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आवश्यक जानकारी

सौ साल तक लम्बी और स्वस्थ आयु पाने के लिए विशेष सप्त धातु पोषक चूर्ण
आवश्यक जानकारी बिना पढ़े मत छोड़ना नीचे दिया हुआ पूरा लेख पढ़िये

आयुर्वेद के अनुसार शरीर में सप्त धातु होतें हैं, पूरा शरीर इनके द्वारा ही ऑपरेट होता है, आज हम आपको जो सप्त धातु पोषक चूर्ण के बारे में बताने जा रहें हैं ये उत्तम रसायन है, यह नस नाड़ियों एवम वात वाहिनियों को शक्ति प्रदान करता है. सात्विक भोजन औ सदाचरण के साथ इसके निरंतर सेवन से रोग प्रतिरोधक शक्ति बनी रहती है, और वृद्ध अवस्था के रोग नहीं सताते. इसको बनाने के लिए ज़रूरी सामग्री है अश्वगंधा (असगंध) 100 ग्राम, आंवला चूर्ण 100 ग्राम, हरड 100 ग्राम, इन तीनो चीजों के चूर्ण को आपस में मिला लीजिये, अभी इसमें 400 ग्राम पीसी हुयी मिश्री मिला लीजिये. और इसको किसी कांच की भरनी में भर कर रख लीजिये. प्रतिदिन एक चम्मच गर्म पानी के साथ या गर्म दूध के साथ ये चूर्ण पूरे साल फांक सकते हैं. जो व्यक्ति पूरी उम्र इसको खायेगा उसकी तो आयु कितनी होगी इसका अंदाजा भी लगा पाना मुश्किल है. अगर कोई व्यक्ति इसको 3 महीने से 1 साल तक खायेगा तो उसका शरीर भी कई सालों तक निरोगी रहेगा. इस योग को बनाने के लिए बस एक बात का ध्यान रखें के सभी वस्तुएं साफ़ सुथरी ले कर ही चूर्ण बनवाएं, कीड़े वाली अश्वगंधा ना लें. इसलिए ये सामग्री किसी विश्वसनीय दुकानदार से ही लें.
सप्त धातुओं का वर्णन – sharir ki saat dhatu

रस
रक्त
मांस
मेद
अस्थि
मज्जा
शुक्र


श्वांस और दमा के रोगियों के लिए विशेष रामबाण_ 
इसको शेयर नही किया तो फिर क्या किया..
जिन लोगों को सर्दियों में श्वांस की प्रॉब्लम हो जाती है. उनके लिए के साधारण सा नुस्खा. ऐसे लोगों को हर रोज़ शंख बजाना चाहिए कम से कम 5 मिनट पूरे जोर लगा कर.

अगर बच्चे छोटे हो तो उनको मेले में मिलने वाले छोटे छोटे भोंपू इस्तेमाल करने चाहिए.
ये प्रयोग हमारे एक मित्र का आजमाया हुआ है. उनकी छोटी बेटी को श्वांस की समस्या थी उसने 2-3 दिन से भोंपू बजाना शुरू किया. और जिस दिन से उसने भोंपू बजाना शुरू किया उस दिन से उसको रात को कोई खांसी नहीं आई और आराम से सोयी, इसके पहले वो रात को बहुत बुरी खांसती थी और श्वांस भी फूल जाती थी. और मज़बूरी में उसको भाप भी देनी पड़ती थी.

आखिर ऐसा क्यों होता है. ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि भोंपू या शंख जोर से बजाने से फेफड़ों की कसरत होती है. और ये स्वस्थ रहते हैं. और ये दोनों रोग ही फेफड़ों और श्वांस नाली के है जिस कारण ये करने से उसको आराम आया.

आप लोग भी ये प्रयोग आजमा कर देखें और अपने नतीजे हमसे ज़रूर शेयर करें. और बच्चों के लिए भोंपू लेते समय ध्यान दीजिये के वो कोई बिलकुल सिंपल सा ना हो, उसमे थोडा जोर देने से आवाज़ आनी चाहिए.

सावधानी.
इसको एक ही श्वांस में नहीं करना है. आराम से धीरे धीरे बीच बीच में श्वांस ले कर बजाएं, तांकि श्वांस फूले नहीं. और अगर श्वांस फूलने लगे तो इसको बंद कर दीजिये, और जब श्वांस नार्मल हो तब कर लेवें. इसको सुबह शाम कभी भी कर सकते हैं.

कपड़ों से दाग मिनटों मे दूर _
दाग धब्बे छुड़ाने की विधियाँ
हमारे दैनिक जीवन में वस्त्र बहुत आवश्यक हैं और उनसे भी आवश्यक है उनकी देखभाल। वस्त्रों को कितनी ही सावधानी से रखा जाये लेकिन उन पर दाग-धब्बे लग ही जाते हैं जो वस्त्रों की सुन्दरता को खराब कर देते हैं। कपड़ों पर दाग किसी वाह्य वस्तु के संपर्क में आने से लगते हैं। कुछ धब्बे तो पानी व साबुन के प्रयोग से धोकर ही छूट जाते हैं लेकिन कुछ धब्बों को रसायनों के प्रयोग से छुड़ाया जाता है। धब्बों को छुड़ाने की विधि धब्बे की प्रकृति व वस्त्र में मिश्रित तत्व एवं रंग पर निर्भर करती है। धब्बे की प्रकृति धब्बे को देखकर, छूकर, सूँघकर व उसके रंग के अनुसार पता की जा सकती है। कपड़ों पर पड़ने वाले धब्बों की प्रकृति के आधार पर उनको निम्न भागों में बाँटा गया है:- 1) जीव-जन्तुओं से उत्पन्न धब्बे 2) वनस्पतियों द्वारा लगे धब्बे 3) ग्रीस के धब्बे 4) रंग के धब्बे 5) खनिज पदार्थों के धब्बे
1) जीव-जन्तुओं से उत्पन्न धब्बे :इस प्रकार के धब्बे दूध, अंडे, खून व माँस के लग जाने से लगते हैं। इन सब चीजों में प्रोटीन की मात्रा पायी जाती है इसलिए इन धब्बों को हटाते समय अधिक गर्म पानी का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
2) वनस्पतियों द्वारा लगे धब्बे :ये धब्बे चाय, कॉफी, फल व सब्जी द्वारा लगते हैं। इन धब्बों को हटाने के लिए क्षारीय पदार्थ की आवश्यकता होती है।
3) ग्रीस के धब्बे :ग्रीस के धब्बे के अन्तर्गत मक्खन, तेल, पेन्ट व कोलतार के धब्बे आते हैं। इन धब्बों को छुड़ाते समय ऐसे रसायनों का प्रयोग करना चाहिए जिसमें ग्रीस आसानी से घुल जाये या ऐसे पाउडर इस्तेमाल करें जैसे चॉक, टेलकम पाउडर, चोकर इत्यादि जो धब्बे को सोख लें।
4) रंग के धब्बे :रंग अम्लीय व क्षारीय दोनों प्रकृति के होते हैं। इसलिए इनको छुड़ाने के लिए इनकी प्रकृति के अनुसार ही रसायन का प्रयोग करना चाहिए।
5) खनिज पदार्थों के धब्बे :खनिज पदार्थों से लगे धब्बे में लोहे, स्याही व दवाइयों के धब्बे आते हैं। इन धब्बों में सबसे पहले अम्ल का प्रयोग करें व बाद में अम्ल को उदासीन करने के लिए क्षार का प्रयोग करें।
धब्बे छुड़ाते समय दो आवश्यक बातें ध्यान रखनी चाहिएः 1) कपड़े का रंग व संगटन। 2) धब्बे की प्रकृति व उम्र।
सामान्य निर्देश :1) हो सके तो धब्बों को ताजी अवस्था में ही शीघ्र छुड़ा लें। 2) कपड़े से दाग या धब्बे छुड़ाते समय कपड़े व धब्बे की प्रकृति के अनुसार ही रसायनों का प्रयोग करें। 3) अगर धब्बे की प्रकृति ज्ञात न हो तो सर्व प्रथम कम हानिकारक प्रक्रिया का प्रयोग करें अगर फिर भी दाग न छूटें तो तेज रसायनों का क्रमबद्ध तरीके से प्रयोग करें -- सबसे पहले वस्त्र को ठंडे पानी में भिगोयें। - उसके बाद गरम पानी में भिगोयें। - उसे खुली हवा में डाल दें। - किसी क्षारीय घोल का प्रयोग करें। - अम्लीय घोल का प्रयोग करें। - अगर दाग फिर भी न छूटे तो ब्लीच का प्रयोग करें। 4) रसायनों को सफेद या सूती लिनन के वस्त्र के ऊपर फैला दें व फिर उसके ऊपर गरम पानी डालें। 5) रंगीन लिनन, ऊन, रेशम व रेयॉन पर केवल घोलों का ही प्रयोग करें। 6) कपड़ों पर रसायन केवल उतनी देर तक ही रखना चाहिए जब तक धब्बा पूर्णतया छूट न जाये, इससे अधिक प्रयोग करने पर कपड़े का रंग खराब होने व फटने का भय रहता है। 7) दाग छुड़ाने के लिए स्पॉजिंग विधि का प्रयोग करें, इस विधि में धब्बे को बाहर से अन्दर की तरफ मलें ताकि वह और न फैले। 8) धब्बे को खुली हवा या खिड़की के पास ही छुड़ायें जिससे कि उत्पन्न होने वाले रसायन कमरे में न फैलें व बाहर निकल सकें। 9) ज्वलनशील रासायनिक पदार्थो जैसे एल्कोहॉल, पेट्रोल, स्प्रिट व बैन्जीन आदि का प्रयोग करते समय आग से बचने के लिए सावधानी रखें। विभिन्न धब्बे छुड़ाने की विधियाँ
क्र०सं०
दाग धब्बे
स्थिति
सफेद सूती एवं लिनन का कपड़ा
1.
स्याही
ताजा
1. दाग पर कटा टमाटर व नमक तब तक रगड़े जब तक दाग हट न जाए। 2. मट्ठे या दही में कपड़े को आधे घण्टे तक भिगोकर पानी एवं साबुन से धो दें। 3. नमक एवं नीबू का रस दाग पर लगाकर आधे घण्टे छोड़ दें। फिर साबुन एवं पानी से धोएँ।
सूखा
1. उपर्युक्त पहली एवं दूसरी प्रक्रिया को अधिक समय तक प्रयोग करें। 2. तनु ऑक्जेलिक एसिड में भिगोकर तनु बोरेक्स के घोल में धोकर निकाल लें।
2.
स्याही (बॉल प्वाइंट पेन)

दाग के नीचे ब्लॉटिग पेपर लगाकर मिथाइलेटेड स्प्रिट डालें।
3.
जंग
ऑक्जेलिक एसिड के घोल में भिगोकर तनु बॉरेक्स के घोल में धोएँ।
4.
लिपस्टिक

मिथाइलेटेड स्प्रिट में भिगोकर साबुन से धोएँ।
ग्लिसरीन में आधा घण्टा भिगोने के बाद धब्बे को साबुन व पानी से धोएँ।
5.
मिट्टी

सूखने दें एवं ब्रश से रगड़कर हटाएँ। साबुन व पानी से धोएँ। यदि दाग फिर भी रह जाए तो पोटैशियम परमैग्नेट तथा ऑक्जेलिक एसिड के घोल में धोएँ।
6.
नेलपेन्ट

रूई की सहायता से एमाइल एसिटेट को दाग लगे भाग पर लगाए। इस विधि का प्रयोग एसीटेट रेयॉन के कपड़े पर नहीं करना चाहिए।
7.
ऑयल पेन्ट तथा वॉर्निश

कैरोसीन में भिगोकर साबुन से धोएँ।
एल्कोहल में भिगोकर साबुन से धोएँ।
8.
बूट पॉलिश
1. यदि दाग सूखा हो तो खुरच कर निकाल दें। थोड़ी ग्रीस लगाकर गर्म पानी एवं साबुन से धो लें। 2. तारपीन के तेल में भिगोकर साबुन से धो लें।
9.
पसीने के दाग

