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निंबू स्वास्थ्य के लिए गुणकारी

निंबू स्वास्थ्य के लिए गुणकारी
नीबू में बडे औषधीय गुण

कोई भी मौसम हो, नींबू ऎसा फल है जो हर घर में हर समय मिलता है। यह केवल खाने का स्वाद ही नहीं बढाता बल्कि इसमें कई औषधीय व सौंदर्यवर्धक गुण भी मौजूद हैं। इसमें विटामिन-सी पर्याप्त मात्रा में होता है।

सौंदर्य निखार के लिए :
1. नारियल के तेल में नींबू का रस मिलाकर रात में सिर में हल्के हाथ से, एक हफ्ते तक रोजाना मालिश कर, सुबह सिर धोने से बालों की खुश्की दूर हो जाती है।

2. यदि मालिश न भी करें तो सिर धोने के पानी में दो नींबू निचोडकर एक हफ्ता लगातार प्रयोग करने से बाल मुलायम होते हैं, उनका झडना कम होता है और खुश्की या रूसी भी कम होती है।

3. नारियल के तेल में नींबू का रस और कपूर लगाकर सिर की मालिश करने से बालों के रोग खत्म हो जाते हैं।

4. सुबह स्नान करने से पहले नींबू के छिलकों को चेहरे पर धीरे-धीरे मलकर 2-3 मिनट बाद चेहरे को पानी से धो लें। इसे 10-15 दिन लगातार करने से चेहरे का रंग साफ हो जाता है। यह बाजार में मिलने वाले किसी भी ब्लीचिंग क्रीम या ब्यूटी पार्लर में कराए जाने वाले ब्लीच का काम करेगा।

5. नींबू का रस और गुलाबजल समान मात्रा में मिलाकर चेहरे पर लगाएं, कुछ दिनों के लगातार प्रयोग से चेहरा बेदाग,त्वचा कोमल व स्वच्छ हो जाती है।

6. नींबू और तुलसी की पत्तियों का रस समान मात्रा में मिलाकर किसी कांच के बर्तन में रख लें और दिन में कम से कम दो बार हल्के हाथ से चेहरे पर लगाएं। कुछ दिन के लगातार इस्तेमाल से चेहरे पर झाइयां व किसी भी प्रकार के निशान मिट जाते हैं।

7. चेहरा जल जाने पर यदि चेहरे पर काले दाग पड गए हों तो एक टमाटर के गूदे में नींबू के रस की कुछ बूंदें मिलाकर सुबह-शाम लगाएं और थोडी देर बाद धो लें।

औषधि के रूप में

1. बदहजमी होने पर नींबू काटकर उसकी फांक या छोटे टुकडे में काला नमक लगाकर चूसने से आराम आता है।

2. जिनको भूख कम लगती है और पेट दर्द की शिकायत रहती है उनको नींबू की फांक में काला या सेंधा नमक लगाकर उसको तवे पर गर्म करके चूसने से न केवल दर्द में आराम मिलता है बल्कि भूख भी खुलकर लगती है।

3. यदि चक्कर आ रहे हों या उल्टी आ रही हों तो नींबू के टुकडे पर काला नमक, काली मिर्च लगाकर खाने से चक्कर आने बंद हो जाते हैं और उल्टी भी बंद हो जाती है।

