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गर्दन दर्द से पाना हो छुटकारा तो अपनाएं ये घरेलू नुस्खे


गर्दन दर्द से पाना हो छुटकारा तो अपनाएं ये घरेलू नुस्खे



यदि आपकी गर्दन में दर्द हो तो इसको कभी हलके में नहीं लेना चाहिए क्योंकि इससे कई लक्षणों का पता चलता है। गर्दन में दर्द की समस्या से ना तो आप ठीक से उठ-बैठ सकते हैं और ना ही रोज मर्रा के काम कर सकते हैं। कई लोगों को सिर को दाएं-बाएं घुमाने पर अकडन और दर्द के साथ कडकड़ाहट की आवाज भी सुनाई देती है। गर्दन में लगातार दर्द रहने पर अति शीघ्र चिकित्सक को दिखाना चाहिए। चिकित्सकीय परीक्षणों के बाद ही यह तय हो पाता है कि दर्द किस कारण हो रहा है। अगर दर्द होने का कारण कोई गंभीर बीमारी न होकर सामान्य है तो उसे व्यायाम योगासनों एवं घरेलू उपचारों से भी ठीक किया जा सकता है।

आइस पैक लगाएं
गरदन की दर्द में आइस पैक काफी लाभ पहुंचाता है। आप चाहें तो बरफ के टुकड़े को कपड़े में बांध कर दर्द पर रख सकते हैं। इससे दर्द में काफी आराम मिलेगा।

अदरक का पेस्ट
यह एक दर्द निवारक दवा के रूप में काम करती है। अगर आप अदरक पावडर को पानी में मिला कर पिएं या फिर इसे घिस कर गरम पानी में मिला कर पेस्ट बना कर गरदन पर लगाएं तो राहत मिलेगी।

गर्म सिकाई
जब चोट की सिकाई होती है तो खून का दौरा उस जगह पर तेज हो जाता है जिससे चोट जल्दी ठीक हो जाती है।

मसाज
मसाज किसी भी दर्द को ठीक कर सकता है। मसाज से आप आराम से अच्छी नींद सो सकते हें। पर चोट को तेजी से नहीं मलना चाहिये नहीं तो वहां पर और ज्यादा दर्द पैदा हो सकता है।

सही मुद्रा बना कर रखें
शरीर की सही मुद्रा बना कर रखने से भी गरदन का दर्द ठीक करने में सहायता मिलती है। अपने शरीर को एक दीवार पर सटा कर खड़ा कीजिए अपनी पीठ और बुटक को दीवार से लगाइए और ठुड्डी को बिल्कुल सीधे रखिए। बस इसी मुद्रा में सारे दिन रहिए।

गरम पानी से स्नान
गरम पानी के शॉवर के नीचे कुछ देर खड़े रहें। जैसे की गरम पानी आपकी गरदन पर गिरेगा, कुछ ही देर में आपको असर दिखाई देगा।

हींग एवं कपूर
हींग एवं कपूर समान मात्रा में लेकर सरसों तेल में फेंटकर क्रीम की तरह बना लें। इस पेस्ट को गर्दन में लगाकर हल्के हाथों में मालिश करने पर दर्द आराम हो जाता है।


जानिए क्‍या है हशिमोटो रोग, लक्षण और ईलाज


मानव शरीर में एक ऐसी सुरक्षा प्रणाली होती है जो शरीर को रोगों से बचाकर स्‍वस्‍थ रखती है। शरीर में पैदा होने वाले कीटाणु और विषाक्‍त पदार्थों से ये छुटाकरा दिलाता है। शरीर की इस सुरक्षा प्रणाली को इम्‍यून सिस्‍टम कहा जाता है और ये हमारी सेहत को दुरुस्‍त रखने में अहम भूमिका निभाता है।

स्‍ट्रेस, कुछ रोगों और दवाओं के साइड इफेक्‍ट्स और खराब जीवनशैली के कारण इम्‍यून सिस्‍टम मजबूत नहीं रह पाता है और इससे शरीर की कई बीमारियों से लड़ने की क्षमता कम होती रहती है।


कुछ मामलों में खुद इम्‍यून सिस्‍टम ही शरीर को नुकसान पहुंचाने लगता है और रोग पैदा करता है। खुद इम्‍यून सिस्‍टम की वजह से शरीर में होने वाली समस्‍याओं को ऑटोइम्‍यून डिजीज कहा जाता है। ऑटोइम्‍यून डिजीज़ में रह्मेटाएड अर्थराइटिस, लुपर, सेलिएक रोग, मल्‍टीपल स्‍कलेरोसिस आदि होता है।

क्‍या आपने कभी हशिमोटो रोग के बारे में सुना है ? ये एक अन्‍य ऑटोइम्‍यून रोग है जिसके बारे में लोगों को कम ही पता है।

तो चलिए जानते हैं हशिमोटो रोग के लक्षण, खतरे और इसके ईलाज के बारे में।

क्‍या है हशिमोटो रोग

जैसा कि हमने पहले भी बताया कि हशिमोटो रोग एक ऑटो इम्‍यून रोग है जिसमें इम्‍यून सिस्‍टम मानव शरीर के प्रमुख अंगों में से एक एंडोक्राइन ग्‍लैंड यानि की थायराएड ग्रंथि पर आक्रमण करने लगता है।

थाएराएड ग्रंथि एक छोटा सा एंडोक्राइन ग्‍लैंड होता है जो गले के नीचे स्थित होता है और ये शरीर की प्रमुख क्रियाओं जैसे मेटाबॉलिज्‍म, विकास के लिए हार्मोंस का उत्‍पादन करता है।

हशिमोटो रोग के कारण इम्‍यून सिस्‍टम थायराएड ग्‍लैंड पर आक्रमण कर देता है। इससे सूजन होने लगती है जोकि थाएराएड रोग का रूप ले लेता है। हशिमोटो रोग की वजह से हुर्द सूजन हायपरथायरायडिज्‍म का रूप ले लेती है। ये बीमारी मध्‍य उम्र की महिलाओं में ज्‍यादा होती है। हालांकि, ये ऑटो इम्‍यून बीमारी महिलाओं और पुरुषों दोनों को ही अपना शिकार बनाती है।

हशिमोटो रोग के लक्षण

आमतौर पर हशिमोटो रोग के लक्षण अंतिम चरण में दिखाई देते हैं लेकिल कुछ लोगों को गले में सूजन दिखाई देती है जोकि इस रोग का ही एक लक्षण है। हशिमोटो रोग के लक्षण धीरे-धीरे बढ़ते हैं लेकिन अगर इनका ईलाज ना किया जाए तो ये सालों में भयंकर रूप ले लेते हैं।

इसके कुछ प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं :

भयंकर थकान और आलस
कब्‍ज
शरीर का पीला और सूखा पड़ना
ज्‍यादा सर्दी लगना
नाखूनों का कमजोर होना
चेहरे में पफीनेस होना
बालों का झड़ना
जीभ का बढ़ना
वजन बढ़ना
बिना किसी कारण के मांसपेशियों में खिंचाव रहना
मासिक धर्म में अधिक रक्‍तस्राव
याद्दाश्‍त कमजोर होना
डिप्रेशन
हशिमोटो रोग के कारण

हशिमोटो रोग के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं :

आनुवांशिक कारण

किसी ऑटोइम्‍यून रोग जैसे लुपुस, अर्थराइटिस या डायबिटीज़ आदि से ग्रस्‍त होना।

पर्यावरण विकिरण के संपर्क में आने के कारण

थायराएड सर्जरी होने के कारण

हार्मोनल ट्रीटमेंट या रेडिएशन थेरेपी की वजह से

हाई कोलेस्‍ट्रॉल

क्‍या आती हैं मुश्किलें

अगर समय रहते हशिमोटो रोग का ईलाज ना किया जाए तो निम्‍न स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याएं हो सकती हैं।

घेंघा रोग

अगर हशिमोटो रोग का ईलाज ना किया जाए तो सूजन की वजह से थाएराएड ग्‍लैंड का आकार बढ़ने लगता है। इस स्थिति को घेंघा कहते हैं और ये थायराएड ग्‍लैंड के अक्रियाशील होने की वजह से होता है।

ह्रदय रोग

हशिमोटो रोग के कारण ह्रदय रोग भी हो सकता है। अक्रियाशील थायराएड ग्रंथि की वजह से शरीर में एलडीएल की मात्रा बहुत बढ़ने लगती है जिससे धमनियां बंद हो जाती हैं और ह्रदय रोग पैदा करती हैं।

मानसिक विकार

हशिमोटो रोग का संबंध मानसिक विकार जैसे डिप्रेशन और लो सेक्‍शुअल लिबिडो से भी है। शरीर में थायराएड हार्मोंस की अस्थिरता के कारण मानसिक विकार हो सकता है।

मिक्‍सडेमा

अगर हशिमोटो रोग का ईलाज ना किया जाए तो इस गंभीर रोग के होने का खतरा रहता है। इसमें चक्‍कर आना, चेहरे और पैरों आदि में सूजन होना। इस रोग का ईलाज तुरंत करवाना चाहिए।

जन्‍म विकार

रिसर्च में सामने आया है कि जो महिलाएं हशिमोटो रोग का ईलाज करवाए बिना बच्‍चे को जन्‍म देती हैं उनके शिशु में जन्‍म विकार जैसे बौद्धिक और स्‍वभाव में दिक्‍कत या ह्रदय और दिमाग या किडनी में समस्‍या का खतरा रहता है।

