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आवश्यक जानकारी

आवश्यक जानकारी बिना पढ़े मत छोड़ना नीचे दिया हुआ पूरा लेख पढ़िये
खून की कमी मतलब कई बीमारियां बढ़ीं
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पिछले कुछ सालों के दौरान भारत सहित दुनिया भर में एनीमिया पीड़ितों की संख्या तेजी से बढ़ी है। बदलती जीवनशैली के साथ आहार संबंधी आदतों में होने वाला बदलाव इस समस्या के मुख्य कारण के रूप में सामने आ रहा है।
वास्तव में एनीमिया कोई बीमारी नहीं है, लेकिन यह कई बीमारियों की वजह जरूर बन सकता है। समय रहते इस पर काबू पाकर सेहत संबंधी कई गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता है। 
क्या है एनीमिया
हमारे शरीर को हेल्दी और फिट रहने के लिए अन्य पोषक तत्वों के साथ-साथ आयरन की भी जरूरत होती है। आयरन ही हमारे शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण करता है। ये कोशिकाएं ही शरीर में हीमोग्लोबिन बनाने का काम करती हैं। 

हीमोग्लोबिन फेफड़ों से ऑक्सीजन लेकर रक्त में ऑक्सीजन पहुंचाता है। इसलिए आयरन की कमी से शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है और हीमोग्लोबिन कम होने से शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है। इसकी वजह से कमजोरी और थकान महसूस होती है, इसी स्थिति को एनीमिया कहते हैं। 
ये हैं लक्षण
चक्कर आना
थकान होना
-त्वचा का पीला पड़ना
-सीने में दर्द
-तलवे और हथेलियों का ठंडा पड़ना
-लगातार सिर में दर्द
-शरीर में तापमान की कमी
-आंखों के नीचे काले घेरे
महिलाएं बनती हैं शिकार
शरीर के रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी से होने वाला रोग एनीमिया ऐसी समस्या है, जिसकी अधिकांश महिलाएं शिकार होती हैं। गर्भवती महिलाओं में एनीमिया का प्रभाव अधिक पाया जाता है। गर्भावस्था के दौरान शरीर को अधिक मात्रा में विटामिन, मिनरल व फाइबर आदि की जरूरत होती है। रक्त में लौह तत्वों की कमी होने से शारीरिक दुर्बलता बढ़ती है। 

वजन कम करने के लिए डाइटिंग कर रही लड़कियां भी इसकी शिकार हो जाती हैं। पीरियड्स के दौरान ब्लीडिंग होने पर, युट्रस में ट्यूमर, आंतों का अल्सर या पाइल्स के कारण भी एनीमिया की आशंका बढ़ जाती है। बच्चे को ब्रेस्ट फीडिंग करवाने वाली महिलाओं को भी एनीमिया होने का खतरा रहता है।

मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर जुगल किशोर बताते हैं, "एनीमिया का मतलब है शरीर में रेड ब्लड सेल्स कम होना। इसके कई कारण हो सकते हैं। महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान या पीरियड्स में अत्यधिक रक्त स्राव होने के कारण एनीमिया हो सकता है। आमतौर पर पाइल्स या अल्सर के कारण भी एनीमिया हो सकता है।" 
उन्होंने आगे बताया, "आजकल पर्यावरण में मौजूद हानिकारक तत्व भी एनीमिया का कारण बन रहे हैं। सबसे पहले सही कारण का पता लगाएं और उसके अनुसार उपचार लें। सही मात्रा में पोषक तत्व युक्त भोजन इसका सबसे पहला उपाय है ज्यादा समस्या होने पर खून चढ़ाने की भी जरूरत पड़ सकती है। एनीमिया की समस्या बढ़ने से व्यक्ति हृदय आघात भी हो सकता है। समय रहते ध्यान देना बहुत जरूरी है।" 

बचने के कई रास्ते
एक अकेली एनीमिया की समस्या, कई बीमारियों की जड़ है। इसे जड़ से खत्म करने के लिए संतुलित और पोषक तत्वों से भरपूर डाइट लेना जरूरी है। एनीमिया को ठीक होने में कम से कम छह महीने का समय लगता है। एनीमिया का मुकाबला करने के लिए मांस, अंडा, मछली, किशमिश, सूखी खुबानी, हरी बीन्स, पालक और हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे आयरन से परिपूर्ण आहार का सेवन महत्वपूर्ण है। 

आयरन युक्त डाइट तभी फायदेमंद होती है, जब उसके साथ विटामिन सी का भी सेवन किया जाता है। विटामिन-सी के लिए अमरूद, आंवला और संतरे का जूस लें। कुछ लोग आयरन सप्लीमेंट्स लेना पसंद करते हैं, लेकिन इसे डॉक्टर की सलाह पर ही लें। अत्यधिक आयरन भी खतरनाक हो सकता है।

खून बढ़ाने वाले आहार
चुकंदर यह आयरन का अच्छा स्त्रोत है। इसको रोज खाने में सलाद या सब्जी के तौर पर शामिल करने से शरीर में खून की कमी नहीं होती।
हरी पत्तेदार सब्जी पालक, ब्रोकोली, पत्तागोभी, गोभी, शलजम और शकरकंद जैसी सब्जियां सेहत के लिए बहुत अच्छी होती हैं। वजन कम होने के साथ खून भी बढ़ता है। पेट भी ठीक रहता है।

सूखे मेवे- खजूर, बादाम और किशमिश का खूब प्रयोग करना चाहिए। इसमें आयरन की पर्याप्त मात्रा होती है।

फल- खजूर, तरबूज, सेब, अंगूर, किशमिश और अनार खाने से खून बढ़ता है। अनार खाना एनीमिया में काफी फायदा करता है। प्रतिदिन अनार का सेवन करें।
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यूरिक एसिड 
शरीर में बढे हुए एसिड को कम करने के घरेलू उपाय बिना पढ़े मत छोड़ना
किसी भी इंसान के शरीर के खून में अगर यूरिक एसिड की मात्रा जरुरत से ज्यादा बढ़ जाती है तो वो जोड़ों में एकत्र हो जाता है जिसकी वजह से गठिया की बीमारी हो सकती है। अधिक शराब का पीना या फिर जरुरत से ज्यादा वजन का बढ़ जाना शरीर में uric acid की मात्रा को बढ़ा सकता है। body में uric acid ना बढ़े इसके लिए आप कोई भी बेकरी product का इस्तेमाल ना करे साथ ही fast food के सेवन से भी बचे ।

यूरिक एसिड के लक्षण /
Symptoms of Uric Acid

Agar aapko malum nahi hai ki aapke body mein uric acid ki matra jyada hai ya nahi to niche diye gaye lakshan se uric acid ko pahchan sakte hai. Aur samay rahte uric acid ka uchit upchar kara sakate hain.

जोड़ो में सुजन हो जाना ।
पैर के अंगूठो में सुजन होना ।
जोड़ो में गांठ पर जाना ।
शरीर के joints में दर्द होना ।
चलने व उठने बैठने के समय जोड़ो में दर्द होना|
किसी एक जगह पर ज्यादा देर बैठ जाने से जोड़ो में दर्द होना |
यूरिक एसिड का इलाज / Treatment of Uric Acid
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Niche diye gaye diet se aap uric acid ka level control kar sakte hai:

इंसान के खून में अगर uric acid बढ़ जाए तो उसे hydraulic fiber से भरा आहार का सेवन अधिक करना चाहिए जैसे की इसबगोल की भूसी, oats, पालक आदि। ये uric acid को blood से absorb कर लेता है ।
uric acid में अगर आप ठंड संसाधित तेल(cold processed oil) लेते है तो आपके लिए ये बहुत ही फायदेमंद होता है। ये uric acid को बढ़ने नहीं देता है साथ ही साथ आपको vitamin E भी मिल जाता है।
हर रोज अगर आप सुबह सुबह खाली पेट ३ से ४ अखरोट(walnut) खाते है तो आपका uric acid control में रहेगा।
जिस किसी के भी शरीर में अगर uric acid बहुत ज्यादा बढ़ जाये तो उसे ज्यादा पानी का सेवन करना चाहिए इससे शरीर में बढ़ा हुआ यूरिक एसिड बाहर निकल जायेगा। इसके अलावा पानी पिने के और फायदे है जो यहाँ पर आप विस्तार में पढ़ सकते हैं |
आंवला के जूस के साथ एलो वेरा (aloe vera) के जूस को मिला कर पीने से भी बहुत फायदा होता है। ये uric acid को control में रखता है ।
बढ़े हुए uric acid को control में रखने के लिए आप antioxidant rich food का सेवन ज्यादा करे जैसे की अंगूर, टमाटर का सलाद या जूस आदि ।
रोजाना खाना खाने के कुछ देर बाद ही एक चम्मच अलसी के बिज (flax seeds) को चबा कर खाने से भी uric acid control में रहता है।
uric acid के वजह से अगर किसी को भी गठिया का problem हो जाये तो बथुई के ताजे पत्ते (chenopodium leaves) को पीस कर उसका जूस निकाल ले और फिर ये जूस सुबह खाली पेट में पिएं। इस जूस को पिने के कम से कम २ घंटे पहले और २ घंटे बाद कुछ नहीं खाना चाहिए । लगभग १५ दिनों तक इसका प्रयोग करने से uric acid control हो जायेगा साथ ही गठिये का दर्द भी कम हो जायेगा ।
एक चम्मच अश्वगंध powder को एक चम्मच शहद के साथ मिला दे और फिर इस मिश्रण को एक glass गुनगुने दूध मिला कर पिएं । इससे uric acid control में रहेगा। ध्यान रहे की अश्वगंध चूर्ण बहुत गर्म होता है इसलिए गर्मी के मौसम में इसका सेवन कम करे ।



