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शर्म के कारण नहीं कह पाती महिलाएं...

शर्म के कारण नहीं कह पाती महिलाएं...




स्त्री-पुरुष के बीच शारीरिक संबंधों को लेकर कई शोध हो चुके हैं। भारत में संभोग सिर्फ शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि काम कला का एक रूप भी है, लेकिन पुरुष प्रधान समाज में औरतों को कई समस्याओं से जूझना पड़ता है। यही वजह है कि कई बार भारतीय महिलाएं अपने मन की बात जुबां पर नहीं ला पातीं। झिझक की वजह से अधिकांश औरतें सेक्स संबंधी बातें जल्दी किसी से शेयर नहीं कर पातीं।

महिलाएं सेक्स के लिए खुद शुरुआत नहीं करतीं तो इसका मतलब यह नहीं है कि वे शारीरिक संबंध नहीं चाहतीं। दरअसल, शर्मीली स्वभाव की महिलाएं दिल के अरमानों को जाहिर करने से कतराती हैं।
पूर्ण संतुष्टि का एहसास नहीं होना


महिलाओं में यह शिकायत आम है कि उनका पार्टनर उन्हें संतुष्ट किए बिना ही छोड़ देता है। दरअसल, इस समस्या की वजह महिला और पार्टनर, दोनों हो सकते हैं। आमतौर पर महिलाओं को लगता है कि पार्टनर को संतुष्ट करना ही उनकी जिम्मेदारी है। इस सोच की वजह से वह अपनी इच्छा नहीं बता पाती। दूसरी तरफ, पुरुष भी कई बार खुद संतुष्ट होने के बाद महिला साथी के बारे में नहीं सोचते है।
सेक्स की चाहत नहीं होना

डिप्रेशन, थकान और कुछ दूसरी वजहों से यह दिक्कत हो सकती है। कई बार बचपन की किसी बुरी याद की वजह से भी सेक्स में दिलचस्पी खत्म हो जाती है। इसके अलावा, कई महिलाओं को अपने पार्टनर के छूने का तरीका भी पसंद नहीं आता।
काम कला की जानकारी न होना


भारतीय महिलाएं सामान्यत: पोर्न के बारे में जानती ही नहीं हैं। वहीं, पुरुष अश्लील साहित्य पढ़कर या एडल्ट मूवी देखकर जब वैसा ही कुछ शारीरिक संबंधों के दौरान दोहराने की कोशिश करते हैं तो महिलाओं को बहुत शॉक लगता है। इसलिए, संबंधों के दौरान साधारण पोजिशन ही अपनाएं।
माहवारी के दौरान सेक्स


एक धारण बनी हुई है कि पीरियड्स के दौरान सेक्स नहीं करना चाहिए। अगर दोनों की इच्छा हो तो पीरियड्स के दौरान भी सेक्स कर सकते हैं, बल्कि कुछ लोग तो इसे ज्यादा सेफ मानते हैं, क्योंकि इस दौरान प्रेग्नेंसी के चांस नहीं होते। साथ ही, कुछ लोग इसे हाइजिनिक नहीं मानते। ऐसे में कन्डोम का इस्तेमाल बेहतर है।
पारिवारिक माहौल


कई बार संयुक्त परिवार में रहने वाले कपल्स को एकांत आसानी से नहीं मिल पाता। किसी भी संबंध से जुड़े दोनों पक्षों के लिए यह आवश्यक है कि सभी कार्य सुचारु रूप से चलें। संबंधों में भी मिठास बनी रहे। इस मामले में पुरुषों की अपेक्षाएं महिलाओं से कुछ ज्यादा ही होती हैं। इसे एक कामकाजी महिला के लिए निभा पाना मुश्किल होता है।
महिलाओं में सेक्स इच्छा कम


महिलाओं को भी पुरुषों की तरह ही सेक्स की इच्छा होती है। बच्चे होने के बाद भी यह इच्छा कम नहीं होती। हालांकि, कई बार परफॉर्मेंस में कमी आ जाती है। इसकी शारीरिक और मानसिक दोनों वजहें होती हैं।
सेक्स करें स्वस्थ रहें







