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पपीता खाने के 11 स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक कारण

पपीता खाने के 11 स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक कारण



विटामिन सी, ए, पोटेशियम और कैल्शियम और आयरन से भरपूर पपीता स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद होता है। पपीता पेट, हृदय और लीवर के रोगों और आंतों की कमजोरी को दूर करने में मददगार होता है।
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पपीते के स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक गुणगुणों की खान कहा जाने वाला पपीता आपके पेट के साथ आपकी त्‍वचा की खूबसूरती बढ़ने में भी आपकी मदद करता है। यह एक ऐसा फल जिसमें विटामिन सी, ए, पोटेशियम और कैल्शियम और आयरन प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है इसके साथ ही स्वास्थ्य के लिए कई हितकारी गुण निहित होते हैं। पपीते के कुछ बेहतरीन स्‍वास्‍थ्‍य लाभों की सूची यहां पर दी गई है
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वजन घटाने में मददगारमीठा होने के बावजूद कैलोरी में कम पपीते को वजन कम करने वाले लोगों को अपने आहार में जरूर शामिल करना चाहिए। इसके अलावा, पपीता में मौजूद फाइबर आपको संतुष्ट और पूर्ण महसूस करवाने के साथ आंतों के कार्यों को ठीक रखता है जिसके फलस्‍वरूप वजन घटाना आसान हो जाता है।
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आंखों के लिए फायदेमंदपपीता नेत्र रोगों के लिए बहुत फायदेमंद होता है। इसमें प्रचुर मात्रा में विटामिन ए की मौजूदगी आंखों की रोशनी को कम होने से बचाती है। इसके सेवन से रतौंधी रोग का निवारण होता है और आंखों की ज्योति बढ़ती हैं।
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कोलेस्ट्रोल कम करेंपपीते में फाइबर, विटामिन सी और एंटी-ऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में होता है जो आपकी रक्त-शिराओं में कोलेस्ट्रोल के थक्कों को बनने देता। कोलेस्ट्रोल के थक्के दिल का दौरा पड़ने और उच्च रक्तचाप समेत कई अन्य ह्रदय रोगों का कारण बन सकते हैं।

माहवारी के दर्द से छुटकारापपीते में पैपेन नामक एंजाइम माहवारी के दौरान रक्त के प्रवाह को ठीक कर दर्द को दूर करने में मदद करता है। इसलिए माहवारी के दर्द से गुजर रही महिलाओं को अपने आहार में पपीता को शामिल करना चाहिए।
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प्रतिरोधक क्षमता में मजबूतीआपकी इम्‍यूनिटी विभिन्‍न संक्रमणों के विरूद्ध ढाल का काम करती हैं। केवल एक पपीते में इतना विटामिन सी होता है जो आपके प्रतिदिन की विटामिन सी की आवश्यकता का लगभग 200 प्रतिशत होता है। इस तरह से ये आपकी प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है।