आवश्यक जानकारी बिना पढ़े मत छोड़ना सभी के लिए उपयोगी लाभकारी नीचे दिया हुआ पूरा लेख पढ़िये
हर प्रकार के दर्द में संजीवनी अंजीर के ये नुस्खे – Health Benefits of Anjir (Fig)
क्षय यानी टी.बी के रोग :– इस रोग में अंजीर खाना चाहिए। अंजीर से शरीर में खून बढ़ता है। अंजीर की जड़ और डालियों की छाल का उपयोग औषधि के रूप में होता है। खाने के लिए 2 से 4 अंजीर का प्रयोग कर सकते हैं।
फोड़े-फुंसी :– अंजीर की पुल्टिस बनाकर फोड़ों पर बांधने से यह फोड़ों को पकाती है।
गिल्टी :– अंजीर को चटनी की तरह पीसकर गर्म करके पुल्टिस बनाएं। 2-2 घंटे के अन्तराल से इस प्रकार नई पुल्टिश बनाकर बांधने से `बद´ की वेदना भी शांत होती है एवं गिल्टी जल्दी पक जाती है।
सफेद कुष्ठ (सफेद दाग) :– *अंजीर के पेड़ की छाल को पानी के साथ पीस लें, फिर उसमें 4 गुना घी डालकर गर्म करें। इसे हरताल की भस्म के साथ सेवन करने से श्वेत कुष्ठ मिटता है।
*अंजीर के कच्चे फलों से दूध निकालकर सफेद दागों पर लगातार 4 महीने तक लगाने से यह दाग मिट जाते हैं।
*अंजीर के पत्तों का रस श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) पर सुबह और शाम को लगाने से लाभ होता है।
*अंजीर को घिसकर नींबू के रस में मिलाकर सफेद दाग पर लगाने से लाभ होता है।”
गले के भीतर की सूजन :– सूखे अंजीर को पानी में उबालकर लेप करने से गले के भीतर की सूजन मिटती है।
श्वासरोग :– अंजीर और गोरख इमली (जंगल जलेबी) 5-5 ग्राम एकत्रकर प्रतिदिन सुबह को सेवन करने से हृदयावरोध (दिल की धड़कन का अवरोध) तथा श्वासरोग का कष्ट दूर होता है।
शरीर की गर्मी :– पका हुआ अंजीर लेकर, छीलकर उसके आमने-सामने दो चीरे लगाएं। इन चीरों में शक्कर भरकर रात को ओस में रख दें। इस प्रकार के अंजीर को 15 दिनों तक रोज सुबह खाने से शरीर की गर्मी निकल जाती है और रक्तवृद्धि होती है।
जुकाम :– पानी में 5 अंजीर को डालकर उबाल लें और इसे छानकर इस पानी को गर्म-गर्म सुबह और शाम को पीने से जुकाम में लाभ होता है।
फेफड़ों के रोग :– फेफड़ों के रोगों में पांच अंजीर एक गिलास पानी में उबालकर छानकर सुबह-शाम पीना चाहिए।
मसूढ़ों से खून का आना :– अंजीर को पानी में उबालकर इस पानी से रोजाना दो बार कुल्ला करें। इससे मसूढ़ों से आने वाला खून बंद हो जाता है तथा मुंह से दुर्गन्ध आना बंद हो जाती है।
तिल्ली (प्लीहा) के रोग में :– अंजीर 20 ग्राम को सिरके में डुबोकर सुबह और शाम रोजाना खाने से तिल्ली ठीक हो जाती है।
खांसी :– *अंजीर का सेवन करने से सूखी खांसी दूर हो जाती है। अंजीर पुरानी खांसी वाले रोगी को लाभ पहुंचाता है क्योंकि यह बलगम को पतला करके बाहर निकालता रहता है।
*2अंजीर के फलों को पुदीने के साथ खाने से सीने पर जमा हुआ कफ धीरे-धीरे निकल जाएगा।
*पके अंजीर का काढ़ा पीने से खांसी दूर हो जाती है।”
गुदा चिरना :– सूखा अंजीर 350 ग्राम, पीपल का फल 170 ग्राम, निशोथ 87.5 ग्राम, सौंफ 87.5 ग्राम, कुटकी 87.5 ग्राम और पुनर्नवा 87.5 ग्राम। इन सब को मिलाकर कूट लें और कूटे हुए मिश्रण के कुल वजन का 3 गुने पानी के साथ उबालें। एक चौथाई पानी बच जाने पर इसमें 720 ग्राम चीनी डालकर शर्बत बना लें। यह शर्बत 1 से 2 चम्मच प्रतिदिन सुबह-शाम पीयें।
बवासीर (अर्श) :- *सूखे अंजीर के 3-4 दाने को शाम के समय जल में डालकर रख दें। सुबह उन अंजीरों को मसलकर प्रतिदिन सुबह खाली पेट खाने से अर्श (बवासीर) रोग दूर होता है।
*अंजीर को गुलकन्द के साथ रोज सुबह खाली पेट खाने से शौच के समय पैखाना (मल) आसानी से होता है।”
कमर दर्द :– अंजीर की छाल, सोंठ, धनियां सब बराबर लें और कूटकर रात को पानी में भिगो दें। सुबह इसके बचे रस को छानकर पिला दें। इससे कमर दर्द में लाभ होता है।
आंवयुक्त पेचिश :- पेचिश तथा आवंयुक्त दस्तों में अंजीर का काढ़ा बनाकर पीने से रोगी को लाभ होता है।
अग्निमान्द्य (अपच) होने पर :– अंजीर को सिरके में भिगोकर खाने से भूख न लगना और अफारा दूर हो जाता है।
प्रसव के समय की पीड़ा :– प्रसव के समय में 15-20 दिन तक रोज दो अंजीर दूध के साथ खाने से लाभ होता है।
बच्चों का यकृत (जिगर) बढ़ना :– 4-5 अंजीर, गन्ने के रस के सिरके में गलने के लिए डाल दें। 4-5 दिन बाद उनको निकालकर 1 अंजीर सुबह-शाम बच्चे को देने से यकृत रोग की बीमारी से आराम मिलता है।
फोड़ा (सिर का फोड़ा) :– फोड़ों और उसकी गांठों पर सूखे अंजीर या हरे अंजीर को पीसकर पानी में औटाकर गुनगुना करके लगाने से फोड़ों की सूजन और फोड़े ठीक हो जाते हैं।
दाद :– अंजीर का दूध लगाने से दाद ठीक हो जाता है।
सिर का दर्द :– सिरके या पानी में अंजीर के पेड़ की छाल की भस्म मिलाकर सिर पर लेप करने से सिर का दर्द ठीक हो जाता है।
सर्दी (जाड़ा) अधिक लगना :- लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में अंजीर को खिलाने से सर्दी या शीत के कारण होने वाले हृदय और दिमाग के रोगों में बहुत ज्यादा फायदा मिलता है।
खून और वीर्यवद्धक :- *सूखे अंजीर के टुकड़ों एवं बादाम के गर्भ को गर्म पानी में भिगोकर रख दें फिर ऊपर से छिलके निकालकर सुखा दें। उसमें मिश्री, इलायची के दानों की बुकनी, केसर, चिरौंजी, पिस्ते और बलदाने कूटकर डालें और गाय के घी में 8 दिन तक भिगोकर रखें। यह मिश्रण प्रतिदिन लगभग 20 ग्राम की मात्रा में खाने से कमजोर शक्ति वालों के खून और वीर्य में वृद्धि होती है।

सालव मिश्री ः औषधि परिचय
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सालम मिश्री एक पोधे की जड़ है नीचे चित्र दिया हुआ है आप पहिचान कर सकते हैं।इसे हिन्दी व बंगाली,फारसी आदि भाषाओं में भी सालव मिश्री कहा जाता है।अपभ्रंस रुप में बहुत लोग इसे सालब मिश्री या सालभ मिश्री भी कहा जाता है यह आसानी से किराने की दवा वेचने वालों के यहाँ आसानी से मिल जाती है।यूनानी दवाओं में तो इसका प्रयोग बहुत स्थानों पर मिलता है इस औषधि का प्रजनन संस्थान पर भी विशेष प्रभाव पड़ता है और इसे इसी कारण प्रजनन संस्थान संबंधी योगों में बहुतायत से प्रयोग किया जाता है।
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रासायनिक संगठन के हिसाव से इसमें कुछ प्रतिशत केल्शियम और पोटेशियम के लवण म्यूसिलेज,एल्ब्यूमिन,स्टार्च,और शर्करा जैसे तत्व भी पाये जाते हैं।और म्यूसिलेज की अधिकता के कारण इसका सेवन वातिक रसों में गाढ़ापन लाता है।इसी कारण अनेकों शुक्रतारल्य के योगों में इसका सेवन चमत्कारी होता है।चिकित्सकों में यह मान्यता है कि इसमें ऐसे तत्व बहुतायत से विद्यमान हैं जो वीर्य को पुष्ट कर शरीर को शक्तिशाली बनाता है।बहुत से लोग जो शीघ्रपतन से ग्रस्त हैं और इस कारण स्त्री के सामने उन्हैं लज्जित होने की स्थिति बन जाती है यह सालम मिश्री या सालम पंजा एसे लोगों को वडा़ ही लाभकारी औषधि द्रव्य है।
इसके अलावा यह केवल पुरुष रोगों में ही नही यह स्त्रियों के प्रदर रोग व इनके कारण उत्पन्न दुर्वलता आदि दूर करने के लिए भी यह उत्तम औषधि रत्न है
चाय कितनी फायदेमंद कितनी नुकसान देय खुद ही निर्णय करें
मेरे प्यारे पाठक मित्रो सादर प्रणाम
आज मैं आपके लिए एक नयी पोस्ट लेकर हाजिर हुआ हूँ जिसपर अगर आप अमल करेगें तो शायद बहुत ही फायदा उठाऐंगे यह हम भारतीयों के लिए निरोग रहने का अच्छा तरीका रहैगा।मेरे फेसबुक साथी श्री सुदेश शर्मा भारतीय ने यह पोस्ट अपने फेसबुक एकाउण्ट पर दी थी जो मैने आपके लिए उपयुक्त पाने पर वहाँ से यहाँ ली है।आप पढ़े और उपयुक्त लगे तो फायदा उठावें मुझे तो बड़ी ही अच्छी लगी है।यह चाय बहुत ही बेकार चीज़ है हम भारतीयों के लिए क्योकि यह हमारी पाचन क्रिया पर बड़ा ही खराव प्रभाव डालती है जिससे अनेकों लोग तो पेट के रोगी ही हो गये हैं।सो भैया आपके लिए यह पोस्ट मैं भाई सुदेश जी के आभार से लाया हूँ। आपका ज्ञानेश कुमार वार्ष्णेय

कृपया पढ़े तथा लाभ उठाऐं सुदेश शर्मा भारतीय की रिपोर्ट

शुभ प्रभात मित्रजनो ,जय श्री राम ,जय माँ भारती 
मित्रो चाय के बारे मे सबसे पहली बात ये कि चाय जो है वो हमारे देश भारत का उत्पादन नहीं है ! अंग्रेज़ जब भारत आए थे तो अपने साथ चाय का पौधा लेकर आए थे ! और भारत के कुछ ऐसे स्थान जो अंग्रेज़ो के लिए अनुकूल (जहां ठंड बहुत होती है) वहाँ पहाड़ियो मे चाय के पोधे लगवाए और उसमे से चाय होने लगी ! 

