो यह आसन आपके लिए ही है। इसका नियमित अभ्‍यास करें।​ 
स्वप्नदोष,शीघ्रपतन,नपुंसकता की योग चिकित्सा

मनुष्य ने स्वयं की गलतियों से शरीर को रोगी और अपूर्ण बना दिया | योग अपने आप में पूर्ण वैज्ञानिक विद्या है | हमारे ऋषियों ने योग का प्रयोग भोग के वजाय आध्यात्मिक प्रगति करने के लिए जोर दिया है जो नैतिक दृष्टि से सही भी है | परन्तु ईश्वर की सृष्टि को बनाये रखने के लिए संसारिकता भी आवश्यक है, वीर्यवान व्यक्ति ही अपना सर्वांगीण विकास कर सकता है,संतानोत्पत्ति के लिए वीर्यवान होना आवश्यक है पौरूषवान (वीर्यवान) व्यक्ति ही सम्पूर्ण पुरुष कहलाने का अधिकारी होता है | वीर्य का अभाव नपुंसकता है इसलिए मौज-मस्ती के लिए वीर्य का क्षरण निश्चित रूप से दुखदायी होता है | ऐसे व्यक्ति स्वप्नदोष,शीघ्रपतन और नपुंसकता जैसे कष्ट सहने को विवश होते हैं |
1. वज्रोली क्रिया :

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जब भी मूत्र त्याग करे तब एकदम से मूत्र को रोक ले .कुछ सेकेण्ड रोकें ..फिर नाड़ियों को ढीला छोड़ें और मूत्र निकलने दे ..पुनः रोके इस तरह मूत्र त्याग के दौरान कई बार इस क्रिया को करें | इस क्रिया के द्वारा नाड़ियों में शक्ति आएगी .फिर वीर्य के स्खलन को भी आप कंट्रोल कर सकेंगे | हमारा मस्तिष्क मूत्र त्याग व वीर्य स्खलन में भेद नही कर सकता ….यही कारण है कि इस क्रिया द्वारा स्खलन के समय में उसी अनुपात में बढ़ोत्तरी होती है जिस अनुपात में आप मूत्र त्याग के समय कंट्रोल कर लेते है | 
2. बाह्य कुम्भक :

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लाभ:

1- इस प्राणायाम से मन की चंचलता दूर होकर वृत्ति निरोध होता है | 

2- इससे बुद्धि सूक्ष्म एवं तीव्र होता है |

3- वीर्य स्थिर होकर स्वप्नदोष और शीघ्रपतन छुटकारा मिलता है |

विधि :

किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठकर पूरी शक्ति से श्वास को एक बार में ही 

बाहर निकल दें | 
श्वास को बाहर निकालकर मूलबंध (गुदा द्वार को संकुचित करें) और उड्डीयान

बंध (पेट को यथाशक्ति अंदर सिकोड़ें) लगाकर आराम से जितनी देर रोक

सकें,श्वास को बाहर ही रोककर रखें | 


जब श्वास अधिक समय तक बाहर न रुक सके तब बंधों को खोलकर धीरे-धीरे श्वास

को अंदर भरें | यह एक चक्र पूरा हुआ |


श्वास भीतर लेने के बाद बिना रोके पुनः बाहर निकालकर पहले की तरह बाहर ही

रोककर रखें | इस प्रकार 3 से २१ चक्र किये जा सकते हैं |

सावधानी :
यह प्राणायाम प्रातः खाली पेट करें | 


श्वास बाहर इतना नही रोकना चाहिए कि लेते समय झटके से श्वास अंदर जाए और 


उखड़े हुए श्वास को 5-6 सामान्य श्वास लेकर ठीक करना पड़े | 


प्राणायाम के 30 मिनट बाद ही कुछ खाएं – पियें | 

3. अश्विनी मुद्रा :
लाभ :
1- इस मुद्रा के निंरतर अभ्यास से गुदा के सभी रोग ठीक हो जाते हैं।

2- शरीर में ताकत बढ़ती है तथा इस मुद्रा को करने से उम्र लंबी होती है। 

3- माना जाता है कि इस मुद्रा से कुण्डलिनी का जागरण भी होता है। 

4- यह मुद्रा शीघ्रपतन रोकने का अचूक इलाज है | 


5- अश्वनी मुद्रा से नपुंसकता दूर होती है | 
विधि :
गासन में बैठकर (टॉयलैट में बैठने जैसी अवस्था) गुदाद्वार को अंदर
‍खिंचकर मूलबंध की स्थिति में कुछ देर तक रहें और फिर ढीला कर दें। पुन: 