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डायबिटीज के रोगियों के लिए अच्छास्‍वाद में मीठा होने के बावजूद इसमें शुगर नाममात्र का होता है इसलिए पपीता डायबिटीज रोगियों के लिए आहार के रूप में एक बेहतरीन विकल्प है। इसके अलावा, जो लोग डायबिटीज के रोगी नहीं हैं, इसके सेवन से डायबिटीज होने के खतरों को दूर कर सकते हैं।
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कैंसर को रोकने में मददगारकुछ अध्‍ययनों के अनुसार, पपीते के सेवन से कोलन और प्रोजेक्ट कैंसर के खतरे को कम किया जा सकता है। पपीते में एंटी-ऑक्‍सीडेंट, फीटोन्यूट्रिएंट्स और फ्लेवोनॉयड्स प्रचूर मात्रा में होते हैं। इसके अलावा इसमें मौजूद विटामिन सी, बीटा कैरोटीन और विटामिन ई शरीर में कैंसर सेल को बनने से रोकते हैं। इसलिए अपने आहार में पपीता शमिल करें।
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तनाव कम करेंइस कमाल के फल में तनाव को दूर करने की ताकत होती हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बामा में हुए एक अध्‍ययन के अनुसार, लगभग 200 मिलीग्राम विटामिन सी स्ट्रेस हार्मोंन को संचालित करने में सक्षम होता है और पपीते में विटामिन सी प्रचुरता में उपलब्ध होता है।
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पाचन को दुरुस्‍त करेंपपीते में फाइबर के साथ-साथ पपैन नामक एक एंजाइम होता है जो आपकी पाचन शक्ति को दुरुस्त रखता है। यह एंजाइम आहार को पचाने में अत्‍यंत मददगार होता है। जिन लोगों को पेट से संबंधित समस्‍या जैसे कब्‍ज की शिकायत हमेशा बनी रहती है, उन्‍हें पपीते का सेवन नियमित रूप से करना चाहिए।
एजिंग को रोकेंहम सभी सदा जवां बने रहना चाहते हैं, पर कोई भी ऐसा करने में कामयाब नहीं हो पाता है। लेकिन फिर भी, स्‍वास्‍थ्‍यवर्द्धक आदतों और पपीते को अपने आहार में शामिल कर आप उम्र के असर को कम कर सकते हैं। पपीते में विटामिन सी, विटामिन ई और बीटा-कैरोटीन सरीखे एंटी-ऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में होते हैं जो शरीर की पोषण की जरूरतों को पूरा कर आपको सालों साल जवान बनाये रखते हैं।
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गठिया से बचावगठिया जैसी बीमारी शरीर को दुर्बल करने के साथ आपकी जीवनशैली को भी बुरी तरह से प्रभावित करती है। इनमें विटामिन-सी के साथ-साथ एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होने के कारण पपीता खाना आपकी हड्डियों के लिए बेहद लाभकारी होता हैं। एक अध्ययन के अनुसार विटामिन-सी युक्त भोजन न लेने वाले लोगों में गठिया का खतरा विटामिन-सी का सेवन करने वालों के मुकाबले लगभग तीन गुना अधिक होता है।

तुलसी के बीज बड़े काम की चीज
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जब भी तुलसी में खूब फुल यानी मंजिरी लग जाए तो उन्हें पकने पर तोड़ लेना चाहिए वरना तुलसी के झाड में चीटियाँ और कीड़ें लग जाते है और उसे समाप्त कर देते है . इन पकी हुई मंजिरियों को रख ले . इनमे से काले काले बीज अलग होंगे उसे एकत्र कर ले . यही सब्जा है . अगर आपके घर में नही है तो बाजार में पंसारी या आयुर्वैदिक दवाईयो की दुकान पर मिल जाएंगे .