तो अंग्रेज़ अपने साथ चाय लेकर आए भारत मे कभी चाय हुई नहीं !1750 से पहले भारत मे कहीं भी चाय का नाम और निशान नहीं था ! ब्रिटिशर आए ईस्ट इण्डिया कंपनी लेकर तो उन्होने चाय के बागान लगाए ! और उन्होने ये अपने लिए लगाए !

क्यूँ लगाए ???

चाय एक medicine है इस बात को ध्यान से पढ़िये !चाय एक medicine है लेकिन सिर्फ उन लोगो के लिए जिनका blood pressure low रहता है ! और जिनका blood pressure normal और high रहता है चाय उनके लिए जहर है !!

low blood pressure वालों के लिए चाय अमृत है और जिनका high और normal रहता है चाय उनके लिए जहर है !
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अब अंग्रेज़ो की एक समस्या है वो आज भी है और हजारो साल से है !सभी अंग्रेज़ो का BP low रहता है ! सिर्फ अंग्रेज़ो का नहीं अमरीकीयों का भी ,कैनेडियन लोगो का भी ,फ्रेंच लोगो भी और जर्मनस का भी, स्वीडिश का भी !इन सबका BP LOW रहता है !

कारण क्या है ???
कारण ये है कि बहुत ठंडे इलाके मे रहते है बहुत ही अधिक ठंडे इलाके मे ! उनकी ठंड का तो हम अंदाजा नहीं लगा सकते ! अंग्रेज़ और उनके आस पास के लोग जिन इलाको मे रहते है वहाँ साल के 6 से 8 महीने तो सूरज ही नहीं निकलता ! और आप उनके तापमान का अनुमान लगाएंगे तो - 40 तो उनकी lowest range है ! मतलब शून्य से भी 40 डिग्री नीचे 30 डिग्री 20 डिग्री ! ये तापमान उनके वहाँ समानय रूप से रहता है क्यूंकि सूर्य निकलता ही नहीं ! 6 महीने धुंध ही धुंध रहती है आसमान मे ! ये इन अंग्रेज़ो की सबसे बड़ी तकलीफ है !!

ज्यादा ठंडे इलाके मे जो भी रहेगा उनका BP low हो जाएगा ! आप भी करके देख सकते है ! बर्फ की दो सिलियो को खड़ा कर बीच मे लेट जाये 2 से 3 मिनट मे ही BP लो होना शुरू हो जाएगा ! और 5 से 8 मिनट तक तो इतना low हो जाएगा जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी ! फिर आपको शायद समझ आए ये अंग्रेज़ कैसे इतनी ठंड मे रहते है !घरो के ऊपर बर्फ, सड़क पर बर्फ,गड़िया बर्फ मे धस जाती है ! बजट का बड़ा हिस्सा सरकारे बर्फ हटाने मे प्रयोग करती है ! तो वो लोग बहुत बर्फ मे ररहते है ठंड बहुत है blood pressure बहुत low रहता है !

अब तुरंत blood को stimulent चाहिए ! मतलब ठंड से BP बहुत low हो गया ! एक दम BP बढ़ाना है तो चाय उसमे सबसे अच्छी है और दूसरे नमबर पर कॉफी ! तो चाय उन सब लोगो के लिए बहुत अच्छी है जो बहुत ही अधिक ठंडे इलाके मे रहते है ! अगर भारत मे कश्मीर की बात करे तो उन लोगो के लिए चाय,काफी अच्छी क्यूंकि ठंड बहुत ही अधिक है !!
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लेकिन बाकी भारत के इलाके जहां तापमान सामान्य रहता है ! और मुश्किल से साल के 15 से 20 दिन की ठंड है !वो भी तब जब कोहरा बहुत पड़ता है हाथ पैर कांपने लगते है तापमान 0 से 1 डिग्री के आस पास होता है ! तब आपके यहाँ कुछ दिन ऐसे आते है जब आप चाय पिलो या काफी पिलो !

लेकिन पूरे साल चाय पीना और everytime is tea time ये बहुत खतरनाक है ! और कुछ लोग तो कहते बिना चाय पीए तो सुबह toilet भी नहीं जा सकते ये तो बहुत ही अधिक खतरनाक है !
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इसलिए उठते ही अगर चाय पीने की आपकी आदत है तो इसको बदलीये !!
नहीं तो होने वाला क्या है सुनिए !अगर normal BP आपका है और आप ऐसे ही चाय पीने की आदत जारी रखते है तो धीरे धीरे BP high होना शुरू होगा ! और ये high BP फिर आपको गोलियो तक लेकर जाएगा !तो डाक्टर कहेगा BP low करने के लिए गोलिया खाओ ! और ज़िंदगी भर चाय भी पियो जिंदगी भर गोलिया भी खाओ ! डाक्टर ये नहीं कहेगा चाय छोड़ दो वो कहेगा जिंदगी भर गोलिया खाओ क्यूंकि गोलिया बिकेंगी तो उसको भी कमीशन मिलता रहेगा !

तो आप अब निर्णय लेलों जिंदगी भर BP की गोलीया खाकर जिंदा रहना है तो चाय पीते रहो ! और अगर नहीं खानी है तो चाय पहले छोड़ दो !
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एक जानकारी और !
आप जानते है गर्म देश मे रहने वाले लोगो का पेट पहले से ही अम्लीय (acidic) होता ! और ठंडे देश मे रहने वाले लोगो का पेट पहले से ही क्षारीय (alkaline) होता है ! और गर्म देश मे रहने वाले लोगो का पेट normal acidity से ऊपर होता है और ठंड वाले लोगो का normal acidity से भी बहुत अधिक कम ! मतलब उनके blood की acidity हम मापे और अपने देश के लोगो की मापे तो दोनों मे काफी अंतर रहता है !

अगर आप ph स्केल को जानते है तो हमारा blood की acidity 7.4 ,7.3 ,7.2 और कभी कभी 6.8 के आस पास तक चला जाता है !! लेकिन यूरोप और अमेरिका के लोगो का +8 और + 8 से भी आगे तक रहता है !

तो चाय पहले से ही acidic (अम्लीय )है और उनके क्षारीय (alkaline) blood को थोड़ा अम्लीय करने मे चाय कुछ मदद करती है ! लेकिन हम लोगो का blood पहले से ही acidic है और पेट भी acidic है ऊपर हम चाय पी रहे है तो जीवन का सर्वनाश कर रहे हैं !तो चाय हमारे रकत (blood ) मे acidity को और ज्यादा बढ़ायी गई !!

आयुर्वेद के अनुसार रक्त (blood ) मे जब अमलता (acidity ) बढ़ती है तो 48 रोग शरीर मे उतपन होते है ! उसमे से सबसे पहला रोग है ! कोलोस्ट्रोल का बढ़ना ! कोलोस्ट्रोल को आम आदमी की भाषा मे बोले तो मतलब रक्त मे कचरा बढ़ना !! और जैसे ही रक्त मे ये कोलोस्ट्रोल बढ़ता है तो हमारा रक्त दिल के वाहिका (नालियो ) मे से निकलता हुआ blockage करना शुरू कर देता है ! और फिर हो blockage धीरे धीरे इतनी बढ़ जाती है कि पूरी वाहिका (नली ) भर जाती है और मनुष्य को heart attack होता है !

तो सोचिए ये चाय आपको धीरे धीरे कहाँ तक लेकर जा सकती है !!

इसलिए कृपया इसे छोड़ दे !!!
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अब आपने इतनी अम्लीय चाय पी पीकर जो आजतक पेट बहुत ज्यादा अम्लीय कर लिया है ! इसकी अम्लता को फिर कम करिए ! 

कम कैसे करेंगे ??

सीधी सी बात पेट अम्लीय (acidic )है तो क्षारीय चीजे अधिक खाओ !
क्यूकि अमल (acidic) और क्षार (alkaline) दोनों लो मिला दो तो neutral हो जाएगा !!

तो क्षारीय चीजों मे आप जीरे का पानी पी सकते है पानी मे जीरा डाले बहुत अधिक गर्म करे थोड़ा ठंडा होने पर पिये ! दाल चीनी को ऐसे ही पानी मे डाल कर गर्म करे ठंडा कर पिये !

और एक बहुत अधिक क्षारीय चीज आती है वो है अर्जुन की छाल का काढ़ा 40 45 रुपए किलो कहीं भी मिल जाता है इसको आप गर्म दूध मे डाल कर पी सकते है ! बहुत जल्दी heart की blockage और high bp कालोस्ट्रोल आदि को ठीक करता है !!

एक और बात आप ध्यान दे इंसान को छोड़ कर कोई जानवर चाय नहीं पीता कुत्ते को पिला कर देखो कभी नहीं पियेगा ! सूघ कर इधर उधर हो जाएगा ! दूध पिलाओ एक दम पियेगा ! कुत्ता ,बिल्ली ,गाय ,चिड़िया जिस मर्जी जानवर को पिला कर देखो कभी नहीं पियेगा !! 

और एक बात आपके शरीर के अनुकूल जो चीजे है वो आपके 20 किलो मीटर के दायरे मे ही होंगी ! आपके गर्म इलाके से सैंकड़ों मील दूर ठंडी पहड़ियों मे होने वाली चाय या काफी आपके लिए अनुकूल नहीं है ! वो उनही लोगो के लिए है! आजकल ट्रांसपोटेशन इतना बढ़ गया है कि हमे हर चीज आसानी से मिल जाती है ! वरना शरीर के अनुकूल चीजे प्र्तेक इलाके के आस पास ही पैदा हो पाएँगी !!
तो आप चाय छोड़े अपने अम्लीय पेट और रक्त को क्षारीय चीजों का अधिक से अधिक सेवन कर शरीर स्व्स्थय रखे 
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गैहूँ के जवारे ः - प्रथ्वी की अनमोललजड़ी
आज की पोस्ट समर्पित है गैहूँ जिसे हम खाते है रोजाना और आज तक इसकी रोटियों की ताकत के अलावा और ताकतो के बारे में मेरे पाठको में से ज्यादा नही जानता होगा।इसके गुणों को देखकर इसे गुणों की खान कहना ही ज्यादा श्रेयस्कर है।मैं आज की पोस्ट लाया हूँ भाई आयुर्वेद नामक ने फेसबुक एकाउण्ट से

गेहूं के जवारे : पृथ्वी की संजीवनी बूटी (डॉ. जगदीश जोशी)

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प्रकृति ने हमें अनेक अनमोल नियामतें दी हैं। गेहूं के जवारे उनमें से ही प्रकृति की एक अनमोल देन है। अनेक आहार शास्त्रियों ने इसे संजीवनी बूटी भी कहा है, क्योंकि ऐसा कोई रोग नहीं, जिसमें इसका सेवन लाभ नहीं देता हो। यदि किसी रोग से रोगी निराश है तो वह इसका सेवन कर श्रेष्ठ स्वास्थ्य पा सकता है। 