अंदर खिंचकर पुन: छोड़ दें। यह प्रक्रिया यथा संभव अनुसार करते रहें और 
फिर कुछ देर आरामपूर्वक बैठ जाएं। 

विशेष
यह क्रिया दिन में कई बार करें, एक बार में कम-से-कम 50 बार अश्वनी मुद्रा करें | 

योग से सम्भब है , साइनोसाइटिस का इलाज







साइनोसाइटिस गालों एवं ललाट की हड्डियों के साइनस (गड्ढों) में जलन या सूजन की स्थिति को कहते हैं। जब किसी कारणवश साइनस के संकरे प्रवेश मार्ग में रुकावट आ जाती है तो सिर दर्द, भारीपन, गालों एवं ललाट पर सूजन तथा आंखों में दर्द जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं। यौगिक क्रियाओं के नियमित अभ्यास से इससे मुक्ति पाई जा सकती है।

साइनोसाइटिस की समस्या का मूल कारण शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यूनसिस्टम) का कमजोर होना माना जाता है, किन्तु योग इस समस्या का मूल कारण मानसिक तनाव तथा भावनात्मक असंतुलन को मानता है। यौगिक क्रियाओं के अभ्यास से प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करने तथा मानसिक एवं भावनात्मक असंतुलन को व्यवस्थित करने में मदद मिलती है। इसके लिए निम्न क्रियाओं का अभ्यास करें।
आसन

शुरुआत पवनमुक्तासन, वज्रासन, शशांकासन जैसे आसनों से करनी चाहिए। उसके बाद अभ्यास में सूर्य नमस्कार, पश्चिमोत्तासन, भुजंगासन, धनुरासन, आकर्ण धनुरासन आदि को जोड़ा जा सकता है। रोग की स्थिति में शीर्षासन, सर्वागासन का अभ्यास नहीं करना चाहिए। 

आकर्ण धनुरासन की अभ्यास विधि

दोनों पैरों को सामने की ओर फैला कर बैठ जाएं। रीढ़, गला व सिर को सीधा रखें। दोनों हाथों को नितम्बों की बगल में जमीन पर रखें।

दाएं पैर को घुटने से मोड़ कर इसके पंजे को दाएं हाथ से पकड़ कर सिर की ओर खींचें, किन्तु ध्यान रखें कि रीढ़ सीधी रखनी है। 

बाएं हाथ से बाएं पैर के अंगूठे को पकड़ें। इस स्थिति में आरामदायक समय तक रुक कर वापस पूर्व स्थिति में आएं। यही क्रिया दूसरी ओर भी करें। 


यह आकर्णधनुरासन की एक आवृत्ति है। इसकी तीन आवृत्तियों का अभ्यास करें। 

प्राणायाम

बुखार एवं रोग की तीव्र अवस्था में प्राणायाम का अभ्यास नहीं करना चाहिए। आराम की स्थिति में कपालभाति प्राणायाम के 5 से 7 चक्रों का अभ्यास रोग को जड़ से दूर करने में मददगार सिद्ध होता है। प्रत्येक चक्र में पचास श्वास रखना चाहिए।

भस्त्रिका की अभ्यास विधि
ध्यान के किसी भी आसन जैसे पद्मासन, सिद्धासन, सुकासन या कुर्सी पर रीढ़, गला व सिर को सीधा कर बैठ जाएं। हाथों को घुटनों पर रख कर आंखों को ढीला बन्द कर लीजिए। अब नासिका द्वारा हल्के झटके से श्वास अन्दर और बाहर कीजिए। यह क्रिया 50 बार लगातार तथा जल्दी-जल्दी करें। यह एक चक्र है। प्रारम्भ तीन चक्रों से करें, धीरे-धीरे, 5-7 तक बढ़ाएं।
सीमा

उच्चरक्तचाप तथा हृदय रोगी इसका अभ्यास न करें।
षटक्रियाएं

बुखार न होने की स्थिति में जलनेति सबसे अधिक लाभप्रद होती है। इससे साइनस की सफाई होती है। अभ्यास योग्य मार्गदर्शन में ही करें।

योगनिद्रा

इस रोग का प्रमुख कारण तनाव है। अतएव, योगनिद्रा का अभ्यास इस रोग से स्थायी निदान देने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आहार

शाकाहारी आहार लेना चाहिए। नमक, चावल, मैदा तथा दूध से बनी चीजों का सेवन न करें। फल- हरी सब्जियों का अधिक सेवन करें।