हशिमोटो रोग का ईलाज

आमतौर पर हार्मोन टेस्‍ट से हशिमोटो रोग की पहचान की जा सकती है। इसके अलावा एंटीबॉडी टेस्‍ट भी किया जाता है।

हशिमोटो रोग के ईलाज में दवाओं के ज़रिए शरीर में आर्टिफिशियल हार्मोन डाले जाते हैं जोकि थायराएड हार्मोंस के उत्‍पादन को नियंत्रित कर इसे लक्षणों को कम करता है।

गर्दन दर्द से पाना हो छुटकारा तो अपनाएं ये घरेलू नुस्खे


यदि आपकी गर्दन में दर्द हो तो इसको कभी हलके में नहीं लेना चाहिए क्योंकि इससे कई लक्षणों का पता चलता है। गर्दन में दर्द की समस्या से ना तो आप ठीक से उठ-बैठ सकते हैं और ना ही रोज मर्रा के काम कर सकते हैं। कई लोगों को सिर को दाएं-बाएं घुमाने पर अकडन और दर्द के साथ कडकड़ाहट की आवाज भी सुनाई देती है। गर्दन में लगातार दर्द रहने पर अति शीघ्र चिकित्सक को दिखाना चाहिए। चिकित्सकीय परीक्षणों के बाद ही यह तय हो पाता है कि दर्द किस कारण हो रहा है। अगर दर्द होने का कारण कोई गंभीर बीमारी न होकर सामान्य है तो उसे व्यायाम योगासनों एवं घरेलू उपचारों से भी ठीक किया जा सकता है।

आइस पैक लगाएं
गरदन की दर्द में आइस पैक काफी लाभ पहुंचाता है। आप चाहें तो बरफ के टुकड़े को कपड़े में बांध कर दर्द पर रख सकते हैं। इससे दर्द में काफी आराम मिलेगा।

अदरक का पेस्ट
यह एक दर्द निवारक दवा के रूप में काम करती है। अगर आप अदरक पावडर को पानी में मिला कर पिएं या फिर इसे घिस कर गरम पानी में मिला कर पेस्ट बना कर गरदन पर लगाएं तो राहत मिलेगी।

गर्म सिकाई
जब चोट की सिकाई होती है तो खून का दौरा उस जगह पर तेज हो जाता है जिससे चोट जल्दी ठीक हो जाती है।

मसाज
मसाज किसी भी दर्द को ठीक कर सकता है। मसाज से आप आराम से अच्छी नींद सो सकते हें। पर चोट को तेजी से नहीं मलना चाहिये नहीं तो वहां पर और ज्यादा दर्द पैदा हो सकता है।

सही मुद्रा बना कर रखें
शरीर की सही मुद्रा बना कर रखने से भी गरदन का दर्द ठीक करने में सहायता मिलती है। अपने शरीर को एक दीवार पर सटा कर खड़ा कीजिए अपनी पीठ और बुटक को दीवार से लगाइए और ठुड्डी को बिल्कुल सीधे रखिए। बस इसी मुद्रा में सारे दिन रहिए।

गरम पानी से स्नान
गरम पानी के शॉवर के नीचे कुछ देर खड़े रहें। जैसे की गरम पानी आपकी गरदन पर गिरेगा, कुछ ही देर में आपको असर दिखाई देगा।

हींग एवं कपूर
हींग एवं कपूर समान मात्रा में लेकर सरसों तेल में फेंटकर क्रीम की तरह बना लें। इस पेस्ट को गर्दन में लगाकर हल्के हाथों में मालिश करने पर दर्द आराम हो जाता है।


आयुर्वेदिक नुस्खे माइग्रेन में उपयोगी



माइग्रेन सिर में होने वाला ऐसा रोग है जिसमें सिर के आधे भाग में दर्द रहता है। यह दर्द होने पर व्यक्ति परेशान हो जाता है। जानते हैं इसके...

माइग्रेन सिर में होने वाला ऐसा रोग है जिसमें सिर के आधे भाग में दर्द रहता है। यह दर्द होने पर व्यक्ति परेशान हो जाता है। जानते हैं इसके लिए लाभकारी आयुर्वेदिक उपायों के बारे में।

दर्द की वजह

आयुर्वेदिक ग्रंथों में इस रोग को अर्धावभेदक नाम दिया गया है। ओस, ठंडी हवाएं, अधिक भोजन करना, समय पर भोजन न करना, ठंडे पेय पदार्थों का प्रयोग, पहला भोजन पचा न होने पर फिर से खाना, बासी भोजन करना, मल-मूत्र रोकना, अधिक व्यायाम करना, हार्मोंस में परिवर्तन, नींद न पूरी होना और थकान आदि कारणों से माइग्रेन हो सकता है।

इन्हें खतरा

यूं तो यह रोग किसी भी उम्र में हो सकता है लेकिन 35 से 45 वर्ष के लोगों में यह अधिक देखने को मिलता है। बच्चे भी इस रोग के शिकार होते हैं लेकिन किशोरावस्था में इसके रोगियों की संख्या बढ़ जाती है। ज्यादा पढऩे और लिखने वाले, अधिक मानसिक काम करने वाले या तनाव में रहने वाले लोग इसकी गिरफ्त में जल्दी आते हैं।

आयुर्वेद के अनुसार वायु जब कफ के साथ शरीर के आधे भाग को जकड़ लेती है तो शंख प्रदेश यानी कान, आंख व सिर में दर्द होता है। यह रोग जब अधिक देर तक बना रहता है तो सुनने व देखने की क्षमता प्रभावित होने लगती है।

इलाज में ये अपनाएं

इसके रोगी को कब्ज की शिकायत नहीं रहनी चाहिए। कब्ज के लिए त्रिफला चूर्ण का प्रयोग गुनगुने पानी के साथ करें। पेट साफ रखने वाली दवाएं ठंडे पानी से न लें। जिस दिन पेट साफ करने वाली दवा लें, उस दिन मूंग की दाल की खिचड़ी घी के साथ खाएं। सुबह दूध के साथ जलेबी लेने से भी सिरदर्द में आराम मिलता है। इसके रोगी को ज्यादा देर खाली पेट नहीं रहना चाहिए। दूध, मलाई, खोया, रबड़ी, मालपुआ, फेणी, घेवर, हलवा आदि खाने से रोगी को आराम मिलता है।



इसके अलावा सुबह दूध में घी डालकर और भोजन के बाद घी पीने से इस रोग में लाभ होता है। गाय का दूध या घी नाक में दो-दो बूंद डालने से फायदा होता है। नौसादर और चूने का मिश्रण सूंघने से भी आराम मिलता है।

इस रोग में पुराना घी, मूंग की दाल, जौ, परवल, सहजन की फली, बथुआ, करेला, बैंगन व फलों में आम, अंगूर, नारियल व अनार का प्रयोग लाभकारी होता है। दालचीनी चूर्ण का लेप माथे पर करने से भी फायदा होता है। इस रोग में भूखे पेट रहने, धूप में घूमने या ज्यादा देर तक टीवी देखने से बचें।


दांतों की सेहत के लिए डेंटिस्‍ट देते हैं ये टिप्‍स




खाने की किसी भी चीज़ को चबाने के लिए दांतों का स्‍वस्‍थ होना बहुत ज़रूरी होता है। इन्‍हें स्‍वस्‍थ रखने के लिए हमें ट्रीटमेंट और अपनी जीवनशैली में ज़रूरी बदलाव कर लेने चाहिए। रोगों से बचने के लिए हमें अपने दांतों की सफाई पर भी ध्‍यान देना चाहिए।

हालांकि, जब बात ओरल या डेंटल हेल्‍थ की आती है तो हम थोड़े लापरवाह से नज़र आते हैं। हमें नहीं लगता कि हमारे दांतों की खराब सेहत का असर हमारे शरीर पर भी पड़ सकता है।

हम में से अधिकतर लोगों को अब भी यही लगता है कि दांतों का इस्‍तेमाल बस खाने को चबाने और चेहरे पर दिखने के लिए होता है।

जबकि दांतों की सेहत और ओरल हेल्‍थ का असर हमारी संपूर्ण सेहत पर भी पड़ता है। अगर आपके दांत स्‍वस्‍थ नहीं हैं तो आपको दांतों से संबंधित कई बीमारियां जैसे मसूडों के रोग, कैविटी आदि हो सकती है इसलिए ये बहुत ज़रूरी है कि आप अपनी ओरल हेल्‍थ का भी पूरा ध्‍यान रखें।

आज हम आपको कुछ ऐसे टिप्‍स के बारे में बताने जा रहे हैं जो ओरल हेल्‍थ के लिए खुद डेंटिस्‍ट बताते हैं।

दांतों को बस ब्रश ना करें

दांतों को मज़बूत और सेहतमंद रखने के लिए आपको दिन में 2-3 तीन बार ब्रश करना चाहिए और खासतौर पर रात को सोने से पहले। हालांकि, हममें से कई लोग बस दांतों को ब्रश करते हैं और मुंह के बाकी हिस्‍सों की सफाई नहीं करते हैं जैसे कि जीभ।

डेंटिस्‍ट का कहना है कि ब्रश या टंग क्‍लीनर से जीभ को साफ करने से प्‍लाक साफ हो जाता है। ये प्‍लाक आपकी ओरल हेल्‍थ को नुकसान पहुंचा सकता है। इसके अलावा मसूड़ों को भी साफ करना चाहिए।

कई रोग दे सकता है ओरल हेल्‍थ

जैसा कि हमने आपको पहले भी बताया कि ओरल हेल्‍थ का असर शरीर पर भी पड़ता है। दांतों की सफाई ना करने से ना सिर्फ कीटाणु पनपते हैं बल्कि ये कई और रोगों का भी कारण बनता है।