सेक्स सिर्फ रति निष्पत्ति से मिलने वाले वाले आनंद का माध्यम मात्र नहीं हैं वरन सेक्स बेहतर स्वास्थ्य का कारण भी बन सकता है। चिकित्सकीय अनुसंधान से भी यह साबित हो चुका है कि बेहतर स्वास्थ्य के लिये सेक्स महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। सेक्स से जहां शारीरिक स्फूर्ति बनी रहती है बल्कि कई बीमारियों को भी ठीक करने में सहायक है। इसके अलावा मानसिक तनाव दूर करने का भी बेहतर साधन है सेक्स । कुल मिलाकर सेक्स स्वास्थ्य के लिये काफी लाभदायक है।
तनाव से मुक्ति


आज की भागमभाग जिंदगी में स्वास्थ्य संबंधी मामलों में सबसे बड़ी समस्या तनाव की है। अक्सर मानसिक तनाव के अतिरेक में कई बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं या फिर गलत कदम उठा लेते हैं। चिकित्सा शास्त्रियों का मानना है कि सेक्स क्रिया के दौरान एंड्रोफस नामक हार्मोन का स्त्राव होता है जो तनावमुक्ति में सहायक होता है। ठीक इसी तरह सेक्स क्रिया के दौरान फिनीलेथलमाइन नामक रसायन भी निकलता है। यह रसायन दिमाग को स्वस्थ होने का भाव भेजता है जिससे मानव में स्वस्थ होने की भावना उत्पन्न होती है, जिससे शरीर स्वस्थ व तनाव मुक्त महसूस करता है।
हड्डियां होती हैं मजबूत


नियमित रूप से सहवास करने पर शरीर की हड्डियां भी मजबूत होती है। सेक्सॉलाजिस्ट व चिकित्सकों की माने तो नियमित सेक्स से हार्मोन एस्ट्रोजन का स्तर बढ़ जाता है। इस बजह से महिलाओं की हड्डियों में आने वाली कमजोरी ऑस्टियोपॉरिसिस रोग में लगाम लगने लगती है, साथ ही इस रोग के होने की संभावना कम होने लगती है।
आयु बढ़ती है

नियमित सेक्स करने वाले लंबी आयु के मालिक होते है ऐसा कई परीक्षणों और सर्वे से सिद्ध हो चुका है। जो लोग नियमित तौर से संभोग करते हैं और जिनके मन में सेक्स को लेकर किसी तरह की शंका नहीं होती और सेक्स का अंदाज बेफ्रिक होता है वे उन लोगों की अपेक्षा ज्यादा लंबी आयु पाते हैं जो महीने में एक बार सेक्स करते हैं।
दर्द निवारक है सेक्स

सेक्स क्रिया एक बेहतरीन प्राकृतिक दर्द निवारक का भी काम करती है। चूंकि सेक्स क्रिया के दौरान एंड्रोफिंस हार्मोन निकलता है जो दर्द कम करने का कार्य करता है। इसी तरह सेक्स के दौरान बढऩे वाली एस्ट्रोजन की मात्रा भी प्री मेन्सुट्रुअल सिन्ड्रोम और मासिक स्त्राव के समय होने वाली परेशानियों से बचाती है। कई बार अनियमित मासिक चक्र भी नियमित हो जाता है। सेक्सोलॉजिस्ट बताते हैं कि सेक्स करने से आर्थराइटिस से पीडि़त महिलाओं को काफी आराम मिलता है। सेक्स से सिरदर्द और माइग्रेन तक दूर हो जाता है। वहीं कुछ चिकित्सक तो यहां तक कहते हैं कि सेक्स करने से सर्दी जुकाम तक नहीं होता हां यह अलग है सर्दी जुकाम में सेक्स न करने की भी सलाह दी जाती है।
निद्रारोग से बचाता है


सेक्स के दौरान ऑक्सीटोसिन हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है, जिसका शरीर को काफी बेहतर अहसास होता है और चैन की नींद आती है। दूसरा सेक्स के बाद चिंता व तनाव न होने से भी नींद बेहतर ही आती है। दूसरी ओर सेक्स का प्रभाव इस मामले में पुरुषों में ज्यादा पड़ता है इसलिये ज्यादातर पुरुष सेक्स के बाद सोना पसंद करते हैं।
यौवन बरकरार

