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स्तनपान क्योंकि अश्लीलता आंख में है!


..क्योंकि अश्लीलता आंख में है!


दो-चार रोज पहले केरल हाईकोर्ट ने कहा-अश्लीलता देखने वालों की आंखों में होती है। सचमुच ब्रेस्ट फीडिंग पर यह बड़ा फैसला है। यह टिप्पणी तो और भी अहम है। यह फैसला केरल से छपने वाली पत्रिका गृहलक्ष्मी और मलयालम मॉडल 27 वर्षीय गीलू जोसेफ के लिए बेहद राहत भरा है। दरअसल इस पत्रिका के कवर में गीलू जोसेफ की ब्रेस्ट फीडिंग की तसवीर छपी थी। 

इसके कैप्शन में लिखा था-केरल की माएं कह रही हैं, कृपया घूरें नहीं। हमें स्तनपान की जरूरत है। इस पर देशव्यापी बहस हुई। आपको अगर याद हो तो इसी जगह 6 मार्च को मैं इसी संदर्भ में ‘...क्योंकि इसी में है सारा जहान!’ शीर्षक से नुमाया हुआ था। बहरहाल पत्रिका और गीलू जोसेफ को कानूनबाजी में उलझाने वाले वकील विनोद मैथ्यू को तगड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी है। यह याचिका इस तसवीर को कामुक और अश्लील बताते हुए दायर की गई थी। कुछ लोगों को यह भी दिक्कत थी कि गीलू जोसेफ ईसाई हैं। अविवाहित हैं। लेकिन तसवीर में उन्होंने मांग पर सिंदूर लगाया है। और गले में मंगलसूत्र पहना है। केरल हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एंटोनी डोमिनिक और जस्टिस डामा शेषाद्रि ने फैसले में अभूतपूर्व टिप्पणी की है-‘जैसे खूबसूरती देखने वालों की आंखों में होती है, ठीक वैसे ही अश्लीलता भी देखने वालों की आंखों में होती है। भारतीय कला ने हमेशा मानव शरीर को खूबसूरती से दर्शाया है। फिर चाहे वो कामसूत्र हो और राजा रवि वर्मा की पेंटिंग हों या अजंता की मूर्तियां। आज के मुकाबले पहले के लोग ज्यादा समझदार थे।’ यहां यह काबिलेगौर है कि गीलू जोसेफ ने तब कहा था- मैं वही करती हूं जो मुझे लगता है कि वह मेरे लिए ठीक है। मैं गलत हो सकती हूं, लेकिन मुझे इसका कोई अफसोस नहीं है। महिलाओं को बिना किसी निषेध और डर के आजादी के साथ ब्रेस्ट फीड कराना चाहिए। बहरहाल गीलू जोसेफ से पहले 2012 में टाइम पत्रिका अपने कवर में ऐसी ही तसवीर छाप चुकी थी। 