ठंड़े पानी में भिगोएँ।
तनु अमोनिया के घोल में भिगोएँ।
दाग को गीला करके धूप से इसका विरंजन करें। जब तक दाग न छूटे उसे गीला ही रखना चाहिए।
जैवेल वॉटर से विरंजन करें।
10.
पेय पदार्थ (चाय, कॉफी)
ताजा
गर्म पानी को दाग पर डालें।
सूखा
बोरेक्स पाऊडर और गर्म पानी को दाग पर डालें।
ग्लिसरीन मे तब तक भिगोएँ जब तक कि दाग छूट न जाए। यदि फिर भी दाग न जाए तो जैवेल वॉटर से विरंजन करें।
11.
खून (प्रोटीन)
ताजा
ठंडे पानी में भिगोकर तनु अमोनिया में धोएँ।
सूखा
नमक व ठंडे पानी में तब तक भिगोएँ जब तक कि दाग हट न जाए।
12.
कत्था एवं पान का दाग
ताजा
पहले तनु पोटैशियम परमैग्नेट का घोल डालें बाद में सोडियम बाइसल्फेट डालें तथा धोएँ।
सूखा
सौलवेन्ट साबुन से धोएँ।
13.
करी (ग्रीस एवं हल्दी)

पानी एवं साबुन के साथ धोएँ।
धूप एवं हवा में विरंजन करें।
जैवेल वॉटर से विरंजन करें।
14.
मोम
ठोस
जितना संभव हो उतना बिना धार वाले चाकू से खुरच कर निकालें।
दाग पर ब्लॉटिग पेपर रखकर गर्म इस्त्री से दबाए। बेन्जीन से धोएँ।
15.
फल
ताजा
स्टार्च के घोल को दाग पर लगाकर 1 घण्टे के लिए छोड़ दें। स्टार्च को रगड़ कर हटा दें एवं दाग पर गर्म पानी डालें।
सूखा
नमक अथवा बॉरेक्स पाउडर दाग पर फैलाकर उस पर गर्म पानी डालें। प्रक्रिया को दाग के हटने तक दोहराएँ।
जैवेल वॉटर से विरंजन करें।
16.
घास

मिथाइलेटेड स्प्रिट में भिगोएँ।
साबुन व पानी से धोएँ।
17.
ग्रीस तेल एवं घी
ताजा
साबुन व गर्म पानी से धोएँ।
सूखा
चिकनाई हटाने वाले घुलनशील घोलों का प्रयोग करके साबुन व गर्म पानी से धोएँ।
18.
हल्दी

करी के दाग हटाने की विधियों का प्रयोग करें।
19.
मेंहदी

गर्म दूध में आधे घंटे तक भिगोकर रखें तथा साबुन से धोएँ।





आधुनिक विज्ञान सिद्ध कर चुका है कि तांबे के बर्तन में पानी क्यों पियें_
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आजकल हम किसी भी घर की रसोई में देखें तो पायंगे ज्यादातर बर्तन स्टेनलेस स्टील के होंगे, कुछेक एल्युमीनियम और कांच, चीनी मिटटी के होंगे. याद करने पर आप पायेंगे कि पहले गांवों और शहरों में भी बहुत तरह के धातु से बने बर्तनों का उपयोग किया जाता था जैसे लोहा, कांसा, पीतल, तांबा, लकड़ी, चाँदी आदि
आदिकाल से ताम्बे के बर्तन का प्रयोग Copper ware use since ancient times
यह बात अवश्य है कि भूतकाल में हमारे भारत में कई कुरीतियाँ या बुराइयाँ फैली थी पर उस जमाने में विद्वानों, विचारकों के साथ ही साथ कई वैज्ञानिक और अनुसंधानकर्ता भी थे जोकि अपने प्रयोगों से प्रकृति के रहस्यों को उजागर करने का प्रयास करते रहते थे.

बर्तनों को उनके कार्य और उपयोग के हिसाब से अलग अलग धातुओं से बनाया जाता था क्योकि इनसे में कुछ धातुओं के बर्तन उनमे रखे जाने वाले भोज्य पदार्थ से रासायनिक प्रतिक्रिया करने लगते थे. अतः इस बात का ध्यान रखा जाता था कि इन बर्तनों को सही उपयोग में ही लाया जाये.

तांबा एक ऐसी धातु थी जिसका प्रयोग ज्यादातर पानी पीने के बर्तन बनाने में किया जाता था. अगर तांबे के बर्तन में रखा पानी कुछ अशुद्ध है तो यह कुछ घंटो में पानी के साथ प्रतिक्रिया करके शुद्ध हो जाता है. साथ ही तांबा के बर्तन में रखा जाने वाला पानी रासायनिक प्रतिक्रिया करके जीवाणुनाशक बन जाता है. यह पानी स्वास्थ्य के अत्यंत लाभकारी होता है. यह पानी रक्त को शुद्ध करता है, पाचन तंत्र सुदृढ़ करता है.

इन्ही खूबियों को जानकर पहले समय के लोग तांबे के बर्तन पानी रखने और पीने के काम लेते थे.
ताम्बे का जग
यह माना जाता है कि तांबे के बर्तन में रखे पानी में जीवाणुरोधी (antimicrobial), एंटीऑक्सीडेट (antioxidant), कैंसररोधी (anti-cancer) और एंटीइन्फ्लेमेटरी (anti-inflammatory) गुण आ जाते हैं. आयुर्वेद के अनेक प्राचीन ग्रंथों में अलग-अलग प्रकार के बर्तनों में रखे पानी का उपयोग करने का वर्णन किया गया है तथा तांबे के बर्तन में रखे पानी को शरीर के लिए बहुत गुणकारी बताया गया है.
वर्ष 2012 में हुई एक स्टडी में यह पता चला था कि सामान्य तापमान पर तांबे के बर्तन में 16 घंटे तक रखने पर दूषित (contaminated) पानी में मौजूद हानिकारक जीवाणुओं की संख्या में कमी आ गई थी. वैज्ञानिको ने प्रयोग के तौर पर ऐसे पानी को लिया कि जिसमे पेट के पेचिश रोग को पैदा करने वाले वायरस, अमीबा ई-कोली थे. कुछ घंटो के पर्यवेक्षण के बाद वैज्ञानिको ने देखा कि हानिकारक बैक्टीरिया पूरी तरह से समाप्त हो चुके थे.

भारत में तो लोग सदियों से इस बात को जानते हैं कि तांबे के बर्तन में रखे पानी में औषधीय गुण आ जाते हैं. एक रिसर्च में यह पता चला कि अस्पतालों में तांबे की सतहों की मौजूदगी से ICU में पाए जानेवाले 97 प्रतिशत बैक्टीरिया नष्ट हो गए जिनसे होनेवाले इन्फेक्शंस में 40 प्रतिशत की कमी आई.

भारतीय योगी सद्गुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं, तांबे के बर्तन में रात भर या कम से कम चार घंटे तक रखे गए पानी में तांबा धातु के वे गुण व्याप्त हो जाते हैं जिनसे हमारे शरीर विशेषकर हमारे लीवर को बहुत लाभ पहुंचता है. यह शरीर को स्वस्थ और ऊर्जावान रखता है

हमें ऐसे लगता है कि बड़े बड़े अमीर लोग, हीरो-हिरोइन वगैरह किसी दूसरी दुनिया के बने खान-पान का प्रयोग करते हैं , ऐसा बिलकुल भी नहीं है.एक इंटरव्यू में अरबाज़ खान और मलाइका अरोरा ने बताया कि सुबह उठने पर सबसे पहले वो रात भर तांबे के जग में रखा हुआ पानी पीते है.

ताम्बे के बर्तन में रखे पानी पीने के लाभ Benefits from water stored in Copper vessel :
– यह हमारे पाचन तंत्र को सुधारता है.

– वजन संतुलित रखने में सहायक है.

– घावों को जल्दी भरता है.

– बुढ़ापे की दर को कम करता है.

– हमारे हृदय (cardiovascular) तंत्र को पुष्ट करता है और हाइपरटेंशन (hypertension) में लाभदायक है.
– कैंसर का प्रतिरोधक है.

– बैक्टीरिया को मारता है.

– दिमाग को स्टीमुलेट करता है.

– थायराइड को नियंत्रित करता है.

– संधिवात (arthritis) और जोड़ों की सूजन कम करता है.

– खून की कमी (anemia) दूर करता है.

– कोलेस्ट्रोल कम करता है.

– लीवर, स्प्लीन और लिंफ सिस्टम (lymph system) के लिए टॉनिक का काम करता है.

– मैलेनिन (melanin) की रक्षा करता है.

– शरीर को लौह तत्व (iron) एब्सॉर्ब करने में सहायक है.

– किडनियों को साफ करता है.

जिस तांबे के बर्तन से आप पानी पीते हैं वह बर्तन एक दो दिन में धुलना अवश्य चाहिए. इसका कारण यह है कि तांबा पानी के साथ प्रतिक्रिया करके कॉपर ऑक्साइड बना देता है जोकि जंग जैसा बर्तन की दीवारों पर जम जाता है. इसे साफ करना आवश्यक है अन्यथा यह पानी धातु के लाभदायक फायदे नहीं दे पायेगा.

तांबे के बर्तन साफ करने का आसान उपाय है नींबू अथवा खटाई, केचप या फिर नमक और सफ़ेद सिरका से रगड़ कर साफ करना और फिर किसी डिटरजेंट से धुल लेना

आजकल तांबे के बने बर्तनों के उपयोग के नाम पर बस तांबे के छोटे से लोटे दिखते है जिसे घर-मंदिर में पूजा पाठ और सूर्य को अर्घ्य देने में प्रयोग किया जाता है. एक समझदार व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने पूर्वजो की परम्परा का पालन करे / न करे पर कम से कम इतने फायदे जानकर ही सही तांबे के बरतनों का प्रयोग करे.

तांबे के बर्तन, जग, बोतल, गिलास, लोटा आदि आपको किसी भी बरतन की दुकान से मिल सकते है या आप इन्हें ऑनलाइन भी आर्डर कर सकते है.


आज से ही लेना शुरु करें_कोई भी साइड इफेक्ट नही _एक बार जरूर पढ़िये ::::::::
बहुत ही चमत्कारी दवा:

250 ग्राम मैथीदाना
100 ग्राम अजवाईन
50 ग्राम काली जीरी (ज्यादा जानकारी के लिए नीचे देखे)
Photo
उपरोक्त तीनो चीजों को साफ-सुथरा करके हल्का-हल्का सेंकना(ज्यादा सेंकना नहीं) तीनों को अच्छी तरह मिक्स करके मिक्सर में पावडर बनाकर कांच की शीशी या बरनी में भर लेवें ।

रात्रि को सोते समय एक चम्मच पावडर एक गिलास पूरा कुन-कुना पानी के साथ लेना है। गरम पानी के साथ ही लेना अत्यंत आवश्यक है लेने के बाद कुछ भी खाना पीना नहीं है। यह चूर्ण सभी उम्र के व्यक्ति ले सकतें है।
चूर्ण रोज-रोज लेने से शरीर के कोने-कोने में जमा पडी गंदगी(कचरा) मल और पेशाब द्वारा बाहर निकल जाएगी । पूरा फायदा तो 80-90 दिन में महसूस करेगें, जब फालतू चरबी गल जाएगी, नया शुद्ध खून का संचार होगा । चमड़ी की झुर्रियाॅ अपने आप दूर हो जाएगी। शरीर तेजस्वी, स्फूर्तिवाला व सुंदर बन जायेगा ।

‘‘फायदे’’
1. गठिया दूर होगा और गठिया जैसा जिद्दी रोग दूर हो जायेगा ।
2. हड्डियाँ मजबूत होगी ।
3. आॅख का तेज बढ़ेगा ।
4. बालों का विकास होगा।
5. पुरानी कब्जियत से हमेशा के लिए मुक्ति।
6. शरीर में खुन दौड़ने लगेगा ।
7. कफ से मुक्ति ।
8. हृदय की कार्य क्षमता बढ़ेगी ।
9. थकान नहीं रहेगी, घोड़े की तहर दौड़ते जाएगें।
10. स्मरण शक्ति बढ़ेगी ।
11. स्त्री का शारीर शादी के बाद बेडोल की जगह सुंदर बनेगा ।
12. कान का बहरापन दूर होगा ।
13. भूतकाल में जो एलाॅपेथी दवा का साईड इफेक्ट से मुक्त होगें।
14. खून में सफाई और शुद्धता बढ़ेगी ।
15. शरीर की सभी खून की नलिकाएॅ शुद्ध हो जाएगी ।
16. दांत मजबूत बनेगा, इनेमल जींवत रहेगा ।
17. नपुसंकता दूर होगी।
18. डायबिटिज काबू में रहेगी, डायबिटीज की जो दवा लेते है वह चालू रखना है। इस चूर्ण का असर दो माह लेने के बाद से दिखने लगेगा । जिंदगी निरोग,आनंददायक, चिंता रहित स्फूर्ति दायक और आयुष्ययवर्धक बनेगी । जीवन जीने योग्य बनेगा ।