4. एक गिलास पानी में एक नींबू का रस निचोडकर एक चम्मच चीनी पीसकर मिलाकर पीने से हैजे जैसा रोग भी ठीक हो जाता है। 
आपका अपना 
डॉ. विजेन्द्र शर्मा 
चीका कैथल हरियाणा 
रीढ की हड्डियों संबंधित जानकारी पढ़िये
गर्दन का दर्द, कन्धे का दर्द, पीठ का दर्द, टाँग का दर्द, एड़ी तथा पैर का दर्द
गर्दन का दर्द, (cervical Spondylosis), कन्धे का दर्द और जकड़न, बाजुओं की चेतनाशुन्यता, कुहनी का दर्द, पीठ, कुन्हे, टाँगों एड़ियों तथा पैरों का दर्द, सलिप डिस्क तथा पैरों का लकवा इत्यादि। 
संसार के समस्त देशों में तीस़-पैंतीस वर्ष से ऊपर की आयु के अघिकांश स्त्री-पुरूषों को प्रायः गर्दन, कन्धे, बाजू या पीठ में दर्द हो जाता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार अमरीका तथा स्वीडन जैसे विकसित देशों में लगभग 80 प्रतिशत लोग अपने जीवन काल में एक न एक बार अवश्य पीठ दर्द से प्रभावित होते है। हमारे देश में भी कुछ वर्षो से रीढ की हड्डी से सम्बधित रोगियों की संख्या मे काफी वृद्धि हो रही है। भारतवर्ष में 30 वर्ष की आयु के लगभग 10 से 15 प्रतिशत लोग प्रायः रीढ की हड्डी के रोगों से पीड़ित रहते हैं। न्यूरोथैरेपी इन रोगो के सफल उपचार में कारगर है। इन रोगों के उपचार से पहले इनके कारण तथा लक्षण इत्यादि के बारे में जानना आवश्यक है।

रीढ की हड्डी का आकार

रीढ़ की हड्डी-मेरूदण्ड सिर के पिछले भाग खोपड़ी से शुरू होकर नितम्ब तक एक श्रृंखला के रूप में जाती है। एक वयस्क व्यक्ति के शरीर में रीढ की हड्डी की लम्बाई लगभग 60-70 सेंटीमीटर होती है और इसमें मोहरों जैसी 33 हड्डियाँ अलग-अलग तथा गति वाली तथा शेष नौ आपस में मिलकर सैक्रम तथा कौक्सिक्स का भाग बनाती है। गर्दन के भाग में 7 वरट्रीबा, पीठ के ऊपरी भाग में 12 वरट्रीबा और पीठ के बिल्कुल निचले भाग में नितम्ब वाले स्थान पर 5 सैक्रम की तथा 4 कोक्सिजियल हड्डियाँ होती है। रीढ की हड्डी सीढी नही होती अपितु इसमें चार वक्र होते है।
रीढ़ की हड्डी हमारे शरीर का मुख्य आधार है। सिर की हड्डियाँ का सारा बोझ इसी के सहारे टिका होता है। वक्षस्थल कि पिंजर की सारी पसलियां जो गिनती में 12 जोड़ है, रीढ़ की हड्डी के थोरेसक वरट्रीबा से जुड़ी होती है। रीढ़ की हड्डी को लचक प्रदान करती है। इसी के कारण हम दाएँ, बाएँ नीचे आसानी से झुक सकते है, ऊपर की ओर सिर उठाकर देख सकते है। और प्रत्येक कार्य को गति के साथ कर सकते है। इसके अतिक्ति केन्द्रीय वात संस्थान का मुख्य भाग मेरूरज्जु रीढ की हड्डी में ही स्थित होता है।
मेरूरज्जु से थोडी-थोडी दूरी पर 31 वातनाड़ियों के जोडे निकलते है। वात संस्थान शरीर में समस्त संस्थानों एवं अंगो का नियन्त्रण करता है। पीठ की सारी मांसपेशियों का ताना-बाना भी रीढ की हड्डी के सहारे ही बुना हुआ और ठहरा हुआ हैं।
यहाँ पर समझ लेना भी आवश्यक हैं कि यदि रीढ़ की हड्डी या मेरूरज्जु में काफी समय से कोई विकार हो तो उस भाग से सम्बंधित शरीर के अंगो में कोई विकार आ सकता है। ये भाग मुख्यतः रीढ़ की हड्डी तथा मेरूरज्जु के समानान्तर ही गर्दन तथा पेट में स्थित होते हैं।