स्‍टडी में शोधकर्ताओं ने पाया है कि कीटाणु और मसूडों के रोग से ह्रदय रोग और अल्‍जाइमर रोग होने का खतरा रहता है। मुंह की नसें सीधा दिल और दिमाग से जुड़ी होती हैं और मुंह का संक्रमित रक्‍त इन दोनों हिस्‍सों में पहुंचता है।

जल्‍दी-जल्‍दी दांतों की करें सफाई

दांतों की सफाई के लिए नियमित डॉक्‍टर के पास जाते रहें। महीनों तक डेंटिस्‍ट से दांतों की सफाई ना करवाने से आपके दांतों की सेहत बिगड़ सकती है।

भले ही आप रोज़ घर पर दांतों को ब्रश और फ्लॉस करते हों लेकिन डेंटिस्‍ट से प्रोफेशनल क्‍लीनिंग करवाना भी ज़रूरी होता है। उनके पास कुछ ऐसे उपकरण होते हैं जो दांतों को साफ कर उन हिस्‍सों से भी बैक्‍टीरिया को साफ कर देते हैं जहां ब्रश नहीं पहुंच पाता है।

ब्रश के बाद कुल्‍ला ना करें

आमतौर पर हम सभी लोग ब्रश के बाद दांतों को पानी से साफ करते हैं। डेंटिस्‍ट का कहना है कि ब्रश में कम टूथपेस्‍ट का इस्‍तेमाल करना चाहिए और इसके बाद कुल्‍ला नहीं करना चाहिए। इससे टूथपेस्‍ट के सक्रिय अवयव मुंह में मौजूद कीटाणुओं और बैक्‍टीरिया को अच्‍छे से खत्‍म कर पाते हैं।

माउथवॉश की बात करें तो इसके प्रयोग के बाद कुल्‍ला करने की जरूरत नहीं है।

शुगर फ्री ड्रिंक्‍स भी पहुंचाती है दांतों को नुकसान

जिन पेय पदार्थों में शुगर होता है उनका दांतों पर भी गलत असर पड़ता है। हालांकि, सच तो ये है कि शुगर फ्री ड्रिंक्‍स का भी खासतौर पर सोडा और फिज़ी ड्रिंक्‍स से भी कैविटी का खतरा रहता है।

ऐसा इसलिए होता है क्‍योंकि ज़्यादातर फिजी ड्रिंक्‍स में कार्बोनिक एसिड होता है जो दांतों के एनेमल को नुकसान पहुंचाता है।

शराब का सेवन

रोज़ाना शराब का सेवन करने से भी मानसिक और मनोवैज्ञानिक सेहत खराब होती है। इसके नकारात्‍मक प्रभावों की लिस्‍ट बहुत लंबी है। रिसर्च में पाया गया है कि शराब पीने से, खासतौर पर रात को शराब पीने से दांतों में कैविटी और मसूडों के रोग का खतरा बढ़ जाता है। शराब को खमीर उठने के बाद बनाया जाता है और इसे पीने से दांतों में कैविटी और बैक्‍टीरिया बढ़ सकता है।

नियमित चेकअप करवाएं

जब तक हमारे दांतों में दर्द या कैविटी नहीं लगती है हम डेंटिस्‍ट के पास नहीं जाते हैं। हालांकि, दर्द या किसी भी तरह के दंत रोग होने से पहले ही आपको डेंटल चेकअप के लिए चले जाना चाहिए। अगर कोई कैविटी, मसूडों में दिक्‍कत या ओरल कैंसर का खतरा होगा तो डेंटिस्‍ट आपको शुरुआती चरण में ही इसकी जानकारी और बचाव के बारे में बता देंगे जिससे आपकी स्थिति और खराब होने से बच जाएगी।

बालों और स्किन के लिए 'चमत्कारी' है अदरक, जानें फायदे



अदरक जब चाय में डलती है तो उसका ज़ायका बढ़ा देती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही अदरक आपके बालों और स्किन के लिए भी फायदेमंद है? हेल्थ बेनिफिट्स के अलावा स्किन और बालों के लिए इसके इतने फायदे हैं कि आप भी जानकर हैरान रह जाएंगे। आइए जानते हैं:

झुर्रियों से मुक्ति

अदरक रिंकल्स यानी झुर्रियों को दूर करने में मदद करती है। अदरक में ऐंटी-ऑक्सिडेंट्स होते हैं, जो स्किन सेल्स में मौजूद टॉक्सिन्स को कम कर देते हैं और ब्लड सर्कुलेशन बढ़ जाता है। इसकी वजह से बढ़ती उम्र के निशान कम हो जाते हैं।

बढ़ती उम्र को रोकती है अदरक

अदरक न सिर्फ बढ़ती उम्र को रोकने में मददगार है, बल्कि चेहरे पर किसी भी तरह के निशान या फिर कील-मुंहासे हों तो फिर अदरक 'रामबाण' की तरह काम करती है। इसमें ऐंटीसेप्टिक और क्लैंज़िंग प्रॉपर्टीज़ होती हैं, जो धीरे-धीरे दाग-धब्बों को कम कर देती हैं और स्किन के रोम छिद्र भी साफ हो जाते हैं।

स्किन के लिए बेस्ट अदरक

यह पढ़कर आपको थोड़ा अजीब लगेगा कि अदरक से भी आपकी स्किन निखर सकती है, लेकिन यह सच है। रोज़ाना अदरक का एक टुकड़ा लेकर स्किन पर रगड़ने से धीरे-धीरे स्किन में निखारा आता चला जाता है।

बेहतरीन स्किन टोनर है अदरक

अदरक एक बेहतर स्किन टोनर और क्लीनर का भी काम करता है। इसके लिए इसे फेस मास्क में मिक्स करके लगाया जा सकता है।

सफेद दाग दूर करती है अदरक

चेहरे का शरीर के किसी भी हिस्से में अगर वाइट स्कार्स यानी सफेद दाग हैं, तो घबराने की ज़रूरत नहीं। अदरक से ये दूर हो जाएंगे।

बालों को झड़ने से रोकती है अदरक

इतना ही नहीं, अगर आपके बाल लगातार झड़ रहे हैं, तो अदरक इसमें काफी कारगर है। अदरक से बालों की जड़ें मज़बूत होती हैं और इसे खाने से आपके बाल झड़ने कम हो जाएंगे।


त्वचा कैंसर सूरज की धूप में रहे बिना भी संभव


हाल के एक शोध के मुताबिक, सनलैस टैनिंग या फेक टैनिंग उत्पाद जैसे स्प्रे, मल्हम, क्रीम, फोम या लोशन जो स्किन कैंसर के खतरे के बिना टैन स्किन का वादा करते हैं, वास्तव में...

हाल के एक शोध के मुताबिक, सनलैस टैनिंग या फेक टैनिंग उत्पाद जैसे स्प्रे, मल्हम, क्रीम, फोम या लोशन जो स्किन कैंसर के खतरे के बिना टैन स्किन का वादा करते हैं, वास्तव में कैंसर को रोकने में मदद नहीं करते हैं। जिन वयस्कों ने सनलैस टैनिंग उत्पादों का उपयोग किया था, उनकी इनडोर टैनिंग बैड्स उपयोग करने की अधिक संभावना रहती है और ऐसे लोगों ने बाहर निकलते समय न तो सुरक्षात्मक कपड़े पहने थे और न ही छाया में रहते थे।

त्वचा कैंसर दुनिया में कैंसर के सबसे आम प्रकारों में से एक है। महिलाओं की तुलना में भारतीय पुरुषों में इस कैंसर के मामले लगभग 70 प्रतिशत अधिक हैं। यह कंडीशन तब होती है, जब अप्राकृतिक त्वचा कोशिकाओं या ऊतकों की वृद्धि अनियंत्रित तरीके से होने लगती है। इसके पीछे जेनेटिक फैक्टर्स से लेकर अल्ट्रावायोलेट रेज के एक्सपोजर तक कुछ भी हो सकता है।

त्वचा कैंसर के सबसे घातक रूपों में से एक है मेलेनोमा। यह मेलेनोसाइट्स या त्वचा में मौजूद वर्णक कोशिकाओं में विकसित होता है। शरीर के अन्य हिस्सों (मेटास्टेसाइज) में फैलने की प्रवृत्ति के कारण त्वचा रोग कैंसर के अन्य रूपों से अधिक गंभीर हो सकता है और गंभीर बीमारी और मृत्यु का कारण बन सकता है। मेलेनोमा के संकेतों को पकडऩे के लिए एबीसीडीई नियम का उपयोग किया जा सकता है : एसिमेट्री या विषमता - तिल या बर्थमार्क के एक हिस्से का दूसरे से मेल न खाना, बॉर्डर या सीमा - अनियमित किनारे, कलर या रंग - पूरी त्वचा का रंग एक जैसा नहीं रहता, कहीं कहीं पर भूरे, काले, गुलाबी, लाल, सफेद या नीले रंग के धब्बे हो सकते हैं, डायामीटर या व्यास - एक चैथाई इंच से अधिक, इवोल्विंग या विकसित होना- तिल के आकार, बनावट या रंग में बदलाव हो रहा हो।

कुछ अन्य आम लक्षण इस प्रकार हैं- त्वचा में परिवर्तन, त्वचा का घाव जो ठीक नहीं होता, त्वचा में दर्द, खुजली या खून आना, किसी थक्के या स्पॉट से का चमकदार, मोम जैसा, चिकना या पीला होना, एक कठोर लाल गांठ जिसमें से खून बहता हो और एक सपाट, लाल धब्बा जो खुरदुरा, सूखा या परतदार होता है।