योगा करें गर्दन की चरबी हटायें



जैसे जैसे उम्र बढती है वैसे वैसे हमारा शरीर विकास की ओर भी आगे कूच करता है और अधोगति भी करता है । यह अधोगति का मतलब कुछ बीमारियाँ, रोग आदि। हमारी उम्र हमारे चेहरे से साफ दिखती है। हम उन सब पर तो संपूर्ण ध्यान रखते हैं। किन्तु हमारे शरीर के कुछ हिस्से ऐसे है जिसे हम नजरअंदाज करते है। हमारी पीठ, हमारी गर्दन आदि। हमारी गर्दन में लम्बे समय के बाद दर्द शुरु हो जाता है। कुछ लोगो को तो छोटी से उम्र में ही यह दर्द होता है।


उम्र के बढ़ने से गर्दन की चमड़ी ढीली पड़ जाती है, तो मोटापे से चरबी बढ़ जाती है। दोनों ही स्थिति में जहां बुढ़ापा झलकने लगता है वहीं दूसरी ओर चेहरे की सुंदरता नष्ट होने लगती है। इस समस्या से लिपटने के लिए एक अनोखा योग है और वह है ब्रह्म मुद्रा योगासन। आइए हम आप को अवगत कराते है इस योग से। नमाज पढ़ते वक्त या संध्या वंदन करते वक्त मुद्रासन को किया जाता है , क्योंकि इस आसन में गर्दन को चारों दिशा में घुमाया जाता है।


पहला टिप्स : करें ब्रह्म मुद्रा- योग में इसका स्थान बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। नमाज पढ़ते वक्त या संध्या वंदन करते वक्त उक्त मुद्रासन को किया जाता रहा है, क्योंकि इस आसन में गर्दन को चारों दिशा में घुमाया जाता है।

कैसे करें- पद्मासन, सिद्धासन या वज्रासन में बैठकर कमर तथा गर्दन को सीधा रखते हुए गर्दन को धीरे-धीरे दाईं ओर ले जाते हैं। कुछ सेकंड दाईं ओर रुकते हैं, उसके बाद गर्दन को धीरे-धीरे बाईं ओर ले जाते हैं। कुछ सेकंड तक बाईं ओर रुककर फिर दाईं ओर ले जाते हैं, फिर वापस आने के बाद गर्दन को ऊपर की ओर ले जाते हैं। उसके बाद नीचे की तरफ ले जाते हैं। फिर गर्दन को क्लॉकवाइज और एंटीक्लॉकवाइज घुमाएं। इस तरह यह एक चक्र पूरा हुआ। अपनी सुविधानुसार इसे 4 से 5 चक्रों में कर सकते हैं।


सावधानियां- जिन्हें सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस या थॉइराइड की समस्या है वे ठोड़ी को ऊपर की ओर दबाएं। गर्दन को नीचे की ओर ले जाते समय कंधे न झुकाएं। कमर, गर्दन और कंधे सीधे रखें। गर्दन या गले में कोई गंभीर रोग हो तो योग चिकित्सक की सलाह से ही यह मुद्रासन करें।

इसके लाभ- जिन लोगों को सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस, थॉइराइड ग्लांट्स की शिकायत है उनके लिए यह आसन लाभदायक है। इससे गर्दन की मांसपेशियां लचीली तथा मजबूत होती हैं। आध्यात्मिक ‍दृष्टि से भी यह आसन लाभदायक है। आलस्य भी कम होता जाता है तथा बदलते मौसम के सर्दी-जुकाम और खांसी से छुटकारा भी मिलता है।
गर्दन की चरबी हटायें


जैसे जैसे उम्र बढती है वैसे वैसे हमारा शरीर विकास की ओर भी आगे कूच करता है और अधोगति भी करता है । यह अधोगति का मतलब कुछ बीमारियाँ, रोग आदि। हमारी उम्र हमारे चेहरे से साफ दिखती है। हम उन सब पर तो संपूर्ण ध्यान रखते हैं। किन्तु हमारे शरीर के कुछ हिस्से ऐसे है जिसे हम नजरअंदाज करते है। हमारी पीठ, हमारी गर्दन आदि। हमारी गर्दन में लम्बे समय के बाद दर्द शुरु हो जाता है। कुछ लोगो को तो छोटी से उम्र में ही यह दर्द होता है।


