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सहवास करने के दौरान खूबसूरती कैसें बढ़ाएं


सहवास करने के दौरान खूबसूरती कैसें बढ़ाएं

किसी भी व्यक्ति की खूबसूरती पर उसके लंबी चलने चलने सहवास क्रिया का बहुत असर पड़ता है। यह क्रिया एक तो शरीर के अन्दर के अंगों की मालिश करती है, शरीर में खून के बहाव को बढ़ाती है वैसे ही यह शरीर को स्वस्थ और मजबूत और चुस्त बनाती है। संभोग के समय वीर्य को जल्दी निकलने से रोकने के लिये आप संभोग से पहले की क्रियाओं को देर तक चला सकती है। इसके लिये सबसे पहले पुरुष के लिंग को पूरी तरह उत्तेजित होने दें और उसे उत्तेजना की अवस्था में ही बनाए रखें। मगर इस सब क्रिया में खुद को इतना मत उत्तेजित होने दीजिए कि वीर्यपात हो जाए। सहवास के दौरान एक दूसरे के शरीर के अंगों से छेड़छाड़ करने से यौन तनाव भरी मात्रा में बढ़ जाता है तथा आप उसको जितनी देर तक रोक कर रखेंगी उतना ही आपकी खूबसूरती में बढ़ोतरी होगी। संभोग करते समय मुंह से निकलने वाली लंबी सांसों को लेने से दिल तेज गति से धड़कता है तथा शरीर में खून का बहाव बढ़ता है। जिससे शरीर में खून की मात्रा बढ़ जाती है जो त्वचा को मुलायम और जवान बनाती है। संभोग क्रिया में कोषों को भी जितना खून चाहिए उतने ही मात्रा मिलती है जिससे शरीर के सारे अंग अच्छी तरह से काम करते है। संभोग करने की क्रिया में ज्यादा समय बिताना चाहिए जल्दी नहीं करनी चाहिए। आप ने जब सोच लिया है कि आपने आज दुनिया का सारा आनन्द लेना है तो बाकी सब कुछ भूल जाए। संभोग क्रिया की लंबी अवधि आपको बहुत आनन्द तो देती ही है साथ ही काफी समय तक आपकी खूबसूरती का उपचार भी करती है। अगर आपने अभी तक संभोग क्रिया का आनन्द नहीं लिया है तो बिना झिझक के अपने पति से बात करे और उन्हें बताएं कि आपको किस से उत्तेजना मिलती है। जब तक आपको संभोग क्रिया में मजा नहीं आएगा तब तक आपको कोई फायदा नहीं होगा और वो सुख का अवसर बनने के स्थान पर दर्दनाक काम बन जायेगा। इसलिए अपने बैडरूम में आपकों सहवास क्रिया में आनन्द लेने के लिये चाहे कितना भी बेशर्म बनना पड़े तो बनने में कोई हर्ज नहीं है। ऐसा करने से आपको अपने पति से प्यार ही मिलेगा क्योंकि जिस क्रिया में आपको आनन्द आयेगा उस में ही आपके पति को भी खुशी मिलेगी। संभोग करने की क्रिया कभी भी एक तरफ से नहीं होती इसमें अपने साथी को देने का नाम ही लेना होता है। जब-तब को छोड़ देना चाहिए अगर उत्तेजना के समय संभोग करने का नाम पहले आप पर आता है तो आने दें। यह पुरुषों के लिये ज्यादा खास होता है क्योंकि वो अपनी साथी से पहले यौनसुख को भोगता है। वीर्य निकलने से रोक देने से संभोग करने से मिलने वाली खूबसूरती बढ़ जाती है। अगर आपको लगता है कि आपका साथी संभोग क्रिया करते समय संभोग के आखिरी पड़ाव पर पहुंच गया है तो वीर्य को निकलने से रोकने के लिये लिंग पर अपना हाथ रखकर अपने अंगूठे को लिंग के साथ ऊपर ले जाने वाली नस पर रख दें। फिर अंगूठे से उस पर जोर से दबाव देकर छोड़ दें। लिंग की नस पर दिया गया यह दबाव वीर्य को ग्रन्थि में नहीं आने देता जिससे की वीर्यपात नहीं हो पाता अब इस संभोग करने के समय को जितना चाहे बढ़ाएं और देखें कि इससे आपके शरीर की खूबसूरती कितनी बढ़ती है। अगर आपका शरीर स्वस्थ है तो आपकी आत्मा भी जरूर खुश होगी।

सहवास करने के लाभ-

संभोग क्रिया करने के दौरान अगर स्त्री को मिलने वाला यौनसुख केवल शरीर को सुकून पहुंचाने को स्रोत नहीं होता बल्कि यह किसी भी बदसूरत व्यक्ति को खूबसूरत बना सकता है। यौनसुख बस एक साधारण शारीरिक प्रतिक्रिया होती है। थोड़े समय में रोजाना यौनसुख भोगने वाली स्त्री में सिर से लेकर पैरों के नाखूनों तक बदलाव आता है। संभोग क्रिया करते समय ग्रंथियों में उत्तेजना बढ़ जाती है और इस क्रिया के अन्त में मुश्किल प्रतिक्रियाएं होती है तथा पिट्यूररी ग्रन्थि खून में हार्मोन्स का स्राव करती है जो यौन अंगो में प्रतिक्रियाओं को बढ़ाते है। संभोग करने की इच्छा के लिये यौन हार्मोन्स होना जरूरी है। पिट्यूटरी ग्रन्थि को मास्टर यौन ग्रथि कहा जाता है क्योंकि इसके हार्मोन्स शरीर की दूसरी यौन ग्रंथियों पर अधिकार रखते है। यह ग्रन्थि अलग-अलग हार्मोन्स को अलग-अलग यौन ग्रन्थियों तक इस सन्देश के साथ भेजती है कि वो अपने खुद के हार्मोन्स को भरने के लिये तैयार रहे। ये यौन ग्रन्थिया जब एक बार खुद एक बार हार्मोन्स से भर जाती है तो पिट्यूटरी ग्रन्थि को सन्देश भेजती है, अब हम खुद सावधान है और हमे तुम्हारी मदद की कोई जरूरत नहीं है। इन सब ग्रन्थियों का व्यक्ति को जवान बनाए रखने और उसकी खूबसूरती बनाए रखने से सीधा संबध होता है। सहवास करने के दौरान खून को बहाने वाली नसों पर काबू रखने वाली छोटी मांसपेशियां अनैच्छिक रुप से सिकुड़ जाती है जिसके कारण स्त्रियां अपनी पूरे शरीर में गर्माहट सी महसूस करती है। छोटी खून को बहाने वाली नसें शान्त रहकर शरीर में बहुत ज्यादा खून और गर्माहट लाती है। इसी कारण से कभी-कभी पूरे शरीर की त्वचा में लालपन आ जाता है। यह प्रक्रिया त्वचा के लिए बहुत अच्छी चिकित्सा का काम करती है क्योंकि यह त्वचा की परतों में खून के बहाव को बढ़ा देती है तथा शरीर के रोम छिद्रों में तेल और नमी को पहुंचाती है जिससें त्वचा को जवानी और चमक मिलती है। त्वचा के अन्दर नमी के जमा होने से त्वचा के कमजोर होने की प्रक्रिया रूक जाती है जिससे त्वचा मुलायम और खूबसूरत बनी रहती है। संभोग क्रिया त्वचा के अलावा बाकी शरीर को भी स्वस्थ और चुस्त बनाए रखने में मदद करती है।

चिकित्सा-

फेफड़े-

सहवास करते समय सांस चलने की गति बहुत ज्यादा तेज हो जाती है जिसके कारण शरीर में ज्यादा से ज्यादा ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है। जिसके कारण फेफड़े तो अपनी पूरी ताकत के साथ काम करते ही है बल्कि मुंह से निकलने वाली गन्दी सांसों के साथ शरीर के जहरीले पदार्थ भी बाहर आ जाते है।

दिल-

सहवास क्रिया के दौरान पूरे शरीर में खून के घूमने के दौरान खून के चलने की गति पर भी असर पड़ता है जिससे दिल की धड़कन भी नहीं बचती। व्यक्ति के आराम करने के समय नब्ज चलने की गति 72 धड़कन की होती है जो संभोग क्रिया के समय प्रति मिनट 180 हो जाती है इससे दूसरे व्यायामों की तुलना में दिल को ज्यादा काम करना पड़ता है तथा यह रोजाना की क्रिया दिल का दौरा पड़ने के खतरे को कम कर देती है।

आंखें-

संभोग क्रिया करते समय आंखों की पुतलियां सिकुड़ जाती है इससे आंखों के आसपास जो छोटी-छोटी मांसपेशियां होती है उनकी कसरत हो जाती है। इस दौरान बढ़ी हुई खून की रफ्तार आंखों को स्वस्थ और चमकीला बनाती है और आंखों के आसपास छोटी-छोटी झुर्रियां और फुलाव नहीं होने देती है।

बाल-

संभोग क्रिया करते समय बढ़ी हुई उत्तेजना के दौरान दिल की धड़कन की रफ्तार तेज होने से पूरे शरीर में तेज गति से खून का संचार होता है। यह खून शरीर के दूसरे अंगों में पहुंचने के साथ-साथ बालों की जड़ों में भी पहुंचकर उनका पोषण करता है। सिर के बालों को उस समय ज्यादा लाभ मिलता है जब आप संभोग क्रिया के समय बिस्तर पर बिना तकिया लगाए बिल्कुल सीधी लेटी रहती है तथा संभोग की किसी दूसरी मुद्रा में नहीं होती है।

भुजा तथा टांगे-

सहवास के समय आप की भुजाओं की मांसपेशिया बिना इच्छा के ही सिकुड़ जाती है जिससे आपकी भुजाएं मजबूत और सुडौल लगती है। ऐसे ही टांगों की मांसपेशियां भी सिकुड़ जाती है यहां तक कि पैरों की उंगलियां भी मुट्ठी की तरह भिंच जाती है। इसलिये सहवास से ना केवल आपको सुकून मिलता है बल्कि पिण्डली, जंघा, पंजे और उंगलियों की मांसपेशियां भी मजबूत होती है।

पेट की मांसपेशियां-

संभोग क्रिया करते समय पेट की मांसपेशियों में बिना इच्छा के सिकुड़ापन आ जाता है तथा संभोग के दौरान शरीर को बिस्तर पर उठाने से पेट की मांसपेशिया तन जाती है जिससे उनमें कसाव पैदा होता है और वह मजबूत बन जाती है।

गाल-

सहवास करते समय पूरे शरीर के साथ चेहरे की मांसपेशिया भी एकदम कस सी जाती है। रोजाना संभोग करने से चेहरा भर जाता है। अगर आप के गाल पिचके हुए है तो रोजाना संभोग करने से वह भर जाएंगे। इसके साथ ही इस क्रिया में गर्दन की मांसपेशियों के अन्दर खिंचाव आता है जिससे गर्दन मुलायम और सुन्दर बन जाती है और जबड़े वाला हिस्सा भी पिलपिला सा नहीं रहता है। ठोड़ी भी दोहरी होने से बच जाती है। इसलिये हमेशा के लिये मजबूत और आकर्षक शरीर चाहते है तो जी भर के सहवास का लाभ उठाइयें।

श्रोणी मांसपेशियां-

सहवास करते समय शरीर का एकदम कठोर हो जाना नितंबों के नीचे के भाग की मांसपेशियों में कसाव पैदा करता है और उन्हे ढीला पड़ने से बचाता है। आप की ये सिकुड़न जितने ही लंबे समय के होंगी आप की मांसपेशियां उतनी ही मजबूत बनेगी।


सहवास को मादक कैसे बनायें


सहवास को मादक कैसे बनायें ?

बेहतर सहवास के लिये क्या आप जानते हैं कि महिला चाहती क्या है? बेडरूम में उसे उन्मत्त (जंगली ) की तरह चलाइए और इस शानदार ड्राइव का दोनों आनंद उठाइये. और यहां गलतियां माफ हैं. यहां आप अपनी सहवास क्षमता का पूरा और सही प्रयोग करें. इसके साथ ही यह सुनिश्चित करें की जब भी वह आप के साथ सहवास कर रही है तो वह तीव्र उत्साह और उत्तेजना में हो और वह आपमें आनंद ढूंढ़े. कुछ ऐसे तरीके हैं जिन्हें अपनाने के बाद नकली उत्तेजना की आवश्यकता नहीं पड़ती. यहां अपनी पत्नी या पार्टनर के बेहतर सहवास का आनंद देने के कुछ तरीके बताए जा रहे हैं -

कैसे बहकाएं पत्नी को :
महिला को बहकाना हमेशा पुरुषों के लिए चुनौती होता है. किन्तु किसी अवसर पर जीवन साथी को बहकाने का अच्छा प्रतिफल मिलता है.
शादी के कुछ सालों बाद कुछ जोड़े पाते हैं कि सहवास और दृढ़ता अपनी वास्तविक चमक खोती जा रही है साथ ही दिन-ब-दिन सहवास करना सिर्फ एक रुटी उद्देश्य रह जाता है. जो कि उनकी कल्पनाशीलता और उत्तेजना को कम करता जाता है.
एक समय यह क्रिया विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण हो जाती है जब महिला एक बच्चे को जन्म देती है. अक्सर बच्चे के जन्म के बाद महिला विशेषतःअन सेक्सी महसूस करती है. यह कठोर सोच उन्हे एक बड़े परिवर्तन के तहतउसे शारीरिक और मानसिक रूप से नीचे ले जाते हैं. बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं की यह सामान्य सोच बन जाती है कि वह पहले मां है बाद में प्रेमिका.
एक आदमी इस परिस्थिति को समझते हुए तरीके से अपने पार्टनर को आकर्षक और सेक्सी बना सकता है. इसका सबसे बेहतर तरीका है कि पॉजिटिव प्रयासों से अपने पार्टनर को बहकाएं (उत्तेजित करें )
ज्यादातर आदमी इस परिस्थितियों से उकता कर नए प्रेम प्रसंगों के प्रलोभन से जुड़ने का प्रयास करते हैं, जबकि यह उचित नहीं है. यदि आप अपने जीवन साथी को बहकाने जा रहे हैं या प्रयास कर रहें हैं तो यह आपको उन प्रलोभनों की वास्तविकता से बेहतर क्षण प्रदान करेगा. ऐसे में विशेषतः ज्यादातर महिलाएं रोमांस और पूर्वज्ञान से आनंदित होकर पुरुषों को पू्र्ण आनंद देती हैं.

अच्छी तरह बढ़ कर तैयारी करें :
अपने पूर्व ज्ञान को आधे मजाक का रूप दें. यह बहकावे के प्लान को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है. कुछ लोग बहकावे को लेकर उन क्षणों की तैयारी का आनंद उठाते हैं.
यदि आपके कोई बच्चा है तो उसकी कोई उचित व्यवस्था पहले से कर दें ताकि बाद के अंतिम लम्हों में आपको किसी प्रकार की हिचक न हो. यह अरेंजमेंट हर उस स्थान में कर सकते हैं. जहां का आप इरादा रखते हैं. स्थान को लेकर संकोच नहीं करना चाहिये. यदि आप बाहर खाना सुनिश्चित करते हैं तो मैं यह विश्वास दिलाता हूं कि यह एक बेहतर अवसर है जहां आपकी पत्नी काफी इन्ज्वाय करेगी. ठीक ऐसी ही परिस्थितियां तब भी होंगीं जब आप अपरान्ह का फिल्म शो देखने का मन बनाते हैं.
बहलाने का कोई भी मौका मिलता है तो उसे न छोड़ें. यही स्थिति ऐसी होगी जब आपकी पत्नी यह सहजता से सोचेगी कि आप उसे कितना चाहते हैं. कभी-कभी उसे उपहार भी दें . जैसे उसकी बगैर जानकारी के उसके लिये उसका पसंदीदा परफ्यूम लाकर दें या फिर कोई सहवासी सा अण्डरवियर उसे गिफ्ट करें. ऐसे में जब भी वह इनका प्रयोग करेगी आपको याद करे रोमांचित होगी.

दिन का समय :

शाम के बेहतर बहकावे के लिये अपरान्ह में दोनों के बीच कोई गैर सेक्सुअल हरकत अच्छे वार्म- अप का काम करती है. कोई रोमांटिक फिल्म देखने जाएं या फिर मौका मिलने पर पैदल साथ-साथ बाजार घूमने निकल जाएं. इस तरह के कई अवसर उन्हें बहलाने के बेहतर साधन हो सकते हैं. इससे वे एक ओर तो पारिवारिक दबाव से मुक्त होगी साथ ही उसे एक नएपन का भी एहसास होगा.

सुहानी शाम और डिनरः
शाम की शुरुआत कैंडल लाइट डिनर से की जा सकती है. जो कि या तो किसी मनपसंद रेस्टोरेंट में हो सकता है या फिर घर में ही इसकी तैयारी की जा सकती है, वह भी बगैर घर की किचन में बगैर समय गवांए. भोजन करने के दौरान न तो ज्यादा खाएं न ही ज्यादा पियें और न ही एक दूसरे को ज्यादा के लिये प्रेरित करें.
साथ ही इस बात का ख्याल रखना चाहिये कि क्या खा रहे हैं. निश्चित मात्रा का भोजन खाने में काफी सहवासी होता है, और आदमी इसे और बेहतर बना सकता है. इस दौरान अपनी पत्नी को अपनी डिश चखाएं और उसकी डिश का भी आनंद ले. यह सब बिना झिझक और औपचारिकता के करें.
बस यहीं से बहकाने का सेक्सुअल पार्ट शुरू होता है, लेकिन यह कार्य अब भी आधा किया जा चुका है.

आपस में छेड़छाड़ करें
आपसी छेड़छाड़ दो प्रेमियों के बीच का महत्वपूर्ण फोरप्ले होती है. इस दौरान धीमी लाइट जलाकर कोई पसंदीदा संगीत चालू कर लें. छेड़छाड़ के बीच-बीच में एक दूसरे को किस करने का मौका न गंवाएं साथ ही एक दूसरे से चिपक कर लेटे.इस दौरान पूरी सौम्यता बरते न कि सीधे सहवास के लिए उन्मुख हो जाएं.

उसके कपड़े उतारें
छेड़छाड़ के दौरान धीरे-धीरे उसके कपड़े उतारें और उसके सुंदर शरीर की तारीफ करने से न चूके. उसे यह बताएं की उसकी वजह से आप किस तरह ऑन होते हैं. यही वह प्वांइट होगा जब आप दोनों को एक दूसरे की गर्मी और उत्तेजना का अहसास होना शुरू हो जाएगा. अब जबकि उसके बदन में नाम मात्र के कपड़े बचे हों तो उसे भी इस क्रिया में सहभागी बनने को कहें. यह उसके लिये भी एक वास्तविक टर्न ऑन होगा, ठीक उसी तरह जैसे की आपका.
जब वह पूरी तरह कपड़े उतार चुकी हो तब वगैर वक्त गंवाए उसके शारीरिक सौंदर्य का महिमामंडन कर लें, साथ ही सहवासी कमेंट पास करें. इस दौरान के सहवासी कमेंट उसे शारीरिक रूप के अलावा मानसिक रूप से भी उत्तेजित करते हैं.

रतिक्रिया
यदि अभी तक सब कुछ ठीक रहा है तो यह स्टेज आपके कुछ हटकर आनंद देने वाली है.
इसके लिये आप उसे अपनी टांगे फैला कर लेटने को कहें और धीरे-धीरे उसके शरीर को नख से सिर तक दुलारें. जगह-जगह दबाएं यदि उसे पसंद हो. उसके स्तनों को खरोंचते हुए दबाएं ताकि उसे एक मीठे दर्द का अहसास हो साथ ही इस दौरान स्तन के निप्पल को भी खींचे. बीत-बीच में इन सभी अंगों को मसलें. अब आप देखेंगे की उसकी उत्तेजना कैसे उसके चेहरे पर झलकने लगी है, जिसकी गवाही उसका शरीर भी देने लगेगा.
अब उसके भग और भगशिश्न को सहलाएं. आप पाएंगे कि वह तीव्र उत्तेजित हो गई है. इस दौरान आप हर उस हरकत को बढ़ावा दे जिसपर आप पाएं कि ऐसा करने पर उसे आनंद की अनुभूति हो रही है और वह उत्तेजना के शिखर की ओर बढ़ रही है. अब जबकि वह तीव्र उत्तेजित हो गई है और अच्छी तरह स्निग्ध हो चुकी है तब आप उसकी योनि में पहले एक अंगुली डाले फिर दो … फिर आप वह करें जो उसे पसंद हो…

सहवास का उपयुक्त समय
अब जबकि वह तीव्र उत्तेजित हो चुकी होगी और वह आप से एकाकार होने की इच्छा रखने लगी है. अब यह अहठधर्मी सहवास पोजीशन के साथ सहवास करने का उचित समय है, जो कि उसके लिये नई सनसनाहट पैदा करेगा. इस दौरान बीच-बीच में आप सहवास पोजीशन में बदलाव ला सकते हैं . अब यदि इस दौरान वह एक उत्तेजना के चरम शिखर पर पहुंच कर संतुष्ट हो जाएगी. यदि आप एक और दौर चाहते हैं तो उसकी पसंद के अनुरूप आप दूसरा दौर भी चला सकते हैं.
वहीं यदि आपकी पार्टनर जल्दी ही बच्चे की मां बनने वाली है तो सहवास का तरीका थोड़ा बदलना होगा. इस दौरान गहराई वाले तथा झटकेदार सहवास से बचें . इसके लिए अपने पार्टनर को चरम उत्तेजित करें फिर उसकी योनि पर अपने शिश्न के अग्रभाग को प्रवेश कराकर बगैर गहराई में गए ही सहवास करें. इसके अलावा अपने चिकित्सक से भी सलाह लें.

बेहतर सहवास पोजीशन
सहवास करने के शुरुआती दौर में सबसे पहले वह सहवास पोजीशन चयन करनी चाहिए जो शुरुआती दौर में कम गहराई वाली हो और बाद में गहरे में प्रवेश करता हो. लेकिन याद रखने वाली बात यह है कि दूरदर्शी युगल इन क्षणों की उत्तेजना के तरीके स्वयं खोज लेते हैं और यह आनंददायी स्थितियां जो वे अपने अनुरूप पाते हैं उसे प्रयुक्त करते हैं. यह तरीका किसी भी विशेषज्ञ के बताए तरीके से बेहतर होता है. कुल मिलाकर पोजीशन वह होनी चाहिए जिसमें दोनों को बराबर की आनंदानुभूति हो .
सहवास पोजीशन को लेकर यद्यपि कई अवरोध हैं फिर भी इसे अपनी सुविधानुसार इसका प्रयोग करना चाहिये. सहवास के दौरान पुरुष का ऊपर होना आधार पोजीशन होती है. फिर भी कई बार इसमें प्रवेश गहराई तक नहीं हो पाता है.
इसके लिए बेहतर विकल्प है कि उसके नितम्ब के नीचे कुछ रखें इसके लिए सबसे बेहतर है कि तकिये का प्रयोग किया जाये. इस तरीके में वह अपने नितंब का एंगल बना सकती है. इसलिये जब आप प्रवेश करेंगे तो वह प्रवेश के कोण को नियंत्रित कर सकने में सक्षम होती है. ऐसे में वह सहवास के दौरान आघात पहुंचाने वाले क्षेत्र पर भी नियंत्रण पा सकती है. कुछ मामलों में महिलाएं सहवास के लिए खुद को उपर रखना पसंद करती है. क्योंकि इस स्थिति में वह प्रवेश को और बेहतर तरीके से नियंत्रित कर सकती हैं.

और बाद में
अब जब आप रतिक्रिया पूर्ण कर चुके हैं, अब आप पत्नी पर छोड़ दे कि शाम की शुरुआत का सबसे सुखद अंत क्या होगा. अब वह आपकी बांहों के घेरे में सोना चाहेगी या फिर वह आपसे कुछ चीजों के बारे में बात करना चाहेगी, जो आप दोनों के लिए प्यार भरी और संदेश देने वाली होगी. इस दौरान आप उसे बताएं कि आप उसे कितना प्यार करते हैं और आपको उसकी कितनी आवश्यकता है. इसके अलावा उससे चर्चा करें कि जब आप दोनों साथ में थे तो सबसे ज्यादा आनंददायी क्षण कौन से रहे. फिर आप दिनभर के साथ की चर्चा कर उसमें नई अनुभूति की जान छिड़क सकते हैं. इस सबके दौरान उसके जवाबों पर ध्यान देकर आप अपना नया अनुभव तैयार करें, ताकि अगली बार आप और बेहतर कर सकें..

रूषों को नापंसद है सात बातें यौन-बिस्तर में :- यौन संबंध बनाते वक्त यह बहुत जरूरी है कि इस बात का विरोष ध्यान रखा जाए कि आपके साथी की पंसद नापंसद क्या है। एक अध्ययन के अनुसार खासकर पुरूषों में यौन-संबधो को लेकर खास पसंद-नापसंद होती हैं। इसलिए महिलायों के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि आपके पुरूष साथी को क्या पसंद नही है। हॉंलाकि यह सब बाते सभी जो़डो पर एक समान रूप से लागू नही होती है क्योंकि हम सभी की सेक्स के लिए अलग-अलग आवश्यकताए होती हैं। आइए हम आपको बतातें है कि ऎसी कौनसी सात बाते है जो पुरूषों को अपने साथी के साथ यौन-संबंध बनाते वक्त बिलकुल नापंसद होती है

1. सबसे महत्वपूर्ण व बुरी बात जो पुरूषो को बिल्कुल नापसंद है, वह है कि कुछ महिलाए सेक्स के दौरान कुछ नही करती है, बस एक मृत शरीर की तरह लेट जाती है इस उम्मीद के साथ कि उनका साथी ही सब कुछ करेगा। महिलाओं को चाहिए कि अपने साथी को इस बात का एहसास दिलाए कि आप भी उस समय सेक्स का भरपूर मजा ले रही है। इसलिए महिलाओं को पुरूषों के शीर्ष से शुरूआत कर अंत तक अपनी सुहानी अदाओं से आर्कषित करना चाहिए
2. लगभग सभी महिलाएं इस बात से सहमत है कि उन्हें अपने शरीर पर चुंबन पसंद है ठीक वैसा ही पुरूषों के साथ है वह भी आपके द्वारा अपने शरीर पर किए गए चुंबन व आंलिगन से पागल हो जाते है इसलिए चुंबन व आंलिगनो के इस सिलसिले को लगातार बरकरार रखना चाहिए।
3. कुछ पुराने जमाने की महिलाओं को अब भी लगता है कि बिस्तर पर सेक्स की सारी जिम्मेदारी सिर्फ पुरूष की ही होती है, जो कि बिलकुल गलत है , आपको भी अपनी जिम्मेदारी लेनी चाहिए और अपने साथी को यह एहसास दिलाना चाहिए कि आप सेक्स चाहती है साथ ही यह भी बतायें कि आपके साथी पुरूष को आपके साथ क्या करना चाहिए
4. जैसे हर महिला चाहती है कि पुरूष उसके साथ ब़डी नाजुकत के साथ पेश ऑंए, उसी प्रकार पुरूषों को भी अपने साथ नाजुकता पसंद है। पुरूषों का शरीर भी बहुत नाजुक होता है जो आपके सुहाने स्पर्श से यौन संबंध बनाने के लिए जल्द ही तैयार हो जाता है। इसलिए महिलाओं को सेक्स के दौरान अपने पुरूष साथी को बहुत नाजुकता के साथ भरपूर आनंद देने की कोशिश करनी चाहिए
5. अगर आप स्वंय सेक्स के सुख का अनुभव करना चाहती है तो अपने साथी को भी इसका सुखद अनुभव देना न भूलें। कई बार पुरूष इस विचार में उलझे रहते है कि हमबिस्तर होते वक्त उनकी महिला साथी को उनके द्वारा की गई क्रिया-प्रतिकियाओ की कोई भावना नही है। इसके लिए आपको चाहिए कि आप यौन संबंध बनाते वक्त ये जरूर बताए कि ""आप इसे कितना पसंद करती हैक् "" ""आपको ऎसा करने में कैसा महसूस हो रहा हैक्"" इत्यादि
6. अपने साथी को भ्रमित न करें, कई बार पुरूष ये समझ नही पाते कि उनके द्वारा यौन संबंध बनाते वक्त आपको दिए जाने वाला अनुभव आप पसंद भी कर रही है या नहीक् इसलिए अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में किसी भी प्रकार की शर्म महसूस न करे, कुछ खुशनुमा चीखें व आवाजें निकालते रहें क्योंकि यही वो सबसे अच्छा तरीका है अपने साथी को बताने का कि आप उसके द्वारा कि जाने वाली हरकतो से सुखद अनुभव कर ही हैं।
7. क्या आपको लगता है आपका यौन-जीवन थोडा उबाऊ हो रहा हैक् तो इसमें कुछ नयापन लाइए अपने साथी को आर्कषित करने के लिए कुछ उत्तेजनक वस्त्र धारण करने में शर्म महसूस मत करिए, उसके लिए कुछ मादक-मोहक अदाओं का प्रदर्शन किजिए और फिर देखिए कि कैसे आपका साथी आपको सेक्स-सुख व प्यार का मीठा अनुभव देता हैं। याद रखिए सेक्स भी आपसी प्यार को बनने मे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 

एक वैज्ञानिक शोध के अनुसार महिलाओ के अंतरवस्त्रो का रंग उनके रोमांटिक मूड तथा प्रेमी व्यक्तितत्व को दर्शाता है। एक मनोवैज्ञानिक डॉ डासन के अनुसार लाल, पीला तथा नारंगी रंग गर्म स्पेक्ट्रम को दर्शाता है जो कि ऊर्जा तथा उत्साह की भावनाएं पैदा करता है, यह हमारे दिल की ध़ाडकन और रक्तचाप को भी ब़डा सकते है।
लाल/पीला/ऑंरेज:- इन रंगो के अंतरवस्त्र आवेशपूर्ण ऊर्जावान तथा नाटकीय स्वभाव को दर्शाते है। यह रंग पसंद करने वाली महिलाएं बिदास होती है तथा उनका मुड भी नाटकीय रूप से बदलता है जो कि उनके आकर्षण का एक हिस्सा है।
गुलाबी रंग:- यह रंग पसंद करने वाली महिलाएं स्वभाव से रोमांटिक तथा विन्रम होती है, इन्हे अधिक से अधिक स्त्रेह पाने की
लालसा होती है। यह महिलाएं काफी कामुक होती है परंतु कभी आगे से पहल नही करती है।
काला रंग:- यह रंग एक व्यक्तिपरक और शक्तिशाली व्यक्तित्व को दर्शाता है। इस तरह की महिलाएं सूक्षम आकर्षण वाली परन्तु आवेशपूर्ण होती है।
सफेद रंग:- यह रंग पंसद करने वाली महिलाएं मासूम परंतु सुझाव देने के लिए तत्पर रहती है। यह एक अच्छी शिक्षार्थी भी होती है।
स्किन या भूरा रंग:- यह रंग स्वाभाविक वास्तविक तथा पारदर्शी व्यक्तितत्व को दर्शाता है। इसको पसंद करने वाली महिलाएं कुछ भी छुपाना पंसद नही करती है। एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि अब 72 प्रतिशत महिलाएं अंतरवस्त्रो की खरीदारी करते समय स्किन या भूरे रंगो वाले अंतरवस्त्रो का पंसद करने लगी है इसका अर्थ यह है कि आज की महिला रोमांस के मामले मे पीछे नही है और अपने आप को पूर्ण रूप से खुले रूप में प्रदर्शित करने मे नही कतराती है। बुनियादी रूप में महिलाओं में अंतरवस्त्रो के रंगो के पंसद को इतनी तेजी से बदलने के लिए कही ना कही मशहूर हस्तियॉं जिम्मेदार है।
हॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री इवा मेंडीस ने हाल ही मे यह खुलासा किया है कि वह स्किन कलर या बिलकुल सादे अंतरवस्त्रो मे सबसे ज्यादा सेक्सी लगती है। तो जनाब, अगली बार जब आप अपनी किसी महिला साथी के लिए अंतरवस्त्रो की खरीदारी पर जाये तो उनके रंगो पर जरूर विचार किजिएगा। 

हाँ, लड़की गर्भ धारण कर सकती है
48 66.67%

हां, माहवारी के दौरान सम्भोग करने से लड़की गर्भधारण कर सकती है
10 13.89%

माहवारी चक्र के 14 वें दिन (रक्तस्राव रूकने के 7 से 10वें दिन)।लड़की गर्भ धारण कर सकती है
24 33.33%

लिंग को पूरी तरह न डाले या वीर्य निष्कासन के समय बाहर निकाल लें, औरत तब भी गर्भधारण कर सकती है।
8 11.11%

नहीं , लड़की गर्भ धारण नहीं कर सकती है
4 5.56%

नहीं , माहवारी के दौरान सम्भोग करने से लड़की गर्भधारण नहीं कर सकती है
9 12.50%

लिंग को पूरी तरह न डाले या वीर्य निष्कासन के समय बाहर निकाल लें, औरत तब भी गर्भधारण नहीं कर सकती है।
7 9.72%

नहीं मालूम है
4 5.56%

महिला गर्भधारण करना चाहती है तो उसे सम्भोग के उपरान्त कम से कम बीस मिनट तक खड़ नहीं होना चाहिए।
15 20.83%

करके देख लेते है



मास्टरबेशन से फर्क नहीं पड़ता

हैं। मैं भी एक जमाने में इस गलतफहमी का शिकार था और इस फील्ड में आने की वजह भी यह थी कि जैसे मेरी गलतफहमी दूर हुई है, वैसे ही दूसरों की भी इस गलतफहमी को दूर कर सकूं। मास्टरबेशन नॉर्मल है, ऐसा कहने से समस्या दूर नहीं होती। इसको उदाहरण और तर्क से समझना होगा, तभी हीनभावना और गलतफहमी दूर हो पाएगी क्योंकि इसकी जड़ें बचपन से हमारे दिमाग में बैठी होती हैं। जो क्रिया सहवास के दौरान स्त्री के प्राइवेट पार्ट में होती है, वही क्रिया मास्टरबेशन के दौरान इंद्रिय हाथ में करती है। जैसे सहवास करने से इंद्रिय छोटी नहीं होती, उसी तरह से मास्टरबेशन करने से भी छोटी नहीं होती।

सच्चाई यह है कि शिथिलता या ढीलापन भी इस्तेमाल न करने से ही आता है। जैसे सहवास से टेढ़ापन नहीं आता, वैसे ही मास्टरबेशन करने से भी इंदिय में टेढ़ापन नहीं आता। ढीलेपन का तो सवाल ही पैदा नहीं होता क्योंकि इस्तेमाल करने से तो मजबूती आती है, बिना इस्तेमाल के नहीं। अंग्रेजी में कहावत है कि इफ यू डोंट यूज इट, यू मे लूज इट। मेरे ख्याल से यह कहावत सौ फीसदी सच है। अफसोस है कि मैं आपको कोई दवा नहीं बता सकता क्योंकि जब यह कोई बीमारी ही नहीं है तो इलाज की भी कोई जरूरत नहीं है।


हनीमून 
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परिचय-
शादी के बाद जब नए दुल्हा-दुल्हन कहीं बाहर घूमने जाते हैं तो कहा जाता है कि वह हनीमून पर गए हैं। हनीमून मनाने की प्रथा हमारे देश की है या बाहर के देश की यह पक्के तौर पर कहना बहुत मुश्किल है। हनीमून शब्द में भी सुहागरात जितना ही नशा है जिसको सुनते ही शरीर में अजीब सी तरंगे उठने लगती हैं। हनीमून को मधुमास भी कहते हैं। हनीमून का मतलब घर और घर वालों से दूर रहकर सिर्फ पत्नी के साथ वक्त गुजारना पड़ता है। बाहर के देशों में शादी के बाद हनीमून पर जाना जरूरी होता है क्योंकि एक तो उनके बीच हर तरह की झिझक और संकोच दूर हो जाता है और दूसरा शादी के बाद शरीर में दबी हुई काम भावनाएं अचानक तेज हो जाती हैं। इस समय व्यक्ति की इच्छा ज्यादा से ज्यादा अपनी पत्नी के साथ समय गुजारने की होती है लेकिन उन्हें वैसा एकांत नहीं मिल पाता है जैसा कि चाहिए होता है। शारीरिक संबंधों के लिए भी उनको सिर्फ रात का ही समय मिल पाता है। इसलिए हर तरह की आजादी के लिए उनके सामने हनीमून पर जाने का तरीका ही सबसे अच्छा रहता है।
हनीमून मनाने का मकसद-
भारतीय संस्कृति में शादी से पहले लड़के-लड़कियों को मिलने की इजाजत नहीं दी जाती है जिसकी वजह से शादी करने वाले लड़के-लड़कियों को एक-दूसरे को जानने का मौका नहीं मिल पाता है। घर में सब लोगों के रहने के कारण भी पति और पत्नी एक-दूसरे से खुलकर अपनी बात नहीं कह पाते हैं। इसलिए शादी के बाद हनीमून पर जाने से दोनों को एक-दूसरे को जानने का मौका मिल जाता है।
एक-दूसरे को समझे-
हनीमून मनाने का मकसद अंतरंगता, भावनात्मक रूप से जुड़ना, एक-दूसरे की पसंद-नापसंद को जानना, एक-दूसरे का स्वभाव पता करना, रुचि-अरूचि जानना होता है ताकि आगे जाकर आपस में किसी प्रकार की परेशानी, तनाव और गलतफहमी आदि के कारण दाम्पत्य जीवन में किसी प्रकार की परेशानी न पैदा हो।
हनीमून मनाने के लिए उपयुक्त स्थान-
• हनीमून मनाने के लिए स्थान का चुनाव करते समय ध्यान रखें और ऐसा स्थान चुने कि जिसमें दोनों की ही बराबर राय है। 
• हनीमून का स्थान ऐसा होना चाहिए जहां पर शांतिदायक माहौल हो और ज्यादा भीड़-भाड़ न हो। 
• हनीमून मनाने के लिए ऐसा स्थान चुनें जोकि दोनों ने पहले कभी न देखा हो। 
• हनीमून का स्थान चुनते समय एक बात का ध्यान रखें कि जहां आप जा रहे हैं वहां का मौसम कैसा है जैसे अगर गर्मी के मौसम में गुजरात जाते हैं तो वहां पर परेशानी हो सकती हैं क्योंकि वहां पर गर्मी ज्यादा होती है।
• हनीमून के स्थान का चुनाव करते समय देख लें कि आपका सफर ज्यादा लंबा नहीं होना चाहिए। कम समय में जितनी ज्यादा जगहों पर घूम लिया जाए वही हनीमून बेस्ट रहता है। 
हनीमून पर जाने से पहले की तैयारी-
• हनीमून पर जाते समय हल्के और ऐसे कपड़े ले जाएं जिनको पहनकर घूमते समय किसी तरह की परेशानी आदि न हो। 
• मौसम के हिसाब से कपड़े रखने चाहिए जैसे कि अगर आप किसी ठंडे स्थान पर जा रहे हैं तो ज्यादा और गर्म कपड़े लेकर जाना अच्छा रहता है। 
• हनीमून पर जाने की पैकिंग करते समय कॉटन, डिटॉल, सेनेटरी नैपकीन और कुछ जरूरी दर्द आदि की औषधियां रख लेनी चाहिए। 
हनीमून पर सेक्स जरूरी है-
• हनीमून पर जाने का असली मकसद न भूल जाए। अपना सारा समय वहां घूमने आदि में नहीं लगाना चाहिए।
• हनीमून पर जाने पर सेक्स के लिए भी पूरा समय निकाल लेना चाहिए क्योंकि वहां पर सेक्स करने का आनंद ही बहुत खास होता है। 
• हनीमून पर जाने पर ज्यादा खाना और घूमना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करने से शरीर में आलस्य और थकान पैदा हो जाती है।
• हनीमून पर गए पति और पत्नी को पूरे दिन बोलते और बहस आदि नहीं करते रहना चाहिए। दिन में कुछ समय तक चुप रहकर प्रकृति की शोभा का आनंद लेना चाहिए। बीच-बीच में एक-दूसरे की आंखों में आंखें डालकर बातें भी की जा सकती हैं। 
हनीमून मनाने कब जाएं-
• हनीमून पर शादी के तुरंत ही जाना चाहिए यह नहीं की शादी के काफी दिनों के बाद हनीमून पर जा रहे हैं। 
• शादी के तुरंत बाद ही हनीमून पर जाना इसलिए सही रहता है क्योंकि यह वे दिन होते हैं जब नवदंपति अपने आने वाले कल की बुनियाद रखते हैं।