कुछ लोग कलौंजी को काली जीरी समझ रहे है जो कि गल्त है काली जीरी अलग होती है जो आपको पंसारी/करियाणा की दुकान से मिल जाएगी जिसके नाम इस तरह से है

हिन्दी कालीजीरी, करजीरा।
संस्कृत अरण्यजीरक, कटुजीरक, बृहस्पाती।
मराठी कडूकारेलें, कडूजीरें।
गुजराती कडबुंजीरू, कालीजीरी।
बंगाली बनजीरा।
अंग्रेजी पर्पल फ्लीबेन।
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पेट सम्बंधित समस्त रोग –
– सप्तक चूर्ण – इस आयुर्वेदिक औषधी से पेट के सारे रोगो, बवासीर, पान्डु, कृमि, कास-खान्सी, अग्निमान्द्य, मन्दाग्नि, भूख का खुलकर न लगना, ज्वर / साधारण बुखार, गुल्म रोग आदि में बहुत फायदा पहुचता है। इस आयुर्वेदिक औषधी को तिल सप्तक चूर्ण कहते है।
इसे बनाने के लिए- तिल, चीता यानी चित्रक, सोन्ठ, मिर्च काली, पीपल छोटी, वाय विडन्ग, बडी हरड़, इन सभी जड़ीबूटियों का चूर्ण बना लें। चूर्ण बनाने के लिये पहले सभी द्रव्यों के छोटे छोटे टुकडे कर लें फिर मिक्सी अथवा इमाम दस्ते या खरल में डालकर महीन चूर्ण बना लें।
इस प्रकार से महीन चूर्ण किया गया पदार्थ औषधि के उपयोग के लिये तैयार है। इस चूर्ण को ३ ग्राम से लेकर ६ ग्राम की मात्रा मे बराबर गुड़ मिलाकर सुबह और शाम सेवन करना चाहिये।

– पेट के कीड़े (विडन्गादि चूर्ण) – इस आयुर्वेदिक औषधी से पेट के सारे कीड़े एकदम जड़मूल से नष्ट हो जाते है जिससे शरीर में हर खाई पीयी चीज़ का पूरा पोषण और ताकत मिलती है। इस आयुर्वेदिक औषधी को विडन्गादि चूर्ण कहते है। इस बनाने के लिए- वाय विडन्ग, सेन्धा नमक, हीन्ग, कालानमक, कबीला, बड़ी हरड, छोटी पीपल, निशोथ की जड़ की छाल ; इतने द्रव्य बराबर बराबर लेना है। इन सभी द्रव्यों का महीन चूर्ण बना लें और इस चूर्ण की मात्रा आधा चम्मच गरम / गुनगुने जल या दही की पतली लस्सी या मठ्ठा के साथ दिन मे दो या तीन बार लेना चाहिये।

– त्रिकटु चूर्ण – इस आयुर्वेदिक औषधी को त्रिकटु चूर्ण इसलिए कहते है क्योकि इसमें सिर्फ ३ सामान्य चीज़ो, जो हर घर में आसानी से मिलती है, मिलाकर पेट के लिए फायदेमंद दवा बनती है। इसे बनाने के लिये तीन द्रव्यों की आवश्यकता होती है- सोन्ठ या सूखी हुयी अदरख, काली मिर्च, छोटी पीपल। इस तीनों को बराबर बराबर मात्रा में लेकर कूट पीसकर अथवा मिक्सी में डालकर महीन चूर्ण बना लें , ऐसा बना हुआ चूर्ण को “त्रिकटु चूर्ण” के नाम से जानते है। यह चूर्ण अपच, गैस बनना, पेट की आंव, कोलायटिस, बबासीर, खान्सी, कफ का बनना, साय्नुसाइटिस, दमा, प्रमेह तथा अनुपान भेद से बहुत सी बीमारियों में लाभ पहुन्चाता है। इसे सेन्धा नमक के साथ मिलाकर खाने से वमन, जी मिचलाना , भूख का न लगना आदि मे लाभकारी है।
– त्रिफला (हर्र, बहेड़ा, आंवला) तीनों समान मात्रा में कूट पीसकर रख लें। 3 ग्राम से 5 ग्राम तक की मात्रा रात्रि में सोते समय गुनगुने पानी के साथ लें। लगातार कुछ दिनों तक लेने से लाभ अवश्य देगा। साथ ही रात्रि में तांबे के पात्र में पानी रख लें एवं सुबह उसे पी लें। इसके दस मिनट बाद शौच जायें, आराम से पेट साफ होगा।

– प्रतिदिन कम से कम 1 हरड़ अवश्य चूसें, चूस कर ही यह पेट में जाय। लगातार कुछ दिन इसका प्रयोग करने पर हर तरह की कब्ज दूर हो जाती है।

– त्रिफला 25 ग्राम, सौंफ 25 ग्राम, सोंठ 5 ग्राम, बादाम 50 ग्राम, मिश्री 20 ग्राम लें और गुलाब के फूल 50 ग्राम भी लें। सभी को कूट-पीसकर एक शीशी में रख लें। रात्रि में सोते समय 5 से 7 ग्राम तक दवा दूध या शहद के साथ लें।



गठिया रोग –

– 100 ग्राम तारपीन का तेल, 30 ग्राम कपूर, 10 ग्राम पिपरमिण्ट, इन सबको मिलाकर धूप में एक दिन रखें। जब यह सब तारपीन में मिल जाये, तो दवा तैयार हो गई। जिन गाठों में दर्द हो, वहां पर यह दवा लगाकर धीरे-धीरे 15 मिनट तक मालिश करें और इसके बाद कपड़ा गरम करके उस स्थान की सिकाई कर दें। एक सप्ताह में ही दर्द में आराम मिलने लगेगा।

– आँवला चूर्ण 20 ग्राम, हल्दी चूर्ण 20 ग्राम, असंगध चूर्ण 10 ग्राम, गुड़ 20 ग्राम इन चारों औषधियों को 500 ग्राम पानी में डालकर धीमी आँच में पकाये, जब पानी 100 ग्राम रह जाये तो उसे आग से उतार कर कपड़े या छन्नी से छान लें एवं इस काढ़े की तीन खुराक बनायें। सुबह, दोपहर एवं रात्रि में खाने के बाद पियें। इस प्रकार प्रतिदिन सुबह यह दवा बनायें, लगातार 30 दिन पीने पर गठिया में निश्चित रूप से आराम होता है।


पित्त रोग-

– पीपल (गीली) चरपरी होने पर भी कोमल और शीतवीर्य होने से पित्त को शान्त करती है।

– खट्टा आंवला, लवण रस और सेंधा नमक भी शीतवीर्य होने से पित्त को शान्त करती है।

– गिलोय का रस कटु और उष्ण होने पर भी पित्त को शान्त करता है।

– हरीतकी (पीली हरड़) 25 ग्राम, मुनक्का 50 ग्राम, दोनों को सिल पर बारीक पीसकर उसमें 75 ग्राम बहेड़े का चूर्ण मिला लें। चने के बराबर गोलियां बनाकर प्रतिदिन प्रातःकाल ताजा जल से दो या तीन गोली सेवन करें। इसके सेवन से समस्त पित्त रोगों का शमन होता है। हृदय रोग, रक्त के रोग, विषम ज्वर, पाण्डु-कामला, अरुचि, उबकाई, कष्ट, प्रमेह, अपरा, गुल्म आदि अनेक ब्याधियाँ नष्ट होती हैं।
10 ग्राम आंवला रात्रि में पानी में भिगो दें। प्रातःकाल आंवले को मसलकर छान लें। इस पानी में थोड़ी मिश्री और जीरे का चूर्ण मिलाकर सेवन करें। तमाम पित्त रोगों की रामबाण औषधि है। इसका प्रयोग 15-20 दिन करना चाहिए।
खांसी और कफ –

– धीमी आंच में लोहे के तवे पर बेल की पत्तियों को डालकर भूनते-भूनते जला डालें। फिर उन्हें पीसकर ढक्कन बन्द डिब्बे में रख लें और दिन में तीन या चार बार सुबह, दोपहर, शाम और रात सोते समय एक माशा मात्रा में 10 ग्राम शहद के साथ चटायें, कुछ ही दिनों के सेवन से कुकुर खांसी ठीक हो जाती हैै। यह दवा हर प्रकार की खांसी में लाभ करती है।

– पान का पत्ता 1 नग, हरड़ छोटी 1 नग, हल्दी आधा ग्राम, अजवायन 1 ग्राम, काला नमक आवश्यकतानुसार, एक गिलास पानी में डालकर पकायें आधा गिलास रहने पर गरम-गरम दिन में दो बार पियें । इससे कफ पतला होकर निकल जायेगा। रात्रि में सरसों के तेल की मालिश गले तथा छाती व पसलियों में करें।

– सूखी खांसी होने पर अमृर्ताण्व रस सुबह-शाम पानी से लेनी चाहिए।

– सितोपलादि चूर्ण शहद में मिलाकर चाटने से खांसी में आराम मिलता है।

– तालिसादि चूर्ण दिन भर में दो-तीन बार लेने से खांसी में कमी आती है।

– हल्दी, गुड़ और पकी फिटकरी का चूर्ण मिलाकर गोलियां बनाकर लेने से खांसी कम होती है।

– तुलसी, काली मिर्च और अदरक की चाय खांसी में सबसे बढि़या रहती हैं।

– गुनगुने पानी से गरारे करने से गले को भी आराम मिलता है और खांसी भी कम होती है।

– सूखी खांसी में काली मिर्च को पीसकर घी में भूनकर लेना भी अच्छा रहता है।

– चंदामृत रस भी खांसी में अच्छा रहता है।

– हींग, त्रिफला, मुलहठी और मिश्री को नीबू के रस में मिलाकर लेने से खांसी कम करने में मदद मिलती है।

– त्रिफला और शहद बराबर मात्रा में मिलाकर लेने से भी फायदा होता है।

– गले में खराश होने पर कंठकारी अवलेह आधा-आधा चम्मच दो बार पानी से या ऐसे ही लें।

– पीपली, काली मिर्च, सौंठ और मुलहठी का चूर्ण बनाकर चौथाई चम्मच शहद के साथ लेना अच्छा रहता है।

– पान का पत्ता और थोड़ी-सी अजवायन पानी में चुटकी भर काला नमक व शहद मिलाकर लेना भी खांसी में लाभदायक होता है। खासकर बच्चों के लिए।

– बताशे में काली मिर्च डालकर चबाने से भी खांसी में कमी आती है।
– खांसी से बचने के सावधानी बरतते हुए फ्रिज में रखी ठंडी चीजों को न खाएं। धुएं और धूल से बचें।

– खांसी के आयुर्वेदिक इलाज के लिए जरूरी है कि किसी अनुभवी चिकित्सक से संपर्क किया जाएं। अपने आप आयुर्वेदिक चीजों का सेवन विपरीत प्रभाव भी डाल सकता है।