त्वचा में कम वर्णक (मेलेनिन) होने का मतलब है कि आप यूवी विकिरण के हानिकारक प्रभावों से सुरक्षित नहीं हैं। यदि आपके बाल सुनहरे या लाल है, हल्के रंगी की आंखें हैं और आसानी से सनबर्न हो जाता है, तो आप गहरे रंग वाले व्यक्तियों की तुलना में मेलेनोमा की अधिक संभावना रखते हैं। लेकिन मेलेनोमा गहरे रंग वाले लोगों में विकसित हो सकता है, जिनमें हिस्पेनिक्स और ब्लैक्स शामिल हैं। कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों में त्वचा कैंसर का खतरा अधिक होता है। इसमें ऐसे लोग शामिल हैं जिन्हें एचआईवी या एड्स हैं और जिन्होंने अंग प्रत्यारोपण करवाया है।

ये हैं कुछ सुझाव :

दिन के मध्य के दौरान धूप से बचें। दिन के बाकी समय, यहां तक कि सर्दियों में या आकाश में बादल होने पर बाहरी गतिविधियों में हिस्सा लें। बादल हानिकारक किरणों से थोड़ी सी सुरक्षा प्रदान करते हैं। तेज सूरज से बच कर आप सनबर्न और सनटैन्स से सुरक्षित रहते हैं और इससे त्वचा में क्षति होती है और त्वचा कैंसर होने का जोखिम बढ़ जाता है।

साल भर सनस्क्रीन लगाएं। सनस्क्रीन सभी हानिकारक यूवी विकिरणों को फिल्टर नहीं करती है, विशेष रूप से ऐसे विकिरण जो मेलेनोमा का कारण बन सकते हैं, लेकिन वे धूप से बचाती हैं। कम से कम 15 एसपीएफ वाली सनस्क्रीन का उपयोग करें।

सुरक्षात्मक कपड़े पहनें। अपनी त्वचा को गहरे रंग के, ठोस बुनावट वाले कपड़ों से ढंकें जो आपकी बाहों और पैरों को कवर कर सकें और एक चैड़े किनारे वाला टोप लगाएं, जो बेसबॉल कैप या विजर की तुलना में अधिक सुरक्षा प्रदान करता है।

धूप का चश्मा ऐसा लें जो दोनों प्रकार के यूवी विकिरण - यूवीए और यूवीबी किरणों को रोक सकता हो।

टैनिंग बैड्स से बचें। टैनिंग बैड यूवी किरणों का उत्सर्जन करते हैं और त्वचा के कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।

अपनी त्वचा की जानकारी रखें, ताकि आप बदलाव को पकड़ सकें। त्वचा में किसी भी तरह के बदलाव पर गौर करें, जैसे कि कोई नया तिल, बर्थमार्क आदि
प्लेटलेट रिच प्लाज्मा से कम होंगी झुर्रियां




दमकती त्वचा और लंबे घने बाल महिलाओं की पहली चाहत होती है। आजकल तो पुरुष भी अपने लिए ऐसी इच्छा रखते हैं। लेकिन बदलती जीवनशैली की वजह से शरीर में विटामिन-डी, सी और ए की कमी हो रही है। साथ ही पूरी नींद न लेने व बढ़ते प्रदूषण आदि के कारण भी बाल झडऩे व कम उम्र में ही उम्रदराज दिखने जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं ।

इनसे राहत पाने के लिए लोग खानेपीने की आदतों में बदलाव करते व दवाइयां (खाने और लगाने की) आदि लेते हैं। लेकिन कई बार ये उपाय भी काम नहीं आते। ऐसी स्थिति में प्लेटलेट रिच प्लाज्मा (पीआरपी) तकनीक फायदेमंद हो सकती है।

पीआरपी की प्रक्रिया: इसमें मरीज के शरीर से 20 से 30 मिलिलीटर खून निकाला जाता है। फिर इस खून को प्लाज्मा में बदलकर इंजेक्शन की सहायता से त्वचा में जरूरत की जगह इंजेक्ट किया जाता है। प्लाज्मा में वृद्धिकारक तत्त्व अत्यधिक मात्रा में मौजूद होते हंै। इसे बालों की जड़ों में इंजेक्ट करने से जड़ों को जरूरी पोषक तत्त्व मिल जाते हैं और उनको ताकत मिलने से बाल बढऩे लगते हैं।

त्वचा में कसाव : यही वृद्धिकारक तत्त्व चेहरे की त्वचा में मौजूद कोलेजन नामक प्रोटीन को भी बढ़ाने में सहायक होते हैं। इससे झाइयां, हल्की झुर्रियां और उम्र के साथ होने वाली फाइन लाइन्स की समस्या कम हो जाती हैं। इसके अलावा प्लेटलेट रिच प्लाज्मा की तकनीक से ढीली त्वचा में कसाव भी लाया जा सकता है।

अल्सर में भी फायदेमंद: इस तकनीक को ठीक न होने वाले घाव (नॉन हीलिंग अल्सर) और मधुमेह के कारण होने वाले अल्सर के इलाज में भी प्रयोग किया जाता है।

प्लेटलेट रिच प्लाज्मा (प्लेट-लेट रिच प्लाज्मा इंजेक्शन ) झड़ते बाल और त्वचा की उम्र से संबंधित परेशानियों के इलाज की तकनीक है। कंधों, कोहनी, कलई, घुटनों, कूल्हों व टखने के ऊत्तकों की परेशानी में भी प्रयोग करते हैं।
ऑर्गेनिक फूड से स्वाद भी सेहत भी



हाल ही एक रिसर्च में कहा गया है कि फसलों में इस्तेमाल किए जाने वाले पेस्टिसाइड्स शरीर के हार्मोन के संतुलन को बिगाडक़र नुकसान पहुंचाते हैं। इतना ही नहीं यह जीन पर भी नकारात्मक प्रभाव छोड़ते हैं। इन दिनों बाजार मेंं उपलब्ध ज्यादातर फलों और सब्जियों की पैदावार बढ़ाने के लिए केमिकल का इस्तेमाल किया जा रहा है।

जो सेहत के लिए काफी नुकसानदेह साबित हो सकता है। ऐसे में विकल्प के तौर पर ऑर्गेनिक फूड को चुन सकते हैं। इन दिनों बढ़ती हैल्थ प्रॉब्लम के कारण लोगों का ध्यान इन फूडï्स की ओर जा रहा है। एक्सपर्ट भी इन्हें डाइट में शामिल करने की सलाह दे रहे हैं क्योंकि ये पूरी तरह से केमिकल फ्री हैं साथ ही फलों और सब्जियों का नेचुरल टेस्ट भी मिलता है। जानते हैं क्या हैं ऑर्गेनिक फूड, इन्हें कैसे उगा सकते हैं और ये कैसे शरीर को फायदा पहुंचाते हैं...

क्या है ऑर्गेनिक फूड
ऑर्गेनिक फूड वे फूड होते हैं जो केमिकल फ्री होते हैं। इनकी पैदावार में किसी तरह के रसायनिक खाद या पेस्टिसाइड्स का प्रयोग नहीं किया जाता है। इनकी उपज और आकार बढ़ाने के लिए किसी तरह के केमिकल का प्रयोग नहीं किया जाता। इन फलों और सब्जियों की पैदावार करने को जैविक खेती भी कहते हैं। इन्हें ऑर्गेनिक फार्म में उगाया जाता है।

यूं पहचानें
बाजार में मौजूद ज्यादातर फल और सब्जियां दिखने में अधिक फ्रेश लगते हैं। लेकिन जरूरी नहीं कि वे आर्गेनिक ही हों। ऑर्गेनिक फूड सर्टिफाइड होते हैं या इन पर स्टिकर लगा होता है। इनका स्वाद नॉर्मल फूड से थोड़ा अलग होता है। जैसे आम मसालों की तुलना में ऑर्गेनिक मसालों की गंध थोड़ी तेज होती है। ऑर्गेनिक सब्जियां पकने में ज्यादा समय नहीं लेती हैं।

ये हैं प्रमुख फायदे

सबसे जरूरी और अहम बात इन फूड में जहरीले तत्व नहीं होते क्योंकि इनमें केमिकल्स, पेस्टिसाइड्स, ड्रग्स, प्रिजर्वेटिव जैसी नुकसान पहुंचाने वाली चीजों का इस्तेमाल नहीं किया जाता। आम फूड आइटम्स में पेस्टिसाइड्स का इस्तेमाल किया जाता है। ज्यादातर पेस्टिसाइड्स में ऑर्गेनो-फॉस्फोरस जैसे केमिकल होते हैं, जिनसे कई तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

ये सेहत के लिए काफी फायदेमंद हैं। पारंपरिक फूड के मुकाबले इन फूड आइटम्स में 10 से 50 फीसदी तक अधिक पौष्टिक तत्व होते हैं। इसमें विटामिन, मिनरल्स, प्रोटीन, कैल्शियम और आयरन भी ज्यादा होते हैं। इनमें मौजूद पोषक तत्व दिल की बीमारी, माइग्रेन, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और कैंसर जैसी बीमारियों से बचाते हैं।

ऑर्गेनिक फम्र्स में उपजाए जाने वाले फलों और सब्जियों में ज्यादा एंटी-ऑक्सीडेटï्स होते हैं क्योंकि इनमें पेस्टिसाइड्स नहीं होते इसलिए इनमें ऐसे पोषक तत्व बरकरार रहते हैं जो आपकी सेहत के लिए अच्छे हैं और बीमारियों से बचाते हैं।