समाज और सेक्स 
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मानव एक सामाजिक प्राणी है और समाज के अंदर ही उसका अस्तित्व संभव है। वह समाज में रहकर ही अच्छी व बुरी आदतें भी सीखता है। आमतौर पर हमारे समाज में यौन से संबंधित बातों को हीनता की दृष्टि से देखा जाता है। युवकों को सही आचार-विचार और अच्छा कैरियर बनाने की सलाह तो घर-परिवार के सदस्य, शिक्षक और समाज के लोग दे देते हैं परन्तु यौन से संबंधित जानकारी देने अथवा चर्चा करने से कतराते हैँ। जबकि बढ़ते हु्ए बच्चोँ के मन में यौन से संबंधित जानकारी प्राप्त करने की जिज्ञासा होती है। जब उन्हें सही जानकारी प्राप्त नहीं हो पाती है तो वे विभिन्न प्रकार की यौन समस्याओँ से पीड़ित हो जाते हैं। इससे उनके मन में यौन संबंधी गलत धारणाएं बैठ जाती हैं। इस प्रकार की गलत धारणाएं आमतौर पर हस्तमैथुन, वीर्यक्षय एवं नपुंसकता आदि के बारे में होती हैं।
हमारे समाज में हस्तमैथुन करने वाले व्यक्ति को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता है। किसी भी युवक के चेहरे पर कील-मुंहासे या आंखों के पास काले रंग के निशान देखने पर दूसरे लोग ऐसी धारणा बना लेते हैं कि यह युवक हस्तमैथुन अवश्य ही करता होगा। क्योंकि उनकी सोच यह होती है कि युवकों के चेहरे पर कील-मुंहासे या आंखों के पास काले रंग के दाग-धब्बे बनना हस्तमैथुन के कारण ही होता है। जबकि हस्तमैथुन करने से शारीरिक तौर पर कोई हानि नहीं होती है क्योंकि पुरुष का लिंग जो कार्य स्त्री की योनि में जाकर करता है, उसी कार्य को वह मुट्ठी में भी करता है जिससे उसे मानसिक व शारीरिक तनाव से मुक्ति मिलती है। यह क्रिया पुरुष की तंत्रिका प्रणाली को अनु्क्रियात्मक बनाती है। हस्तमैथुन का सहारा लेकर अनचाहे गर्भों व एड्स जैसे हानिकारक रोगोँ से बचा जा सकता है।
सामाजिक व नैतिक दृष्टि से भी हस्तमैथुन क्रिया का काफी महत्व है। आप कल्पना करें कि यदि कोई युवक अपने पड़ोस की किसी लड़की से सेक्स संबंध बनाने की इच्छा करता हो परन्तु उस लड़की की सेक्स में इच्छा न हो और वह लड़का उस लकड़ी से सेक्स संबंध बनाने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहता हो। यदि ऐसे मेँ लड़का उस लकड़ी से सेक्स करने का मन बदल दे और हस्तमैथुन करके अपनी इच्छा की शांति कर ले तो सामाजिक सुरक्षा व नैतिक परंपरा बनी रहती है। यदि वही लड़का हस्तमैथुन न करके लड़की से जबर्दस्ती करने लगे तो इससे यौन अपराध की उत्पत्ति होती है। इससे सामाजिक असुरक्षा व भय का वातावरण फैल जाता है।
यदि समाज में इसी तरह से हस्तमैथुन को नकारात्मक दृष्टि से देखा जाएगा तो समाज में यौन अपराधों व बलात्कारों की बाढ़ आ जाएगी। जिस प्रकार से संभोग करने से कोई कमजोरी नहीं होती, उसी प्रकार से हस्तमैथुन करने से भी कमजोरी नहीं होती है। फिर भी समाज में इसको लेकर अनेक भ्रांतियां विद्यमान हैं, जैसे- हस्तमैथुन करने से नपुंसकता आ जाती है, इससे टी.बी. हो जाती है, मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है और हार्ट अटैक की शिकायत हो जाती है आदि। जबकि ये सभी बातें निराधार हैं। वास्तविकता तो यह है कि इन सभी बातों से हस्तमैथुन करने वालों का मन कुंठित हो जाता है जिसके फलस्वरूप वह मानसिक रूप से पागल हो जाता है। 
हस्तमैथुन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। यदि कोई व्यक्ति शादी से पहले या शादी के बाद भी हस्तमैथुन करते हैं तो इससे उसके व्यक्तित्व पर कोई भी असर नहीं पड़ता है। आमतौर पर प्रवासी लोग अपनी पत्नी से दूर रहते हैं। ऐसी स्थिति में सेक्स की इच्छा होने पर वह हस्तमैथुन का सहारा लेगा अथवा किसी वेश्या के पास जाएगा। इस हालत में किसी वेश्या या पराई स्त्री के पास जाना सामाजिक और कानूनी तौर पर गलत है। इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति अपनी कामवासना की पूर्ति के लिए किसी वेश्या या पराई स्त्री के पास जाता है, तो वह कई प्रकार के यौन रोगों से ग्रस्त हो जाता है। अतः ऐसे व्यक्तियों को हस्तमैथुन करके अपनी सेक्स-इच्छा की पूर्ति कर लेनी चाहिए। जो व्यक्ति यह कहते हैं कि उन्होने कभी भी हस्तमैथुन नहीं किया है, ऐसे व्यक्तियों के दावे आमतौर पर गलत होते हैं। जबकि वास्तविकता तो यह है कि हस्तमैथुन व्यक्ति को उसकी कल्पनाओं को साकार करना सिखाता है जिससे उसकी तंत्रिका प्रणाली की क्रियात्मकता उसकी कल्पनाओं के अनुरूप बनती है।
अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों को हस्तमैथुन करते देखकर परेशान हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में माता-पिता को परेशान नहीं होना चाहिए।
हस्तमैथुन और संभोग दोनों एक ही सिक्के दो पहलू हैं क्योंकि दोनों ही माध्यम से निकलने वाले वीर्य का कोई महत्व नहीं होता है। वीर्य तो निकलने के लिए ही बना है। यह न तो जीवनप्रद है और न ही शक्तिप्रद। फिर भी हमारे समाज में यह धारणा है कि वीर्य की एक बूंद का निर्माण 100 बूंद खून से होता है जबकि वीर्य और खून में कोई भी समानता नहीं होती है। जननांगों में वीर्य का निर्माण लगातार होता रहता है जो उत्सर्जन के लिए होता है न कि जमा रखने के लिए। आमतौर पर झोलाछाप डाँक्टर नवयुवकों के मन में वीर्य के नष्ट होने से वाले वाली गंभीर रोगों की मिथ्या बाते बताकर भय उत्पन्न कर देते हैं। इसके परिणामस्वरूप वे इन बातों में आकर अपना समय व पैसा बर्बाद कर देते हैं और मानसिक रूप से कुंठित बने रहते हैं। यही कुंठा धीरे-धीरे करके उनका यौवन समाप्त कर देती है।
इसके अतिरिक्त वे वीर्य के गाढ़ेपन अथवा पतलेपन को लेकर भी परेशान रहते हैं जबकि इसका वैज्ञानिक विद्यान यह है कि जब मैथुन क्रिया देर से संपन्न होती है तो वीर्य गाढ़ा निकलता है। लेकिन जब मैथुन क्रिया जल्दी-जल्दी संपन्न होती है तो स्वाभाविक है कि वीर्य पतला ही निकलेगा। इससे सेक्स शक्ति पर बिल्कुल भी प्रभाव नहीं पड़ता है। नवयुवकों के वीर्य और 30-35 साल के व्यक्ति के वीर्य में अंतर होता है। नवयुवकों के वीर्य का रंग सफेद होता है लेकिन जैसे-जैसे उसकी आयु बढ़ती है, उसके वीर्य का रंग सफेद से पीला होता जाता है तथा वीर्य की मात्रा भी घट जाती है। इसलिए वीर्य के रंग व उसकी मात्रा का बढ़ती हुई आयु के लोगों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अधिकतर लोग नपुंसकता को लेकर ज्यादा ही परेशान रहते हैं। यदि किसी लड़के की शादी होने के 2-3 साल बीत जाने के बाद भी बच्चा नहीं होता है तो उसे नपुंसक मान लिया जाता है। इसलिए इस धारणा को बदलने की जरूरत है क्योंकि बच्चा पैदा करना शुक्राणुओं पर निर्भर करता है। शुक्राणुओं की कमी या अधिकता से व्यक्ति की मैथुन क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसी तरह से वीर्य में धातु जाने की एक अन्य गलत धारणा अकसर व्यक्तियों में पायी जाती है।
कुछ लोग पेशाब के साथ वीर्य निकलने की शिकायत करते हैं और कहते हैं कि इससे उनका शरीर दिन पर दिन कमजोर होता जा रहा है। ऐसे लोग नीम-हकीमों के चक्कर में पड़कर एक ऐसी कुंठा के शिकार हो जाते हैं जो उन्हें अंदर से दीमक की तरह खोखला कर देती है। ऐसे लोगों को यौन से संबंधित जानकारी अवश्य ही कर लेनी चाहिए क्योंकि पेशाब के साथ वीर्य जिसे लोग धातु कहते हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं निकलता। पेशाब के साथ निकलने वाला चिपचिपा पदार्थ वीर्य नहीं होता है बल्कि वह प्रोस्टेट तथा मूत्रमार्गीय ग्रन्थियों का स्राव होता है। जब कोई व्यक्ति शौच के लिए बैठता है तथा मलत्याग के लिए जोर लगाता है अथवा पेशाब त्याग करने के लिए थोड़ा दबाव डालता है तो यह दबाव मलाशय से होकर प्रोस्टेट तथा मूत्रमार्गीय ग्रन्थियों पर भी पड़ता है जिससे प्रोस्टेट तथा मूत्रमार्गीय ग्रन्थियों का जमा हुआ स्राव चिपचिपे पदार्थ के रूप में कुछ बूंदे मूत्रमार्ग से बाहर निकल आती हैं। सच तो यह है कि शरीर क्रिया विज्ञान के अनुसार पेशाब के साथ वीर्य का जाना संभव नहीं है क्योंकि जैसे ही कोई व्यक्ति चरमसीमा पर पहुंचकर वीर्यपात करता है तब मूत्राशय का द्वार स्वतः ही बंद हो जाता है।
विकसित देशों में लोग शौच के लिए कमोड का प्रयोग करते हैं लेकिन हमारे देश में उकडूं बैठकर शौच जाने का प्रचलन है। इस अवस्था में शौच के लिए बैठने वाला व्यक्ति अधिकतर नीचे की ओर देखता है तथा पेशाब से निकलते हुए पदार्थ को वीर्य समझ लेता है। इस संबंध में उसके मन में पहले से ही यह गलत धारणा बैठी होती है कि वीर्य बहुत ही कीमती और शक्ति बढ़ाने वाला होता है। इस सोच के चलते उसकी चिंता और भी अधिक बढ़ जाती है कि उसकी सारी शक्ति नष्ट हो रही है। इसके फलस्वरूप वह स्वयं को मानसिक और शारीरिक तौर पर कमजोर समझने लगता है। इसकी तुलना में विकसित देशों में कमोड का प्रचलन होने से शौच जाने वाले व्यक्ति का मुंह सीधा होता है। उसका ध्यान नीचे की ओर नहीं जाता है। इसलिए वह मानसिक व शारीरिक रूप से भी स्वस्थ बना रहता है।
इसके अलावा हमारे देश में लिंग (पेनिस) के बारे में भी कुछ धारणाएं फैली हुई हैं जिसमें अधिकतर पु्रुषों में अपने लिंग (पेनिस) को लेकर खास उत्सुकता बनी रहती है। वे हमेशा अपने लिंग (पेनिस) की तुलना दूसरे के लिंग से किया करते हैं। यदि उसे लगता है कि दूसरे व्यक्ति के लिंग (पेनिस) की तुलना में उसके लिंग (पेनिस) की लंबाई व मोटाई कम है तो उसे अपने आप में ग्लानि और शर्मिन्दगी महसूस होती है। जिससे वह अपने लिंग (पेनिस) की लंबाई और मोटाई में वृद्धि के उपाय ढूढ़ता रहता है जोकि बिल्कुल ही निरर्थक है क्योंकि जिस प्रकार दो व्यक्तियों में नाक की लंबाई, आंखों की गहराई, माथे की चौड़ाई और कद की ऊंचाई भिन्न-भिन्न होती है। उसी प्रकार सभी व्यक्तियों के लिंग (पेनिस) की लंबाई और मोटाई अलग-अलग होती है। इस लंबाई और मोटाई का व्यक्ति की मैथुन क्षमता पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता है।
साधारतयः योनि की गहराई 15 सेमी होती है जबकि उसकी संवेदनशील तंत्रिकाएं केवल 5 सेमी गहरे भाग में ही समाप्त हो जाती हैं, बाकी के 10 सेमी भाग में कोई भी संवेदनशीलता नहीं होती है। इसलिए छोटे लिंग (पेनिस) वाले पुरुष को सेक्स करते समय अपना अधिक ध्यान योनि की संवेदनशील तंत्रिकाओं पर देना चाहिए क्योंकि स्त्री की कामसंतुष्टि के लिए उत्तेजित अवस्था में लिंग (पेनिस) की लंबाई 5 सेमी भी पर्याप्त होती है जोकि लगभग सभी पुरुषों की होती ही है। इसलिए लिंग (पेनिस) की लंबाई के चक्कर में न पड़कर केवल अपने यौनशक्ति की ओर ही ध्यान देना चाहिए।
कुछ स्त्रियां भी लिंग के आकार को महत्व देती हैं। वे सोचती हैं कि लंबे लिंग (पेनिस) वाला पुरुष छोटे लिंग (पेनिस) वाले पुरुष की तुलना में स्त्री को अधिक काम-सुख प्रदान करता है। इसलिए ऐसी स्त्रियों को समझ लेना चाहिए कि योनि की रचना बहुत लचीली होती है। ऐसी अवस्था में लिंग (पेनिस) की लंबाई और मोटाई का कोई महत्व ही नहीं रह जाता है।
नवविवाहित दम्पति इस बात को जानने के इच्छुक रहते हैं कि वे सेक्स कब और कितनी बार करें क्योंकि उनके मन में समाज में फैली भ्रांतियों के कारण ये डर बैठा होता है कि अधिक सेक्स करने से शारीरिक दु्र्बलता आ जाती है। या पुरुष को टी.बी. हो सकती है। इस तरह की बातें हमारे रूढ़वादी समाज की देन हैं। इसी चिंता और सोच के कारण वे दम्पति सेक्स की तीव्र इच्छा होते हुए भी अपनी सेक्स उत्तेजना को दबाये रखते हैं। ऐसा करना शारीरिक और मानसिक रूप से अधिक हानिकारक होता है।
नवविवाहित दम्पतियों को अपनी सेक्स इच्छा को दबाकर नहीं रखना चाहिए। उन्हें जब भी सेक्स की इच्छा हो, सेक्स कर लेना चाहिए क्योंकि सेक्स कब और कितनी बार करें इसका किसी भी चिकित्सा प्रणाली में कोई भी नियम या कानून नहीं है। सेक्स करने से किसी भी तरह की शारीरिक और मानसिक कमजोरी नहीं होती है। सेक्स सप्ताह में एक बार करें या सातों दिन करें- यह आपकी सेक्स इच्छा पर निर्भर करता है। कुछ दम्पति दिन या रात में दो या तीन बार सेक्स करके संतुष्ट होते हैं तथा कुछ दम्पति सप्ताह में केवल दो-तीन बार सेक्स करके ही संतुष्टि महसूस करते हैं। इसलिए सेक्स कितनी बार करें। इस बारे में न सोचकर अपनी इच्छानुसार सेक्स संबंध बना लेना चाहिए। इससे वैवाहिक जीवन में खुशिया बनी रहती हैं।
वैवाहिक जीवन में आनंद, खुशी और संतुष्टि ही सबसे अधिक अहम बात होती है। कई दम्पति बार-बार सहवास करके भी संतुष्ट नहीं होते हैं तथा कई दम्पति एक बार की सेक्स क्रिया से असीम सुख और आनंद प्राप्त करते हैं। इसलिए सेक्स क्रिया की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण बात है- सेक्स की गुणवत्ता। इसके लिए सेक्स की तकनीक के बारे में जानना आवश्यक है जिससे सेक्स का अधिक से अधिक आनंद प्राप्त किया जा सके क्योंकि सेक्स की क्रिया स्त्री-पु्रुष दोनों मिलकर करते हैं और उन दोनों को समान रूप से तृप्ति मिलनी चाहिए।
कुछ लोगों के अनुसार पुरुषों में स्त्रियों की अपेक्षा कामुकता अधिक होती है। इसलिए वे सेक्स क्रिया के दौरान उत्तेजित होकर शीघ्र ही स्खलित हो जाते हैं और स्त्री की सेक्स इच्छा अधूरी रह जाती है। ये धारणा आमतौर पर उन लोगों की होती है जो समाचारपत्रों और टी.बी. चैनलों पर यौन से संबंधित घटनाओं को पढ़ते और देखते हैं। इस प्रकार की घटनाओं में अक्सर पुरुषों को ही जिम्मेदार माना जाता है। जबकि कुछ स्त्रियां भी सेक्स क्रिया के मामले में पुरुषों से पीछे नहीं होती।
सामान्तयः ब्रह्मचर्य़ का तात्पर्य है- अविवाहित रहकर सेक्स क्रिया से दूर रहना। ब्रह्मचर्य़ का पालन करने वाला व्यक्ति हमेशा स्वस्थ, निरोगी और लंबी आयु वाला होता है। इसी गलतफहमी के कारण कुछ लोग ब्रह्मचर्य़ का पालन करके अपने शरीर की ऊर्जा को बनाये रखने की कोशिश करते हैं। जब उनकी यह कोशिश बेकार जाती है तो उनके मन में चिंता और ग्लानि का भाव उत्पन्न होने लगता है कि ब्रह्मचर्य़ का पालन भंग करके उन्होंने अपने स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा लिया है। जब ऐसी घटनाएं कई बार घट जाती हैं तो व्यक्ति की स्थिति बहुत ही गंभीर हो जाती है। क्योंकि सेक्स की इच्छा को रोकने से भावनात्मक अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है, जिससे मन में तरह-तरह की कामुक कल्पनाएं आकर व्यक्ति की एकाग्रता को भंग कर देती हैं। इसके साथ ही चिड़चिड़ापन, अधीरता, अनिद्रा आदि गंभीर परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं। कभी-कभी सेक्स की इच्छा को रोकने से जननेन्द्रियां भी निष्क्रिय होकर सेक्स उत्तेजना को कम कर देती हैं। ऐसे व्यक्तियों को स्वप्नदोष की शिकायत होना आम बात है। इसे दूसरे तरीके से इस प्रकार से समझा जा सकता है। 
मान लोकि कोई बर्तन पानी से पूरा भरा हुआ है। यदि उस बर्तन में कोई ठोस चीज या कोई अन्य सामान डाला जाए तो उस बर्तन में भरा हुआ पानी निकलकर बाहर निकल जाएगा। यही बात वीर्य के संबंध में भी लागू होती है। मनुष्य के शरीर में वीर्य का निर्माण लगातार होता रहता है लेकिन जो व्यक्ति ब्रह्मचारी होता है उसका वीर्य शरीर से बाहर नहीं निकलता है। इससे शरीर के कोष में वीर्य लगातार भरता रहता है। ऐसा व्यक्ति जब कभी भी कामुक सपने देखता है तो इससे उसके शरीर में एकत्रित वीर्य में गति आ जाती है जिसके परिणामस्वरूप उसका वीर्यपात हो जाता है। इस प्रकार से वीर्यपात होना ही स्वप्नदोष कहलाता है। कामुक सपने किसी भी आयु वाले व्यक्ति को आ सकते हैं। ब्रह्मचर्य़ और स्वप्नदोष का आपस में गहरा संबंध होता है।
यही कारण है कि ब्रह्मचर्य़ का पालन करने वाले व्यक्ति स्वप्नदोष से पीड़ित हो जाते हैं। इसमें किसी भी प्रकार के आश्चर्य़ की बात नहीं है क्योंकि पुरुष का शुक्राशय, प्रोस्टेट ग्रंथियां तथा अंडग्रंथि मिलकर वीर्य का निर्माण लगातार करते रहते हैं और उसका निष्कासन भी स्वाभाविक है। वीर्य़ का निष्कासन सेक्स क्रिया, हस्तमैथुन अथवा स्वप्नदोष के माध्यम से होता है। यही कारण है कि ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले लोगों को स्वप्नदोष की अधिक शिकायत होती है। इसलिए स्वप्नदोष कोई रोग नहीं है बल्कि यह एक शारीरिक वृत्ति है। यदि आप भी इस समस्या से ग्रस्त हैं तो परेशान नहीं होना चाहिए और न ही इसकी चिकित्सा के लिए किसी डाँक्टर के पास जाने की आवश्यकता है। कुछ लोगों में यह भ्रम होता है कि स्वप्नदोष के बाद कमजोरी महसूस होती है। इसके बारे में सही राय यह है कि स्वप्नदोष के बाद कमजोरी महसूस होना सिर्फ मनोवैज्ञानिक है क्योंकि बचपन से हमारे मन में यह बात बैठा दी जाती है कि हमारी जननेन्द्रिय शरीर का विशेष अंग हैं और उससे निकलने वाला पदार्थ भी विशेष होता है। इस प्रकार की गलत धारणा ही व्यक्ति को तंत्रिकावसाद ग्रस्त कर देती है।
कुछ लोग शादी के बाद अपनी पत्नी के कुंवारेपन की परीक्षा पहली बार सेक्स के दौरान निकलने वाले रक्त के माध्यम से करते हैं। उनकी धारणा यह होती है कि कुंवारी लड़की से पहली बार सेक्स करने से उसकी योनि से रक्त का स्राव होता है। यदि रक्त नहीं निकलता है तो इसका मतलब है कि वह लड़की कुंवारी नहीं है तथा वह पहले भी किसी दूसरे के साथ सेक्स संबंध बना चुकी है जबकि इस प्रकार की सोच मिथ्या होती है। वैज्ञानिक मतानुसार किसी युवती का योनिच्छद, जो कुंवारेपन की निशानी है, वह जन्म से ही होता है। किसी-किसी लड़की की कौमार्य झिल्ली खेल-कूद के दौरान चोट लगने से फट जाती है जिसके फलस्वरूप रक्तस्राव हो जाता है। कभी-कभी साइकिल चलाने से भी कौमार्य झिल्ली फट जाती है तथा रक्तस्राव हो जाता है। इसलिए यह जरूरी नहीं है कि प्रथम सेक्स संबंध के समय में ही योनि से रक्त निकले।

संभोग के प्रति स्त्रियों की उपेक्षा 
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परिचय- 
किसी भी पति और पत्नी को अपने वैवाहिक जीवन को सुखी बनाने के लिए जरूरी है कि उनके बीच सेक्स संबंध भी अच्छे हो। जहां भी पति और पत्नी के बीच बनने वाले सेक्स संबंध संतुष्टि देने वाले होते हैं वहां पर ही पति और पत्नी के बीच प्रेम संबंधों में मजबूती आती है। ठीक इसके विपरीत अगर पति-पत्नी के बीच बनने वाले संबंध दोनों को संतुष्टि देने वाले नहीं होते तो उनके बीच में कड़वाहट पैदा हो जाती है और इन संबंधों को अगर समय रहते नहीं संभाला जाता तो यह तलाक का कारण बन जाता है। इसलिए सेक्स संबंधों को अनदेखा नहीं करना चाहिए। कभी-कभी सेक्स संबंधों में गतिरोध उत्पन्न हो जाता है जोकि खतरनाक साबित होता है। यह अवरोध पति के अंदर की यौन दु्र्बलता के कारण हो सकता है जिसके कारण वह अपनी पत्नी को सेक्स के रूप में पूरी तरह संतुष्टि नहीं दे पाता और यही अवरोध पत्नी के कारण भी पैदा हो सकता है जो कामशीलता के रूप में दिखाई देता है जिसके अंतर्गत पत्नी की रुचि सेक्स संबंधों के प्रति कम होती जाती है। सेक्स संबंधों में अरुचि होना या उपेक्षा का भाव सेक्स संबंधों से मिलने वाले आनंद को दूर कर देता है। इस स्थिति से बचने का प्रयास करना चाहिए।
सेक्स संबंधों में पूरी तरह आनंद और संतुष्टि प्राप्त करने के लिए पति और पत्नी को ही पूरी तरह योगदान देना चाहिए। पुरुष हर समय सेक्स संबंध बनाने के लिए तैयार रहता है लेकिन स्त्रियों में कई बार सेक्स संबंधों को लेकर अरुचि पैदा हो जाती है। वह अपने आपको दिमागी और शारीरिक रूप से इन संबंधों के लिए तुरंत तैयार नहीं कर पाती। पुरुष स्त्रियों की इन भावनाओं को अनदेखा करके उसके साथ जबर्दस्ती सेक्स संबंध बनाने लगता है। इसलिए सुखी और स्वस्थ संबंधों के लिए यह जरूरी है कि स्त्री और पुरुष दोनों ही शारीरिक तथा मानसिक रूप से पूरी तरह उमंग के साथ इसमें लीन हो।
सेक्स शास्त्रियों का मानना है कि सेक्स क्रिया में स्त्री का योगदान खास मायने रखता है क्योंकि पुरुष को वीर्यपात होते ही चरम सुख की अनुभूति हो जाती है लेकिन स्त्री के लिए चरम सुख की प्राप्ति इतनी सरल और सहज नहीं होती है। पुरुष सेक्स करने के लिए हर समय तैयार रहता है जबकि स्त्री को इसके लिए तैयार होने में कुछ समय लगता है। बहुत से मौकों पर पुरुष को स्त्री को तैयार भी करना होता है। इसलिए सेक्स संबंधों को जीवंत बनाए रखने में स्त्री की खास भूमिका होती है। हमारे यहां की सभ्यता, संस्कृति और मर्यादाओं के चलते काफी लंबे समय तक सेक्स संबंधों के दौरान स्त्री के सहयोग को स्वीकार ही नहीं किया गया था। उसका सहयोग सेक्स संबंधों के समय खामोशी के साथ समर्पण तक ही सीमित था। उसे सिर्फ पुरुष की यौन उत्तेजना को शांत करने का साधन समझा जाता था। स्त्री को सेक्स संबंधों में संतुष्टि मिली है या नहीं इस तरफ कोई ध्यान नहीं देता था। कभी किसी खास मौके पर अगर सेक्स संबंधों के लिए पहल करती थी तो उसके चरित्र पर ही शक किया जाता था।
लेकिन धीरे-धीरे समय बदला, लोगों के बर्ताव और विचारों में खुलापन आने लगा, भारतीय़ लोगों पर पश्चिमी संस्कृति का असर पड़ने लगा तो स्त्रियों की चेतना भी सेक्स संबंधों के प्रति जागने लगी। स्त्रियों के मन में पुरुष को आनंद प्राप्त कराने के साथ-साथ स्वयं भी आनंद पाने की इच्छा बढ़ने लगी। सेक्स संबंधों में स्त्री को भी चरम सुख प्राप्त हो इसके लिए पुरुष का इस क्रिया के लिए पूरी तरह सक्षम होना जरूरी है। लेकिन इस क्रिया के लिए बहुत से पुरुषों में यौन दुर्बलता रुकावट बनने लगी है। एक स्त्री किसी भी स्थिति में पुरुष को पूर्ण संतुष्ट कर सकती है लेकिन पुरुष के साथ यह बात ठीक नहीं बैठती। उसे सेक्स संबंध बनाने के लिए अपने आप में पूर्णता प्राप्त करने की क्षमता पैदा करनी ही होती है। वर्तमान में यह इसलिए भी जरूरी हो गया है कि स्त्री पहले की अपेक्षा सेक्स संबंधों के बारे में ज्यादा सजग हो गई है। यदि स्त्री को काफी समय तक अपने पति से सेक्स संबंधों में संतुष्टि प्राप्त नहीं होता तो वह विरोध पर उतर जाती है।
पुरुषों को भी बदलते समय को दिमाग में रखकर खुद को इस नई स्थिति का सामना करना ही पड़ेगा। जबसे पति-पत्नी में एक या दो बच्चे पैदा करने की सोच आई है तबसे शरीर संबंधों का महत्व बढ़ गया है। सेक्स संबंध पूरी तरह से पुरुष और स्त्री का व्यक्तित्व मामला है। वैसे तो इसमें आई रुकावट को दूर करने की जिम्मेदारी स्त्री और पुरुष दोनों पर ही आती है लेकिन फिर भी इसको लेकर पुरुष ज्यादा प्रेशर में रहता है। सेक्स संबंधों में सक्षम न होना कोई इस तरह की समस्या नहीं है कि जिसका पता पुरुष को न हो या वह इसके बारे में समझता न हो, यह बात अलग है कि वह सब कुछ जानते समझते हुए भी इससे अंजान बनने की कोशिश करता है क्योंकि स्खलन के साथ ही उसकी कामोत्तेजना तो समाप्त हो जाती है लेकिन उसकी कमजोरी या समस्या का असर सिर्फ स्त्री पर ही पड़ता है।
वर्तमान समय में हर आदमी अनेक प्रकार की समस्याओं से ग्रस्त जीवन जी रहा है। इसमें से एक समस्या जो तेजी से फैल रही है वह है यौन दुर्बलता। अगर किसी व्यक्ति को यह समस्या होती है तो वह शर्म, संकोच या झिझक के मारे किसी को अपनी इस समस्या के बारे में बता नहीं पाता है। दूसरों को बताने की बात तो दूसरी है वह अपनी इस समस्या के बारे में अपनी पत्नी को भी बताने से डरता है क्योंकि उसे लगता है कि इस बारे में बताने से वह उसकी नजरों में गिर सकता है। पुरुष की यह सोच बिल्कुल गलत है लेकिन यह समस्या अगर लंबे समय तक बनी रहती है तो स्थिति और भी घातक हो सकती है। समस्या चाहे छोटी हो या बड़ी उसके बारे में लापरवाही न करके तुरंत ही इलाज करवाना चाहिए।
यहां पर एक बात पर ध्यान देना और भी जरूरी है कि स्त्रियों की काम संतुष्टि के बारे में पुरुष की मानसिकता आज भी पहले की ही तरह ही है। उनका मानना है कि पुरुष देने वाला है और स्त्री लेने वाली है इसलिए स्त्रियों को जितना मिलता है उतने में ही संतुष्ट हो जाना चाहिए। लेकिन जो पुरुष शारीरिक संबंधों में स्त्री की संतुष्टि की उपेक्षा करते हैं उन्हें आगे चलकर बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी पुरुषों की पत्नियां आगे चलकर पराए पुरुष के चक्कर में पड़ जाती हैं। ऐसे बहुत से मामले या केस आदि हमें अपने आसपास ही देखने को या पढ़ने को मिल जाते हैं जिसमें किसी पति ने अपनी पत्नी को किसी और पुरुष के साथ पकड़ लिया या अवैध संबंधों के चक्कर में किसी पति ने अपनी पत्नी की हत्या कर दी। लेकिन यह सब इसलिए ही होता है क्योंकि इन मामलों में पतियों में कभी अपनी पत्नी की शारीरिक तृप्ति की ओर ध्यान ही नहीं दिया जिसके कारण पत्नी को अपने शरीर की संतुष्टि के लिए दूसरे पुऱुषों का सहारा लेना पड़ा। इसलिए अगर पुरुष को अपना दाम्पत्य जीवन सुख और शांति से बिताना है तो उसे शारीरिक संबंधों में स्त्री की संतुष्टि का भी पूरा ध्यान रखना चाहिए।