वैसे ब्रेस्ट फीडिंग सारी दुनिया में बहस का मुद्दा रहा है। पिछले साल 2017 में किर्गिस्तान में राष्ट्रपति की सबसे छोटी बेटी आलिया शागयीवा के अपने बच्चे को ब्रेस्टफीड कराने की तसवीर पर भी ऐसा हंगामा हो चुका है। उन्होंने यह तसवीर अप्रैल में सोशल मीडिया पर पोस्ट की थी। इस पर लिखा था-मेरे बेटे को भूख लगती है तो मैं कहीं भी और कभी भी उसे स्तनपान कराती हूं। हैरानी यह है कि इस तसवीर से उनके पिता राष्ट्रपति अल्माजबेक आत्मबयेव और मां राइसा भी नाराज थीं। शर्मनाक यह है कि इस तसवीर पर आलिया को समाज के बड़े वर्ग की खरी-खोटी सुननी पड़ी। सरमायेदारों ने अनैतिक व्यवहार का इतना राग अलापा कि आलिया को आखिर में इस पोस्ट को डिलीट करना पड़ा। इससे आहत आलिया ने कहा था-यह बहस उस संस्कृति का हिस्सा थी, जिसमें महिला के शरीर को कामुकता से जोड़कर देखा जाता है। दरअसल हमारे देश यानी भारत में दिक्कत यह है कि अश्लीलता क्या है? इसकी कोई सर्वमान्य कानूनी परिभाषा अभी तक तय नहीं हो पाई है। किसी को औरतों का मटकना अश्लील लगता है तो किसी को उनकी आंख का इशारा। किसी को ब्रेस्ट देखकर तकलीफ होती है तो किसी को उनकी टांग। किसी को लड़कियों का जींस पहनना अश्लील लगता है और किसी को लड़कों का चूमना। आखिर संस्कृति और अश्लीलता की लाठी कितनी बार औरतों को लहूलुहान करती रहेगी। पागल लोग यह समझने को तैयार ही नहीं हैं कि हमारे मुल्क में हजारों तरह की संस्कृतियां एक साथ जीवंत हैं। कामसूत्र की धरती है। तमाम मंदिरों में संभोग के दृश्य हैं। अंडमान द्वीप पर तो कुछ लोग अब भी बेलिबास रहते हैं। एक ऐसा भी दौर रहा है इसी महादेश में, जिसके कई हिस्सों में कुआंरी लड़कियों की बात छोड़िए, शादीशुदा औरतें तक ब्लाउज नहीं पहनती थीं। पिछली सदी में कुछ औरतों ने अपनी स्मृति रचनाओं में लिखा है कि दादी-नानी के जमाने में कोई युवती ब्लाउज पहन ले तो उसको अश्लील कहकर डांटा जाता था। महिलाएं रात को छिपकर ब्लाउज पहनती थी। वह भी अपने पति को रिझाने के लिए। बात आंख से शुरू हुई है और आंख पर ही आकर ठहर गई है। आंखों पर यकीन मानिये एक बहुत प्यारी गजल है। यह फिल्म उमराव जान में अभिनेत्री रेखा पर फिल्माई गई है। पढ़िए- इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं / इन आंखों से वाबस्ता अफसाने हजारों हैं / इन आंखों... / इक तुम ही नहीं तन्हा, उलफत में मेरी रुसवा / इस शहर में तुम जैसे दीवाने हजारों हैं / इन आंखों... / इक सिर्फ हम ही मय को आंखों से पिलाते हैं / कहने को तो दुनिया में मयखाने हजारों हैं / इन आंखों... / इस शम्म-ए-फरोजां को आंधी से डराते हो / इस शम्म-ए-फरोजा के परवाने हजारों हैं / इन आंखों...। ...और दोस्तो अगर आंखों से अब भी अश्लीलता का चश्मा ना उतर रहा हो तो किसी रंगशाला में ‘किस्सा योनि का’ नाटक जरूर देख लें। यह अमेरिकी नाटककार ईव एंसलर की रचना ‘द वैजाइना मोनोलॉग्स’ पर आधारित है। इसमें यौन संबंध, बलात्कार, घरेलू हिंसा, मासिक धर्म, समलैंगिकता और प्रसव जैसे नितांत वैयक्तिक मुद्दे पर बात होती है। यह नाटक कई वर्जनाओं को तोड़ता है।