इनमें एंटीऑक्सीडेंट्स ज्यादा होने के कारण शरीर की रोगों से लडऩे की क्षमता को बढ़ाते हैं। ऑर्गेनिक फूड चर्बी नहीं बढऩे देते।

ऑर्गेनिक फूड में आम तरीके से उगाई जाने वाली फसल के मुकाबले ज्यादा पोषक तत्व होते हैं क्योंकि इन्हें जिस मिट्टी में उगाया जाता है, वह अधिक उपजाऊ होती है।

ऑर्गेनिक खेती शुरू करने से पहले जमीन को दो साल के लिए खाली छोड़ा जाता है ताकि मिट्टी में पहले से मिले पेस्टिसाइड्स का असर पूरी तरह खत्म हो जाए। इस कारण इन फूड्स में विटामिन-मिनिरल अधिक होते हैं।

ये फूड अधिक लोकप्रिय
ये फूड आसानी से ज्यादातर शहरों में मौजूद मॉल्स और फूड चेन में उपलब्ध होते हैं। ऑर्गेनिक फूड में सीजनल फल और सब्जियों की डिमांड अधिक होती है। जैसे तरबूज, खरबूज, आम और सब्जियों में टिंडा, तोरई और लौकी आदि। इसके अलावा मसालों की भी डिमांड होती है। अगर आप भी इन ऑर्गेनिक फूड को एंज्वॉय करना चाहते हैं तो फार्म में उगा सकते हैं।
ज्यादा जूस पीना हो सकता है खतरनाक, ये हैं नुकसान





क्या आपको फलों के मुकाबले जूस पीना ज़्यादा अच्छा लगता है? अगर हां, तो ज़रा सावधान हो जाएं क्योंकि अगर आपको लगता है कि जूस पीने से काफी फायदे होते हैं, तो शायद आप गलत हैं। कुछ वजहे हैं जिनके कारण जूस पीना सेहत के लिए सही नहीं है।


इसलिए कम पीएं जूस

कुछ ऐसे फल हैं, जैसे कि सेब और अंगूर जिन्हें डायबीटीज़ में फायदेमंद माना जाता है, लेकिन अगर इन्हीं चीज़ों को जूस बनाकर पीया जाए, तो असर उल्टा होगा। जूस में कैलरी ज़्यादा मात्रा में होती है। साथ ही उसमें कॉन्सनट्रेटिड शुगर भी काफी होता है। साथ ही जूस में कम फाइबर होता है, जिसकी वजह से आपको जूस पीते ही तुरंत पेट भरा हुआ महसूस होने लगता है।


​जूस के बजाय खाएं फल

चूंकि एक फल के मुकाबले उसका जूस ज़्यादा जल्दी कंज्यूम कर लिया जाता है इसलिए उससे कार्बोहाइड्रेट इन्टेक भी काफी ज़्यादा होता है। एक रिसर्च में सामने आया कि जिन लोगों ने खाना खाने से पहले सेब का जूस पिया उन्हें ज़्यादा भूख लगी और उन्होंने उन लोगों के मुकाबले ज़्यादा खाया, जिन्होंने मात्र एक सेब खाने के बाद खाना खाया था।


​जूस को न बनाएं डाइट का हिस्सा

जूस को अपनी डेली लाइफ का हिस्सा बनाना ठीक नहीं है, लेकिन लोग यह सोचकर रोज़ाना उसे अपनी डाइट में इसलिए शामिल कर लेते हैं क्योंकि वह नैचरल है और हेल्दी होगा। ऐसा कहीं कोई सबूत नहीं है जो यह साबित कर पाए कि जूस हेल्दी है, बल्कि इसे भी अन्य चीनीयुक्त पेय पदार्थों में गिनना चाहिए।


​जूस और मोटापे का कनेक्शन

जूस पीने के बजाय फल खाने की आदत डालें। शायद ही लोग जानते हों कि जूस पीने का मोटापे से भी संबंध है। हालांकि कुछ लोग इसके हेल्थ बेनिफिट्स के आगे इसे नज़रअंदाज़ कर देंगे। मोटापे के अलावा जूस पीने से इम्यून सिस्टम भी कमज़ोर हो जाता है और किसी भी बीमारी से लड़ने की क्षमता भी कम हो जाती है।


​होती हैं ये परेशानियां भी

जूस पीने से ब्लड शुगर लेवल भी प्रभावित होता है और डायबीटीज़ जल्दी असर करती है। इसके अलावा सिरदर्द, मूड स्विंग्स जैसी कई और परेशानियां आपको घेर लेती हैं। इसलिए जूस पीने से सावधान रहें। इसे अपनी ज़रूरत न बनाएं। हां कभी-कभी इच्छा हुई तो पी सकते हैं।
खराब लाइफस्टाइल युवाओं को बना रहा हृदयरोगी


खराब लाइफस्टाइल युवाओं को हृदयरोगी बना रहा है। यह कहना है दिल्ली के पटपड़गंज स्थित मैक्स हॉस्पिटल के हृदयरोग विशेषज्ञ डॉ. ऋत्विक राज भुयान का। उन्होंने शनिवार को कहा कि देश में हार्ट अटैक के रोगियों की संख्या में प्रतिदिन बढ़ोतरी हो रही है, चाहे वो शहर हो या गांव। आजकल युवा वर्ग में हृदय संबंधी रोग का खतरा बढ़ता ही जा रहा है और यह पुरुषों और महिलाओं दोनों के ही लिए जोखिम भरा विषय 
फेसवॉश से रोज़ाना चेहरा धोने से होते हैं ये फायदे




रोज़ सुबह उठकर हम अपना चेहरा धोते हैं क्‍योंकि आपके लिए दिन की शुरुआत के लिए ऐसा करना ज़रूरी है। नहाने, एक कप गर्म कॉफी या चाय और नाश्‍ते से दिन की शुरुआत होती है लेकिन क्‍या महिलाएं अपने चेहरे को साफ करने के रूटीन पर पर्याप्‍त ध्‍यान देती हैं?

खैर, जवां दिखना और स्‍वस्‍थ और साफ चेहरा पाने के लिए फेस वॉशिंग का एक अच्छा रूटीन होना बहुत ज़रूरी है। अगर आप चेहरे को ठीक तरह से साफ करना नहीं जानती हैं तो इससे आपकी त्‍वचा को नुकसान पहुंच सकता है।


संवेदनशील त्‍वचा वाले लोगों को फेसवॉश से दिक्‍कत हो सकती है। इसलिए आपको होममेड फेसवॉश का इस्‍तेमाल करना चाहिए जिसमें केमिकल्‍स नहीं होते हैं या फिर आपको अपनी त्‍वचा के अनुसार फेसवॉश चुनना चाहिए।

हमारे चेहरे पर प्रदूषण, धूल-मिट्टी, सूर्य की यूवी किरणें आदि पड़ती हैं और इसलिए आपको चेहरे की सफाई पर सबसे ज़्यादा ध्‍यान देना चाहिए वरना आप समय से पहले ही एजिंग का शिकार हो सकती हैं जैसे कि झुर्रिंया, काले घेरे, ब्‍लैकहैड्स, व्‍हाइटहैड्स और ड्राई स्किन आदि।

इसलिए सबसे पहले आपको फेसवॉश से स्किन को साफ करने के बेसिक स्‍टेप के बारे में पता होना चाहिए। आज हम आपको फेसवॉश से चेहरे को साफ करने के 6 फायदों के बारे में बताने जा रहे हैं।

जमा मैल को साफ करता है

हर रोज़ हमारा चेहरा प्रदूषण, धूल और पसीने के संपर्क में आता है। 8 से 9 घंटे के बाद बाहर समय बिताने से आप समझ ही सकते हैं कि आपकी त्‍वचा का क्‍या हाल होता है। फेसवॉश तेल, धूल और बाकी प्रदूषकों को स्किन से साफ करता है। अगर आप रोज़ मेकअप का इस्‍तेमाल करते हैं तो सोने से पहले मेकअप ज़रूर उतार लें। अपनी स्किन के अनुसार किसी भी फेसवॉश का इस्‍तेमाल आप कर सकते हैं। फेसवॉश से त्‍वचा ताज़ी, साफ और सुंदर दिखती है।

त्‍वचा में नमी बनाए रखता है

त्‍वचा को रोज़ और सही तरह से साफ करने पर स्किन का पीएच लेवल बना रहता है। इससे स्किन मुलायम, सुंदर और जवां दिखती है। फेसवॉश त्‍वचा से मृत कोशिकाओं को बाहर निकालने में मदद करता है। आपके चेहरे में नमी बनी रहती है।

एक्‍सफोलिएट करता है

फेसवॉश ना सिर्फ धूल-मिट्टी को चेहरे से साफ करता है बल्कि मृत और शुष्‍क कोशिकाओं को भी बाहर निकालता है और ताज़ी त्‍वचा की परत को बाहर लाता है। मुलायम त्‍वचा बाहर आती है जिससे चेहरे पर अपने आप ही निखार रहता है।

रक्‍तप्रवाह बढ़ता है

फेसवॉश से चेहरा धोने और मसाज करने से चेहरे में रक्‍तप्रवाह तेज़ होता है और त्‍वचा ग्‍लो करने लगती है। ये बहुत रिलैक्‍स करती है। त्‍वचा को साफ करने के लिए फेसवॉश से चेहरे पर मसाज करें। इससे त्‍वचा को इंस्‍टेंट ग्‍लो मिलेगा।

