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नींद न आने की बीमारी के शिकार हैं भारतीय!


नींद न आने की बीमारी के शिकार हैं भारतीय!

। एक ताजा सर्वे में पाया गया है कि भारतीयों में नींद की समस्याएं भरपूर हैं लेकिन वह इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं। फिलिप्स एंड नेलसन कंपनी ने अपने ताजा सर्वे में भारतीयों के सोने की आदतों का पता लगाया है। इसमें पाया गया कि 93 फीसद भारतीयों को आवश्यकतानुसार नींद नहीं मिलती। इनमें से ज्यादातर ऐसे हैं जिन्हें एक रात में आठ घंटे से कम की ही नींद मिलती है।


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सर्वे में बताया गया कि 87 फीसद भारतीय ऐसे हैं जिन्हें लगता है कि नींद कम आने के कारण उनकी सेहत खराब हो रही है। वहीं, 72 फीसद लोग ऐसे ही हैं जिनकी नींद बहुत कच्ची होती है। और हल्की सी आहट में भी उठ जाते हैं। ऐसे लोग रात में कम से कम तीन बार जरूर जग जाते हैं। 62 फीसद लोग अनमने होकर आंख मूंदकर लेटे रहते हैं। पर नींद नहीं आती। या फिर ऐसे लोगों की नींद के दौरान दस सेकेंड तक सांस रुक जाती है जिससे घबराकर वह उठ जाते हैं।


57 फीसद भारतीय मानते हैं कि नींद न आने से उनका काम प्रभावित होता है। दफ्तरों में 38 फीसद लोगों ने अपने साथी कर्मचारियों को नींद में ऊंघते देखा है। खराब नींद की निशानी खर्राटे भरना भी है। देश में 33 फीसद लोग खर्राटे लेते हैं उनमें से आधे के खर्राटे की आवाज उनके बातचीत की आवाज से भी तेज होती है। 19 फीसद भारतीय ऐसे भी हैं जिन्हें लगता है कि कम सोने के कारण उनका स्वभाव चिड़चिड़ा हो रहा है और इससे उनके रिश्ते परिवार से खराब हो रहे हैं।


11 फीसद लोग अपनी नींद पूरी करने के लिए दफ्तर से छुट्टी ले लेते हैं। लेकिन इतना सब होने के बावजूद केवल दो फीसद लोग ही अपनी नींद संबंधी परेशानियों के इलाज के लिए किसी चिकित्सक के पास जाते हैं। अन्यथा आमतौर पर लोग नींद संबंधी गंभीर परेशानी होने पर भी इसका इलाज कराने के लिए किसी डॉक्टर से परामर्श नहीं लेते हैं।


उल्लेखनीय है कि विश्वस्तर पर भी एक तिहाई लोग नींद संबंधी समस्याओं से ग्रस्त हैं। चिकित्सकों ने चेताया है कि इन समस्याओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। चूंकि नींद न आने से संबंधित 80 प्रकार की बीमारियां हैं। अच्छी बात ये है कि इन सभी का इलाज हो सकता है। आपकी नींद कैसी और कितनी है इससे ही आपके सेहतमंद होने का पता चलता है।

दिल्ली के गंगाराम अस्पताल के न्यूरोलाजिस्ट डॉ. संजय मनचंदा ने बताया कि अनिद्रा रोग से जीवन की गुणवत्ता तो कम होती ही है याद्दाश्त पर बुरा असर पड़ता है। घबराहट, सुस्ती, उदासी और पारिवारिक समस्याओं के अलावा गंभीर बीमारियों में मधुमेह, हृदयरोग और मस्तिष्क आघात तक हो सकता है। मनचंदा ने बताया कि 33 फीसद सड़क दुर्घटना नींद की कमी के कारण ही होती हैं।

: मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य

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आजकल लोग नींद के दौरान कई अजीबोगरीब हरकतें कर रहे हैं, जिसमें सेक्‍स करने से लेकर खाना खाने और एसएमएस करने तक की क्रिया शामिल है। ब्रिटेन में इन परेशानियों के उपचार के लिए लोग मनोचिकित्‍सकों के पास जा रहे हैं। ब्रिटेन के मेंटल हेल्थ फ़ांउडेशन के अनुसार ब्रिटेन के तीस प्रतिशत लोग नींद से संबंधित किसी न किसी बीमारी के शिकार हैं। तो कहीं आप भी नींद के झोके में ही यौन क्रिया को तो नहीं अंजाम दे रहे हैं। अच्‍छी नींद से आप इस तरह की परेशानियों से बच सकते हैं।

आप सोच रहे होंगे कि आख़िर लोग नींद में कौन-सी अजोबीगरीब हरकतें करते हैं:

नींद में ही कर डालते हैं पूरा संभोग
कहीं आप भी नींद में तो नहीं कर रहे हैं सेक्‍स!
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कहीं आप भी नींद में तो नहीं कर रहे हैं सेक्‍स!

आजकल लोग नींद के दौरान कई अजीबोगरीब हरकतें कर रहे हैं, जिसमें सेक्‍स करने से लेकर खाना खाने और एसएमएस करने तक की क्रिया शामिल है। ब्रिटेन में इन परेशानियों के उपचार के लिए लोग मनोचिकित्‍सकों के पास जा रहे हैं। ब्रिटेन के मेंटल हेल्थ फ़ांउडेशन के अनुसार ब्रिटेन के तीस प्रतिशत लोग नींद से संबंधित किसी न किसी बीमारी के शिकार हैं। तो कहीं आप भी नींद के झोके में ही यौन क्रिया को तो नहीं अंजाम दे रहे हैं। अच्‍छी नींद से आप इस तरह की परेशानियों से बच सकते हैं।



आप सोच रहे होंगे कि आख़िर लोग नींद में कौन-सी अजोबीगरीब हरकतें करते हैं:

नींद में ही कर डालते हैं पूरा संभोग
सेक्सोमेनिया एक ऐसी बीमारी है जिसमें लोग नींद में संभोग करते हैं. इसके बारे में मालूमात हाल ही में हासिल हुई हैं. इसके मामले तब सामने आते हैं जब लोग बहुत ज़्यादा तनाव में होते हैं या फिर शराब और ड्रग्स का सेवन कर चुके हों. इसमें कई बार लोग नींद में ही पूरा संभोग कर लेते हैं.

एडिनबरा स्लीप क्लिनिक के डॉक्टर क्रिस इडज़ीकोव्सकी कहते हैं कि कई बार नींद के दौरान सेक्स काफ़ी हिंसक भी हो सकता है.
डॉक्टर क्रिस इडज़ीकोव्सकी के अनुसार, “ऐसा व्यवहार होते वक्त दिमाग का वो हिस्सा सो रहा होता है जो सोचने और सजग रहने के लिए ज़िम्मेदार होता है. सिर्फ़ यौन इच्छाओं वाला हिस्सा ही जागता रहता है.”