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* तुलसी चटपटी, कड़वी अग्निदीपक, हृदय को हितकारी गरम, दाह, पित्त, वृद्धिकर, मूत्रकृच्छ, कोढ़, रक्तविकार, पसली-पीड़ा तथा कफ वातनाशक है। पाश्चात्य मतानुसार श्वेत तुलसी उष्ण, पाचक एवं बालकों के प्रतिश्याय व कफ रोग में कार्यान्वित होता है। काली तुलसी शीत, स्निग्ध, कफ एवं ज्वरनाशक है। फुसफुस के अन्दर से कफ निकालने के लिए काली मिर्च के साथ तुलसी के पत्तों का प्रयोग किया जाता है। तुलसी रोगाणुनाशक पौधा है। प्राय: सभी हिन्दू घरों में यह मिलता है और इसकी पूजा होती है।

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* केवल क्षय और मलेरिया के कीटाणु ही तुलसी की गंध से समाप्त नहीं हो जाते, अन्य रोगों के कीटाणु भी नष्ट हो जाते हैं। कुछ वर्ष पूर्व मलाया में मलेरिया की अधिकता को देखकर वहां की सरकार ने पार्कों में वनों में खाली जमीन जहां भी थी वहां तुलसी के पौधे रोपने का एक जोरदार अभियान चलाया था। उसके परिणामस्वरूप महामारी के रूप में कुख्यात मलेरिया धीरे-धीरे कम होते हुए अब बिलकुल समाप्त हो गया है। वहां के निवासी तुलसी के गुणों से भली-भांति परिचित हो चुके हैं। आज उनके घरों में तुलसी के एक-दो नहीं कई-कई पौधे लहलहाते दिखाई देते हैं।
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* अनेक होमियोपैथिक दवाइयां तुलसी के रस से तैयार की जाती हैं। मेटेरिया मेडिका में तुलसी के अनेक गुणों का उल्लेख किया गया है।
* हमारे दैनिक जीवन में तुलसी का बहुत ही व्यापक उपयोग है। घर में हम अन्य फूलदार पौधे गमलों में लगाते हैं क्योंकि हर घर में कच्ची जमीन नहीं होती। हमें गमलों में तुलसी के भी दो-चार पौधे लगाने चाहिए। हालांकि जमीन में तुलसी का पौधा जिस तेजी से पनपता और विकसित होता है गमले में नहीं हो पाता। लेकिन इससे उसके गुणों में कोई अन्तर नहीं आता।
* तुलसी का सेवन करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। तुलसी का उपयोग करने के तत्काल बाद दूध नहीं पीना चाहिए। उससे कई रोग पैदा हो जाते हैं। अनेक आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन दूध के साथ बताया गया है लेकिन तुलसी का सेवन गंगाजल, शहद या फिर सामान्य पानी के साथ बताया गया है।
आयुर्वेद के मतानुसार, यदि कार्तिक मास में प्रातःकाल निराहार तुलसी के कुछ पत्तों का सेवन किया जाए तो मनुष्य वर्ष भर रोगों से सुरक्षित रहता है।

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* तुलसी के सेवन का मनुष्य के चरित्र पर गहरा प्रभाव पड़ता है। तुलसी के सेवन से विचार शुद्ध और पवित्र रहते हैं। आध्यात्मिक विचार उत्पन्न होते हैं। वासना की ओर मन आकृष्ट नहीं हो पाता। मन में न तो वासनात्मक विचार उत्पन्न होते हैं न क्रोध आता है। तुलसी के नियमित सेवन से शरीर में चुस्ती-फुर्ती पैदा होती है। चेहरा कान्तिपूर्ण बन जाता है।