त्‍वचा जवां दिखती है

मृत कोशिकाओं को हटाकर त्‍वचा की कोशिकाओं में सांस आती हैं जिससे स्किन भी सांस ले पाती है। इससे त्‍वचा नमी को बनाए रख पाती है और त्‍वचा जवां और ताज़ी लगती है। आप एजिंग के निशानों को रोक नहीं सकते हैं लेकिन उनके आने में विलंब ज़रूर कर सकते हैं। अपने चेहरे को रोज़ धोएं और मसाज करें।

त्‍वचा को प्रॉडक्‍ट सोखने में मदद करें

अगर आप एंटी एजिंग क्रीम या अन्‍य किसी प्रॉडक्‍ट का सही असर या फायदा पाना चाहती हैं तो रात को चेहरा साफ करके सोएं। साफ चेहरे पर प्रॉडक्‍ट्स सही तरीके से काम करते हैं इसलिए रात और सुबह के वक़्त चेहरे को ठीक तरह से साफ करें।

रात में स्किन रिपेयर होती है और मृत कोशिकाएं हटती हैं लेकिन ये तब भी आपके चेहरे पर ही रहते हैं इसलिए इन्‍हें हटाने के लिए सुबह और रात को फेस वॉश करना बहुत ज़रूरी है।

है।

उन्होंने आगे कहा कि दुनियाभर में सबसे ज्यादा मौतें हार्ट अटैक या हार्ट फेल होने की वजह से होती हैं। विश्व में लगभग 1.70 लाख लोगों की मृत्यु दिल की बीमारी से होती है। इसी तरह से भारत में 3 मिलियन लोगों की मृत्यु सीवीडी कार्डिओ वैस्कुलर बीमारियों से होती हैं, जिसमे हार्ट अटैक और हार्ट स्ट्रोक भी शामिल होते हैं।


उन्होंने कहा कि कि अमूमन बिज़ी लाइफस्टाइल के कारण युवा शारीरिक गतिविधियों पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाते, जिसके चलते कार्डियोवैस्कुलर डिज़ीज, टाइप 2 डायबीटीज़ और मोटापे जैसे रोगों का खतरा दोगना हो जाता है। यह हाई ब्लड प्रैशर लिपिड लेवल्स में असंतुलन और घबराहट को भी बढ़ा देता है, जो सीधे दिल की बीमारी से जुड़े हुए होते हैं।



वर्कआउट से पहले मलाई खाने से मिलती है एनर्जी, जानिए ऐसे ही मलाई खाने के फायदें


क्‍या आपको दूध के साथ मलाई खाना पसंद है, नहीं। आज की जनरेशन का यहीं प्रॉब्‍लम है। मलाई का नाम सुनते ही मुंह सिकोड़ने लग जाते है। मलाई का नाम सुनते ही लोगों के द‍िमाग में आता है कि कोलेस्ट्रॉल की वजह से वजन बढ़ जाएगां। अक्‍सर बच्‍चें दूध पीते समय मलाई की वजह से आनाकानी करते है।

इस वजह से कई महिलाएं बच्‍चों को पहले ही मलाई हटाकरर दूध छानकर देती है ताकि बच्‍चा कम से कम दूध ही पीलें। लेकिन मलाई खाने के फायदें सुन आप भी आप भी अपने बच्‍चें को दूध पिलाने की आदत डाल देंगी। आइए जानते है दूध पीने के साथ मलाई खाने के फायदों के बारे में।


कितनी मलाई खाना फायदेमंद है?
हाल ही में हुए एक नए अध्ययन से यह बात सामने आई है कि जिस डाइट में सैचुरेटेड फैट्स ज्यादा होते हैं, वे वास्तव में स्वास्थ्य को लाभ पहुंचाते हैं। प्रतिदिन एक से दो चम्मच मलाई खाने से शरीर को पौष्टिक तत्‍व मिलते है, इससे वजन नहीं बढ़ता है। एक शोध में मालूम चला है कि जिन फूड में नेचुरली हाई फैट ज्‍यादा और कार्ब्स कम हो, वह उसे गुड केलेस्‍ट्रॉल में गिना जाता है। और इससे हार्ट डिजीज होने का खतरा कम रहता है। लेकिनइसे अधिक मात्रा में सेवन करने से बचना चाहिए।

किस तरह फायदा पहुंचाती है?
मलाई में लैक्टिक फर्मेन्टेशन प्रोबायोटिक होता है, यह सूक्ष्‍मजीव आंतों को सेहतमंद रखते है जिससे पेट से जुड़े रोग दूर रहते हैं। मलाई खाने से शरीर डिटॉक्‍स होता है। इसके नियमित सेवन से घुटनों और जोड़ो के दर्द से राहत मिलती है।

इम्‍यून सिस्‍टम बनाए रखता है
पुरुष यदि रात को सोते समय 2 चम्मच भी मलाई का सेवन किया तो यह एसिड रीफ्लक्स की तकलीफ से राहत देती है। इसके अलावा इसमें मौजूद विटामिन-ए और प्रोटीन होता है जो इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं और रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है।

एनर्जी के ल‍िए अच्‍छा स्‍त्रोत है मलाई
अगर आप जिम है तो वर्कआउट के पहले एक छोटी कटोरी मलाई खा सकते हैं। मलाई को प्रोटीन का सबसे बढि़या स्रोत माना गया है। मात्र 50 ग्राम मलाई में खासा कैल्शियम होता है, जो न केवल हड्डियों के लिए अच्छा है, बल्कि नाखूनों को भी स्वस्थ रखता है। साथ ही प्रोटीन मसल्स के लिए खास फायदेमंद होता है।
गर्भाशय निकलवाने का सोच रही हैं तो जान लें ये हानिकारक प्रभाव


प्‍यूबर्टी की उम्र शुरु होने पर लड़कियों में मासिक धर्म शुरु हो जाता है। इसमें हर महीने शरीर से रक्‍त निकलता है। इससे रक्‍त की कमी तो होती ही है साथ ही और भी कई तरह की समस्‍याएं सामने आती हैं।

ऐसे में लड़कियों को मूड स्विंग्‍स से लेकर पेट दर्द और पेट फूलने की समस्‍या रहती है। सभी महिलाओं में माहवारी का दर्द और प्रभाव अलग-अलग होता है। लेकिन एक बात तो पक्‍की है कि माहवारी के कारण महिलाओं को असहजता ज़रूर होती है।

इस असहजता की वजह से ही महिलाओं को लगता है कि काश उनके शरीर से गर्भाशय निकल जाए। ऐसा उन महिलाओं में ज़्यादा होता है जो प्रजनन की उम्र में होती हैं और कभी मां नहीं बनना चाहती हैं। उन्‍हें एक ऐसा जीवन चाहिए होता है जिसमें पीरियड्स ना हो और वो खुलकर सांस ले सकें। हालांकि, गर्भाशय निकाल देने से आपकी सारी परेशानियां खत्‍म नहीं हो जाती हैं। इसके साथ कई तरह के साइड इफेक्‍ट्स भी देखने को मिलते हैं। आज हम आपको इस आर्टिकल के ज़रिए बताने जा रहे हैं कि गर्भाशय निकाल देने पर किस तरह के हानिकारक प्रभाव देखने को मिलते हैं।

रिकवरी में लगता है लंबा वक्‍त
यूट्रेस निकलवाने की प्रक्रिया के बाद महिलाओं को रिकवरी में समय लगता है। इसके लंबवत आकार में एक कट लगाया जाता है। कुछ मामलों में क्षैतिज आकार का भी होता है। इस कट के द्वारा गर्भाशय को शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है। इस प्रक्रिया में सर्जरी के बाद हफ्तों तक महिलाओं को बेड पर आराम करना पड़ता है। इसके दौरान जो घाव या दाग पड़ता है वो भी आसानी से नहीं जाता है। कुछ मामलों में ये महीनों तक रह जाता है जबकि कुछ में सालों तक इसका निशान नहीं जाता है।

वजाइना को नुकसान
वजाइनल हिस्‍टेरेक्‍टोमी के मामले में भी ये एक साइड इफेक्‍ट होता है। ऐसा तब होता है जब वजाइना के ज़रिए सर्जन यूट्रेस को निकालता है। आप जानते ही हैं कि वजाइना कितना संवेदनशील होता है। अगर सर्जन बहुत ज़्यादा ध्‍यान से सर्जरी ना करे तो इस वजह से वजाइना को नुकसान पहुंच सकता है।

अनीमिया का खतरा
गर्भाशय निकलवाने के लिए सर्जरी के बाद बहुत ज़्यादा रक्‍त बह सकता है। इतनी ज़्यादा मात्रा में रक्‍त निकलने की वजह से आपको अनीमिया का खतरा रहता है। कुछ मामलों में मरीज़ों को ब्‍लड क्‍लॉट की समस्‍या भी रहती है। ये क्‍लॉट पैरों या फेफडों में बनते हैं और ये यूट्रेस निकालने का सबसे बड़ा साइड इफेक्‍ट है।

कैंसर का खतरा बढ़ जाता है
लैप्रोस्‍कोपी हिस्‍टेरेक्‍टोमी जैसे मामलों में ये साइड इफेक्‍ट देखने को मिलता है। इसमें पॉवर मोसेलेटर्स के ज़रिए यूट्रेस टिश्‍यूज़ को तोड़ा जाता है ताकि लैप्रोस्‍कोपिक चीरे से यूट्रेस को बाहर निकाला जा सके। हालांकि, इस वजह से पूरे शरीर में कैंसर जनित टिश्‍यूज़ फैल सकते हैं। कई सालों में ये टिश्‍यूज़ घातक रूप ले सकते हैं।