पत्नियों के लिए कुछ महत्वपू्र्ण बातें 
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परिचय-
जिस परिवार में पति और पत्नी के बीच अथाह प्यार होता है, घर में सुख-शांति होती है, एक-दूसरे पर भरोसा होता है, उसी घर को असल में आदर्श परिवार कहा जाता है और वहीं हर तरह की सुख-समृद्धि मिलती है। लेकिन उसके लिए पति और पत्नी दोनों को ही मिलकर कोशिश करनी चाहिए। एक पूरे परिवार को ठीक प्रकार और अनुशासन से चलाने की जिम्मेदारी पत्नी पर ही होती है इसमें वह अगर थोड़ी सी भी लापरवाही बरतती है तो पूरा परिवार टूटकर बिखर जाता है।
ससुराल में तालमेल बैठाने की कोशिश करें- 
विवाह के तुरंत बाद ही स्त्री को पत्नी के रूप में एक नए परिवार और नए माहौल में जाना पड़ता है। ससुराल में स्त्री को अपने पति के साथ-साथ सास-ससुर, ननद-जेठानी, देवर-देवरानी आदि के बीच तालमेल बैठाना पड़ता है।
बहुत सी स्त्रियां होती हैं जो शादी के बाद अपने ससुराल वालों के साथ तालमेल नहीं बैठा पाती हैं क्योंकि ससुराल वालों की उसको लेकर जितनी अपेक्षाएं होती हैं वह उन पर खरी नहीं उतर पाती है। स्त्री को ससुराल में सास-ससुर के रूप में एक तरह से मां-बाप ही मिलते हैं। इसलिए उनकी सही तरह से देखभाल और मान-सम्मान बनाए रखना उसी की जिम्मेदारी होती है। बहुत सी सास सख्त स्वभाव की होती हैं लेकिन अगर बहू चाहे तो अपने अच्छे व्यवहार से तथा मीठी बोली से पत्थर दिल सास को भी मोम की बना सकती है। जिन बहुओं को इस तरीके से अपनी सास का दिल जीतना आता है उन्हें ही ससुराल में ज्यादा प्यार मिलता है। अगर ससुराल में कभी सास या ससुर कुछ गलती होने पर या न भी होने पर डांट देते हैं तो उन्हें पलटकर जवाब नहीं देना चाहिए क्योंकि पहले घर में मां-बाप भी तो छोटी-छोटी बातों पर डांट देते थे। पति भी जब देखता है कि मेरी पत्नी मेरे घर वालों का कितना सम्मान करती है तो उसके दिल में भी अपनी पत्नी के लिए प्यार और सम्मान बढ़ जाता है। इसलिए हर स्त्री को चाहिए कि वे अपने ससुराल में अपने व्यवहार को अच्छा बनाकर ससुराल वालों का दिल जीतने की कोशिश करें। ऐसे घरों में हमेशा सुख और शांति बनी रहती है।
ससुराल के सदस्यों को अपना समझना-
अक्सर स्त्री का ससुराल में अपनी ननदों के प्रति प्यार कुछ कम ही होता है। जब तक ननद की शादी नहीं होती तो उन दोनों की किसी न किसी बात पर बहस आदि होती ही रहती है। शादी होने के बाद भी जब ननद अपने घर आती है तो स्त्री थोड़े ही दिनों में उसे बोझ समझने लगती है और उसकी सही तरह से आवभगत नहीं करती। सास भी कभी यह बर्दाश्त नहीं कर पाती कि उसकी बहू उसकी बेटी के साथ गलत व्यवहार करे। इसी कारण से बहुत से घरों में क्लेश का माहौल बन जाता है। इसलिए हर बहू का यह कर्तव्य बनता है कि वह अपनी ननदों से अपनी बहनों जैसा ही बर्ताव करे और उन्हें वैसा ही मान-सम्मान दें।
ससुराल के हर काम में भाग लें-
ससुराल में जैसे ही कोई शादी-ब्याह या फंक्शन आदि हो जैसे कि ननद की शादी, देवर की शादी या कोई और प्रोग्राम तो उस घर की बहू को उसमें बढ़-चढ़कर काम करना चाहिए। बहुत सी स्त्रियां होती हैं जो ऐसे समय किसी न किसी रोग का बहाना बनाकर काम से बचने का प्रयास करती हैं। लेकिन उन्हें पता होना चाहिए कि अगर वह काम से बचने के लिए इस तरह के बहाने आदि बनाती हैं तो इससे उनका कोई नाम नहीं होता बल्कि लोग तो यही कहते हैं कि काम से बचने के लिए बहाना बनाकर पड़ी है। वैसे तो कुछ भी काम हो जो होने होते हैं वे शुरू भी होते हैं और खत्म भी होते हैं। बाद में सिर्फ इतना ही रह जाता है कि किसने कितना काम किया और किसने कामचोरी की। इसलिए हर बहू को यह समझना जरूरी है की ससुराल को भी अपना घर समझें और उसमें होने वाले कामों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें।
घर की बातें बाहर फैलाना-
बहुत सी बहुओं की आदत होती हैं कि उनके घर में कोई भी छोटी-मोटी बात या लड़ाई-झगड़ा होता है तो वह तुरंत ही अपने आस-पड़ोस में रहने वाली स्त्रियों को बता देती हैं। पड़ोस की औरतें भी बहू के द्वारा कही जाने वाली बातों को उसकी सास को 2 की 4 लगाकर बता देती हैं जिससे अगर छोटा झगड़ा भी होगा तो वह भी बड़े झगड़े में तब्दील हो जाता है। इससे सास और बहू के रिश्तों में और भी खटास पड़ जाती है। असल में कोई घर ऐसा नहीं होता जहां पर कि छोटे-मोटे झगड़े नहीं होते हैं लेकिन घर के इन झगड़ों को बाहर ले जाना किसी लिहाज से उचित नहीं है। अगर आप अपने पड़ोस के लोगों को कुछ बताते हैं तो वह उन्हें सुलझाने की बजाय मजे ही लेंगे। इसलिए घर की बातों को अगर घर में ही सुलझा लिया जाए तो अच्छा है। यहां तक कि बहू को अपने घर की किसी भी बात को अपने मायके वालों को बताने से भी बचना चाहिए।
सेक्स संबंधों में संतुलन-
घर वालों के साथ अपने संबंधों को मधुर बनाने के साथ ही एक प्रकार के संबंध और हैं जिन्हें भी अगर मधुर बनाकर रखा जाए तो जिंदगी में फिर किसी प्रकार की परेशानी आने की कोई आशंका नहीं होती है और वह है पति और पत्नी के बीच बनने वाले सेक्स संबंध। पति-पत्नी को एक-दूसरे के नजदीक लाने के लिए तथा प्यार को बढ़ाने के लिए सेक्स एक बहुत ही महत्वपूर्ण काम करता है। इन संबंधों में पत्नी को भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए, तभी यह संबंध सफल बनते हैं। बहुत सी स्त्रियां होती है जो बच्चे को जन्म देने के बाद सेक्स से ऐसे कटने लगती है जैसे कि सेक्स सिर्फ बच्चे को पैदा करने के लिए ही किया जाता है। सेक्स एक ऐसी भूख है जो व्यक्ति को हमेशा ही लगती रहती है। विद्वानों के अनुसार जोश और उमंग से भरे सेक्स संबंध व्यक्ति की ऊर्जा शक्ति को बनाए रखते हैं और उसे हर तरह की परिस्थिति से लड़ने की ताकत प्रदान करते हैं।
हर पत्नी के लिए इस बात को समझना जरूरी है कि बच्चे पैदा हो जाने से या बड़े हो जाने से शारीरिक संबंधों की जरूरत समाप्त नहीं हो जाती है। पेट की भूख हो या सेक्स की, दोनों ही व्यक्ति के साथ आखिरी समय तक रहती है। कभी भी किसी ग्रंथ में या किसी और में यह बात कभी भी नहीं की गई कि बच्चे के जन्म के बाद सेक्स करना बेकार है। सफल सेक्स संबंध व्यक्ति के दिमाग की परेशानियों को समाप्त कर देते हैं। इसलिए पति के साथ इस क्रिया में ज्यादा से ज्यादा सहयोग प्रदान करने की कोशिश करें।
सेक्स संबंधों के समय इधर-उधर की बातें-
बहुत सी स्त्रियां होती है कि वह जब अपने पति के साथ सेक्स क्रिया में लीन होती हैं तब भी घर की या बाहर की बातें छेड़ देती हैं। उन्हें लगता है कि वैसे तो उसे अपने पति से बात करने का पूरा मौका नहीं मिल पाता तो क्यों न अभी कर ली जाए। पति सोचता है कि उसकी पत्नी उसके साथ इस क्रिया में ध्यान दें लेकिन वह होती है कि कहां-कहां की बातें लेकर बैठ जाती है। इस कारण पति जो आनंद लेना चाहता है चाहकर भी वह नहीं ले पाता है।
इस बारे में पत्नियों को सोचना चाहिए कि सेक्स संबंध बनाते समय ऐसी बातें करें जो उनकी और पति की उत्तेजना को और बढ़ाएं न कि ऐसी जिनसे कि इस क्रिया में मन ही न लगे। अगर पत्नी को पति से किसी जरूरी बात को करने का समय नहीं मिल पाता है तो संबंध बनाने से पहले ही इन बातों को निपटा लें। वैसे भी बच्चे के पैदा होने के बाद रोजाना सेक्स संबंध बनाना मुश्किल हो जाता है तब तो इसके लिए सप्ताह में कभी-कभार ही समय मिल पाता है। ऐसे में अगर सेक्स संबंध बनाते समय भी घर-गृहस्थी की समस्याओं के बारे में बात की जाती है तो पति का मूड इससे खराब हो सकता है। इसके लिए पत्नी को ऐसे समय में बेकार की बातों में न पड़कर सेक्स क्रिया में ही ध्यान लगाना चाहिए क्योंकि सेक्स ऐसी क्रिया है जिसका आनंद पति और पत्नी दोनों को ही बराबर रूप में मिलता है।
पति पर शक करना-
आज के समय में आफिस आदि में स्त्रियां और पुरुष साथ-साथ मिलकर काम करते हैं। लेकिन बहुत सी पत्नियों की आदत होती है कि अगर उनका पति किसी लड़की के साथ काम करता है तो वह हर वक्त उस पर शक करती रहती हैं। ऐसे में अगर पति कभी घर पर देर से आता है तो पत्नी को लगता है कि उसका पति उसके साथ काम करने वाली लड़की के साथ घूम रहा होगा। पति जब घर पर आता है तो वह उसको ताने मारने लगती है। इसी कारण से उनके बीच में अक्सर झगड़े होते रहते हैं। असल में पत्नियों के शक के पीछे कोई खास कारण न हो फिर भी वह अपने ही मन से पति से ऊपर शक करती रहती है।
इसके लिए सारी पत्नियों को यह बताना जरूरी है कि उन्हें अपनी पत्नी पर पूरा विश्वास रखना चाहिए। अगर कुछ पुरुष अपनी पत्नियों के साथ धोखा करके किसी और लड़की के साथ संबंध बनाते हैं तो ऐसा जरूरी नहीं है कि सारे पति ही ऐसे हो। एक छोटा सा शक हंसते-खेलते घर को बर्बाद कर सकता है।
दूसरी स्त्रियों से बराबरी करना-
बहुत सी स्त्रियों की आदत होती है कि उनकी पड़ोसन अगर कोई गहना या साड़ी आदि खरीदकर लाती है तो वह भी उनकी देखादेखी अपने पति से वैसी ही चीजों की मांग करने लगती है। लेकिन हर पति के पास इतना पैसा नहीं होता कि वह अपनी पत्नी की किसी भी मांग को तुरंत ही पूरा कर दे। ऐसे में अगर वह अपनी पत्नी से कहता है कि कुछ समय रुक जाओ मैं तुम्हें बाद में वह चीज दिला दूंगा। लेकिन पत्नी अपने पति की इस मजबूरी को समझती नहीं और मुंह बनाकर बैठ जाती है। लेकिन यह बात बिल्कुल ठीक नहीं है। बढ़ती महंगाई के दौर में आज पतियों के पास इतना पैसा नहीं बच पाता कि वह अपनी पत्नी की सारी मांगों को पूरा कर सके। वैसे भी जिंदगी में सुख आता है तो जल्दी ही चला भी जाता है लेकिन दुख आता है तो वह बहुत ही मुश्किल से जाता है। हर पत्नी को अपने पति का सुख-दुख में पूरा सहयोग करना चाहिए। वैसे भी पतियों की आदत होती है कि अगर उनके पास पैसा है तो वह उसे अपनी पत्नी और बच्चों पर खर्च करने में हिचकता नहीं है। हर पति की यह दिली ख्वाहिश होती है कि वह अपनी पत्नी और बच्चों को हर सुख दे। इसलिए पत्नियों को भी पति की मजबूरी को समझना चाहिए।
पति के घर लौटते ही समस्याओं की झड़ी लगा देना-
बहुत की पत्नियों की आदत होती है कि जैसे ही रात को उनका पति थका-हारा काम पर से लौटता है वैसे ही पत्नी उसके सामने पूरे दिन की समस्याएं लेकर बैठ जाती है। एक तो पति वैसे ही पूरे दिन के काम आदि के कारण थका हुआ होता है और उस पर अपनी पत्नी से दुनिया भर की परेशानियां सुनकर और दुखी हो जाती है। कुछ ही दिनों में पति अपनी पत्नी की इस आदत से इतना दुखी हो जाता है कि उसके स्वभाव में चिड़चिड़ापन पैदा हो जाता है।
हर पत्नी को इस बारे में पूरा ध्यान रखना चाहिए कि पति के काम से घर आते ही किसी तरह की परेशानी आदि लेकर न बैठे। बात अगर बहुत जरूरी हो तो पति को पहले खाना आदि खिला दें और उसके बाद जब सही समय लगे तो बता दें। इसके अलावा पति के काम से घर आते ही हल्की-फुल्की या प्यार भरी बाते करके उसके दिमाग की थकान को दूर करना चाहिए। मानसिक थकान दूर होते ही शारीरिक थकान अपने आप ही मिट जाती है। इसलिए हर पत्नी को अपनी ऐसी आदतों को बदलना चाहिए।
शारीरिक संबंध बनाने से पहले खुद पर ध्यान दें-
बहुत से विद्वानों का मानना है कि पुरुष को आंतरिक शक्ति या ऊर्जा बेडरूम से ही प्राप्त होती है और यह ऊर्जा समाप्त भी बेडरूम में ही होती है। बहुत सी स्त्रियों की एक आदत होती है कि वह शादी के कुछ ही समय के बाद शारीरिक संबंधों के प्रति लापरवाह नजर आने लगती हैं। इसके साथ ही वह अपने शरीर के साथ अपने पहनावे को लेकर भी लापरवाह हो जाती हैं। व्यक्ति के पहनावे से ही उसके व्यक्तित्व का पता चलता है। अगर साधारण कपड़ों को अच्छी तरह से धोकर और प्रेस करके पहने जाए तो वह साधारण इंसान को भी खूबसूरत बना देते हैं। इसके विपरीत अगर महंगे से महंगे और खूबसूरत कपड़ों को भी अगर बेढंगे तरीके से पहना जाए तो वह सुंदर इंसान को भी बदसूरत बना देते हैं।
पत्नियों के खुद के रखरखाव तथा पहनावे का शारीरिक संबंधों में बहुत ज्यादा महत्व होता है। स्त्री को पूरे दिन बहुत से काम करने पड़ते हैं जैसे- सुबह के समय चाय-नाश्ता तैयार करना, बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजना, पति के कपड़े आदि तैयार कराना, खाना बनाना, कपड़े धोना आदि। ऐसे में शरीर की अवस्था और पहनावा दोनों ही प्रभावित होते हैं। काम करते समय शरीर से निकलने वाला पसीना और धूल-मिट्टी कपड़ों में घुस जाती है। बहुत सी स्त्रियां तो घर में रहते हुए 2-3 दिन में कपड़े बदलती हैं। दिन में तो कैसे भी कपड़े चल जाते हैं लेकिन कुछ स्त्रियां तो उन्हीं कपड़ों को पहनकर बैडरूम में सोने के लिए चली जाती हैं। ऐसे में जब पति पत्नी को आलिंगन में लेकर संभोग क्रिया की शुरुआत करने वाला होता है तभी उसके कपड़ों से आने वाली बदबू पति की काम उत्तेजना को उड़ा देती है। ऐसी स्त्रियों के कपड़ों के अलावा शरीर से भी बदबू आने लगती है। ऐसे में शारीरिक संबंधों में एकाकार कैसे हो सकते हैं जो स्त्रियां शादी होने के बाद अपना शारीरिक आकर्षण खोती जा रही हैं या अपना तरफ ध्यान नहीं दे रही हैं उनके लिए कुछ बातें जरूरी हैं-
• अपने शरीर की सुंदरता का पूरा-पूरा ध्यान रखें। अगर आपको लग रहा है कि आपके शरीर में मोटापा बढ़ रहा है तो इसको कंट्रोल करने के लिए तुरंत अपने रोजाना करने वाले भोजन और व्यायाम पर ध्यान दें। मोटापा स्त्री की सुंदरता के लिए अभिशाप होता है। इसकी वजह से दूसरे कई रोग भी पैदा हो सकते हैं जैसे- रक्तचाप, मधुमेह (डायबटीज), गठिया का दर्द, दिल के रोग आदि। 
• शरीर की स्वच्छता को बनाकर रखें। रोजाना स्नान करने की आदत डालें। रात को बेडरूम में जाने से पहले दिन में पहने हुए कपड़े बदल लेने चाहिए।
• रात को पहने जाने वाले कपड़े पति की पसंद के ही होने चाहिए। बहुत से पतियों को रात के समय अपनी पत्नी सफेद जालीदार नाइटी और उसके नीचे काली ब्रा में अच्छी लगती है। बहुत से पुरुषों को नाइटी और उसके नीचे के कपड़ों का रंग अलग-अलग अच्छा लगता है। ऐसा माना जाता है कि पति रात के समय अपनी पत्नी को जिन कपड़ों में देखना चाहता है और वह उन्हीं में मिल जाती है तो इससे पति की काम-उत्तेजना बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। 
• पलंग पर बिछाने वाली चादर को सप्ताह में 1-2 बार जरूर बदल लेना चाहिए। 
• खिड़कियों पर ऐसे पर्दे लगाने चाहिए जो कि उत्तेजना को बढ़ाने वाले हो। चाहे तो इस बारे में अपने पति से भी राय ली जा सकती है। 
सब पत्नियों के लिए-
आज के आधुनिक युग में हर लड़की सपनों की दुनिया में जीती है। शादी के बारे में भी हर लड़की के कई सपने होते हैं जैसे कि उसका होने वाला पति कोई राजकुमार जैसा होगा, उसका बहुत बड़ा घर होगा, बहुत बड़ी गाड़ी होगी आदि। वैसे तो सपना देखना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन बहुत सी लड़कियां इन सपनों को ही अपना जीवन बना लेती हैं और कुछ भी करके अपने इन सपनों को पूरा करने की कोशिश में लगी रहती हैं।
कहते हैं कि जो सपने देखता है वहीं उन सपनों को पूरा भी करने की ताकत रखता है। यह सही है कि सपने देखो और उन्हें पूरा करने की कोशिश करो। लेकिन ऐसे सपने मत देखो कि जिन्हें पूरा करने के लिए अपना बहुत कुछ दाव पर लगाना पड़े।
ससुराल में जाने के बाद हर स्त्री का सपना होना चाहिए कि वह अपने पति और ससुराल वालों को खुश रखे। उसके घर में सुख-शांति बनी रहे। जिंदगी में किसी प्रकार की कोई परेशानी न आए। यह ऐसे सपने होते हैं जिनके नतीजे ज्यादातर सकारात्मक होते हैं। ऐसे सपनों को पूरा करने में अगर स्त्री अपनी पूरी जिंदगी भी कोशिश करते रहे तो यह उसके लिए कोई घाटे वाला सौदा साबित नहीं होता। परिवार की सुख-शांति के लिए हर पत्नी को अपने पति के साथ पूरा सहयोगात्मक रुख अपनाकर चलना चाहिए। घर की सुख-शांति के लिए देखे गए सपने में अगर उसे अपने पति की मदद भी लेनी पड़े तो कोई बुरी बात नहीं है। चाहे तो पूरा परिवार ही स्त्री के इस सपने को पूरा करने में सहयोग दे सकता है। अगर स्त्री का यह सपना पूरा हो जाता है तो उसे लगता है कि उसका जीवन सफल हो गया।

रजोनिवृत्ति 
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परिचयः-
जिस प्रकार से युवावस्था शुरू होने पर स्त्री को मासिकधर्म आने लगता है, ठीक उसी प्रकार से वृद्धावस्था शुरू होने पर यह आना बंद हो जाता है। यह अधिकतर स्त्रियों में 42 वर्ष से 50 वर्ष के समय में होता है। अतः कहा जा सकता है कि लगभग 40 से ऊपर की आयु को पार कर चुकी स्त्रियों को जब मासिकधर्म आना बंद हो जाता है तो उसे ही रजोनिवृत्ति कहा जाता है।
यह समय आना स्त्रियों में स्वाभाविक प्रक्रिया है लेकिन कभी-कभी इसमें इतने अधिक शारीरिक उलट-फेर होते हैं हुए देखे गये हैं कि इसको बहुत सी स्त्रियां बीमारी भी समझने लगती हैं। वैसे यह समय जब स्त्री में आ जाता है तो यह समझना चाहिए कि अब वह गर्भधारण और बच्चा पैदा करने के योग्य नहीं रही है।
रजोनिवृत्ति का शरीर पर प्रभाव-
इस समय में स्त्रियों के यौनांगों के आकार-प्रकार पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। इसकी वजह से स्त्रियों की डिम्ब ग्रंथियां धीरे-धीरे मुरझाकर सिकुड़ जाती हैं। गर्भाशय का मुख भी सिकुड़कर एक प्रकार से सूख जाता है। इस समय से योनिमार्ग भी मुरझाकर इतना अधिक सिकुड़ जाता है कि उसका कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता है और ठीक इसी प्रकार से योनिद्वार भी सिकुड़कर छोटा हो जाता है। भगोष्ठों पर भी झुर्रिया आ जाती हैं। इस समय में स्त्रियों के स्तन के आस-पास की चर्बी भी कम हो जाती है और उनके आकार छोटे पड़ जाते हैं। स्तनों की त्वचा पर झुर्रियां पड़ जाती हैं। इसके अलावा शरीर के कई और भागों में भी कुछ परिवर्तन होने लगता है। इन सब परिवर्तनों के कारण से स्त्रियों के शरीर की कई ग्रंथियों के स्राव में बदलाव आ जाता है जिसके कारण से स्त्री को सेक्स क्रिया करने की इच्छा समाप्त हो जाती है।
रजोनिवृत्ति के लक्षण-
यह एक प्रकार की स्वाभाविक प्रक्रिया है। जब यह समय स्त्रियों में आ जाता है तो उसमें कुछ इस प्रकार के लक्षण दिखाई देने लगते हैं- मासिक-स्राव धीरे-धीरे आना बंद हो जाता है और फिर कभी भी नहीं आता, इस समय में स्त्री को कोई भी परेशानी नहीं होती लेकिन फिर भी बहुत सी स्त्रियां अपने आप को रोगी समझने की भूल कर बैठती हैं।
रजोनिवृत्ति के समय में स्त्रियों में कुछ प्रमुख लक्षण दिखाई पड़ते हैं-
• शरीर से पसीना आना। 
• दिल की धड़कन बढ़ जाना तथा घबराहट होना।
• सिर में दर्द तथा चक्कर आना।
• चेहरा लाल तथा गर्म महसूस होना।
• स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाना।
• शारीरिक कमजोरी अधिक महसूस होने लगना। 
• हमेशा उदासीपन छाई रहना।
• पेट से संबंधित समस्या होना। 
• पाचनशक्ति कमजोर पड़ जाना।
• मुंह का स्वाद बिगड़ा लगना तथा जी मिचलाना और उल्टियां आना।
• कब्ज की समस्या होना। 
• इस प्रकार के लक्षण होने के साथ-साथ धीरे-धीरे मासिकस्राव बंद हो जाना। 
• किसी-किसी अपवाद के रूप में स्त्री को इस समय में गर्दन में दर्द होते हुए देखा गया है। 
• किसी-किसी स्त्रियों के हाथ-पैर सुन्न हो जाते हैं और किसी को कमर तथा जोड़ों में दर्द होने लगता है।
• इस समय में बहुत-सी स्त्रियों को मानसिक तनाव भी होने लगता है। 
• कुछ स्त्रियों को तो इस समय के बाद शरीर पर चर्बियां पड़ने लगती हैं। 
• कुछ स्त्रियों में तो यह भी देखा गया है कि मासिकधर्म दो से चार या छः महीने बंद रहने के बाद फिर होने लगता है और अधिक मात्रा में होता है तथा धीरे-धीरे बंद हो जाता है। यदि इस प्रकार के लक्षण स्त्रियों में हैं तो उसके गर्भाशय में कैंसर होने का डर लगा रहता है। 
सेक्स में समय का महत्व 
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सेक्स कब और कितने दिनों पर करें-
आमतौर पर यह सवाल सभी के मन में उठता है कि महीने में सेक्स कितनी बार करना चाहिए। कुछ लोग सेक्स को प्रतिदिन किए जाने वाला कार्य समझते हैं। सेक्स के प्रति इस तरह की भावना रखने वाले व्यक्ति मूर्ख और नादान होते हैं जो यह नहीं समझ पाते हैं कि कोई भी वस्तु कितनी भी अच्छी क्यों न हो, जरूरत से अधिक उपयोग करने पर हानि ही पहुंचाती है। इसी तरह सेक्स की भी अपनी एक स्थित और समय होता है। आयुर्वेद के अनुसार जो पुरुष स्त्री के साथ संयम और नियम से सेक्स करता है, वह जल्दी बूढ़ा नहीं होता। सेक्स और शरीर विशेषज्ञों का कहना है कि स्त्री-पुरुष दोनों को अपनी स्वास्थ्य क्षमता और शारीरिक शक्ति के अनुसार ही सेक्स करना चाहिए। 
‘चरक संहिता’ और ‘सुश्रुत संहिता’ जैसे स्वास्थ्य ग्रंथों में सेक्स के बारे में अलग-अलग ऋतु में समय और अंतर की बाते लिखी गई हैं। इन ग्रंथों में लिखा है कि व्यक्ति को कितने दिन सेक्स करना चाहिए, सेक्स की उत्तेजना किस मौसम में अधिक होती है, अलग-अलग अंतराल पर सेक्स क्यों करना आवश्यक है तथा विपरीत मौसम में अधिक सेक्स करने से क्या हानि हो सकती है।
हरहराचार्य द्वारा रचित ‘शांगंधर दीपिका’ नामक कामशास्त्र में लिखा कि अलग-अलग दिनों में स्त्री के अलग-अलग अंगों में सेक्स की उत्तेजना अधिक रहती है। यदि उन दिनों स्त्री के उन अंगों से छोड़छाड़ किया जाए तो वह जल्द ही उत्तेजित हो जाती है। हरहराचार्य लिखते हैं कि मासिकस्राव से पहले और बाद में स्त्री के अलग-अलग अंगों में उत्तेजना होती है। मासिकधर्म के बाद जो 15 दिन हों उसे शुक्ल पक्ष और पहले 15 दिन को कृष्ण पक्ष कहा जाता है।
मासिकस्राव से पहले और बाद में स्त्री के अलग-अलग उत्तेजित होने वाले अंगः- 

तिथि मासिकस्राव से पहले (कृष्ण पक्ष) मासिकस्राव के बाद (शुक्ल पक्ष) तिथि मासिकस्राव से पहले (कृष्ण पक्ष) मासिकस्राव के बाद (शुक्ल पक्ष) 

8 मस्तक
आंखें
होंठ
गाल
गर्दन
कांख
स्तन
हृदय अंगूठा
पैर
टखना
जांघ
योनि
कमर
नाभि

15 नाभि
कमर
योनि
जांघ
टखना
पैर
अंगूठा स्तन
कांख
गर्दन
गाल
होंठ
आंखें
मस्तक

सेक्स के बारे में महत्वपूर्ण बातें-
• हमेशा दिन में सेक्स संबंध बनाने से बचना चाहिए। रात को ही सेक्स करना चाहिए क्योंकि रात को सेक्स करने से सेक्स का पूर्ण आनन्द मिलता है। 
• खाना खाने के तुरंत बाद सेक्स नहीं करना चाहिए। इससे पाचन तंत्र खराब होता है। खाना खाने के लगभग तीन-चार घंटे बाद ही सेक्स करना चाहिए। 
• आधी रात को किया गया सेक्स काफी आनंददायक होता है। सूर्य निकलने से कुछ समय पहले सेक्स संबंध नहीं बनाना चाहिए क्योंकि यह शारीरिक व मानसिक दोनों ही तरह से काफी नुकसानदायक होता है। 
• भूख, प्यास तथा अधिक भोजन आदि की स्थिति सेक्स संबंधों के लिए बहुत हानिकारक होती है। 
• अधिक उतावलापन, बेचैनी तथा अधीरता में सेक्स संबंध नहीं बनाना चाहिए। इससे सेक्स का आनन्द नहीं मिलता है और साथ ही मानसिक तनाव बढ़ जाता है। 
• पानी के भीतर, शौचालय, कार के भीतर, गुफा, खुले मैदान, चौराहे, झाड़ियों की आड़ आदि स्थानों पर सेक्स संबंध नहीं बनाना चाहिए। 
• एक से अधिक स्त्री के साथ सेक्स संबंध नहीं बनाना चाहिए क्योंकि इससे रोग हो सकता है। 
• यदि सेक्स के बाद लिंग पर किसी प्रकार के चिह्न या घाव आदि दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए। 
• अधिक सेक्स कभी नहीं करना चाहिए। इससे शरीर में कई प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। 
• वेश्या, कॉलगर्ल एवं पराई स्त्री के साथ यौन संबंध नहीं बनाना चाहिए। इससे सेक्स रोग हो सकता है। 
‘सुश्रुत संहिता’ और ‘चरक संहिता’ के अनुसार किस ऋतु में कितनी बार सेक्स करना चाहिएः


ऋतु शिशिर बसंत ग्रीष्म वर्षा शरद हेमंत
महीने दिसम्बर-जनवरी फरवरी-मार्च अप्रैल-मई जून-जुलाई अगस्त-सितंबर अक्टूबर-नवंबर
सेक्स कितने दिनों के अंतर पर करना चाहिए 3 दिनों के अंतर पर (शुक्ल पक्ष.)
इच्छानुसार (कृष्ण पक्ष.) 3 दिनों के अंतर पर (शुक्ल पक्ष.)
3 दिनों के अंतर पर (कृष्ण पक्ष.) 15 दिनों के अंतर पर (शुक्ल पक्ष.)
15 दिनों के अंतर पर (कृष्ण पक्ष.) 3 दिनों के अंतर पर (शुक्ल पक्ष.)
15 दिनों के अंतर पर (कृष्ण पक्ष.) 3 दिनों के अंतर पर (शुक्ल पक्ष.)
3 दिनों के अंतर पर (कृष्ण पक्ष.) 3 दिनों के अंतर पर (शुक्ल पक्ष.)
इच्छानुसार (कृष्ण पक्ष.)
सेक्स की उत्तेजना सबसे अधिक कब होती है रात्रि में (शुक्ल पक्ष.)

रात्रि में (कृष्ण पक्ष.)
दिन-रात कभी भी (शुक्ल पक्ष.)
दिन-रात कभी भी (कृष्ण पक्ष.) रात्रि में (शुक्ल पक्ष.)

दिन में (कृष्ण पक्ष.)
हल्के वर्षा के समय (शुक्ल पक्ष.)
बादलों की गरज के समय (कृष्ण पक्ष.) रात्रि में (शुक्ल पक्ष.)

रात्रि में (कृष्ण पक्ष.)
रात्रि में (शुक्ल पक्ष.)

रात्रि में (कृष्ण पक्ष.)

स्थान सेक्स बंद कमरे में जहां अधिक ठंड हो वहां करना चाहिए। जंगल में बने घर में सेक्स करना चाहिए। जहां मौसम न अधिक गर्म हो और न अधिक ठंड हो वहां सेक्स करना चाहिए। समान्य से थोड़े कम तापमान वाले स्थान पर सेक्स करना चाहिए। जहां जहां मौसम न अधिक गर्म हो और न अधिक ठंड हो वहां सेक्स करना चाहिए। हेमंत के मौसम में गर्म कमरे में सेक्स करना चा


सेक्स में नयापन 
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परिचय-
सेक्स क्रिया में आनन्द और संतुष्टि पाने के लिए सेक्स संबंधों में नयापन लाना आवश्यक होता है। एक ही तरीके से सेक्स संबंध बनाने से यह सेक्स संबंध उबाऊं, बोरिंग और सुस्त लगने लगता है। जब सेक्स संबंधों में कोई नयापन नहीं होता है तो पति-पत्नी एक-दूसरे को दोष देने लगते हैं।
सेक्स संबंधों में आनन्द और संतुष्टि न मिलने से पति-पत्नी के बीच एक दीवार सी बनने लगती है जिसका प्रभाव वैवाहिक जीवन पर पड़ता है। सेक्स संबंधों में आनन्द न मिलने से पति-पत्नी के बीच मनमुटाव होने से दोनों दुखी रहने लगते हैं जिससे सेक्स की इच्छा में कमी आने लगती है। इस तरह के कारणों से पति-पत्नी अलग रहने लगते हैं या उनका जीवन कष्टमय हो जाता है। अतः जीवन में उत्पन्न इस तरह की समस्याओं से बचने के लिए सेक्स संबंधों में नयापन लाना बेहद आवश्यक है।
सेक्स संबंधों में नयापनः
एक-दूसरे के प्रति प्यार को बढ़ावा देना-
युवक-युवतियों की जब शादी होती है तो शादी के कुछ दिनों तक सब कुछ ठीक रहता है। पति-पत्नी के बीच संबंध अच्छे रहते हैं लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जाता है वैसे-वैसे काम व अन्य कारणों से पति-पत्नी के बीच दूरियां बढ़ती जाती हैं जिससे उन्हें आपस में प्यार करने का मौका ही नहीं मिलता और उनके बीच सेक्स संबंधों में भी खटास बढ़ने लगता है। वैवाहिक जीवन में उत्पन्न इस तरह की समस्याओं से बचने के लिए आवश्यक है कि पति-पत्नी आपस में बात करने के लिए समय निकालें। एक-दूसरे से अच्छी बाते करें और एक-दूसरे की बातों को सुने। दोनों ही एक-दूसरे का सम्मान करें और सेक्स संबंध के नए तरीकों को अपनाएं।
एक-दूसरे के बीच अच्छे संबंध के लिए उपहारः
वैवाहिक जीवन को आनन्दित व सुखी बनाने के लिए आवश्यक है कि पति-पत्नी समय-समय पर एक-दूसरे को उपहार दिया करें। यह आवश्यक नहीं है कि उपहार के लिए कोई खास मौका ही हो। इस तरह एक-दूसरे को उपहार देने से वैवाहिक जीवन में संतुलन बना रहता है और एक-दूसरे के प्रति प्यार बढ़ता है।
सेक्स संबंधों में नयापन के लिए कपड़ों की अदला-बदलीः
वैवाहिक जीवन में किसी प्रकार का कोई विवाद एवं असंतुष्टि पैदा न हो, इसलिए जब भी मौका मिले अपनी पत्नी की सुन्दरता, उसके कपड़े और बातों की तारीफ करना चाहिए। इस तरह पत्नी को भी पति की तारीफ करनी चाहिए। एक-दूसरे की तारीफ करने से सेक्स संबंधों में नवीनता आती है। सेक्स संबंधों में नवीनता के लिए चाहिए कि बेडरूम वे एक-दूसरे के कपड़े पहने तथा अलग-अलग तरीके से एक-दूसरे को खुश करने की कोशिश करें।
बच्चों जैसी हरकते करनाः
सेक्स संबंधों में नवीनता लाने के लिए पति को चाहिए कि वह अपनी पत्नी के सामने बच्चों की तरह व्यवहार करे और घुटने के बल चले। पति-पत्नी दोनों के एक-दूसरे के अंगों के साथ छेड़छाड़ करना चाहिए। पत्नी को चाहिए कि पति को घोड़ा बनने के लिए कहें और उस पर सवार हो जाए। बेडरूम में जाते समय दोनों को आवाज निकालना चाहिए। पत्नी को चाहिए कि पत्नि के स्तनों को स्पर्श करे तथा चूसे। इस तरह की हरकते करने से पत्नी के मन में प्यार और उत्तेजना बढ़ने लगती है जिससे सेक्स क्रिया में बेहद आनन्द मिलता है।
बार-बार हनीमून मनानाः
सेक्स संबंधों के प्रति हमेशा उत्साह और चाह बनाए रखने के लिए पति-पत्नी को चाहिए कि वे हर साल कहीं न कहीं घूमने के लिए जाएं। घूमने के लिए आप हनीमून के लिए जहां गए थे वहां जा सकते हैं या किसी नई जगह और होटल भी चुन सकते हैं। इस तरह जब आप घूमने जाएं तो एक-दूसरे को पहली हनीमून पर किए गए कार्य और बातों को याद कराएं। इस तरह बाहर घूमने और अपनी हनीमून के बारे में बात करने से सेक्स संबंधों की याददाश्त ताजा हो जाती है और सेक्स क्रिया में नयापन महसूस होता है।
प्यार भरी बातेः 
शादी के बाद पति-पत्नी दोनों के बीच एक समस्या रहती है वे एक-दूसरे को किस नाम से बुलाएं। आमतौर पर लोग अपनी पत्नी को सामान्य नाम से पुकारतें हैं जैसे- एजी, ओजी आदि। इसके अतिरिक्त कुछ लोग अपनी पत्नी को उसके मायके के नाम से भी पुकारते हैं। लेकिन पति-पत्नी के बीच अच्छे संबंध बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि वे दोनों एक-दूसरे को पुकारने के लिए अच्छे नाम रखें और उसी नाम से उसे पुकारें। इससे एक-दूसरे के प्रति प्यार बढ़ता है।
मीठी बाते करनाः
पति-पत्नी को आपसी संबंधों को सही बनाए रखने के लिए कभी-कभी एक साथ बैठकर अपने विवाह के फोटो एलबम या वीडियो रिकॉडिंग देखना चाहि्ए। विवाह के समय किए गए कार्यों को याद करना चाहिए, पहली बार मिलने पर किए गए बातों को याद करना चाहिए, सुहागरात के समय की गयी सेक्सी बातों व घटनाओं को एक-दूसरे को सुनाएं। इस तरह पुरानी बातों और घटनाओं को याद करने से पति-पत्नी के बीच नजदीकियां बढ़ती है जिससे सेक्स संबंधों में नयापन आता है।
सेक्स संबंधी अंगों का नाम रखनाः
स्त्री-पुरुष चाहे तो वे सेक्स संबंधी अंगों को नाम दे सकते हैं लेकिन इन नामों को केवल बेडरुम में ही उपयोग करना चाहिए। स्तनों, लिंग और योनि का नाम रख सकते हैं। इस तरह इन अंगों के नाम रखने से सेक्स क्रिया बेहद रोमांचित और आनन्दित होता है।
सेक्स क्रिया के समय बाते करनाः 
सेक्स संबंध बनाने से पहले स्त्री को पुरुष के लिंग को सहलाना चाहिए और उससे बाते करनी चाहिए। इस क्रिया में इस तरह बाते करनी चाहिए जैसे कोई किसी व्यक्ति से बाते करता है। इस तरह पुरुष को भी स्त्री की योनि और स्तनों से बाते करनी चाहिए। इस तरह दोनों को एक-दूसरे के अंगों से बाते करनी चाहिए। इससे सेक्स क्रिया में बेहद उत्तेजना पैदा होती है जिससे सेक्स का भरपूर आनन्द मिलता है।
सेक्स क्रिया से पहले का खेलः
सेक्स संबंध बनाने से पहले पति-पत्नी को चाहिए कि वे आपस में कोई भी खेल-खेले। पति-पत्नी दोनों को ही एक-दूसरे के अंगों को सहलाना और छूना चाहिए। इस तरह एक-दूसरे के अंगों से खेलने से दोनों के अन्दर कामुक उत्तेजना उत्पन्न होगी। इस प्रकार कामुक उत्तेजना पैदा होने के बाद सेक्स करने से सेक्स में नयापन के साथ-साथ आनन्द भी मिलता है।
आंखों-आंखों में बाते करनाः
पति-पत्नी को सेक्स संबंधों को बेहतर बनाने के लिए एक-दूसरे से आंखों ही आंखों में बाते करते हुए रात को सेक्स क्रिया के लिए प्रोग्राम बनाना चाहिए। इस तरह मुंह से बिना कुछ बोले इशारों से सेक्स की बाते करने और सेक्स के लिए एक-दूसरे को उत्तेजित करने से सेक्स क्रिया का आनन्द और सुख और बढ़ जाता है।
नए तरीके से सेक्स की पहल करनाः 
सेक्स संबंध बनाने के लिए हमेशा नए-नए तरीके का उपयोग करना चाहिए क्योंकि एक ही तरीके से सेक्स करने से सेक्स के दौरान वह आनन्द नहीं मिलता जो मिलना चाहिए। सेक्स संबंध बनाने से पहले एक-दूसरे की तारीफ करनी चाहिए। पुरुष को स्त्री से सेक्स संबंधित बाते करनी चाहिए, उसकी बालों, आंखों और उसकी खूबसूरती की तारीफ करनी चाहिए। सेक्स संबंधी कोई घटना सुनाएं, उसके शरीर व कामुक अंगों को सहलाएं। इससे स्त्री और पुरुष दोनों में सेक्स के प्रति उत्तेजना बनी रहती है और सेक्स से दोनों को पूर्ण आनन्द मिलता है। पति-पत्नी दोनों को ही सेक्स संबंधों के लिए नये तरीकों का उपयोग करना चाहिए। हमेशा सेक्स के नये तरीके का उपयोग करने से सेक्स का आनन्द बना रहता है।
शादी की सालगिरह मनानाः
वैवाहिक जीवन सुखमय बनाने और सेक्स के रोमांच को कायम रखने के लिए शादी की सालगिरह मनानी चाहिए। शादी की सालगिरह मनाने से पति-पत्नी दोनों की पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। दोनों के अन्दर की भावनाएं जागृत हो जाती हैं और हनीमून की याद ताजा हो जाती है। सालगिरह पर रोमांटिक जगहों पर घूमने जाना चाहिए और रोमांटिक बातें करनी चाहिए।
गिफ्ट देनाः 
वैवाहिक जीवन में एक-दूसरे को खुश रखने के क्रम में गिफ्ट का भी बेहद महत्व है। स्त्री-पुरुष दोनों को ही एक-दूसरे को गिफ्ट देना चाहिए। इससे एक-दूसरे के लिए मन में प्यार बढ़ता है और आपसी संबंध ठीक रहते हैं। पति को चाहिए कि गिफ्ट देने से पहले वह चोरी-छिपे यह जानने की कोशिश करे कि गिफ्ट में क्या दे जो उसे पसंद हो। इस तरह पत्नी को भी पति के खुश करने के लिए गिफ्ट देना चाहिए। इससे दोनों का मन प्रसन्न रहता है जिसके कारण सेक्स संबंध में बेहद आनन्द और सुख मिलता है। 
सेक्स के लिए आसनों का उपयोग करनाः
सेक्स क्रिया में आसन का बेहद महत्व है। एक ही तरीके और एक ही आसन में सेक्स करने से पति-पत्नी को सेक्स से शारीरिक व मानसिक सुख नहीं मिल पाता जो उसे सेक्स से मिलना चाहिए। ऐसे में सेक्स का भरपूर आनन्द प्राप्त करने के लिए हमेशा नए-नए आसनों का उपयोग करना चाहिए। अलग-अलग आसनों में सेक्स करने से सेक्स का पूर्ण आनन्द मिलता है। सेक्स में आनन्द के लिए कभी भी ऐसे आसनों का प्रयोग न करें जिससे स्त्री को कष्ट हो क्योंकि ऐसे आसनों में सेक्स करने से न ही आनन्द मिलता है और न ही संतुष्टि। ऐसे कष्टकारी आसनों में सेक्स करने से स्त्री रोगग्रस्त भी हो सकती है। अतः अलग-अलग आसनों में सेक्स करें लेकिन कठिन आसनों में कभी भी सेक्स न करें।