तुलसी रक्त विकार का सबसे बड़ा शत्रु है। रक्त में किसी भी कारण से विकार उत्पन्न हो गए हों, धोखे या जानबूझकर खा लेने पर विष रक्त में घुलमिल गया हो, तुलसी के नियमित प्रयोग से वह विष रक्त से निकल जाता है।
तुलसी के पौधे आंखों की ज्योति और मन को शान्ति प्रदान करते हैं। वातावरण में सात्विकता की सृष्टि करते हैं। तुलसी हृदय को सात्विक बनाती है। मन, वचन और कर्म से पवित्र रहने की प्रेरणा के लिए तुलसी प्रयोग की जाती है।
जीवन की सफलता मन की एकाग्रता पर बहुत कुछ निर्भर करती है। यदि मन एकाग्र न हो तो मनुष्य न तो भजन, पूजन, आराधना और चिन्तन-मनन कर सकता है न ही अध्ययन कर सकता है।
* भारतीय चिकित्सा विज्ञान (आयुर्वेद) का सबसे प्राचीन और मान्य ग्रंथ चरक संहिता में तुलसी के गुणों का वर्णन करते हुए कहा गया है-
हिक्काल विषश्वास पार्श्व शूल विनाशिनः।
पितकृतात्कफवातघ्र सुरसः पूर्ति गंधहा।।
अर्थात् तुलसी हिचकी, खांसी, विष विकार, पसली के दाह को मिटाने वाली होती है। इससे पित्त की वृद्धि और दूषित कफ तथा वायु का शमन होता है। भाव प्रकाश में तुलसी को रोगनाशक, हृदयोष्णा, दाहिपितकृत शक्तियों के सम्बन्ध में लिखा है।
तुलसी कटुका तिक्ता हृदयोष्णा दाहिपितकृत।
दीपना कष्टकृच्छ् स्त्रार्श्व रुककफवातेजित।।
अर्थात् तुलसी कटु, तिक्त, हृदय के लिए हितकर, त्वचा के रोगों में लाभदायक, पाचन शक्ति को बढ़ाने वाली मूत्रकृच्छ के कष्ट को मिटाने वाली होती है। यह कफ और वात सम्बन्धी विकारों को ठीक करती है।
धन्वंतरि निघुंट में कहा गया है-
तुलसी लघु उष्णाच्य रूक्ष कफ विनाशिनी।
क्रिमिमदोषं निहंत्यैषा रुचि वृद्वंहिदीपनी।।

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तुलसी, हल्की, उष्ण रूक्ष, कफ दोषों और कृमि दोषों को मिटाने वाली अग्नि दीपक होती है।
* सामान्यतः तुलसी के दो ही भेद जाने जाते हैं जिन्हें रामा और श्यामा कहते हैं। रामा के पत्तों का रंग हलका होता है जिससे उसका नाम गौरी पड़ गया है। श्यामा अथवा कृष्णा तुलसी के पत्तों का रंग गहरा होता है और उसमें कफनाशक गुण अधिक होता है। इसलिए औषधि के रूप में प्रायः कृष्णा तुलसी का ही प्रयोग किया जाता है। इसकी गंध व रस में तीक्ष्णता होती है। तुलसी की अन्य कई प्रजातियाँ होती हैं। एक प्रजाति ‘वन तुलसी’ है जिसे ‘कठेरक’ भी कहते हैं। इसकी गंध घरेलू तुलसी की अपेक्षा कम होती है और इसमें विष का प्रभाव नष्ट करने की क्षमता होती है। रक्त दोष, नेत्रविकार, प्रसवकालीन रोगों की चिकित्सा में यह विशेष उपयोगी होती है। दूसरी जाति को ‘मरुवक’ कहते हैं। राजा मार्तण्ड ग्रन्थ में इसके लाभों की जानकारी देते हुए लिखा गया है कि हथियार से कट जाने या रगड़ लगकर घाव हो जाने पर इसका रस लाभकारी होता है। किसी विषैले जीव के डंक मार देने पर भी इसका रस लाभकारी होता है। तीसरी जाति बर्बरी या बुबई तुलसी की होती है, इसकी मंजरी की गंध अधिक तेज होती है। इसके बीज अत्यधिक वाजीकरण माने गए हैं।