दर्द
किसी अन्‍य सर्जिकल प्रक्रिया की तरह गर्भाशय निकालने में भी दर्द होता है। अब कितना और कब तक दर्द होता है, ये लैप्रोस्‍कोपिक सर्जरी की प्रक्रिया और क्‍या शरीर से सिर्फ गर्भाशय निकाला जा रहा है, इस बात पर निर्भर करता है। नैचुरल हिस्‍टेरेकटोमी बहुत दर्दनाक होता है और इसका दर्द महीनेभर तक रहता है। वजाइनल हिस्‍टेरेक्‍टोमी के कुछ मामलों में बहुत कम दर्द होता है।

एनेस्‍थीसिया से दिक्‍कत
सर्जरी के दौरान होने वाले दर्द से बचने के लिए डॉक्‍टर मरीज़ को एनेस्‍थीसिया देते हैं। कुछ महिलाओं को सांस लेने में दिक्‍कत या ह्रदय से संबंधित समस्‍या होने लगती है। इस तरह की समस्‍या अस्‍थमा के मरीज़ों और 50 से अधिक उम्र की महिलाओं में ज़्यादा देखी जाती है।

संक्रमण
किसी भी सर्जरी में आंतरिक मानव अंगों के संपर्क में आने के लिए बाहरी चीज़ों का प्रयोग किया ही जाता है। इनकी वजह से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। डॉक्‍टर और मेडिकल टीम चाहे कितनी भी सावधानी बरतें लेकिन मरी़ज़ के शरीर में संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता है।

आसपास के अंगों में चोट
मनुष्‍य का शरीर एक बहुत जटिल मशीन है और इसमें सभी अंग आसपास होते हैं। इस वजह से बाकी अंगों को भी चोट लग सकती है। महिलाओं के यूट्रेस के आसपास फैलोपियन ट्यूब, आंतें, पेल्‍विक हड्डियां और ओवरी होती है। शरीर से यूट्रेस निकालने की प्रक्रिया में आसपास के अंगो को भी चोट लग सकती है। अब किस अंग को कितनी चोट लगती है और उसे भरने में कितना समय लगता है ये स्‍पष्‍ट तौर पर नहीं कहा जा सकता है।

समय से पूर्व मेनोपॉज़
कई बार किसी बीमारी की वजह से गर्भाश्‍य को निकालना पड़ता है और कुछ मामलों में तो ओवरी भी निकाल दी जाती है। ऐसे मामलों में प्रीमेनोपॉज़ हो सकता है। आम भाषा में इसका मतलब है कि महिलाओं को समय से पहले ही मेनोपॉज़ आ जाता है। गर्मी लगना, मूड स्विंग्‍स होना, बुखार आना और रात में पसीना आदि इसके लक्षण हैं।

सेक्‍स में दर्द होना
सभी महिलाओं में ये लक्षण दिखाई नहीं देता है। हालांकि, कुछ मामलों में जिन महिलाओं का गर्भाशय निकाल दिया जाता है उन्‍हें कभी-कभी सेक्‍स के दौरान दर्द महसूस हो सकता है। पेट के निचले हिस्‍से में दर्द महसूस हो सकता है। अगर आपको भी संभोग के दौरान पेट के निचले हिस्‍से में दर्द महसूस होता है तो इसका कारण शरीर से गर्भाशय को निकालना हो सकता है। अपने डॉक्‍टर से इस बारे में बात करें।
कम समय में ज्यादा वजन घटाने का आसान प्लान


इन दिनों लोगों के बीच सबसे बड़ा क्रेज बना हुआ वेट लॉस यानी वजन घटाना। अधिकतर लोग ऐसे हैं जो बिना ज्यादा मेहनत किए वजन घटाने की प्लानिंग कर रहे हैं। अगर आप भी इनमें से ही एक हैं तो हम आपको बता रहे हैं GM डायट के बारे में जिसे फॉलो कर महज 7 दिन के अंदर आप 5 से 7 किलो तक वजन घटा सकते हैं। GM डायट के तहत 7 दिनों के लिए अलग-अलग फूड ग्रुप से खाना खाने की सलाह दी जाती है और यह डायट प्लान कम समय में ज्यादा वजन घटाने का दावा भी करता है।

GM डायट के हैं सेहत से जुड़े कई फायदे
GM डायट को फॉलो कर न सिर्फ आप वजन घटा सकते हैं बल्कि इस डायट के स्वास्थ्य से जुड़े कई दूसरे फायदे भी हैं। GM डायट के जरिए आपका डाइजेशन बेहतर रहता है, शरीर डीटॉक्स होता है यानी हानिकारक तत्वों को शरीर से बाहर निकालने में मदद मिलती है, साथ ही फैट को बर्न करने की शरीर की क्षमता भी बढ़ती है। वैसे ज्यादातर लोग जिन्होंने GM डायट को फॉलो किया है उन्हें बेहतर नतीजे मिले हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इस डायट में फल और सब्जियों को शामिल किया जाता है जिनमें कैलरीज की मात्रा कम होती है। बेहतर नतीजों के लिए 5 से 7 दिन के गैप के बाद आप इस डायट को एक से ज्यादा बार फॉलो कर सकते हैं।

GM डायट का प्लान
पहला दिन- केले के अलावा कोई भी एक फल। आप इस फल को जितनी बार मन करे खा सकते हैं। तरबूज खाने की सलाह ज्यादा दी जाती है क्योंकि इसमें पानी अधिक होता है और यह वजन घटाने में मदद करता है।

दूसरा दिन- किसी भी सब्जी दिन भर में जितनी बार मन करे उबाल कर या फिर कच्चा खा सकते हैं। आप चाहें तो ब्रेकफस्ट में मध्यम आकार के एक आलू को 1 चम्मच लो फैट मक्खन के साथ खा सकते हैं।

तीसरा दिन- केला और आलू के अलावा आप कोई भी फल या सब्जी को दिनभर उबाल कर या फिर कच्चा खा सकते हैं।

चौथा दिन- चौथे दिन आपको सिर्फ केला और दूध ही खाना है। दिनभर में आप 6 से 8 बड़े वाले केले और 3 ग्लास स्किम्ड दूध पी सकते हैं।

पांचवां दिन- 280 ग्राम चिकन या फिश को 6 बड़े-बड़े टमाटर के साथ खाएं। शाकाहारी हैं तो मीट की जगह ब्राउन राइस या पनीर खा सकते हैं। पानी पीने की क्षमता को बढ़ाएं।

छठा दिन- इन दिन अपना जितनी चाहें सब्जियां खा सकते हैं, खासतौर पर पालक लेकिन आलू बिलकुल नहीं। शाकाहारी ब्राउन राइस और पनीर खा सकते हैं जबकि मांसाहारी चिकन या फिश। इस दिन भी ढेर सारा पानी पिएं।

जरूरी टिप
GM डायट को फॉलो करते वक्त यह जरूरी है कि आप सातों दिन हर दिन कम से कम 45 मिनट वॉक करें। अगर आपको कमजोरी महसूस हो रही हो तो ज्यादा मेहनत वाली एक्सर्साइज करने से बचें। अधिक कैलरी वाले पेय पदार्थ और स्वीटनर्स का सेवन करने से बचें। आप चाहें तो इस दौरान ब्लैक टी, ब्लैक कॉफी या फिर हर्बल टी का सेवन कर सकते हैं लेकिन चीनी डाले बिना।

जंक फूड के सेवन से बचें
जब आप एक सप्ताह तक GM डायट फॉलो कर लें तो उसके बाद एक सप्ताह तक ऐसी चीजों का सेवन करें जिसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक हो और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम। इस दौरान किसी भी तरह का जंक फूड खाने से बचें क्योंकि इससे आप दोबारा वेट गेन कर सकते हैं।


गुणों से भरपूर नारियल तेल


नारियल का तेल कई गुणों से भरा है। यह स्किन और बालों को हेल्दी बनाए रखने के लिए एक बेहतरीन विकल्प माना जाता है। इसकी एंटीबैक्टीरियल और एंटी फंगल क्वालिटी इसे बाकी तेलों से अलग और खास बनाती है। अपनी ब्यूटी को और बढ़ाने के लिए आप इसे इन पांच तरीकों से इस्तेमाल कर सकते हैं।

स्किन मॉइस्चराइजर
नारियल के तेल में फैटी ऐसिड के साथ ही विटामिन ई भी होता है, जो इसे त्वचा के लिए एक बेहतरीन हाइड्रेटिंग पोशन बनाना है। इस तेल से आपकी रूखी त्वचा भी मुलायम बन जाएगी। इसके रोजाना इस्तेमाल से आप खुद स्किन की क्वालिटी में भी बदलाव महसूस करेंगे।

मेक-अप रिमूवर
बाजार में यूं तो कई कीमतों के मेक-अप रिमूवर मौजूद हैं, लेकिन नारियल तेल की बराबरी शायद ही कोई कर पाए। चाहे नॉर्मल मेकअप हो या वॉटरप्रूफ, यह तेल चुटकियों में आपके चेहरे को साफ कर देगा और उसे नुकसान भी नहीं पहुंचाएगा।

ऐक्ने को कहें बाय-बाय
ऐक्ने होने पर हम तेल या किसी भी ऑइली चीज से दूर भागते हैं। हालांकि, नारियल का तेल इस्तेमाल करने पर आप ऐक्ने से छुटकारा पा सकते हैं। इसकी एंटीबैक्टीरियल प्रॉप्टीज बैक्टीरिया को मारकर फुंसियों को खत्म कर देती है, साथ ही उससे बने धब्बे भी हल्के हो जाते हैं।