गर्दन कंधे तथा पीठ में दर्द के प्रमुख कारण 

गर्दन कन्धे तथा पीठ तथा टाँगो में दर्द के निम्न कारण हो सकते हैः
यह रोग उन लोगों को अघिक होता है जो सारा-दिन बैठकर पढने-लिखने, सिलाई, बुनाई, कशीदाकारी या कोई ऐसा काम करते है, जिसमें गर्दन तथा कमर प्रायः झुकी रहती है। जो स्त्रियाँ बिना आराम किये घंटों भर झुककर घर का कामकाज करती है तथा शारीरिक शक्ति से अधिक काम करती है, वे इन रोगों से अवश्य पीड़ित होती है।
वजन बढ़ने से भी ये रोग हो जाते है क्योकि इससे रीढ़ की हड्डी पर अधिक बोझ पड़ जाता है जिसे हड्डियाँ तथा मांसपेशियाँ सहन नही कर पाती। डाक्टरो का विचार है कि अगर आपका वजन वांछित वजन से 25 किलो अधिक है तो इसका अभिप्राय है कि आप दिन-रात 25 किलो या अतिरिक्त बोझ उठाए रखते है।
ये रोग उन लोगों को भी हो सकते है जिन्हे गठिया- अस्थिसन्धि-शोथ होता है या फिर जिन लोगो की हड्डियाँ कमजोर पड़ जाती है। कई व्यक्तियों की मांसपेशियों की परस्पर पकड़ भी ढीली पड़ जाती है।
जो लोग सैर या व्यायाम बिल्कुल नही करते तथा सारा दिन कुछ न कुछ खाते रहते है। पेट में अधिक गैस बनने से भी प्रायः अधिक कष्टजनक हो जाते है।
संतुलित भोजन न लेना, भोजन मे पूरी मात्रा में खनिज तथा विटामिन, खास कर विटामिन डी (सुबह की धूप) न लेना अधिक मात्रा में चीनी तथा बहुत मिठाइयां खाना इत्यादि।
टेढे-मेढे हो कर सोना, हमेशा ढीली चारपाई या लचकदार बिछौना पर सोना, आरामदेह सोफों तथा गद्देदार कुर्सी पर घंटों भर बैठे रहना, ऊँचा सिरहाना तकिया लेना तथा टेढा मेढा होकर बैठना भी इन रोगों का एक मुख्य कारण है।
जो स्त्रियाँ ऊँची ऐड़ी वाले जूते डालती है उन्हें भी प्रायः कमर एवं एड़ियों का दर्द हो जाता हैं।
कई व्यक्तियो की रीढ़ की हड्डी में जन्म से भी कोई विकार होता है, दुर्घटना के समय रीढ़ की हड्डी पर चोट लगने या दबाब पड़ने के कारण उसी समय से या फिर कुछ दिनों, महीनों या वर्षो बाद ऐसे दर्द शुरू हो जाते है।
गलत ढंग से बैठ कर कोई वाहन चलाने से भी गर्दन तथा कमर का दर्द हो जाता है।
अशांति, चिन्ता, निराशा, भय तथा सदमा इन रोगों के प्रमुख कारण है।
स्त्रियों को प्रसव तथा लगातार कई प्रसवो के कारण भी ये रोग हो जाते है।
पीठ की मांसपेशियों के दर्द के कई अन्य कारण भी हो सकते है जैसे लगातार बीमारी के कारण कमजोर होना, चोट लगना, ठंड लगना, रक्त संचार ठीक न होना, शरीर की शक्ति से अधिक काम करना, पूरा आराम तथा पूरी निंद्रा न करना, अधिक बोझ उठाना, गलत ढंग से बोझ उठाना या व्यायाम करते समय मांसपेशियों पर अधिक जोर पड़ जाना इत्यादि।