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* अनेक हकीमी नुस्खों में इनका प्रयोग होता है। वीर्य की वृद्धि करने व पतलापन दूर करने के लिए बर्बरी जाति की तुलसी के बीजों का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा तुलसी की एक कृमिनाशक जाति भी होती है।
जैसा नाम वैसा गुण:–
तुलसी के कई नाम हैं जो इसके गुणों का इतिहास बताते हैं। वेदों, औषधि-विज्ञान के ग्रंथों और पुराणों में इसके कुछ प्रमुख नाम-गुण इस प्रकार हैं-
* कायस्था--क्योंकि यह काया को स्थिर रखती है।
* तीव्रा–क्योंकि यह तीव्रता से असर करती है।
* देव-दुन्दुभि–इसमें देव-गुणों का निवास होता है।
* दैत्यघि- -रोग-रूपी दैत्यों का संहार करती है।
* पावनी- -मन, वाणी और कर्म से पवित्र करती है।
* पूतपत्री- -इसके पत्र (पत्ते) पूत (पवित्र) कर देते हैं।
* सरला-– हर कोई आसानी से प्राप्त कर सकता है।
* सुभगा- -महिलाओं के यौनांग निर्मल-पुष्ट बनाती है।
* सुरसा-– यह अपने रस (लालारस) से ग्रन्थियों को सचेतन करती है।
शोभा, सुगन्धि और पवित्रता की प्रतीक है ये —
तुलसी का पौधा जिस आंगन में लहलहाता है, उसकी शोभा और सुगन्धि में पवित्रता होती है। महिलाएं अपना चरित्र तुलसी-जैसा बनाने में ही अपना जीवन सार्थक मानती हैं।
इसीलिए विनम्र भाव से वे कहती हैं- ‘‘मैं तुलसी तेरे आंगन की।’’
तुलसी का माहात्म्य:–
1 यह मन में बुरे विचार नहीं आने देती।
2 रक्त-विकार शान्त करती है।
3 त्वचा और छूत के रोग नहीं होने देती।
4 तुलसी की कंठी माला कंठ रोगों से बचाती है।
5 कामोत्तेजना नहीं होने देती, नपुंसक भी नहीं बनाती।
6 तुलसी-दल चबाने वाले के दांतों को कीड़ा नहीं लगता।
7 तुलसी के सेवक को क्रोध कम आता है।
8 तुलसी की माला, कंठी, गजरा और करधनी पहनना शरीर को निर्मल, रोगमुक्त और सात्विक बनाता है।
9 कार्तिक महीने में जो तुलसी का सेवन करता है, उसे साल भर तक डॉक्टर-वैद्य, हकीम के पास जाने की जरूरत नहीं पड़तीं।
10 तुलसी को अंधेरे में तोड़ने से शरीर में विकार आ सकते हैं क्योंकि अंधकार में इसकी विद्युत लहरें प्रखर हो जाती हैं।
11 तुलसी का सेवन करने के बाद दूध न पीएं। इससे चर्म-रोग हो सकते हैं।
12 कार्तिक महीने में यदि तुलसी-दल या तुलसी-रस ले चुकें हों तो उसके बाद पान न खाएं। ये दोनों गर्म हैं और कार्तिक में रक्त-संचार भी प्रबलता से होता है, इसलिए तुलसी के बाद पान खाने से परेशानी में पड़ सकते हैं।
13 तुलसी-दल के जल से स्नान करके कोढ़ नहीं होता।
14 सूर्य-चन्द्र ग्रहण के दौरान अन्न-सब्जी में तुलसी-दल इसलिए रखा जाता है कि सौरमण्डल की विनाशक गैसों से खाद्यान्न दूषित न हो।
15 जीरे के स्थान पर पुलाव आदि में तुलसी रस के छींटे देने से पौष्टिकता और महक में दस गुना वृद्धि हो जाती है।
16 तेजपात की जगह शाक-सब्जी आदि में तुलसी-दल डालने से मुखड़े पर आभा, आंखों में रोशनी और वाणी में तेजस्विता आती है।
17 तेल, साबुन, क्रीम और उबटन में तुलसी, दल और तुलसी रस का उपयोग, तन-बदन को निरोग, सुवासित, चैतन्य और कांतिमय बनाता है।
18 स्वभाव में सात्विकता लाने वाला केवल यही पौधा है।
19 तुलसी केवल शाखा-पत्तों का ढेर नहीं, आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है।