नपुंसकता –
– इस आयुर्वेदिक औषधी से पुरुषो की हर तरह की मर्दाना कमजोरी में आश्यर्यजनक रूप से बहुत तेज़ लाभ मिलता है। इस दवाई को मदन प्रकाश चूर्ण कहते है और इसे बनाने में इस्तेमाल होता है अश्वगन्धा, कौन्च के बीज, सेमर के फूल, बीज बन्द, शतावर, मोचरस, गोखरू, जायफल, ताल मखाना, मूसली, विदारीकन्द, सोठ, घी में भूनी हुयी ऊड़द की दाल, पोस्तादाना और बन्सलोचन यह सभी द्रव्य एक एक हिस्सा लेकर महीन से महीन चूर्ण बना लें और इस सभी वस्तुओं के चूर्ण के हिस्से के बराबर शक्कर लें और इस शक्कर को महीन से महीन पीसकर उपरोक्त चूर्ण में मिला लें। इस चूर्ण को एक चम्मच दूध या पानी से दिन में एक बार या दो बार खाना है। आयुर्वेद की यह दवाई गजब की चमत्कारी है और ये शरीर के सातो धातुओं जैसे रस, रक्त, मान्स , मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र धातुओं को जबरदस्त निश्चित रूप से बढ़ाता ही बढ़ता है।



मिर्गी –

आम तौर पर लोगो को मिर्गी के बारे में ज्यादे जानकारी न होने की वजह से इसका उचित इलाज नहीं हो पाता है। ये एक मानसिक रोग है और इसका एलोपैथी में सामन्यतया कोई कारगर इलाज नहीं दीखता। आईये जानते है मिर्गी से जुड़े कई पहलुओं को-

मिर्गी एक ऐसी बीमारी है जिसे लेकर लोग अक्सर बहुत ज्यादा चिंतित रहते हैं। मिर्गी रोग होने के और भी कई कारण हो सकते हैं जैसे-

बिजली का झटका लगना, नशीली दवाओं का अधिक सेवन करना, किसी प्रकार से सिर में तेज चोट लगना, तेज बुखार तथा एस्फीक्सिया जैसे रोग का होना आदि। इस रोग के होने का एक अन्य कारण स्नायु सम्बंधी रोग, ब्रेन ट्यूमर, संक्रामक ज्वर भी है। मिर्गी के रोगी अक्सर इस बात से परेशान रहते हैं कि वे आम लोगों की तरह जीवन जी नहीं सकते। उन्हें कई चीजों से परहेज करना चाहिए। खासतौर पर अपनी जीवन शैली में आमूलचूल परिवर्तन करना पड़ता है जिसमें बाहर अकेले जाना प्रमुख है।

यह रोग कई प्रकार के ग़लत तरह के खान-पान के कारण होता है। जिसके कारण रोगी के शरीर में विषैले पदार्थ जमा होने लगते हैं, मस्तिष्क के कोषों पर दबाब बनना शुरू हो जाता है और रोगी को मिर्गी का रोग हो जाता है। दिमाग के अन्दर उपलब्ध स्नायु कोशिकाओं के बीच आपसी तालमेल न होना ही मिर्गी का कारण होता है। हलांकि रासायनिक असंतुलन भी एक कारण होता है।

प्राणायाम करने से सभी मानसिक रोगो की तरह मिर्गी में बहुत फायदा होता है।

अंगूर का रस (बिना रासायनिक खाद और कीटनाशक से पैदा हुआ) मिर्गी रोगी के लिये अत्यंत उपादेय उपचार माना गया है। आधा किलो अंगूर का रस निकालकर प्रात:काल खाली पेट लेना चाहिये। यह उपचार करीब ६ माह करने से आश्चर्यकारी सुखद परिणाम मिलते हैं। मिट्टी (बिना रासायनिक खाद और कीटनाशक की) को पानी में गीली करके रोगी के पूरे शरीर पर प्रयुक्त करना अत्यंत लाभकारी उपचार है। एक घंटे बाद नहालें। इससे दौरों में कमी होकर रोगी स्वस्थ अनुभव करेगा। मानसिक तनाव और शारिरिक अति श्रम रोगी के लिये नुकसानदेह है। इनसे बचना जरूरी है।

रोजाना तुलसी के २० पत्ते चबाकर खाने से रोग की गंभीरता में गिरावट देखी जाती है।

भारतीय देशी गाय के दूध से बनाया हुआ मक्खन मिर्गी में फ़ायदा पहुंचाने वाला उपाय है। दस ग्राम नित्य खाएं। गर्भवती महिला को पड़ने वाला मिर्गी का दौरा जच्चा और बच्चा दोनों के लिए तकलीफदायक हो सकता है। उचित देखभाल और योग्य उपचार से वह भी एक स्वस्थ शिशु को जन्म दे सकती है। मिर्गी की स्थिति में गर्भ धारण करने में कोई परेशानी नहीं है।

इस दौरान गर्भवती महिलाएं डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाइयां लें। मां के रोग से होने वाले बच्चे पर कोई असर नहीं पड़ता। गर्भवती महिला समय-समय पर डॉक्टर से जांच कराती रहें, पूरी नींद लें, तनाव में न रहें और नियमानुसार दवाइयां लेती रहें। इससे उन्हें मिर्गी की परेशानी नहीं होगी। गर्भवती महिला के साथ रहने वाले सदस्यों को भी इस रोगकी थोड़ी जानकारी होना आवश्यक है।
शरीर के अंदर पैदा होने वाले हर किस्म के कीड़ो और उनसे पैदा होने वाली अनेक किस्म के बीमारियो के लक्षण के लिए —
– नीम की 7 पत्ती 1 से 2 महीने खाए और अगर नीम की पत्ती चबाने में दिक्कत हो तो पतंजली योगपीठ की नीम घनवटी खाए नोट – हर आदमी को साल में एक बार कीड़ो की दवा जरूर खाना चाहिए और नीम खाने के 1 घंटे आगे पीछे दूध से बने सामान नहीं खाना चाहिए 
– वायविडंग, नारंगी का सूखा छिलका, शक्कर को समभाग पीसकर रख लें। 6 ग्राम चूर्ण को सुबह खाली पेट सादे पानी के साथ 10 दिन तक प्रतिदिन लें। दस दिन बाद कैस्टर आयल (अरंडी का तेल) 25 ग्राम की मात्रा में शाम को रोगी को पिला दें। सुबह मरे हुए कीड़े निकल जायेंगे।

– पिसी हुई अजवायन 5 ग्राम को चीनी के साथ लगातार 10 दिन तक सादे पानी से खिलाते रहने से भी कीड़े पखाने के साथ मरकर निकल जाते है।

– पका हुआ टमाटर दो नग, कालानमक डालकर सुबह-सुबह 15 दिन लगातार खाने से बालकों के चुननू आदि कीड़े मरकर पखाने के साथ निकल जाते है। सुबह खाली पेट ही टमाटर खिलायें, खाने के एक घंटे बाद ही कुछ खाने को दें।
पीलिया-
– बिना कीड़ो और कीटनाशक वाले मूली के पत्तों के 100 ग्राम रस में 20 ग्राम चीनी मिलाकर पिलायें। साथ ही मूली, सन्तरा, पपीता, तरबूज, अंगूर, टमाटर खाने को दें। साथ ही गन्ने का रस पिलायेें और पेट साफ रखें। पीलिया में आराम जरूर मिलेगा।



हाई ब्लडप्रेशर –

– गौमूत्र का प्रतिदिन सुबह खाली पेट एवं रात्रि में सोते समय 10-10 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन लिया जाये, तो भी ब्लडप्रेशर नार्मल हो जाता है।

– अर्जुन की छाल का चूर्ण 5 ग्राम की मात्रा सुबह एवं 5 ग्राम की मात्रा शाम को सोते समय लगातार लेने से ब्लडप्रेशर नार्मल होता है एवं हृदय से सम्बन्धित बीमारियों में फायदा मिलता है।

चर्मरोग / सफेद दाग –

– नीम और तुलसी की 7-7 पत्ती गोमूत्र के साथ रोज पीये और अगर नीम की पत्ती चबाने में दिक्कत हो तो पतंजली योगपीठ की आरोग्य वटी खाए और गोमूत्र को खुजली या सफ़ेद दाग पर लगाये (नोट – नीम खाने के 1 घंटे आगे पीछे दूध से बने सामान नहीं खाना चाहिए )
कैंसर-

गेंहूँ के जवारे का रस, तुलसी की पत्ती, गोमूत्र, त्रिफला और गिलोय आदि का नियमित सेवन करने से कैंसर में निश्चित लाभ होता है।



हार्ट अटैक –

– 99% ब्लॉकेज को भी रिमूव कर देता है – पीपल का पत्ता । पीपल के 15 पत्ते लें । जो कोमल गुलाबी कोंपलें न हों । बल्कि पत्ते हरे कोमल व भली प्रकार विकसित हों । प्रत्येक का ऊपर व नीचे का कुछ भाग कैंची से काटकर अलग कर दें । पत्ते का बीच का भाग पानी से साफ कर लें । इन्हें 1 गिलास पानी में धीमी आँच पर पकने दें । जब पानी उबलकर एक तिहाई रह जाए । तब ठंडा होने पर साफ कपड़े से छान लें और उसे ठंडे स्थान पर रख दें । इस काढ़े की 3 खुराकें बनाकर प्रत्येक 3 घंटे बाद प्रातः लें । हार्ट अटैक के बाद कुछ समय हो जाने के पश्चात लगातार 15 दिन तक इसे लेने से हृदय पुनः स्वस्थ हो जाता है । और फिर दिल का दौरा पड़ने की संभावना नहीं रहती । दिल के रोगी इस नुस्खे का 1 बार प्रयोग अवश्य करें । पीपल के पत्ते में दिल को बल और शांति देने की अदभुत क्षमता है । इस पीपल के काढ़े की 3 खुराकें सवेरे 8 बजे 11 बजे व 2 बजे ली जा सकती हैं । खुराक लेने से पहले पेट एकदम खाली नहीं होना चाहिए । बल्कि सुपाच्य व हल्का नाश्ता करने के बाद ही लें । प्रयोगकाल में तली चीजें, चावल आदि न लें । मांस, मछली, अंडे, शराब, धूम्रपान का प्रयोग बंद कर दें । नमक, चिकनाई का प्रयोग बंद कर दें । अनार, पपीता, आंवला, बथुआ, लहसुन, मैथीदाना, सेब का मुरब्बा, मौसंबी, रात में भिगोए काले चने, किशमिश, गुग्गुल, दही, छाछ आदि लें ।

प्राणायाम करने से फायदा होता है।

अस्थमा / दमा –
तुलसी की पत्ती, गोमूत्र, त्रिफला सेवन करने से अस्थमा / दमा में लाभ होता है।
अजीर्ण / अपच / कब्ज / कमजोर पाचन शक्ति –

50 ग्राम–सौफ, 50 ग्राम–हर्र, 50 ग्राम–बहेडा, 50 ग्राम–आवला, 50 ग्राम–सनाय पत्ती, 25 ग्राम–काला नमक इन सभी का चूर्ण बना ले इस चूर्ण को 250 ग्राम मुनक्का ले कर उसके बीज निकाल कर मुनक्के में मिला कर पीस ले, फिर छोटी छोटी गोली बना ले। पहले पन्द्रह दिन एक-एक गोली सुबह, दोपहर, शाम लेनी है, सुबह की गोली खाली पेट लेनी है अन्य खाने के, पन्द्रह दिन बाद सुबह और शाम लेनी है यह गोली कम से कम तीनसे चार माह लेनी है, स्वस्थ लोग भी इसका सेवन कर सकते है।
ह्रदय रोग

एक तोला काली साबूत उडद रात को गरम पानी मे भिगो दे। सबेरे पानी से उडद के दाने निकाल ले तथा उडद को छिलको समेत सिलबट्टे पर पीस ले। उडद की इस पीट्टी को एक तोला शुद्ध गुग्गुल के चूर्ण मे मिला ले। इस योग को खरल मे डालकर एक तोला अरंडी का तेल और एक तोला गाय का मक्खन डालकर उसे ढंग से मिला ले । काफ़ी देर तक इसे खरल मे रगडते रहे । नहाने के बाद शरीर को पौछ कर इस लेप को छाती से पेट तक मल ले। चार घंटे के लिये लेट जाये। उठ बैठ भी सकते है। जब लेप सूख जाये तो नहा ले । यह प्रयोग प्रतिदिन सुबह पाँच दिन तक करना चाहिये । एक महीने के बाद फ़िर पाँच दिन करे । ह्रद्यरोग पूरी तरह ठीक हो जायेगा।
बवासीर (पाईल्स) –
– एक मूली प्रतिदिन दोपहर में अच्छी तरह धोकर चबा कर बिना काटे, बिना किसी नमक मसाले के, सीधे दातो से चबा चबा कर खाए काफी आराम होगा।
नजला जुखाम –
रात को सोते समय दूध में बहुत थोड़ी सी शुद्ध केसर डाल कर पीने से नजला जुखाम ठीक हो जाता है।
संधिसोथ, स्पॉन्डिलाइटिस, कटिशूल, स्लिप्ड डिस्क, कंधा का अकड़ना, तनाव एवं मोच, तंत्रों का दर्द (साइटिका) —
आयुर्वेद में इस प्रकार की समस्याओं के उपचार के लिये अनेक फल-सिद्ध प्रक्रियाएँ अर्थात पिझिचिल, नजावराकिझी, अभयांगम, शिरोधारा, शिरोवस्ती, इलाकिझी, उबटन आदि प्रयोग किये जाते हैं। आयुर्वेद में इन प्रक्रियाओं का वर्णन इस दिया है –
पिझिचिल-