गेहूं के जवारों में अनेक अनमोल पोषक तत्व व रोग निवारक गुण पाए जाते हैं, जिससे इसे आहार नहीं वरन्‌ अमृत का दर्जा भी दिया जा सकता है। जवारों में सबसे प्रमुख तत्व क्लोरोफिल पाया जाता है। प्रसिद्ध आहार शास्त्री डॉ. बशर के अनुसार क्लोरोफिल (गेहूंके जवारों में पाया जाने वाला प्रमुख तत्व) को केंद्रित सूर्य शक्ति कहा है। 

गेहूं के जवारे रक्त व रक्त संचार संबंधी रोगों, रक्त की कमी, उच्च रक्तचाप, सर्दी, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, स्थायी सर्दी, साइनस, पाचन संबंधी रोग, पेट में छाले, कैंसर, आंतों की सूजन, दांत संबंधी समस्याओं, दांत का हिलना, मसूड़ों से खून आना, चर्म रोग, एक्जिमा, किडनी संबंधी रोग, सेक्स संबंधी रोग, शीघ्रपतन, कान के रोग, थायराइड ग्रंथि के रोग व अनेक ऐसे रोग जिनसे रोगी निराश हो गया, उनके लिए गेहूं के जवारे अनमोल औषधि हैं। इसलिए कोई भी रोग हो तो वर्तमान में चल रही चिकित्सा पद्धति के साथ-साथ इसका प्रयोग कर आशातीत लाभ प्राप्त किया जा सकता है। 

हिमोग्लोबिन रक्त में पाया जाने वाला एक प्रमुख घटक है। हिमोग्लोबिन में हेमिन नामक तत्व पाया जाता है। रासायनिक रूप से हिमोग्लोबिन व हेमिन में काफी समानता है। हिमोग्लोबिन व हेमिन में कार्बन, ऑक्सीजन, हाइड्रोजन व नाइट्रोजन के अणुओं की संख्या व उनकी आपस में संरचना भी करीब-करीब एक जैसी होती है। हिमोग्लोबिन व हेमिन की संरचना में केवल एक ही अंतर होता है कि क्लोरोफिल के परमाणु केंद्र में मैग्नेशियम, जबकि हेमिन के परमाणु केंद्र में लोहा स्थित होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि हिमोग्लोबिन व क्लोरोफिल में काफी समानता है और इसीलिए गेहूं के जवारों को हरा रक्त कहना भी कोई अतिशयोक्ति नहीं है। 

गेहूं के जवारों में रोग निरोधक व रोग निवारक शक्ति पाई जाती है। कई आहार शास्त्री इसे रक्त बनाने वाला प्राकृतिक परमाणु कहते हैं। गेहूं के जवारों की प्रकृति क्षारीय होती है, इसीलिए ये पाचन संस्थान व रक्त द्वारा आसानी से अधिशोषित हो जाते हैं। यदि कोई रोगी व्यक्ति वर्तमान में चल रही चिकित्सा के साथ-साथ गेहूं के जवारों का प्रयोग करता है तो उसे रोग से मुक्ति में मदद मिलती है और वह बरसों पुराने रोग से मुक्ति पा जाता है। 

यहां एक रोग से ही मुक्ति नहीं मिलती है वरन अनेक रोगों से भी मुक्ति मिलती है, साथ ही यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति इसका सेवन करता है तो उसकी जीवनशक्ति में अपार वृद्धि होती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि गेहूं के जवारे से रोगी तो स्वस्थ होता ही है किंतु सामान्य स्वास्थ्य वाला व्यक्ति भी अपार शक्ति पाता है। इसका नियमित सेवन करने से शरीर में थकान तो आती ही नहीं है। 

यदि किसी असाध्य रोग से पीड़ित व्यक्ति को गेहूं के जवारों का प्रयोग कराना है तो उसकी वर्तमान में चल रही चिकित्सा को बिना बंद किए भी गेहूं के जवारों का सेवन कराया जा सकता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि कोई चिकित्सा पद्धति गेहूं के जवारों के प्रयोग में आड़े नहीं आती है, क्योंकि गेहूं के जवारे औषधि ही नहीं वरन श्रेष्ठ आहार भी है।

मकोय नामक दिव्य औषधि जो कर देती है हृदय एवं यकृत रोगों का सफाया

मैं पहले हैपेटाइटिस बाले लेखों में आप लोगों को बता चुका हूँ कि यकृत के रोग आपके अनीयमित खानपान,शराव आदि का ज्यादा सेबन,शहरी जीवन शैली,तनाव व काम की अधिकता,निराशा आदि के कारण रोग ग्रसित होता है वैसे इसकी कार्य क्षमता इतनी है कि इसका 10प्रतिशत भाग भी सही रहै तो यह काम करता रहेगा।ध्यान दें कि आपके शरीर के दो ही अंग हैं जिन पर खानपान व जीवन शैली का गंभीर प्रभाव पड़ता है जिनमें पहला है यकृत और दूसरा हृदय जिसे दिल भी कहते हैं।इन दोनों अंगों में रोग हो जाने पर विशेष बात यह है कि हजार रुपये से कम में तो बात बनती नही और लाखों लग जाए इसकी संभावना भी कम नही सो भइया आयुर्वेद का कहना मानो उसका नीति श्लोक है कि 'चिकित्सा से परहैज बहेतर' अर्थात जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूँ रोग का इलाज है उन कारणों का विनाश करो जिनसे रोग की उत्पत्ति हुयी है सो अपनी जीवन चर्या एसी बनाओ कि रोग पास ही न फटकें ।लैकिन जब रोग हो ही गया है तो चिकित्सा तो करनी ही पड़ेगी।प्रकृति ने हमें अनेकों औषधियाँ प्रदान की हैं जो प्रयोग करने पर हमारे रोगों को दूर कर सकती हैं इनमें कुछ तो एसी हैं कि जिन्हैं हम अनजाने में घास कूड़ा समझते हैं और आजकल के वैज्ञानिकों ने कृषि विज्ञान के छात्रों को भी खरपतबार नाम बताकर भारतीय चिकित्सा विज्ञान में प्रमाणित औषधियों का विनाश करा दिया है।अब समय आ गया है जबकि हमें इनकी उपयोगिता को समझना होगा जिससे दिव्य औषधियां समाप्त न हो जाऐं ।ऐसी ही एक दिव्य औषधि है मकोय जिसे संस्कृत में काकमाची के नाम से जाना जाता है।कहीं कहीं इसे चरगोटी,चरबोटी,चिरपोटी,कबैया या गुरुमकाई कहते है हमारे यहाँ लोग इसे मकोई के नाम से जानते हैं।गुजराती में पीलूडी,मराठी में लघु कावड़ी जबकि मुम्बई में इसे घाटी,कामुनी या मको के नाम से जाना जाता है।पंजाबी में यही कचमच,मको व कॉसफ बोला जाता है वहीं बंगाल में ये काकमाची,मको,तलीदन या गुड़काभाई के नाम से जानी जाती है।तमिल में मानतक्कली तेलगू में वाजचेट्टू,कंमाची,या काकमाची उर्दू में मकोय,अरबी में अम्बू सालबा,फारसी में रोबाहतरीक कहा जाता है इसी औषधि को अग्रेजी में कामन नाइट शेड बोला जाता है तथा इसके British Columbia Drug and Poison Information Centre (BC DPIC) में गुण धर्म भी इस लिंक पर देखे जा सकते हैं।
यह मिर्च के पौधे जैसा पोधा होता है जिसकी अधिकतम ऊँचाई 3 फिट के लगभग हो सकती है।इस पर फूल भी लगभग मिर्च जैसा ही आता है और मिर्च जैसी डालियाँ भी होती हैं इसके फल छोटे छोटे तथा समूह में होते है ये गोल गोल होते हैं पकने पर लाल हो जाते हैं तथा बाद में काले हो जाते हैं।इसके पुष्प मिर्च जैसे तथा छोटे छोटे सफेद रंग के होते हैं।
मकोय के गुण व प्रभाव मकोय या काकमाची त्रिदोषनाशक अर्थात वात,पित्त व कफ तीनो दोषों का शमन करने वाला है।यह तिक्त अर्थात कड़ुवा स्वाद रखने वाली तथा इसकी प्रकृति गर्म,स्निग्ध,स्वर शोधक,रसायन,वीर्य जनक,कोढ़,बबासीर,ज्वर,प्रमेह,हिचकी,वमन को दूर करने वाला तथा नेत्रों को हितकर औषधि है।यह यकृत व हृदय के रोगो को हरने वाली औषधि है।यकृत की क्रिया विधि जब विगड़ जाती है तो शरीर में अनेक उपद्रव यथा सूजन,पतले दस्त,व पीलिया जैसे रोगो के अलाबा कई बार बवासीर जैसे रोग होने लगते हैं।इन रोगों में मकोय का सेवन बहुत ही लाभ प्रद रहता है।यह औषधि यकृत की क्रियाविधि को धीरे धीरे सुद्रढ़ करके रोग का विनाश कर देती है।इस औषधि के प्रयोग से यकृत संवंधी रोग धीमें धीमें समाप्त हो जाते हैं।इस औषधि के पत्तों का रस आँतों में पहुँचकर वहाँ इकठ्ठे विषों का विनाश कर देता है तथा पेशाव द्वारा शरीर से बाहर कर दिया जाता है।
शरीर में कहीं सूजन हो या फिर यकृत व हृदय में सूजन हो तो इस औषधि के पत्तों का रस पिलाना लाभकारी है खूनी बबासीर में या मुँह के किसी भी हिस्से से रक्त स्त्राव में मकोय के पत्तों का रस लाभप्रद है।हृदय रोग में इसके फल देने से रोग मिट जाता है।जलोदर रोग में मकोय के फल देने से रोग मिटने लगता है।नेत्रों के रोगों में भी इस औषधि मकोय का प्रयोग बहुत ही हितकारी है।अब इतना बता देने पर इसके रस की महिमा आपको पता चल गयी होगी।मकोय का रस तिल्ली की सूजन,यकृत की सूजन,यकृत के पुराने से पुराने रोग को मिटाने की ताकत रखता है।मकोय का रस तैयार करने की विधि नीचे दे रहा हूँ।
मकोय का रस निकाल कर उसे मिट्टी के बर्तन में भरकर धीमी अग्नि पर गर्म करें,धीरे धीरे उसका हरा रंग बादामी रंग में बदल जाता है,तब इसे उतार कर छान लें।
इस प्रकार तैयार रस को 100-150 ग्राम की मात्रा में लेने पर यकृत के रोग, बड़ी हुयी तिल्ली, हृदय संबंधी रोग दूर होने लगते हैं।यदि शरीर में खुजली की शिकायत हो तथा वह मिट नही रही हो।तो मकोय के रस की 25 से 50 ग्राम की मात्रा लेते रहने से यह मिट जाऐगी।इससे शरीर का रक्त शुद्ध हो जाता है।और रक्त से जुड़े सभी रोग मिट जाते हैं।किसी चिकत्सक के सानिध्य में मकोय का रस लेते रहने पर गठिया,संधिवात,प्रमेह,कफ,जलोदर,सूजन,बवासीर,यकृत और तिल्ली के रोगों को मिटाया जा सकता है।हृदय रोग में इसके काले फल देने से मूत्र ज्यादा मात्रा में लाकर तथा पसीना लाकर यह रोगी को आराम प्रदान कर देता है। इसका प्रयोग एलोपैथिक दवाओं के प्रयोग से उत्पन्न रिऐक्सन में भी फायदा करता है।