स्तनपान या उसकी आड़ में अश्लीलता....फैसला आपका।




केरला में गृहलक्ष्मी मैगज़ीन का कवर पेज आज पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ हैं। मैगज़ीन कवर पे मलयालम अभिनेत्री गिलु जोशफ दुधमुंहे बच्चे को स्तनपान करा रही हैं। स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए ऐसा फोटोशूट किया गया हैं परंतु इस कवर फ़ोटो के बाद जोशेफ कई लोगो के निशाने पे आ गयी हैं तो कुछ उनकी तारीफ भी कर रहे हैं, कुल मिला के विरोध ही ज्यादा हैं। विरोध करने वालो का कहना है कि न तो जोशेफ माँ हैं ना ही वो स्तनपान करा रहीं हैं बस स्तनपान के नाम पे अश्लीलता व पब्लिसिटी बटोर रही हैं। मैगज़ीन में उनका फ़ोटो आने के बाद से देश में बहस का एक नया मुद्दा छिड़ गया हैं कि माताओं के सार्वजनिक जगहों पे खुले में अपने शिशु को स्तनपान कराना सही हैं या नहीं। इस मुद्दे पे हर वर्ग की अपनी ही सोच हैं पर महिलावादी इस बात का ज्यादा समर्थन कर रहे हैं कि माताओं को यह अधिकार होना चाहिए, अपने तर्क में उनका कहना हैं कि खुले में स्तनपान कराने में कोई बुराई नहीं हैं, दोष लोगो की नज़र का हैं जो एक माँ और शिशु की भूख के बजाय महिलाओं के वक्षो को देख रहे हैं। वैसे उनकी बात कुछ हद तक सही भी हैं पर जिस तरह मलयालम अभिनेत्री दूध पिला रही हैं वास्तव में वो थोड़ा अजीब हैं। पहले यह अभियान सिर्फ विदेशों तक ही सीमित था पर अब भारत मे भी इसका जोर शोर से प्रचार शुरू हो गया हैं। बहस का मुद्दा यह हैं कि क्या खुले में उस तरह से स्तनपान सही हैँ? निजी तौर पे मेरी राय हैं "नहीं" ऐसा मैं खुद के अनुभव से कह रही हूँ, मैं माँ हूँ, अपनी बेटी को शुरुआती 6 महीने सिर्फ स्तनपान पे ही रखा, जो अब भी जारी हैं, ना तो मुझें इसमे कोई परेशानी हुई ना ही कभी इस तरह openly ब्रेस्टफीडिंग की जरूरत पड़ी क्योंकि मैं अपना फीडिंग कवर हमेशा ही अपने साथ रखती थी।
और न ही मैंने आजतक किसी माँ को इस तरह दूध पिलाते देखा हैं, चाहे ग्रामीण हो या शहरी सभी अपने आँचल या दुपट्टे की आड़ में ही स्तनपान कराते देखा हैं।

वैसे भी दुनिया मे हर तरह के लोग होते हैं तो ऐसे खुले तौर पे दूध पिलाते हुए लोगो से यह उम्मीद करना के वो महिला के वक्षो को न देखे अजीब ही हैं, और कोई माँ भी शायद नहीं चाहेगी कि जब वो अपने बच्चे को दूध पिलाये तो लोग उसे घूरे।

मार्किट में आजकल वैसे भी आपकी सुविधानुसार बहुत तरह के मैटरनिटी, नर्सिंग वियर, फीडिंग कवर, फीडिंग स्टोल आदि मौसम के अनुरूप मिल जाते हैं, जिनसे आप आसानी से अपने बच्चे को किसी भी पब्लिक या open स्पेस में आराम से बच्चे को दूध भी पिला सकते हैं। सार्वजनिक जगह पे गिलु जोशेफ की तरह दूध पिलाने का में निजी तौर पे समर्थन नहीं करती क्योंकि देश मे इसके अलावा भी बहुत से ऐसे मसले हैं जिनपे लोगो को जागरूक करने की जरूरत हैं उनमें सबसे पहले तो गर्भावस्था में उचित खान पान व पोषण हैं, क्योंकि कई महिलाओं को इसके अभाव में स्तनों में दूध ही नही बनता तो बच्चों को क्या पिलाये।

और कुछ माँए खुद भी स्तनपान नहीं कराना चाहती, एक सर्वे के अनुसार पूरे विश्व की जनसंख्या में मात्र 38% बच्चे ही अपने 6 महीने की उम्र तक पूर्णतया स्तनपान पे रहते है।

भारत मे यह प्रतिशत 54.9% हैं जिसमे भी ग्रामीणों का प्रतिशत ज्यादा हैं तो ऐसे में जरूरी हैं कि openly breast feeding के बजाय सिर्फ breast feeding को तथा गर्भावस्था में उचित खान-पान व पोषण को बढ़ावा दिया जाना ज्यादा जरूरी हैं।

खुले में स्तनपान को समर्थन देने से ज्यादा जरूरी हैं ये जागरूकता क्योंकि कई परिवारों में महिलाओं को गर्भावस्था में अतिरिक्त खुराक मिलना तो दूर बल्कि परिवार की महिलाओं द्वारा ही यह कहा जाता है कि "तुम कोई अकेली औरत नहीं हो जो बच्चा जनोगी" या "हम तो एक वक्त खा के भी 4-5 बच्चे जन दिए औऱ सारा काम भी करते थे तुम्हे तो थकान कुछ ज्यादा ही होती हैं"

मेरी मैड ने मुझें अपनी खुद की गर्भावस्था का किस्सा सुनाया की एक बार उसके पति उसके लिए नारियल पानी ले आये तो सास ने ऐसे नाजुक मौके पे भी उसको सुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। तो ऐसे माहौल में आप ही बताएं कि क्या ज्यादा जरूरी हैं?



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