एक आरामदेह, शमक एवं पुन: यौवन प्रदान करने वाला उपचार है जिसमें औषधियुक्त नर्म तेल संपूर्ण शरीर (सिर एवं गर्दन को छोड़कर) पर एक निश्चित समय के लिये निरंतर धार के रूप में उड़ेला जाता है । इसका प्रयोग संधिसोथ, उम्र वृद्धि, सामान्य कमजोरी, पक्षाघात का प्रभावपूर्ण ढ़ंग से उपचार करने के लिये किया जाता है । ’पिझिचिल’ एवं ’सर्वांगधारा’ तकनीकी रूप से समान हैंI ’पिझिचिल’ का अक्षरश: अर्थ ’निचोड़ना’ है। यहाँ, नर्म तेल को मरीज के शरीर के ऊपर तेल के पात्र में समय-समय पर डुबाये हुये कपड़े के द्वारा निचोड़ा जाता है । पिझिचिल के प्रयोग की सलाह वात शरीरी द्रव-पक्षाघात (आंशिक पक्षाघात) के निरस्तीकरण, लकवा एवं मांशपेशियों में तनाव के द्वारा उत्पन्न बीमारियों – तथा मांशपेशियों को प्रभावित करने वाली अन्य अपकर्षक बीमरियों के लिये दी जाती है ।

नजवराकीझ –

सभी प्रकार के वात रोगों, जोड़ों में दर्द, मांशपेशियों के अपक्षय, त्वचा विकार, चोट एवं अभिघात के स्वास्थ्य्लाभ की अवधि, गठिया, आम कमजोरी, लकवा आदि के लिये चिकित्सा है । औषधियुक्त तेल के प्रयोग के बाद, औषधियुक्त दूध-दलिया के पुलिंदे के प्रयोग के द्वारा आपके संपूर्ण शरीर का पूर्ण शरीर मालिश कर पसीना निकाला जाता है । यह एक प्रतिरक्षी क्षमता बढ़ाने वाला पुनर्यौवन चिकित्सा है । विभिन्न बीमारियों के लिये उपचार होने के अतिरिक्त, नजवराकीझी आपकी त्वचा में नये प्राण भरता है एवं इसमे चमक लाता है ।

शिरोधारा –

एक अनोखा उपचार है जहाँ एक निश्चित अवधि के लिये सिर को विशिष्ट औषधियुक्त तेलों के नियमित धार में स्नान कराया जाता है । यह मानसिक आराम के लिये एक प्रभावकारी चिकित्सा है एव यह अनिद्रा, तनाव, विषाद, घटती हुई मानसिक चुस्ती आदि को ठीक करता है । जब औषधियुक्त छाछ तेल का स्थान लेता है, इस चिकित्सा को तक्रधारा कहा जाता है ।

शिरोवस्ती –

निष्कासन (शोधन) उपचार की अपेक्षा उपशामक (शमन) उपचार अधिक माना जाता है । सामान्य रूप से इस उपचार के पूर्व तेल डालने (स्नेहन) एवं पसीना निकालने (स्वेदन) की क्रिया होती है । छ: से आठ फीट लंबा चमड़े का आस्तीन मरीज के सिर पर रखा जाता है एवं इसे सही स्थान पर रखने के लिये माथे के चारों तरफ एक पट्‍टी बाँधी जाती है। आस्तीन के भीतरी भाग पर अस्तर चढ़ाने के लिये तथा यह सुनिश्चित करने के लिये कि रिसाव न हो, सना हुआ आटा का प्रयोग किया जाता है । तब तेल आस्तीन में उड़ेला जाता है एवं सिर पर कुछ पल रहने दिया जाता है । वहाँ तेल को कितने देर तक रखा जाये इसका निर्धारण बीमारी की कठोरता से होता है। सामान्य रूप से वात विकार से उत्पन्न बीमारियों के लिये यह पचास मिनट तक होता है । इस प्रकार का वस्ती संवेदक कार्यों में सुधार लाता है । यह अर्द्ध नासीय शिरानाल क्षेत्र में कफ जनित स्रावों को बढ़ावा देता है जो मस्तिष्क में वाहिकीय संकुलन को कम करता है । यह उपचार आंशिक पक्षाघात, मोतियाबिंद, बहरापन, कान दर्द, अनिद्रा एवं कपालीय शिरा को कष्ट देने वाले अन्य बीमारियों के लिये निर्धारित है । शिरोवस्ती वाहिकीय सिरदर्दों, खंडित मनस्कता, सनकी-बाध्यकर विकारों, स्मरण शक्ति में क्षीणता, अनाभिविन्यास, ग्लूकोमा एवं शिरानाल सिरदर्दों में अत्यधिक उपयोगी होता है ।

अभयांगम –
पुनर्यौवन के लिये सामान्य चिकित्सा है । जड़ी-बूटीयुक्त तेल के साथ इस संपूर्ण शरीर मालिश का प्रयोग शरीर के 107 आवश्यक बिन्दुओं (मर्मों) के विशेष संबंध में मालिश के लिये किया जाता है । यह बेहतर संचार, मांशपेशीय स्वास्थ्य, मानसिक शांति एवं बेहतर स्वास्थ्य अनुरक्षण में मदद करता है । यह आपकी त्वचा को मजबूत बनाता है एवं आदर्श स्वास्थ्य तथा दीर्घायुपन को प्राप्त करने के लिये सभी ऊतकों को पुनर्यौवन प्रदान करता है तथा मजबूती देता हैI यह ओजस (प्राथमिक जीवनशक्ति) को बढ़ाता है एवं इस प्रकार आपके शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाता है । आपकी आँख के लिये लाभकारी होने के अतिरिक्त, अभयांगम आपको गहरी निद्रा प्रदान करता है । यह भी वात रोग का एक उपचार है ।

इलाकिझी-

त्वचा में नये प्राण भरने की चिकित्सा है । जड़ी-बूटी संबंधी संबंधी पुलटिस विभिन्न जड़ी-बूटियों एवं औषधियुक्त चूर्ण से बनती है । औषधियुक्त तेलों में गर्म होने के बाद आपके सम्पूर्ण शरीर की मालिश इन पुलटिसों से की जाती है । यह परिसंचरण को बढ़ावा देता है एवं पसीने को बढ़ाता है जो बदले में वर्ज्य पदार्थ को बाहर निकालने में त्वचा की मदद करता है, उसके द्वारा त्वचा के स्वास्थ्य में सुधार लाता है । इसका प्रयोग जोड़ों के दर्द, मांशपेशी के ऐठनों, तनाव एवं गठिया को रोकने के लिये भी होता है।

उपर्युक्त सभी उपचारों को एक पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति के साथ भी किया जा सकता है ताकि उसकी प्रतिरक्षा, जीवनशक्ति एवं जीवन की दीर्घायु को बढ़ाया जा सके । चिकित्सक की दिशा के अनुसार उपर्युक्त उपचारों को विभिन्न सम्मिश्रणों में किया जा सकता है। निश्चित अवधियों तक सहने एवं निश्चित अंतरालों पर दुहराने के बाद के बाद इनमें से प्रत्येक सम्मिश्रण एक उपचारात्मक एवं पुनर्यौवन प्रदान करने वाला प्रभाव प्रदान करता है ।

उबटन –

उबटन एक सौन्दर्य मालिश है । इसका प्रयोग वृद्ध लोगों की मदद करने के लिये होता है एवं युवा माताओं के साथ-साथ शिशुओं के लिये विशेष तकनीकों का विकास किया गया है । भारतीय पारंपरिक मालिश तकनीक आयुर्वेदिक दोषों एवं मर्मों (प्रतिवर्ती उपचार के समान दवाब बिन्दुओं) पर आधारित है । विशेष चिकित्सात्मक उपचारों जैसे कि पंचकर्म शुद्धिकरण में विशिष्ट आयुर्वेदिक मालिश चिकित्सा का प्रयोग किया जाता है ।



गुर्दे की पथरी से निजात पाने के कुछ कारगर घरेलू उपाय –

– प्याज, तुलसी की पत्ती या पत्थर चट्टे के पत्ते का सेवन करने से पथरी धीरे धीर घटती है।

अनिद्रा –

– खुद को अच्छी नींद के लिए पंजो का मसाज भी करें। दिनभर की थकान के बाद जब आपके पैरों में मसाज किया जाता है तो इससे आपको आराम मिलता है और नींद अच्छी आती है।
अल्सर –

– आधा कप ठंडे दूध में आधा नीबू निचोड़कर पिया जाए तो वह पेट को आराम देता है। जलन का असर कम हो जाता है और अल्‍सर ठीक होता है।

– पोहा अल्‍सर के लिए बहुत फायदेमंद घरेलू नुस्‍खा है, इसे बिटन राइस भी कहते हैं। पोहा और सौंफ को बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लीजिए, 20 ग्राम चूर्ण को 2 लीटर पानी में सुबह घोलकर रखिए, इसे रात तक पूरा पी जाएं। यह घोल नियमित रूप से सुबह तैयार करके दोपहर बाद या शाम से पीना शुरू कर दें। इस घोल को 24 घंटे में समाप्‍त कर देना है, अल्‍सर में आराम मिलेगा।

– पत्ता गोभी और गाजर को बराबर मात्रा में लेकर जूस बना लीजिए, इस जूस को सुबह-शाम एक-एक कप पीने से पेप्टिक अल्सर के मरीजों को आराम मिलता है।

– अल्‍सर के मरीजों के लिए गाय के दूध से बने घी का इस्तेमाल करना फायदेमंद होता है।

– अल्‍सर के मरीजों को बादाम का सेवन करना चाहिए, बादाम पीसकर इसका दूध बना लीजिए, इसे सुबह-शाम पीने से अल्‍सर ठीक हो जाता है।

– सहजन (ड्रम स्टिक) के पत्‍ते को पीसकर दही के साथ पेस्ट बनाकर लें। इस पेस्‍ट का सेवन दिन में एक बार करने से अल्‍सर में फायदा होता है।

– अल्सर होने पर एक पाव ठंडे दूध में उतनी ही मात्रा में पानी मिलाकर देना चाहिए, इससे कुछ दिनों में आराम मिल जायेगा।

– छाछ की पतली कढ़ी बनाकर रोगी को रोजाना देना चाहिये, अल्‍सर में मक्की की रोटी और कढ़ी खानी चाहिए, यह बहुत आसानी से पच जाती है।

सर दर्द –

– तेज़ पत्ती की काली चाय में निम्बू का रस निचोड़ कर पीने से सर दर्द में अत्यधिक लाभ होता है।

– नारियल पानी में सौंठ पावडर का लेप बनाकर उसे सर पर लेप करने भी सर दर्द में आराम पहुंचेगा।

– लहसुन पानी में पीसकर उसका लेप भी सर दर्द में आरामदायक होता है।

– तुलसी के पत्तों को कुचल कर उसका रस दिन में माथे पर 2, 3 बार लगाने से भी दर्द में राहत देगा।

– हरा धनिया कुचलकर उसका लेप लगाने से भी बहुत आराम मिलेगा।

– सफ़ेद सूती कपडे को सिरके में भिगोकर माथे पर रखने से भी दर्द में राहत मिलेगी।

– पपीते के बीजों को पीसकर माथे पर लेप करें। दर्द रूक जाने पर लेप को पानी से धो डालें ।