गर्दन तथा पीठ र्दद के कइ्र्र्र लक्षण है। ये अनेक रोगियों मे एक दूसरे से मिलते जुलते तथा एक दूसरे से भिन्न भी हो सकते हैं। इन रोगों में पीडा बिना रूके लगातार हो सकती है। कईयों को ऐसी पीडा केवल कामकाज करते समय तथा चलते - फिरते होती है। कइयो को उठते - बैठते, लटने,झुकने,करवट लेने,दायें-बायें धुमने,बाजू आगे,पीछे या ंऊपर करते समय या कोई वस्तु उठाते समय होती है। पीडा किसी एक स्थान पर बनी रहती है। या फिर रीढ की हडडी के एक सिरे से दूसरे सिरे तक चलती रहती है। इस प्रकार पीडा पीठ के किसी एक भाग से दूसरे भाग मे पहुँच जाती है। कभी ऐसा होता है।कि पीडा तीव्र होती है और रोगी चिल्लाना शुरू कर देता है। और कभी कँाटों की चुभन जैसी प्रतीत होती है। सामान्यतः दर्द गर्दन के पास,पीठ के मघ्य मे या पीठ के बिल्कुल निचले भाग मे होता है जहँा से प्रायः किसी एक टाँग या दोनो टाँगों या दोनो टाँगों में पँहुच जाता है। टाँग का दर्द प्रायः टाँग के बाहरी तरफ नाड़ी मे प्रतीत होता है। कई रोगियों के एक पैर या दोनों पैरों का अँगूठा, एक या एक से अधिक अँगुलियों, एक पैर या दोनों पैरो का ऊपरी या नीचे सारा या कुछ भाग प्रायः सुन्न सा हो जाता है। टाँग में होने वाले दर्द को शियाटिका कहा जाता है।

प्रायः यह देखा गया है कि जिन रोगियों को गर्दन के पास या पीठ के ऊपरी भाग मे दर्द होता है उनके एक या दोनों बाजुओं मे भी दर्द होता है क्योंकि पीठ का ऊपरी भाग तथा बाजुओं की मांसपेशियाँ परस्पर सम्बंधित होती है। गर्दन का दर्द प्रायः मानसिक अशांति और मांसपेशियाँ की कमजोरी, किसी एक या दोनो के कारण भी हो सकता है।

रीढ़ की हड्डी से सम्बंधित सभी रोग न्यूरोथैरेपी के उपचार से कुछ ही दिनों मे ठीक हो जाते है।
अनेक कारणों से शरीर में पानी की क्रोनिक कमी हो सकती है जिसके गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं और यह ज़रूरी नहीं है कि इसके लक्षण एकाएक ही प्रकट हों. क्रोनिक डिहाइड्रेशन बहुत व्यापक समस्या बनता जा रहा है और यह उन व्यक्तियों को पेरभावित करता है जो पर्याप्त मात्रा में जल ग्रहण नहीं करते.

क्रोनिक डिहाइड्रेशन के फलस्वरूप होनेवाले 13 प्रमुख लक्षणों पर विचार करें और नियमित अंतराल पर पानी पीने को अपनी आदत में शामिल करें. प्रत्येक लक्षण यह बताता है कि शरीर में पानी की सतत कमी होते जाना स्वास्थ्य को किस प्रकार प्रभावित कर सकता हैः

1. थकान और ऊर्जा की कमी – शरीर के ऊतकों (टिशू) में पानी की कमी होने से एंजाइमेटिक गतिविधि धीमी हो जाती है.

2. असमय वृद्धावस्था – नवजात शिशु के शरीर में जल की मात्रा 80 प्रतिशत होती है जो कि वयस्क होने तक घटते-घटते 70 प्रतिशत रह जाती है और उम्र बढ़ने के साथ-साथ और घटती जाती है.

3. मोटापा – हम प्रायः नम और तरल भोजन लेना पसंद करते हैं इसीलिए आवश्यकता से अधिक भोजन कर लेते हैं क्योंकि प्यास को लोग कई बार भूख समझ लेते हैं.

4. हाई और लो ब्लड प्रेशर – शरीर में पानी की कमी होने पर रक्त की मात्रा धमनियों, शिराओं और रक्त वाहिनीयों के तंत्र को पूरी तरह से भरने के लिए पर्याप्त नहीं होती.

5. कोलेस्ट्रॉल – डिहाइड्रेशन होने से कोशिकाओं के भीतर स्थित द्रव कम हो जाता है. शरीर अधिक कोलेस्ट्रॉल का निर्माण करके इस नुकसान की भरपाई करने का प्रयास करता है.

6. कब्ज – जब चबाया हुआ भोजन आंतों में प्रवेश करता है तो इसमें मौजूद द्रव के कारण मल भली भांति बनता है और आंत पानी को सोख लेती हैं. पुराने कब्ज में आंतें शरीर के अन्य अंगों को पानी उपलब्ध कराने के लिए पानी को अधिकता से सोखने लगती हैं.
7. पाचन विकार – क्रोनिक डिहाइड्रेशन में पेट में पाचक रसों का निर्माण घट जाता है.