दूर्वा घास जिसे काली घास भी कहते हैं के आयुर्वेदिक गुण




दुर्वा की खास बातें जानेंगे तो आप भी मानेंगे ये है चमत्कारी:-
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क्या आप जानते हैं श्रीगणेश को एक विशेष प्रकार की घास अर्पित की जाती है जिसे दुर्वा कहते हैं। दुर्वा के कई चमत्कारी प्रभाव हैं। यहां जानिए दुर्वा से जुड़ी खास बातें

गणपति अथर्वशीर्ष में उल्लेख है-
यो दूर्वांकरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति।
अर्थात- जो दुर्वा की कोपलों से (गणपति की) उपासना करते हैं उन्हें कुबेर के समान धन की प्राप्ति होती है।

प्रकृति द्वारा प्रदान की गई वस्तुओं से भगवान की पूजा करने की परंपरा बहुत प्राचीन है। जल, फल, पुष्प यहां तक कि कुश और दुर्वा की घास द्वारा अपनी प्रार्थना ईश्वर तक पहुंचाने की सुविधा हमारे धर्मशास्त्रों में दी गई है। दुर्वा चढ़ाने से श्रीगणेश की कृपा भक्त को प्राप्त होती है और उसके सभी कष्ट-क्लेश समाप्त हो जाते हैं।

हमारे जीवन में दुर्वा के कई उपयोग हैं। दुर्वा को शीतल और रेचक माना जाता है। दुर्वा के कोमल अंकुरों के रस में जीवनदायिनी शक्ति होती है। पशु आहार के रूप में यह पुष्टिकारक एवं दुग्धवर्धक होती है। प्रात:काल सूर्योदय से पहले दूब पर जमी ओंस की बूंदों पर नंगे पैर घूमने से नेत्र ज्योति बढ़ती है।

पंचदेव उपासना में दुर्वा का महत्वपूर्ण स्थान है। यह गणपति और दुर्गा दोनों को अतिप्रिय है। पुराणों में कथा है कि पृथ्वी पर अनलासुर राक्षस के उत्पात से त्रस्त ऋषि-मुनियों ने इंद्र से रक्षा की प्रार्थना की। इंद्र भी उसे परास्त न कर सके। देवतागण शिव के पास गए। शिव ने कहा इसका नाश सिर्फ गणेश ही कर सकते हैं। देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर श्रीगणेश ने अनलासुर को निगल लिया। जब उनके पेट में जलन होने लगी तब ऋषि कश्यप ने 21 दुर्वा की गांठ उन्हें खिलाई और इससे उनकी पेट की ज्वाला शांत हुई।

दुर्वा जिसे आम भाषा में दूब भी कहते हैं एक प्रकार ही घास है। इसकी विशेषता है कि इसकी जड़ें जमीन में बहुत गहरे (लगभग 6 फीट तक) उतर जाती हैं। विपरीत परिस्थिति में यह अपना अस्तित्व बखूबी से बचाए रखती है। दुर्वा गहनता और पवित्रता की प्रतीक है। इसे देखते ही मन में ताजगी और प्रफुल्लता का अनुभव होता है। शाक्तपूजा में भी भगवती को दुर्वा अर्पित की जाती है।

पांच दुर्वा के साथ भक्त अपने पंचभूत-पंचप्राण अस्तित्व को गुणातीत गणेश को अर्पित करते हैं। इस प्रकार तृण के माध्यम से मानव अपनी चेतना को परमतत्व में विलीन कर देता है।

श्रीगणेश पूजा में दो, तीन या पांच दुर्वा अर्पण करने का विधान तंत्र शास्त्र में मिलता है। इसके गूढ़ अर्थ हैं। संख्याशास्त्र के अनुसार दुर्वा का अर्थ जीव होता है जो सुख और दु:ख ये दो भोग भोगता है। जिस प्रकार जीव पाप-पुण्य के अनुरूप जन्म लेता है। उसी प्रकार दुर्वा अपने कई जड़ों से जन्म लेती है। दो दुर्वा के माध्यम से मनुष्य सुख-दु:ख के द्वंद्व को परमात्मा को समर्पित करता है। तीन दुर्वा का प्रयोग यज्ञ में होता है। ये आणव (भौतिक), कार्मण (कर्मजनित) और मायिक (माया से प्रभावित) रूपी अवगुणों का भस्म करने का प्रतीक है।
इसके अलावा फेसबुक पर ही इसका एक योग और भाई विनोद जैन सुराना ने लिखा है ।कि इस घास को घुटनों की प्राव्लम को दूर करने में भी प्रयोग होता है जिसके लिऐ घास को तोड़कर छाया में सुखा लें फिर मिक्सी में वारीक चूर्ण बना ले और इसका 1 चम्मच चूर्ण लेकर रो़ज दूध से लें।

चिर युवा बनाने वाला द्रव्य है आँवला
कि कितना कष्ट होता है अपने वुढा़पे का आगमन तथा उसे काटना और अगर व्यक्ति के हाथ में होता तो वह इसे आने ही नही देता लैकिन यहाँ में एक बात कहूँगा कि चाहै बहुत अधिक विपरीत परिस्थितियाँ न हों तो यह सत्य ही है कि व्यक्ति यौवन के समय को वढ़ा सकता है।लैकिन इसके लिए शरीर को थोड़ा कष्ट तो देना ही पड़ेगा।और अगर थोड़ी महेनत व देखभाल से यदि सदावहार यौवन या चिरयुवा पन प्राप्त हो जाए तो मैं यह नहीसमझता कि कोई भी घाटे का सौदा होगा।हमारे आयुर्वेद में एक महर्षि हुये है जिनका नाम हम चरक के ना्म से जानते हैं उन्हौने वयःस्थापन के उपाय अर्थात चिर युवा बने रहने के उपायों का विस्तार से वर्णन किया है।अभी सर्दियाँ शुरु ही हुयी हैं और आयुर्वेद में रुचि लेने बाले यह जान लें कि यही समय है जब कि आप अपने शरीर को अच्छी खुराक दे सकते हैं क्योंकि इस समय जठराग्नि प्रवल रहती है सो आप लक्कड़ पत्थर जो भी खाऐंगे सब हजम हो जाऐगा इन सर्दी सर्दी के महिनों में सो इसका लाभ उठाऐं।
आजकल आँवले का फल आना शुरु हो गया है और अगर आपके यहां नही आया है तो जल्दी ही आ जाएगा सो केवल बाजार पर ध्यान ही रखे ।पके हुये आँवले अगर आप वैसे ही खाए तो वैसे ही खा सकतै हैं ।क्योंकि यह पहले खट्टा लगताहै कि न्तु सैकेंण्डो बाद ही मुँह मीठा हो जाता है।आँवला विटामिन सी का बहेतरीन स्रोत है।आवले का रस अगर 2-3 चम्मच निकालकर रोजानाखाने के बाद पी लिया जाऐ तो शरीर में सभी विटामिन मिल जाएगी।अब जिन्है यह आँवला एसे अच्छा न लग रहा हो तो आँवलो को 2 दिन तक नमक के पानी में रख दे तो वह जब पीले पीले से हो जाए तब काट काट कर सुखाकर किसी काँच के वर्तन में रख लें।यह अब आपको खट्टा सा न लगकर स्वादिष्ट हो जाता है।इसी फार्मूले को सुखाकर पीसकर चूर्ण बनाकर भी दिनो तक रखे जा सकते हैं।बाबा रामदेव दी के यहाँ के बने एसे पाउच आप विना हाथ पैर हिलाए भी प्राप्त कर सकते हैं।
आँवला वुद्धि बल को तो बढ़ाता ही है साथ ही साथ रक्त पित्त,प्रमेह,संभोग शक्ति बढा़ने बाला,बुढ़ापे को दूर रखने बाला,नेत्रज्योति बढ़ाने बाला,वात,पित्त, कफ अर्थात त्रिदोष का काम तमाम करने बाला,भोजन में रुचि बढ़ाने वाला,शारीरिक शीतलता,गर्मी आदि का निवारण करने बाला,थकान,उल्टी,कब्ज आदि का हरण करने बाला है।यह व्यक्ति की आयु,शऱीर का वजन बढ़ाने वायु का अनुलोमन,दमा,खाँसी,बबासीर,चर्म रोग,पेट रोग,विसर्प,ग्रहणी ,विषम ज्वर आदि हृदय रोग,हिचकी,कामला ,पेट क दर्द, कामला,बड़ी हुयी तिल्ली,बढ़े हुय़े,बूँद बूँद कर या रुक कर पेशाव आना समस्याओं को मिटाने के साथ ही इन्द्रियों का बल व स्मृति बढा़ने में सहायक है।
अब आँवले के निम्न प्रयोग भी आप कर सकते हैं जो उपरोक्त लाभों का प्रदान करेंगें।
आँवले का मुरब्वाः-आँवले को छल्नी से घिसकर उनसे समान मात्रा में चीनी डालकर धीमी आँच पर गरम करके डेढ.तार की चासनी लेकर नीचे रख दिन बनाने को इलायची व केशर डालकर काँच की बोतल में ऱख लें।
आमलकी रसायन
रसायन चूर्ण
त्रिफला 
आवले का घी आदि सभी तरह के ये 1 से 4 तक की सभी बस्तुएं बाजार से मिल जाती है और आप बैहिचक इनका प्रयोग कर सकते हैं।
अन्त में आँवला बास्तव मे व्यक्ति को तरोताजा रखता है।और किसी भी वय के बालक ,बूढ़े या स्त्रियाँ सभी इसे प्रयोग करके रोग मुक्त रह सकते हैं।आप सदैव निरोग रहैं यही हमारी मनोकामना है। 