हेयर मास्क
बालों के लिए नारियल का तेल कितना अच्छा होता है, यह बात सब जानते हैं। इसे आप बालों में सीधे लगाने के साथ ही दही या नींबू में मिलाकर भी लगा सकते हैं। इससे बालों की चमक बढ़ेगी और डैन्ड्रफ की समस्या भी दूर हो जाएगी।

ऐंटी-एजिंग
नारियल का तेल बाजार में उपलब्ध अन्य ऐंटी-एजिंग क्रीमों के मुकाबले काफी बेहतर है। यह कोलेजन को बूस्ट करता है और आपकी स्किन को जवां बनाता है। यह त्वचा को गहराई तक मॉइस्चराइज करता है, जिससे झुर्रियों की समस्या दूर हो जाती है।
सेहत के बारे में बताते हैं आपके नाखून

महिलाएं अक्सर अपने नाखूनों को खूबसूरत बनाने में घंटों लगा देती हैं। कभी पॉलिशिंग में, कभी इनकी ट्रिमिंग में तो कभी शेपिंग में लेकिन इन्हीं नेल्स में आने वाले छोटे-मोटे बदलावों पर हमारा ध्यान नहीं जाता, जबकि यही बदलाव हमारे हेल्थ की पूरी कहानी कहते हैं। ऐसे में अगर आपको भी अपने नाखूनों पर कुछ निशान दिखें तो सतर्क हो जाएं क्योंकि यह किसी बीमारी का संकेत हो सकता है...

सफेद लाइन्स
नाखून पर एक से ज्यादा सफेद धारियां किडनी से जुड़ी बीमारियों और शरीर में पोषक तत्वों की कमी की ओर इशारा करती हैं। समय रहते डॉक्टर को दिखाएं।


सॉफ्ट नाखून
नाखून बहुत सॉफ्ट हैं और अंदर से खोखले नजर आते हैं, तो यह लीवर प्रॉब्लम या शरीर में आयरन की कमी का संकेत है। आयरन की कमी से ये टूटना भी शुरू हो जाते हैं।

पीले नाखून
जब नेल्स पीले पड़ते जा रहे हों या बेहद मोटे हो गए हों, इसके साथ ही, बार-बार टूट भी रहे हों तो समझिए कि आपको फंगल इन्फेक्शन की समस्या है। तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।

मुरझाए नाखून
आपके नेल्स में शाइनिंग नहीं रहती, तो समझें कि आपको अनीमिया की समस्या है। इस तरह के नाखून वालों को डायबीटीज और लीवर से जुड़ी समस्याएं होने की भी सम्भावनाएं होती हैं।

जोड़ों के दर्द में फायदेमंद है खट्टी इमली



खट्टी इमली न सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाती है बल्कि इसमें ढेर सारे पौष्टिक तत्व भी होते हैं। इमली अलग-अलग प्रकार से दुनिया के लगभग हर हिस्से में दवा और खाने के रूप में इस्तेमाल की जाती है। आइए जानते हैं कि इमली का सेवन कितना पौष्टिक है और ये किन दिक्कतों को दूर करती है...

पोषण का खजाना
100 ग्राम इमली में करीब 239 कैलरी ऊर्जा, 62.5 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 0.6 ग्राम वसा और 2.8 ग्राम प्रोटीन होता है। इसके अलावा इसमें 628 मिलीग्राम पोटैशियम, 113 मिलीग्राम फॉस्फॉरस, 92 मिलीग्राम मैग्नीशियम, 74 मिलीग्राम कैल्शियम, 28 मिलीग्राम सोडियम, 2.8 मिलीग्राम आयरन और 0.1 ग्राम जिंक होता है। इमली में वे सभी तत्व होते हैं जो शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी हैं।


पाचन के लिए फायदेमंद
आयुर्वेदाचार्य एस के पांडेय कहते हैं, इमली में फाइबर मौजूद होने की वजह से यह पाचन तंत्र के लिए फायदेमंद है। फाइबर वाले आहारों के सेवन से आंतों में मौजूद गंदगी साफ हो जाती है और इससे पेट भी साफ होता है।

ब्लड प्रेशर करे कंट्रोल
इमली में पोटैशियम की भरपूर मात्रा होती है इसलिए ये हाई ब्लड प्रेशर और कलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं से निपटने में भी मदद करती है। इमली से बने आहार के सेवन से ब्लड प्रेशर और कलेस्ट्रॉल कंट्रोल में रहते हैं। इसमें मौजूद विटमिन सी फ्री रेडिकल्स का असर कम करके दिल को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करता है।

इमली का तेल है लाभकारी
इमली का तेल शरीर में होने वाले दर्द और सूजन को कम करता है। इसके तेल से मसाज करने से जोड़ों के दर्द और गठिया में आराम मिलता है। इमली आंखों की जलन और सूजन भी कम करती है।

वजन कम करने में मददगार
इमली वजन घटाने में भी मददगार है। जब इमली का इस्तेमाल मसाले के तौर पर किया जाता है तो इसमें मौजूद हाइड्रॉक्सीसिट्रिक ऐसिड फैट को तेजी से बर्न करने में मदद करता है। इसलिए अगर आप वजन बढ़ने से परेशान हैं तो इमली से बनी डिशेज जैसे-चटनी, गोलगप्पे का पानी और सब्जी में डालकर इसका खूब सेवन करें।
अलसी के तेल से निकाला ब्लड प्रेशर और कलेस्ट्रॉल का तोड़


दिल के रोगियों के लिए अलसी का तेल फायदेमंद होता है, यह बात लंबे समय से कही जाती रही है लेकिन इसका पेटेंट अब केजीएमयू के पास है। केजीएमयू के फिजियॉलजी विभाग के डॉ नरसिंह वर्मा और कानपुर के केमिकल इंजिनियर क्षितिज भारद्वाज ने ऐसा तेल तैयार किया है जो ब्लड प्रेशर और कलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखेगा। इसके लिए इन दोनों ने 4 साल केजीएमयू के मरीजों पर रिसर्च की। रिसर्च के नतीजों के अनुसार, इस तेल में मौजूद ओमेगा-3 फैटी ऐसिड से ब्लड प्रेशर और कलेस्ट्रॉल जैसी गंभीर बीमारियां कम हो गई। कुछ मरीजों की तो दवाएं भी बंद हो गईं। डॉ नरसिंह वर्मा और क्षितिज ने इस शोध का पेटेंट भी करवा लिया है। यह तेल अब ओमेगा अलाइव ऑइल के नाम से लखनऊ के मेडिकल स्टोर्स के अलावा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।


कलेस्ट्रॉल की दवा बंद
डॉ नरसिंह वर्मा ने बताया कि रिसर्च के लिए केजीएमयू में हाई बीपी और कलेस्ट्रॉल वाले 300 मरीज चुने गए। इंजिनियर क्षितिज ने अलसी के साधारण तेल को खास तरह से प्रॉसेस किया। एक ग्रुप के 150 मरीजों को प्रॉसेस किया गया अलसी का तेल और दवाएं दी गईं। दूसरे ग्रुप को सिर्फ दवाएं दी गईं। 6 महीने बाद पाया कि जिन मरीजों को तेल और दवाएं दी जा रहीं थी उनका कलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर सिर्फ दवा खाने वाले मरीजों से बेहतर था। फिर 3-3 महीने पर मरीजों को ऑब्जर्व किया गया। हर बार नतीजे बेहतर रहे। बाद में मरीजों की राय से कुछ की दवाएं बंद कर उन्हें सिर्फ अलसी के बीज से प्रॉसेस किए गए ओमेगा-3 ऑइल से बना खाना ही दिया गया तो पाया गया कि दवा की तुलना में भी यह कारगर रहा।

अब होगी ओमेगा-3 की जांच
ब्लड में फैटी ऐसिड ओमेगा 3 की मात्रा कितनी है, इसकी अपने देश में कोई जांच नहीं होती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि कांउसिल ऑफ साइंस ऐंड टेक्नॉलजी से मिले फंड से वे कुछ लोगों के ब्लड सैंपल अमेरिका भेजेंगे और उनके रक्त में मौजूद ओमेगा 3 की जांच करवाएंगे। फिर इसके आधार पर उन लोगों को ऑइल दिया जाएगा ताकि भविष्य में और बेहतर परिणाम आ सकें।

अमेठी में लगा ऑइल प्लांट
इस शोध को इंडियन काउंसिल ऑफ ऐग्रिकल्चर की मेंटरशिप मिली है। जबकि कांउसिल ऑफ साइंस ऐंड टेक्नॉलजी ने कुछ फंड भी दिया है। सफल शोध के बाद ओमेगा-3 ऑइल का प्लांट अमेठी में लगाया गया है। इंजिनियर क्षितिज का का कहना है कि अब उनकी कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा अलसी के बीज लेकर तेल तैयार कर सकें। फिलहाल बाजार में यह ऑइल ऑनलाइन और लखनऊ के कुछ चुनिंदा मेडिकल स्टोर्स पर उपलब्ध है।

इनमें ज्यादा ओमेगा-3
देसी घी, कच्ची मूंगफली, सूरजमुखी, सरसों के तेल, राजमा और समुद्री मछली में ओमेगा-3 काफी मात्रा में होता है। डॉ नरसिंह का कहना है कि नदियों में प्रदूषण बढ़ने के कारण स्थानीय मछलियों में अब उतना ओमेगा-3 नहीं रहा लेकिन समुद्री मछलियों में अब भी ओमेगा-3 की मात्रा ज्यादा होती है।

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