8. गैस्ट्राइटिस (Gastritis) पेट के अल्सर – पेट (आमाशय) की म्यूकस झिल्ली भीतरी सतह को अम्लीय पाचक रसों द्वारा नष्ट हो जाने से बचाने के लिए म्यूकस की एक परत हमेशा स्त्रावित होती रहती है. पानी की कमी से अम्ल बनने की गति बढ़ जाती है और पेट में छाले हो जाते हैं.

9. सांस संबंधित कठिनाइयां – फेफड़ो की भीतरी म्यूकस झिल्ली भी सांस के रास्ते भीतर आनेवाले कणों को जकड़ लेती है. पानी की कमी से इसकी क्षमता भी प्रभावित होती है.

10. एसिड-क्षार का असंतुलन – डिहाइड्रेशन होने से एंजाइम गतिविधियां सुस्त हो जाती हैं जिससे शरीर में एसिड बनना शुरु हो जाता है.

11. एक्जिमा – त्वचा की नमी बनाए रखने के लिए एक दिन शरीर में पानी की 20 से 24 औंस पसीना बनना ज़रूरी है जो एसिड की तीव्रता को कम करता है. इस दर में कमी आने से त्वचा में खारिश-खुजली होने लगती है.

12. सिस्टाइटिस (Cystitis) और यूरिन इन्फेक्शन्स – पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहने से मूत्र में मौजूद एसिड और टॉक्सिन आदि बाहर निकलते रहते हैं और उनकी तीव्रता नहीं बढ़ती. इससे यूरिन सिस्टम की म्यूकस झिल्लियां सुरक्षित रहती हैं.

13. गठिया – डिहाइड्रेशन से रक्त और शरीर के अन्य द्रवों में टॉक्सिन का कंसेन्ट्रेशन बढ़ जाता है जिससे गठिया का दर्द भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है.

कितना पानी पिएं?
हस सभी सांस लेने, पसीना बहने और मल-मूत्र त्यागने के कारण अपने शरीर का पानी खोते रहते हैं. शरीर की सभी गतिविधियां भलीभांति चलती रहें इसके लिए यह ज़रूरी है कि हम शरीर में हमेशा कम होती जा रही पानी की मात्रा की भरपाई पानी पीकर तथा तरल भोजन लेकर करते रहें.

संतुलित तापमान और वातावरण में स्वस्थ व्यस्क व्यक्ति को औसतन कितने लीटर पानी पीना चाहिए? इन्स्टीट्यूट ऑफ़ मेडिसिन के अनुसार पुरुषों के लिए पानी का यथेष्ट इनटेक (adequate intake = AI) लगभग 3 लीटर है. स्त्रियों के लिए इलकी मात्रा 2.2 लीटर है. इस इनटेक में अन्य द्रव पदार्थ जैसे चाय, कॉफ़ी, जूस आदि की मात्रा भी शामिल है.
पानी की कमी से होने वाले रोग पढ़िये
अनेक कारणों से शरीर में पानी की क्रोनिक कमी हो सकती है जिसके गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं और यह ज़रूरी नहीं है कि इसके लक्षण एकाएक ही प्रकट हों. क्रोनिक डिहाइड्रेशन बहुत व्यापक समस्या बनता जा रहा है और यह उन व्यक्तियों को पेरभावित करता है जो पर्याप्त मात्रा में जल ग्रहण नहीं करते.
क्रोनिक डिहाइड्रेशन के फलस्वरूप होनेवाले 13 प्रमुख लक्षणों पर विचार करें और नियमित अंतराल पर पानी पीने को अपनी आदत में शामिल करें. प्रत्येक लक्षण यह बताता है कि शरीर में पानी की सतत कमी होते जाना स्वास्थ्य को किस प्रकार प्रभावित कर सकता हैः

1. थकान और ऊर्जा की कमी – शरीर के ऊतकों (टिशू) में पानी की कमी होने से एंजाइमेटिक गतिविधि धीमी हो जाती है.