– आंवले का चूर्ण फाँककर पपीते का रस पीयें।

– रात को पपीते का रस गरम करके पियें।
डेगू –
अनार जूस तथा गेहूं घास रस नया खून बनाने तथा रोगी की रोग से लड़ने की शक्ति प्रदान करने के लिए है।

– गिलोय की बेल का सत्व मरीज़ को दिन में 2-3 बार दें, इससे खून में प्लेटलेट की संख्या बढती है, रोग से लड़ने की शक्ति बढती है तथा कई रोगों का नाश होता है।



बालो में रुसी –

– दही से स्नान करने से रुसी की समस्या से मुक्ति मिलती है।



कमर दर्द –

– खस और मिश्री दोनों बराबर मात्रा में लेकर कूट पीस लें । प्रतिदिन 1 चम्मच खाकर और ऊपर से गर्म दूध पीने से कमर दर्द जाता रहता है ।

– सरसों का तेल 125 ग्राम, देशी कपूर 20 ग्राम दोनों मिलाकर शीशी में रखकर धूप में रख दें। कपूर के पिघल जाने पर इस तेल से दर्द के स्थान पर मालिश करें ।

– कमर दर्द होने पर तारपीन के तेल की मालिश करें, राहत मिलेगी ।



लू लगना –

– धनिये के कुछ दाने लेकर पीस लें। फिर उन्हें पानी में घोलकर जरा सा बूरा और जरा सा नमक मिलाकर रोगी को बार—बार पिलायें।



उल्टी –

– सबसे पहले रोगी को पानी उबालकर ठंडा करके उसमें जरा सा सेंधा नमक और जरा सी शक्कर मिलाकर पिलाना चाहिए।



जलोदर

– बथुए के साग का रस आधा कप, जरा सा नमक मिलाकर सेवन करें। बथुआ जलोदर के रोगियों को बहुत ही फायदेमंद है या खरबूजे में सेंधा नमक लगाकर खायें ।



स्नायु रोग

– दो चम्मच सुखा धनियाँ, दो चम्मच बूरा तथा एक चुटकी नमक । तीनों को पीसकर चूर्ण बना लें । इसे फांक कर ऊपर से पानी पी लें। चक्कर बंद हो जायेंगे।

– काली मिर्च का चूर्ण आधा चम्मच, घी एक चम्मच, सेंधा नमक आधा चम्मच तीनों को मिलाकर खाने से चक्कर जाते रहते हैं।



आधाशीशी-

नमक और नौसादर मिलाकर शीशी में भर लें। फिर इसे धीरे—धीरे सूंघें आधाशीशी ठीक होती है
हिस्टीरिया –

पपीते के रस में थोड़ा सा कपूर मिलाकर रोगी को सुंघाने से रोगी की मूर्छा हट जाती है।

शरीर का सुन्न होना

दूध में बहुत थोड़ी सी सोंठ डालकर उबाल लें। फिर इस दूध को सूर्यास्त से पूर्व पियें।
चर्मरोग –

कच्चे पपीते को छीलकर कुचल लें। फिर ताजा रस दाद, खाज, खुजली वाले स्थान पर लगायें। लगभग 15 दिन तक इस रस को लगाने से दाद—खाज आदि जड़ से नष्ट हो जाता है।
शरीर में खुश्की-

खुश्की की व्याधि शरीर में वायु के बढ़ने तथा चिकनाई का अंश कम होने के कारण पैदा होती है। इसके लिए शरीर में तेल की मालिश करें। यदि इतने पर भी खुश्की दूर न हो तो पपीते की चिकित्सा अपनायें।

– पपीते के रस में एक चम्मच करेले का रस सेवन करें।

– 100 ग्राम पपीते का रस तथा 2 चम्मच हरे आंवले का रस दोनों को मिलाकर सुबह शाम दो खुराक के रूप में सेवन करें।

फोड़े फुन्सी की चिकित्सा –

– तुलसी के पौधे की जड़, पपीते के तने की लकड़ी तथा पपीता तीनों को पीस कर महीन करके फोड़े—फुसी पर लगायें।

– पपीता का गूदा 100 ग्राम, ग्वार पाठे का गूदा 50 ग्राम दोनों को मिला लें। जरा सी पिसी हल्दी मिला करके फोड़े—फुसी पर लगायें। इससे फोड़े—फुन्सियाँ शीघ्र ही फूट कर ठीक हो जाती है।
छोटी उम्र में झुर्रियाँ पड़ना-

– पपीते के 100 ग्राम बीज लेकर सुखाकर पीस लें। इन बीजों के चूर्ण को मक्खन में मिला दें। यह मल्हम झुर्री वाले स्थान पर लगायें।
सूजन (शोथ) –

त्रिफला का चूर्ण फांककर ऊपर से पपीते का (पका हुआ) रस पी लें। यह सूजन को दूर करने की बड़ी प्रसिद्ध दवा है।
मुँहासे

– कच्चे पपीते के रस में 2 चम्मच गुलाब जल डालकर दिन में तीन चार बार मुँह धोयें।

– कच्चे पपीते के दूध में जामुन की गुठली को घिसकर मुँहासों पर लगायें।
गले के ऊपरी भाग के रोग डिप्थीरिया-

– रात को सोते समय पपीते का गूदा गर्दन के चारों ओर चुपडकर हल्की पट्टी लपेट दें।

– कच्चे पपीते का रस दिन में तीन—चार बार पिलायें।

– पपीते की पतली—पतली खीर रोगी को खिलायें।
पायरिया –

– पपीते की पत्तियों को चबाकर थूक दें। इससे मुँह से पायरिया की दुर्गंध मिट जाती है।
आवाज बैठ जाना –

– पपीते के बीजों को पानी में औटाकर छान लें। इस पानी से दिन में दो—तीन बार गरारे करें।
मूत्र रोग-

– पके पपीते के रस में आधा चम्मच अजवाइन का चूर्ण मिलकर पीयें। मूत्र त्याग की बाधा खत्म हो जायेगी । और स्वप्न दोष भी मिट जाता है।
अण्ड कोषों की सूजन-

– पपीते के पत्तों के साथ अरण्डी के पत्ते पीसकर पुल्टिस बना लें । इसे पोतों के चारों ओर लेप कर पट्टी बांध लें। दो तीन दिन में अण्डकोषों की सूजन चली जाती है।
लो ब्लड प्रेशर-

– लहसुन लो ब्लड प्रेशर की रामबाण दवा है। अगर ब्लड प्रेशर ज्यादा लो हो तो 4 लहसुन या सामान्य लो हो तो 2 लहसुन को, पीसकर या बारीक़ काटकर नमक के साथ देने पर शर्तिया फायदा होगा।

– 50 ग्राम देशी चने व 10 ग्राम किशमिश को रात में 100 ग्राम पानी में किसी भी कांच के बर्तन में रख दें। सुबह चनों को किशमिश के साथ अच्छी तरह से चबा-चबाकर खाएं और पानी को पी लें। यदि देशी चने न मिल पाएं तो सिर्फ किशमिश ही लें। इस विधि से कुछ ही सप्ताह में ब्लेड प्रेशर सामान्य हो सकता है।

– रात को बादाम की 3-4 गिरी पानी में भिगों दें और सुबह उनका छिलका उतारकर कर 15 ग्राम मक्खन और मिश्री के साथ मिलाकर बादाम- गिरी को खाने से लो ब्लड प्रेशर नष्ट होता है।

– प्रतिदिन आंवले या सेब के मुरब्बे का सेवन लो ब्लेड प्रेशर में बहुत उपयोगी होता है। आंवले के 2 ग्राम रस में 10 ग्राम शहद मिलाकर कुछ दिन प्रातःकाल सेवन करने से लो ब्लड प्रेशर दूर करने में मदद मिलती है।

– लो ब्लड प्रेशर को सामान्य बनाये रखने में चुकंदर रस काफी कारगर होता है। रोजाना यह जूस सुबह- शाम पीना चाहिए। इससे हफ्ते भर में आप अपने ब्लड प्रेशर में सुधार पाएंगे।

– जटामासी, कपूर और दालचीनी को समान मात्रा में लेकर मिश्रण बना लेँ और तीन-तीन ग्राम की मात्रा मेँ सुबह-शाम गर्म पानी से सेवन करें। कुछ ही दिन मेँ आपके ब्लड प्रेशर में सुधार हो जायेगा।

– जिस को लोबीपी की शिकायत हो और अक्सर चक्कर आते हों तो आवलें के रस में शहद मिलाकर चाटने से जल्दी आराम मिलता है। रात्रि में 2-3 छुहारे दूध में उबालकर पीने या खजूर खाकर दूध पीते रहने से निम्न रक्तचाप में सुधार होता है।
– अदरक के बारीक कटे हुए टुकडों में नींबू का रस व सेंधा नमक मिलाकर रख लें। इसे भोजन से पहले थोडी मात्रा में खाते रहने से यह रोग दूर होता है। 200 ग्राम मट्ठे मे नमक, भुना हुआ जीरा व थोडी सी भुनी हुई हींग मिलाकर प्रतिदिन पीते रहने से इस समस्या के निदान में पर्याप्त मदद मिलती है।

– 200 ग्राम टमाटर के रस में थोडी सी काली मिर्च व नमक मिलाकर पीना लाभदायक होता है। उच्च रक्तचाप में जहां नमक के सेवन से रोगी को हानि होती है, वहीं निम्न रक्तचाप के रोगियों को नमक के सेवन से लाभ होता है।

– गाजर के 200 ग्राम रस में पालक का 50 ग्राम रस मिलाकर पीना भी निम्न रक्तचाप के रोगियों के लिये लाभदायक रहता है।

– निंबू को पानी के साथ या सलाद आदि के साथ रोज खाने से इस समस्या से राहत मिलती है।
पायरिया-

– आंवला को जलाकर इसको पीसकर पॉउडर को सरसों के तेल में मिलाकर प्रतिदिन मंजन करने से पायरिया रोग ठीक हो जाता है और मुंह से दुर्गन्ध दूर होती है।

– खस और इलायची को लौंग के तेल में मिलाकर प्रतिदिन सुबह—शाम दांतों पर मलने से पायरिया रोग नष्ट होता है। इससे दांतों का दर्द और ठंडी चीजों के प्रयोग से उत्पन्न दर्द ठीक हो जाता है।

– नमक बारीक पीसकर १ ग्राम नमक में ४ ग्राम सरसों का तेल मिलाकर प्रतिदिन मंजन करने से पायरिया रोग नष्ट होता है। इससे दांतों का दर्द और ठंडी चीजों के प्रयोग से उत्पन्न दर्द ठीक हो जाता है।

– जामुन के पेड़ की छाल जलाकर इसके राख में थोड़ा सा सेंधानमक व फिटकरी मिलाकर पीसकर रख लें। इसे प्रतिदिन मंजन करने से पायरिया रोग ठीक होता है।

– पायरीया के रोगी को हल्दी का बारीक चूर्ण सरसों के तेल में मिलाकर प्रतिदिन रात को सोते समय दांतों पर मलकर बिना कुल्ला किए सो जाना चाहिए और सुबह उठकर कुल्ला करना चाहिए, इससे दांतों का पायरिया नष्ट हो जाता है।

– आम की गुठली को बारीक पीसकर मंजन बना लें और इसे प्रतिदिन मंजन के रूप में प्रयोग करें । यह पायरिया को नष्ट करता है ओर दांतों के अन्य रोग भी खत्म करते है।

– पायरिया होने पर कपूर का टुकड़ा पान में रखकर खूब चबाने और लार एवं रस को बाहर निकालने से पायरिया रोग खत्म होता है। देशी घी में कपूर मिलाकर प्रतिदिन ३ से ४ बार दांत व मसूढ़ों पर धीरे—धीरे मलने और लार को बाहर निकालने से पायरिया रोग ठीक होता है।

– पीपल के काढ़े में घी मिलाकर प्रतिदिन दो बार कुल्ला करने से पायरिया व मसूढ़ों की सूजन दूर होती है।

– हरीतकी का चूर्ण बनाकर इससे प्रतिदिन मंजन करने से दांत व मसूढे स्वस्थ होते है और पायरिया ठीक होता है।