कैसे जीतें पत्नी का तन और मन 
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कोई भी पुरुष जब किसी स्त्री से विवाह कर लेता है तो उसके बाद उस पुरुष का अपनी पत्नी पर पूरा अधिकार हो जाता है। पत्नी को पति के अनुसार ही अपनी आगे की जिंदगी बितानी पड़ती है। मां-बाप के घर के बाद पति का घर ही पत्नी का आसरा होता है। पत्नी जब अपने आपको पूरी तरह से पति के आसरे छोड़ देती है तो पति का भी फर्ज बनता है कि वह भी उसका अच्छी तरह से ख्याल रखे, वह अपनी पत्नी के सुख-दुख का पूरा ध्यान रखे।
हर पत्नी शादी के बाद अपने तन और मन को पति के लिए समर्पित कर देती है क्योंकि वह जानती है कि शादी के बाद पति को सबसे पहले अपनी पत्नी का शरीर चाहिए होता है। इसको इस तरह से भी देखा जा सकता है कि शादी के बाद पत्नी के लिए समर्पण जरूरी हो जाता है लेकिन यह समर्पण का भाव स्त्री के लिए हमेशा एक समान नहीं रहता कभी-कभी तो स्त्री में यह समर्पण का भाव पूरे उत्साह के साथ रहता है जिसमें वह पति के साथ संबंध बनाते समय पूरा आनंद उठाती है परंतु कभी-कभी उसके लिए यह समर्पण मजबूरी बन जाता है जिसमें स्त्री हर प्रकार के आनंद से वंचित रहती है। इसलिए पुरुष को चाहिए कि जो चीज अपनी है ही उस पर जोर-जबर्दस्ती क्या करना। जब पत्नी अपने पति को हर प्रकार के सुख देने के लिए हर समय तैयार रहती है तो फिर पति अपनी पत्नी की इच्छाओं का ख्याल क्यों नहीं रखता।
महान लोगों के अनुसार पत्नी का तन तो हर समय पति के लिए तैयार रहता है लेकिन उसका मन जीतना पति के लिए आसान नहीं होता है। अगर पति अपनी पत्नी का तन प्राप्त करने से पहले उसका मन जीत ले तो इसके बाद पत्नी के द्वारा पति को मिलने वाले शारीरिक सुख का आनंद बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। ऐसे पुरुष बहुत ही कम होते हैं जो इस बात को जानते हैं कि पत्नी का तन जीतने के लिए पहले उसका मन जीतना जरूरी है। पत्नियां भी अपने पति से यही आशा करती हैं कि उनका पति उनके तन से पहले उनके मन पर कब्जा करे क्योंकि इससे वह अपने आपको संबंधों के लिए तैयार कर पाती है।
ऐसे पुरुष जो सिर्फ अपनी पत्नी का तन पाना चाहते हैं उनकी अक्सर यह शिकायत रहती है कि सेक्स संबंध बनाते समय उनको पूरा आनंद प्राप्त नहीं होता। इसका कारण भी वह अक्सर अपनी पत्नियों को ही मानते हैं लेकिन वह नहीं जानते कि इसका कारण वह स्वयं ही है।
संतान न होने की स्थिति में पत्नी को दोष देना- 
अक्सर शादी होने के कुछ समय के बाद ही ससुराल वाले बहू से अपेक्षा करने लग जाते हैं कि उनकी बहू जल्द ही उनको पोते-पोतियों की खुशखबरी सुनाएगी। शादी को पूरा 1 साल भी नहीं होता कि सब बहू को परेशान करने लगते हैं कि वह कब खुशखबरी सुनाएगी। लेकिन जब बहू उनका यह सपना पूरा नहीं करती तो सब मिलकर बहू को दोष देने लगते हैं। इतनी बातें तो शादी होने के 1 साल के अन्दर-अन्दर होने लगती हैं, लेकिन जब शादी को 3-4 साल बीत जाते हैं तो बहू को बांझ, बंजर जमीन आदि नामों से पुकारा जाने लगता है। घर में छोटी-छोटी बातों पर उसको धिक्कारा जाने लगता है। हद तो तब हो जाती है जब शादी के 6-7 सालों में जब बहू मां नहीं बन पाती तो घर वाले अपने लड़के की दूसरी शादी करवाने के लिए विचार करने लगते हैं। यही हालात तब पैदा हो जाते हैं जब लड़के की दूसरी पत्नी भी मां नहीं बन पाती और उसे भी यही सब सहना पड़ता है। लेकिन कोई लड़के की तरफ ध्यान नहीं देता कि लड़की अगर मां नहीं बन पा रही तो इसमें लड़के का दोष भी हो सकता है और उसकी भी जांच कराई जाए।
संतान न होना असल में ऐसी समस्या है जिसका सामना कर पाना पति और पत्नी दोनों के लिए ही बहुत मुश्किल होता है। इसके लिए सबसे अच्छा रास्ता यही होता है कि संतान न होने की स्थिति में पति को अपनी पत्नी के साथ-साथ अपना भी चेकअप करवा लेना चाहिए। इससे अगर पत्नी के अंदर कोई समस्या न होकर पति के अंदर कोई समस्या हो तो उसको दूर किया जा सके।
लड़का न होने पर पत्नी को दोष देना-
हमारे समाज में आज भी बहुत सी जगहों पर लड़के-लड़की में काफी भेदभाव माना जाता है। ऐसे लोगों का मानना होता है कि अगर घर में लड़का पैदा नहीं होगा तो उनका वंश आगे नहीं बढ़ेगा। इसी धारणा के अंतर्गत ऐसे लोग जब तक घर में लड़का पैदा नहीं होता तब तक अपने घर की बहू को बच्चे पैदा करने के लिए उकसाते रहते हैं चाहे लड़के के चक्कर में कितनी ही लड़कियां पैदा क्यों न हो जाएं। ऐसे लोग स्त्री की हालत नहीं देखते हैं कि उसका शरीर बच्चे पैदा करने में सक्षम है भी या नहीं। बहुत से ऐसे मामलों में लड़का पैदा करने के चक्कर में स्त्री की स्थिति इस मोड़ पर आ जाती है कि उस समय बच्चा होने पर या तो मां को बचा लिया जाए या फिर बच्चे को ही। इस तरह के मामलों में भी दोष स्त्री को ही दिया जाता है कि उसमें लड़का पैदा करने की क्षमता ही नहीं है। स्त्री को दिन-रात प्रताड़ित किया जाता है लड़का पैदा करने के लिए। ऐसे मामलों में हद तो तब हो जाती है जब खुद पति ही लड़का पैदा न होने का दोष अपनी पत्नी को ही देने लगता है। इस समय जब पत्नी को अपने पति का सहारा चाहिए होता है लेकिन पति ही उसे प्रताड़ित करे तो पत्नी का तो पूरा मनोबल टूटना स्वाभाविक है। आज के आधुनिक युग में लोगों की लड़के-लड़कियों के मामलों में ऐसी सोच रखना हमें दूसरे देशों के मुकाबले पिछड़ा साबित करती है। ऐसी सोच रखने वाले लोगों को यह समझाना बहुत जरूरी है कि गर्भ में लड़का है या लड़की यह निर्भर होता है पति और पत्नी दोनों के गुणसूत्रों पर। हर स्त्री-पुरूष की शरीर रचना में 46 गुणसूत्र काफी महत्वपूर्ण होते हैं। पुरुष के शुक्राणु तथा स्त्री के रज (अंडाणु) में एक-एक केंद्रक होता है। हर केंद्रक में 46 गुण सूत्रों में से 23 गुणसूत्र प्रजनन की क्षमता रखने वाले होते हैं। स्त्री-पुरुष के 23-23 गुणसूत्रों के योग से प्रजनन क्रिया सम्पन्न होती है। पुरुष के 22+एक्स अथवा 22+वाई और स्त्री के 22+एक्स तथा 22+एक्स के आपस में मिलने से स्त्री को गर्भ ठहरता है। लड़का या लड़की होने का निर्धारण (लड़का होना है या लड़की) पुरुष के एक्स-वाई तथा स्त्री के एक्स-एक्स के आपस में मिलने से होता है। अगर पुरुष का एक्स गुण सूत्र स्त्री के एक्स गुण सूत्र के साथ मिलता है तो स्त्री के गर्भ में लड़की ठहरती है और अगर पुरुष का वाई गुण सूत्र स्त्री के एक्स गुण सूत्र के साथ मिलता है तो स्त्री के गर्भ में लड़का ठहरता है। इसलिए अगर स्त्री के सिर्फ लड़की पैदा होती है तो इसका दोष स्त्री को देना बिल्कुल सही नहीं है क्योंकि स्त्री के तो एक्स-एक्स गुणसूत्र होते हैं जबकि पुरुष के एक्स-वाई गुण सूत्र होते हैं। लड़का पैदा करने के लिए स्त्री के एक्स गुण सूत्र का पुरुष के वाई गुणसूत्र से मिलना जरूरी होता है लेकिन अगर स्त्री के एक्स गुणसूत्र के साथ पुरुष का भी एक्स गुणसूत्र मिलता है तो सिर्फ लड़की ही पैदा होती है। इसलिए जो लोग लड़कियां पैदा होने का दोष सिर्फ स्त्री को देते हैं उनके लिए यह जानना जरूरी है कि लड़का-लड़का पैदा करने के लिए मुख्य भूमिका पुरुष की ही होती है।
पत्नी को अपने हर सुख-दुख में शामिल करें-
हर व्यक्ति के साथ सुख और दुख का बहुत ही गहरा रिश्ता होता है। अपनी पूरी जिंदगी में हर इन्सान को इन सुख-दुखों से गुजरना पड़ता है। लेकिन जो इन्सान इन मुश्किल हालतों में भी डटकर खड़ा रहता है वह ही अपनी इन समस्याओं से मुक्ति पा लेता है। विद्वानों का यह कहना है कि अगर सुख को किसी और के साथ बांट लिया जाए तो उसका मजा और भी बढ़ जाता है और अगर दुख को किसी और के साथ बांट लिया जाए तो वह कम हो जाता है। एक व्यक्ति के लिए सुख-दुख बांटने के लिए उसकी पत्नी से बढ़कर और दूसरा कोई साथी नहीं होता है क्योंकि एक पत्नी ही होती है जो पति के हर सुख हो या दुख उसमें उसके साथ खड़ी रहती है और उसे हौसला देती है। कई मामलों में तो पत्नी की एक सलाह ही पति को बहुत बड़ी परेशानियों को दूर कर देती है।
बहुत से व्यक्तियों के जीवन में जब भी कोई सुख या दुख के पल आते हैं तो वह व्यक्ति शराब या दूसरे नशे में अपने सुख को बढ़ाना चाहता है या फिर उस नशे में डूबकर अपने गम को भुलाना चाहता है। ऐसे समय में अगर पत्नी को ही इन सुख और दुखों में शामिल किया जाए तो व्यक्ति को किसी तरह के नशे में डूबने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
पत्नी के सामने दूसरी स्त्रियों की प्रशंसा करना-
हर इंसान के अंदर श्रेष्ठता, हीनता और जलन जैसी भावनाएं हर समय मौजूद रहती हैं चाहे वह पति हो या पत्नी। अक्सर शादी के बाद पति अपनी पत्नी को अपने पहले अफेयर के बारे में बताता है। वह अपनी पत्नी की तुलना दूसरी लड़कियों से करने लगता है जोकि बिल्कुल ही ठीक नहीं है क्योंकि कोई भी पत्नी यह बर्दाश्त नहीं कर सकती कि उसका पति उसके सामने किसी दूसरी लड़की की प्रशंसा करे। इन बातों की वजह से कई बार पति और पत्नी के बीच में नौबत तलाक तक पहुंच जाती है। बहुत से पुरुष जो महिला साथियों के साथ काम करते हैं वह अक्सर शाम को आफिस आदि से आने के बाद अपनी पत्नी को उनकी बातें बताने लगते हैं, उनके रूप-रंग की तारीफ करने लगते हैं, आफिस में उनके द्वारा लाने वाले खाने के बारे में बताने लगते हैं कि वह कितना अच्छा खाना बनाती है लेकिन इन सबके बीच में वह यह नहीं सोचता कि अपनी जिस पत्नी को वह मजे ले-लेकर दूसरी लड़कियों के बारे में बता रहा है उसके दिल पर क्या बीत रही होगी। बहुत से पुरुष तो अपनी पत्नी के साथ सेक्स संबंध बनाते समय भी दूसरी लड़कियों की तारीफ करने से बाज नहीं आते हैं जिसका नतीजा यह होता है कि पत्नी को सेक्स संबंधों में किसी प्रकार का आनंद नहीं आता है। इन सबके कारण स्त्री कुछ ही समय में चिड़चिड़ी हो जाती है और छोटी-छोटी बातों पर लड़ने-झगड़ने लगती है। इन सबसे बचने का तरीका यही है कि पति को अपनी पत्नी के सामने दूसरी स्त्रियों की प्रशंसा नहीं करनी चाहिए, जहां तक हो सके अपनी पत्नी की ही ज्यादा से ज्यादा तारीफ करें।
शराब पीकर सेक्स करना-
बहुत से सेक्स विद्वानों का मानना है कि सिर्फ सेक्स ही एक ऐसी क्रिया है जो पुरुष और स्त्री को एक-दूसरे के बिल्कुल तन और मन के करीब कर देती है। इसलिए सेक्स संबंधों का शादीशुदा जीवन में महत्व बढ़ जाता है। अगर स्त्री या पुरुष में से कोई भी अपने बीच में होने वाले सेक्स संबंधों से असंतुष्ट हैं तो वह दिमागी रूप से खुद को अस्वस्थ महसूस करते हैं। यह समस्या पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को ज्यादा परेशान करती है अर्थात ज्यादातर मामलों में स्त्री को सेक्स संबंधों में असंतुष्ट ही रहती है। पुरुषों के साथ चाहे किसी भी तरह की सेक्स संबंधी परेशानी हो उसका सबसे बुरा असर स्त्री पर ही पड़ता है। इसके अलावा जब कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ होता है, सेक्स संबंधों में पूरी तरह से सक्षम होता है लेकिन अगर शराब पीकर सेक्स संबंध बनाता है तो भी स्त्री इन संबंधों का पूरी तरह से आनंद नहीं उठा पाती। इन बातों को ज्यादातर पुरुष या तो समझते नहीं है या समझते हैं भी तो इसे अनदेखा कर देते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि पत्नी अपने तन से तो पति के नजदीक हो जाती है लेकिन मन से वह उससे दूर ही रहती है।
स्त्रियों को अक्सर शराब की दुर्गंध बर्दाश्त नहीं होती है इसी कारण जब पति शराब पीकर पत्नी के साथ संबंध बनाता है और पत्नी के साथ चुंबन आदि करता है तो उसकी सांसों में से आने वाली शराब की दुर्गंध के कारण पत्नी अपना चेहरा इधर-उधर घुमाने लगती है। उसकी कोशिश यही रहती है कि उसका पति उससे दूर ही रहे। शराब पीकर सेक्स संबंध बनाने वाले पुरुषों के लिए सेक्स संबंध सिर्फ सजा के तौर पर ही बनते हैं। कुछ समय के बाद ऐसे पतियों की पत्नियां अपने पति से कटी-कटी रहने लगती हैं, सेक्स के प्रति उनकी रुचि समाप्त होने लगती है। ऐसे लोगों का कहना होता है कि उनकी पत्नियां सेक्स संबंधों के समय उनके साथ किसी प्रकार का सहयोग नहीं करती। अगर किसी व्यक्ति को शराब पीने की बुरी लत लगी हो तो उसे चाहिए कि उसे जिस समय सेक्स संबंध बनाने हो उस समय शराब नहीं पीनी चाहिए। कई लोगों का यह भी मानना होता है कि शराब पीकर सेक्स संबंध बनाने से ज्यादा आनंद आता है लेकिन यह बात बिल्कुल गलत है। शराब पीकर सेक्स संबंध सिर्फ कुछ समय के लिए ही होते हैं उसके बाद पुरुष की सेक्स संबंध बनाने की क्षमता पहले से भी कम हो जाती है।
पत्नी के बीमार होने पर-
अक्सर स्त्रियां घर के काम-काज के कारण या बच्चों आदि में पड़कर अपने स्वास्थ्य की तरफ ध्यान नहीं देती हैं। छोटी-मोटी बीमारियों की तो वे बिल्कुल ही परवाह नहीं करती और घर के कामकाज में ही लगी रहती हैं। ऐसे में पति का यह फर्ज बनता है कि वह अपनी पत्नी का ध्यान रखें। पत्नी को यदि कोई रोग हो तो उसकी पूरी देखभाल करने का जिम्मा उसके पति पर ही आ जाता है। अगर स्त्री संयुक्त परिवार में रहती है तो घर के दूसरे लोग उसका पूरा सहयोग करते हैं लेकिन दिक्कत तो तब आती है जब पति और पत्नी अकेले रहते हैं। ऐसे में पत्नी का अपने पति के अलावा देखभाल करने का कोई आसरा नहीं रह जाता।
बहुत से लोग ऐसे होते हैं कि उनको पत्नी की किसी तरह की रोग या परेशानी नजर ही नहीं आती। उसको समय पर खाना चाहिए होता है, समय पर धुले हुए कपड़े चाहिए होते हैं। अगर यह सब समय पर नहीं मिलता तो वह गुस्से में भर जाता है और पत्नी को बुरा-भला कहने लगता है। ऐसे में पत्नी अगर अपने पति को यह बताती है कि उसकी तबीयत खराब थी जिसके कारण वह घर का कामकाज नहीं कर पाती तब भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, वह उल्टा अपनी पत्नी से सहानुभूति जताने के बजाय उल्टा-सीधा बोलने लगता है। ऐसे पति यह नहीं देखते कि जब वह खुद बीमार होता है या घर का कोई और सदस्य बीमार होता है तो वही पत्नी अपना सब कुछ भूलकर उनकी देखभाल में लग जाती है। उस समय उसे अपने खाने-पीने का भी ध्यान नहीं रहता। ऐसा माना जाता है कि रोग के समय रोगी को जितना लाभ अपने परिजनों की सेवा सुश्रुषा, सहानुभूति और अपनेपन द्वारा मिलता है। इससे रोगी को मानसिक रूप से ताकत मिलती है, आशा जागती है, रोग दूर भागते हैं। रोग के समय जिस व्यक्ति की देखभाल ठीक तरह से नहीं हो पाती है वह जल्दी ठीक भी नहीं होता है। इसलिए हर पति का यह फर्ज होता है कि अगर उसकी पत्नी की तबीयत खराब है तो उसको अपनी पत्नी का पूरा ख्याल रखना चाहिए। इसके लिए अगर पति को अपने काम से छुट्टी लेकर भी अपनी पत्नी की देखभाल करनी पड़े तो उसे यह भी करना चाहिए।
गर्भावस्था में खास सावधानी-
कोई भी स्त्री जब पहली बार गर्भवती होती है या ऐसी स्त्री जो शादी के काफी दिनों बाद गर्भवती हुई हो, दोनों ही स्थितियों में उसे खास देखभाल की जरूरत पड़ती है। इस समय बहुत सी स्त्रियां अंदर से डरी हुई होती हैं। ऐसी स्थिति में पुरुष पर दो तरह की जिम्मेदारियां आ जाती हैं। एक तो उसे अपनी पत्नी का पूरा ख्याल रखना पड़ता है और दूसरा खुद पर संयम रखना होता है। अक्सर गर्भधारण के कुछ समय के बाद ही स्त्री की खुद के प्रति संवेदनशीलता कम रहती है जो गर्भ ठहरने के पांचवें महीने के बाद बढ़ने लगती है। इस समय तक स्त्री को अपने गर्भ में पल रहे बच्चे की उपस्थिति का साफ-साफ पता चलने लगता है। गर्भवती स्त्री को बच्चे का गर्भ में हाथ-पैर चलाना, करवट लेना आदि महसूस होने लगता है। इसी के साथ उसके भीतर मातृत्व की भावना भी जागने लगती है। यह स्थिति गर्भवती स्त्री के लिए विशेष महत्व की होती है, इसलिए उनकी देखभाल करने का दायित्व भी बढ़ जाता है। पुरुष को ऐसी अवस्था में पत्नी के साथ किसी भी प्रकार का बुरा बर्ताव नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका असर उसके गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी पड़ सकता है। इसलिए हर पति को चाहिए कि स्त्री की गर्भावस्था में उसका पूरा ध्यान रखें, समय-समय पर उसको दवाईयां दें, उसको समय पर खाना खिलाएं। इससे पत्नी को मानसिक रूप से काफी सहारा मिलता है और वह एक नए जीव को जन्म देने के लिए तैयार हो जाती है।
स्त्री के गर्भवती होते ही उसके पति के आत्मसंयम की परीक्षा चालू हो जाती है। इस समय उसके पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने पर एक तरह से प्रतिबंध लग जाता है। गर्भावस्था के समय के शुरुआती 2 महीनों में तथा आखिरी 2 महीनों में सेक्स करना बिल्कुल ही गलत माना जाता है। इसके अलावा बाकी महीनों में गर्भवती स्त्री के साथ सेक्स संबंध बनाए तो जा सकते हैं लेकिन बहुत ही सावधानी के साथ। कुछ पतियों के लिए इस स्थिति का सामना कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है उनके लिए इतने ज्यादा समय तक सेक्स से दूर रहना एक समस्या हो जाती है। कुछ पुरुष इससे बचने के लिए दूसरा रास्ता निकाल लेते हैं। कुछ पुरुष गुदामैथुन करने लगते है तो कुछ मुखमैथुन की तरफ अग्रसर होने लगते हैं। आमतौर पर स्त्रियां गुदामैथुन और मुखमैथुन को पसंद नहीं करती हैं लेकिन जब पुरुष जबर्दस्ती करता है तो वह मना ही नहीं कर पाती है। वह पुरुष को मनमानी तो करने देती है परंतु उसके मन की भावनाएं भी आहत होने लगती हैं। इसलिए ऐसे समय खुद पर काबू रखना बहुत ही जरूरी होता है।
घर का काम करने में पत्नी का हाथ बंटाना-
अक्सर पत्नी को घर के कामकाज में, बच्चों को संभालने में, मेहमानों की आवभगत करने में इतनी शारीरिक और मानसिक थकान हो जाती है जिसके कारण वह बीमार हो जाती है। ऐसे में स्त्री को महसूस होता है कि कोई ऐसा हो जो उसके कामकाज में थोड़ा हाथ बंटा लें ताकि उसे भी राहत मिले। ऐसे में पुरुष को चाहिए कि वह घर का कुछ काम अपने जिम्मे पर ले ले जिससे कि उसकी पत्नी को भी थोड़ा आराम मिल सके। आजकल ज्यादातर घरों में पति और पत्नी दोनों ही काम करते हैं इसलिए सुबह के काम पति और पत्नी को मिलकर ही करना चाहिए। इसमें चाय-नाश्ते से लेकर खाना बनाना तथा घर की साफ-सफाई शामिल होती है। पत्नी का हाथ बंटाते हुए कहीं भी हीनता का शिकार नहीं होना चाहिए। बहुत से पुरुष कुर्सी पर बैठे-बैठे, चाय पीते हुए, अखबार पढ़ते हुए काफी समय खराब कर देते हैं और फिर आफिस का समय होते ही वह अपनी पत्नी पर काम को जल्दी-जल्दी निपटाने के लिए चिल्लाने लगता है। पत्नी का तो सारा समय ही घर के छोटे-मोटे कामों को करने में ही निकल जाता है। इसलिए पति को खुद ही आगे आकर अपनी पत्नी का हाथ बंटाना चाहिए। पति अगर सारे कामों में पत्नी का हाथ नहीं बंटा सकता तो कुछ काम जैसे सुबह का नाश्ता बनाते समय पत्नी का हाथ बंटा देना, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना और भी कई छोटे-छोटे काम हैं जिनमें वह अपनी पत्नी का हाथ नहीं बंटा सकता है। ऐसा करने से पत्नी के सारे काम जल्दी ही निपट जाते हैं और उसे किसी तरह की शारीरिक और मानसिक परेशानियां भी नहीं होती।

तियों के लिए उपयोगी सुझाव 
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परिचय-
शादी के बाद दाम्पत्य जीवन में प्यार और सुख शांति बनाए रखने के लिए पति और पत्नी को मिलकर कोशिश करनी होती है। परिवार एक ऐसी गाड़ी की तरह है जिसमें पति-पत्नी के रूप में पहिए होते हैं जिसे दोनों को मिलकर खींचना होता है। इन दोनों पहियों में से अगर एक भी खराब होता है तो गाड़ी चलाना मुश्किल हो जाता है।
परिवार को समृद्ध और खुशहाल बनाने के लिए पत्नियों की तरह पतियों की भी बहुत खास भूमिका होती है। अगर दोनों मिलकर कोशिश करते हैं तभी परिवार में सुख-शांति बनी रह सकती है और जहां सुख-शांति है वहीं धन और खुशहाली का निवास होता है। पति या पत्नी में से कोई भी परिवार में अपनी भूमिका से पीछे नहीं हट सकता है क्योंकि दोनों का कार्य क्षेत्र अलग-अलग है। पत्नी का क्षेत्र परिवार के अंदर आता है तो पति का परिवार के बाहर लेकिन सामूहिक रूप से अपने-अपने क्षेत्रों में दिए गए सहयोग का फल मिलकर सामने आता है। पति को परिवार के अंदर भी अपनी कुछ जिम्मेदारियों को निभाना पड़ता है। इसलिए पति और पत्नी दोनों को ही मिलकर अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए काम करते रहना चाहिए।
परिवार में संतुलन- 
शादी के बाद पत्नी का जो सवसे बड़ा सहारा होता है वह उसका पति ही होता है क्योंकि उसकी पत्नी बनने के बाद वह अपना सबकुछ छोड़कर उसके पास आती है। इसलिए पति की जिम्मेदारी होती है कि वह अपनी पत्नी की अच्छी तरह से देखभाल करे। अक्सर देखा जाता है कि शादी के बाद सास और बहू के छोटे-मोटे झगड़े तो होते ही रहते हैं। ऐसे में पति के रात को घर में आने पर उसकी मां झगड़े की बात को बढ़ा-चढ़ाकर बताती है और चाहे गलती खुद की ही क्यों न हो फिर भी सारा इल्जाम अपनी बहू पर लगा देती है। पति भी अपनी मां की बात सुनकर सारा गुस्सा अपनी पत्नी पर निकाल देता है और कई बार तो उसे पीटने पर भी आ जाता है। ऐसा होने पर पत्नी सिर्फ आंसू ही बहा सकती है और कुछ नहीं कर सकती।
पति को इस बात का पूरा ख्याल रखना चाहिए कि उसकी पत्नी उसकी वजह से ही इस घर में आई है। पत्नी पर अगर किसी तरह की परेशानी आती है तो वह सबसे पहले अपने पति से ही कहती है क्योंकि वह ही उसके लिए सबसे बड़ा सहारा होता है इसलिए पति का फर्ज बनता है कि पत्नी के मान-सम्मान की पूरी तरह से रक्षा करे। शादी के बाद पत्नियां पति को परमेश्वर इसीलिए कहती है क्योंकि जिस प्रकार से परमेश्वर सबकी रक्षा करता है वैसे ही पति भी परमेश्वर की तरह उसकी ऱक्षा करें। उसे हर तरह के दुख और तकलीफ से बचाकर रखें।
पत्नी का मजाक उड़ाना-
बहुत से घरों में पत्नी को अक्सर चिढ़ाया जाता है, उसके ऊपर कई तरह के कमेंटस मारे जाते हैं जिनको सुनकर पत्नी को बुरा तो बहुत लगता है लेकिन वह कुछ बोल नहीं पाती। ऐसे में वह सोचती है कि काश उसका पति इस समय उसके साथ खड़े होकर उसका मजाक उड़ाने वालों को जवाब दे। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि उसका पति भी अपने घर वालों के साथ मिलकर ही उसका मजाक उड़ाने लग जाता है। ऐसे में स्त्री के पास आंसुओं के सिवा दूसरा कोई सहारा नहीं रह जाता। बाद में इसको एक मजाक का नाम दे दिया जाता है लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या ऐसा मजाक होता है जो सामने वाले को रोने पर मजबूर कर दे, उसके दिल को दुखाए। मजाक एक हद तक ही सही होता है। चलो मजाक हो भी रहा है तो उस समय पति का फर्ज तो यही बनता है कि अपनी पत्नी का साथ दे क्योंकि जब सब लोग एक साथ मिलकर उसकी पत्नी का मजाक उड़ा रहे हैं तो कोई पत्नी के साथ भी तो होना चाहिए। पत्नी को ऐसा कभी भी एहसास नहीं होना चाहिए कि वह अकेली है बल्कि उसे तो ऐसा लगना चाहिए कि मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि सबसे मुकाबला करने के लिए मेरा पति तो मेरे साथ खड़ा है।
दहेज के लिए पत्नी को प्रताड़ित करना-
हमारे भारतवर्ष में आज भी दहेज नाम का सांप कुंडली मारकर बैठा है। दहेज के नाम पर आज भी कितनी स्त्रियां बलि चढ़ा दी जाती है। कई बार लड़की के मां-बाप शादी के बाद अपनी बेटी को काफी कुछ देकर विदा करते हैं और कुछ बाद में देने का वादा कर लेते हैं। बहुत से लोग जान-बूझकर अमीर घर की लड़की से शादी करते हैं। शादी करने से पहले वह कई तरह की डिमांड लड़की के घर वालों के सामने रख देते हैं। अगर लड़की के घर वाले उनकी डिमांड्स को पूरा भी कर देते हैं तो लड़के के घर वाले और भी चीज तथा पैसों की डिमांड करने लगते हैं। अगर लड़की शादी के बाद अपने घर से पैसा आदि नहीं लाती तो उसे तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाता है। बहुत से पति भी दहेज के चक्कर में पत्नी के साथ बुरा बर्ताव करने लगते हैं जिसके कारण उसकी जिंदगी बहुत बदतर हो जाती है। कभी-कभी इसके परिणाम बहुत ही ज्यादा गंभीर भी निकलते हैं।
हर पति को एक बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि उनके द्वारा दहेज के लिए पत्नी को प्रताड़ित करना बहुत बड़ा पाप होता है इसलिए पत्नी को दहेज के लिए परेशान नहीं करना चाहिए। शादी के बाद लड़की के पिता की मर्जी होती है कि वह अपनी बेटी को क्या देना चाहता है और क्या नहीं देना चाहता है। लेकिन अगर लड़के द्वारा एक भी चीज की डिमांड रखी जाती है तो उससे गिरी हुई बात कोई और नहीं हो सकती। पत्नी को कम दहेज लाने पर या बिल्कुल न लाने पर किसी प्रकार के ताने नहीं देने चाहिए और इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि घर का कोई और सदस्य भी उसे किसी प्रकार से प्रताडि़त न कर पाए। ससुराल वालों को बहू को ही सबसे बड़ा दहेज मानना चाहिए क्योंकि एक मां-बाप के लिए उसकी बेटी से बढ़कर दूसरा और कोई धन नहीं होता है।
शादी के बाद लड़की का नौकरी करना-
आज के समय में बढ़ती हुई मंहगाई के कारण पति और पत्नी दोनों का ही बाहर नौकरी करना जरूरी हो गया है और गृहस्थी को चलाने के लिए भी यह जरूरी है। लेकिन बहुत से घरों में आज भी स्त्री के बाहर काम करने को गलत नजरों से देखा जाता है क्योंकि ऐसे घर के लोगों को लगता है कि अगर स्त्री घर से बाहर रहकर दूसरे पुरुषों के साथ काम करेगी तो उसके दूसरे पुरुषों के साथ संबंध बन सकते हैं। लेकिन ऐसी सोच बिल्कुल गलत है। आज भी बहुत से ऐसे परिवार हैं जहां पर पति और पत्नी दोनों ही बाहर काम करते हैं और उनके बीच में कोई समस्या भी नहीं होती है। कुछ लोग अपनी पत्नी के ऊपर अधिकार जमाने के लिए चाहते हैं कि वह घर पर ही रहे और घर और बच्चों को संभाले। सभी पतियों को चाहिए कि अपने मन से किसी भी तरह के शक आदि को निकालकर अपनी पत्नी को बाहर नौकरी करने देना चाहिए और उसके विकास में भी सहयोग देना चाहिए।
व्यक्तिगत समस्याओं का पत्नी पर गुस्सा उतारना-
आज के समय में बहुत से व्यक्ति इस समस्या से ग्रस्त हैं कि वह अपना किसी भी तरह का गुस्सा आदि अपनी पत्नी पर उतार देते हैं जिसको कि किसी भी रूप में उचित नहीं कहा जा सकता है। हर व्यक्ति किसी न किसी समस्या से ग्रस्त रहता है। अगर व्यक्ति आफिस आदि में काम करता है तो वहां पर बॉस की डांट खानी पड़ती है तो उसे गुस्सा आने लगता है, अगर व्यक्ति अपना काम करता है तो वहां पर फायदा या नुकसान उसके मन में आक्रोश भर देता है। यही गुस्सा जब तक बाहर नहीं निकल जाता तब तक अंदर ही अंदर सुलगता रहता है। इसको पति और पत्नी के बीच होने वाले झगड़ों की बहुत बड़ी वजह माना जाता है। पति को जब अपना गुस्सा निकालने का दूसरा कोई रास्ता दिखाई नहीं देता है तो वह इसे अपनी पत्नी पर निकाल देता है। वह पत्नी की छोटी-छोटी बातों में गलतियां निकालने लगता है और कुछ मामलों में तो बात मारपीट पर भी आ जाती है।
यहां पर सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि पति अपने गुस्से को निकालने का कोई दूसरा रास्ता क्यों नहीं तलाश करता। पत्नी को बार-बार डांटना, उसके कामों में गलतियां निकालना कहां तक सही है। हर व्यक्ति को इस बात की कोशिश करनी चाहिए कि समस्या चाहे आफिस की हो या व्यापार की उसे घर के भीतर नहीं ले जाना चाहिए। बाहर की किसी भी तरह की समस्या का असर पत्नी पर नहीं पड़ना चाहिए नहीं तो इससे घर की सुख और शांति में बाधा पड़ सकती है।
पत्नी से कुछ छिपाना-
बहुत सी पत्नियां अक्सर यह शिकायत करती रहती है कि पति उनसे ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे वह उनकी जिंदगी का हिस्सा ही नहीं है। कई पुरुष अपने घर के सदस्यों के प्रति कुछ ज्यादा ही लगाव रखते हैं। वह घर के किसी भी सदस्य को कुछ भी देते लेते हैं तो अपनी पत्नी को या तो बताते नहीं है या बताना जरूरी नहीं समझते। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि अगर मैं अपने घर वालों को कुछ देता हूं और यह बात मेरी पत्नी को पता चल जाती है तो उसे बहुत बुरा लगेगा। लेकिन जो पति ऐसा सोचते हैं या करते है वह बहुत ही गलत करते हैं क्योंकि घर की कोई भी बात हो वह कभी न कभी पत्नी के सामने आ ही जाती है।
अगर घर में किसी सदस्य को किसी भी चीज की जरूरत होती है और पति अपने घर वालों की उस जरूरत को पूरा कर देता है तो उसे अपनी पत्नी से कुछ भी छिपाना नहीं चाहिए। अगर पति का व्यवहार अपनी पत्नी के प्रति अच्छा है तो कोई भी पत्नी अपने पति की इस बात पर एतराज नहीं करती कि उसका पति अपने परिवार के लिए कुछ क्यों कर रहा है। इसलिए पति की समझदारी इसी में है कि वह हर तरह के लेने या देने में अपनी पत्नी से कुछ न छिपाएं क्योंकि अगर वह अपनी पत्नी को सब कुछ बताकर करता है तो इससे दोनों के ही बीच में प्यार और भरोसा बढ़ता है।
पत्नी को खुश रखना-
एक गृहस्थी संभालने वाली स्त्री पूरे दिन घर के कामों में इतनी थक जाती है कि शरीर के साथ उसका मन भी थकने लगता है। ऐसे में पति की एक प्यार भरी बोली स्त्री के तन और मन की थकान को तुरंत दूर कर देती है लेकिन यह पति पर निर्भर करता है कि वह अपनी पत्नी को किस प्रकार खुश रख सकता है। बहुत से लोग सोचते हैं कि पत्नी को महंगे उपहारों आदि के द्वारा खुश किया जा सकता है लेकिन यह गलत है। पत्नी के लिए तो कई बार सिर्फ पति की एक मुस्कान ही काफी रहती है। इसके अलावा कुछ दूसरे तरीकों के द्वारा भी पत्नी को खुश किया जा सकता है-
• जिस दिन भी पत्नी के साथ संभोग क्रिया करनी हो तो उस दिन फूलों का एक गजरा (वेणी) लेकर आएं। फिर उसे रात के समय स्वयं अपनी पत्नी के बालों में लगाना चाहिए। इस तरह करने से पत्नी का मन आनंद से भर जाता है। 
• महीने में या सप्ताह में 1-2 बार पत्नी को कहीं बाहर घुमाने ले जाना चाहिए या फिल्म आदि दिखाने जाना चाहिए। घूमते समय पत्नी के साथ बाहों में बाहें डालकर प्यार की बातें करनी चाहिए। रोजाना घर के कामकाज करते-करते पति के साथ बाहर घूमने से पत्नी की शारीरिक और मानसिक थकान दूर हो जाती है और मन में नए उत्साह का संचार होता है। 
• घर पर पत्नी अगर खाने में कुछ नया बनाती है तो उसकी दिल खोलकर प्रशंसा करनी चाहिए। हर पत्नी चाहती है कि वह अगर अपने पति के लिए कुछ भी करती है तो पति उसकी बहुत तारीफ करें इसमें पत्नी के द्वारा बनाया गया खाना सबसे अहम होता है। बहुत से पति अपनी पत्नी के द्वारा किए गए किसी भी काम की तारीफ नहीं करते हैं जिससे पत्नी का उत्साह किसी भी काम को करने में नहीं लगता है इसलिए पत्नी की तारीफ करने में किसी तरह की कंजूसी नहीं करनी चाहिए। 
• पत्नी जब भी यह शिकायत करती है कि मेरी तबीयत कुछ खराब है या कुछ अच्छा नहीं लग रहा है तो उसको घर के सारे कामों से छुट्टी दे देनी चाहिए। अगर पति और पत्नी घर में अकेले ही रहते हैं तो पति को ही घर की पूरी जिम्मेदारी संभालनी चाहिए। पत्नी भी जब देखती है कि उसके पति ने पूरा घर संभाल रखा है तो वह भी बहुत खुश हो जाती है और जल्दी ही ठीक हो जाती है। 
• पत्नी की अगर कोई सहेली घर पर आती है तो उसके साथ सही तरह से व्यवहार करना चाहिए। बहुत से पुरुषों की आदत होती है कि वह अपनी पत्नी की सहेलियों के संग कुछ ज्यादा ही घुलमिल जाते हैं और उनसे कुछ ज्यादा ही मजाक आदि करने लगते हैं। इससे पत्नी को अपने पति पर शक होने लगता है और उसकी नजरों में पति की इज्जत कम होने लगती है। इसलिए जब भी पत्नी की कोई सहेली आदि घर पर आए तो अच्छा है कि वह अपनी पत्नी और सहेली को अकेला छोड़ दें। 
• हर पति को अपनी पत्नी के लिए त्यौहार या शादी की सालगिरह पर कोई न कोई गिफ्ट आदि देते रहने चाहिए। उपहार चाहे छोटा हो या बड़ा ये उपहार देने वाले की इच्छा पर निर्भर करता है। पत्नी भी यह नहीं देखती कि मेरे पति ने मुझे छोटा उपहार दिया है या बड़ा। पति के द्वारा मिलने वाला उपहार उसे बहुत ज्यादा खुशी देता है। 
• पति को कभी भी अपनी पत्नी की सालगिरह या जन्मदिन नहीं भूलना चाहिए। बहुत से पति इन खास तारीखों को भूल जाते हैं लेकिन पत्नी कभी ऐसी तारीखों को नहीं भूलती है। इसलिए हर पति को चाहिए कि इन खास तारीखों को कभी न भूलें। पति को शादी की सालगिरह या पत्नी के जन्मदिन पर उसके लिए कोई तोहफा देना चाहिए या पहले से ही कोई उपहार लेकर रखना चाहिए और रात के 12 बजते ही पत्नी को उपहार देकर चौंका देना चाहिए। 
सेक्स संबंध-
पति और पत्नी के बीच के रिश्तों को सही तरह से निभाने के लिए बाकी सब चीजों के साथ एक चीज और भी बहुत जरूरी है जिसके जरा सा भी खराब होने से पति और पत्नी के बीच बहुत बड़ी दरार पड़ सकती है। यह हैं दोनों के बीच में बनने वाले सेक्स संबंध। इन्हीं सेक्स संबंधों के कारण ही पति और पत्नी के बीच व्यक्तिगत संबंधों का निर्धारण होता है। अगर यह संबंध सही है तो सब कुछ सही चलता है लेकिन इन संबंधों में अगर स्त्री असंतुष्ट रह जाती है तो इससे उनकी बसी-बसाई गृहस्थी में उथल-पुथल हो सकता है।
बहुत से मामलों में पुरुष की सेक्स क्षमता किसी न किसी कारण से प्रभावित हो सकती है और स्तंभन शक्ति कम होने लगती है। पुरुष की इस कमजोरी का असर उसकी पत्नी पर पड़ता है। पत्नी की रोजाना की आवश्यकताओं की पूर्ति दूसरे माध्यमों से हो सकती है लेकिन सेक्स संबंधों में उसे जो संतुष्टि चाहिए वह उसे उसके पति के अलावा कहीं और से प्राप्त हो नहीं सकता।
पति के अंदर अगर शीघ्रपतन (संभोग के समय जल्दी स्खलन होना) का रोग हो तो यह उन दोनों के बीच परेशानियों को बढ़ा देता है। जब पति की इस समस्या के कारण पत्नी हर बार सेक्स संबंधों से मिलने वाले चरम सुख से वंचित रह जाती है तो पत्नी के दिल में धीरे-धीरे अपने पति के लिए विरक्ति पैदा होने लगती है और पत्नी अपनी शारीरिक संतुष्टि के लिए दूसरे पुरुष के पास जाने को मजबूर हो जाती है। यही कारण होता है गृहस्थी बिगड़ने का। पुरुषों को इस बारे में बहुत ही गंभीरता से सोचना चाहिए। अगर उसके साथ सेक्स से संबंधित कोई परेशानी हो जाती है तो उसको उपचार करवाने में देरी नहीं करनी चाहिए। अगर इस मामलें में जरा सी भी लापरवाही की जाए तो बहुत खतरनाक हो सकती है।
शारीरिक आकर्षण-
शादी के बाद अपने शारीरिक आकर्षण को बनाए रखना सिर्फ स्त्रियों के लिए ही जरूरी नहीं है बल्कि पुरुषों के लिए भी उतना ही जरूरी है। अक्सर पति शादी के बाद इस बात की जरूरत महसूस नहीं करते कि उन्हें अब अपनी पत्नी को आकर्षित करने के लिए शरीर को अच्छा बनाकर रखने की जरूरत है। बहुत से लोगों का यह भी मानना होता है कि अगर शादी के कुछ साल बाद पति अपने पहनावे को लेकर या अपने शरीर को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित होने लगता है तो समझना चाहिए कि वह किसी और स्त्री के चक्कर में पड़ता जा रहा है। शादी के बाद जिस रफ्तार से स्त्रियां अपने शरीर के प्रति लापरवाह हो जाती हैं उससे ज्यादा पुरुष लापरवाह हो जाते हैं। बहुत से व्यक्ति तो पूरे-पूरे सप्ताह तक शेव करने से भी परहेज करने लगते हैं। छुट्टी वाले दिन तो पुरुष उठकर नहाने धोने में भी आलस्य करने लगता है। आस-पास अगर कहीं भी जाना पड़ता है तो जो कपड़े उसने पहने होते हैं उन्हीं में उठकर चल देता है। इससे पति के प्रति पत्नी का आकर्षण कम होने लगता है जिसका असर उनके बीच बनने वाले शारीरिक संबंधों पर भी पड़ता है। हर पति के लिए यह ध्यान देने वाली बात है कि जिस तरह से वे चाहते हैं कि उनकी पत्नी हर तरह से आकर्षक लगे उसी प्रकार स्त्रियां भी चाहती है कि उनके पति भी सबसे ज्यादा आकर्षक दिखाई दें।
घर में आने वाली आर्थिक समस्या-
शादी के बाद अक्सर छोटे-मोटे इतने खर्चे हो जाते हैं कि घर में आर्थिक समस्या पैदा हो जाती है। पति की तनख्वाह में घर का खर्च नहीं चल पाता है या किसी की शादी वगैरा आ जाती है जिसके लिए धन की जरूरत होने पर किसी से पैसे उधार लेने पड़ते हैं और कुछ समय बाद उसे वापस भी दे दिया जाता है। ऐसे ही पैसों की जरूरत पड़ने पर ससुराल आदि से भी पैसा उधार ले लिया जाता है लेकिन कई लोग ससुराल का पैसा वापिस नहीं करते जोकि गलत है। अगर ससुराल से पैसे लिये जाते हैं तो उन्हें भी जल्दी वापिस कर देने चाहिए नहीं तो इससे ससुराल में नाम खराब होता है।
ससुराल के प्रति सहयोगात्मक रहना-
हर परिवार में कोई न कोई शादी-ब्याह या दूसरे कोई से फंक्शन चलते ही रहते हैं। इसी तरह से पत्नी के घर में भी कोई न कोई फंक्शन आदि होते ही रहते हैं। ऐसे में पत्नी चाहती है कि उसका पति उसके साथ रहे क्योंकि उसे पता होता है कि पति के साथ रहने पर ही उसका सम्मान बढ़ता है। ऐसे में अगर उसका पति उसे पूरी तरह से सहयोग देता है तो उसके आनंद की कोई सीमा नहीं रहती। लेकिन बहुत से पति ऐसे होते हैं जो अपने ससुराल में किसी तरह का सहयोग नहीं करते हैं। ऐसे पति अक्सर पत्नी के मायके में होने वाले कार्यों में कोई न कोई विवाद पैदा कर देते हैं और ऐसे किसी कार्यक्रम में शामिल होने से मना कर देते हैं। ससुराल वाले ऐसे दामादों को मनाते-मनाते थक जाते है लेकिन वह किसी की बात सुनते ही नहीं हैं।
पति के इस तरह के व्यवहार से पत्नी का काफी दिल दुखता है। मायके में भी उसे तरह-तरह की बातें सुननी पड़ती हैं कि तेरा पति कैसा है किसी की बात नहीं सुनता है। इसलिए हर पति का यह कर्त्तव्य होता है कि वह अपनी पत्नी के किसी भी हाल में अपमान न होने दें। ससुराल में पड़ने वाले हर काम में बढ़-चढकर हिस्सा लेना चाहिए। इससे ससुराल में पति का मान-सम्मान बढ़ने से पत्नी को भी बहुत खुशी मिलती है।
पतियों के लिए कुछ और जरूरी बातें-
• बहुत से पतियों की आदत होती है कि वह सोचते हैं कि हमारी शादी हो चुकी है तो मुझे अपनी पत्नी को अपने प्रेम का इजहार करने की कोई जरूरत ही नहीं है लेकिन यह बात गलत है। हर पति को चाहिए कि समय-समय पर अपनी पत्नी से किसी न किसी रूप में अपने प्रेम का इजहार करते रहना चाहिए क्योंकि पति चाहे अपनी पत्नी से कितना भी प्रेम करे लेकिन फिर भी उसे एक आस रहती है कि मेरा पति मुझे रोजाना कहे कि मै तुमसे बहुत प्यार करता हूं। अगर कोई पति अपनी पत्नी से सुबह काम पर जाते समय या शाम को आने के बाद प्यार के दो शब्द बोलता है तो पत्नी के लिए वह दो शब्द सबसे अनमोल होते हैं। 
• पति को कभी-कभी अपनी पत्नी के किसी न किसी गुण की प्रशंसा करते रहना चाहिए जिसमें सबसे ऊपर पत्नी की खूबसूरती आती है। अगर पति बहुत ही रोमांटिक मूड में अपनी पत्नी के रूप-रंग की तारीफ करता है तो इससे पत्नी की खुशी का ठिकाना नहीं रहता है। 
• अक्सर स्त्रियों में प्यार या काम उत्तेजना की लहर उठने पर वह मुंह से कुछ नहीं कहती लेकिन अपने हाव-भाव से अपने अंदर उठने वाली तरंगों का प्रदर्शन करती है। इसलिए हर पति को चाहिए कि पत्नी के इन हाव-भाव के जरिए उसके दिल की बात जानने की कोशिश करें। 
• अपने बच्चों के सामने अपनी पत्नी की कोई बुराई नहीं करनी चाहिए या उसके बारे में कोई ऐसी बात नहीं करनी चाहिए जिससे कि बच्चों की नजर में अपनी मां की छवि खराब हो।
• घर के किसी भी छोटे-बड़े फैसलों में एक बार अपनी पत्नी की राय जरूर लेनी चाहिए। कभी-कभी पत्नी की एक छोटी सी राय भी पति की बड़ी से बड़ी परेशानी को पल भर में दूर कर देती है। 
• अगर पत्नी किसी बात पर गुस्से में हो तो उसे तुरंत ही अपने सीने से लगा लेना चाहिए। पति की यह छोटी सी हरकत पत्नी का गुस्सा पलभर में ही गायब कर देती है। 
• बहुत सी स्त्रियां होती हैं जोकि अपने पति को तो अच्छे से अच्छा भोजन कराती हैं लेकिन खुद कुछ भी खाने में ही अपना कर्त्तव्य समझती है। पति भी सोचता है कि पत्नी जो खा रही है चलो सही है। लेकिन पति को इस बात का ख्याल रखना चाहिए और उसे अच्छे से अच्छा खाना खिलाना चाहिए क्योंकि स्त्री के भोजन पर ही उसके होने वाले बच्चे का स्वास्थ्य निर्भर करता है। 
• अगर आपकी पत्नी ज्यादा खूबसूरत नहीं है तो इसमें उसे दोष देने की या बात-बात में उसे ताने मारने की कोई जरूरत नहीं है। पत्नी की सुंदरता उसके रूप-रंग को न देखकर उसके गुणों और समझदारी पर निर्भर करती है। अगर आपकी पत्नी में सबका दिल जीतने की कला है तो वह दुनिया की सबसे खूबसूरत स्त्री है। 
• अगर पति-पत्नी के बीच किसी भी तरह की अनबन होती है तो उसके बारे में किसी बाहर के व्यक्ति को पता नहीं चलना चाहिए। यहां तक कि पत्नी के घर वालों को भी इस बारे में पता नहीं चलना चाहिए क्योंकि बहुत से मामलों बात सुलझने की बजाय और बिगड़ जाती है। पति-पत्नी के बीच की किसी भी तरह की समस्या को वह दोनों आपस में ही मिलकर आसानी से सुलझा सकते हैं। 
चार बातों पर सदा अमल करने से पति और पत्नी के बीच किसी भी तरह की समस्या होने की आशंका नहीं रहती है-
• दोनों के बीच में सच्चा प्यार होना चाहिए। 
• दोनों को एक-दूसरे पर पूरा भरोसा रखना चाहिए।
• पति-पत्नी को एक-दूसरे के स्वभाव का अच्छी तरह से पता होना चाहिए कि उन्हें क्या पसंद है और क्या पसंद नहीं है।
• दोनों को एक-दूसरे की छोटी-मोटी गलतियों को नजरअंदाज करते रहना चाहिए और अगर गलती हो भी जाए तो उसे क्षमा कर देना चाहिए।