2. असमय वृद्धावस्था – नवजात शिशु के शरीर में जल की मात्रा 80 प्रतिशत होती है जो कि वयस्क होने तक घटते-घटते 70 प्रतिशत रह जाती है और उम्र बढ़ने के साथ-साथ और घटती जाती है.

3. मोटापा – हम प्रायः नम और तरल भोजन लेना पसंद करते हैं इसीलिए आवश्यकता से अधिक भोजन कर लेते हैं क्योंकि प्यास को लोग कई बार भूख समझ लेते हैं.

4. हाई और लो ब्लड प्रेशर – शरीर में पानी की कमी होने पर रक्त की मात्रा धमनियों, शिराओं और रक्त वाहिनीयों के तंत्र को पूरी तरह से भरने के लिए पर्याप्त नहीं होती.

5. कोलेस्ट्रॉल – डिहाइड्रेशन होने से कोशिकाओं के भीतर स्थित द्रव कम हो जाता है. शरीर अधिक कोलेस्ट्रॉल का निर्माण करके इस नुकसान की भरपाई करने का प्रयास करता है.

6. कब्ज – जब चबाया हुआ भोजन आंतों में प्रवेश करता है तो इसमें मौजूद द्रव के कारण मल भली भांति बनता है और आंत पानी को सोख लेती हैं. पुराने कब्ज में आंतें शरीर के अन्य अंगों को पानी उपलब्ध कराने के लिए पानी को अधिकता से सोखने लगती हैं.

7. पाचन विकार – क्रोनिक डिहाइड्रेशन में पेट में पाचक रसों का निर्माण घट जाता है.

8. गैस्ट्राइटिस (Gastritis) पेट के अल्सर – पेट (आमाशय) की म्यूकस झिल्ली भीतरी सतह को अम्लीय पाचक रसों द्वारा नष्ट हो जाने से बचाने के लिए म्यूकस की एक परत हमेशा स्त्रावित होती रहती है. पानी की कमी से अम्ल बनने की गति बढ़ जाती है और पेट में छाले हो जाते हैं.

9. सांस संबंधित कठिनाइयां – फेफड़ो की भीतरी म्यूकस झिल्ली भी सांस के रास्ते भीतर आनेवाले कणों को जकड़ लेती है. पानी की कमी से इसकी क्षमता भी प्रभावित होती है.

10. एसिड-क्षार का असंतुलन – डिहाइड्रेशन होने से एंजाइम गतिविधियां सुस्त हो जाती हैं जिससे शरीर में एसिड बनना शुरु हो जाता है.
11. एक्जिमा – त्वचा की नमी बनाए रखने के लिए एक दिन शरीर में पानी की 20 से 24 औंस पसीना बनना ज़रूरी है जो एसिड की तीव्रता को कम करता है. इस दर में कमी आने से त्वचा में खारिश-खुजली होने लगती है.

12. सिस्टाइटिस (Cystitis) और यूरिन इन्फेक्शन्स – पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहने से मूत्र में मौजूद एसिड और टॉक्सिन आदि बाहर निकलते रहते हैं और उनकी तीव्रता नहीं बढ़ती. इससे यूरिन सिस्टम की म्यूकस झिल्लियां सुरक्षित रहती हैं.

13. गठिया – डिहाइड्रेशन से रक्त और शरीर के अन्य द्रवों में टॉक्सिन का कंसेन्ट्रेशन बढ़ जाता है जिससे गठिया का दर्द भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है.

कितना पानी पिएं?
हस सभी सांस लेने, पसीना बहने और मल-मूत्र त्यागने के कारण अपने शरीर का पानी खोते रहते हैं. शरीर की सभी गतिविधियां भलीभांति चलती रहें इसके लिए यह ज़रूरी है कि हम शरीर में हमेशा कम होती जा रही पानी की मात्रा की भरपाई पानी पीकर तथा तरल भोजन लेकर करते रहें.