गोंद के प्राकृतिक गुणो को जानें तथा लाभ उठाऐं
मित्रो यह पोस्ट मैं आपको श्री नितीश मयूर जी के फेसबुक एकाउण्ट से दे रहा हूँ। मेरा उद्देश्य आपको आयुर्वेद की सभी सम्भब जानकारियाँ देने का रहता है कि आपको यथा संभव आयुर्वेदिक जानकारियाँ प्राप्त हो सकें।आज की पोस्ट मुझे अच्छी ब अपने पाठकों के उपयुक्त लगी तो मैने इसे साभार ग्रहण किया जिससे आपको आयुर्वेद की महिमा का पता चल सके- 
गोंद एक एसा प्राकृतिक द्रव्य है जो पोधों से प्राप्त होता है और यह पौधे का वृज्य पदार्थ है।यह कभी कभी तो कई जगहों पर पौधे का आँसू या रोना भी कहलाता है। यह एक अच्छी औषधि भी होता है औऱ प्रत्येक पोधे का गोंद अलग प्रकार के गुण धर्म रखता है।आज मैं केवल आपको यही जानकारी दूँगा और फिर कभी विशेष इसी विषय पर ही कोई पोस्ट दूंगा ।लैकिन आज भाई नितीश मयूर जी द्वारा प्रतिपादित पोस्ट से जानकारी अर्जित करें औऱ लाभ उठाऐं उन्हौने यथा सम्भव आपको इस छोटी सी पोस्ट में अनेकों गुणों का वर्णन कर गागर में सागर भरने का सफल प्रयास किया है। आपका ज्ञानेश कुमार वार्ष्णेय। 
गोंद के औषधीय गुण 
किसी पेड़ के तने को चीरा लगाने पर उसमे से जो स्त्राव निकलता है वह सूखने पर भूरा और कडा हो जाता है उसे गोंद कहते है .यह शीतल और पौष्टिक होता है . उसमे उस पेड़ के ही औषधीय गुण भी होते है . आयुर्वेदिक दवाइयों में गोली या वटी बनाने के लिए भी पावडर की बाइंडिंग के लिए गोंद का इस्तेमाल होता है .
कीकर या बबूल का गोंद पौष्टिक होता है .
- नीम का गोंद रक्त की गति बढ़ाने वाला, स्फूर्तिदायक पदार्थ है।इसे ईस्ट इंडिया गम भी कहते है . इसमें भी नीम के औषधीय गुण होते है - पलाश के गोंद से हड्डियां मज़बूत होती है .पलाश का 1 से 3 ग्राम गोंद मिश्रीयुक्त दूध अथवा आँवले के रस के साथ लेने से बल एवं वीर्य की वृद्धि होती है तथा अस्थियाँ मजबूत बनती हैं और शरीर पुष्ट होता है।यह गोंद गर्म पानी में घोलकर पीने से दस्त व संग्रहणी में आराम मिलता है।
- आम की गोंद स्तंभक एवं रक्त प्रसादक है। इस गोंद को गरम करके फोड़ों पर लगाने से पीब पककर बह जाती है और आसानी से भर जाता है। आम की गोंद को नीबू के रस में मिलाकर चर्म रोग पर लेप किया जाता है।
- सेमल का गोंद मोचरस कहलाता है, यह पित्त का शमन करता है।अतिसार में मोचरस चूर्ण एक से तीन ग्राम को दही के साथ प्रयोग करते हैं। श्वेतप्रदर में इसका चूर्ण समान भाग चीनी मिलाकर प्रयोग करना लाभकारी होता है। दंत मंजन में मोचरस का प्रयोग किया जाता है।
- बारिश के मौसम के बाद कबीट के पेड़ से गोंद निकलती है जो गुणवत्ता में बबूल की गोंद के समकक्ष होती है।
- हिंग भी एक गोंद है जो फेरूला कुल (अम्बेलीफेरी, दूसरा नाम एपिएसी) के तीन पौधों की जड़ों से निकलने वाला यह सुगंधित गोंद रेज़िननुमा होता है । फेरूला कुल में ही गाजर भी आती है । हींग दो किस्म की होती है - एक पानी में घुलनशील होती है जबकि दूसरी तेल में । किसान पौधे के आसपास की मिट्टी हटाकर उसकी मोटी गाजरनुमा जड़ के ऊपरी हिस्से में एक चीरा लगा देते हैं । इस चीरे लगे स्थान से अगले करीब तीन महीनों तक एक दूधिया रेज़िन निकलता रहता है । इस अवधि में लगभग एक किलोग्राम रेज़िन निकलता है । हवा के संपर्क में आकर यह सख्त हो जाता है कत्थई पड़ने लगता है ।यदि सिंचाई की नाली में हींग की एक थैली रख दें, तो खेतों में सब्ज़ियों की वृद्धि अच्छी होती है और वे संक्रमण मुक्त रहती है । पानी में हींग मिलाने से इल्लियों का सफाया हो जाता है और इससे पौधों की वृद्धि बढ़िया होती
- गुग्गुल एक बहुवर्षी झाड़ीनुमा वृक्ष है जिसके तने व शाखाओं से गोंद निकलता है, जो सगंध, गाढ़ा तथा अनेक वर्ण वाला होता है. यह जोड़ों के दर्द के निवारण और धुप अगरबत्ती आदि में इस्तेमाल होता है .
- प्रपोलीश- यह पौधों द्धारा श्रावित गोंद है जो मधुमक्खियॉं पौधों से इकट्ठा करती है इसका उपयोग डेन्डानसैम्बू बनाने में तथा पराबैंगनी किरणों से बचने के रूप में किया जाता है।
- ग्वार फली के बीज में ग्लैक्टोमेनन नामक गोंद होता है .ग्वार से प्राप्त गम का उपयोग दूध से बने पदार्थों जैसे आइसक्रीम , पनीर आदि में किया जाता है। इसके साथ ही अन्य कई व्यंजनों में भी इसका प्रयोग किया जाता है.ग्वार के बीजों से बनाया जाने वाला पेस्ट भोजन, औषधीय उपयोग के साथ ही अनेक उद्योगों में भी काम आता है।
- इसके अलावा सहजन , बेर , पीपल , अर्जुन आदि पेड़ों के गोंद में उसके औषधीय गुण मौजूद होते है .
दूध जिसे अंग्रेजी में Milk व संस्कृत में क्षीर के नाम से जाना जाता है वास्तव में वह वस्तु है जिसे धरती का अमृत कहा जाता है वैसे भी अगर कहीं अमृत है तो वह यह दूध या दुग्ध ही है।इसमें सभी पौष्टिकतत्व एक ही पदार्थ या वस्तु में ही मिल जाते है सो इसे Complete Food या पूर्ण भोजन भी कहा जा सकता है।इसमें जो पौष्टिक तत्व नही पाया जाता है वह है केवल विटामिन सी।बाकी सबसे श्रेष्ठ भोजन है दूध इसी लिए ऋषि मुनियों व आयुर्वेद के मनीशियों ने इसी कारण व्रत व उपवासों में जवकि रोटी व अन्न को खाने की मनाही लिखी है वही दूध को निरापद घोषित किया है।वैसे दूधों का औषधि के रुप में प्रयोग करते समय अनेको जानवरों के दूध जिसे जंगम दूध कहा गया है इस दुग्ध वर्ग में गाय,बकरी,गधी,उँटनी, भैड़,स्त्री,भैंस आदि का दूध लिया गया है।जबकि पेड़ व पौधों को भी औषधि द्रव्यों में प्रयोग किया गया है जिसे स्थावर दूध कहा गया है।वैसे बच्चे के लिए अपनी माँ का दूध ही सर्वोत्तम माना गया है किन्तु रोग की अवस्था में चाहैं रोग माँ को हो या बच्चे को हो को केवल गाय का दूध ही पिलाना सर्वोत्कृष्ट है।वैसे भी बीमार लोगों के लिए गाय का दूध एक टानिक की तरह है ।आज कल कुछ रोगों मे नये शोधों के अनुसार बकरी का दूध बहुत ही तीव्र फायदा करता देखा गया है जैसे कि डेंगू के इलाज में भी रोग के इलाज में अनुपान में बकरी का दूध पीने से फायदा होगा।
जिन लोगों की जठराग्नि थोड़ा कमजोर है या जिन्है गैस की शिकायत रहती है ऐसे लोग एक दिन अपने दूध में निम्न औषधियाँ मिलाकर प्रयोग करना चाहिय़े।
इलायची 
पीपर
पिपलामूल 
आजी मसाले मिलाकर उवला दूध पीने से शरीर गैस व मंदाग्नि का वि नाश होता है।
दूध से बनने बाली बस्तुऐं व उनके गुणः
मलाईः मलाई एक एसा द्रव्य है जो दूध से ही निकलती है तथा यह गरिष्ठ,शीतल,बलबर्धक ,तृप्तिकारक, पुष्टिबर्धक ,कफ कारक और धातु वढ़ाने बाले गुणों को रखता है।यह दूध को उबालकर प्राप्त होती है।यह पित्त,कफ,पुष्टिकारक ,कफ कारक,और धातु बर्धक होता है ।

पान के औषधीय गुण*
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भारतीय संस्कृति में पान को हर तरह से शुभ माना जाता है। धर्म, संस्कार, आध्यात्मिक एवं तांत्रिक क्रियाओं में भी पान का इस्तेमाल सदियों से किया जाता रहा है।
**************इसके अलावा पान का रोगों को दूर भगाने में भी बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया जाता है। खाना खाने के बाद और मुंह का जायका बनाए रखने के लिए पान बहुत ही कारगर है। कई बीमारियों के उपचार में पान का इस्तेमाल लाभप्रद माना जाता है
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* पान में दस ग्राम कपूर को लेकर दिन में तीन-चार बार चबाने से पायरिया की शिकायत दूर हो जाती है। इसके इस्तेमाल में एक सावधानी रखना जरूरी होती है कि पान की पीक पेट में न जाने पाए।

* चोट लगने पर पान को गर्म करके परत-परत करके चोट वाली जगह पर बांध लेना चाहिए। इससे कुछ ही घंटों में दर्द दूर हो जाता है। खांसी आती हो तो गर्म हल्दी को पान में लपेटकर चबाएं।

* यदि खांसी रात में बढ़ जाती हो तो हल्दी की जगह इसमें अजवाइन डालकर चबाना चाहिए। यदि किडनी खराब हो तो पान का इस्तेमाल बगैर कुछ मिलाए करना चाहिए। इस दौरान मसाले, मिर्च एवं शराब (मांस एवं अंडा भी) से पूरा परहेज रखना जरूरी है।