सेक्स क्रिया में अधिक आनन्द लेने के तरीके 
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परिचय- 
सेक्स क्रिया को लम्बे समय तक खींचने के लिए कुछ विशेष तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है जो सेक्स के आनन्द को कई गुना बढ़ा देती है। आज कई प्रकार के वैज्ञानिक शोधों से यह ज्ञात हो चुका है कि लगभग 85 प्रतिशत पुरुषों का वीर्यपात सेक्स क्रिया के दौरान दो मिनट में ही हो जाता है। कुछ तो ऐसे भी पुरुषों का पता चला है कि वे 10 से 20 सेकण्ड में ही और कुछ योनि में लिंग को प्रवेश करने के बाद ही स्खलित हो जाते हैं। कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो योनि में लिंग को प्रवेश कराने से पहले ही आलिंगन चुम्बन के समय ही स्खलित हो जाते हैं। ऐसे पुरुष कभी भी अपने पत्नी को सेक्स क्रिया का भरपूर आनन्द नहीं दे पाते। इस स्थिति में ऐसे पुरुष वैद्य-हकीमों के चक्करों में पड़कर अपने धन तथा स्वास्थ्य को भी नष्ट कर देते हैं।
पुरुषों के शीघ्रपतन को दूर करने के लिए बहुत से चिकित्सकों ने कई तरीकों की खोज की है। इन तरीकों को सावधानी से अपनाने से शीघ्रपतन की समस्या से बचा जा सकता है और सेक्स क्रिया का भरपूर आनन्द भी लिया जा सकता है।
सेक्स क्रिया करने के कुछ तरीके निम्न हैं- 
1. सेक्स क्रिया करने से पहले स्त्री को पूरी तरह से उत्तेजित करना चाहिए। जब स्त्री पूरी तरह से उत्तेजित हो जाए तब उसके साथ संभोग करना चाहिए और कुछ देर तक अपने लिंग को स्त्री की योनि में डालकर झटके (स्ट्रोक) लगायें तथा इसके बाद कुछ देर के लिए हट जाएं। इसके बाद फिर से स्त्री की योनि के मुख (भगनासा) को खोले और दुबारा स्ट्रोक लगाकर-लगाकर घर्षण करें। इस प्रकार से दो से तीन बार सेक्स क्रिया करें। इससे स्त्री-पुरुष दोनों को भरपूर आनन्द मिलेगा। इस प्रकार पूर्ण रूप से आनन्द लेते-लेते एक समय ऐसा आयेगा जब आप स्खलित हो जायेंगे और आपको पूर्ण आनन्द मिलेगा। इस तरह से सेक्स क्रिया करने से स्त्री कई बार चरम सुख प्राप्त करती है और लम्बे समय तक सेक्स क्रिया भी चलती है। 
2. सेक्स क्रिया करते समय स्खलन होने से पहले ही लिंग को योनि से बाहर निकाल दें और शरीर को एकदम ढीला छोड़ दें। इसके कुछ देर बाद फिर से सेक्स क्रिया करने लगे। इस प्रकार से सेक्स क्रिया करते समय बीच में ही स्खलित होने की स्थिति बन जाए तो जबर्दस्ती अपने वीर्य को रोके नहीं क्योंकि इससे शारीरिक कमजोरी उत्पन्न होती है। इस स्थिति में संभोग करते समय स्खलित होने के कुछ देर बाद अपने को फिर से सेक्स क्रिया के लिए तैयार करें। 
3. सेक्स क्रिया करते समय पुरुष को चाहिए कि स्त्री की योनि में लिंग प्रवेश करके स्ट्रोक लगाने में जल्दबाजी न करें क्योंकि इससे जल्दी ही स्खलन हो जाता है। अतः स्ट्रोक धीरे-धीरे लगायें। ऐसा करने से सेक्स क्रिया लम्बे समय तक चलती है। स्ट्रोक लगा-लगाकर घर्षण करते समय अपने मन में स्ट्रोक की गिनती करते जाएं और जब स्खलन होने लगे तब स्ट्रोक लगाना बंद कर दें। फिर अपनी आंखों को बंद करके शरीर को ढीला छोड़ दें। इसके कुछ देर बाद स्ट्रोक लगा-लगाकर घर्षण करना शुरू कर दें और गिनती गिनते जाएं। 
4. यदि किसी व्यक्ति को शीघ्रपतन की शिकायत हो तो वह सेक्स क्रिया करने से एक दो घंटे पहले हस्तमैथुन करके वीर्य को निकाल दे। इसके बाद जब आप सेक्स क्रिया करेंगे तो उस समय शीघ्रपतन का भय नहीं रहेगा और लम्बे समय तक सेक्स क्रिया का आनन्द भी ले सकेंगे। 
5. सेक्स क्रिया करते समय लंबी-लंबी सांसे लेने की आदत डालें। इससे सेक्स क्रिया में पूर्ण रूप से आनन्द मिलता है। 
6. अगर सेक्स क्रिया करते वक्त स्खलन का एहसास हो तो किसी दूसरी चीज की ओर अपना ध्यान लगाएं, इससे स्खलन होने की संभावना रुक जाती है। इसके कुछ देर बाद फिर से सेक्स क्रिया करने लगे। इस तरह की क्रिया कई बार करें। इससे भरपूर आनन्द मिलेगा। 
7. सेक्स क्रिया के दौरान वीर्य स्खलन होने की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो अपनी गुदा को संकुचित कर लें और कुछ समय तक इसी अवस्था में रुके रहे हैं। इससे स्खलन की स्थिति रुक जाती है। 
8. संभोग करते वक्त जब योनि को लिंग में प्रवेश करें तब उस समय अपनी गुदा को संकुचित कर लें और लिंग के स्नायुओं को भी सिकोड़ लें। इस स्थिति में रहने के साथ ही स्ट्रोक लगा-लगाकर घर्षण करें। इस तरीके से सेक्स क्रिया लम्बे समय तक बनी रह सकती है। 
9. यदि आपको शीघ्रपतन की शिकायत हो तो सेक्स क्रिया करने से लगभग 10-15 मिनट पहले लिंग के मुंड पर जायलोकेन मलहम लगा लें। ऐसा करने से लिंग मुंड की त्वचा में संवेदनशीलता खत्म हो जाती है और शीघ्रपतन नहीं होता है। 
10. यदि सेक्स क्रिया करने से पहले यह पता लग जाए कि लिंग मुंड संवेदनशील हो गया है तो उस पर टेल्कम पाउडर लगा दें। इससे संवेदनशीलता खत्म हो जाती है।
11. लिंग में अधिक उत्तेजना होने के कारण से वह अधिक टाइट हो गया हो तो इस पर रबड़ बैंड चढ़ा लें, ध्यान रहे कि रबड़ बैंड अधिक कसा न हो और न ही अधिक ढीला, क्योंकि ऐसा करने से लिंग में खून का बहाव लंबे समय तक रहेगा और सेक्स क्रिया देर तक चलेगी। 
12. सेक्स क्रिया करते समय जब वीर्य स्खलन होने की स्थिति उत्पन्न होने लगे तो स्ट्रोक लगाकर घर्षण करने का काम बंद कर दें और तुरंत अपनी जननन्द्रियों को पेट के अन्दर की तरफ खींचे। इस स्थिति में जननेन्द्रियों को तब तक खींचे रखें जब तक वीर्य स्खलन की स्थिति खत्म न हो जाए। इसके कुछ समय बाद स्ट्रोक लगाना शुरू कर दें। इस प्रकार से क्रिया करने से सेक्स क्रिया का समय देर तक बना रहता है। इस तरीके से संभोग करने की कला को योनिमुद्रा कहते हैं। 
13. सेक्स क्रिया करते समय यदि वीर्य स्खलन की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो इसको रोकने के लिए अपने फेफड़े की भरी हुई वायु को जोर से बाहर की ओर फेंके। ऐसा करने से वीर्य स्खलन को रोकने में लाभदायक प्रभाव देखने को मिलता है। इससे स्खलन की अनुभूति भी गायब हो जाती है। इसके बाद दुबारा से सेक्स क्रिया करना शुरू करें। इस प्रकार से सेक्स क्रिया के दौरान कई बार दोहरा भी सकते हैं। इस तरीके से सेक्स क्रिया करने से संभोग कला का समय बढ़ जाता है। 
14. वीर्य स्खलन होते समय जितना अपने पेट को अन्दर खींच सकते हो खींचे और सांस को अन्दर की ओर न लें बल्कि अन्दर की सांस को बाहर की ओर फेंके। पेट को अन्दर की ओर खींचने से खाली जगह बन जाती है और काम केंद्र के आस-पास की शक्ति नाभि की ओर आ जाती है तथा वीर्य स्खलन होना रुक जाता है। 
15. सेक्स क्रिया करते समय नाक के दांये भाग से सांस लेते रहें, इससे सेक्स क्रिया लम्बे समय तक चलती है। नाक के बांये भाग से सांस न लें क्योंकि यह भाग ठंडा होता है और ऐसा करने से सेक्स शक्ति में कमी आती है। नाक के दांये भाग से सांस लेने के लिए अपने दाएं हाथ की मुट्ठी बायें बगल में रखकर बगल को जोर-जोर से दबाएं और करवट लेट जाए। इस प्रकार से क्रिया करने से दायां स्वर चालू हो जाएगा। 
सेक्स क्रिया के दौरान जल्दी वीर्यपात होने के कुछ कारणों की खोज-
भय-
सेक्स संबंधों के दौरान मन में भय होने से भी जल्दी वीर्यपात हो सकता है। अतः इसको दूर करने के लिए भय होने के मूल कारणों को जानना बहुत जरूरी है। यदि इसके होने के कारणों को पता लग जाए तो भय से मुक्ति पाना आसान हो जाता है। जीवन में भय अगर अधिक हो तो इसके घातक परिणाम देखने को मिल सकते हैं क्योंकि भय से अनेक गंभीर, घातक तथा असाध्य रोग उत्पन्न होते हैं। अधिकांश रोगों के होने के कारण तो मुख्य रूप से भय ही होता है। कुछ लोग तो ऐसे भी देखे गये हैं कि वे सांप के काटने के भय से ही मृत्यु के मुंह में चले जाते हैं।
भय एक ऐसी मानसिक बीमारी का रूप धारण कर लेती है जिसके कारण सेक्स क्रिया से संबंधित रोग होने के अलावा व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। उदाहरण के लिए- चार-पांच साल पहले एक किसान खेत में पानी दे रहा था तभी किसी कीड़े ने उसके पैर में काट लिया और कटे हुए स्थान से खून निकलने लगा। इसके बाद उसने खेत में इधर-उधर ध्यान से देखा लेकिन वहां पर कुछ भी दिखाई नहीं दिया। इसके बाद वह घर पर आया और कटे हुए स्थान पर पट्टी बांध ली। कुछ दिनों बाद जब वह दुबारा से खेत में पानी देने के लिये गया तो उसने वहां पर एक सांप देखा। सांप को देखकर उसके मन में विचार आया कि पिछली बार शायद पानी देने के दौरान इसी सांप ने काटा था और यही बात उसके मन में बैठ गयी। इसी भय के कारण किसान ने चारपाई पकड़ ली। कुछ समय बाद ही भय के कारण उसकी मृत्यु हो गई। इस कहानी से स्पष्ट होता है कि भय के कारण मृत्यु भी हो सकती है।
शीघ्रपतन से पीड़ित रोगी को कभी भी यह नहीं सोचना चाहिए कि मेरे सामने केवल दो विकल्प हैं। पहला यह कि मुझे कभी भी यह बीमारी ठीक नहीं हो सकती है तथा दूसरा यह की मेरे इस रोग को केवल वैद्य और हकीम ही ठीक कर सकते हैं। इस प्रकार सोचने के कारण से यह रोग बढ़ता ही जाता है तथा रोगी वैद्य और चिकित्सक के चक्कर में फंसकर अपने धन तथा स्वास्थ्य को बरबाद कर लेते हैं।
शीघ्रपतन को दूर करने के लिए इसके कारणों को जनना बहुत जरूरी हैं, शीघ्रपतन के निम्न कारण होते हैं-
1. हस्तमैथुन– कुछ लोगों में सेक्स क्रिया के प्रति इतनी तेज उत्तेजना होती है कि वे बचपन से ही हस्तमैथुन करके अपने वीर्य को नष्ट करते रहते हैं, जिसके कारण से वे शीघ्रपतन का शिकार हो जाते हैं। उन्हें यह भी भय हो जाता है कि वीर्य नष्ट होने का सबसे बड़ा कारण शीघ्रपतन है। जबकि इस भय को मन से निकाल देना चाहिए क्योंकि वीर्य न तो किसी थैली में जमा होता रहता है और न ही वह खून में मिलकर शरीर को बलवान बनाता है। किशोरावस्था में लोग कुछ समय तक हस्तमैथुन करके अपनी उत्तेजना को शांत कर लेते हैं, यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। वैसे देखा जाए तो यह एक अप्राकृतिक प्रक्रिया है जो नहीं करना चाहिए लेकिन फिर भी मानसिक तनाव तथा सेक्स क्रिया की उत्तेजना को शांत करने के लिए हस्तमैथुन कर लेना न तो कोई अनैतिक कार्य है और न ही इससे शरीर कमजोर होता है। अतः कहा जा सकता है कि हस्तमैथुन का भय पूर्ण रूप से काल्पनिक होता है। यदि इस भय से मुक्ति मिल जाए तो शीघ्रपतन से छुटकारा मिल सकता है। वैसे देखा जाए तो हस्तमैथुन सुनने और पढ़ने में कुछ अजीब सा लगता है कि हस्तमैथुन के द्वारा किस प्रकार से शीघ्रपतन को रोका जा सकता है? या हस्तमैथुन के द्वारा संभोग कला के समय को बढ़ाया सकता है? लेकिन शीघ्रपतन को दूर करने का वह तरीका है जिसको पति-पत्नी संभोग करते समय प्रयोग करें तो लाभ मिलेगा। इस क्रिया में पति चाहे तो हस्तमैथुन का प्रयोग करना आरम्भ कर दे लेकिन यह क्रिया स्खलन तक जारी न रखे। यदि पति स्वयं हस्तमैथुन कर रहा है तो उसे इस क्रिया को तब बंद कर देना चाहिए जब वह स्खलन बिंदु तक पहुंचने वाला हो, इस स्थिति में जब स्खलन की स्थिति टल जाए तो कुछ समय तक आराम करना चाहिए। फिर इसके बाद इस क्रिया को दुबारा से करें। ऐसा करने से शीघ्रपतन की समस्याएं दूर होने लगेंगी और संभोग क्रिया करने के प्रति आत्मविश्वास भी जागेगा। इस प्रकार से संभोग के समय को बढ़ाने से सेक्स क्रिया के समय में वृद्धि होती है। इस क्रिया को पति अपनी पत्नी से भी करा सकता है। लेकिन इस क्रिया को पत्नी से कराने पर सावधान रहना चाहिए। पत्नी से हस्तमैथुन कराते समय अपने स्खलन के समय पर ध्यान रखना चाहिए तथा जैसे ही स्खलन होने को हो वैसे ही अपनी पत्नी को कुछ भी हरकत करने से मना कर देना चाहिए। इसके बाद कुछ देर तक आराम करना चाहिए और फिर से पत्नी को यही क्रिया करने के लिए करना चाहिए। इस क्रिया को चार-पांच बार करना चाहिए। इस प्रकार से सेक्स क्रिया करने से संभोग का समय लम्बा जाता है। 
2. स्वप्नदोष- स्वप्नदोष का भय भी शीघ्रपतन होने का कारण हो सकता है। इससे 11 से 18 वर्ष के बालकों तथा युवकों को बहुत अधिक परेशानी होती है तथा उनमें हीन भावना भी पैदा कर देती है। स्वप्नदोष एक प्रकार की सेफ्टीवाल्व की प्रक्रिया है। प्रकृति ने मनुष्यों में वीर्य के उत्पादन तथा संचयन में तालमेल रखने के लिए स्वचालित तनाव मुक्ति (आटो टेंशन रिलीज) की शक्ति प्रदान की है। यदि ऐसा न होता तो युवक अनेक रोगों से ग्रस्त हो जाते। यहां यह जानना बहुत आवश्यक है कि बहुत से ऐसे भी व्यक्ति देखे गये हैं जो विवाहित हैं फिर भी अपनी पत्नी से बहुत दिनों तक संभोग न करने के कारण स्वप्नदोष से पीड़ित हो जाते हैं। कभी-कभी तो अधेड़ उम्र के लोगों को भी स्वप्नदोष हो जाता है क्योंकि नाती-पोते वाले हो जाने के कारण से वे अपनी पत्नी को संभोग क्रिया के लिए समय नहीं दे पाते जिसके कारण से कभी-कभी उन्हें स्वप्नदोष हो जाता है। सेक्स क्रिया की अधिक चिंता करने के कारण व्यक्ति बार-बार कामोत्तेजित हो जाते हैं जिसके कारण से वे हस्तमैथुन करने की कोशिश करते हैं और जब वे इससे भी अपनी उत्तेजना को शांत नहीं कर पाते हैं तो प्राकृतिक स्वप्नावस्था में उनको मानसिक तनाव एवं उत्तेजना होकर यह क्रिया हो जाती है। अतः कहा जा सकता है कि स्वप्नदोष से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। देखा जाए तो यह मानसिक संतुलन को बनाये रखने के लिए मात्र एक स्वचालित प्रक्रिया है। इसलिए सकारात्मक सोच से आत्मविश्वास में दृढ़ता आती है तथा भय अपने आप ही दूर हो जाता है। इस सोच को अपनाने से भय आत्मविश्वास के सामने टिक नहीं पाता है। इस प्रकार भय को खत्म करने के लिए मन में बार-बार सकारात्मक सोच अपनाना चाहिए और मन में हमेशा यह विचार बनाये रखना चाहिए कि स्वप्नदोष को मानसिक और शारीरिक कमजोरी नहीं है, मैंने कोई गलत काम नहीं किया है, मुझमें पौरुष शक्ति की कोई कमी नहीं है, सेक्स क्रिया करने की मुझमें पूरी शक्ति विद्यमान है। इस प्रकार की भावना जैसे-जैसे मन में आती जाएगी वैसे-वैसे स्खलन पर नियंत्रण भी होता जाएगा। 
3. लैंगिक उत्तेजना के समय पारदर्शी तरल पदार्थ आना- कई युवक तो ऐसे भी होते हैं जो लैंगिक उत्तेजना के समय में रंगहीन पारदर्शी तरल पदार्थ से भयभीत हो जाते हैं। इस प्रकार के पारदर्शी तरल पदार्थों को देखकर वे सोचने लगते हैं कि उनमें किसी प्रकार की कमजोरी तो नहीं है। वे यह भी सोचने लगते हैं कि इस कमजोरी के कारण ही वीर्य इतनी जल्दी-जल्दी बार-बार आ रहा है। लेकिन देखा जाए तो यह पारदर्शी तरल पदार्थ वीर्य नहीं होता है। यह तो केवल वह तरल पदार्थ है जो काउपर ग्रंथि से निकलने वाला मात्र एक तरल पदार्थ है जो लिंग के मूत्रमार्ग को चिकना करने की स्वचालित प्रक्रिया है। यह धीरे-धीरे रिसता हुआ निकलता रहता है। अगर प्रकृति ने यह क्रिया न दी होती तो वीर्य स्खलन के समय हमारा मूत्रमार्ग कई जगह से छिल जाता है और मूत्र त्याग करते समय दर्द तथा जलन होती है। वीर्य स्खलन के समय इसका वेग काफी तेज होता है, यह भी प्रकृति का ही वरदान है। वीर्य इतनी तेज गति से बाहर इसलिए निकलता है ताकि वह सीधे गर्भाशय के मुख से सम्पर्क करें और शुक्राणु सरलतापूर्वक गर्भाशय के अंदर पहुंचकर डिम्ब से सम्पर्क कर सकें। 
गहरी तथा नियंत्रित सांस लेने की तकनीक-
सेक्स क्रिया के समय भरपूर आनन्द लेने के लिए उत्तेजना के समय गहरी एवं समुचित ढंग से सांस लेने का अभ्यास करना चाहिए। वैसे देखा जाए तो संभोग के समय सांस की गति बढ़ जाती है और उत्तेजना की तीव्रता के साथ सांस की रफ्तार भी तेज हो जाती है। सेक्स करते समय पति को चाहिए कि स्वाभाविक रूप से गहरी सांस ले और कुछ सेकण्ड तक सांस को भीतर ही रोके रखें तथा फिर धीरे-धीरे सांस को छोड़ें। इस क्रिया को चार से पांच बार दोहराने से पति को अहसास होने लगेगा कि उसके शरीर और मन से तनाव गायब हो चुका है। इसके बाद कुछ समय तक आराम करने के बाद फिर से इस क्रिया को दोहराना चाहिए। इस प्रकार से सेक्स क्रिया करने से पति को अहसास होगा कि सेक्स उत्तेजना पर नियंत्रण रखने में उसे पहली सफलता मिल गई है। इस क्रिया से सेक्स करने से वीर्य स्खलन केंद्र पर नियंत्रण हो जाएगा और मन का भय भी समाप्त हो जाता है। इसके साथ ही मानसिक तनाव दूर हो जाने पर कामांग भी स्वाभाविक रूप से कार्य करने लगेंगे। 
कभी-कभी बहुत से व्यक्तियों के मन में यह आशंका उठ सकती है कि जननेन्द्रियों पर नियंत्रण रखना आसान नहीं होता लेकिन हम सब जननेन्द्रियों पर नियंत्रण रखने में सफल हो सकते हैं, उसी तरह कामोत्तेजना पर नियंत्रण रखना भी संभव हो सकता है। जब संवेगों पर नियंत्रण हो जाता है तब शरीर एवं मन में एक रागात्मक तालमेल बैठ जाता है और दोनों ही पूर्ण संतुलन के साथ चरम बिंदु पर अग्रसर हो जाते हैं।
चिन्तन में अन्तर्विरोध-
चिन्तन में अन्तर्विरोध मनोवैज्ञानिक उपचार है जो सेक्स क्रिया के समय उत्तेजक बातें, दृश्य या सेक्स उत्तेजना को तेज करती हैं और शीघ्रपतन की अवस्था को पैदा करती हैं। इस स्थिति को रोकने के लिए संभोग के समय में लिंग को योनि में प्रवेश करते वक्त और घर्षण के समय जब काम-क्रीड़ा के खेल के विचारों को त्याग देते हैं तो उसे ही अपना ध्यान सेक्स से अन्य मन विचारों की ओर मोड़ देने की कला कहते हैं।
इस समय किसी यात्रा, पिकनिक, भाषण या मीटिंग पर ध्यान केंद्रित करने से कमोत्तेजना पर काबू पाया जा सकता है। संभोग से ध्यान हटा लेने से वीर्य स्खलन का समय बढ़ जाता है। शीघ्रपतन को दूर करने के लिए जो-जो क्रिया अपनाई जाती है, उनका बार-बार अभ्यास करने से शीघ्रपतन से छुटकारा पाया जा सकता है। लेकिन किसी भी अप्रिय या भय वाली घटना पर ध्यान केन्द्रित करने से कामोत्तेजना अचानक ही बैठ जाती है और लैंगिक उत्तेजना ठंडी पड़ जाती है। अतः ध्यान केन्द्रित करने में सावधानी बरतनी चाहिए और सेक्स क्रिया करते समय उन घटनाओं को कभी भी याद नहीं करना चाहिए जिनसे किसी प्रकार से हानि हों।
सेक्स क्रिया के समय घर्षण पर नियंत्रण-
बहुत से ऐसे पुरुष होते हैं जो सेक्स क्रिया के समय में स्ट्रोक लगाने के समय कामवासना के कारण जल्दी उत्तेजित हो जाते हैं तथा जननेन्द्रिय को नियंत्रण में न रखने के अभाव में योनि में लिंग को डालकर तुरंत ही घर्षण प्रारम्भ कर देते हैं और जल्दी-जल्दी स्ट्रोक लगाना शुरू कर देते हैं। इस स्थिति में वे उत्तेजना के कारण अपने आप पर काबू नहीं रख पाते और तीन-चार स्ट्रोक लगाने के बाद ही स्खलित हो जाते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि लिंग को योनि में प्रवेश करने के तुरंत बाद ही स्ट्रोक लगाना शुरू नहीं करना चाहिए। सेक्स क्रिया में जब लिंग को योनि में प्रवेश कराते हैं तो लगभग 10 से 15 सेकण्ड तक स्ट्रोक नहीं लगाना चाहिए बल्कि लिंग को योनि में चुपचाप पड़े रहने देना चाहिए और जब उत्तेजना का वेग कम पड़ जाए तब धीरे-धीरे घर्षण शुरू करना चाहिए। उत्तेजना यदि अधिक बढ़ने लगे तो स्ट्रोक लगाना बंद करके लिंग को योनि से बाहर निकाल लेना चाहिए। इसके बाद 5 से 10 सेकण्ड आराम करना चाहिए। आराम करने के बाद फिर से स्ट्रोक लगा-लगाकर धीरे-धीरे घर्षण शुरू कर देना चाहिए। इस प्रकार से सेक्स क्रिया करने से पुरुष को यह महसूस होगा कि इस बार उत्तेजना कुछ हद तक काबू में आ गई है। जैसे ही आपका स्खलन होने लगे वैसे ही लिंग को योनि से बाहर निकाल ले, इससे स्खलन रुक जाएगा। इस प्रकार से संभोग करते समय प्रत्येक बार आराम करने के बाद उत्तेजना पर नियंत्रण बढ़ता जाएगा और चार से पांच बार इस प्रकार से संभोग करने से स्खलन के समय पर पूरी तरह से नियंत्रण हो जाएगा। जब उत्तेजना पर नियंत्रण हो जाए तो फिर स्ट्रोक की गति को बढ़ाया जा सकता है और फिर एक स्थिति ऐसी भी आ सकती है जिसमें तेज धक्के लगाने पर भी स्खलन नहीं होगा। इस विधि से सेक्स क्रिया 15 मिनट से एक घण्टे तक की जा सकती है। घर्षण रोकने की क्रिया को अधिक से अधिक तीन से चार बार ही रोकना चाहिए, यदि इससे अधिक बार रोका गया तो स्खलन होने में बहुत अधिक रुकावट उत्पन्न हो सकती है और ऐसा भी हो सकता है कि स्खलन कैसे हो। वीर्य स्खलन बहुत देर तक रुक जाना भी कष्टदायक होता है क्योंकि बार-बार वीर्य स्खलन में रुकावट उत्पन्न होने से स्खलन केन्द्र पर नियंत्रण समाप्त हो जाता है और पुरुष स्खलन के अभाव में पसीने-पसीने से तर होकर बेचैन होने लगता है। ऐसा होने से पुरुष को वह सेक्स का सुख भी नहीं मिल पाता जोकि उसे मिलना चाहिए। इस स्थिति में ऐसा भी हो सकता है कि पत्नी पहले ही स्खलित (चरम बिंदु) हो जाए। घर्षण करने पर पत्नी को बहुत अधिक कष्ट होता है और खुद भी स्खलित न होने के कारण मानसिक तनाव तथा शारीरिक कष्ट होता है। इसलिए इस विधि का प्रयोग सावधानी से करना चाहिए।
सेक्स क्रिया करते समय उत्तेजना पर नियंत्रण रखना-
संभोग क्रिया के समय को बढ़ाने के लिए सेक्स उत्तेजना पर नियंत्रण रखना बहुत जरूरी होता है क्योंकि शीघ्र स्खलित हो जाने के कारण से पति-पत्नी को सेक्स का भरपूर आनन्द नहीं मिल पाता है। इसलिए सेक्स क्रिया करते समय यदि आवश्यकता से अधिक उत्तेजित हो जाए तो कुछ समय के लिए लिंग से घर्षण करना बंद करके आराम करें, इससे कमोत्तेजना का वेग कुछ कम हो जाएगा। इस क्रिया को करते समय जब उत्तेजना का वेग कुछ कम हो जाए तब स्त्री को दुबारा से आलिंगन तथा चुम्बन करना शुरू कर दें, इससे स्त्री को आपसे बहुत अधिक सुख मिलेगा।
स्त्री के स्तनों के निप्पल को अधिक देर तक चूसना तथा स्तनों को दबाना कामोत्तेजना को भड़काने वाला होता है। अतः इस क्रिया को करते समय अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। चुम्बन तथा चूसने की क्रिया ज्यादा करने से भी शीघ्र स्खलन होने का डर होता है। अतः सेक्स क्रिया का अधिक से अधिक आनन्द लेने के लिए इसका कम से कम ही प्रयोग करें।
संभोग क्रिया करते समय यदि पत्नी को यह पता चल जाए कि मेरा पति मुझसे अधिक कामोत्तेजक है तो ऐसी अवस्था में उसे अपनी पति से यह कहना चाहिए कि लिंग को तुरंत ही योनि में न डाले और न ही तेज स्ट्रोक लगाकर घर्षण करें। इस स्थिति में पत्नी को चाहिए कि वह अपने पति का पूरी तरह से साथ दे और पति को सेक्स क्रिया का भरपूर आनन्द दें तथा लें।
सेक्स क्रिया के समय पति को चाहिए कि अपनी पत्नी को सेक्स का भरपूर आनन्द दें और पत्नी को पूरी तरह से सेक्स के लिए उत्तेजित करें। यदि आपने ऐसा न किया तो हो सकता है कि तुम्हारी पत्नी सेक्स क्रिया के समय सेक्स के प्रति ठंडी पड़ी रहेगी और उसकी योनि मार्ग में तरलता उत्पन्न नहीं होगी। यदि पत्नी की योनि शुष्क हो जाए तो लिंग को योनि में प्रवेश करने में दिक्कत आती है और घर्षण करना भी मुश्किल हो जाता है। इस स्थिति में पत्नी को सेक्स क्रिया का खेल खेलने में कष्ट होगा तथा पति भी दो-चार घर्षण के बाद ही स्खलित हो जाएगा। अतः पति को चाहिए कि पत्नी को सेक्स क्रिया के दौरान उसे पहले उत्तेजित सीमा तक पहुंचाने का काम करें। लेकिन यह भी ध्यान रखे कि अपने को शीघ्र स्खलन की स्थिति तक न पहुंचे। धैर्य और संयम के मेल से अपनी पत्नी को सेक्स उत्तेजना की सीमा रेखा तक पहुंचाएं और फिर सेक्स क्रिया का पूरा आनन्द लें और पत्नी को भी भरपूर आनन्द दें।
शीघ्र स्खलन को रोकने के लिए कुछ तरीके-
ठीक प्रकार से सेक्स क्रिया करने से शीघ्र स्खलन होने की समस्या को रोका जा सकता है तथा सेक्स क्रिया को लम्बे समय तक आनन्द लिया जा सकता है। यदि सेक्स करने के दौरान कुछ भी असावधानी बरतेंगे तो इस प्रकार की समस्या उत्पन्न हो सकती है। अतः शीघ्र स्खलन की समस्या को रोकने के लिए कुछ तरीके दिये जो रहे हैं जो इस प्रकार हैं-
1. संभोग क्रिया करते समय पत्नी को चाहिए कि अपने पति के लिंग को पकड़कर सहलाए। इससे लिंग में कोमल स्पर्श पड़ने के कारण तनाव उत्पन्न होने लगता है। इस क्रिया में पत्नी को चाहिए कि लिंग को धीरे-धीरे पकड़ कर दबाती रहे और लिंग जब पूरी तरह हो उत्तेजित जाए या स्खलन की स्थिति उत्पन्न होने लगे तो पति को चाहिए कि पत्नी को कहे कि लिंग को थोड़ी देर के लिए दबाना छोड़ दें। इसके बाद कुछ देर तक अन्य चीज पर ध्यान केंद्रित कर लें ताकि स्खलन होने के संकट को टाला जा सकें। कुछ देर बाद जब स्खलन की स्थिति टल जाए तो फिर से वही क्रिया अपनाएं। इस सेक्स क्रिया के तरीके को अपनाने से शीघ्र स्खलन की समस्या से छुटकारा मिल सकता है। 
2. पति के वीर्य स्खलन के समय को बढ़ाने के लिए पत्नी को चाहिए कि अपने पति के वीर्य स्खलन के समय में रुकावट पैदा करें। इसके लिए एक यह तरीका अपनाया जा सकता है जैसेकि पति-पत्नी को सेक्स क्रिया करने के लिए एक ही बिस्तर पर निर्वस्त्र अवस्था में लेट जाना चाहिए। इस अवस्था में पति को चाहिए कि अपनी तेज होती उत्तेजना के प्रति ध्यान रखें और स्खलन की स्थिति पर पहुंचने से पहले ही एक-दूसरे को उत्तेजित करने की प्रक्रिया को बंद करके एक-दूसरे को शरीर से थोड़ा हटकर दूसरी ओर ध्यान लगा लें। सेक्स क्रिया के समय में इस तरीके का प्रयोग कई बार दोहरा सकते हैं। इस तरह से संभोग करने से पति की चिंता और भय दूर होने लगता है और संभोग कला के समय में वृद्धि होने लगती है। इस क्रिया के प्रयोग से पति अपने कामोत्तेजना के समय में नियंत्रण पा लेता है। इस तरह से संभोग करने की क्रिया में सफलता धीरे-धीरे मिलती है। यदि इस क्रिया का प्रयोग करते समय एक-दो बार असफल भी हो जाए तो दुःखी न हो और न ही अपने प्रयास रोकें। पति-पत्नी को यह कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि कोशिश करने से ही सफलता प्राप्त होती है। 
3. सेक्स क्रिया के दौरान पति के शीघ्र स्खलन को रोकने के लिए इस प्रकार का तरीका अधिक लाभकारी हो सकता है जैसेकि पत्नी को चाहिए कि वह पलंग पर बैठकर अपनी दोनों टागों को फैलाकर अपने पति के सामने की ओर खोल दे। इसके बाद पति को चाहिए कि अपनी टांगों को पत्नी की जांघों के ऊपर रखें। इसके बाद अपने घुटने को थोड़ा सा ऊपर उठाकर रखें ताकि अपनी टांगों का बोझ पत्नी के ऊपर न पड़ने दें। इसके बाद पत्नी को चाहिए कि लिंग को हाथ में पकड़कर धीरे-धीरे सहलाए। इससे लिंग उत्तेजित होकर तन जाता है। लिंग जब पूरी तरह से तन जाए तो पत्नी को चाहिए कि लिंगमुंड को अंगूठे तथा पहली दो अंगुलियों से पकड़कर दबाए। इस क्रिया में पत्नी को ध्यान रखना चाहिए कि अंगूठे को लिंगमुण्ड के उस भाग पर रखे, जहां पर फ्रीनम (Freenum) स्थित होता है तथा पहली अंगुली को लिंगमुण्ड पर और बीच की उंगली को लिंगमुण्ड के किरीट (Corona Glandis) के पीछे रखे। इस क्रिया को करते समय पत्नी को यह ध्यान रखना चाहिए कि अंगुलियों से लिंग पर दबाव उस प्रकार दें जिस प्रकार से नींबू को निचोड़ा जाता है। लेकिन इस क्रिया को तीन-चार बार से ज्यादा न करें। इस क्रिया में पत्नी के अंगूठे और अंगुलियों के दबाव की वजह से पति के स्खलन होने की क्रिया रुक जाती है। इससे लिंग की उत्तेजना की स्थिति कुछ कम हो जाती है। इसके 10 से 15 मिनट के बाद फिर से इसी प्रकार से क्रिया करनी चाहिए। ठीक इसी प्रकार से इस सेक्स क्रिया को कई बार दोहराना चाहिए। इस क्रिया से पति-पत्नी को सेक्स का भरपूर आनन्द मिलता है तथा उनका प्रेम संबंध भी गहरा होता चला जाता है। इससे पुरुष शीघ्र स्खलित नहीं होता है तथा इसके साथ ही सेक्स के प्रति आत्म-विश्वास भी जाग जाता है। इस तरीके से पत्नी पति के लिंगमुण्ड को 10 से 15 बार दबाती है तो पति शीघ्र स्खलन के भय से भी मुक्त हो जाता है। जब भय से मुक्त हो जाए तो उसे चाहिए कि अपने उत्तेजित लिंग को योनि में प्रविष्ट करें। लेकिन इस समय किसी प्रकार का घर्षण न करे और अपना ध्यान किसी खेल, कोई मनोरंजक तस्वीर या अन्य चीजों की ओर रखे। कहने का अर्थ यह है कि अपना ध्यान संभोग क्रिया की कला में बिल्कुल न हो। इस स्थिति में पत्नी का भी सहयोग आवश्यक होता है। पत्नी को चाहिए कि वह भी शांत पड़ी रहे। किसी भी प्रकार का शारीरिक छेड़-छाड़ न करें जिससे पति उत्तेजित होकर स्खलित हो जाए। इस स्थिति में पति चाहे तो ढीली अवस्था में लेटा रह सकता है और पत्नी विपरीत आसन का प्रयोग कर सकती है। पत्नी चाहे तो इस स्थिति में पति के ऊपर अपनी योनि के अन्दर लिंग को लेकर शांत बैठी रह सकती है। इस स्थिति में लिंग उसकी योनि में पूरी तरह से समाया रहेगा, लेकिन दोनों में से कोई भी घर्षण की क्रिया न करें। इस क्रिया को करते समय जैसे ही पति को महसूस हो कि मैं स्खलित होने वाला हूं, वैसे ही उसे सनसनी महसूस होने लगेगी। ऐसा होते ही उसे अपनी पत्नी को संकेत दे देना चाहिए कि मैं स्खलित होने वाला हूं। इसके बाद पत्नी को चाहिए कि पति का संकेत पाकर तुरंत ही लिंग को योनि से बाहर निकालकर लिंगमुंड को अंगूठे तथा पहली दो अंगुलियों से पकड़कर दबाए, इससे स्खलन होना तुरंत ही रुक जाएगा। इस तरीके से सेक्स क्रिया करने से पति-पत्नी दोनों को भरपूर सेक्स का आनन्द मिलता है। इस तरीके से सेक्स क्रिया सप्ताह में एक बार ही करना चाहिए तथा इसका उपयोग लगभग 8 से 12 महीने तक कर सकते हैं। इस क्रिया को करने के लिए धैर्य और संयम की आवश्यकता होती है। इस क्रिया से किसी प्रकार का जादूई परिणाम या सफलता पाने की आशा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह कोई मदारी का खेल नहीं कि पैसा फेकों और तमासा देखों। इस आसन को सामान्य भाषा में विपरीत आसन कहा जाता है। इस आसन में सबसे मुख्य जानने वाली बात यह है कि पति की उत्तेजना को भड़काने के लिए पत्नी उसके लिंग से छेड़छाड़ करती है। इस अवस्था में पत्नी बहुत अधिक कामोत्तेजित हो जाती है और पति के स्खलन होने के साथ ही स्खलित हो जाती है या फिर पति के स्खलन होने से पहले ही स्खलित होकर भरपूर आनन्द के केंद्र में डूब जाती है। इस क्रिया में पति-पत्नी दोनों को ही भरपूर आनन्द मिलता है तथा वे दोनों ही आलिंगन, चुम्बन और एक-दूसरे से छेड़-छाड़ का खेल खेलते रहते हैं। इस क्रिया में यदि पति का स्खलन समय तीन से चार बार टल जाए तो पत्नी स्वयं घर्षण के रफ्तार को बढ़ा सकती है और अन्तिम समय तक पूरे जोश तथा शक्ति के साथ घर्षण कर सकती है। इस प्रकार से स्खलित यदि पति-पत्नी एक साथ होते हैं तो उन्हें भरपूर चरम सुख मिलता है। 
4. संभोग कला के समय को बढ़ाने के लिए गणना के तकनीक को अपनाने से शीघ्र स्खलन के समस्या से छुटकारा मिल सकता है। इस तरीके को करने के लिए पति को चाहिए कि पत्नी की योनि में लिंग को डालकर कुछ छणों तक किसी भी प्रकार की कोई हरकत और न घर्षण करें। इस स्थिति में जब भी पति को लगता है कि स्खलन की स्थिति टल चुकी हैं तब उसे धीरे-धीरे लिंग का घर्षण योनि में करना चाहिए। इस क्रिया में स्ट्रोक लगाकर घर्षण करने के क्रम को गिनते जाए, जैसेकि one...two...three...four....five.. आदि। गिनती का क्रम तब तक चलते रहने दे जब तक की स्खलन होने का महसूस न हो। जैसे ही स्खलन की आशंका होने लगे, वैसे ही स्ट्रोक लगाना बंद कर दें और स्खलन होने की आशंका टल जाए तो फिर से गिनती गिनते हुए स्ट्रोक लगा-लगाकर घर्षण करना शुरू कर दें। इस प्रकार से प्रतिदिन सेक्स क्रिया करने से सेक्स करने के समय को बढ़ाया जा सकता है। 
5. सेक्स क्रिया के समय को बढ़ने के लिए उल्टी गिनती गिनकर सेक्स करने के तरीके को अपनाने से लाभ मिलेगा। इस क्रिया के द्वारा सेक्स करने के लिए लिंग को योनि में प्रवेश कराके धीरे-धीरे घर्षण करें तथा घर्षण की गिनती 10 तक गिने और फिर उल्टी गिनती गिने। पहले गिनती इस प्रकार गिने-10, 9, 8, 7, 6, 5, 4, 3, 2, 1 तथा इसके बाद 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18, 19, 20 फिर इसके बाद 20, 19, 18, 17, 16, 15, 14, 13, 12, 11, 10, 9, 8, 7, 6, ,5 ,4 ,3 , 2, 1 तक। इस क्रिया में चाहे तो 20 से 1 तक उल्टी गिनती गिन सकते हैं। इस प्रकार की सेक्स क्रिया में प्रत्येक दस बार घर्षण करने के बाद कुछ देर तक आराम करना चाहिए। इस क्रिया को कई दिनों तक करने से संभोग कला के समय को बढ़ाने में लाभ मिलता है। इस क्रिया को करने में यदि पहले दिन 40 या 50 घर्षण हो तो दूसरे दिन 60 तक ले जाएं तथा इस प्रकार से तीसरे, चौथे, पांचवे और इससे आगे के दिन घर्षण करने की संख्या को बढ़ाते चले जाएं। इस प्रकार से सेक्स करने से मस्तिष्क पर पड़ने वाला जोर हट जाता है जिसके परिणामस्वरूप वीर्य स्खलन के समय में वृद्धि होती है। इस क्रिया में यदि तीन से चार बार स्खलन होने का समय टल जाए तो संभोग करने के समय में वृद्धि हो जाती है और सेक्स करने का आनन्द हजार गुना बढ़ जाता है। इस क्रिया के द्वारा सेक्स क्रिया करने से यह लाभ मिलता है कि पत्नी एक से अधिक बार स्खलित होकर भरपूर आनन्द को प्राप्त करती है और स्वयं को भी अधिक आनन्द मिलता है। 
6. वीर्य स्खलन होने के बाद दुबारा प्रयास- पति-पत्नी को सेक्स क्रिया करते समय यदि वीर्य स्खलन होने लगे तो बलपूर्वक वीर्य स्खलन रोकने का प्रयास नहीं करना चाहिए। संभोग के समय या योनि में लिंग प्रवेश करने के बाद तुरंत ही वीर्य स्खलन हो जाता है तो चिंता करने की कोई बात नहीं है और न ही घबराने की बात है। स्खलन हो जाए तो कुछ समय के लिए शरीर को ढीला छोड़ दें। लेकिन आराम पांच मिनट से अधिक न करें। इसके बाद दुबारा से पत्नी के जननेन्द्रिय अंगों से खेलते हुए मसलना, सहलाना, दबाना तथा चूमना चाहिए। इसके साथ ही पत्नी को कहे की लिंग को हाथ में लेकर दबाये, सहलाये तथा उछाले। ऐसा करने से दुबारा से लिंग उत्तेजना में आ जाता है और पुरुष सेक्स के लिए तैयार हो जाता है। लेकिन इस बार यह ध्यान रखना चाहिए कि जैसे ही वीर्य स्खलन होने लगे। वैसे ही अपने ध्यान से सेक्स को हटाकर किसी और चीज पर लगा लेना चाहिए। ऐसा करने से वीर्य स्खलन होना रुक जायेगा। इस क्रिया को दो से तीन बार अजमाने के बाद लिंग को उत्तेजना में लाकर उसे योनि में प्रवेश कराये और स्ट्रोक लगा-लगाकर घर्षण करना शुरू करें। इस प्रकार से सेक्स करने से संभोग का समय लम्बा हो जाता है और सेक्स का भरपूर आनन्द मिलता है तथा पत्नी को सम्पूर्ण आनन्द मिलता है। 
सेक्स क्रिया करने के दौरान कुछ आत्म-संकेत-
आत्म-संकेत एक ऐसा सूचना निर्देश है जो आज तक मनोवैज्ञानिक रहस्य बना हुआ है और इसे शिक्षित लोग भी ठीक प्रकार से समझ नहीं पाये हैं। मन के रहस्य को समझना बहुत अधिक कठिन होता है। मन की शक्ति सभी प्रकार की शक्तियों का भंडार होता है। वैसे देखा जाए तो मन के तीन स्तर होते हैं- मन, चेतन तथा उपचेतन।
चेतन मन- 
इसको मन का ऊपरी भाग कहते हैं। यदि मन को एक महासागर मान लिया जाए तो चेतन मन उसमें तैरते हुए बर्फ के पहाड़ के समान है और यदि बर्फ का पहाड़ मन है तो पानी के ऊपर दिखाई देने वाला भाग ही चेतन मन होगा तथा पहाड़ को जो भाग पानी के अन्दर डूबा हुआ है, वह अचेतन है। मनुष्य की जागी हुई अवस्था में उसका सभी कार्य, चिन्तन-मनन या क्रिया-कलाप चेतन मन द्वारा ही होता है। आज इस संसार में ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में जो उन्नति हुई है या जो आश्चर्यजनक सफलताएं प्राप्त हुई है, वह चेतन मन की ही देन हैं।
उपचेतन मन- 
यह चेतन और अचेतन के जड़ पर स्थित होता है और यह दोनों को जोड़ने वाली एक कड़ी होती है, जो स्मृतियों का भण्डार है। मनुष्य जो कुछ भी याद करता है वह इसी में संचित (जमा) होता है। यह स्वयंचालित होता है। बात-चीत करते समय या कुछ लिखते समय अचानक से कोई शब्द भूल जाते हैं लेकिन कुछ प्रयास करने के बाद वह शब्द याद आ जाता है। इस क्रिया में भूला हुआ शब्द तुरंत याद आ जाता है। कोई भी कार्य करते समय अचानक कोई चीज, घटना, पिक्चर या कोई व्यक्ति याद आ जाना ही उपचेतन का कार्य कहलाता है। बैठे-बैठे किसी की कल्पनाओं में खो जाना या किसी कार्य में खो जाना उपचेतन की एक लीला कहलाती है। वैसे देखा जाए तो यह पानी में डूबे उस पानी के समान होता है जो पानी की ऊपरी सतह को छूते (स्पर्श) रहते हैं।
अचेतन मन – 
यह मन का वह जादुई भाग होता है जो एक रहस्यमय है। यह अनंत शक्ति का भण्डार होता है लेकिन अचेतन मन की शक्ति निष्क्रिय पड़ी रहती है। इसके क्रियाशील या जाग्रति हो जाने पर मनुष्य में अदभुत शक्तियां उत्पन्न हो जाती हैं और वह बहुत से ऐसे अदभुत कार्य को करने में सक्षम हो जाता है जिन्हें चमत्कार कहा जाता है। इसी अचेतन मन को प्रभावित करने के कई तरीको में से एक तरीका वह है जो आत्म संकेत या स्वयं संकेत कहलाता है। जिस व्यक्ति में इस प्रकार की इच्छा शक्ति उत्पन्न हो जाती है, वह किसी भी कार्य को करने में हिम्मत नहीं हारता है। वह जिस किसी कार्य में अपने हाथ को अजमाता है उसमें ही सफलता प्राप्त करता है।
वैसे आत्म-संकेत प्राप्त करना कोई कठिन कार्य नहीं होता है। इसके प्रभाव से आत्म-विश्वास में मजबूती आती है। इसके प्रभाव से घनघोर अन्धकार में भी उजाला उत्पन्न हो जाता है अर्थात आत्मविश्वास के कारण साहस उत्पन्न होता है। यदि किसी व्यक्ति में आत्म-संकेत की प्राप्ति हो जाए तो वह अकेला ही कब्रिस्तान में सो सकता है। ठीक इसी प्रकार सेक्स क्रिया करते समय पुरुष को अपने मन में यह आत्म-विश्वास रखना चाहिए कि मेरा वीर्य शीघ्र स्खलित नहीं होगा और मैं अपनी पत्नी को पूरी तरह से संतुष्ट करने में सक्षम हूं, हम दोनों पति-पत्नी का संभोग करने का समय लम्बा होगा तथा स्खलन पर मेरा पूरी तरह से नियंत्रण रहेगा। इस प्रकार की भावना अपने मन में कई बार करते रहे, चाहे आप बैठे हो, चल रहे हो या सोने के लिए बिस्तर पर लेटे हो। इस भावना को दोहराते रहे लेकिन माला न जपें। सोते समय भी इस भावना को तब तक दोहराते रहें जब तक की नींद न आ जाये।
आत्म-संकेत के लिए बार-बार प्रयास करने से आपकी भावना अचेतन मन में प्रवेश कर जाएगी और आत्म-विश्वास भी उत्पन्न हो जाएगा। लेकिन यह कार्य दो-चार दिनों का नहीं करना चाहिए। यह भावना स्वयं अपने मन को ही देना चाहिए। ध्यान को केन्द्रित करके इस भावना को दोहराते रहिये, इसके फलस्वरूप तीन से छः महीने के अन्दर आपकी समस्या समाप्त हो जाएगी। इसके फलस्वरूप शीघ्रपतन भी दूर हो जाएगा। इसके प्रयोग से पति-पत्नी का सेक्स क्रिया लम्बे समय तक चलता है और पति-पत्नी को भरपूर सेक्स का आनन्द मिलता है।
पत्नी द्वारा सेक्स क्रिया में सकारात्मक संकेत-
इस प्रकार के संकेत को करने के लिए पत्नी को चाहिए कि जब पति गहरी नींद में सो रहा हो तब उसके कान में धीरे-धीरे फुस-फुसाते हुए कहें कि आप में पूर्ण पौरुष शक्ति विद्यमान है, आप देर तक संभोग क्रिया कर सकते हैं, आप जल्दी स्खलित नहीं होंगे, आप मुझे पूरी तरह से सेक्स का आनन्द दे सकते हैं। इस प्रकार की बातें पत्नी को प्रत्येक रात में कम से कम तीन-चार बार पति को अवश्य कहनी चाहिए।
इसके लिए मैं आपको एक बात यह भी बताना चाहूंगा कि जब भी पुरुष सो जाता है तब उसका चेतन मन तो निष्क्रिय हो जाता है, लेकिन अवचेतन मन पूर्ण रूप से क्रियाशील बना रहता है। अचेतन मन में दबी हुई इच्छाएं ही स्वप्न में बदलकर प्रकट होती हैं और दबी हुई इच्छाएं ही पूर्ण हो जाती हैं। इसलिए आपके द्वारा दी गई भावना ही पति के अचेतन मन में प्रवेश करेगी और बार-बार कई दिनों तथा कुछ महीनों तक यदि आप धैर्य तथा संयमपूर्वक भावना देती रहेंगी तो उनका अचेतन मन क्रियाशील हो जाएगा और आपके पति में सेक्स के प्रति आत्म-विश्वास जाग उठेगा। इससे पति को शीघ्रपतन से छुटकारा भी मिल जाएगा तथा उनमें सेक्स क्रिया करने की क्षमता में भी वृद्धि हो जाएगी। इसके प्रयोग से आपके दाम्पत्य जीवन में रंगीन उमंग, उल्लास तथा आनन्द का संचार होने लगेगा।
लिंग मुण्ड का संवेदनशील हो जाना-
बहुत से ऐसे पुरुष होते हैं जिनका लिंग बहुत अधिक संवेदनशील होता है और जब स्त्री की गर्म, गीली तथा उत्तेजित योनि से उसका सम्पर्क होता है तो वे बहुत अधिक कामोत्तेजक होकर स्खलित हो जाते हैं। इस स्थिति से बचने के लिए सबसे अच्छा उपाय यह है कि आप अपने लिंगमुण्ड की त्वचा को नीचे की ओर खिसका करके खुला रखें। यदि लिंगमुण्ड अधिक ढीला हो और छल्ले से फिसलकर लिंगमुण्ड को बार-बार ढक लेता हो तो खतना कर लेना अच्छा होता है। खतना करा लेने से लिंगमुण्ड स्थायी रूप से खुला रहेगा और कपड़ों को लगातार घर्षण से उसकी अतिसंवेदनशीलता कुछ दिनों में खत्म हो जायेगी और संभोग भी अधिक समय तक चलेगा। खतना कर लेना लिंग की सफाई रखने की दृष्टि से भी आवश्यक है। लिंगमुण्ड को सभी समय ढके रहने से छल्ले के पीछे एक श्वेत रंग का मैल जमने लगता है जो बदबू उत्पन्न करने के अतिरिक्त कभी-कभी खुजली भी उत्पन्न कर देता है। इससे संक्रमण की भी आशंका बनी रहती है। इसलिए खतना करायें या न करायें लेकिन लिंग-मुण्ड को हमेशा खुला रखें।
लिंग की अतिसंवेदनशीलता को दूर करने के लिए एक यह तरीका है कि एक कटोरे में गर्म पानी लें और दूसरे कटोरे में ठंडा पानी लें। ध्यान रखे कि पानी इतना गर्म हो जितना लिंग की त्वचा सह सके, ज्यादा गर्म पानी से लिंग में जलन हो सकती है। दूसरे कटोरों में भी पानी ज्यादा ठंडा न लें। इस क्रिया को करने के लिए शुरू में पानी उतना ही गर्म तथा ठंडा रखें कि आसानी से सहन हो जाये। बाद में धीरे-धीरे पानी की उष्णता एवं शीतलता बढ़ाई जा सकती है। लेकिन हर स्थिति में सहनशीलता का ध्यान रखें अन्यथा लाभ के बजाय हानि हो सकती है। क्रिया को करने के लिए पहले अपने लिंग को गर्म पानी में डुबायें और लगभग 30 सेकण्ड तक डुबाकर रखें। इसके बाद लिंग को पानी से निकालकर ठंडे पानी के कटोरे में डुबा दें। इस बार भी लगभग 30 सेकण्ड तक लिंग को पानी में डुबाकर रखे। इस क्रिया को पहले दिन कम से कम पांच बार करें। इस क्रिया में यह ध्यान रखें कि अण्डकोष न तो पानी से स्पर्श करें और न ही कटोरी को। पानी में केवल लिंग को ही डुबायें और इस क्रिया को प्रतिदिन बढ़ाते जाए। धीरे-धीरे इस क्रिया का अभ्यास हो जाने तथा सहनशीलता बढ़ जाने पर लिंग को लगभग दो मिनट तक पानी में डुबाए रखें।
आप कभी भी इस बात से भयभीत न हो कि पानी में इस तरह से लिंग डुबाने से हानिकारक प्रभाव हो सकता है। यह क्रिया पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है। क्योंकि ठंडे पानी से रक्त का प्रवाह त्वचा की ओर तेज गति से होता है और गर्म पानी से रक्त का प्रवाह पीछे की ओर हटता है। अतः कहा जा सकता है कि ठंडे पानी और गर्म पानी के प्रयोग से लिंग की रक्तवाहिनियों तथा शिराओं में रक्त संचार की गति तेज हो जायेगी और लिंग में एक प्रकार की नई शक्ति तथा चेतना का संचार होगा तथा इसके साथ ही लिंग-मुण्ड की संवेदनशीलता भी खत्म हो जाती है। इस क्रिया को करने के फलस्वरुप संभोग को देर तक बनाए रखना तथा योनि में लिंग से तेज गति से घर्षण करने की शक्ति में वृद्धि भी हो जाती है।
सूर्य स्नान क्रिया से सेक्स शक्ति को बढ़ाना-
सूर्य स्नान की क्रिया को अपनाने से यौन-शक्ति में वृद्धि होती है। इस क्रिया को करने के लिए सूर्य के किरणों को लिंग पर पड़ने देना चाहिए। सूर्य की किरणों में विटामिन डी होता है। जब सूर्य की किरणों को लिंग पर डाला जाता है तो इसके साथ ही मुक्त हवा का प्रभाव पड़ता है जिसमें उसमें रक्तंचार की क्रिया को तेज हो जाती है तथा इससे नई शक्ति भी जाग जाती है। यदि लिंग को नंगा रखना संभव न हो तो एक पतले कपड़े से ढ़ककर रखा जा सकता है। इस क्रिया को 5 मिनट से लेकर 30 मिनट तक कर सकते हैं।
सिट्ज बाथ द्वारा यौन-शक्ति में वृद्धि करना-
सिट्ज बाथ करने के लिए ठंडे तथा गर्म पानी का उपयोग किया जा सकता है। इस बाथ को करने से संभोग क्रिया के समय में वृद्धि होती है तथा पौरुष शक्ति का भी विकास होता है। यह क्रिया एक प्रकार की जल चिकित्सा की क्रिया है जो वीर्य तथा पौरुष शक्ति की वृद्धि के लिए उपयोग में ली जाती है। इस बाथ की क्रिया को कम से कम पांच मिनट तक पानी के तापमान के अनुसार करना चाहिए। यह एक प्रकार की स्नान करने की क्रिया होती है।
इस स्नान को करने के लिए सुबह का समय अच्छा होता है लेकिन इसे करने के लिए समय का कोई बंधन नहीं होता है। वैसे सुविधा के अनुसार इस क्रिया का प्रयोग किसी भी समय किया जा सकता है। इस स्नान की क्रिया में गर्म और ठंडे पानी का स्नान एक के बाद एक करते रहना चाहिए। गर्म पानी का तापमान 110 डिग्री से लेकर 115 डिग्री फारेनहाइट तक होना चाहिए।
सिट्ज बाथ को करने के लिए एक टब में पानी भर ले, ध्यान रहे कि टब का पानी इतना रहे कि पेट तक का भाग उसमें डूब जाये। सिट्ज बाथ करने के लिए उस तरीके का इस्तेमाल करें, जिसमें पेट तो पानी में रहे लेकिन टांगे टब के बाहर ही रखे। यह क्रिया 8 से 10 मिनट तक करते रहना चाहिए। ठंडे तथा गर्म पानी का टब एक-दूसरे के पास ही रखे ताकि एक से निकालकर दूसरे में आसानी से बैठना सम्भव हो। प्रत्येक टब में 8 से 10 मिनट तक सिट्ज बाथ करने से सेक्स क्रिया के समय तथा पौरुष शक्ति में वृद्धि हो होती है। इसके प्रयोग से अंडकोष, कब्ज, मूत्र से सम्बंधित रोग तथा अंडकोष की वृद्धि आदि रोग ठीक हो जाते हैं