फोन से चिपके रहने वाले लोग नींद में एसएमएस करते रहते हैं
ब्रिटेन के एक अस्पताल में काम करने वाली डॉक्टर क्रिस्टी एंडरसन कहती हैं कि कई लोग नींद में एसएमएस करने के आदी हो गए हैं. एक अनुमान के अनुसार ब्रिटेन में 92 फ़ीसदी लोगों के पास मोबाइल फोन है और इनमें से अधिकांश अपने फोन के साथ ही बिस्तर में जा रहे हैं. डॉक्टर एंडरसन के अनुसार, ये आम बात है कि जो काम लोग जागते वक्त करते हैं वही वो सपनों के दौरान भी करते हैं. और चूँकि मोबाइल आने के बाद एसएमएस का चलन भी बढ़ा है तो ज़ाहिर उनका दखल सपनों में होगा. भई आपका फ़ोन भी तो तकिए के पास ही होता होगा. क्या आपने कभी ऐसा किया है?

भोजन करते ही नहीं, कुछ तो नींद में उसे बना भी लेते हैं!
कुछ लोग सुबह उठकर अपने किचन को काफ़ी अस्त-व्यस्त पाते हैं. नींद में चलने वाले ये लोग हैरान होते होंगे लेकिन ये तो उन्हीं का करा-धरा होता है. नींद में चलकर रसोई घर तक पहुंचने में कुछ मुँह में डाल लेना एक बड़ी समस्या नहीं है. इसे डॉक्टर नॉक्टर्नल ईटिंग सिंड्रोम कहते है.

ज्यादा मुश्किल मामलों में, कुछ लोग खाना तक बना लेते हैं. ऐसे मामले में वे नींद से जगे होते हैं लेकिन उन्हें ये याद नहीं होता कि वे क्या कर चुके हैं. नींद में चलने की बीमारी के बारे में जानकारी बढ़ने के साथ ऐसे लोग भी क्लीनिक का दरवाज़ा खटखटाने लगे हैं.

सांस बंद होना
नींद में सांस बंद होने की बीमारी को ऑब्सट्रक्टिव एपनोआ कहते हैं. जानकार कहते हैं कि इस मर्ज का संबंध मोटापे से है. इस हालात में लोग ज़ोर-ज़ोर से खर्राटे भी मारते हैं.

बीबीसी के एक कार्यक्रम के लिए टेस्ट का हिस्सा बने पॉल एस्बुरी कहते हैं कि वो कभी-कभी नींद में 26 सैंकड तक सांस लेना बंद कर देते हैं. पॉल एस्बुरी ने कहा, “जब मुझे ये बताया गया तो मैं डर गया. मुझे तो लगा कि मुझे सिर्फ़ खर्राटे मारने की आदत है लेकिन जाहिर है कि हालात काफ़ी गंभीर हैं.”

पैरासोमनिया
नींद के दौरान कुछ लोगों को धमाके और तेज़ रोशनी भी दिखाई देती है। नींद के दौरान इस तरह के विकारों को पैरासोमनिया कहते हैं. इसमें सोने के दौरान आंखों के खुले रहने से लेकर नींद में कार चलाने तक जैसी चीज़ें शामिल हैं. ब्रितानी डॉक्टर एंडरसन के पास वैसे लोग भी आए हैं जो नींद के दौरान ही अपने दादा के हाथों से सावधानीपूर्वक घड़ी तक उतार लेते हैं.
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हेड सिंड्रोम
इसके अलावा नींद से जुड़ी एक और समस्या से पीड़ित लोगों की संख्या बढ़ी है. आप गहरी नींद में होते हैं और अचानक आपको लगता है कि आपके दिमाग में जोरदार धमाका हुआ है और आप अचानक से उठ जाते हैं. इसे हेड सिंड्रोम कहा जाता है.
इससे पीड़ित लोगों को ऐसा लगता है कि पास में कोई बड़ा धमाका हुआ है, या फिर जोरदार बिजली गरजी है या फिर किसी ने फ़ायरिंग की है. इसमें कोई दर्द तो नहीं होता लेकिन इससे लोग व्यथित हो जाते हैं. अमूमन लोग भागकर खिड़की तक पहुंच कर झांक कर देखते हैं कि धमाका कहां हुआ या आवाज़ क्यों आयी.

अभी और भी शोध की है जरूरत
ऐसा क्यों होता है और उस वक्त हमारे दिमाग में क्या कुछ चल रहा होता है, इसके बारे में रहस्य बना हुआ है. इस पहलू पर ज़्यादा शोध अध्ययन नहीं हुए हैं. इसकी अहम वजह तो यही है कि इसको लेकर आंकड़ों को एकत्रित करना एक मुश्किल काम रहा है. वैसे क्या आपने कभी नींद के दौरान कुछ अजीब हरकत की है?

कितनी नींद है ज़रूरी
* इंसान- 5 से 11 घंटे
* अजगर- 18 घंटे
* बिल्ली- 12.1 घंटे
* भेंड- 3.8 घंटे
* जिराफ़- 1.9 घंटे

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सेक्सोमेनिया एक ऐसी बीमारी है जिसमें लोग नींद में संभोग करते हैं. इसके बारे में मालूमात हाल ही में हासिल हुई हैं. इसके मामले तब सामने आते हैं जब लोग बहुत ज़्यादा तनाव में होते हैं या फिर शराब और ड्रग्स का सेवन कर चुके हों. इसमें कई बार लोग नींद में ही पूरा संभोग कर लेते हैं.

एडिनबरा स्लीप क्लिनिक के डॉक्टर क्रिस इडज़ीकोव्सकी कहते हैं कि कई बार नींद के दौरान सेक्स काफ़ी हिंसक भी हो सकता है.

डॉक्टर क्रिस इडज़ीकोव्सकी के अनुसार, “ऐसा व्यवहार होते वक्त दिमाग का वो हिस्सा सो रहा होता है जो सोचने और सजग रहने के लिए ज़िम्मेदार होता है. सिर्फ़ यौन इच्छाओं वाला हिस्सा ही जागता रहता है.”