उम्र के बढ़ने से गर्दन की चमड़ी ढीली पड़ जाती है, तो मोटापे से चरबी बढ़ जाती है। दोनों ही स्थिति में जहां बुढ़ापा झलकने लगता है वहीं दूसरी ओर चेहरे की सुंदरता नष्ट होने लगती है। इस समस्या से लिपटने के लिए एक अनोखा योग है और वह है ब्रह्म मुद्रा योगासन। आइए हम आप को अवगत कराते है इस योग से। नमाज पढ़ते वक्त या संध्या वंदन करते वक्त मुद्रासन को किया जाता है , क्योंकि इस आसन में गर्दन को चारों दिशा में घुमाया जाता है।
पहला टिप्स : करें ब्रह्म मुद्रा- योग में इसका स्थान बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। नमाज पढ़ते वक्त या संध्या वंदन करते वक्त उक्त मुद्रासन को किया जाता रहा है, क्योंकि इस आसन में गर्दन को चारों दिशा में घुमाया जाता है।
कैसे करें- पद्मासन, सिद्धासन या वज्रासन में बैठकर कमर तथा गर्दन को सीधा रखते हुए गर्दन को धीरे-धीरे दाईं ओर ले जाते हैं। कुछ सेकंड दाईं ओर रुकते हैं, उसके बाद गर्दन को धीरे-धीरे बाईं ओर ले जाते हैं। कुछ सेकंड तक बाईं ओर रुककर फिर दाईं ओर ले जाते हैं, फिर वापस आने के बाद गर्दन को ऊपर की ओर ले जाते हैं। उसके बाद नीचे की तरफ ले जाते हैं। फिर गर्दन को क्लॉकवाइज और एंटीक्लॉकवाइज घुमाएं। इस तरह यह एक चक्र पूरा हुआ। अपनी सुविधानुसार इसे 4 से 5 चक्रों में कर सकते हैं।


सावधानियां- जिन्हें सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस या थॉइराइड की समस्या है वे ठोड़ी को ऊपर की ओर दबाएं। गर्दन को नीचे की ओर ले जाते समय कंधे न झुकाएं। कमर, गर्दन और कंधे सीधे रखें। गर्दन या गले में कोई गंभीर रोग हो तो योग चिकित्सक की सलाह से ही यह मुद्रासन करें।


इसके लाभ- जिन लोगों को सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस, थॉइराइड ग्लांट्स की शिकायत है उनके लिए यह आसन लाभदायक है। इससे गर्दन की मांसपेशियां लचीली तथा मजबूत होती हैं। आध्यात्मिक ‍दृष्टि से भी यह आसन लाभदायक है। आलस्य भी कम होता जाता है तथा बदलते मौसम के सर्दी-जुकाम और खांसी से छुटकारा भी मिलता है।
अष्टांगयोग क्या है



महर्षि पतं‍जलि के अनुसार 

अष्टांगयोग योग की एक सरल पद्धति है। साधना के इस मार्ग पर चल कर घर-गृहस्थी वाले सभी लोग भी योग की उच्च अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं। अष्टांग योग अत्यंत महत्वपूर्ण साधना पद्धति है, जिसका विस्तृत वर्णन पतंजलि ने अपने सूत्रों में किया है। अष्टांग योग के आठ अंग- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि- बताए गए हैं:


'
अहिंसा


किसी भी प्राणी को किसी भी प्रकार से पीड़ा न पहुंचाना अर्थात् मन में सभी जीवधारियों के प्रति प्रेमभाव रखना अहिंसा है। काम-क्रोध आदि भावनाओं के जाल में फंस कर शरीर, वाणी अथवा मन से किसी भी प्राणी को शारीरिक या मानसिक पीड़ा अथवा नुकसान पहुंचाना हिंसा है। पांचों यमों में अहिंसा को सर्वोत्तम माना गया है। यम के चार अंगों सत्य, अस्तेय, ब्रह्माचर्य, अपरिग्रह एवं नियमों का पालन अहिंसा की भावना को सुदृढ़ करने के लिए ही किया जाता है।


सत्य


सत्य वह है, जैसा देखा, अनुमानित किया या सुना हो- वैसा ही वर्णन करना। लेकिन इसकी एक और शर्त भी है - इस सत्य से प्राणियों का कल्याण होना चाहिए। महाभारत में प्राणी मात्र के लिए हितकारी सत्य को ही श्रेष्ठ बताया गया है।


अस्तेय


धर्म विरुद्ध, चोरी से या अन्यायपूर्वक किसी की चीजों को हड़प लेना स्तेय है। इसके विपरीत परायी वस्तु की ओर आकर्षित न होना, उसे ग्रहण न करना, उसकी अभिलाषा न रखना अस्तेय है।


ब्रह्माचर्य


उपस्थेन्द्रिय अर्थात् जननेन्द्रिय का संयम ब्रह्माचर्य कहलाता है। उपस्थेन्द्रिय सभी इन्द्रियों में सबसे ज्यादा कामाग्नि को भड़काने वाली है। दूसरी इन्द्रियां भी कामोद्दीपन में सहायक होती हैं। इसलिए सभी इन्द्रियों को शान्त रखने के लिए उपस्थेन्द्रिय पर संयम करना चाहिए।