एक चिकित्सकीय सर्वेक्षण से सिद्ध हुआ है कि वे दंपति जो सप्ताह में तीन बार सहवास करते हैं वे उन लोगों की अपेक्षा ज्यादा युवा दिखते हैं जो कभी-कभी सेक्स करते हैं या नहीं करते हैं। इसके कारणों के बारे में बताया गया है कि सेक्स क्रिया में जो ऊर्जा लगती है उससे ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है तथा रक्त प्रवाह तीव्र होने के साथ रक्त का संचार त्वचा में भी तेजी से होने लगता है जिससे त्वचा में नई कोशिकाएं बनती हैं। इस वजह से त्वचा में एक नहीं कांति या चमक पैदा होती है। वहीं दूसरी और वे महिलाएं जिनको रजोनिवृत्ति हो चुकी है अगर सहवास क्रिया करती रहती हैं तो उन्हें गर्मी या पसीना आने की शिकायत नहीं रहती है। ऐसी महिलाओं पर आयु का ज्यादा प्रभाव भी नहीं पड़ता है।
शक्तिवर्धक है सेक्स


सेक्स उत्तेजना के दौरान ताजा खून सारे शरीर में तेजी से दौडऩे लगता है। यहां तक कि यह प्रवाह दिमाग में भी होता है। इससे उस क्षेत्र में रक्त संचार बढ़ जाता है। इस वजह से धमनियां मजबूत होती हैं साथ ही मस्तिष्क की कार्यक्षमता बढऩे से वह ज्यादा कठिन काम कर सकता है। रक्त संचार में वृद्धि विभिन्न शारीरिक दुर्बलताओं को दूर करती है।
हार्ट अटैक से बचाता है

चिकित्सकीय अनुसंधानों से स्पष्ट हो चुका है और हृदय रोग विशेषज्ञों का कहना है कि सप्ताह में तीन बार कम से कम 20 मिनट तक सेक्स क्रिया करने से हार्ट अटैक का खतरा कम हो जाता है, साथ ही हृदय गति में भी सुधार होता है। चिकित्सको की माने तो उनका कहना है कि सेक्स के दौरान हृदय के स्पंदन की गति सेक्स के दौरान तेज हो जाती है और पूरे शरीर में खून की गति बढ़ जाने से जहां तहां थोड़ा बहुत अवरोध होता है वह साफ हो जाता है।
व्यायाम भी है सेक्स

एक तरफ जहां व्यायाम करने से आपके सेक्स जीवन में सुधार आता है वहीं यह खुद एक प्रभावशाली व्यायाम है। सेक्स मांसपेशियों की टोनिंग करने में मदद करता है। तीस मिनट की सेक्स प्रक्रिया के दौरान एक आम व्यक्ति की करीब दो सौ कैलोरी खर्च होती हैं, यानी अगर आप प्रतिदिन इसे करते हैं तो हर दो हफ्ते बाद आपका आधा किलो वजन घट सकता है। अगर आप एक साल तक हफ्ते में तीन बार इसे करते हैं तो यह दो सौ किलोमीटर दौडऩे के बराबर होता है। 


गर्मियों में कैसे रखें बालों को खुबसूरत








गर्मियों में बाल बेजान हो जाते हैं, रूसी और बाल झडऩे की परेशानी भी बढ़ जाती है। दरअसल गर्मी में तेज धूप से बहुत पसीना बनता है और त्वचा की नमी बढ़ जाती है। त्वचा के छिद्र अधिक खुल जाते हैं, जिनसे पसीना निकलता है, लेकिन इससे त्वचा की जड़ कमज़ोर पड़ जाती है।

चूंकि सिर की ऊपरी त्वचा पर नमी रहती है, इसलिए बालों के गिरने का खतरा बढ़ जाता है। नमी के कारण खुजली होती है। बार-बार खुजलाने से समस्या बिगड़ती जाती है और बाल गिरने लगते हैं।

बेशक बाल गिरने की समस्या गर्मियों में बढ़ती है, पर यह पूरे साल सताने वाली एक आम समस्या है। बालों की समस्या के कई कारण हैं। हालांकि मुख्यत: दो कारण देखे जाते हैं- आनुवांशिक और खान-पान की समस्या। बाल बढऩे में भी इन कारणों की खास अहमियत है। बाल गिरने के कुछ अन्य कारण भी हैं, जैसे खाने में अधिक मीठा लेना, हानिकारक रसायन युक्त शैम्पू और कंडीशनर का उपयोग, चिंता, तनाव आदि।