फोन से चिपके रहने वाले लोग नींद में एसएमएस करते रहते हैं 

ब्रिटेन के एक अस्पताल में काम करने वाली डॉक्टर क्रिस्टी एंडरसन कहती हैं कि कई लोग नींद में एसएमएस करने के आदी हो गए हैं. एक अनुमान के अनुसार ब्रिटेन में 92 फ़ीसदी लोगों के पास मोबाइल फोन है और इनमें से अधिकांश अपने फोन के साथ ही बिस्तर में जा रहे हैं. डॉक्टर एंडरसन के अनुसार, ये आम बात है कि जो काम लोग जागते वक्त करते हैं वही वो सपनों के दौरान भी करते हैं. और चूँकि मोबाइल आने के बाद एसएमएस का चलन भी बढ़ा है तो ज़ाहिर उनका दखल सपनों में होगा. भई आपका फ़ोन भी तो तकिए के पास ही होता होगा. क्या आपने कभी ऐसा किया है? 
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भोजन करते ही नहीं, कुछ तो नींद में उसे बना भी लेते हैं!
कुछ लोग सुबह उठकर अपने किचन को काफ़ी अस्त-व्यस्त पाते हैं. नींद में चलने वाले ये लोग हैरान होते होंगे लेकिन ये तो उन्हीं का करा-धरा होता है. नींद में चलकर रसोई घर तक पहुंचने में कुछ मुँह में डाल लेना एक बड़ी समस्या नहीं है. इसे डॉक्टर नॉक्टर्नल ईटिंग सिंड्रोम कहते है.

ज्यादा मुश्किल मामलों में, कुछ लोग खाना तक बना लेते हैं. ऐसे मामले में वे नींद से जगे होते हैं लेकिन उन्हें ये याद नहीं होता कि वे क्या कर चुके हैं. नींद में चलने की बीमारी के बारे में जानकारी बढ़ने के साथ ऐसे लोग भी क्लीनिक का दरवाज़ा खटखटाने लगे हैं.

सांस बंद होना
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नींद में सांस बंद होने की बीमारी को ऑब्सट्रक्टिव एपनोआ कहते हैं. जानकार कहते हैं कि इस मर्ज का संबंध मोटापे से है. इस हालात में लोग ज़ोर-ज़ोर से खर्राटे भी मारते हैं.
बीबीसी के एक कार्यक्रम के लिए टेस्ट का हिस्सा बने पॉल एस्बुरी कहते हैं कि वो कभी-कभी नींद में 26 सैंकड तक सांस लेना बंद कर देते हैं. पॉल एस्बुरी ने कहा, “जब मुझे ये बताया गया तो मैं डर गया. मुझे तो लगा कि मुझे सिर्फ़ खर्राटे मारने की आदत है लेकिन जाहिर है कि हालात काफ़ी गंभीर हैं.”

पैरासोमनिया

नींद के दौरान कुछ लोगों को धमाके और तेज़ रोशनी भी दिखाई देती है। नींद के दौरान इस तरह के विकारों को पैरासोमनिया कहते हैं. इसमें सोने के दौरान आंखों के खुले रहने से लेकर नींद में कार चलाने तक जैसी चीज़ें शामिल हैं. ब्रितानी डॉक्टर एंडरसन के पास वैसे लोग भी आए हैं जो नींद के दौरान ही अपने दादा के हाथों से सावधानीपूर्वक घड़ी तक उतार लेते हैं.

हेड सिंड्रोम

इसके अलावा नींद से जुड़ी एक और समस्या से पीड़ित लोगों की संख्या बढ़ी है. आप गहरी नींद में होते हैं और अचानक आपको लगता है कि आपके दिमाग में जोरदार धमाका हुआ है और आप अचानक से उठ जाते हैं. इसे हेड सिंड्रोम कहा जाता है.
इससे पीड़ित लोगों को ऐसा लगता है कि पास में कोई बड़ा धमाका हुआ है, या फिर जोरदार बिजली गरजी है या फिर किसी ने फ़ायरिंग की है. इसमें कोई दर्द तो नहीं होता लेकिन इससे लोग व्यथित हो जाते हैं. अमूमन लोग भागकर खिड़की तक पहुंच कर झांक कर देखते हैं कि धमाका कहां हुआ या आवाज़ क्यों आयी. 

अभी और भी शोध की है जरूरत

ऐसा क्यों होता है और उस वक्त हमारे दिमाग में क्या कुछ चल रहा होता है, इसके बारे में रहस्य बना हुआ है. इस पहलू पर ज़्यादा शोध अध्ययन नहीं हुए हैं. इसकी अहम वजह तो यही है कि इसको लेकर आंकड़ों को एकत्रित करना एक मुश्किल काम रहा है. वैसे क्या आपने कभी नींद के दौरान कुछ अजीब हरकत की है?

कितनी नींद है ज़रूरी

* इंसान- 5 से 11 घंटे
* अजगर- 18 घंटे 
* बिल्ली- 12.1 घंटे 
* भेंड- 3.8 घंटे 

* जिराफ़- 1.9 घंटे 
। एचआईवी एड्स का पता लगते ही स्त्री पुरुष का सेक्स के प्रति रुझान में गिरावट आ जाता है। वह इस कदर depression से घिर जाते हैं कि सेक्‍स से उन्‍हें अरुचि हो जाती है और वह इससे मुंह फेर लेते हैं। एचआईवी एडस की जानकारी मिलते ही महिला और पुरुष दोनों के यौन व्‍यवहार में गिरावट आती है, लेकिन पुरुषों की मन:स्थिति अधिक चिंताजनक स्‍तर पर पहुंच जाती है।

पीडि़तों का यौन व्यवहार पूरी तरह से बदल जाता है और sex से वह दूरी बनाना शुरू कर देते हैं। विशेषज्ञों की राय है कि दंपत्ति में से किसी एक को hiv aids होने पर कंडोम लगाकर सुरक्षित संभोग किया जा सकता है। यदि पति पत्‍नी दोनों को एचआईवी हो चुका है तो वे बिना condom के भी सेक्‍स कर सकते हैं। सेक्‍स के प्रति व्‍यवहार में गिरावट स्‍वाभाविक है, लेकिन इससे जीने की इच्‍छा न होने का पता चलता है। इसलिए जरूरी है कि सही उपचार के साथ खुश रहा जाए। 


Hiv Aids symptoms की जानकारी मिलते ही यौन व्‍यवहार में गिरावट

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (icmr) का राष्ट्रीय प्रजनन स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान द्वारा मुंबई के 407 hiv aids positive व्यक्तियों पर अध्ययन किया गया। गर्भनिरोधक विधियों के उपयोग की जानकारी, उनके यौन व्यवहार का रुख और उनमें कंडोम के उपयोग को बढावा देने के लिए इन सभी का साक्षात्कार किया गया। इस साक्षात्कार में यह सामने आया कि खुद के एचआईवी से पीडि़त होने की जानकारी होते ही 50 फीसदी महिलाएं और 64 फीसदी पुरुष सेक्स से मुंह मोड लेते हैं। इनके यौन व्यवहार में गिरावट आ जाती है। 