20 तुलसी के आगे खड़े होकर पढ़ने, विचारने दीप जलाने और पौधे की परिक्रमा करने से दसों इन्द्रियों के विकार दूर होकर मानसिक चेतना मिलती है।
सामान्य ज्वर:-
इसमें शरीर का तापमान 102-103 डिग्री हो जाता है। बेचैनी, शरीर में दर्द, प्यास का अधिक लगना, सिर-हाथ-पैरों में पीड़ा।
गर्मी या धूप में अधिक घूमना, थकावट, पेट में दर्द, सर्दी-गर्मी के प्रभाव से यह रोग हो सकता है। दस तुलसी के पत्ते, बीस काली मिर्च, पांच लौंग, थोड़ी-सी सोंठ पीसकर ढाई सौ मिलीलीटर पानी में उबाल लें और शक्कर मिलाकर रोगी को पिला दें। अगर रोगी को ज्वर के कारण घबराहट महसूस होती हो तो तुलसी के रस में शक्कर डालकर शरबत बना लें और रोगी को पिला दें। शीघ्र आराम मिलता है।
मौसमी बुखार:-
* बरसात या मौसम बदलने से रक्त संचार पर भला-बुरा असर पड़ता ही है और ज्वर के रूप में हमारे अंदर घंटी बजा देता है। तुलसी की दस ग्राम जड़ लेकर पानी में उबालिए और पी जाइए दो-तीन दिन सुबह-शाम इस उपचार से रक्त-साफ स्वच्छ हो जाएगा।
पुराना बुखार:-
* पुराना बुखार हो तो फेफड़े कमजोर होने लगते हैं, खांसी उठती रहती है, छाती में दर्द भी होता है।
तुलसी रस में मिश्री घोलकर तीन-तीन घंटे बाद तीन दिन तक पिलाए। ज्वर भी उतर जाएगा और खांसी व दर्द भी जाते रहेंगे।
सर्दी बुखार:-
* पांच तुलसी-दल और पांच काली मिर्च पानी में पीसकर पिलाएं। तुलसी-मिर्च का वह चूर्ण ढाई सौ ग्राम पानी में उबालकर पिलाने से तुरन्त असर होता है। आधे-आधे घंटे बाद दो बडे़ चम्मच पिलाते रहने से निश्चित लाभ होता है।
खांसी बुखार:-
* दस ग्राम तुलसी-रस, बीस ग्राम शहद और पांच ग्राम अदरक का रस मिलाकर एक बड़ा चम्मच भर कर पिला दें। अद्भुत योग है, आजमाकर देख लें।
* ग्यारह पत्ते तुलसी और ग्यारह दाने काली मिर्च, दोनों को पानी में पीसकर छान लें। इधर आग पर मिट्टी का खाली सकोरा पकाकर लाल कर दें और उसमें तुलसी काली मिर्च का घोल छौंक दें। यह घोल गुनगुना रह जाने पर काला नमक मिलाकर पिला दें। खांसी बुखार समूल निकल भागेंगे।
* दो ग्राम तुलसी पत्ते, दो ग्राम अजवायन पीसकर पचास ग्राम पानी में घोलकर पिला दें। सुबह-शाम पिलाएं।
मलेरिया:-
* तुलसी का रस, मंजरी, तुलसी-माला, तुलसी के पौधे और तुलसी-बीज मलेरिया को काटकर फेंक देते हैं। तुलसी-रस दस ग्राम और पिसी काली मिर्च एक ग्राम मिलाकर रोगी को दिन में पांच-छह बार दो-दो घंटे बाद पिलाते रहें। परेशानी से बचना चाहें तो तुलसी के दो सौ ग्राम रस में सौ ग्राम काली मिर्च मिलाकर रख दें। सुबह-दोपहर-शाम एक-एक चम्मच पिलाएं।
पुराना मलेरिया:-
* सात तुलसी-दल और सात काली मिर्च दोनों दाढ़ के नीचे रखकर चूसते रहें दिन में तीन-चार बार यही प्रक्रिया दोहराने से महीनों पुराना मलेरिया भी भाग जाएगा।
लगातार बुखार रहना:-
* जलकुम्भी के फूल, काली मिर्च और तुलसी-दल, तीनों समान मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें और प्रातः-सायं पिलाएं।