कंघी करते हुए दो-चार बाल हाथ आ जाएं तो घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह एक सामान्य प्रक्रिया है। हर दिन 45 से 60 बालों का गिरना स्वाभाविक है। इनकी जगह नए बाल उग आते हैं, लेकिन हर दिन औसत 60 से अधिक बाल गिरने लगे तो चिकित्सक से परामर्श लेना आवश्यक हो जाता है।

सबसे पहले तो आप बालों को नियमित रूप से धोएं। गर्मियों के दिनों में तो बार-बार धोना चाहिए, क्योंकि विलंब करने से सिर की त्वचा तैलीय रह जाती है, बहुत अधिक बाल गिरने लगते हैं, रूसी की समस्या घेर लेती है और बाल रुखे हो जाते हैं। एक अन्य महत्वपूर्ण बात है शैम्पू का चयन, माइल्ड शैंपू का उपयोग करें। बेबी शैम्पू का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

यूं तो बाल गिरना बुढ़ापे की निशानी है, पर आज युवाओं में भी यह आम समस्या है। कम उम्र में बाल गिरने से कभी-कभी निराशा घेर लेती है। कई लोग बाल गिरने के बाद खुद को यार-दोस्तों के बीच जाने के काबिल नहीं मानते हैं। इससे उनमें इतनी हीन भावना आ जाती है कि वे स्वाभिमान खो बैठते हैं और खुद को कम आंकने लगते हैं।

ड्राय स्किन की घर पर ही करें फेशियल




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त्वचा को स्वस्थ रखना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। फेशियल और क्लीनअप त्वचा को तरोताजा रखने के सर्वश्रेष्ठ उपाय के रूप में सामने आए हैं। फेशियल त्वचा की सतह से रोमकूपों की गहराईयों तक में जाकर उसे साफ और स्वच्छ करता है साथ ही त्वचा का पोषण भी करता है। क्लीनअप से चेहरे की त्वचा की सफाई होती है, मृत त्वचा निकल जाती है और नमी लौट आती है।
कैसे करें घर पर चेहरे की सफाई


क्लीन्जिंग- इससे त्वचा की गहराईयों से धूल मिट्टी के अंश पूरी तरह निकल जाते हैं। इसे करने से पहले मेकअप पूरी तरह हटा दें. ठंडा दूध, क्रीम , या बेबी ऑइल के प्रयोग से सूखी त्वचा की क्लीन्जिंग की जा सकती है।

ब्लीचिंग- जब भी माईल्ड ब्लीचिंग की जाती है तो चेहरे की त्वचा पर मौजूद डेड सेल्स हट जाते हैं साथ ही चेहरे पर महीन बाल भी ब्लीच हो जाते हैं। याद रखें की सुखी त्वचा को ब्लीच करने से हालात और खराब हो सकते हैं।

एक्सफोलिएट- घर पर बने स्क्रब से हल्का एक्सफोलिएशन होता है जिससे धूल, मिट्टी, और मृत सेल्स त्वचा से हट जाते हैं। आप इन्हें आजमा सकती हैं-

स्टीमिंग- इसे घर पर ही कर सकते हैं लेकिन यह ध्यान रहे कि इसे अधिक समय तक और बार-बार नहीं करना है। स्टीमिंग से फायदा यह है कि चेहरे की त्वचा की रक्त नलिकाएं चौड़ी होकर फूल जाती हैं। इससे रक्तचाप अधिक तेजी से होने लगता है। इससे चेहरे का मैल, तेल, और रोमकूपों के अवरोध निकल जाते हैं। ब्लेक हैड्स को निकालना आसान हो जाता है। चूंकि चेहरे की त्वचा से मृत त्वचाकण निकल जाते हैं इसलिए इस पर लगाई गई कोई औषधी क्रीम भी अच्छा असर करती है।

मसाज- अपने चेहरे को 10 मिनट तक हल्के हाथ से मसाज दीजिए। स्ट्रोक्स लय में होना चाहिए। इससे चेहरे की मांसपेशियां शिथिल हो जाती हैं और रक्त की आपूर्ति अच्छी होने लगती है। इससे एजिंग प्रोसेस धीमी पड़ जाती है और झुर्रियां कम हो जाती हैं।