पति एचआईवी पीडित होने की बात पत्‍नी से छुपा लेते हैं

इस साक्षात्कार में भाग लेने वालों में कुल 368 विवाहित जोडे में से 35 फीसदी ऐसे थे, जिनमें दोनों को एचआईवी था। 21 फीसदी ऐसे थे, जिनके केवल एक साथी को एचआईवी था जबकि 44 फीसदी ऐसे थे, जिन्होंने अपने साथी से अपने एचआईवी पीडि़त होने की बात पूरी तरह से छुपाई। एचआईवी पीडित होने की बात छुपाने वालों में पतियों की संख्‍या पत्नियों की अपेक्षा ज्‍यादा देखी गई। ऐसे लोग अपने साथी के लिए हमेशा जोखिम भरा होते हैं और उन्हें कभी भी यह जानलेवा बीमारी दे सकते हैं। 
कंडोम के उपयोग को लेकर दोहरा व्‍यवहार

एचआईवी पीडि़तों में 53 फीसदी ने माना कि वह बिना condom संभोग करने का जोखिम कभी नहीं लेते। जबकि 32 फीसदी ऐसे थे, जो एचआईवी का इलाज तो करा रहे थे, लेकिन यौन संबंध बनाने में कंडोम का उपयोग बिल्कुल नहीं करते थे। ऐसे लोगों ने अपने साथी को भी यह जानलेवा बीमारी दे दिया। इन लोगों से जब पूछा गया कि आप एचआईवी के बारे में जानते-समझते हुए कंडोम का उपयोग क्यों नहीं करते? तो उनका जवाब था कि कंडोम का उपयोग करने से शारीरिक संबंध की गोपनीयता भंग होती है। ऐसे लोग यह समझते हैं कि यदि वह कंडोम ख़रीदेंगे तो लोगों को पता चल जाएगा कि वह संभोग करने के लिए इसे ख़रीद रहे हैं। इस कारण कंडोम ख़रीदने में इन्हें झिझक महसूस होती है।
बच्‍चा पैदा करने की भी इच्‍छा
अध्ययन में यह भी सामने आया कि एचआईवी पोजीटिव कुछ दंपित्त इसके बाद भी बच्चे पैदा करना चाहते हैं ताकि उनका वंश आगे चल सके। उनमें विश्वास होता है कि एंटीरेट्रोवाइरल चिकित्सा (ART) के उपरांत उनका शिशु एचआईवी ऋणात्मक होगा। 

एचआईवी की जानकारी मिलते ही अवसाद में घिर जाता है व्‍यक्ति 

इस बारे में दिल्ली मेडिकल काउंसिल के सदस्य डॉ॰ अनिल बंसल कहते हैं कि एचआईवी पीडि़त होने की जानकारी होते ही व्यक्ति अवसाद से घिर जाता है। इससे उसका यौन जीवन का कम होना लाजिमी है। ऐसे व्यक्तियों को लगता है अब जीवन समाप्त होने को है, जिस कारण उसे सेक्स से भी अरुचि हो जाती है। वहीं जहां पति-पत्नी दोनों को एचआईवी है वहां दोनों सेक्स सुख बराबर ले सकते हैं। वहां कंडोम प्रयोग की आवश्यकता नहीं होती। 

वीर्य महिलाओं को उबारता है डिप्रेशन से

न्‍यूयॉर्क। सेक्‍स महिलाओं को न केवल रिचार्ज करता है, बल्कि तनाव और अवसाद अर्थात डिप्रेशन (depression) से उबरने में भी उनकी मदद करता है। एक नए शोध में पता चला है कि पुरुषों के वीर्य में मौजूद रसायन महिलाओं के शरीर में रसायनिक बदलाव ले आता है, जिससे उनका मूड खुशगवार हो जाता है।

मेल ऑनलाइन में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक सिमेन अर्थात पुरुष वीर्य महिलाओं के सेहत के लिए दवा का काम करता है और उन्‍हें डिप्रेशन से उबारने में मदद करता है। शोध में कहा गया है कि वीर्य में कई ऐसे रासायन पाए जाते हैं तो जो न केवल मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य के लिए दवा का काम करते हैं, बल्कि आपसी प्रेम को बढ़ाने में भी सहायक हैं। शोध यह भी कहता है कि असुरक्षित यौन संबंध के दौरान योनि के जरिए हो या मुख मैथुन के जरिए, वीर्य महिलाओं के अंदर पहुंच कर उनके मूड में जबरदस्‍त बदलाव लाने में सहायक है।

आखिर ऐसा क्‍या है पुरुषों के वीर्य (Semen) में 
शोधकर्ताओं के अनुसार, वीर्य में ऐसा रसायन होता है तो महिलाओं में अनुराग और प्रेम के स्‍तर को बढ़ा देता है। उनके मानसिक दशा में तत्‍काल सकारात्‍क बदलाव देखने को मिलता है। सेक्‍स के बाद महिलाएं गहरे नींद की आगोश में जाना चाहती हैं, जो उनके तनाव को कम करने में सहायक है। वीर्य में ऐसे रसायन हैं जो अवसादक यानी एंटी डिप्रेशन दवा का काम करते हैं।


शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन महिलाओं के पुरुष साथी हमेशा कंडोम लगाकर सेक्‍स करते थे, उनमें तनाव का स्‍तर ज्‍यादा था, बनिस्‍पत उन महिलाओं के जिनके पुरुष साथी हमेशा असुरक्षित संभोग ही करते थे। बिना कंडोम के संभोग पसंद करने वाली महिलाओं ने संज्ञानात्‍मक टेस्‍ट अर्थात भावनात्‍मक परीक्षा में बेहतरीन स्‍कोर किया। यानी ऐसी महिलाएं भावना या संवेदना के अधिक नजदीक पाई गईं।


शोधकर्ताओं के अनुसार, वीर्य में शुक्राणु के साथ-साथ कॉर्टिसोल भी पाया जाता है। कॉर्टिसोल लगाव बढ़ाने और तनाव घटाने वाला एक हार्मोन है। इसके अलावा इसमें पाया जाने वाला एस्‍ट्रोन मूड बनाने और ऑक्‍सीटॉक्सिन को बढ़ाने में सहायक है। यही नहीं, तनाव कम करने वाला थायरोट्रोपिन और नींद बढ़ाने वाला मेलाटोनिन हार्मोन भी वीर्य में मौजूद होता है, जो तनाव घटाने वाला हार्मोन है।