यौन अंग अनुरूपण और संभोग 
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परिचय-
संभोग क्रिया करने के लिए स्त्री और पुरुष दोनों के ही यौन अंगों का अनुकूलन होना बहुत जरूरी है। अगर दोनों के यौन अंग एक-दूसरे के अनुरूप हो तो संभोग क्रिया के समय पुरुष का लिंग स्त्री की योनि में पूरी तरह से समा जाता है। संभोग क्रिया को सफल बनाने के लिए यौन अंगों को अनुरूपण बहुत ही ज्यादा खास होता है। इसलिए यौन अंगों की रचना के आधार पर संभोग क्रिया के 3 भेद बताए गए हैं- 
1. उच्च स्तरीय संभोग 
2. मध्यम स्तरीय संभोग 
3. निम्न स्तरीय संभोग
उच्च स्तरीय संभोग- 
इस तरह की संभोग क्रिया में पुरुष का लिंग स्त्री की योनि से काफी लंबा होता है।
मध्यम स्तरीय संभोग-
इस तरह की संभोग क्रिया में स्त्री और पुरुष के यौन अंगों में समानता होना जरूरी है।
निम्न स्तरीय संभोग-
इस तरह की संभोग क्रिया में पुरुष के लिंग का आकार छोटा होता है और स्त्री की योनि की गहराई ज्यादा होती है।
यौन अंगों की रचना के आधार पर संभोग के नजरिये से पुरुषों को इन प्रकारों का बताया गया है- 
1. घोड़ा 
2. बैल 
3. खरगोश
घोडा़-
इस वर्ग का पुरुष रौबदार और आकर्षक होता है। इसका चेहरा अंडे का आकार का, कान लंबे, सिर बड़ा और होंठ गुलाबी तथा पतले होते हैं। इनकी आवाज काफी कड़क होती है। इनके हाथ-पैर लंबे तथा जांघें मजबूत होती हैं। ऐसे पुरुषों को गुस्सा ज्यादा आता है और इनकी चाल भी तेज होती है। इन पुरुषों के वीर्य से मधुरस की गंध आती है और यह संभोग क्रिया में निपुण होते हैं। स्त्रियां ऐसे पुरुषों की ओर जल्दी ही आकर्षित हो जाती है।
इस वर्ग के पुरुष का लिंग घोड़े की तरह मजबूत और लंबा होता है। इस तरह के पुरुषों के लिंग की लंबाई सामान्यताः 6 इंच और घेरा साढ़े 4 या 5 इंच होता है। इस तरह के पुरुषों में संभोग क्रिया के समय स्तंभन शक्ति ज्यादा होती है।
बैल-
इस वर्ग के पुरुष न तो ज्यादा लंबे होते है और न ही ज्यादा छोटे होते हैं। इनकी बोली में मिठास होती है, यह कला में रुचि रखते हैं, हमेशा सच बोलते हैं और इनका व्यक्तित्व आकर्षक होता है। इस वर्ग के पुरुष संभोग कला में पूरी तरह से निपुण होते हैं इसलिए इनके साथ संभोग करने वाली स्त्रियां हमेशा खुश रहती है। ये एक सफल प्रेमी और अच्छे पति भी साबित होते हैं।
इस वर्ग का पुरुष बैल की तरह ताकतवर और संभोग क्रिया में निपुण होता है। ऐसे पुरुषों में जब काम उत्तेजना जागृत होती है तो इनका लिंग लगभग 4 से 5 इंच का हो जाता है। ऐसे पुरुष स्त्री को संभोग क्रिया के समय जल्दी संतुष्ट कर लेते हैं।
खरगोश-
इस वर्ग का पुरुष खरगोश की तरह शांत स्वभाव का होता है। इनकी लंबाई लगभग 5 फुट के करीब होती है और यह शरीर से भी ताकतवर नहीं होते हैं। इनके हाथ-पैर सामान्य से कुछ छोटे होते हैं और चेहरा गोल आकार में होता है। ऐसे पुरुष गुणी, अनुरागी तथा ललित कला के प्रेमी होते हैं। इनका दिल साफ होता है इसलिए यह जल्दी ही सब पर भरोसा कर लेते हैं। इनकी बोली मीठी होती है।
खरगोश वर्ग के पुरुषों में जब काम उत्तेजना जागृत होती है तब इनके लिंग की लंबाई लगभग 3 से 4 इंच होती है। इनके अंदर काम उत्तेजना कम होती है इसलिए यह संभोग क्रिया के लिए बेचैन नहीं होते हैं। यह थोड़ी देर की संभोग क्रिया से ही संतुष्ट हो जाते हैं। ऐसे लोग शांत जगह पसंद करते हैं। इनका स्वभाव विनम्र होता है इसलिए इनको ज्यादातर सभी लोग पसंद करते हैं।
योनि रचना के आधार पर स्त्रियों को भी 3 वर्गों में बांटा गया है- 
1. हस्तिनी नायिका (हथिनी के समान)। 
2. बड़वा नायिका (घोड़ी के समान)। 
3. मृगी नायिका (हिरन के समान)।
हस्तिनी-
इस वर्ग की स्त्रियां हथिनी के समान शरीर की होती हैं। इनका चेहरा, नितंब और स्तन भारी होते हैं। इस वर्ग की स्त्रियों के हाथ-पैर मोटे, आंखें छोटी और नाक ज्यादा चौड़ी होती हैं। इनकी आवाज पुरुषों की ही तरह रोबदार और भारी होती है और इन्हें छोटी-छोटी बातों पर जल्दी ही गुस्सा आ जाता है।
हस्तिनी वर्ग की स्त्रियों के भगोष्ठ मोटे और रोएं सख्त होते हैं। इनकी योनि लगभग 6 इंच गहरी होती है। ऐसी स्त्रियों में काम उत्तेजना इतनी तेज होती है जोकि इनकी आंखों में ही झलकती रहती है। इनको संभोग क्रिया के समय संतुष्ट करना बहुत मुश्किल होता है। इनको पुरुष का मजबूत अलिंगन, दांतों से काटना तथा नाखून गड़ाना पसंद होता है। संभोग क्रिया के समय यह तेज घर्षण को पसंद करती है। इनका स्वभाव खुले किस्म का होता है और यह सबमें जल्दी घुलमिल जाती हैं।
बड़वा-
बड़वा का अर्थ घोड़ी होता है। इस वर्ग की स्त्रियां ऊंचे कद की होती हैं, इनके नैन-नक्श काफी सुंदर होते हैं, बाल लंबे होते हैं, नाक लंबी होती है, स्तन पुष्ट होते हैं, कमर पतली होती है और होंठ गुलाबी होते हैं। ऐसी स्त्रियों की बोली मीठी और चाल मादक होती है। इनका स्वभाव गुस्सैल होता है। यह संभोग कला में निपुण होती हैं।
यह कामुक प्रवृति की होती हैं इसलिए यह आलिंगन तथा चुंबन से जल्दी ही उत्तेजित हो जाती हैं। इन्हें संभोग क्रिया के समय मजबूत आलिंगन के साथ ही शरीर में नाखून गड़ाना पसंद होता है। इनकी योनि की गहराई 4 इंच गहरी होती है। यह संभोग क्रिया में खास रुचि रखती है इसलिए यह इस क्रिया के समय पुरुष को पूरा सहयोग प्रदान करती है। इनकी योनि से मधुरस की गंध आती है।
मृगी-
मृगी का अर्थ हिरनी होता है। यह हिरनी के जैसी चंचल, सुंदर, आकर्षक और सम्मोहक होती हैं। इनकी आंखें काली, बाल लंबे, गर्दन सुराहीदार, रंग गोरा और शरीर कोमल होता है। इन स्त्रियों के गाल मोटे-मोटे, होंठ गुलाबी, स्तन पुष्ट, कमर पतली, नितंब भारी और आवाज मीठी होती है। इस वर्ग की स्त्रियों में नाच-गाने और ललित कला में रुचि रहती है। ऐसी स्त्रियां संभोग क्रिया में पुरुष को पूरी तरह से सहयोग प्रदान करती हैं। इनमें हर तरह के गुण होते हैं इसलिए यह संभोग प्रिय लोगों की पसंदीदा होती हैं। ऐसी स्त्रियों की योनि की गहराई लगभग 3 इंच होती है, भगोष्ठ उभरे हुए होते हैं और इनकी योनि से कमल के जैसी खुशबू आती है।
यौन अंगों की रचना और आकार-प्रकार के आधार पर संभोग क्रिया को 2 वर्गों में बांटा गया है-
• समरत (समान यौन अंगों का समागम)
• विषमरत (असमान यौन अंगों का समागम)
समरत-
जब पुरुष के लिंग की लंबाई और स्त्री की योनि की गहराई एक जैसी होती है तो उसे समरत कहते हैं। लिंग और योनि के आकार-प्रकार एक जैसे होने के कारण लिंग योनि में बिल्कुल समा जाता है।
समरत में पुरुष वर्ग का जोड़ा निम्न प्रकार की वर्ग की स्त्री के साथ बनाया गया है-
• घोड़े वर्ग का पुरुष मृगी (हिरन) वर्ग की स्त्री के साथ।
• बैल वर्ग का पुरुष हस्तिनी (हथिनी) वर्ग की स्त्री के साथ।
• खरगोश वर्ग का पुरुष बड़वा (घोड़ी) वर्ग की स्त्री के साथ। 
इन्हें ही संभोग क्रिया के लिए सबसे अच्छे जोडे़ माना गया है। यौन अंगों की एक जैसी रचना होने के कारण स्त्री और पुरुष दोनों को ही संभोग क्रिया में पूरी संतुष्टि मिलती है।
विषमरत-
स्त्री और पुरुष के यौन अंगों में समानता न होने पर संभोग करना विषमरत कहलाता है। इसमें लिंग की लंबाई और योनि अलग-अलग आकार की होती है। अगर लिंग ज्यादा लंबा होता है और योनि कम गहरी होती है तो संभोग करते समय घर्षण क्रिया के समय स्त्री को दर्द होता है और लिंग के पूरी तरह से योनि में प्रवेश न कर पाने के कारण पुरुष भी पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो पाता। इसी तरह से अगर पुरुष का लिंग छोटा होता है लेकिन स्त्री की योनि ज्यादा गहरी होती है तो दोनों ही संभोग क्रिया के दौरान मिलने वाले चरम सुख से वंचित रह जाते हैं। लिंग अगर छोटा होता है तो वह योनि में ज्यादा अंदर तक चोट नहीं कर पाता और स्त्री को पूरी तरह से संतुष्टि नहीं मिल पाती है।