* जलने या छाले पड़ने पर पान के रस को गर्म करके लगाने से छाले ठीक हो जाते हैं। पीलिया ज्वर और कब्ज में भी पान का इस्तेमाल बहुत फायदेमंद होता है। जुकाम होने पर पान में लौंग डालकर खाने से जुकाम जल्दी पक जाता है। श्वास नली की बीमारियों में भी पान का इस्तेमाल अत्यंत कारगर है। इसमें पान का तेल गर्म करके सीने पर लगातार एक हफ्ते तक लगाना चाहिए।

* पान में मुलेठी डालकर खाने से मन पर अच्छा असर पड़ता है। यूं तो हमारे देश में कई तरह के पान मिलते हैं। इनमें मगही, बनारसी, गंगातीरी और देशी पान दवाइयों के रूप में ज्यादा कारगर सिद्ध होते हैं। भूख बढ़ाने, प्यास बुझाने और मसूड़ों की समस्या से निजात पाने में बनारसी एवं देशी पान फायदेमंद साबित होता है।
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चेतावनी :कत्थे का प्रयोग मुंह के कैंसर का कारण भी हो सकता है। यहां सिर्फ पान के औषधीय महत्व की जानकारी दी गई है
अमरुद अमृत सम फल प्रदायक फल
अमरुद लाजवाव स्वाद वाला पौष्टिकता से भरपूर फल है जो सर्वाधिक मात्रा में भारत में ही पैदा होता है।इसका पेड़ तीन से दस मी. तक ऊँचा हो जाता है।यह साल के बारहों महिने हरा रहने बाला पेड़ है।पेड़ का तना अन्य पेड़ों जैसा न होकर अपने आप में निराला ही होता है। जो अन्य पेड़ो की तुलना में काफी पतला सा होता है तथा छाल की परते सी उचली हुयी सी रहती हैं जो हरी व भूरे से रंग की होती है।इसके पेड़ों परसफेद रंग के फूल भी कहीं इक्का दुक्का तो कहीं 2-3 फूलों के गुच्छे में मि्लते हैं।बनाबट व गुणों के आधार पर कुछ जातियों में अमरुद का फल तो गोल सा होता है तो कई जातियों के अमरुद लम्बे से होते हैं।अमरुद का छिलका हरे रंग का पतला सा व पके अमरुद में यह पीला सा हो जाता है।अमरुद का गूदा पीला सा व कभी कभी गुलाबी भी होता है।गूदे के अन्दर बीज एक स्पेशल तरीके से लगे होते हैं।पकने पर इसका गूदा मुलायम व दानेदार हो जाता है जो बहुत स्वादिस्ट भी लगता है।इसके बीज बहुत कठोर होते हैं आजकल कुछ प्रजातियाँ एसी भी हैं जिनमे बीज हैं ही नही।

अमरुद एक एसा फल है जो पेड़ से टूटने के बाद कई दिनो तक तरोताजा ही बना रहता है।और अगर आपके घऱ में फ्रीज कीसुविधा है तो सोने पर सुहागा फिर तो आप 10-12दिन तक अमरुदों का मजा ले सकते हैं । लैकिन फिर भी मै तो यह ही कहूँगा कि आप अगर फलों का असली आनन्द लेना चाहते हैं तो भैया ताजे फल ही अच्छी प्रकार से धो कर खाऐं कारण यह है कि आजकल अधिक उत्पादन के चक्कर में किसान कीटनाशकों व रसायनों का भरपूर प्रयोग कर रहै हैं।
अगर अमरुद का रासायनिक विवेचन किया जाऐ तो 100 ग्राम अमरुद हमें प्रचुर मात्रा में फास्फोरस व पोटेशियम देने के साथ 152 मिलीग्राम विटामिन सी, 7 ग्राम रेसे,33 मिलीग्राम कैल्सियम,1 मिलीग्राम आयरन प्रदान करता है।अमरुद का प्रत्येक अंग आयुर्वेदिक दवा में काम आता है।
अमरुद कसेला,मधुर,खट्टा,तीक्ष्ण,बलवर्धक,उन्मादनाशक,त्रिदोषनाशक,दाह और बेहोशी नष्ट करने बाला है।
बच्चों के लिए भी अमरुद बहुत पौष्टिक फल है।अमरुद स्नायुमण्डल,पाचन तंत्र,हृदय व दिमाग को ताकत प्रदान करता है।

पेट के दर्द में अमरुद का सफेद गूदा हल्के नमक के साथ खाने से आराम मिलता है।
पुराने जुकाम में चूल्है की आग पर भुना हुआ अमरुद नमक व काली मिर्च के साथ खाने से जुकाम की स्थिति से छुटकारा प्राप्त होता है।
चहरे के मुहासे हो जाने पर इसके पत्तों को पानी में उबाल कर उसमें नमक डालकर चहरे पर लगाने से मुहासे ठीक हो जाते हैं।
अमरुद में पाया जाने बाला रेशा या फाइवर मेटावोलिज्म को ठीक रखने की सबसे अच्छी दवा है तो जिन लोगों का पेट खराव रहता है वो लोग अमरुद का सेवन अवश्य करें।
नेत्र के रोगी भी अमरुद को खूब खाऐ कारण इसमे उनकी आँखों को लाभकारी तत्व विटामिन ए प्रचुर मात्रा में मि्लता है।
मसूड़े व सांस के मरीजो के लिए इसकी पत्तियाँ चबाने से मसूड़े तो ताकतवर होंगे ही साथ ही साँस की ताजगी आएगी।
चमकती दमकती त्वचा के लिए भी यह फायदे मंद है क्योंकि अमरुद में विटामिन ए,बी,व सी के साथ पोटेशियम भी प्रचुर मात्रा में मिलती है।अमरुद को पीसकर अगर चहरे पर लगाया जाए तो स्किन के दाग धब्बे तो दूर होंगे ही साथ ही त्वचा का भी निखार आएगा।
आजकल का सबसे खतरनाक रोग बी.पी. का बढ़ना घटना है। इस रोग का भी उपाय यह अमरुद अपने आप में समाए हुए है।
अमरुद रक्त में कोलेस्ट्राल की मात्रा को संतुलित बनाए रखता है।यह रक्त का प्रवाह शरीर में बना रहे इसमें भी महत्वपूर्ण सहयोग करता है।


शोधों के आधार पर एक अमरुद में एक संतरे के फल से चार गुना विटामिन सी प्राप्त हो सकता है।और यह शरीर को क्लिंजर का काम करता है।पके अमरुद की अपेक्षा कच्चे अमरुद में विटामिन सी ज्यादा मात्रा में पायी जाती है। अतः थोड़ा पका होने पर ही इसे सलाद में भी खाकर हम फायदा उठा सकते हैं।
अन्त में यह कहकर मैं अपनी बात समाप्त करना चाहता हूँ कि संस्कृत भाषा में अमृत फल नाम से वर्णित अमरुद आजकल के शोधों में भी अपना महत्व पूर्ण स्थान बनाकर आयुर्वेद की महानता को वर्णित कर रहा है क्योंकि उस समय ऋषियों के पास आज की तरह के यंत्र नही थे न ही उनके पास आज के वैज्ञानिकों की तरह की सुविधाए ही थी परन्तु उनके पास जो दिव्य द्ष्टि थी उससे उन्होने आज कल के एलौपेथिक चिकित्सा शास्त्र की अपेक्षा कहीं अधिक विकसित ऐसी चिकित्सा पद्धति दी जिसमें साइड इफैक्ट का कहीं भी नाम नही था।और अमरुद की अगर बात करे तो इसके पौष्टिकता व गुणों को देखकर ही ऋषियों ने इसे अमृत फल नाम दिया था।

घरों में प्रयोग होने वाली हल्दी को भारतीय समाज में शायद ऐसा कोई भी नही होगा जो न जानता हो और तो औऱ इसके रोगों में प्रयोग को लेकर भी हर घर में न सही तो ज्यादातर घरों की महिलाए अवश्य ही जानती हैं फिर भी इसके प्रयोग इतने अधिक हैं कि शायद कोई भी व्यक्ति एसा नही होगा जो इसके सभी प्रयोगों के बारे में जानता होगा।
मैने अभी दो दिन पहले हल्दी पर एक पोस्ट दी जो लेख मैने साभार श्री रणधीर चौधरी पानीपतिया के फेसबुक एकाउण्ट से लिया था।और इस पर आप लोगो का आवागमन देखकर मैने आपका अधिक प्यार पाने के लिए यह नयी पोस्ट हल्दी पर ही दे रहा हुँ।आशा है आप लोगों को अवश्य पसंद आएगी।
घर में मसालों में प्रयोग होने की ही तरह हल्दी के आयुर्वेद में अनेको प्रयोग हैं जो देश काल परिस्थिति के अनुसार लोगों की जानकारी में हैं तथा स्थानीय लोग इन प्रयोगों को करके स्वास्थ्य लाभ लेते हैं व लेते रहहैं।
हल्दी कई भयंकर रोगों की रामवाण दवा होने के कारण अनेको रोगों के रोगियों को वरदान है। जैसे मधुमेह में इसका प्रयोग संजीवनी के समान है।इसके औषधीय गुणों को देखते हुए प्राकृतिक चिकित्सा के ग्रंथो मे इसे चमत्कारी औषधि का दर्जा दिया गया है।आज विज्ञान के चमत्कारों का बोलबाला है अतः कोई भी वस्तु यदि उपयोगी है तभी समाज की उसे मान्यता मिल पाती है फिर इस औषधि के गुणों को देखकर तो अमेरिका का भी ईमान डोल गया और उसने भारतीय औषधि हल्दी का एक बार तो पेटेन्ट ही करा लिया लैकिन धन्यबाद भारतीय वीरों को जिन्हौने अमेरिका को टक्कर ही नही दी अपितु धूल चटा दी और हल्दी का भारतीय पेटेण्ट करा लिया।
हल्दी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे किसी भी उम्र का व्यक्ति चाहें बच्चा बूढ़ा या जवान हो निड़र होकर प्रयोग कर सकता है।और तो और इसे गर्भ वती स्त्रियाँ भी प्रयोग कर सकती हैँ।हल्दी में प्रोटीन, वसा,कार्बोहाइड्रेट,फाइबर,खनिज पदार्थ जैसे मैंगनीज, पोटेशियम,कैल्शियम,फास्फोरस,लोहा, विटामिन ए, बी, सी के स्रोत तथा ऊर्जा भी पाई जाती है।आधुनिक शोधों के अनुसार हल्दी में कैंसर की कोशिकाओं को मारने की क्षमता है।और तो और मैने http://eeshay.com पर .यह भी पढ़ा कि यह डोमेंशिया या भूलने की बीमारी के इलाज में भी लाभदायक है।हल्दी में एक रसायन‘करक्यूमिन’ पाया जाता है जो गठिया तथा मनोभ्रम या डोमेंशिया यानि की भूलने की बीमारी जैसी बीमारियों के इलाज का महत्वपूर्ण तत्व है। ब्रिटेन के कार्क कैंसर रिसर्च सैण्टर में कैंसर की कोशिकोओं पर किये गये शोध के अनुसार ‘करक्यूमिन’ने 24 घण्टे के भीतर ही कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करना शुरु कर दिया।यह जानकारी ब्रिटिस जरनल आफ कैंसर में प्रकाशित हो चुका है।
आयुर्वेदिक ग्रंथो यथा चरक संहिता आदि ग्रंथो में हल्दी को कुष्ठ रोग,खुजली व विष को नष्ट करने वाली औषधि कहा है।आचार्य सुश्रुत के अनुसार सांस रोग, खांसी मिटाने वाली तथा नेत्र राग हर कहा गया है।भोजन पाचक व कुष्ठ व मधुमेह या डायविटीज में प्रभावकारी है