– नीम के कोमल पत्ते, कालीमिर्च और काला नमक मिलाकर सुबह सेवन करने से दांतों के कीड़े मर जाते है और खून साफ होकर पायरिया रोग ठीक होता है। नीम के पत्तो को पानी में उबालकर कुल्ला करने से पायरिया रोग ठीक होता है। नीम की दातुन से दांतों के रोग नष्ट होते है।

– बबूल की छाल का काढ़ा बनाकर गरारे व कुल्ला करने से पायरिया रोग में लाभ मिलता है।

– 5 से 6 बूंद लौंग का तेल 1 गिलास गर्म पानी में मिलाकर प्रतिदिन गरारे करने से पायरिया रोग नष्ट होता है।

– तिल को चबाकर खाने से दांत मजबूत होते है और पायरिया रोग नष्ट होता है।
दस्त / पेचिश –

– शुद्ध केसर बूँद भर घी में मिलकर चटायें।
– गाय के दूध में कच्चे या उबले दूध के झाग बच्चे को सेवन करायें। झाग (फैन) आयुर्वेद में परम औषधि माना है।

– एक गिलास मट्ठे को १/२ ग्राम फिटकरी भस्म के साथ सेवन करें। शिकायत दूर हो जायेगी।

– गाय के दूध में दो गुना पानी मिलाकर उबालें (सिर्फ दूध रह जाने पर फीका ही घूँट—घूँट पीयें) तो आपका रोग दूर हो जायेगा।

– दूध में (एक गिलास) एक नींबू निचोड़ कर फटने से पहले पियें। रोग दूर हो जायेगा।

– यदि पेचिश में खून आ रहा है तो एक चुटकी जावित्री का चूर्ण छाछ में मिलाकर सेवन करने से रोग मिट जाता है।

– मेथी के बीजों का चूर्ण ताजा दही के साथ सेवन करें।

– गाय के दूध के दही के साथ खजूर का सेवन करें।



एनीमिया (रक्ताल्पता) –

– जिनके शरीर में रक्त की कमी हो टमाटर के रस में नींबू का रस मिलाकर लें। रक्तक्षीणता में आधा कप आँवले का रस, दो चम्मच चासनी, थोड़ा सा पानी मिलाकर पीने से लाभ होता है। रक्ताल्पता में फालसा खाने से लाल रक्त बढ़ता है। सहजना की पत्तियों की सब्जी खानी चाहिए, लोहे की कमी से होने वाली अरक्तता दूर होती है। चाय के सेवन से रक्तक्षीणता बढ़ती है। रक्ताल्पता (एनीमिया) में चुकन्दर से बढ़कर कोई दवा नहीं है। कमजोरी अनुभव होने पर नींबू पानी का सेवन करने से स्फूर्ति प्राप्त होती है। पपीता पाचन शक्ति बढ़ाता है तथा खून में वृद्धि करता है अत: जिन्हें खून की कमी हो उन्हें पपीता अवश्य खाना चाहिए। लाल टमाटरों का रस पीते रहने से कमजोरी व थकावट दूर होती है एवं भूख खुलती है। दालचीनी और काला तिल समान मात्रा में लेकर पीस लें। इस चूर्ण को आधा कप दूध या पानी के साथ लेने से कमजोरी दूर होती है। पके हुए मीठे आठ दस आडू, दस—बारह दिन बराबर लें। 5 – 7 काजू खूब चबाकर ऊपर से गर्म दूध पी लें। एक मुट्ठी फालसा रोज चूसने से रक्त की कमी नहीं रहती। आम को दूध में घोंट कर रोज पीने से रक्ताल्पता दूर होती है। थोड़ी मात्रा में रोज आलूबुखारा खाने से रक्त की कमी दूर होती है। 5—7 चीकू एक साथ सेवन करें। बेजान शरीर में जान आयेगी और कमजोरी दूर हो जायेगी। पालक भी एक बेहतर औषधि है। तिल का प्रयोग भोजन में होना चाहिए क्योंकि इसमें लौह तत्व पाया जाता है। शरीर एकदम कमजोर पड़ गया हो और आँखों के आगे अंधेरा छाने लगा हो तो समझ लीजिए कि शरीर में खून की कमी बढ़ रही है। ऐसे में आँवले के चूर्ण का तिल के चूर्ण में मिलाकर रख लें। अब एक चम्मच चूर्ण हर रोज चासनी मिला कर चाटें। देखते—देखते महीने भर में हालत सुधर जाएगी। अनार के रस को एनीमिया के रोगी को पिलाना फायदेमंद है।

नाभि विकार (सूजन)-

– घी गरम करके एक चुटकी हल्दी डालकर रूई के फोहे पर रखें और गुनगुना नाभि पर बांध दें तो नाभि का विकार दूर हो जायेगा।
श्वांस सम्बन्धी रोग –

– एक गिलास दूध में आधा गिलास पानी, एक चम्मच पिसी हल्दी और २ चम्मच गुड़ मिलाकर इतना उबालें कि मात्र गिलास भर दूध शेष रह जाये। गुनगुना होने पर सेवन करेंगे तो रोग दूर हो जायेगा।

– वयस्कों की पुरानी खाँसी के लिए 2 ग्राम दालचीनी चूर्ण और 5 पिप्पली को 250 ग्राम दूध तथा 250 ग्राम पानी में डालकर इतना उबालें कि दूध ही रह जाये, फिर उस दूध को घूँट—घूँट करके सेवन करें । डाली गई पिप्पली को चबा—चबा कर खायें। दो—तीन सप्ताह में ही खांसी का रोग ठीक हो जायेगा।

– दूध में घी डालकर पियें सूखी खाँसी ठीक हो जायेगी।
सीने में जकड़न –

– 100 ग्राम दूध में 200 ग्राम पानी, 10 ग्राम सोठ, 5 ग्राम दालचीनी का चूर्ण डालकर पकायें कि काढ़े की मात्रा आधी (150 ग्राम) रह जाये तो फिर इसे घूँट—घूँट करके पियें।
नोट – किसी भी नुस्खे को आजमाने से पहले वैदकीय परामर्श लेना उचित होता है

सूखे मेवे की हैल्थ के लिए देखें करामात सूखे मेवे बहुत शक्तिवर्द्धक होते है_ 
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_ प्रोटीन से भरपूर सूखे मेवों में फाइबर, फाइटो न्यूट्रियंट्स एवं एन्टी ऑक्सीडेण्ट्स जैसे विटामिन ई एवं सेलेनियम की बहुलता होती है। बादाम, किशमिश, काजू, मूंगफली, अखरोठ आदि मेवे नॉन वेज फूड का एक अच्छा ऑप्शन भी माने जाते हैं। साथ ही 1 कप बादाम में 32 ग्राम प्रोटीन, मूंगफली में 36 ग्राम प्रोटीन और काजू में 20 ग्राम प्रोटीन मिलता है। वैज्ञानिकों के अनुसार प्रतिदिन एक तिहाई कप विभिन्न प्रकार के मेवे लेने चाहिए। मेवों को तलने या भूनने से उनके गुण नष्ट हो जाते हैं इसलिए इनका इस्तेमाल बिना तले करें। आइये और जातने हैं इन स्वादिष्ट मेवों के बारे में- अंजीर इसमें कैल्सियम तथा विटामिन ए और बी काफी मात्रा में पाए जाते हैं। अंजीर के सेवन से कब्ज, एनीमिया, अस्थमा, जुखाम, कमर दर्द, सिरदर्द, बावासीर आदि रोग दूर होती हैं और शरीर में ताकत आती है। अंजीर में कैल्शियम बहुत होता है, जो हड्डयों को मजबूत करने में सहायक होता है। बादाम यह ना केवल प्रोटीन और फाइबर में ही संपूर्ण होते हैं बल्कि इनमें खूब सारा कैल्शियम, एंटीऑक्सीडेंट और विटामिन ई भी होता है। इसे खाने से दांत और हड्डयों में ताकत आती है और फाइबर होने की वजह से ये हार्ट के लिये भी अच्छा माना जाता है। अखरोट अखरोट में फाइबर, विटामिन बी, मैग्नीशियम और एंटी आक्सिडेंट्स अधिक मात्रा में होते हैं। यह बालों और त्वचा को स्वस्थ रखता है। इसको खाने से मधुमेह, मोटापा, कैंसर और दिल की बीमारियां दूर रहती हैं। अगर आपको अनिद्रां की समस्या है तो इसका सेवन जरूर करें। छुहारा छुहारा आयरन, कैल्यिशम, पोटेशियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस, मैंगनीज, तांबा आदि जैसे पोषक तत्वों से भरा हुआ है। सुबह-शाम तीन छुहारे खाकर बाद में गर्म पानी पीने से कब्ज दूर होती है। अगर शरीर में खून की कमी है या फिर पेट में एसिडिटी बनती है तो खजूर खाइये। नट्स अखरोट के परिवार का यह मेवा जिंक, विटामिन ई, विटामिन ए, फोलेट और फॉस्फोरस से भरा हुआ होता है। यह ब्लड कोलेस्ट्रॉल को कम कर के दिल की बीमारी होने से बचाता है। जिंक इंफेक्शन और विटामिन ई कैंसर होने से बचाता है। साथ ही इसको खाने से रंगत भी गोरी हो जाती है। किशमिश इसको खाने से खून बनता है, वायु दोष, पित्त और कफ दूर होता है तथा ह्वदय के लिये किशमिश बडी ही हितकारी होती है। खून की कमी को भी किशमिश दूर करती है क्योंकि इसमें बहुत सा आयरन होता है। इससे यौन दुर्बलता भी दूर होती है। खुबानी सूखी खुबानी का सेवन प्यास और कफ में फायदेमंद है। इसमें विटामिन ए, बी कॉम्लेक्स और सी की प्रचुरता होती है, जो आंखों और प्रजनन क्षमता के लिए फायदेमंद होता है। काजू काजू से शरीर में ताकत आती है और यह दांतों में सडन पैदा करने वाले बैक्टीजरिया स्ट्रैहप्टोंककस म्यूनटैन्सट का भी मुकाबला करता है। आधे मुटी काजू में 374 कैलोरीज़, 31 ग्राम वसा, 10 ग्राम प्रोटीन, विटामिन ई, विटामिन के और विटामिन 6 होती है। कैल्शिसयम, आयरन, फोलेट, और जि़क बहुत अधिक मात्रा में होती है, और 16 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है। पिस्ता मिठाई और स्नैक्स में पडने वाला पिस्ता स्वास्थ्य के लिये बहुत अच्छा होता है। पिस्ता में मैग्नीशियम, कॉपर, रेशा, फास्फोरस और विटामिन बी होता है। इसको खाने से कोलेस्ट्रॉल और हार्ट अटैक से बचा जा सकता है