चेहरे के मसाज के बाद ये फेसमॉस्क इस्तेमाल करें। यूं तो बाजार में हर तरह के फेसमॉस्क मिलते हैं लेकिन घर पर आसानी से बनाया जा सकता है।
घर पर बनाएं ये क्लीन्जर 
खोपरे का दूध न सिर्फ त्वचा का सूखापन कम करेगा बल्कि डॉर्क स्पाट्स और झाइयों से भी मुकाबला करेगा। 
दूध की क्रीम या वेजिटेबल कुकिंग ऑइल से चेहरे की सफाई कर सकते है। 
एक चौथाई खीरा ककड़ी, 2 चम्मच दही, और 2 चम्मच पका हुआ ओटमील मिलाकर सफाई की जा सकती है। 
घरेलू मॉइस्चराईजर कैसे बनाएं 
दूध की मलाई एक बहुत अच्छा मॉइस्चराईजर है। इसमें नींबू के रस की चंद बूंदें मिला लें। इससे त्वचा में नमी लौट आएगी। 
दही चेहरे की त्वचा की देखभाल करने वाला एक प्रमुख रसायन है। यह त्वचा की नमी लौटाता है, इसकी एंटीऑक्सीडेंट और एंटीइंफ्लामेटरी प्रॉपर्टीज त्वचा को चिकनी बनाने में प्रमुख भूमिका निभाती है। 
शहद एक लाजवाब स्किन मॉइस्चराईजर है। इसे लगाकर थोड़ी देर चेहरे पर रहने दें, बाद में धो लें। त्वचा निखर उठेगी। 
गवांरपाठे का पल्प चेहरे पर 20 मिनट तक लगाकर रखें बाद में धो लें। 
नींबू की चंद बूंदों में ग्लीसरीन मिलाकर लगा लें। यह भी एक अच्छा एक्सफोलिएटिव है। 
पका हुआ ओटमील, शहद और केले का पल्प मिलाकर चेहरे पर लगाएं। यह सूखी त्वचा के लिए वरदान है। 
घरेलू स्क्रब्स से कैसे करें चेहरे की सफाई 
थोड़ा गेहूं का आटा लें अंदाज से और इसमें दूध की मलाई तथा गुलाबजल मिला लें। इसे घोंटकर पैक की तरह कर लें. इसे चेहरे की त्वचा पर रगड़कर लगाएं। इससे चेहरे की त्वचा से मृत त्वचा बाहर निकल जाएगी। 
मूली को किस लें और चेहरे पर थोड़ी देर के लिए फैला कर रख लें। यह एक माइल्ड ब्लीचिंग एजेंट है। इससे त्वचा निखर उठेगी। 

तरबूज का शरबत



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तरबूज का शरबत बहुत ही स्वादिष्ट होता है। यह हमें चिपचिपी गर्मी, धूप, लू, उमस, आदि में ठंडक देने का काम करता है। उत्तर भारत में तो लोग इसके बारे में कम ही जानते हैं, लेकिन मुंबई में यह हर जगह मिलता है और लोग इसे बहुत पसंद भी करते हैं। तो आइये आज हम भी मुंबई का मशहूर तरबूज का शरबत बनाते हैं।
सामग्री


तरबूज - 2- 2.1/2 कि.ग्रा.

नींबू - 1

बर्फ के क्यूब्स - 1 कप
विधि


तरबूज का शरबत बनाने के लिये सबसे पहले तरबूज को धोकर काटिये और फिर इसके मोटे हरे भाग को काट कर अलग कर दीजिये। अब लाल वाले भाग को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट कर मिक्सी में पीस लीजिये। थोड़ी देर बाद जब तरबूज का गूदा और रस बिल्कुल घुल जाए तब इस जूस को छलनी में छान लीजिये।

अब इस जूस में नींबू निचोड़ कर अच्छे से मिलाइये और फिर इसे गिलासों में डाल दीजिये। ठंडा करने के लिये इसमें अपने अनुसार बर्फ डाल दीजिये और चाहें तो गिलास में शरबत के ऊपर 1-2 पोदीने की पत्तियाँ भी सजा दीजिये (यदि आप को इसमें मीठा कम लग रहा हो तो आप अपने स्वादानुसार इसमें चीनी मिला कर इसे और अधिक मीठा भी कर सकते हैं, लेकिन चीनी मिलाने के बाद यह जूस अपना वास्तविक स्वाद खो देता है)।