पुरुष के लिंग की लंबाई अगर स्त्री की योनि की गहराई से ज्यादा होती है तो उसे उच्चरत कहा जाता है। बैल वर्ग का पुरुष अगर हिरन वर्ग की स्त्री के साथ होता है तो उसे उच्चरत कहते हैं। ऐसे ही अगर घोड़े वर्ग का पुरुष हिरन वर्ग की स्त्री के साथ संभोग क्रिया करता है तो वह उच्चतर होता है। घोड़े वर्ग के पुरुष का लिंग काफी बड़ा होता है और हिरन वर्ग की स्त्री की योनि की गहराई सिर्फ 3 इंच ही होती है। इसी कारण से कामोत्तेजित पुरुष अगर अपने पूरे लिंग को स्त्री की योनि में प्रवेश कराने की कोशिश करता है तो स्त्री दर्द से चिल्ला उठती है और संभोग क्रिया में विघ्न पड़ जाता है।
निम्नरत-
यह उच्चरत के बिल्कुल उल्टा होता है। जिस समय खरगोश वर्ग का पुरुष घोड़ी वर्ग की स्त्री के साथ संभोग करता है तो उसका लिंग स्त्री की योनि में ज्यादा अंदर तक नहीं पहुंच पाता है जिससे स्त्री को किसी प्रकार की संतुष्टि प्राप्त नहीं होती है। इसी तरह से अगर बैल वर्ग का पुरुष किसी हस्तिनी वर्ग की स्त्री के साथ संभोग करता है तो उसका लिंग स्त्री की योनि की गहराई के आधे तक भी नहीं पहुंच पाता है। इसे ही निम्नतर कहते हैं। इसके कारण से न तो पुरुष को और न ही स्त्री को किसी प्रकार की संभोग में मिलने वाली संतुष्टि प्राप्त हो पाती है। बहुत छोटे आकार के लिंग से योनि में पूरी तरह से घर्षण न होने के कारण घोडी़ वर्ग की स्त्री या हस्तिनी वर्ग की स्त्री चरम सुख तक नहीं पहुंच पाती है।
निम्नरत की तुलना में उच्चरत ज्यादा उपयुक्त और वांछनीय होता है क्योंकि अगर पुरुष स्त्री की योनि में सावधानी से घर्षण की क्रिया करता है तो इससे स्त्री को असीम आनंद प्राप्त होता है और पूर्ण संतुष्टि भी प्रदान होती है। लेकिन उच्चतर छोटी और कम गहरी योनि के लिए सही नहीं है। इसी प्रकार निम्नरत भी बेकार होता है क्योंकि गहरी योनि में छोटा लिंग आधे तक भी नहीं पहुंच पाता और न ही ज्यादा जोर की घर्षण क्रिया कर सकता है।
अगर किसी कारण से घोड़े वर्ग का पुरुष किसी घोडी़ वर्ग की या हिरन वर्ग की स्त्री के साथ संभोग करता है तो ऐसी स्त्री को संभोग के समय अपनी जांघों को पूरी तरह से फैलाकर अपनी योनि के मुख को पूरी तरह से फैलाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि पुरुष का लिंग आसानी से उसकी योनि में प्रवेश कर पाए। अगर स्त्री अपने नितंबों के नीचे एक मोटा सा तकिया रखकर अपनी योनि वाले भाग को ऊंचा उठा लेती है तो इससे उसकी योनि की गहराई बढ़ जाती है और बड़े आकार का लिंग भी उसमें पूरी गहराई तक समा जाता है। अगर संभोग करने वाला पुऱुष इस क्रिया में पूरी तरह से निपुण होता है तो बड़े से बड़ा लिंग भी छोटी योनि में प्रवेश करके स्त्री को चरम सुख तक पहुंचा सकता है।

स्त्रियों की संभोग में रुचियां 
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परिचय-
स्त्रियों की संभोग के प्रति रुचि होने के बारे में सबसे पहले यह बात जानना जरूरी होता है कि स्त्रियां भी पुरुषों से कम कामुक नहीं होती हैं। इसमें फर्क सिर्फ इतना होता है कि पुरुष की कामुकता जल्दी समाप्त हो जाती है जबकि स्त्रियां अपनी कामुकता को छुपाकर रखना चाहती है और जब तक जरुरी न हो तब तक उनकी कामुकता का आसानी से पता नहीं लगाया जा सकता है।
स्त्रियों मे कामुकता के बहुत से केंद्र होते हैं लेकिन उन केंद्रों के बारे में जानने से पहले यह जानना जरुरी है कि उनमें काम उत्पत्ति कव होती है।
लड़कियों का जब मासिकधर्म शुरू होता है तो उसके बाद उनके शरीर में खास तरह के हार्मोन्स का विकास होना शुरू होता है और इसी समय से लड़कियां काम भावना की ओर भागने लगती हैं। इसी समय लड़कियों के शारीरिक अंगों का भी विकास होने लगता है जैसे उसके स्तन और नितंबों का भारी होना, जननांगों पर बाल उगना़, आवाज का बदल जाना आदि। माना जाता है कि जिन लड़कियों का मासिकधर्म जल्दी शुरु होता है उनके अंदर संभोग करने की इच्छा भी जल्दी पैदा होती है लेकिन यह बात पूरी तरह से सही नहीं है क्योंकि संभोग करने की इच्छा का संबंध शारीरिक विकास की अपेक्षा सामाजिक या अनुवांशिक कारणों से ज्यादा होता है। अक्सर कुछ लड़कियां मासिकधर्म के दौरान संभोग के प्रति उत्तेजना महसूस करती हैं लेकिन संभोग करने से डरती हैं लेकिन यह बात सही नहीं है। अगर वे इस दौरान संभोग के प्रति उत्तेजना महसूस करती हैं तो उसे संभोग करने से डरना नहीं चाहिए वह अपने पति को संभोग के लिए तैयार कर सकती हैं। इस दौरान स्त्री को गर्भ ठहरने का डर भी नहीं रहता है और उसकी योनि में भी वहुत ज्यादा नमी रहती है। शुरुआत में तो स्त्रियां इस दौरान संभोग करते समय योनि में से ज्यादा खून आने की शिकायत करती हैं लेकिन धीरे-धीरे यह खून आना कम हो जाता है क्योंकि कु्छ समय में गर्भाशय का संकुचन हो जाता है। कुछ स्त्रियों में मासिकधर्म के समय दिमागी तनाव जैसे लक्षण पैदा हो जाते हैं जिसका असर उनकी सेक्स करने की इच्छा पर भी पड़ता है। उनमें चिड़चिड़ापन आ जाता है और इसी के साथ ही जी मिचलाना, कमर में दर्द आदि लक्षण प्रकट होते हैं।
बहुत सी स्त्रियां गर्भधारण करने के बाद सेक्स करने के बारे में इच्छा तो रखती है लेकिन डरती है कि कहीं इसका उनके गर्भ में पल रहे बच्चे पर बुरा असर न पड़े। ऐसी स्त्रियां गर्भावस्था के दौरान संभोगक्रिया कर सकती हैं लेकिन इसके लिए उन्हें अपने आपको शरीर और दिमाग से पूरी तरह स्वस्थ महसूस करना होता है और कुछ सावधानियां बरतने की जरूरत होती है। अगर किसी स्त्री को पहले गर्भावस्था के समय 3 महीने के दौरान कभी गर्भपात हुआ हो तो दुबारा गर्भ ठहरने के बाद शुरुआती 3 महीनों तक संभोगक्रिया से दूर रहना चाहिए। अगर स्त्री को पहले कई बार गर्भपात हुआ हो तो गर्भावस्था के दौरान उसे संभोग से दूर रहना चाहिए क्योंकि ऐसी स्त्री के गर्भाशय का मुंह गर्भ को स्थापित रखने में कमजोर होता है। स्वस्थ स्त्री अगर शुरुआती 3 महीने के बाद सातवें महीने तक संभोग करे तो कोई परेशानी की बात नहीं है। लेकिन संभोगक्रिया के लिए ऐसे आसनों का प्रयोग करना चाहिए जिनका असर गर्भ में पल रहे बच्चे पर न पड़े। इन आसनों में संभोगक्रिया के दौरान स्त्री को पुरुष के ऊपर होकर या बगल में लेटकर संभोगक्रिया करनी चाहिए।
बहुत सी स्त्रियों में यौन उत्तेजना इतनी तेज होती है कि उन्हें संभोग करने से पहले प्राकक्रीड़ा द्वारा उत्तेजित करने की जरूरत नहीं पड़ती। ऐसी स्त्रियां पुरुष के द्वारा छूते ही उत्तेजित हो जाती हैं और संभोगक्रिया के लिए तैयार हो जाती हैं। पर दूसरी किस्म की स्त्रियों को कलात्मक प्राकक्रीड़ा द्वारा उत्तेजित करना जरूरी हो जाता है। जब तक ऐसी स्त्रियों के जननांगों में यौन लहरे तरंगित नहीं होती तब तक उनका पति उनके साथ सफल सेक्स नहीं कर सकता। जब तक स्त्री में यौन उत्तेजना नहीं होगी तब तक उसकी योनि द्रवित नहीं हो पाएगी और उसमें लिंग भी आसानी से प्रवेश कर पाएगा। अगर किसी तरह से लिंग योनि में प्रवेश कर भी जाता है तो उससे तेजी से घर्षण नहीं किया जाएगा। इसलिए हर पति को अपनी पत्नी के काम केंद्रों की जानकारी होनी चाहिए। वैसे तो स्त्री का पूरा शरीर ही यौन उत्तेजना के मामले में संवेदनशील होता है लेकिन उसके होंठ, जीभ, स्तन, नाभि का हिस्सा, नितंब, जांघ के अंदर का हिस्सा, योनि और भगनासा बहुत उत्तेजक अंग होते हैं। अगर स्त्री के इन अंगों को सहलाया जाए तो स्त्री उत्तेजित होकर तुरंत संभोग के लिए तैयार हो जाती है।
होंठ और जीभ-
होंठ और जीभ बहुत ही कामोत्तेजक होते हैं। पति जब अपनी पत्नी का चुंबन लेते समय उसके नीचे वाले होंठ को अपने होंठों के बीच में लेकर चूसता है, उसकी जीभ को अपनी जीभ से रगड़ता है, मुंह में मुंह लेकर चूसता है तो स्त्री के होंठ कामोत्तेजना से गुलाबी हो जाते हैं और उसकी आंखों में भी नशा छाने लगता है। अक्सर पत्नी अपने पति के द्वारा होंठों को चूमने या चूसने से तुरंत ही कामोत्तेजित हो जाती है।
स्तन-
स्त्री के स्तन भी बहुत कामोत्तेजक होते हैं। अक्सर पुरुष स्त्री के स्तनों को देखकर ही उत्तेजित हो जाता है लेकिन जब पुरुष भारी और आकर्षक स्तनों को धीरे-धीरे सहलाता और मसलता है, उसके स्तनों के निप्पलों को उंगलियों से धीरे-धीरे दबाता है तो स्त्री उसी समय कामोत्तेजित हो जाती है बेकाबू हो जाती है। अगर पुरुष स्तनों के निप्पलों में से एक को चूसते हुए दूसरे को सहलाता है तो स्त्री कामोत्तेजित होकर सिसकियां लेनी लगती हैं। लेकिन इस सबको अगर एक हद तक ही किया जाए तो ठीक है वरना पुरुष को अपने आपको संभालना मुश्किल हो जाता है और वह तुरंत ही स्खलित हो जाता है। बहुत से पुरुष होते हैं जो स्त्री के स्तनों के साथ खेलते-खेलते ही स्खलित हो जाते हैं।
नाभि-
स्त्री के नाभि वाले भाग को अगर हल्के-हल्के से सहलाया या गुदगुदाया जाए तो स्त्री की कामोत्तेजना बढ़ने लगती है। अगर पुरुष स्त्री की नाभि को अपनी जीभ से चूमता या सहलाता है तो स्त्री में कामोत्तेजना चरम पर पहुंचने लगती है। लेकिन स्त्री का नाभि वाला भाग उसके होंठों, जीभ और स्तनों से कम ही उत्तेजक होता है।
नितंब-
बहुत सी स्त्रियों के नितंब काफी आकर्षक और कामोत्तेजक होते हैं। बाहर के देशों में पीन नितंब बहुत ज्यादा कामोत्तेजक होते हैं। उन देशों में स्त्री को बहुत सुंदर और मादक माना जाता है जिसका सीना और नितंब एक ही साइज के होते हैं जैसे अगर किसी स्त्री का सीना 34 है तो उसके नितंबों के उभारों का नाप भी 34 ही होना चाहिए। सौंदर्य प्रतियोगिताओं में अक्सर वही स्त्री जीतती है जिसके सीने, कमर और नितंब का नाप 34-24-36 होता है। उभरे हुए नितंब पुरुष के लिए स्तनों के समान ही कामोत्तेजक होते हैं। नितंबों को सहलाने और मसलने से पुरुष की नस-नस में कामोत्तेजना पैदा होने लगती है और स्त्री भी कामोत्तेजित होकर पति से लिपटने लगती है।
जांघ-
स्त्री के जांघों के भीतरी भाग को धीरे-धीरे सहलाने से भी स्त्री कामोत्तेजित हो जाती है। इन अंगों का मादक स्पर्श पुरुष को भी कामोत्तेजित कर देता है। अक्सर स्त्रियां इन अंगों को सहलाए जाने से प्रसन्न और गदगद हो जाती हैं और संभोगक्रिया के लिए तैयार हो जाती हैं।
भगनासा- 
स्त्री के शरीर का सबसे कामोत्तेजक अंग उसका भगनासा होता है। यह छोटे भगोष्ठों के बीच उस स्थान पर स्थित होता है जहां से छोटे भगोष्ठों का उभार शुरू होता है। इसके थोड़ा सा नीचे मूत्रद्वार होता है जिससे स्त्री मूत्र त्याग करती है। भगनासा छोटे दाने के आकार में उभरी हुई होती है लेकिन असल में ये बहुत ज्यादा बारीक कामोत्तेजक तंत्रिकाओं का समूह होती है। यह लिंग का ही बहुत छोटा प्रतिरूप होता है। इसमें भी मुंड होता है जो साधारण रूप में मुंडचर्म से ढका रहता है लेकिन उत्तेजित होने पर मुंड अनावृत होकर तन जाता है। इसका आकार भी सामान्य से दुगना हो जाता है। पुरुष जब इस भगनासा को हल्के से सहलाता है या कलात्मक ढंग से छेड़ता है तो स्त्री के शरीर में काम उत्तेजना बहुत ही तेज हो जाती है। अगर यह क्रिया हद से बाहर हो जाती है तो तेज काम उत्तेजना के कारण पुरुष और स्त्री दोनों ही स्खलित हो जाते हैं और संभोगक्रिया के असली आनंद से वंचित रह जाते हैं। इसलिए पुरुष को इस मामले में बहुत ही सावधान रहने की जरूरत होती है। थोड़ी सी सावधानी बरतने से ही पुरुष स्त्री को इतना उत्तेजित कर देता है कि स्त्री की योनि में पुरुष के लिंग के प्रवेश करने तथा हल्के से घर्षण से ही स्त्री तेज स्खलन को महसूस करके बहुत ज्यादा आनंद और गुदगुदी से कुछ पलों के लिए आनंद के सागर में खो जाती है।
योनि-
भगनासा के अलावा स्त्रियों का योनि मार्ग भी काफी संवेदनशील कामोत्तेजक अंग होता है। योनि के मुख्य द्वार पर छोटे भगोष्ठ स्थित होते हैं जो बहुत ज्यादा संवेदनशील होते हैं। छोटे भगोष्ठों से सलंग्न योनि छल्ला होता है जो भगनासा की तरह ही सूक्ष्म तंत्रिकाओं से घिरा होता है। यह अंग स्वैच्छिक पेशियों से जुड़ा रहता है और स्त्री अपनी इच्छा के अनुसार इसमें संकोच उत्पन्न कर सकती है। संभोगक्रिया के समय जब लिंग तेजी से घर्षण करता है तो उस समय योनि मुख के कलात्मक ढंग से फैलने और सिकुड़ने से पुरुष बहुत ज्यादा आनंद महसूस करता है। उत्तेजना उसे और मदहोश कर देती है और लिंग के द्वारा योनि में घर्षण और तेज होता जाता है। बहुत सी कामुक स्त्रियों में योनि मुख का आंकुचन (योनि मुख का अपने आप सिकुड़ना और फैलना) कामोत्तेजना के समय खुद ही होने लगता है और स्त्री आसानी से उसके सिकुड़ने और फैलने की गति को नियंत्रित नहीं कर सकती है। इस प्रकार की योनि से पुरुष को जो यौन सुख मिलता है उसको बताया नहीं जा सकता है। स्त्री के इस अंग को उंगली से धीरे-धीरे सहलाने से या जीभ के द्वारा चाटने से स्त्री बहुत ज्यादा उत्तेजित होकर सिसकियां भरने लगती है। ऐसी स्थिति पैदा होने पर अगर पुरुष अपने लिंग को स्त्री की योनि में प्रवेश कराके घर्षण शुरू कर दें तो कुछ ही समय में स्त्री स्खलित होकर संतुष्ट हो जाती है। स्त्री जब बहुत ज्यादा उत्तेजित हो जाती है तब उसके भगोष्ठ फूलकर गुलाबी रंग के हो जाते हैं।
किसी भी स्त्री को उत्तेजित करने में लगभग 15 से 30 मिनट का समय लग जाता है लेकिन पति में अगर सब्र या कामकला की कमी हो तो वह पत्नी को उत्तेजित किये बिना ही एकतरफा संभोगक्रिया में लग जाता है और तुरंत ही स्खलित होकर एक तरफ हो जाता है। इस सब में उसे इस बात की कोई चिंता नहीं रह जाती कि जिस पत्नी ने उसे अलौकिक आनंद प्रदान किया है उसे खुद भी पूरी तरह संतुष्टि मिली है या नहीं।
कई स्त्रियां होती हैं जो संभोगक्रिया के समय चुंबन से ऩफरत करती हैं और पुरुष के द्वारा अपने शरीर पर नाखून गाड़ने से या दांतों से काटने से भी बुरा मानती हैं। ब्रह्मलोक और अवंती की स्त्रियां भी इन्हें पसंद नहीं करती लेकिन संभोगक्रिया के अलग-अलग आसनों में ज्यादा रुचि लेती हैं। इनको युक्तसंगम या बैठकर संभोग करने में आनंद मिलता है। यह 4 प्रकार से किया जाता है- जानूपू्र्वक, हरिविक्रम, द्वितल और अवलंबित।
आमीर प्रदेश और मालवा की स्त्रियों को मजबूत आलिंगन, चुंबन और पीड़ाक जैसी संभोगक्रिया सबसे प्रिय होती है। इन्हें पुरुष के द्वारा अपने शरीर पर नाखून गड़ाना और दांतों से काटना नापसंद होता है। संभोगक्रिया में इन्हें जितना ज्यादा दर्द होता है उतनी ही अधिक इनकी यौन उत्तेजना बढ़ती है।
• ईरावती, सिंधु, शतद्रु, चंद्रभागा, विपात और वितस्ता नदियों के पास रहने वाली स्त्रियों के शरीर की उत्तेजना बढ़ाने वाले अंगों पर पुरुष द्वारा सहलाने से काम उत्तेजना तेज होती है।
• गुर्जरी स्त्रियों के सिर के बाल घने, दुबला-पतला शरीर, स्तन भरे हुए और आंखे नशीली होती हैं। यह स्त्रियां सरल संभोग करना पसंद करती हैं। 
• लाट प्रदेश की स्त्रियां बहुत उत्तेजक होती हैं। इनके शरीर के अंग कोमल और नाजुक होते हैं। ऐसी स्त्रियों को लगातार चलने वाली संभोगक्रिया पसंद होती है। अपने पुरुष साथी से लिपटना इन्हें बहुत पसंद होता है। ये तेज कटिसंचालन करती हैं और काफी देर तक योनिमंथन करने से इन्हें आनंद मिलता है। यह स्त्रियां पुरुष द्वारा अपने शरीर पर नाखून गड़ाना और दांतों से काटना भी पसंद करती हैं। 
• आंध्रप्रदेश की स्त्रियां कोमल अंगों वाली होती हैं और इनके अंदर यौन उत्तेजना बहुत ज्यादा होती है। यह स्त्रियां संभोग के लिए पुरुष को खुद ही उत्तेजित करती हैं और बड़वा आसन में संभोग करना पसंद करती हैं। 
• उत्कल और कलिंग प्रदेश की स्त्रियों को काम उत्तेजना के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं होता। यह स्त्रियां पुरुष द्वारा अपने शरीर पर नाखून गड़ाना और दांतों से काटना पसंद करती हैं। उत्कल स्त्रियां बिल्कुल शर्म न करने वाली, हमेशा प्यार करने वाली और लंबे समय तक संभोग की इच्छा रखने वाली होती हैं। 
• बंगाल और गौड़ प्रदेशों की स्त्रियां कोमल अंगों वाली होती हैं। इन्हें हर समय आलिंगन और चुंबन में रुचि होती है। ऐसी स्त्रियों की काम उत्तेजना को जगाने में बहुत देर लगती है लेकिन एक बार जब इनकी काम उत्तेजना जगती है तो ये अपने आपको पूरी तरह से पुरुष के हवाले कर देती हैं। इनके नितंब भारी होते हैं इसलिए इन्हें नितंबनी भी कहा जाता है। 
• कामरूप की स्त्रियां मीठी बोली वाली होती हैं। इनके शरीर के अंग कोमल और आकर्षक होते हैं। पुरुष द्वारा सिर्फ इनका आलिंगन करने से ही इन्हें पूरी तरह संभोग संतुष्टि मिल जाती है। एकबार अगर यह स्त्रियां उत्तेजित हो जाती हैं तो उसके बाद यह पूरी तरह से संभोगक्रिया में डूबी रहती हैं। 
• आदिवासी स्त्रियां अपने शरीर के विकारों को दूसरों से छुपाती हैं लेकिन दूसरों में अगर कोई दोष इन्हें दिखाई देता है तो यह उन्हें ताना मारने से नहीं चूकती हैं। इन्हें संभोग की सभी क्रीड़ाएं पसंद होती हैं और यह सामान्य संभोग में ही यह संतुष्ट हो जाती हैं। 
• महाराष्ट्र की स्त्रियां 64 कलाओं की ज्ञाता होती हैं। संभोगक्रिया के समय वह किसी प्रकार का संकोच नहीं करती और अश्लील बातें बोलती हैं। 
• पटना की स्त्रियां भी अश्लील बातें करती हैं लेकिन सिर्फ घर के अंदर, बाहर नहीं। 
• कर्नाटक की लड़कियों की योनि से पानी ज्यादा मात्रा में निकलता है। यह स्त्रियां आलिंगन. चुंबन और स्तनों को दबवाने के साथ ही योनि में उंगलियों से घर्षण करने से उत्तेजित होती है। संभोगक्रिया के समय यह स्त्रियां जल्दी संतुष्ट हो जाती हैं।

पूर्ण यौन तृप्ति 
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परिचय- 
हर स्त्री के शरीर में बहुत से कामोत्तेजक अंग होते हैं जिनको हल्का-सा छूने से या सहलाने से ही स्त्री के अंदर यौन उत्तेजना जाग उठती है। इनमें स्त्री के स्तन, जांघें, भगनासा और कटि प्रदेश जैसे अंग आते हैं। अगर स्त्री के साथ संभोग करने से पहले उसके इन अंगों को सहलाकर या चूमकर उसे संभोग करने से लिए अच्छी तरह से उत्तेजित कर लिया जाए तो संभोग क्रिया में स्त्री और पुरुष दोनों को ही आनंद आता है। स्त्री के हावभाव को देखकर ही पता लगा लिया जा सकता है कि वह आपके साथ संभोग क्रिया के लिए पूरी तरह से तैयार है।
अगर स्त्री की यौन उत्तेजना को जगाए बिना ही उसके साथ संभोग किया जाए तो उसे इस क्रिया में पूरी तरह से आनंद प्राप्त नहीं होगा और वह बेबस प्राणी की तरह बिस्तर पर पड़ी रहेगी और पुरुष को संभोग क्रिया में सहयोग नहीं करेगी। इसी वजह से न तो पुरुष संभोग का असली मजा प्राप्त कर पाएगा और न ही स्त्री। हो सकता है कि इसके कारण स्त्री-पुरुष से कुछ दिन में ही दिन में कटने सी रहने लगे और उसके मन में यह आए कि मेरे पति को संभोग के बारे में कुछ जानकारी ही नहीं है।
स्त्रियों के अंदर मासिकस्राव के दौरान काम उत्तेजना कम या ज्यादा होती रहती है। मासिकस्राव आने से 2-3 दिन पहले या 2-3 दिन के बाद स्त्री में काम उत्तेजना बढ़ी हुई रहती है। इन दिनों में अगर स्त्री के साथ संभोग किया जाए तो वह अपने पुरुष साथी को इस क्रिया में पूर्ण सहयोग देती है इसलिए पुरुष को चाहिए कि वह स्त्री के मासिकस्राव आने से 2-3 दिन पहले या बाद में उसके स्वभाव का ध्यान रखें। अगर इस समय स्त्री के हावभाव या हरकतों से पुरुष को ऐसा ज्ञात होता है कि स्त्री शारीरिक संपर्क में ज्यादा रुचि ले रही है तो कोशिश करें कि उसकी यह इच्छा किसी तरह से पूरी हो जाए उसकी इस इच्छा को मरने न दें।
यह बात हर पुरुष अच्छी तरह से जानता है कि किसी भी स्त्री में अगर काम उत्तेजना जागती है तो वह अपनी इस इच्छा को खुद पुरुष के सामने प्रकट नहीं कर सकती। जो समझदार पुरुष होते हैं वह स्त्री की इस बढ़ती हुई काम उत्तेजना को खुद ही समझ लेता है। किसी भी स्त्री के अंदर जब भी काम उत्तेजना जागृत होती है तो वह खुद ही अपने पुरुष साथी के शरीर से अपने शरीर को छुआती रहती है, उसके शरीर के अंगों को बार-बार छेड़ती रहती है. उससे अलिंगन करने का प्रयास करती है। पुरुष को जब भी अपनी साथी स्त्री में ऐसे लक्षण नजर आते हैं तो उसे उसकी इस काम उत्तेजना को शांत कर देना चाहिए।
स्त्रियों के शरीर के इन कामोत्तेजित अंगों के बारे में पुरुष को स्त्री से ही जानकारी मिल सकती है लेकिन इसके लिए पुरुष को स्त्री का पूर्ण सहयोग और भरोसा प्राप्त करना होगा। अगर पुरुष स्त्री का संकोच आदि समाप्त करने में सफल हो जाता है तो इससे स्त्री संभोग क्रिया के समय अपने शरीर की प्रतिक्रिया, उत्तेजना और अनुभूति पुरुष को बताने से किसी तरह से हिचकिचाहट नहीं करेगी। इससे स्त्री और पुरुष दोनों को ही संभोग क्रिया के समय पूर्ण संतुष्टि प्राप्त होती है।
बहुत से पुरुष अपनी कामोत्तेजना के वशीभूत होकर अपनी साथी स्त्री की इच्छा विरुद्ध उससे संभोग करने लगते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि वह स्त्री की काम उत्तेजना को शांत किए बिना ही स्खलित हो जाता है जिसका नतीजा यह होता है कि स्त्री की यौन उत्तेजना पूरी तरह से शांत नहीं हो पाती और वह कुछ ही समय में अपने पति के खिलाफ अपने मन में नफरत सी भर लेती है।
अगर पुरुष को अपनी पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने हो तो इसके लिए जरूरी नहीं है कि उसका खुद का मन ही इस क्रिया के लिए तैयार हो बल्कि स्त्री के मन की इच्छा जानना भी जरूरी है। अगर पुरुष के द्वारा स्त्री को आलिंगन, चुंबन या स्पर्श करने से स्त्री की काम उत्तेजना जागृत नहीं होती तो फिर पुरुष को स्त्री के साथ जबरन शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए क्योंकि ऐसे संबंध बलात्कार करने के समान होते हैं।
संभोग क्रिया के समय पुरुष स्त्री से जल्दी स्खलित हो जाता है क्योंकि पुरुष की कामोत्तेजना स्त्री की काम उत्तेजना जागने से पहले ही जाग चुकी होती है नतीजतन पुरुष स्त्री से पहले ही स्खलित हो जाता है। इसलिए पुरुष को चाहिए कि अपनी कामोत्तेजना को थोड़ा संयमित रखे तथा बताए गए उपायों को अपनाकर पत्नी की काम उत्तेजना को पूरी तरह से जगाने के बाद ही संभोग करना शुरु करें इससे स्त्री और पुरुष दोनों ही संभोग क्रिया के समय एक साथ स्खलित होंगे और उन्हें चरम सुख मिलेगा।
अक्सर स्त्रियों में एक बात देखी जाती है कि वह साफ-सफाई की तरफ कुछ ज्यादा ही ध्यान देती है। ऐसी स्त्रियां अपने पति की शारीरिक गंदगी, आलिंगन, चुंबन, स्पर्श न करना और प्यार की बातें न करना आदि। जो पुरुष इन बातों की परवाह न करके अपनी पत्नी को संभोग क्रिया के लिए विवश करते हैं वे अपनी पत्नी की भावनाओं को चोट पंहुचाते हैं। स्त्रियां ऐसे पुरुषों को अपना शरीर तो सौंप देती हैं लेकिन मन से उनके साथ इस क्रिया में सहयोग नहीं करती। इसलिए पुरुष को चाहिए कि अपने शरीर की सफाई पर खासतौर पर ध्यान दें। अगर पुरुष साफ-सुथरे और आकर्षित कपड़ों में स्त्री के सामने जाता है तो स्त्री का मन स्वयं ही उसकी ओर आकर्षित होता है इसके साथ ही पुरुष का हंसमुख होना, प्रेम करने का सबसे अलग तरीका, जिंदादिल रहना स्त्रियों को बहुत ज्यादा पसंद होता है।