* तुलसी-दल दस ग्राम लेकर पांच दाने काली मिर्च के साथ घोट लें और दिन में तीन बार सेवन कराएं। आन्तरिक सफाई होते ही बुखार का नामोनिशान भी नहीं रहेगा।
सन्निपात:-
* ज्वर इतने जोर का बढ़ जाए कि आदमी बड़बड़ाने लगे, ऐसी स्थिति में तुलसी, बेल (बिल्व) और पीपल के पत्तों का काढ़ा उबालें। जब पानी ढाई-तीन सौ ग्राम बच जाए तो शीशी में भर लें। दस-दस ग्राम दो-दो घंटे बाद रोगी का पिलाते रहें। निश्चित ही लाभ होगा।
लू लगना:-
* एक चम्मच तुलसी-रस में देशी शक्कर मिलाकर एक-एक घंटे बाद देते रहें। यह न समझें कि तुलसी-रस गर्म होने से हानि पहुंचाएगा। संजीवनी शक्ति जिस कन्दमूल में भी होगी, वह गर्म ही होगा। आराम आने के बाद भी धूप में निकलना हो तो तुलसी रस में नमक मिलाकर पीएं इससे लू लगने की आशंका ही नहीं रहेगी। प्यास भी कम लगेगी और चक्कर भी नहीं आएंगे।
टूटा-टूटा बदन:-
* उपचार-तुलसी दल की चाय बनाकर पीएं आपके बदन में ताजगी की लहरें दौड़ने लगेंगी। घर में अगर चाय की पत्ती की जगह तुलसी दल सुखाकर रख लें तो कफ, सर्दी, जुकाम, थकान और बुखार या सिर-दर्द पास भी नहीं फटकेंगे।
श्वसन संस्थान के रोग:-
* प्रदूषण के साथ ही दिनचर्या व खानपान का अव्यवस्थित होना मुख्य रूप से फेफड़ों से संबंधित रोगों के कारण है। बिना किसी पूर्व योजना के बने फ्लैट्स और मकानों में खुली हवा के न होने से भी फेफड़े रोगग्रस्त होते हैं।
जुकाम:-
* छोटी इलायची के कुल दो दाने और एक ग्राम तुलसी बौर (मंजरी) डालकर काढ़ा बनाएं और चाय की तरह दूध-चीनी डालकर पिला दें। दिन में चार-पांच बार भी पिला देंगे तो खुश्की नहीं करेगी, मगर सर्दी-जुकाम को जड़ से ही गायब कर देगी।
* तुलसी के पत्ते छः ग्राम सोंठ और छोटी इलायची छः-छः ग्राम, दालचीनी एक ग्राम पीसकर चाय की तरह उबाल लें। थोड़ी-सी शक्कर डाल लें। दिन में इस चाय का चार बार बनाकर पीएं। कुछ खाएं नहीं जुकाम कैसा भी हो ठीक हो जाएगा।
यदि जुकाम के साथ बुखार भी हो तो चाय के अलावा तुलसी के पत्तों का रस निकालकर उसमें शहद मिलाकर दिन में चार बार सेवन करें। जुकाम के कारण होने वाला ज्वर शान्त हो जाएगा।
* दालचीनीं, सोंठ और छोटी इलायची, कुल एक ग्राम, तुलसी-दल, छह ग्राम, इन्हें पीसकर चाय बनाएं और पीएं। दिन में ऐसी चाय चार बार भी ले सकते हैं। उस रात पेट भरकर खाना न खाएं। अगली सुबह आराम आ जाएगा।
शीघ्र पतन एवं वीर्य की कमी:-
* तुलसी के बीज 5 ग्राम रोजाना रात को गर्म दूध के साथ लेने से समस्या दूर होती है।
नपुंसकता:–
* तुलसी के बीज 5 ग्राम रोजाना रात को गर्म दूध के साथ लेने से नपुंसकता दूर होती है और यौन-शक्ति में बढोतरि होती है।
मासिक धर्म में अनियमियता:-
* जिस दिन मासिक आए उस दिन से जब तक मासिक रहे उस दिन तक तुलसी के बीज 5-5 ग्राम सुबह और शाम पानी या दूध के साथ लेने से मासिक की समस्या ठीक होती है और जिन महिलाओ को गर्भधारण में समस्या है वो भी ठीक होती है