भारत मे हल्दी बहुत समय पहले से ही दूल्हा व दुल्हन का रुप व सोन्दर्य निखारने के लिए हल्दी चढ़ाने की रस्म निभायी जाती रही है जिसका उद्देश्य इसलिए है कि अगर जोड़े में से किसी को या दोनों को कोई भी चर्म रोग हो तो वह हल्दी से नष्ट हो जाऐ।

हल्दी पर मैं कुछ समय तक आपको धारावाहिक लेख रुक रुक कर लिखुगाँ आप नियमित आना जारी रखें।क्रमशः-------------------------------------------
हल्दी है इन दो जानलेवा बीमारियों की गजब की दवा

यह लेख मैने साभार श्री रणधीर चौधरी पानीपतिया के फेसबुक एकाउण्ट से ली है।
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हल्दी के गुणों से तो हम और आप तो वर्षों से परिचित रहे हैं और दुनिया के वैज्ञानिक भी इसके नए- नए गुणों के पन्ने जोड़ते चले जा रहे हैं।
अब हाल के ही एक शोध को ले लीजिये ,हल्दी मैं पाए जानेवाले तत्व कुर्कुमिन को कैंसर को फैलानेवाली अवस्था जिसे मेटास्टेसिस के नाम से जाना जाता है ,इसे रोकने में मददगार पाया गया है। पश्चिमी देशों में प्रोस्टेट कैंसर सबसे खतरनाक माना जाता रहा है और अधिकांश में इसका पता तब चलता है ,जब इसका ट्यूमर शरीर के कई अंगों में फैल चुका होता है। तीन प्रतिशत रोगियों में यह फैलाव घातक होता है। म्यूनिक स्थित एल.एम् .यू.के डॉ बेट्रिक बेक्मिरर की मानें तो हल्दी के सकिय तत्व करक्यूमिन को मेटास्टेसिसरोधी गुणों से युक्त पाया गया है। इन वैज्ञानिकों की टीम ने करक्यूमिन को कैंसर से बचाव सहित दूसरे अंगों में फैलने से रोकने वाले गुणों से युक्त पाया गया है। इससे पूर्व भी इन्हें वैज्ञानिकों ने करक्यूमिन को फेफेड़ों और स्तन के मेटास्टेसिस को रोकने वाले गुणों से युक्त पाया था,वैज्ञानिकों ने करक्यूमिन में कैंसर के फैलने के लिए जिम्मेदार दो प्रोटीन के निर्माण को कम कर देने वाले गुणों से युक्त पाया है।

करक्यूमिन के इस प्रभाव के कारण ट्यूमर कोशिकाएं कम मात्रा में साइटोकाईनिन को पैदा कर पाती हैं,जो मूलत: कैंसर के फैलाव यानी मेटास्टेसिस के लिए जिम्मेदार होता है। डॉ.बेक्मिरर का तो यहाँ तक कहना है की हल्दी में पाया जानेवाला तत्व करक्यूमिन केवल कैंसर के फैलाव को ही कम नहीं करता है ,अपितु इसके नियमित सेवन से स्तन और प्रोस्टेट के कैंसर से भी बचा जा सकता है। वैज्ञानिकों ने प्रतिदिन आठ ग्राम तक करक्यूमिन की मात्रा को मानव शरीर के लिए सुरक्षित माना है। हल्दी के गुणों का आयुर्वेद के जानकार सदियों से चिकित्सा में प्रयोग कराते आ रहे हैं । भारतीय व्यंजन हल्दी के श्रृंगार के बगैर अधूरी ही मानी गई है। वैज्ञानिकों का यह मानना है की बी.एच .पी .(बीनाइन प्रोस्टेटिक हायपरप्लेसीया ) एवं महिलाएं जिनका पारिवारिक स्तन कैंसर का इतिहास रहा हो उनमें करक्यूमिन का सेवन कैंसर से बचाव की महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकता है।
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जामुन का फल- देखन में छोटा लगे काम करे गंभीर

जामुन
बड़े-2 छायादार जामुन के वृक्षों पर लगने बाला जामुन का फल स्वाद में निराला तो होता ही है यह अपने औषधीय गुणों से भी भरपूर होता है। हिन्दी महिनों के आधार पर यह अषाढ़ मास में पैदा होने वाली अषाढ़ा जामुन व भाद्रपद माह में होने वाली भदैयाँ जामुन कहलाती है।दोनो की बनाबट में भी बहुत अन्तर होता है। पर दोनों ही औषधीय गुणों से भरपूर हैं।जामुन को नमक डाल कर खाना चाहिंए,जामुन के फल,गुठली,वृक्ष की की छाल तीनो चीजें यहाँ तक कि इसकी पत्तियाँ भी औषधीय गुणों से यक्त होती हैं 
ध्यान दें-जामुन को कभी भी दूध के साथ न लें,जबकि भोजन के बाद नमक लगा कर लेना अत्यंत गुणकारी है। 
रासायनिक गुण-
जामुन का फल- शीतल,मधुर,ऱुचिकारक कसैला,रूक्ष,पौष्टिक कफ पित्त व अफारा नाशक तथा शरीर में रक्त की वृद्धि करता है।
गुठली-फल तो फल जामुन की गु्ठली की गिरी में जम्बोलिन ग्लूकोसाइड पाया जाता है।जिसका प्रमुख लक्षण यह है कि यह तत्व स्टार्च को शर्करा में परिवर्तित होने से रोकता है।अतः मधुमेह या सुगर के रोगियों के लिए इसकी गुठलियोँ का चूर्ण अच्छा फायदा करता है।इसके अतिरिक्त क्लोरोफिल,एल्ब्यूमिन,गेलिक एसिड,रेजिन व चर्बी आदि अनेक बहुमूल्य पदार्थ पाए जाते हैं।इसमे लोह तत्व भी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।यह लोह तत्व इतना सोम्य व गुणकारक होता है कि इससे किसी प्रकार का नुकसान नही हो सकता अपितु यह लोह शरीर में लोह की कमी को पूरा करने के साथ शरीर यकृत(जिगर)और प्लीहा(तिल्ली)आदि शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर लाभकारी परिणाम डालता है अतः शरीर में रक्त की प्रचुर मात्रा में बृद्धि होती है।
बृक्ष की छाल- स्वाद में मधुर,कसैली,पाचक,रुक्ष,शरीर के मलों(दोषों)को उनके निकलने वाले मार्गों से ही निकालने वाली है यह रुचिकर पित्त दाह में तत्काल शान्तिकारक औषध है। 
सिरका- जामुन का सिरका पेट सम्बंधी रोगों के लिए लाभकारक है।
रोग और जामुन-
1-मधुमेह-(अ)जामुन की गुठली का चूर्ण 5ग्रा.दिन में दो बार शहद से या जल के साथ लेते रहने से मूत्र में शक्कर की मात्रा कम हो जाती है।
(व)जामुन की गुठली को सुुखाकर उसका पाउडर बनाकर रख लें। नियमित रूप से आधा चम्मच की मात्रा में सुबह शाम पानी के साथ इसका सेवन करें। जामुन की छाल को सुखाकर उसे जलाएं और राख बनाकर छान लें। फिर इसे बोतल में भरकर रख लें। इसके सेवन से सुबह शाम 60-65 मिली ग्राम की मात्रा में खाली पेट पानी के साथ इसके सेवन करने से डायबिटीज नियंत्रित रहता है।
परहेज- चावल आलू शक्कर व मीठे पदार्थों का सेवन बन्द कर दें।जौ चने की रोटी,गाय का फीका दूध,मक्खन फल शाक,फूलशाक आदि का सेवन करें।
2-मोतीझरा- जामुन के कोमल पत्ते,गुलदाउदी के फूल,काली मिर्च समान भाग लेकर जल के साथ पीस लें। मोतीझरा के रोगी को पिलाएं तुरन्त शान्ति मिलेगी। रोग भी दूर होगा।
3-रक्त प्रदर-महिलाओं की व्याधि रक्तप्रदर में जामुन की गिरी का चूर्ण शक्कर में मिलाकर दिन में तीन वार सेवन करने से रक्त प्रदर में लाभ मिलता है।
4-बार बार पेशाव जाना(बहुमूत्र)जामुन की गिरी का बारीक चूर्ण इसी चूर्ण के बराबर कालेतिल साफ करके मिला लें। 10-10 ग्रा.सुबह शाम दूध से लें बहुमूत्र दूर हो जाता है।

5-आवाज वैठना यदि आपकी आवाज बैठ गई है या मोटी या भारीपन लिए हुए है और आप इससे छुटकारा पाना चाहते हैं तो आपको शहर में जामुन की गुठली का पाउडर मिलाकर लेना चाहिए। इससे आवाज का भारीपन दूर होता है साथ ही आवाज भी साफ हो जाएगी।
6-जामुन और आम की गुठलियों का 2-2 ग्राम पाउडर छाछ के साथ दिन में तीन बार लेने से पेट दर्द दूर होता है।
7-फोड़े फुंसी-जामुन की गुठली को पानी के साथ घिसकर चेहरे पर लेप करने से मुंहासे और फुंसियां दूर होती हैं और चेहरे का सौंदर्य निखरता है।
8- आग से जले के घाव में-आग से जलने पर घाव बन गया हो तो जामुन की छाल की राख नारियल तेल के साथ मिलाकर घाव लगाने से लाभ होता है।
9-मंजन जामुन की छाल को छाया में सुखाकर बारीक पीसकर कपडे से छान लें। इसका प्रयोग मंजन के रूप में करें। इससे दांत मजबूत होते हैं, साथ ही पायरिया और दांत दर्द से भी छुटकारा मिलता है। 
10-उल्टियों में जामुन की छाल को छाया में सुखाकर उसकी भस्म शहद में मिला कर चाटने से उल्टियों में लाभ होता है।


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