धनिया के आठ चमत्कारी फायदे 
धनिया के 8 फायदे --- एसिडिटी और आँखों की जलन दूर करने में भी कारगर
भारतीय रसोई में धनिये का इस्तेमाल काफी उपयोगी होता जा रहा है. मसालों और व्यंजनों में स्वाद की मात्रा बढ़ाने और स्वादिष्ट बनाने के लिए इसका उपयोग किया जाता है. खास तौर पर इसकी हरी पत्तियों का इस्तेमाल तो हर घर में किया जाता है साथ ही इसके सूखे हुए बीज भी बहुत ही उपयोगी होते है. धनिये के इतने गुणों के कारण इसका महत्व इतना बढ़ गया है कि विज्ञान भी इसके अनेक औषधीय गुणों की प्रसंशा करता है. आज हम आपको बताएँगे धनिये के अनेक गुण जो हमें होने वाली बिमारियों से छुटकारा दिलवाते है, इस प्रकार है
(1) आँखों की जलन दूर करता है :
आँखों की जलन दूर करने के लिए सबसे पहले हमें एक प्रकार का चूर्ण बनाना है. चूर्ण को तैयार करने के लिए सौंफ, मिश्री तथा धनिये के बीजो को समान मात्रा लेकर उनकी पिसाई करके चूर्ण तैयार किया जाता है. अब इस चूर्ण का सेवन भोजन के बाद किया जाता है. 6 ग्राम चूर्ण का सेवन करने से आँखों व हाथ पैरों की जलन से छुटकारा पाया जा सकता है. साथ ही पेशाब में होने वाली जलन तथा सिरदर्द में भी आराम मिलता है. 
(2) गैस से छुटकारा दिलाने में सहायक
स्वास्थ्य सुधार के लिए धनिये की चाय काफी महत्वपूर्ण साबित होती है. लगभग दो कप पानी लिया जाता है इसके बाद पानी में जीरा व धनिया डाल लिया जाता है. इसके बाद चाय पत्ती व थोड़ी मात्रा सौंफ की डाल कर लगभग 2 मिनट तक इसको खौलाया जाता है. 2 मिनट खुलने के बाद इसमें घोल में जरुरत के अनुसार शक्कर डाल दी जाती है और साथ ही अदरक भी डाल दिया जाता है. इसे और स्वादिष्ट बनाने के लिए कई बार शक्कर की जगह इसमें शेहद को मिला लिया जाता है. अब इस बने हुए घोल को सेवन करने से पाचन सम्बन्धी समस्याओ में आराम मिलता है साथ ही गैस से परेशानी से भी छुटकारा मिलता है. गले में होने वाली समस्याएँ भी दूर की जा सकती है.
(3) नकसीर दूर करने में सहायक
नकसीर में आराम पाने के लिए सबसे पहले एक प्रकार का रस तैयार किया जाता है. इस रस को तैयार करने के लिए हरे धनिये की 20 ग्राम पत्तियां ली जाती है. अब इसमें थोड़ा लगभग चुटकी भर कपूर मिला लिया जाता है. इसके बाद इनको पीस लिया जाता है. पीस लेने के बाद तैयार रस को छान कर रस को अलग कर लिया जाता है. तैयार रस को दो बूंदों को नाख के दोनों छिद्रों में दोनों तरफ टपका लेना चाहिए साथ ही रस को माथे पर लगा कर हल्का मलने पर नाख से निकलने वाला खून तुरंत ही बंद हो जाता है. 
(4) आँखों से पानी गिरने की समस्या का इलाज 
आँखों में पानी गिरने की समस्या का इलाज करने के लिए थोडा से ताजा हरा धनिया ले. अब इसको कूट कर पानी में थोड़ी देर तक उबाल ले. थोड़ी देर उबलने के बाद इसको ठण्डा कर ले. ठण्डा होने के बाद इसको एक मोटे कपडे में छान कर किसी बंद डब्बे ,शीशी या बर्तन में रख ले. रोजाना इसकी दो दो बुँदे आँखों में टपकते रहे. इसे इस प्रकार इस्तेमाल करने से आँखों में जलन से आराम महसूस होता है और पानी गिरने की समस्या से भी छुटकारा मिलता है.
(5) मासिक धर्म में होने वाली समस्याओं का समाधान
लगभग आधा लीटर पानी ले और इसमे 6 ग्राम धनिया डाल कर खौलाएं. अब इसमें थोड़ी शक्कर मिला लें. इस प्रकार तैयार घोल को पी लें. यह महिलाओं की मासिक धर्मं सम्बंधित समस्याओं को दूर करने में मदद करता है.
(6) त्वचा के लिए फायदे
धनिये का इस्तेमाल त्वचा के लिए बहुत ही असरदारक साबित होता है. धनिया का सेवन खून में इन्सुलीन की मात्र को नियंत्रण में रखता है. धनिये के इस्तेमाल से मधुमेह को भी खत्म किया जा सकता है.इस प्रकार हम कह सकते है कि धनिये का सेवन हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभकारी है
(7) मुहासों और काले धब्बो से छुटकारा 
धनिये के चूर्ण से मुहासों को ख़त्म किया जा सकता है और साथ ही चेहरे पर हुए काले धब्बे भी हटाये जा सकते है. इसके लिए हमें एक प्रकार का लेप तैयार करना पड़ेगा जिसकी विधि इस प्रकार है : धनिये की कुछ पत्तियां लो और इनको पीस लो. अब इसकी पिसी हुयी पत्तियों की कुछ मात्रा में एक चुटकी भर हल्दी मिला लो. अब इस तैयार हुए लेप को दिन में दो बार चेहरे पर लगा ले. इस प्रकार ऐसा रोजाना करने से जल्दी ही मुहासों और काले धब्बो से छुटकारा मिलता है और साथ ही चेहरे की सुन्दरता भी बढती है. 
(8) सर्दी और खांसी में आरामदायक
सर्दी और खांसी से बचने के लिए एक प्रकार का काढ़ा बहुत ही महत्वपूर्ण इलाज है. सर्दी और खांसी से ग्रस्त बच्चो और बड़ो के लिए भी यह काढ़ा बहुत ही फायदेमंद है. यह काढ़ा धनिया , जीरा और बच की बराबर मात्र को लेकर बनाया जाता है_ रात्री मे दो चम्मच हरे धनिये का रस प्रतिदिन सेवन करने से गहरी नींद आने मे सहायक है

आवश्यक जानकारी बिना पढ़े मत छोड़ना _ नीचे दिया हुआ पूरा लेख पढ़िये
इन पांच चीज़ों को दोबारा गर्म करके खाना ज़हर खाने के समान है
ताज़ा भोजन खाने में जितना ज़ायकेदार होता है उतना ही सेहतमंद भी होता है. लेकिन ज्यादातर घरों में जब भी खाना खाने से बच जाता है, तो उसे फ्रिज में रख देते हैं और फिर उसे दोबारा गर्म करके खाते हैं. वैसे भोजन पकाने के बाद उसे बहुत देर तक नहीं रखना चाहिए, ऐसा करने से उसके पोशक तत्व नष्ट हो जाते हैं

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ताज़ा भोजन खाने में जितना ज़ायकेदार होता है उतना ही सेहतमंद भी होता है

लेकिन ज्यादातर घरों में जब भी खाना खाने से बच जाता है, तो उसे फ्रिज में रख देते हैं और फिर उसे दोबारा गर्म करके खाते हैं
वैसे भोजन पकाने के बाद उसे बहुत देर तक नहीं रखना चाहिए, ऐसा करने से इसमें मौजूद पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं लेकिन कई ऐसी चीजें हैं जिन्हें दोबारा गर्म करके कभी भी नहीं खाना चाहिए, क्योंकि इन चीज़ों को दोबारा गर्म करके खाना ज़हर के समान खतरनाक हो सकता है
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आइए हम आपको बताते हैं कि वो कौन सी पांच चीज़ें जिन्हें दोबारा गर्म करके खाना ज़हर खाने के समान है

1 – चिकन
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ताज़ा बना हुआ चिकन खाना सेहत के लिए फायदेमंद होता है लेकिन चिकन को दोबारा गर्म करके खाना सेहत के लिए घातक हो सकता है. चिकन को दोबारा गर्म करने से इसमें मौजूद प्रोटीन नष्ट हो जाता है. चिकन को दोबारा गर्म करके खाने से पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं

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2 – आलू

आलू सेहत के लिए फायदेमंद होते हैं लेकिन इन्हें पकाकर बहुद देर तक नहीं रखना चाहिए. पके हुए आलू का ज्यादा देर तक रखने से इनमें मौजूद पोषक तत्व समाप्त हो जाते हैं और इसे दोबारा गर्म करके खाने से पाचन क्रिया पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है

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3 – चुकंदर

अगर आप चुकंदर को पकाते हैं और खाने के बाद जब यह बच जाता है तो इसे दोबारा गर्म करके नहीं खाना चाहिए. ऐसा करने से इसमें मौजूद नाइट्रेट समाप्त हो जाता है. अगर खाने के बाद चुकंदर बच जाता है, तो इसे फ्रिज में रख दें और अगली बार खाने से कुछ घंटे पहले फ्रिज से बाहर निकाल दें और इसे गर्म किए बगैर ही खाएं

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4 – मशरूम

मशरूम में भरपूर मात्रा में प्रोटीन होता है. इसलिए हमेशा ताज़ा मशरूम खाना ही फायदेमंद होता है. मशरूम को दोबारा गर्म करके खाने से इसमें मौजूद प्रोटीन का कॉम्पोजिशन बदल जाता है और ये सेहत के लिए ज़हर के समान साबित हो सकता है

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5 – पालक

पालक को दोबारा गर्म करके खाना सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है. इससे कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है. इसमें मौजूद नाइट्रेट दोबारा गर्म करने के बाद कुछ ऐसे तत्वों में बदल जाते हैं जिससे कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है

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*बहरहाल ताज़ा खाना जितना सेहतमंद होता है, उतना ही हानिकारक होता है बासी खाने को गर्म करके खाना. खासकर इन पांच चीजों को कभी भी दोबारा गर्म करके खाने की गलती न करें, नहीं तो ये सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं*
त्रिफला लेने के नियम _
दो तोला हरड बड़ी मंगावे |तासू दुगुन बहेड़ा लावे ||
और चतुर्गुण मेरे मीता |ले आंवला परम पुनीता ||
कूट छान या विधि खाय|ताके रोग सर्व कट जाय ||
त्रिफला का अनुपात होना चाहिए :-
1:2:3=1(हरद )+2(बहेड़ा )+3(आंवला )
त्रिफला लेने का सही नियम 
*सुबह अगर हम त्रिफला लेते हैं तो उसको हम "पोषक "
कहते हैं |क्योंकि सुबह त्रिफला लेने से त्रिफला शरीर
को पोषण देता है जैसे शरीर में vitamine
,iron,calcium, micro nutrients की कमी को पूरा
करता है एक स्वस्थ व्यक्ति को सुबह त्रिफला खाना
चाहिए |
*सुबह जो त्रिफला खाएं हमेशा गुड के साथ खाएं |
*रात में जब त्रिफला लेते हैं उसे "रेचक " कहते है
क्योंकि रात में त्रिफला लेने से पेट की सफाई (कब्ज
इत्यादि )का निवारण होता है |
*रात में त्रिफला हमेशा गर्म दूध के साथ लेना
चाहिए |
नेत्र-प्रक्षलन : एक चम्मच त्रिफला चूर्ण रात को एक
कटोरी पानी में भिगोकर रखें। सुबह कपड़े से छानकर
उस पानी से आंखें धो लें। यह प्रयोग आंखों के लिए
अत्यंत हितकर है। इससे आंखें स्वच्छ व दृष्टि सूक्ष्म
होती है। आंखों की जलन, लालिमा आदि तकलीफें
दूर होती हैं।
कुल्ला करना : त्रिफला रात को पानी में
भिगोकर रखें। सुबह मंजन करने के बाद यह पानी मुंह में
भरकर रखें। थोड़ी देर बाद निकाल दें। इससे दांत व
मसूड़े वृद्धावस्था तक मजबूत रहते हैं। इससे अरुचि, मुख
की दुर्गंध व मुंह के छाले नष्ट होते हैं।
- त्रिफला के गुनगुने काढ़े में शहद मिलाकर पीने से
मोटापा कम होता है। त्रिफला के काढ़े से घाव
धोने से एलोपैथिक- एंटिसेप्टिक की आवश्यकता
नहीं रहती। घाव जल्दी भर जाता है।
- गाय का घी व शहद के मिश्रण (घी अधिक व शहद
कम) के साथ त्रिफला चूर्ण का सेवन आंखों के लिए
वरदान स्वरूप है।
- संयमित आहार-विहार के साथ इसका नियमित
प्रयोग करने से मोतियाबिंद, कांचबिंदु-दृष्टिदोष
आदि नेत्र रोग होने की संभावना नहीं होती।
- मूत्र संबंधी सभी विकारों व मधुमेह में यह फायदेमंद
है। रात को गुनगुने पानी के साथ त्रिफला लेने से
कब्ज नहीं रहती है।
- मात्रा : 2 से 4 ग्राम चूर्ण दोपहर को भोजन के
बाद अथवा रात को गुनगुने पानी के साथ लें।
- त्रिफला का सेवन रेडियोधर्मिता से भी बचाव
करता है। प्रयोगों में देखा गया है कि त्रिफला की
खुराकों से गामा किरणों के रेडिएशन के प्रभाव से
होने वाली अस्वस्थता के लक्षण भी नहीं पाए जाते
हैं। इसीलिए त्रिफला चूर्ण आयुर्वेद का अनमोल
उपहार कहा जाता है।
सावधानी : दुर्बल, कृश व्यक्ति तथा गर्भवती स्त्री
को एवं नए बुखार में त्रिफला का सेवन नहीं करना
चाहिए

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