अपरिग्रह


चारों ओर से भोग साधनों को ग्रहण करना परिग्रह है। इसके विपरीत भोग साधनों को ग्रहण न करना अपरिग्रह कहलाता है। धन सम्पत्ति व भोग सामग्री को आवश्यकता से अधिक केवल अपने भोग के लिए संचित करना गलत माना जाता है।


नियम


महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में पांच नियम बताए हैं-शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय व ईश्वर प्रणिधान।


'शौचसन्तोषतप: स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमा:' (यो.सू. 2/32)
शौच
शौच दो प्रकार का होता है, बाह्य शौच एवं आभ्यन्तर शौच।
बाह्य शौच-मिट्टी, साबुन, जल आदि द्वारा शरीर के अंगों, साधना स्थल व वस्त्र आदि की शुद्धि करना, सात्विक आहार से मन को पवित्र रखना, यौगिक क्रियाओं द्वारा शरीर को निरोगी रखना बाह्य शौच है।

आभ्यन्तर शौच-यह आंतरिक शुद्धि का साधन है। मन की भीतरी नकारात्मक आदतों का परिष्कार करके उनकी जगह पवित्र विचारों को अपनाना, राग-द्वेष आदि विकारों की जगह मैत्री, करुणा, मुदिता व उपेक्षा का पालन करना आभ्यन्तर शौच है।


संतोष


हमारे पास जो साधन उपलब्ध हैं, उनसे अधिक की इच्छा न करना संतोष है। संतोष का सवाल केवल भौतिक पदार्थों के विषय में ही उठाया जाता है। आध्यात्मिक स्तर पर संतोष की आवश्यकता नहीं होती। भौतिक पदार्थों की चाह का क्षीण पड़ जाना ही संतोष कहलाता है। इसके बाद साधक इच्छाओं से मुक्त हो जाता है। संतोष ही सुखों का मूल है जबकि असंतोष से केवल दु:ख मिलते हैं।


तप


जिस प्रकार घुड़सवारी में माहिर घुड़सवार बिगड़ैल घोड़ों को भी काबू कर लेता है, उसी प्रकार साधना से शरीर, प्राण, इन्द्रियों और मन को नियंत्रित कर लेना तप कहलाता है। हमारी ऊर्जा हर पल शरीर से बाहर की ओर बहती है। ऊर्जा के ऐसे प्रवाह को रोक कर उसका संचय करना और उसे ऊर्ध्वगति प्रदान करना ही तप है। भूख-प्यास, गर्मी-सर्दी मान-अपमान आदि द्वन्द्वों को सहन करना तप है। तप के बिना योग भी सिद्ध नहीं होता।
स्वाध्याय
इसमें साधक अन्तर्मुखी होकर अपने चित्त और उसमें निहित विचारों का अध्ययन करता है। पवित्र पावन ओउम् का जप तथा मोक्ष मार्ग में प्रवृत्त करने वाले शास्त्रों, वेदों, उपनिषदों, गीता आदि का अध्ययन करना स्वाध्याय लाता है। इसमें 'स्व' का अध्ययन किया जाता है अर्थात् यह जानने का प्रयास किया जाता है कि 'मैं कौन हूँ।'
ईश्वर प्रणिधान