यही नहीं, इसमें सेरोटोनिन हार्मोन की भी अच्‍छी मात्रा होती है। सेरोटोनिन को अवसाद कम करने वाला न्‍यूरोट्रांसमीटर तक कहा जाता है। स्‍त्री के अंदर वीर्य का स्राव होते ही ये सारे हार्मोन काम करने लगते हैं, जो उनके मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य को बढ़ाने वाला साबित होता है।

सर्वे का तरीका

द स्‍टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्‍यूयॉर्क के वैज्ञानिकों ने विश्‍वविद्यालय परिसर में रहने वाली 293 महिलाओं पर यह शोध किया। सर्वे में शामिल महिलाओं के सेक्‍स के प्रयोगात्‍मक अनुभव और उनकी यौन जिंदगी के आधार पर प्रश्‍न पूछे गए, जिसके आधार पर यह निष्‍कर्ष निकाला गया कि मुख मैथुन और संभोग के समय जिन महिलाओं में पुरुषों का वीर्य पहुंचा उनका मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य बहुत बेहतर था। वहीं कंडोम लगाकर सेक्‍स करने वाली महिलाओं में तनाव का स्‍तर ज्‍यादा देखा गया।

निष्‍कर्ष 

* शोधकर्ता गॉलअप एंड ब्रुच एवं मनोवैज्ञानिक स्‍टीवन प्‍लेटक की प्रकल्‍पना है कि जो महिलाएं असुरक्षित संभोग करती हैं वो तनाव की कम शिकार होती हैं।

* गोलुप की प्रयोगशाला ने यह भी निष्‍कर्ष निकाला कि वीर्य ग्रहण करने वाली महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करती हैं, क्‍योंकि उनकी एकाग्रता का स्‍तर बहुत अधिक होता है। कोई भी टास्‍क उनके संज्ञान में तेजी से आती हैं, जिसे अपनी एकाग्रता के बल पर वह उनका हल कर पाती हैं।

* शोधकर्ताओं ने तीसरा नतीजा यह निकाला कि मत भिन्‍नता वाले चिर स्‍थाई साथी की अपेक्षा अजनबियों से स्‍थापित सेक्‍स संबंध में स्रावित वीर्य महिलाओं के शरीर में अधिक सकारात्‍मक प्रभाव पैदा कर सकता है।


* शोधकर्ताओं की चौथी प्रकल्‍पना यह है कि अजनबी पुरुष से सेक्‍स करने पर महिलाओं में गर्भ ठहरने की आशंका कम रहती है। अजनबियों से सेक्‍स करने के दौरान महिलाएं जानती और सोचती हैं कि उन्‍हें उससे बच्‍चे नहीं चाहिए। यही कारण है कि सेक्‍स के दौरान उनका रक्‍तचाप बहुत बढ़ जाता है। यही नहीं, उनके पेशाब में प्रोटीन की मात्रा भी बढ़ जाती है, जो शुक्राणुओं को नष्‍ट कर देता है।


* शोधकर्ताओं का कहना है कि अपने स्‍थाई पार्टनर के साथ असुरक्षित संभोग करने और बार-बार उससे गर्भधारण करने वाली महिलाओं को जब उनसे अलगाव का सामना करना पड़ता है तो वो अक्‍सर अवसाद की शिकार हो जाती हैं। लेकिन वहीं जो महिलाएं अपने साथी के साथ नियमित रूप से असुरक्षित संभोग नहीं करतीं, वो नए संबंध बनाने के लिए तुरंत तैयार हो जाती हैं और ऐसा वो अनजाने में प्रतिशोध या बदला लेने के लिए करती हैं।

* शोधकर्ताओं का कहना है कि सेक्‍स खुशी तो देता ही है, लेकिन जब एक स्‍त्री की योनि में वीर्य का स्राव तेजी से होता है तो वह आनंद से भर उठती है। कंडोम सेक्‍स में स्‍त्री को उस चरम आनंद की प्राप्ति नहीं हो पाती है। संभोग में चरम आनंद की दशा गहरे से गहरे तनाव को छूमंतर कर देती है। 

दुनिया भर में महिलाएं इस वक्त खुद को बेहद तनाव और दबाव में महसूस करती हैं। यह समस्या आर्थिक तौर पर उभरते हुए देशों में ज्यादा दिख रही है। एक सर्वे में भारतीय महिलाओं ने खुद को सबसे ज्यादा तनाव में बताया। 21 विकसित और उभरते हुए देशों में कराए गए नीलसन सर्वे में सामने आया कि तेजी से उभरते हुए देशों में महिलाएं बेहद दबाव में हैं, लेकिन उन्हें आर्थिक स्थिरता और अपनी बेटियों के लिए शिक्षा के बेहतर अवसर मिलने की उम्मीद भी दूसरों के मुकाबले कहीं ज्यादा है। सर्वे में 87 प्रतिशत भारतीय महिलाओं ने कहा कि ज्यादातर समय वे तनाव में रहती हैं और 82 फीसदी का कहना है कि उनके पास आराम करने के लिए वक्त नहीं होता।

तनाव के बावजूद शॉपिंग का शौक

तनाव में रहने के बावजूद इस बात की काफी संभावना है कि भारतीय महिलाएं आने वाले पांच साल के दौरान अपने ऊपर ज्यादा खर्च करेंगी। 96 प्रतिशत का कहना है कि वे कपड़े खरीदेंगी जबकि 77 फीसदी कहती हैं कि वे सेहत और सुंदरता से जुड़े उत्पादों पर जेब ढीली करेंगी। वहीं 44 फीसदी महिलाएं घर में बिजली से चलने वाली चीजें लाना चाहती हैं।

सामाजिक बदलाव है वजह: 

नीलसन की उपाध्यक्ष सुजैन व्हाइटिंग ने एक बयान में कहा, 'दुनिया भर में महिलाएं उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं और बड़ी संख्या में नौकरियां कर रही हैं। उनके काम करने से घर की आमदनी भी बढ़ रही है। महिलाओं ने नीलसन को बताया जब उन्हें अपने लक्ष्य मिलते हैं तो वह खुद को सशक्त महसूस करती हैं, लेकिन इससे उनका तनाव भी बढ़ता है।'


तनाव और समय न होने के मामले में मेक्सिको की महिलाएं दूसरे नंबर पर हैं। वहां 74 प्रतिशत महिलाएं इस समस्या से दो चार हैं। इसके बाद रूस में 69 प्रतिशत महिलाएं तनाव झेल रही हैं। सर्वे के मुताबिक इस तनाव के लिए एक हद तक सामाजिक बदलाव भी जिम्मेदार हैं। वहीं विकसित देशों में स्पेन में सबसे ज्यादा 66 प्रतिशत महिलाएं तनाव की शिकार हैं। इसके बाद फ्रांस में 65 प्रतिशत और अमेरिका में 53 प्रतिशत महिलाएं इस समस्या से जूझ रही हैं। 