संभोग क्या है ? 
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समान रूप से शारीरिक सम्बन्धों द्वारा भोगा गया आनन्द ही सम्भोग है। इसमें सेक्स का आनन्द स्त्री-पुरुष को समान रूप से प्राप्त होना आवश्यक है। स्खलन के साथ ही पुरुष को तो पूर्ण आनन्द की प्राप्ति हो जाती है और सेक्स सम्बन्ध स्थापित होते ही पुरूष का स्खलन निश्चित हो जाता है। यह स्खलन एक मिनट में भी हो सकता है तो दस मिनट में भी। अर्थात् पुरुष को पूर्ण आनन्द की प्राप्ति हो जाती है। इसलिए मुख्य रूप से स्त्री को मिलने वाले आनन्द की तरफ ध्यान देना आवश्यक है। अगर स्त्री इस आनन्द से वंचित रहती है, इसे सम्भोग नहीं माना जाना चाहिए। इस वास्तविकता से व्यक्ति पूरी तरह से अनभिज्ञ होकर अपने तरीके से सेक्स सम्बन्ध बनाता है और स्त्री के आनन्द की तरफ कोई ध्यान नहीं देता है। इसे केवल भोग ही मानना चाहिए। सम्भोग की वास्तविकता को समझे बिना इसे जानना मुश्किल होगा। विवाह के बाद व्यक्ति सम्भोग करने के स्थान पर भोग करता है तो इसका मतलब यह है कि वह इस तरफ से अनजान है कि स्त्री को सेक्स का पूरा आनन्द मिला कि नहीं। सम्भोग शब्द की महत्ता को समझें। स्त्री को भोगें नहीं, समान रूप से आनन्द को बांटे। यही संभोग है।
युवक-युवती जब विवाह के उद्देश्य को समझ विवाह-बंधन में बंधते हैं तो वे इस बात से अवगत होते हैं कि उनके प्रेम भरे क्रिया-कलापों का अंत संभोग होगा। प्रत्येक शिक्षित युवक-युवती यह जानते हैं कि संभोग विवाह का अनिवार्य अंग है। यदि कोई सहेली ऐसी नवयुवती से पूछती है कि तू विवाह करने तो जा रही है किन्तु यह भी जानती है कि संभोग कैसा होता है ? वो या तो इसका उत्तर टाल जाएगी अथवा कह देगी कि उसके बारे मे जानने की क्या आवश्यकता है? संभोग तो पुरुष करता है। इसलिए उसे ही जानना चाहिए कि संभोग कैसे करना चाहिए।
ऐसे प्रश्नों पर युवक हंसकर उत्तर देता है, भला यह भी कोई पूछने की बात है। संभोग करना कौन नहीं जानता।
संभोग आरंभ करने की स्थिति- 
यह ठीक है कि अनेक प्रकार की काम-क्रीड़ा से स्त्री संभोग के लिए तैयार हो जाए और उसकी योनि तथा पुरुष के शिश्न मुण्ड में स्राव आने लगे तो योनि में शिश्न डालकर मैथुन प्रारम्भ कर देना चाहिए। परन्तु जिस बात पर हमें विशेष बल देना चाहिए वह यह है कि योनि में शिश्न डालने के पश्चात् ही काम-क्रीड़ाओं को बंद नहीं कर देना चाहिए, जिनके द्वारा स्त्री को संभोग के लिए तैयार किया गया है। यह 
ठीक है कि समागन के कुछ आसन ऐसे होते हैं जिनमें बहुत अधिक प्रणय क्रीड़ाओं की गुंजाइश नहीं होती, परन्तु ऐसे आसन बहुत कम होते हैं। योनि में शिश्न के प्रवेश करने के बाद जब तक संभव हो सके इन क्रियाओं को जारी रखना चाहिए। यदि किसी आसन में नारी का चुम्बन लेते रहना संभव न हो तो स्तनों को सहलाते और मसलते रहना चाहिए। अगर स्तनों को मसलना या पकड़कर दबाना भी संभव न हो तो इसके चुचकों का ही स्पर्श करते रहना चाहिए। इससे तात्पर्य यह है कि इस समय जो भी प्रणय-कीड़ा संभव हो सके, उसे जारी रखना चाहिए। इससे काम आवेग में वृद्धि होती है, मनोरंजन बढ़ता है और स्त्री के उत्साह में वृद्धि होती है।
प्रणय क्रीड़ाएं अनिवार्य विषय 
जो लोग मैथुन कार्य प्रारम्भ होते ही प्रणय क्रीड़ा बंद कर देते हैं, वे प्रणव-क्रीड़ा को मैथुन से अलग मानते हैं। उनकी धारणा है कि मैथुन कार्य प्रारम्भ होते ही प्रणय क्रियाओं की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। यह धारणा बिल्कुल गलत है। इन दोनों चीजों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। इस स्थिति में आकर प्रणय-क्रीड़ाओं को एकदम बंद कर देने से वह सिलसिला टूट जाता है जिसमें स्त्री रुचि लेने लगी थी।
इस बात को सदा याद रखना चाहिए कि काम-क्रीड़ा के दो उद्देश्य होते हैं- एक तो इस क्रिया द्वारा आनन्द प्राप्त करना और दूसरे दोनों सहयोगियों-विशेषतया-स्त्री को प्रणय-क्रिया के अंतिम कार्य अर्थात् संभोग के लिए तैयार करना। इन दोनों बातों पर ध्यान देने से यह स्पष्ट हो जाएगा कि यदि संभोग की स्थिति पर पहुंचकर प्रणय-क्रीड़ा में अनावश्यक अवरोध पैदा कर दिया जाए या इस क्रीड़ा को बंद ही कर दिया जाए तो स्त्री के मन में झुंझलाहट पैदा हो जाएगी। इस बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए इस दृश्य की कल्पना कीजिए।
पुरुष नारी के गले में बाहें डाले हुए उसके स्तनों का चुम्बन कर रहा है, साथ ही वह उन्हें मसलता जाता है और उसके चूचुकों को भी समय-समय पर स्पर्श कर लेता है। स्वाभाविक है कि इससे नारी के उत्साह और काम के आवेग में वृद्धि होती है। वह उसके हाथ को अपने स्तनों पर और दबा लेती है। इसका तात्पर्य यह है कि वह चाहती है कि पुरुष उनको और जोर से मसले, क्योंकि इससे उसे और अधिक आनन्द आता है। पुरुष इस संकेत को दूसरे रूप में लेता है और समझता है कि स्त्री पर कामोन्माद का पूरा आवेग चढ़ चुका है। बस वह स्तनों को मसलना बंद करके नारी की योनि में अपने शिश्न को प्रविष्ट करने की तैयारी करने लगता है। इससे स्त्री को बड़ी निराशा होती है। पुरुष उसकी योनि में शिश्न डाले, इसमें तो उसे कोई आपत्ति नहीं है, किन्तु वह यह नहीं चाहती कि वह स्तनों को मसलना बंद कर दे। उसे उसके मर्दन (मसलने) से जो आनन्द प्राप्त हो रहा था, उसका सिलसिला बीच में टूट गया। वह यह नहीं चाहती थी। इसलिए यह आवश्यक है कि संभोग क्रिया आरंभ होते समय और उसके जारी रहते हुए न तो प्रणय-क्रीड़ा को समाप्त करें और न उसमें कोई रुकावट ही आने दें।
यह तो सभी लोग जानते हैं कि संभोग क्रिया में पुरुष और स्त्री दोनों ही समान रूप से भागीदार होते हैं, किन्तु बहुत से लोगों का विचार यह है कि पुरुष सक्रिय भागीदार की भूमिका अदा करता है तथा स्त्री केवल सहन करती है अथवा स्वीकार मात्र करती है यह विचार भ्रांतिपूर्ण है। स्त्रियों के जनन अंग बने ही इस प्रकार के हैं कि वे संभोग में कभी निष्क्रिय रह ही नहीं सकते। यूरोपीय देशों की अनेक कुमारी नवयुवतियों ने इस बात को स्वीकार किया है कि जब पहली बार किसी पुरुष ने उनके उरोजों को पकड़कर चूचुकों को धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया तो उनकी योनि में विशेष तरह की फड़क-सी अनुभव हुई और यह इच्छा जाग्रत हुई कि कोई कड़ी वस्तु उसमें जाकर घर्षण करें।
कुछ पत्नियां ऐसी होती हैं जो जान-बूझकर निष्क्रिय भूमिका अदा करना चाहती हैं। वे समझती हैं जब पति उसका चुम्बन, कुचमर्दन (स्तनों को सहलाना, मसलना) आदि करे तो उन्हें ऐसा आभास देना चाहिए कि पुरुष के इस कार्य से उन्हें आनन्द नहीं मिल रहा है। उन्हें आशंका होती है कि यदि वे आनन्द प्राप्ति का आभास देंगी तो पति यह समझ लेंगे कि वे विवाह से पूर्व संभोग का आनन्द ले चुकी हैं। इस प्रकार के विचारों को उन्हें अपने मन से निकाल देना चाहिए।
संभोग करते समय इस बात को याद रखना चाहिए कि संभोग में सबसे अधिक आनन्द प्राप्त करने के लिए जिस आवेग की आवश्यकता होती है, वह तभी प्राप्त हो सकता है जब योनि में शिश्न निरंतर गतिशील रहे। इस गति का संबंध हरकत करने से है। इस स्थिति में शिश्न कड़ा और सीधा होकर योनि की दीवारों की मुलायम परतों तथा गद्दियों के सम्पर्क में आ जाता है। इसके फलस्वरूप शिश्न के तंतुओं में अधिकाधिक तनाव आ जाता है जिसकी समाप्ति वीर्य स्खलन के साथ होती है।
संभोग करते समय बहुत से पुरुषों को आशंका रहती है कि योनि में उनका लिंग प्रवेश करते ही वे स्खलित हो जाएंगे। इसी आशंका से भयभीत होकर वे योनि में शिश्न प्रविष्ट करके जल्दी-जल्दी हरकत करने लगते हैं और इस प्रकार वे बहुत जल्दी स्खलित हो जाते हैं। सेक्स के वास्तविक आनन्द की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि शिश्न के पूर्णतया प्रविष्ट हो जाने के बाद स्त्री पुरुष दोनों स्थिर होकर चुम्बन मर्दन आदि करें। इसके थोड़ी देर बाद फिर गति आरंभ करें। जब फिर स्खलन होने की आशंका होने लगे, तब फिर रुककर चुम्बन आदि में प्रवृत्त हो जाएं, इससे दोनों को अधिकाधिक आनन्द प्राप्त होगा। इस स्थिति में स्त्री को चाहिए कि जब पुरुष गति लगाए तब वह योनि को संकुचित करे, जितना अधिक वह संकुचित करेगी, उतना ही पुरुष का आनन्द बढ़ेगा और वह क्रिया करने लगेगा। ऐसा करने से स्त्री और पुरुष दोनों को आनन्द आएगा।
इस भांति रुक-रुककर गति लगाने से स्त्री पूर्ण उत्तेजना की स्थिति में पहुंच जाती है। उस समय उसकी इच्छा होती है कि अब पुरुष जल्दी-जल्दी गति देकर अपने-आपको और स्त्री दोनों को स्खलित कर दे। उस समय पुरुष को जल्दी-जल्दी गति लगानी चाहिए, स्त्री को भी इसमें अपनी ओर से पूरा सहयोग देना चाहिए। अधिकांश स्त्रियों की यह धारण सही नहीं है कि गति लगाना केवल पुरुष का ही काम है।
जब कुछ देर तक स्त्री-पुरुष के यौन अंग एक-दूसरे पर घात-प्रतिघात करते रहते हैं तो इस क्रिया से अब तक मस्तिष्क को जो आनन्द मिल रहा था, वह बढ़ते-बढ़ते इतना अधिक हो जाना हो जाता है कि मस्तिष्क इससे अधिक आनन्द बर्दाश्त नहीं कर पाता। इस समय स्त्री-पुरुष यौन आनन्द की चरम सीमा पर पहुंच चुके होते हैं जिसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में चरमोत्कर्ष कहा जाता है। ऐसी परिस्थिति में मस्तिष्क अपने आप संभोग क्रिया को समाप्त करने के संकेत देने लगता है। पुरुष व स्त्री स्खलित है जाते हैं। पुरुष के शिश्न से वीर्य निकलता है और स्त्री की योनि से पानी की तरह पतला द्रव्य।
स्खलन के बाद
संभोग के बाद जब वीर्य स्खलित हो जाता है तो अधिकांश पुरुष समझ लेते हैं कि अब काम समाप्त हो गया है और सो जाने के अलावा कोई काम शेष नहीं रह गया है। उनकी यह बहुत बड़ी भूल है। स्खलन के साथ ही मैथुन समाप्त नहीं हो जाता। वीर्य स्खलन का अर्थ केवल इतना है कि जिस पहाड़ की चोटी पर आप पहुंचना चाहते थे, वहां आप पहुंच गये हैं। अभी चोटी से नीचे भी उतरना है। नीचे उतरना भी एक कला है।
जो पुरुष वीर्य स्खलित होने के पश्चात सो जाता है या सोने की तैयारी करने लगता है, वह अपनी संगिनी की भावना को गहरा आघात पहुंचाता है। उसके मन में यह विचार आ सकता है कि उसका साथी केवल अपनी शारीरिक संतुष्टि को महत्त्व देता है, उसकी भावना की कोई परवाह नहीं करता। पुरुष का कर्त्तव्य है कि वह स्त्री के मन में ऐसी भावना पैदा न होने दे।
स्त्री को संतुष्टि तथा आनन्द प्रदान करने के लिए पुरुष को चाहिए कि वह समागम के बाद स्त्री के विभिन्न अंगों का चुम्बन ले, प्रेमपूर्वक आलिंगन करे और कुछ समय प्रेमालाप करे। इन बातों से स्त्री को यह अनुभव होगा कि पुरुष उसे कामवासना की पूर्ति का खिलौना ही नहीं समझता, वास्तव में वह उससे प्रेम करता है।
इसके अलावा संभोग के बाद पुरुष का आवेग जिस गति से शांत होता है स्त्री का आवेग उतनी तेजी से शांत नहीं होता। उसमें काफी समय लगता है। इसलिए यह आवश्यक है कि पुरुष धीरे-धीरे अपनी प्रणय क्रीड़ाओं से स्त्री को सामान्य दशा में लाए। जब उसे यह विश्वास हो जाए कि स्त्री का कामोन्माद पूरी तरह से शांत हो गया है तो भी उसे उसकी ओर मुंह फेरकर नहीं सोना चाहिए। उसे अपनी छाती से तब तक लगाए रखना चाहिए तब तक वह सो न जाए। उसके सोने के बाद ही स्वयं को सोना चाहिए।
संभोग क्रीड़ा का वर्गीकरण
शिश्न और योनि के आकार के भेद के अनुसार जिस प्रकार संभोग क्रीड़ा का वर्गीकरण किया गया है उसी प्रकार संवेग के आधार पर भी रति-क्रीड़ा के भेद निर्धारित किए गए हैं। जिस प्रकार दो व्यक्तियों के चेहरे आपस में नहीं मिलते, जिस प्रकार दो व्यक्तियों की रुचि एवं पसन्द में तथा शारीरिक ढ़ाचे एवं मानसिक स्तर में परस्पर भिन्नता होती है, उसी प्रकार दो नर-नारियों की कामुकता एवं यौन संवेगों में पर्याप्त अन्तर होता है। कुछ नर-नारियां ऐसी होती हैं जो प्रचण्ड यौन-क्रीड़ा को सहन नहीं कर पाती। प्रगाढ़ एवं कठोर आलिंगन, चुम्बन, नख-क्रीड़ा एवं दंतक्षत उन्हें नहीं भाता। ऐसे नर-नारियों को मृदुवेगी कहा गया है। कोमल प्रकृति होने के कारण इन्हें हल्का संभोग ही अधिक रुचिकारी होता है।
जिन नर-नारियों की यौन-चेतना औसत दर्जे की अथवा मध्यम दर्जे की होती है उन्हें मध्यवेगीय कहते हैं। ये न तो अति कामुक होते हैं और न ही इनकी यौन सचेतना मंद होती है। ये संभोग प्रिय भी होते हैं और यौन कला प्रवीण भी परन्तु काम पीड़ित नहीं होते हैं। पाक क्रीड़ा में अक्रामक रुख भी नहीं अपनाते। इनका यौन जीवन सामान्यतः संतुष्ट एवं आनन्दपूर्ण होता है। ये अच्छे तथा आदर्श गृहस्थ भी होते हैं।
चण्ड वेगी नर-नारियों की कामुकत्ता प्रचण्ड होती है। ये विलासी और कामी होते हैं। बार-बार यौन क्रियाओं के लिए इच्छुक रहते हैं। मौका पाते ही संभोग भी कर लेते है। संवेगात्मक तीव्रता अथवा न्यूनता के आधार पर स्त्री-पुरुष को जो वर्गीकरण किया गया है वह प्रकार है-
समरत

स्तंभनकाल- कई पुरुषों में देर तक सेक्स करने की क्षमता नहीं होती है। ऐसे पुरुष योनि में शिश्न प्रवेश के कुछ सैकैण्ड के बाद ही स्खलित हो जाते हैं। कुछ पुरुषों की स्तंभन शक्ति मध्यम दर्जे की होती है। थोड़े ही पुरुष ऐसे होते हैं जो देर तक रति-क्रीड़ा करने में सक्षम होते हैं जो पुरुष अधिक देर तक नहीं टिक पाते वे स्त्री को संतुष्ट नहीं कर सकते। उनका विवाहित जीवन कलहपूर्ण हो जाता है। इसी तरह कुछ स्त्रियां शीघ्र ही संतुष्ट हो जाती हैं- कुछ स्त्रियां मात्र थोड़े वेगपूर्ण घर्षणों से ही संतुष्ट होती हैं और कुछ स्त्रियां करीब 10-15 मिनट तक निरंतर घर्षण के पश्चात ही संतुष्ट होती हैं। अतः यौन-संतुष्टि के लिए काल के आधार पर भी वर्गीकरण किया गया है।
1- शीघ्र स्खलित होने वाले पुरुष का संयोग शीघ्र संतुष्ट होने वाली स्त्री के साथ।
2- मध्यम अवधि तक टिकने वाले पुरुष का सेक्स संबंध मध्यकालिक रमणी (स्त्री) के साथ।
3- दीर्घकालिक पुरुष का समागम देर तक घर्षण करने के बाद पश्चात संतुष्ट होने वाली रमण प्रिया नारी के साथ।
उक्त सभी वर्गीकरण स्त्री-पुरुष की मनोशारीरिक रचना एवं संवेगात्मक तीव्रता के आधार पर किए गए हैं।
वही रति-क्रीड़ा सफल एवं उत्तम होती हैं जिसमें स्त्री-पुरुष दोनों चरमोत्कर्ष के क्षणों में सब कुछ भूल कर दो शरीर एक प्राण हो जाते हैं। परन्तु यह तभी संभव होता है जबकि पुरुष को सेक्स संबंधी संपूर्ण जानकारी हो तथा जिसमें पर्याप्त स्तंभन शक्ति हो। जिन पुरुषों में देर तक सेक्स करने की क्षमता होती हैं उन पर स्त्रियां मर-मिटती हैं।
अनेक पुरुषों को यह भ्रम बना रहता है कि उनके समान ही स्त्रियां भी स्खलित होती हैं। यह धारणा भ्रामक, निराधार और मजाक भी है। पुरुषों के समान स्त्रियों में चरमोत्कर्ष की स्थिति में किसी भी प्रकार का स्खलन नहीं होता।
नारी की पूर्ण योनि संतुष्टि के लिए आवश्यक है कि रति-क्रीड़ा में संलग्न होने के पूर्ण नारी को कलात्मक पाक-क्रीड़ा द्वारा इतना कामोत्तेजित कर दिया जाये कि वह सेक्स संबंध बनाने के लिए स्वयं आतुर हो उठे एवं चंद घर्षणों के पश्चात ही आनन्द के चरम शिखर पर पहुंच जाएं।
नारी को उत्तेजित करने के लिए केवल आलिंगन, चुम्बन एवं स्तन मर्दन ही पर्याप्त नहीं होता। यूं तो नारी का सम्पूर्ण शरीर कामोत्तेजक होता है, पर उसके शरीर में कुछ ऐसे संवेदनशील स्थान अथवा बिन्दु हैं जिन्हें छेड़ने, सहलाने एवं उद्वेलित करने में अंग-प्रत्यंग में कामोत्तेजना प्रवाहित होने लगती है। नारी के शरीर में कामोत्तेजना के निम्नलिखित स्थान संवेदनशील होते हैं-
शिश्निका (सर्वाधिक संवेदनशील), भगोष्ठः बाह्य एवं आंतरिक, जांघें, नाभि क्षेत्र, स्तन (चूचक अति संवेदनशील), गर्दन का पिछला भाग, होंठ एवं जीभ, कानों का निचला भाग जहां आभूषण धारण किए जाते हैं, कांख, रीढ़, नितम्ब, घुटनों का पृष्ठ मुलायम भाग, पिंडलियां तथा तलवे।
इन अंगों को कोमलतापूर्वक हाथों से सहलाने से नारी शीघ्र ही द्रवित होकर पुरुष से लिपटने लगती है हाथों एवं उंगलियों द्वारा इन अंगों को उत्तेजित करने के साथ ही यदि इन्हें चुम्बन आदि भी किया जाए तो नारी की कामाग्नि तेजी से भड़क उठती है एवं रति क्रीड़ा के आनन्द में अकल्पित वृद्धि होती है। यह आवश्यक नहीं कि सभी अंगों को होंठ अथवा जिव्हा से आन्दोलित किया जाए यह प्रेमी और प्रिया की परस्पर सहमति एवं रुचि पर निर्भर करता है कि प्रणय-क्रीड़ा के समय किन स्थानों पर होठ एवं जीभ का प्रयोग किया जाए। उद्देश केवल यही है कि प्रत्येक रति-क्रीड़ा में नर और नारी को रोमांचक आनन्द की उपलब्धि समान रूप से होनी चाहिए।
नारी की चित्तवृत्ति सदा एक समान नहीं रहती। किसी दिन यदि वह मानसिक अथवा शारीरिक रूप से क्षुब्ध हो, रति-क्रीड़ा के लिए अनिच्छा जाहिर करे तो किसी भी प्रकार की मनमानी नहीं करनी चाहिए। सामान्य स्थिति में भी प्रिया को पूर्णतः कामोद्दीप्त कर लेने के पश्चात् ही यौन-क्रीड़ा में संलग्न होना चाहिए।
संभोग के लिए प्रवृत्ति या इच्छा-
स्त्री भले ही सम्भोग के लिए जल्दी मान जाए, परन्तु यह जरूरी नहीं है कि वह इस क्रिया में भी जल्द अपना मन बना ले। पुरुषों के लिए यह बात समझना थोड़ी मुश्किल है। स्त्री को शायद सम्भोग में इतना आनन्द नहीं आता जितना कि सम्भोग से पूर्व काम-क्रीड़ा, अलिंगन, चुम्बन और प्रेम भरी बातें करने में आता है। जब तक पति-पत्नी दोनों सम्भोग के लिए व्याकुल न हो उठें तब तक सम्भोग नहीं करना चाहिए।
What is sex? Sambhog kya hai? Sambhog kaise kiya jaye
संभोग और आसन 
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संभोग करने के अलग-अलग तरीके होते हैं और हर तरीके को आसन कहा जाता है। इन आसनों का अपना विशेष महत्व है क्योंकि इनका संबंध स्त्री-पुरुष के सेक्स-स्वभाव एवं शारीरिक बनावट से होता है। यदि यह कह जाए कि सभी स्त्री-पुरुष एक ही आसन से सफलतापूर्वक एवं सुविधापूर्वक संभोग कर सकते हैं तो यह गलत होगा।
भारतीय सेक्स ग्रंथों और कोकशास्त्रों में संभोग करने के लगभग चौरासी विभिन्न आसनों का उल्लेख किया गया है तथा अलग-अलग सेक्स स्वभाव की स्त्रियों के साथ लेटकर-बैठकर खड़े होकर आदि तरीकों से संभोग करने के बहुत ही विचित्र प्रकार के आसनों को अपनाने की सलाह दी गई है। यदि हम इन सभी आसनों के सभी पहलुओं पर गंभीरतापूर्वक विचार करें तो सहज ही इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि जिन आसनों में सेक्स आसानी व पीड़ा रहित किया जा सके उनको छोड़कर शेष बनाए गए आसन लगभग व्यर्थ एवं अव्यवहारिक हैं- क्योंकि इनमें से अनेक ऐसे भी आसन है जिसमें योनि में शिश्न प्रवेश संभव ही नहीं है।
सेक्स के विभिन्न आसनों का भी वही कार्य है जो एक साधारण आसन का होता है फर्क सिर्फ इतना होता है कि हर बार नया आसन करने से मानसिक संतुष्टि भी प्राप्त होती है। जिस प्रकार मनुष्य एक ही सब्जी अथवा चावल आदि का सेवन करे तो वह बोर हो जाता है और भोजन का ग्रहण नीरस हो जाता है। इसलिए मनुष्य प्रतिदिन बदल-बदल कर भोजन की रचना करता है ताकि न केवल उसे भोजन करके पूर्ण तृप्ति प्राप्त हो, बल्कि रोज के भोजन में कुछ नया खाने को मिले जिससे खाने में नीरसता न हो।
इसी प्रकार मनुष्य के लिए सम्भोग तो आवश्यक है ही और इसे खाने के समान रुचिकर बनाने के लिए जो विधान सामने आया है वह आसन के रूपों में हैं। मनुष्य का उद्देश्य है कि वह अलग-अलग प्रकार से सम्भोग करके मानसिक सुख प्राप्त करे।
संभोग करने के लिए आसन-
1. सामान्य आसन (स्त्री नीचे और पुरुष ऊपर की स्थिति में)- संभोग करने में यह आसन सबसे ज्यादा प्रचलित है।
इस आसन की विशेषता यह है कि इसमें स्त्री और पुरुष लेटे रहने की स्थिति में बिल्कुल आमने-सामने रहते हैं- एक दूसरे को देख सकते हैं- एक-दूसरे के हाव-भाव महसूस कर सकते हैं- पुरुष इस स्थिति में बहुत सहजता से शिश्न योनि में डाल सकता है- वह स्त्री के होंठो एवं माथे का चुम्बन ले सकता है- स्तनों का मर्दन कर सकता है- वह स्त्री के होंठों एवं कपोलों का चुम्बन ले सकता है- स्तनों का मर्दन कर सकता है- वे दोनों एक-दूसरे को भरपूर आलिंगन में बांध सकते हैं- और सबसे बड़ी बात यह है कि इस आसन द्वारा संभोग करने में पुरुष अधिक क्रियाशील रहता है। इस प्रकार पुरुष बहुत खुलकर संभोग करने के साथ-साथ अपने अहं को भी संतुष्ट कर सकता है।
आसनों में से शायद यही एक ऐसा आसन है जिसमें स्त्री और पुरुष शारीरिक रूप से एक-दूसरे के बहुत अधिक निकट सम्पर्क में आ सकते हैं। सेक्स के समय निकटत्तम शारीरिक सम्पर्क अधिक आनन्द एवं उत्तेजना का स्रोत माना गया है।
क्योंकि सामान्य हालातों में पुरुष संभोग करता है और स्त्री संभोग कराती है इसलिए इस आसन में पुरुष खुले तौर पर एवं सक्रिय रूप से संभोग कर सकता है। नवविवाहित दम्पत्ति इसी आसन द्वारा संभोग करना अधिक पसंद करते हैं। यौवन की मचलती यह अवस्था सेक्स-आवेग से भरी होती है- सेक्स की चाह उत्तेजना में वृद्धि करती है- इसलिए इस आसन द्वारा वे पूर्ण रूप से सक्रिय होकर संभोग करने में अधिक आनन्द एवं संतोष अनुभव करते हैं।
सामान्य स्त्रियां भी सेक्स-स्वभाव में एक समान नहीं होती, इसलिए कुछ स्त्रियां इस आसन से संभोग करते समय अपने ऊपर पुरुष के गहरे दबाव को पसंद करती हैं- तीव्र उत्तेजना की अवस्था में वे चाहती हैं कि पुरुष ज्यादा से ज्यादा दबाव दे। लेकिन कुछ स्त्रियां ऐसी भी होती हैं कि वे अपने ऊपर पुरुष के कम अथवा मध्यम दबाव को ही पसंद करती हैं। इस आसन की यह विशेषता है कि अलग-अलग स्वभाव की ये दोनों प्रकार की स्त्रियां मनचाहा दबाव प्राप्त कर सकती हैं। स्त्री के ऊपर लेटकर संभोग समय कंधों एवं कुहनियों के सहारे पुरुष स्त्री पर कम दबाव डाल सकता है।
इस आसन की दूसरी मुख्य विशेषता प्राप्त होने वाले गहरे आलिंगन की है। पुरुष जब स्त्री शरीर पर लेटकर उसे पूरे आलिंगन में लेता है और साथ ही योनि में शिश्न डालने के बाद इसे गति प्रदान करता है तो स्त्री का समूचा योनि-प्रदेश दबाव और आलिंगन में आ जाता है। पुरुष यदि इस अवस्था में स्त्री को बांहों में भरता है तो स्तनों का समूचा उभार गहरे आलिंगन में बंध जाता है। सक्रिय सहयोगिनी के रूप में स्त्री भी पुरुष को अपने आलिंगन में ले सकती है। वह पुरुष के ऊपर कंधों के थोड़ा नीचे बांहों का घेरा डालन-दबाने से नाभि के निचले भाग पर आलिंगन प्राप्त कर सकती है- और यौनि में शिश्न लेने के बाद दोनों अपनी टांगों को गोलाकार में उठाकर पुरुष की जंघाओं को आलिंगन में ले सकती है।
इस तरह यह आसन एक तेज तथा पूर्ण संभोग के लिए सबसे उपयुक्त और सर्वाधिक प्रचलित है तथा अधिकांश जोड़े इसी संभोग करते हैं।
2. सम्पुटक आसन (स्त्री-पुरुष अगल-बगल की स्थिति में)- संभोग का यह दूसरा आसन है जो पहले आसन के बाद सर्वाधिक प्रचलित है। इस आसन में स्त्री-पुरुष की स्थिति लेटे रहने की अगल-बगल की अवस्था में होती है। पहले की तुलना में इस आसन में खास अंतर यह है कि स्त्री-पुरुष लेटे हुए ऊपर-नीचे की स्थिति में नहीं, बल्कि आमने-सामने समानान्तर अवस्था में होते हैं- अर्थात स्त्री अपने दाहिने ओर पुरुष की ओर मुंह करके लेटती हैं और पुरुष बांई करवट लेकर स्त्री की तरफ मुंह करके लेट जाता है। योनि में शिश्न प्रवेश के समय स्त्री अपना निचला (दाहिना) पैर पुरुष के दोनों पांवों के बीच डाल देती है और ऊपरी (बांया) पैर घुमाकर पुरुष की दायें ओर की जांघ के ऊपर टिका देती है। इस तरह योनि ऐसी स्थिति में आ जाती है कि पुरुष आसानी से अपना शिश्न योनि में डाल सकता है। इस आसन में जहां स्त्री सक्रिय सहयोग प्रदान कर सकती है वहां पुरुष भगांकुर-मर्दन के साथ-साथ प्रायः दूसरी सभी सेक्स-क्रीड़ाएं भी कर सकती हैं।
इसी आसन में एक स्थिति और भी होती है जब ठीक शिश्न-प्रवेश के समय स्त्री बायीं ओर को करवट बदल लेती है और पुरुष उसकी दाई जांघ को तनिक ऊपर उठाकर पीछे की ओर से योनि में शिश्न डालता है। इस अवस्था में स्त्री कम और पुरुष अधिक सक्रिय होता है। आसन की इस स्थिति में अगल-बगल लेटकर प्रायः वही दम्पत्ति संभोग करते हैं जिनका पेट बढ़ा होता है। लेटकर आमने-सामने की स्थिति में, पेट बढ़े होने के कारण, योनि में शिश्न डालने में जरा दिक्कत आती है।
अनेक स्त्री-पुरुष जिनका विवाह हुए कुछ वर्ष बीत चुके होते हैं, इस आसन द्वारा संभोग करना पसंद करते हैं उनमें पहले जैसा सेक्स का जोश नहीं होता, बल्कि सेक्स संम्बधों में अधिक मधुरता-अधिक ठहराव और अधिक आत्मीयता पैदा हो चुकी होती है। तब यह आसन उन्हें अधिक आकर्षित करता है।
3. पुरुष नीचे और स्त्री ऊपर की स्थिति में- इस आसन को विपरीत आसन भी कहा जाता है, क्योंकि ज्यादातर स्त्री-पुरुष जब सामान्यावस्था में संभोग करते हैं तो स्त्री नीचे और पुरुष ऊपर होता है, किन्तु इस आसन में स्थिति एकदम विपरीत है। इस स्थिति में पुरुष नीचे चित्त अवस्था में लेटता है और स्त्री उसके ऊपर लेटकर संभोग करती है। पहले आसनों में संभोग पुरुष द्वारा किया जाता है, लेकिन इस आसन में संभोग स्त्री करती है।
सेक्स-स्वभाव से तेज उत्तेजक स्त्रियों में सेक्स की दहकती ज्वाला इतनी तेज होती है कि वे उत्तेजना की चरम सीमा को पारकर संभोग कराने के स्थान पर संभोग स्वयं करना पसंद करती हैं तथा योनि में शिश्न को डालकर अत्यंत सक्रिय रूप से इसे गति प्रदान करती है। ये कहा जा सकता है कि सामान्य हालातों में संभोग-क्रिया के समय जो सभी क्रियाएं पुरुष करता है, वह सब इस स्थिति में स्त्री करती है और पुरुष सहन करता है। विपरीत आसन ऐसे संभोग के लिए उपयुक्त कहा जा सकता है क्योंकि पुरुष स्त्री के नीचे दबा निष्क्रिय रहता है और शीघ्र स्खलित नहीं होता। स्त्री भी यही चाहती है कि पुरुष तुरन्त स्खलित नहीं हो एवं संभोग-क्रिया अधिक देर तक चलती रहे। इससे स्त्री को संतुष्टि प्राप्त होती है।
इस आसन द्वारा संभोग करने से पुरुष को यह सुविधा रहती है कि वह स्त्री शरीर के साथ सेक्स-क्रीड़ाएं कर सके लेकिन स्त्री यह सब कुछ खुद ही करती है और पुरुष को ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं पड़ती।
सभी स्त्रियां स्वभाव से तेज उत्तेजक नहीं होतीं, लेकिन सामान्य रूप में ही किसी कारण से अधिक उत्तेजना महसूस करने लगती हैं। इस हालात में कई बार पुरुष स्वयं ही उसे इस आसन द्वारा संभोग करने का निमंत्रण देता है न केवल स्त्री को अधिक समय तक सेक्स-सुख प्रदान करता है बल्कि संभोग-क्रिया में नयापन अपने आप आ जाता है।
1-स्त्री और पुरुष खड़े रहने की स्थिति में संभोग- इस आसन द्वारा स्त्री-पुरुष लगभग खड़े होकर संभोग करते हैं। स्त्री किसी दीनार आदि का सहारा लेकर, पुरुष की अपेक्षा थोड़ा ऊपर पर खड़ी होती है और पुरुष सामने से योनि में शिश्न प्रवेश कर संभोग-क्रिया करता है।
इस आसन द्वारा किए जाने वाले संभोग को पूरा संभोग नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसमें स्त्री न तो पूर्ण रूप से उत्तजित होती है- न उसे चरम सुख प्राप्त होता है और न ही संतुष्टि मिलती है। पुरुष जरूर योनि में शिश्न प्रवेश कर अपने आप को स्खलित करके आत्मसुख प्राप्त कर लेता है।
इस आसन में संभोग लगभग मजबूरी की हालत में किया जाता है जब पति सेक्स-तनाव से परेशान हो-जल्दी में हो- किसी कारणवश घर में निश्चिंत होकर संभोग करने का स्थान एवं सुविधा उस समय नहीं हो-आदि।
2- स्त्री और पुरुष आगे-पीछे की स्थिति में संभोग- संभोग का यह आसन किसी-किसी देश में व्यापक रूप से प्रचलित नहीं है लेकिन कुछ देशों में यह आसन बहुत प्रचलित है।
इस आसन में स्त्री हाथों के बल आगे की ओर झुकती है और पुरुष पीछे की ओर से योनि में शिश्न-प्रवेश करता है। इस आसन को पशु आसन भी कहा जाता है।
इस आसन द्वारा संभोग-क्रिया करने से पूर्ण रूप से, पुरुष ही क्रियाशील रहता है तथा सभी क्रीड़ाओं एवं क्रियाओं का सम्पादन वहीं करता है। स्त्री पूर्ण रूप से निश्चेष्ट और बिना किसी क्रिया के झुकी रहती है अगर वह चाहे तो जरा सा सहयोग देने की स्थिति में नहीं होती। पुरुष के लिए सुविधा यह है कि वह योनि में शिश्न को मनचाहे ढंग से गति दे सकता है- दोनों बांहे फैलाकर, स्तनों को मसल कर, भगांकुर से छेड़छाड़ कर तथा पूरी आजादी के साथ स्त्री के शरीरे से आनन्द प्राप्त कर सकता है।
लेकिन यह आसन असुविधाजनक भी उतना ही है। एक तो इससे स्त्री संभोग-क्रिया में कोई भाग नहीं ले सकती- दूसरे, स्त्री-पुरुष दोनों को ही झुककर लगातार खड़े रहना पड़ता है जो बाद में दोनों के लिए थकावट का कारण बन सकता है। इस आसन में सबसे बड़ी कमी यह है कि स्त्री-पुरुष आमने-सामने नहीं रहते तथा पुरुष पूरी संभोग-क्रिया के दौरान स्त्री के हाव-भाव एवं उस पर होने वाली प्रतिक्रिया को जान ही नहीं पाता। इस आसन से संभोग करने का संबंध स्त्री की मानसिकता से होता है तथा इसे तभी अपनाना चाहिए जब स्त्री इसके लिए पूरी तरह से सहमत हो।
3- स्त्री और पुरुष द्वारा बैठने की स्थिति में संभोग- यह आसन संभोग-क्रिया में नवीनता लाने के उद्देश्य से अक्सर कई लोग करना पंसद करते हैं। इसमें आम तौर से स्त्री कुछ ऊंचे फर्श पर- आरामकुर्सी, पलंग, कम ऊंचे मेज आदि पर इस प्रकार बैठती है कि उसका कमर से ऊपर वाला भाग थोड़ा पीछे की ओर झुककर टेक लगा लेता है। उसकी यह स्थिति ठीक ऐसी ही होती है कि जैसे वह आरामकुर्सी में अर्द्धलेटी अवस्था में पड़ी हो। वह कमर से नीचे का भाग आगे की ओर और कमर से ऊपर का भाग पीछे की ओर ढ़ीला छोड़ देती है। वह अपने दोनों पांव दायें एवं बायें ओर काफी अधिक फैला देती है तथा पुरुष पांवों के फैलाव के ठीक बीच में आकर अपना शिश्न स्त्री-योनि में डाल देता है। इस अवस्था में पुरुष जब अपने शिश्न को तेज गति प्रदान करता है। स्त्री दायें-बायें फैल अपने पांवों को समेटकर पुरुष की कमर के इर्द-गिर्द डालकर उसे भींचती है। ऐसा करने से उसकी पूरी योनि के आस-पास पुरुष-शरीर का दबाव पड़ता है तथा शिश्न योनि की गहराई तक पहुंचता महसूस होता है। इस प्रकार स्त्री-पुरुष दोनों ही एक नया अनुभव- एक अलग प्रकार का आनन्द अनुभव करते हैं। यही आसन स्त्री के स्थान पर और स्त्री पुरुष के स्थान पर आ जाते हैं तथा बिल्कुल पहले की भांति ही संभोग-क्रिया करते हें।
4- उत्फुल्लक आसन- इस आसन के लिए पत्नी अपनी कमर और नित्मब के नीचे एक गुदगुदा तकिया रखकर दोनों जंघाओं को ऊपर उठा ले और जब पति लिंग प्रवेश का कार्य सम्पन्न कर ले तब पत्नी पति के नितम्बों को अपने हाथों से पकड़कर संभोग कार्य में सहायता दे। इस प्रकार सम्भोग-करने से स्त्री पुरुष दोनों को ही अधिक प्राप्त होता है।
5- विजृम्भितक आसन- अगर पत्नी दोनों टांगों को घुटने से मोड़कर छाती की ओर खींचकर दोनों जांघो को खोल दे तो इसे विजृम्भितक आसन कहते हैं। ऐसा करने से योनि का मुख अण्डे के समान खुल जाता है और बड़े से बड़ा लिंग भी आसानी से प्रविष्ट हो काम-क्रीड़ा में सरसता का संचार करता है।
6- इन्द्राणिक आसन- अगर पत्नी अपनी दोनों जंघाओं को एक साथ उठाकर पति की एक जांघ पर रखे देती है और पुरुष तिरछा होकर सम्भोग करता है तो वह आसन इन्द्राणिका आसन कहलाता है।
7- पीड़ितक आसन- यह आसन का ही एक रूप है। इसमें नारी सम्पुट आसन से सम्भोग करते समय दोनों जंघाओं को कसकर दबाकर योनि को अधिक संकुचित बना देती है तो उसे पीड़ितक आसन कहते हैं।
8- वेषिटक आसन- जब नारी उत्तान सम्पुट आसन से संभोग करते समय दोनों जंघाओं को कैंची के समान फंसाकर योनि को अत्यधिक संकुचित करती है तो वेष्टिक आसन होता है।
9- वाड़वक आसन- इसमें स्त्री अपनी योनि में शिश्न प्रवेश कराकर अपनी जांघो को दबाकर योनि को संकुचित करके शिश्न को अच्छी तरह से जकड़ लेती है, क्योंकि नीरी योनि घोड़ी के समान शिश्न को कसकर पकड़ती है इसे वाड़वक आसन कहते है। इस आसन से सम्भोग करने पर पुरुष को वही सुख मिलता है जो की एक कुमारी लड़की से सम्भोग करने पर प्राप्त होता है।
10- भुग्नक आसन- जब पुरुष स्त्री की दोनों जंघाओं को ऊपर उठाकर नीचे की ओर सम्भोग करता है तब वह भुग्नक आसन कहलाता है। इस आसन में पुरुष नारी को गोद में उठाकर खड़े-खड़े भी रतिक्रिया कर सकता है।
11- जृम्मितक आसन- इस आसन में स्त्री अपनी दोनों टांगों को घुटने से मोड़कर पुरुष के कंधो पर रख देती है। पुरुष शरीर को धनुष की तरह झुकाकर सम्भोग करता है।
12- शुलचितक आसन- यदि नारी एक टांग को बिस्तर पर फैलाकर और दूसरी टांग इस प्रकार मोड़े कि पुरुष के सिर को छूनें लगें तो उसे शूलचितंक आसन कहते है।
13- वेणुदारितक आसन- जब सत्री अपनी एक टांग को प्रेमी के कंधे पर दूसरी टांग को विस्तर पर फैलाकर रखते हुए सम्भोग क्रिया में संगग्न होती है तो इसे वेणुदारितक आसन कहते हैं।
14- पदमासन- जब स्त्री बिस्तर पर लेटकर सम्पुट आसन से संभोग करती हुई अचानक अपनी दांयी जांघ को बांयी जांघ पर चढ़ा देती है तो यह पदमासन कहलाता है।
15- उत्पीड़ित आसन- यदि स्त्री केवल टांग को सिकोड़ कर पुरुष के सीने पर रखे और दूसरी टांग को पलंग पर फैला दे तो उत्पीड़ित आसन कहलाता है।
16- परावृतक आसन- जब पुरुष सम्पुट आसन से सम्भोग करते-करते नारी को कसकर चुम्बन करे और स्त्री भी नीचे की ओर से पुरुष की बांहों को जकड़ ले तथा इसके बाद धीरे-धीरे बैठती हुई ओर पीछे की ओर घूमती हुई जब पुरुष की गोद में आ जाती है और पुरुषेन्द्रिय योनि के बाहर नहीं निकल पाता तब वह परावृतक आसन कहलाता है।
संभोग-क्रिया के लिए उसी आसन का चुनाव करना चाहिए जिसके लिए पति-पत्नी दोनों ही सहमत हों। दोनों में से यदि कोई एक सहमत नहीं हो तो संभोग-क्रिया अधूरी ही रहेगी।
शारीरिक रूप से यदि स्त्री पतली है और कूल्हे आदि में मांस नहीं है तो स्त्री नीचे पुरुष ऊपर के आसन द्वारा उसके साथ संभोग सफलतापूर्वक होने में कठिनाई हो सकती है। ऐसी स्त्री के साथ यदि इसी आसन से संभोग किया जाए तो योनि में आसानी से शिश्न-प्रवेश के लिए उसके कूल्हों के नीचे तकिया रख लेना चाहिए। इससे योनि-प्रदेश ऊपर उठ सकेगा और शिश्न-प्रवेश में कठिनाई नहीं होगी। अगल-बगल लेटकर या बैठने की स्थिति में अथवा बताए गए आसनों में से किसी दूसरे आसन द्वारा ऐसी स्त्री के साथ संभोग किया जा सकता है।
कई बार स्त्री-योनि या शरीर की बनावट ऐसी होती है कि किसी विशेष आसन द्वारा योनि में शिश्न-प्रवेश संभव नहीं हो पाता। इस बात का पता चल जाने के बाद पुरुष को चाहिए कि वह कोई भी दूसरा आसन अपनाए जिससे सुविधापूर्वक संभोग-क्रिया संभव हो सके। किसी भी अन्य आसन का चुनाव अपने अनुभव और आवश्यकता के अनुसार किया जा सकता है।
संभोग क्रिया के लिए कोई भी खास आसन स्त्री पर थोपना नहीं चाहिए बल्कि उसकी रुचि एवं सेक्स स्वभाव का आदर करना चाहिए। इसी प्रकार संभव हे कि स्त्री की रुचि किसी अन्य विशेष आसन द्वारा संभोग करने में हो। पुरुष को इस बात का ध्यान भी रखना चाहिए

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