ईश्वर के प्रति श्रद्धा, प्रेम, समर्पण एवं भक्ति ही ईश्वर प्रणिधान है। शरीर, इन्द्रिय मन, प्राण, अंत:करण आदि से किए जाने वाले सभी कर्मों और उनके फलों (परिणाम) को ईश्वर को अर्पित कर देना ईश्वर प्रणिधान कहलाता है।
आसन
महर्षि पतंजलि के अनुसार जिस अवस्था में शरीर अपेक्षित समय तक सुखपूर्वक स्थिर रह सके, उसे आसन कहते हैं। उपर्युक्त सूत्र में पतंजलि ने आसन की परिभाषा, समय-सीमा व उसके लाभों का भी वर्णन किया है। इसका सार यह है कि जब तक शरीर में स्थिरता और मन में सुख की अनुभूति हो रही है, तब तक आसन में स्थिर रहें। जब स्थिरता, अस्थिरता में और सुख, दु:ख में परिवर्तित होने लगे, तो आसन बदल लेना चाहिए। आमतौर पर हम देखते हैं कि हमारा शरीर एक मिनट भी स्थिर नहीं रह पाता। कभी हम हाथ हिलाते हैं, तो कभी पैर। लेकिन आसन के अभ्यास से शरीर व चित्त में स्थिरता आती है और सुख की अनुभूति होती है। आसनों के अभ्यास से साधक को द्वन्द्व नहीं सताते। आसनों की संख्या का महर्षि पतंजलि ने कोई वर्णन नहीं किया है।
प्राणायाम
'प्राणस्य आयाम:', अर्थात् प्राण और आयाम, इन दो शब्दों से मिलकर बना है प्राणायाम। प्राण एक जीवनी शक्ति है। इसके बिना प्राणी जीवित नहीं रह सकता। दूसरी ओर, आयाम का मतलब है प्राण का ठहराव या विस्तार करना। जन्म के साथ ही प्राणी में श्वास-प्रश्वास की क्रिया प्रारंभ हो जाती है। इस क्रिया का अभाव ही मृत्यु है। बिना पानी व भोजन के तो व्यक्ति जीवित रह सकता है, लेकिन बिना प्राण के जीवित नहीं रह सकता। प्राणायाम के द्वारा प्राण पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है।
महर्षि पतंजलि प्राणायाम को परिभाषित करते हुए कहते हैं :
'तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद: प्राणायाम:'
आसन की सिद्धि होने पर श्वास-प्रश्वास की गति को नियंत्रित कर लेना या उस गति का विच्छेद करना या प्राण का शरीर में विस्तार करना प्राणायाम कहलाता है। महर्षि पतंजलि ने प्राणायाम के चार भेद बताए हैं-बाह्यवृत्ति, आभ्यंतरवृत्ति, स्तम्भवृत्ति व बाह्याभ्यंतर विषयाक्षेपी।
प्रत्याहार

महर्षि पतंजलि के अनुसार जो इन्द्रियां चित्त को चंचल कर रही हैं, उन इन्द्रियों का विषयों से हट कर एकाग्र हुए चित्त के स्वरूप का अनुकरण करना प्रत्याहार है। प्रत्याहार से इन्द्रियां वश में रहती हैं और उन पर पूर्ण विजय प्राप्त हो जाती है। अत: चित्त के निरुद्ध हो जाने पर इन्द्रियां भी उसी प्रकार निरुद्ध हो जाती हैं, जिस प्रकार रानी मधुमक्खी के एक स्थान पर रुक जाने पर अन्य मधुमक्खियां भी उसी स्थान पर रुक जाती हैं।
धारणा
प्रत्याहार के द्वारा जब इन्द्रियां अंतर्मुखी हो जाती हैं, तब वे अपने विषय को वृत्तिमात्र से ग्रहण करती हैं। अभ्यास की स्थिति में कुछ समय तक चित्त की वृत्ति ध्येय पर स्थिर हो जाती है, फिर अन्य वृत्ति चित्त में उत्पन्न होती है। तदुपरान्त धीरे-धीरे चित्त को पुन: उसी ध्येय पर स्थिर किया जाता है।


'देशबन्धश्चित्तस्य धारणा।' (यो.सू. 3/1)
अर्थात्, चित्त को वृत्ति मात्र से किसी स्थान में बांधना धारणा है। प्रत्याहार द्वारा इन्द्रियों को विषयों से हटा कर मन को शरीर में चक्र आदि स्थानों में लगाकर स्थिर करना धारणा है।
ध्यान

पातंजल योग के अनुसार जिस स्थान विशेष पर धारणा की जाती है, उस स्थान पर वृत्ति के समान रूप से निरंतर बने रहने को ध्यान कहते हैं-
'तत्र प्रत्यैयकतानता ध्यानम्' (यो.सू. 3/2)।
ध्यान के समय चित्त अन्य विषयों से हट जाता है औ
र केवल ध्येयविषयक वृत्ति का ही आवागमन होता है। ध्यान में तेल की धारा की तरह एक ही वृत्ति का प्रवाह होता रहता है।

ध्यान मन को शान्त एवं एकाग्र कर अंतर्मुखी बनाने की एक अनूठी विधा है। यह साधक के भीतर स्थित काम, क्रोध, लोभ, मोह, राग-द्वेष, अहंकार आदि विकारों को क्षीण कर देता है। तब साधक दिन भर के क्रियाकलाप करते हुए भी अपने भीतर स्थित परम चेतना के साथ जुड़ा रहता है।