उम्मीद:

सर्वे में उभरते हुए देशों की 80 प्रतिशत महिलाओं को उम्मीद है कि उनकी बेटी को उनसे कहीं ज्यादा वित्तीय स्थिरता मिलेगी जबकि 83 फीसदी का कहना है कि उन्हें शिक्षा हासिल करने के ज्यादा मौके मिलेंगे। विकसित देशों में 40 प्रतिशत महिलाओं को लगता है कि उनकी बेटियों की वित्तीय स्थिति उनसे अच्छी होगी जबकि 54 प्रतिशत का अनुमान है कि उनकी बेटियां बेहतर शिक्षा पाएंगी।

इस सर्वे में तुर्की, रूस, दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, चीन, थाइलैंड, भारत, मलेशिया, मेक्सिको, ब्राजील, अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, स्वीडन, जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया की 6,500 महिलाओं ने हिस्सा लिया। 


अमेरिका में हुए एक शोध के जरिये वैज्ञानिकों यह निष्कर्ष निकाला है कि नास्तिक लोग धार्मिक लोगों की तुलना में खुलकर सेक्स का मजा लेते हैं, जबकि धार्मिक प्रवृत्ति के लोग सेक्स के दौरान प्रयोग करने से हिचकिचाते हैं। शोध में पाया गया कि यदि धार्मिक लोग हिचकिचाहट के साथ सेक्स के दौरान नए प्रयोग कर भी लें तो भी बाद में वे ऐसा करने पर अफसोस करते हैं। 


जबकि नास्तिक लोग सेक्स पर खुलकर बाते करते हैं और अपने अनुभव एक दूसरे के साथ बांटते हैं। वे सेक्स की कल्पना करते हैं और फिर उसे साकार करने लगते हैं। इसमें उनके पार्टनर भी बराबर और सक्रिय भू‍मिका निभाते हैं। 

शोध के दौरान दोनों ही तरह के लोगों ने माना कि वे सेक्स में हस्तमैथुन, मुख मैथुन, 69 पोजिशन सेक्स जैसी क्रियाएं करते हैं, लेकिन धार्मिक प्रवृति के लोग ऐसे सेक्स को इंजॉय नहीं कर पाते, क्योंकि उन्हें लगता है कि ये धर्म या नीति के अनुसार नहीं है। हालांकि बाद वे फिर ये सभी क्रियाएं दोहराते हैं, लेकिन ऐसे सेक्स को लेकर उनका पछतावा बना रहता है। 

कैनसास यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक डरैल रे और अमांडा ब्राउन ने आस्तिक और नास्तिक प्रवृति के चौदह हजार पांच सौ लोगों पर यह प्रयोग किया। ग्रुप में सभी लोग एक समान उम्र के थे और सेक्स के प्रति एक समान रूप से सजग भी। 

यहां तक कि ये लोग हफ्ते में समान रूप से सेक्स करते रहे, लेकिन आस्तिक और नास्तिक लोगों में फर्क वहां आ गया, जब आस्तिकों ने कहा कि वे सेक्स को पूरी तरह इंजॉय करने में झिझकते हैं। सेक्स में अलग अलग क्रियाएं करने के बाद इन लोगों को अपराधबोध होता है और यही कारण है कि वे सेक्स का इतना आनंद नहीं ले पाते, जितना कि नास्तिक लोग लेते हैं। (एजेंसियां) 


विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार ऑब्‍सेसिव कंपल्सिव डिस्‍आर्डर (ocd) विकलांगता की दस बड़ी वजहों में से एक है। यह मानसिक विकलांगता की श्रेणी में आता है। ओसीडी एक ऐसी बीमारी है, जो व्‍यक्ति को एक ही क्रिया को बार-बार दोहराने को विवश करता है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं इसकी अधिक शिकार होती हैं, जिसके परिणामस्‍वरूप उनका अत्‍यधिक धार्मिक हो जाना, अधिक साफ-सफाई, यौन संबंध को गंदा कार्य मानकर अनिच्‍छा-जैसी समस्‍याएं सामने आती हैं। इसका प्रभाव पीडि़त के निजी, पारिवारिक व सामाजिक जीवन पर जबरदस्‍त तरीके से पड़ता है और वह खुद को सबसे काटकर रखने की कोशिश करता है। 

कुछ उदाहरण

दृश्‍य 1- एक शाम, कार्यालय से छूटने के बाद लोग बस स्टैंड पर रुकने वाली हर रूट के बस के रुकते ही उसमें चढ़ने के लिए भाग रहे थे। दिल्ली परिवहन निगम की रूट संख्‍या 740 की बस में पैर रखने तक की जगह नहीं थी। लोग एक दूसरे को धक्‍का दे रहे थे। बस के अंदर एक युवक युवती से सट कर खड़ा था और भीड़ का फायदा उठाकर बार-बार उसके शरीर को स्‍पर्श कर रहा था। 
दृश्य-2-50 वर्ष की शोभा परेशान हैं। उनका नाती बिछावन से जब भी जमीन पर उतरता है, उसका पैर चप्पल पर पड़ने की जगह जमीन से लग जाता है, जिसकी वजह से वह अधीर हो उठती हैं। वह हर बार अपने नाती को पैर धोने के लिए कहती हैं। ऐसा नहीं है कि वह सिर्फ दूसरे को ही सफाई करने के लिए कहती है, बल्कि खुद एक से डेढ़ घंटे तक नहाती रहती हैं। नल लगातार खुला रहता है, जिससे कई बार घर में पानी का संकट तक उत्‍पन्‍न हो जाता है। घर वाले उन्‍हें खरीखोटी भी सुनाते हैं, लेकिन अगले दिन वह फिर से लंबे स्‍नान में लग जाती हैं। दिन में अनगिनत बार वह अपना हाथ भी धोती रहती हैं। 


दृश्‍य-3-दृश्‍य तीन कई दृश्यों से मिलकर बना है। आनंद जब भी दफ्तर आता है तो वह अपनी टेबल को 15 मिनट तक साफ करता रहता है। दफ्तर छोड़ने से पहले करीब आधे घंटे तक अपने कागजात को व्‍यवस्थित करता रहता है। सुमन जहां भी मंदिर देखती है बार-बार भगवान को प्रणाम करने लगती है। अनिल पार्किंग में गाड़ी खड़ी करने के बाद दोबारा से उसे देखने जाते हैं कि कहीं लॉक तो खुला नहीं रह गया। घर से बाहर निकलने पर वह इसी तरह घर का ताला चेक करने के लिए लौट पड़ते हैं। अनूप सालों पुराने अखबार को सिर्फ इस डर से नहीं फेंकता है कि भविष्‍य में इसकी जरूरत पड़ सकती है। विकास जब भी मोटरसाइकिल पर चलता है तो बार-बार अपनी जेब टटोलता रहता है कि कहीं उसका मोबाइल या पर्स गिर तो नहीं गया।