* तुलसी के पत्ते गर्म तासीर के होते है पर सब्जा शीतल होता है . इसे फालूदा में इस्तेमाल किया जाता है . इसे भिगाने से यह जेली की तरह फुल जाता है . इसे हम दूध या लस्सी के साथ थोड़ी देशी गुलाब की पंखुड़ियां दाल कर ले तो गर्मी में बहुत ठंडक देता है .इसके अलावा यह पाचन सम्बन्धी गड़बड़ी को भी दूर करता है .यह पित्त घटाता है ये त्रीदोषनाशक , क्षुधावर्धक है ।
तुलसी के सेवन में सावधानी।
तुलसी का सेवन करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। तुलसी का उपयोग करने के तत्काल बाद दूध नहीं पीना चाहिए। उससे कई रोग पैदा हो जाते हैं। अनेक आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन दूध के साथ बताया गया है लेकिन तुलसी का सेवन गंगाजल, शहद या फिर सामान्य पानी के साथ बताया गया है।
आयुर्वेद के मतानुसार, यदि कार्तिक मास में प्रातःकाल निराहार तुलसी के कुछ पत्तों का सेवन किया जाए तो मनुष्य वर्ष भर रोगों से सुरक्षित रहता है।

खुनी बवासीर का एक दिन में इलाज।

अगर आप बवासीर से परेशान हैं चाहे वो खुनी हो चाहे बादी, तो ये प्रयोग आपके लिए रामबाण से कम नहीं हैं। इस प्रयोग से पुरानी से पुरानी बवासीर 1 से 3 दिन में सही हो जाएगी। इस इलाज से एक दिन में ही रक्तस्राव बंद हो जाता है। बड़ा सस्ता व सरल उपाय है। एक बार इसको ज़रूर अपनाये। आइये जाने ये प्रयोग।
नारियल की जटा से करे खुनी बवासीर का एक दिन में इलाज।
नारियल की जटा लीजिए। उसे माचिस से जला दीजिए। जलकर भस्म बन जाएगी। इस भस्म को शीशी में भर कर ऱख लीजिए। कप डेढ़ कप छाछ या दही के साथ नारियल की जटा से बनी भस्म तीन ग्राम खाली पेट दिन में तीन बार सिर्फ एक ही दिन लेनी है। ध्यान रहे दही या छाछ ताजी हो खट्टी न हो। कैसी और कितनी ही पुरानी पाइल्स की बीमारी क्यों न हो, एक दिन में ही ठीक हो जाती है।
यह नुस्खा किसी भी प्रकार के रक्तस्राव को रोकने में कारगर है। महिलाओं के मासिक धर्म में अधिक रक्तस्राव या श्वेत प्रदर की बीमारी में भी कारगर है। हैजा, वमन या हिचकी रोग में यह भस्म एक घूँट पानी के साथ लेनी चाहिए। ऐसे कितने ही नुस्खे हिन्दुस्तान के मंदिरों और मठों में साधु संन्यासियों द्वारा आजमाए हुए हैं। इन पर शोध किया जाना चाहिए।


दवा लेने के एक घंटा पहले और एक घंटा बाद तक कुछ न खाएं तो चलेगा। अगर रोग ज्यादा जीर्ण हो और एक दिन दवा लेने से लाभ न हो तो दो या तीन दिन लेकर देखिए।
हम आपके लिए भारत के कोने कोने से आयुर्वेद के अनसुने चमत्कार ले कर आते हैं, आप भी इनको शेयर कर के ज़्यादा से ज़्यादा लोगो तक पहुंचाए। और ज़्यादा से ज़्यादा लोगो को पेज लाइक करने के लिए कहे।
विशेष
1. बवासीर से बचने के लिए गुदा को गर्म पानी से न धोएं। खासकर जब तेज गर्मियों के मौसम में छत की टंकियों व नलों से बहुत गर्म पानी आता है तब गुदा को उस गर्म पानी से धोने से बचना चाहिए।
2. एक बार बवासीर ठीक हो जाने के बाद बदपरहेजी ( जैसे अत्यधिक मिर्च-मसाले, गरिष्ठ और उत्तेजक पदार्थो का सेवन ) के कारण उसके दुबारा होने की संभावना रहती है। अत: बवासीर के रोगी के लिए बदपरहेजी से परम आवश्यक है।

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