समाधि
'तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूप शून्यमिव समाधि:' (यो.सू. 3/3)।
ध्यान की अवस्था में ध्याता अर्थात् ध्यान करने वाला, ध्येय और ध्यान आपस में मिल जाते हैं। इससे ध्येय के यथार्थ स्वरूप का पता नहीं चल पाता। लेकिन जब ध्यान प्रबल हो जाता है, तब ध्येय का स्वरूप विराट होने लगता है और ध्याता अपने स्वरूप में सर्वथा शून्य जैसा होकर ध्येय को स्वरूपमात्र में देखने लगता है। समाधि की अवस्था में ध्येय का स्वरूप ध्याता और ध्यान से अलग होकर ध्येयाकार वृत्ति में पूर्णता से महसूस होने लगता है। जैसे नमक पानी में मिल जाने से उसके साथ एकरूप हो जाता है, उसी तरह जब आत्मा और मन की एकरूपता हो जाती है, तो वह अवस्था समाधि कहलाती है। समाधि के दो भेद बताए गए हैं-सम्प्रज्ञात (सविकल्प अथवा सबीज) समाधि व असम्प्रज्ञात (निविर्कल्प अथवा निबीर्ज) समाधि।
गर्भाशय तथा जननेन्द्रिय स्रावों में लाभदायक पादहस्तासन





इस आसन में हम दोनों हाथों से अपने पैर के अंगूठे को पकड़ते हैं, पैर के टखने भी पकड़े जाते हैं। चूंकि हाथों से पैरों को पकड़कर यह आसन किया जाता है इसलिए इसे पादहस्तासन कहा जाता है। यह आसन खड़े होकर किया जाता है।


विधि : यह आसन खड़े होकर किया जाता है। पहले कंधे और रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाएँ। फिर दोनों हाथों को धीरे-धीरे ऊपर उठाया जाता है। हाथों को कंधे की सीध में लाकर थोड़ा-थोड़ा कंधों को आगे की ओर प्रेस करते हुए फिर हाथों को सिर के ऊपर तक उठाया जाता है। ध्यान रखें की कंधे कानों से सटे हुए हों। 


तत्पश्चात हाथ की हथेलियों को सामने की ओर किया जाता है। जब बाहें एक-दूसरे के समानान्तर ऊपर उठ जाएं तब धीरे-धीरे कमर को सीधा रख श्वास भीतर ले जाते हुए नीचे की ओर झुकना प्रारम्भ किया जाता है। झुकते समय ध्यान रखे की कंधे कानों से सटे ही रहें। 

तब घुटने सीधे रखते फिर हाथ की दोनों हथेलियों से एड़ी-पंजे मिले दोनों पांव को टखने के पास से कस के पकड़कर माथे को घुटने से स्पर्श करने का प्रयास किया जाता है। इस स्थिति में श्वास लेते रहिए। इस स्थिति को सूर्य नमस्कार की तीसरी स्थिति भी कहा जाता है। सुविधा अनुसार 30-40 सेकंड इस स्थिति में रहें।


वापस आने के लिए धीरे-धीरे इस स्थिति से ऊपर उठिए और क्रमश: खड़ी मुद्रा में आकर हाथों को पुन: कमर से सटाने के बाद विश्राम की स्थिति में आ जाइए। कुछ क्षणों का विराम देकर यह अभ्यास पुन: कीजिए। इस तरह 5 से 7 बार करने पर यह आसन असरकारक होता है।
सावधा‍‍नी : रीढ़ की हड्डी में कोई शिकायत हो तथा साथ ही पेट में कोई गंभीर बीमारी हो ऐसी स्थिति में यह आसन न करें।


इसके लाभ : यह आसन मूत्र-प्रणाली, गर्भाशय तथा जननेन्द्रिय स्रावों के लिए विशेष रूप से अच्‍छा होता है। इससे कब्ज की शिकायत भी दूर होती है। यह पीठ और रीढ़ की हड्डी को मजबूत और लचीला बनाता है तथा जंघाओं और पिंडलियों की मांसपेशियों को मजबूत करता है। आंतों के व पेट के प्राय: समस्त विकार इस आसन को नियमित करने से दूर होते हैं। इससे सुषुम्ना नाड़ी का खिंचाव होने से उनका बल बढ़ता है।
हाई बीपी के मरीजों के लिए शवासन उपयोगी


शवासन में सांस पर नियंत्रण रखकर शरीर को निर्जीव अवस्था में छोड़ा जाता है। इस अभ्यास में हम इंद्रियों व मन को बाहर के विषयों से हटाते हैं और शरीर व मन को ऊर्जा से भर देते हैं। इस आसन का अभ्यास कोई भी व्यक्ति कर सकता है। हाई ब्लड प्रेशर के रोगी लगातार इस आसन को करें तो बीपी कंट्रोल किया जा सकता है। 

