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गर्भावस्था के दौरान पीठ दर्द


गर्भावस्था के दौरान पीठ दर्द की समस्या को कैसे दूर करें


गर्भावस्था किसी भी महिला की जिंदगी के खुशनुमा दौर में से एक होता है | पर, जरूरी नहीं कि गर्भावस्था के ये 9 माह उतने ही खुशनुमा बीतें, जितना TV और फिल्म के माध्यमों में दिखाया जाता है | पीठ दर्द की समस्या गर्भावस्था के दौरान बेहद आम है |

कैसे प्राकृतिक तरीके से इस समस्या से छुटकारा पाएं, आइए जानते हैं :

क्या है सियाटिका :

वैसे तो सियाटिका कमर से जुड़ी हुई समस्या है, लेकिन प्रेग्नेंट महिलाएं अक्सर इसकी शिकार हो जाती हैं | प्रेगनेंसी के तीसरी तिमाही में यह बीमारी गर्भवती महिला को अपना शिकार बनाती है | दरअसल, प्रेगनेंसी के दौरान गर्भाशय का आकार बढ़ने लगता है | जो रीड की हड्डी के निचले भाग में स्थित सियाटिका नामक नस पर दबाव डालने लगता है, इससे कमर के निचले भाग में दर्द होने लगता है |

गर्भावस्था की तीसरी तिमाही में जब बच्चा पूर्ण रूप से विकसित होने लगता है | और जन्म लेने की स्थिति में पहुंचने लगता है | तो दबाव सीधे तौर पर सियाटिका नस पर होता है | जिससे कमर के नीचे भाग में बेहद दर्द होने लगता है | यह दर्द धीरे-धीरे पैरों तक पहुंच जाता है |

सियाटिका के मरीजों में कमर में बेतहाशा दर्द और सूजन हो जाती है | सियाटिका का दर्द असहनीय हो जाता है | यह दर्द हिप ज्वाइंट से प्रारंभ होकर, धीरे-धीरे तेज होती हुई पैर के अंगूठे तक फैलती है | इसमें घुटने और टखने के पीछे भी काफी दर्द रहता है | कभी-कभी शरीर के ये अंग सुन्न पड़ जाते हैं | कई बार पैरों में जलन भी होती है और पैर सो जाते हैं | कभी-कभी एक ही पैर की एक भाग में दर्द होता है | और दूसरा भाग सुन्न हो जाने का एहसास देता है | एमआरआई, EMG तथा एनसीपी जैसी कई जांच प्रक्रिया आए हैं | जिनके माध्यम से दर्द का कारण मालूम किया जा सकता है |


प्राकृतिक तरीके से उपचार :-

1. पाचन प्रणाली को दुरुस्त करना :

प्राकृतिक तौर पर स्वस्थ रहने के लिए पाचन प्रणाली का दृश्य होना आवश्यक होता है | जब पाचन प्रणाली सही तरीके से काम नहीं करती है | तो कई तरह की बीमारियां हमला बोलती हैं | होलिस्टिक उपचार में सबसे पहले बेहतर आहार से पाचन प्रक्रिया को दूरुस्त किया जाता है |

2. डिटॉक्सीफिकेशन : शरीर में वायु, भोजन व जल के माध्यम से जहरीले पदार्थ प्रवेश करने लगते हैं | ऐसे में उन्हें शरीर से निकालने का प्रयास किया जाता है | आहार में अन्य विकल्प जैसे ताजे फल व सब्जियों का रस, अनाज, आंवला, तुलसी, सहजन, सेब, रसभरी, अंगूर आदि को शामिल कर शरीर का डिटॉक्सीफिकेशन किया जाता है | व्यायाम आदि के जरिए भी शरीर से जहरीले पदार्थ निकलने का प्रयास किया जाता है |

3. शरीर में अम्लीय पदार्थों का संतुलन :
जब हम पैदा होते हैं तो हमारे शरीर में भरपूर मात्रा में एल्कलाइन होता है, इसलिए युवा आसानी से कुछ भी खा कर पचा लेते हैं |लेकिन जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ने लगती है तो शरीर में एसिड की मात्रा अधिक होने लगती है | इस एल्कलाइन असंतुलन से शरीर कई बीमारियों की भेंट चढ़ जाता है | ऐसे में, अधिक से अधिक तरल पदार्थों का सेवन फायदेमंद होता है |

4. पौष्टिक पदार्थ :

उपचार के दौरान मरीज को कई पौष्टिक पदार्थों का सेवन करने के लिए प्रेरित किया जाता है | उन्हें ऐसे पदार्थों का सेवन करने के लिए कहा जाता है | जिसमें एंटीऑक्सीडेंट्स, विटामिन, मिनरल, फैटी एसिड आदि हों | साथ ही उन्हें इन सबसे भरपूर दवाइयां भी दी जाती हैं |

5. शारीरिक संतुलन :



जब शरीर की हड्डियां और मांसपेशियां सही अवस्था में न हों, तो शारीरिक असंतुलन होने लगता है | होलिस्टिक उपचार के दौरान व्यायाम कराया जाता है ताकि मांसपेशियां मजबूत हो सकें | फिर जोड़ों को व्यवस्थित कर रीड की हड्डी के बीच में आए रिक्तता को ठीक किया जाता है |इस उपचार में रस्सियां, लकड़ी की ईंटें, स्टरैप हुक, तकिया, बेडशीट आदि का इस्तेमाल किया जाता है |

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