ये कुछ ऐसे असामान्य व्‍यवहार हैं जिनके शिकार लोग चाह कर भी इन्‍हें छोड़ नहीं पाते। मनोचिकित्‍सक ऐसे असामान्‍य व्‍यवहार को मानसिक विकार की श्रेणी में रखते हैं। उनके अनुसार, यह ऑब्‍सेसिव कंपल्सिव डिस्‍आर्डर (ocd) है। ओसीडी का शिकार व्‍यक्ति ऐसे किसी विचार से लगातार परेशान होता चला जाता है और लगातार उस एक ही तरह का व्‍यवहार करता है।


क्‍या है ओसीडी

एम्‍स के के मनोचिकित्‍सा विभाग के सह आचार्य आचार्य डॉ॰ राजेश सागर के अनुसार ओसीडी मस्तिष्‍क का एक विकार है। मनुष्य के अचेतन मन में दबे विचार गाहे-बगाहे बाहर आते रहते हैं। जहां सामान्य व्यक्ति इसकी उपेक्षा कर दूसरे कामों में लग जाता है, वहीं ओसीडी से ग्रस्त व्यक्ति के लिए यह उसके जीवनशैली का हिस्सा बन जाता है। यह बीमारी एक तरह से सनक का रूप ले लेती है और फिर रोगी बार-बार एक ही क्रिया को दोहराने लगता है। ओसीडी का शिकार व्यक्ति यह जानता है कि उसकी हरकत एक मानसिक विकार है, लेकिन चाह कर भी वह इस पर नियंत्रण नहीं कर पाता है।


ऑब्सेशन(आवेश) और कंपल्‍शन(विवशता)


डॉ.राजेश सागर के अनुसार ओसीडी में आमतौर पर ऑब्सेशन(आवेश) और कंपल्‍शन (विवशता) दोनों ही होते हैं। ऑब्सेशन ऐसी मन:स्थिति हैं जो बार-बार पैदा होती है और इन पर मरीज का नियंत्रण नहीं रह पाता है। मरीज इन ऑब्सेशन को दूर करने के लिए विवश हो कर कंपल्‍शन करता है। अर्थात वह अपने बनाए नियमों का पालन करते हुए क्रियाओं को दुहराता चला जाता है। ओसीडी का लक्षण मरीज को हताश कर देता है, जिस नकारात्‍मक प्रभाव उसके पारिवारिक व सामाजिक जीवन पर पड़ता है। 
कैसे उत्पन्न होता है ओसीडी

राममनोहर लोहिया अस्पताल के मनोरोग विभाग की अध्‍यक्ष डॉ. स्मिता एन.देशपांडे के अनुसार, ओसीडी के कारण मस्तिष्‍क के दो हिस्‍सों के बीच संवाद में समस्या उत्पन्न हो जाती है। संक्रमण का डर, अपने को या दूसरों को नुकसान पहुंचाने की कल्‍पना, आक्रामकता, इच्छाओं पर नियंत्रण न होना, यौन संबंध के बारे में जरूरत से अधिक चिंतन, अत्यधिक धार्मिक निष्ठा, बीमारी का डर आदि ओसीडी का कारण बन जाती है। इसमें व्यक्ति की सोच पर उसका नियंत्रण समाप्त हो जाता है। कई बार विचारों का प्रवाह इतना अधिक बढ़ जाता है कि उसका शरीर शिक्षिल पड़ने लगता है। डॉ॰ देशपांडे के अनुसार शोध में ओसीडी के आनुवांशिक होने की कहीं-कहीं जानकारी मिली है, लेकिन इसकी संख्‍या बहुत कम है।

ओसीडी का निदान

डॉ. राजेश सागर बताते हैं कि ओसीडी एक ऐसा मानसिक विकार है, जो अज्ञानता के अभाव में वर्षों तक मरीज के अंदर दबा रहता है। यह बीमारी जितनी पुरानी होती है, उसके निदान में उतना ही लंबा समय लगता है। व्‍प्‍यक्ति इस बीमारी से किसी भी उम्र में पीडि़त हो सकता है। इसकसे निदोन के लिए जरूरी है कि मरीज को उसके परिवार वालों का पूरा सहयोग मिले और वह इसे सामान्य बीमारी की तरह लेते हुए मनोचिकित्‍सक से संपर्क करें। ओसीडी से मुक्त होने की इच्छा का मन में पनपना इलाज के लिहाज से फायदेमंद रहता है। निदान के लिए मरीज को शिक्षित करने से लेकर विहेवियर थेरेपी तक की प्रक्रिया अपनाई जाती है।

मानसिक विकलांगता

विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में 1.2 करोड़ भारतीय किसी न किसी रूप से इस बीमारी से पीडि़त हैं, जिसमें एक फीसदी बच्चे भी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर इलाज कराया गया तो इस बीमारी के शिकार लोगों की यह समस्‍या 60 से 70 फीसदी तक कम हो जाती है। 


ऑब्‍सेशन कंपल्‍शन 

* धूल-मिट्टी से प्रदूषण का डर धोना, साफ-सफाई


* नुकसान पहुंचाने की कल्‍पना दोहराना


* इच्छाओं पर नियंत्रण न होना बार-बार जांच करना 


* अनुचित यौन इच्छा स्पर्श करना


* धार्मिक निष्ठा प्रार्थना करना, बुदबुदाना 


* संदेह गिनना, ताला चेक करने जाना
। उम्र के हर पड़ाव में शरीर में होते हार्मोनल परिवर्तन, हर माह पीरियड की अनिवार्यता, घर और दफ़्तर के काम का दोहरा दबाव, सभी रिश्‍तों को निभाने की पूरी जिम्‍मेदारी और बढ़ते एकल परिवार की वजह से नारी मन और उदासी एक-दूसरे के पूरक होते हैं। इसका सीधा असर न केवल उनकी जिंदगी पर, बल्कि उनके परिवारिक रिश्तों, दांपत्य जीवन और गर्भ में पल रहे बच्चों तक पर पड़ता है। समय से पूर्व प्रसव और बांझपन तक की समस्याओं से जूझती महिलाओं पर हुए अस्पताल आधारित शोध बताते हैं कि हताश, निराशा और अवसाद के लिए उनका मन एक उर्वरक भूमि की तरह है। 