फायदे 
इस अभ्यास को करने से मानसिक तनाव, थकान दूर होकर नई ऊर्जा का संचार होता है। इससे सिरदर्द, अनिद्रा और अवसाद की समस्या नहीं रहती।
ध्यान रहे 
अगर आपके कमर में दर्द रहता है तो इस आसन को करते समय घुटने के नीचे कंबल या तकिया लगा लें।
ऎसे करें अभ्यास
पीठ के बल जमीन पर लेट जाएं। सांस छोड़ते हुए दोनों पैरों को अपनी ओर हल्का-सा घुमाएं। दोनों हाथों को शरीर से थोड़ी दूरी पर फैलाएं व हथेलियों को ऊपर की ओर रखें। आंखे बंद करके शरीर को ढीला छोड़ दें। खाने के 4 घंटे बाद दिन में दो बार 10-10 मिनट तक करें, सोने से पहले करने पर नींद अच्छी आती है। -

रोजाना योगा करने के 14 फायदे




योगा एक ऐसी वैज्ञानिक प्रमाणिक व्यायाम पद्धति है।जिसके लिए न तो ज्यादा साधनों की जरुरत होती हैं और न ही अधिक खर्च करना पड़ता है। इसलिए पिछले कुछ सालों से योगा की लोकप्रियता और इसके नियमित अभ्यास करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि योगा करने के क्या लाभ है....


1. योगासन अमीर-गरीब, बूढ़े-जवान, सबल-निर्बल सभी स्त्री-पुरुष कर सकते हैं।


2. आसनों में जहां मांसपेशियों को तानने, सिकोडऩे और ऐंठने वाली क्रियाएं करनी पड़ती हैं, वहीं दूसरी ओर साथ-साथ तनाव-खिंचाव दूर करनेवाली क्रियाएं भी होती रहती हैं, जिससे शरीर की थकान मिट जाती है और आसनों से व्यय शक्ति वापस मिल जाती है। शरीर और मन को तरोताजा करने, उनकी खोई हुई शक्ति की पूर्ति कर देने और आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से भी योगासनों का अपना अलग महत्व है।


3. योगासनों से भीतरी ग्रंथियां अपना काम अच्छी तरह कर सकती हैं और युवावस्था बनाए रखने एवं वीर्य रक्षा में सहायक होती है।


4. योगासनों द्वारा पेट की भली-भांति सुचारु रूप से सफाई होती है और पाचन अंग पुष्ट होते हैं। पाचन-संस्थान में गड़बडिय़ां उत्पन्न नहीं होतीं।


5. योगासन मेरुदण्ड-रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाते हैं और व्यय हुई नाड़ी शक्ति की पूर्ति करते हैं।


6. योगासन पेशियों को शक्ति प्रदान करते हैं। इससे मोटापा घटता है और दुर्बल-पतला व्यक्ति तंदरुस्त होता है।


7. योगासन स्त्रियों की शरीर रचना के लिए विशेष अनुकूल हैं। वे उनमें सुन्दरता, सम्यक-विकास, सुघड़ता और गति, सौन्दर्य आदि के गुण उत्पन्न करते हैं।


8. योगासनों से बुद्धि की वृद्धि होती है और धारणा शक्ति को नई स्फूर्ति एवं ताजगी मिलती है। ऊपर उठने वाली प्रवृत्तियां जागृत होती हैं और आत्म-सुधार के प्रयत्न बढ़ जाते हैं।


9. योगासन स्त्रियों और पुरुषों को संयमी एवं आहार-विहार में मध्यम मार्ग का अनुकरण करने वाला बनाते हैं, मन और शरीर को स्थाई तथा सम्पूर्ण स्वास्थ्य, मिलता है।


10. योगासन श्वास- क्रिया का नियमन करते हैं, दिल और फेफड़ों को बल देते हैं, रक्त को शुद्ध करते हैं और मन में स्थिरता पैदा कर संकल्प शक्ति को बढ़ाते हैं।


11. योगासन शारीरिक स्वास्थ्य के लिए वरदान स्वरूप हैं क्योंकि इनमें शरीर के समस्त भागों पर प्रभाव पड़ता है, और वह अपने कार्य सुचारु रूप से करते हैं।

12. आसन रोग विकारों को नष्ट करते हैं, रोगों से रक्षा करते हैं, शरीर को निरोग, स्वस्थ और बलिष्ठ बनाए रखते हैं।

13. आसनों से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। आसनों का निरन्तर अभ्यास करने वाले को चश्में की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।

14. योगासन से शरीर के प्रत्येक अंग का व्यायाम होता है, जिससे शरीर पुष्ट, स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनता है। 

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