संतुलित तापमान और वातावरण में स्वस्थ व्यस्क व्यक्ति को औसतन कितने लीटर पानी पीना चाहिए? इन्स्टीट्यूट ऑफ़ मेडिसिन के अनुसार पुरुषों के लिए पानी का यथेष्ट इनटेक (adequate intake = AI) लगभग 3 लीटर है. स्त्रियों के लिए इलकी मात्रा 2.2 लीटर है. इस इनटेक में अन्य द्रव पदार्थ जैसे चाय, कॉफ़ी, जूस आदि की मात्रा भी शामिल है.
1. मूलाधार चक्र :

यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला यह "आधार चक्र" है। 99.9% लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है, उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।

मंत्र : "लं"

कैसे जाग्रत करें : मनुष्य तब तक पशुवत है, जब तक कि वह इस चक्र में जी रहा है.! इसीलिए भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर लगातार ध्यािन लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है यम और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना।

प्रभाव : इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतरवीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है।

2. स्वाधिष्ठान चक्र -
यह वह चक्र लिंग मूल से चार अंगुल ऊपर स्थित है, जिसकी छ: पंखुरियां हैं। अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है, वह आपके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए ही आपका जीवन कब व्यतीत हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ फिर भी खाली रह जाएंगे।

मंत्र : "वं"

कैसे जाग्रत करें : जीवन में मनोरंजन जरूरी है, लेकिन मनोरंजन की आदत नहीं। मनोरंजन भी व्यक्ति की चेतना को बेहोशी में धकेलता है। फिल्म सच्ची नहीं होती. लेकिन उससे जुड़कर आप जो अनुभव करते हैं वह आपके बेहोश जीवन जीने का प्रमाण है। नाटक और मनोरंजन सच नहीं होते।

प्रभाव : इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश होता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हो, तभी सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी।

3. मणिपुर चक्र :

नाभि के मूल में स्थित रक्त वर्ण का यह चक्र शरीर के अंतर्गत "मणिपुर" नामक तीसरा चक्र है, जो दस कमल पंखुरियों से युक्त है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे काम करने की धुन-सी रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।

मंत्र : "रं"

कैसे जाग्रत करें: आपके कार्य को सकारात्मक आयाम देने के लिए इस चक्र पर ध्यान लगाएंगे। पेट से श्वास लें।

प्रभाव : इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष दूर हो जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं। आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं।
4. अनाहत चक्र

हृदय स्थल में स्थित स्वर्णिम वर्ण का द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से सुशोभित चक्र ही "अनाहत चक्र" है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है, तो आप एक सृजनशील व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं.

मंत्र : "यं"

कैसे जाग्रत करें : हृदय पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह अभ्यास से जाग्रत होने लगता है और "सुषुम्ना" इस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगती है।

प्रभाव : इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है। इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है। व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता हैं। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है।

5. विशुद्ध चक्र

कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां "विशुद्ध चक्र" है और जो सोलह पंखुरियों वाला है। सामान्यतौर पर यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है, तो आप अति शक्तिशाली होंगे।

मंत्र : "हं"
कैसे जाग्रत करें : कंठ में संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र Iजाग्रत होने लगता है।

प्रभाव : इसके जाग्रत होने कर सोलह कलाओं और सोलह विभूतियों का ज्ञान हो जाता है। इसके जाग्रत होने से जहां भूख और प्यास को रोका जा सकता है वहीं मौसम के प्रभाव को भी रोका जा सकता है।

6. आज्ञाचक्र :

भ्रूमध्य (दोनों आंखों के बीच भृकुटी में) में "आज्ञा-चक्र" है। सामान्यतौर पर जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहां ज्यादा सक्रिय है, तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। "बौद्धिक सिद्धि" कहते हैं।

मंत्र : "ॐ"

कैसे जाग्रत करें : भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।

प्रभाव : यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस "आज्ञा चक्र" का जागरण होने से ये सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं, व्यक्ति एक सिद्धपुरुष बन जाता है।

7. सहस्रार चक्र :

"सहस्रार" की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।

कैसे जाग्रत करें : "मूलाधार" से होते हुए ही "सहस्रार" तक पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह "चक्र" जाग्रत हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है।

प्रभाव : शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही "मोक्ष" का द्वार है।


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