महिलाओं में होता है युनि पोलर डिप्रेशन (depression in women)
वर्ल्‍ड ब्रेन सेंटर के निदेशक डॉ॰ निलेश तिवारी के अनुसार महिलाएं युनि पोलर डिप्रेशन की ज्यादा शिकार होती हैं। शोध में सामने आया है कि 22 से 30 प्रतिशत तक महिलाएं युनि पोलर डिप्रेशन की शिकार होती हैं। बढ़ता कामकाज का दबाव, अति महत्वकांक्षा, टूटते रिश्ते और बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा ने महिलाओं को अवसाद में ढकेल दिया है। युनि पोलर डिप्रेशन में महिलाएं उदासी में चली जाती है, जबकि बाईपोलर डिप्रेशन में हर चीज बढ़ जाती है। युनि पोलर दुख का अतिरेक है और बाईपोलर खुशी का अतिरेक। नारी के शरीर में हार्मोनल बदलाव और मस्तिष्क में न्यूरो केमिकल बदलाव की वजह से उदासी उनकी संगिनी बन जाती है। युनि पोलर डिप्रेशन के बढ़ने से महिलाएं ऑब्सेसिव कंप्लसिव डिसऑर्डर, साइकोसिस, स्कीजोफ्रेनिया आदि का शिकार हो जाती हैं। ये अलग-अलग मानसिक बीमारियां हैं, लेकिन इसमें कहीं न कहीं उदासी व हताशा मुख्य वजह होती है। 

प्रसव लेकर आती है मानसिक परेशानियां 

राममनोहर लोहिया अस्पताल के मनोरोग विभाग के डॉ॰ नगेंद्र नारायण मिश्र के अनुसार, गर्भकाल और प्रसवोपरांत बड़ी संख्या में महिलाएं डिप्रेशन का शिकार हो जाती हैं। प्रसवोपरांत के अवसाद को पोस्‍ट पार्टम डिप्रेशन कहते हैं। टूटते परिवार, पति-पत्नी में कलह, साह-बहु के बिगड़ते रिश्ते आदि इसकी वजह हो सकते हैं। महिलाएं इसमें खुद को सभी से अलग-थलग कर लेती हैं और उदास रहने लगती हैं। वैसे तो उदासी का यह स्तर अस्थाई ही होता है, लेकिन जब यह बढ़ने लगे तो मानसिक समस्या का रूप ले लेता है। 

उदासी व हताशा के स्थाई होने पर महिलाएं विक्षिप्त (न्यूरोसिस) और मनोविक्षिप्त (साइकोसिस) तक का शिकार हो जाती है। इसमें चीखना-चिल्लाना, चिड़चिड़ाना होना, असुरक्षित महसूस करना, दुश्चिंता, अनिद्रा जैसी समस्याएं पैदा होने लगती हैं। गर्भकाल में भी यह समस्याएं पैदा हो सकती हैं। गर्भकाल के शुरुआती तीन और आखिरी के तीन महीनों में महिलाओं को विशेष प्यार, लगाव, इलाज और समर्थन की जरूरत होती है। 

कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली के सुचेता कृपलानी अस्पताल में एक क्लिनिकल शोध हुआ था। इसमें यह सामने आया था कि गर्भकाल में 1 से 10 प्रतिशत तक और बच्चे के जन्म के उपरांत 50 से 70 फीसदी तक महिलाएं हताशा की शिकार होती हैं। थोड़े समय की हताशा बीमारी नहीं है, लेकिन जब यह हताशा लंबी उदासी में बदल जाती है तो यह अवसाद का रूप ले लेती है। 

गर्भपात: अपराध भाव की गहरी पैठ 

दिल्ली के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ॰ मनजीत सिंह भाटिया ने `मनोरोग गलत धारणाएं और सही पहलू' नामक अपनी किताब में लिखा है कि गर्भपात कराने वाली कई महिलाओं के मन में अपराध बोध बैठ जाता है, भावनात्मक अस्थिरता पैदा हो जाती है, सेक्स के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव आ जाता है, हताशा घेर लेती है और आत्महत्या तक के विचार मन में आने लगते हैं। उनके अनुसार, आज महिलाएं गर्भपात को एक बच्चे की हत्या जैसा पाप नहीं समझतीं है, लेकिन इसके बावजूद 30 से 40 प्रतिशत बाद में अपराध भावना पालकर पश्चाताप ग्रस्त हो जाती हैं। इसके परिणाम स्वरूप मानसिक रूप से अस्थिर और चिड़चिड़ी हो जाती हैं। 

मासिक धर्म: तन और मन की उलझन हर माह (menstrual period cycle affect) 

डॉ॰ मनजीत सिंह भाटिया के अनुसार, महिलाओं की मानसिक परेशानियां बहुत हद तक हर महीने होने वाली माहवारी या पीरियड से जुड़ी होती है‍। मासिक धर्म से जुड़ी मानसिक समस्याएं मुख्यत: तीन रूपों में प्रकट होती हैं। पहला, किशोरावस्था में मासिक धर्म के शुरू होने पर, दूसरा अधेड़ावस्था में मासिक धर्म के बंद होने अर्थात रजोनिवृत्त होने पर और तीसरा हर महीने पीरियड शुरू होने से पहले होने वाले शारीरिक-मानसिक परिवर्तन के रूप में। 

ये समस्याएं प्राय: मन व शरीर दोनों से ही संबंधित होती हैं। अध्ययन के अनुसार, पीरियड शुरू होने पर 40 फीसदी व रजोनिवृत्ति के समय 60 फीसदी महिलाएं शारीरिक-मानसिक समस्याओं से ग्रस्त होती हैं। इस कारण स्त्रियों को ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत आती है, अतिशय भावुकता घेर लेती है, कई तरह के शारीरिक दर्द का सामना करना पड़ता है, सेक्स के प्रति अनिच्छा का भाव पनप जाता है और कई तरह की शारीरिक परेशानियों का उन्हें सामना करना पड़ता है। 

मन की उदासी से पीछा छुड़ाने का तरीका
* अपनी सोच व व्‍यवहार को सकारात्‍मक और नियंत्रित रखें
* अच्छे व स्‍वस्‍थ्‍य संबंध को विकसित करें 

* पारिवारिक संबंध को मज़बूत बनाएं 

* संयुक्त परिवार को प्रोत्साहित करें 

* पति-पत्नी मिलकर समस्या का समाधान तलाशें 


* सप्‍ताहांत में पति व बच्‍चों के साथ घूमने या शॉपिंग के लिए जाएं 

* दांपत्य में सेक्स संबंध को उचित स्थान दें, उसके प्रति अनिच्छा न पालें 

* ध्यान, योग व कसरत को जीवनचर्या बनाएं 

* शराब व सिगरेट से दूर रहें

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