ठंडा ठंडा तरबूज का शरबत तैयार है। अब इसे जितना मर्जी पीजिये और घर में सभी को पिलाइये।

यकीन मानिये इस शरबत को पीने के बाद आप बाजार में बिकने वाले बनाबटी रंग और स्वाद वाली रंगीन पानी की बोतलों को छुएंगे भी नहीं।

कैल्शियम की अधिक मात्रा भी स्वास्थ्य को नहीं सुहाती




कैल्शियम को हड्डियों के लिए बहुत ही उपयोगी माना जाता है, लेकिन शोधकर्ताओं ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि कैल्शियम की अत्यधिक मात्रा का स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है । कैल्शियम के सप्लिमेंट्स का अधिक मात्रा में सेवन करने के कारण कैल्शियम अल्कली या मिल्क अल्कली नामक समस्या हो सकती है।

इन दिनों लोग छरहरा दिखने के लिए खाना छोड़ कर गोलियों का सहारा ले रहे हैं, जो खतरनाक है। ऐसा करके हम प्राकृतिक टाइम टेबल के विपरीत काम कर रहे हैं। आहार की पूर्ति गोलियों से कर लेना बहुत ही आसान है, लेकिन इसके दुष्प्रभाव भी कुछ कम नहीं हैं । फल, सब्जी या भोजन के जरिये शरीर में विटामिन की क्षतिपूर्ति करना तो अच्छी बात है, लेकिन इसके लिए गोली का सहारा लेना आपको रोगी बना सकता है। हालिया अध्ययन से पता चला है कि शरीर में विटामिन का स्तर पर्याप्त बनाए रखने के लिए ज्यादा गोलियां खाना प्रोस्टेट कैंसर का खतरा बढ़ा देता है।
कैल्शियम की गोलियों के कुछ दुष्प्रभाव 
कैल्शियम की गोलियों के अतिरिक्त सेवन से रक्त में कैल्शियम की मात्रा बढ़ सकती है और यहां तक कि किडनी भी खराब हो सकती है । 
जिनके परिवार में प्रोस्टेट कैंसर से ग्रस्त रोगी होने का पुराना इतिहास रहा है, उन्हें मल्टीविटामिन का सेवन करने से कैंसर के होने का खतरा रहता है । 
मिल्क एल्कली सिन्ड्रोम के कारण हाइपरग्लाइसीमिया हो सकता है और अगर समय रहते इसकी चिकित्सा नहीं की गयी तो रीनल फेल्योर भी हो सकता है। 
स्वास्थ्य के लिए कुछ सावधानियां 
अगर आप कैल्शियम की गोलियां ले रहे हैं, तो रक्त में कैल्शियम की मात्रा की जांच करा लें । 
आस्टीयोपोरोसिस के मरीज़ों के लिए कैल्शियम की गोलियों लेना आवश्यक होता है, लेकिन उन्हें भी कैल्शियम की मात्रा ध्यान में रखनी चाहिए । 
चिकित्सक के परामर्श के अनुसार ही विटामिन की गोलियां लें। 

कैल्शियम से संबंधित भ्रम और तथ्य

कैल्शियम से सम्बन्धी चुनौती सदियों से चली आ रही है और यह स्थिति आज भी वैसी ही है। कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि कैल्शियम के पूरक लेने से हड्डियां मजबूत और स्वस्थ होती हैं और आस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारी के दूर रहने के साथ साथ हड्डियों के टूटने का भी खतरा कम होता है, लेकिन कुछ लोगों का ऐसा भी मानना है कि कैल्शियम के रूपक लेने से इनके अतिरिक्त प्रभाव होते हैं। इसलिए कैल्शियम से सम्बन्धी भ्रम का समाधान निकालने के लिए यहां कई प्रकार के भ्रम का समाधान निकाला जा रहा है।

प्रतिदिन मुझे किस मात्रा में कैल्शियम लेना चाहिए?

विशेषज्ञों के अनुसार एक वयस्क व्यक्ति (जिसकी उम्र 19 से 50 वर्ष हो) उसे दिनभर में लगभग 1,000 मिलीग्राम कैल्शियम लेना चाहिए और 50 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति को 1,200 मिलीग्राम कैल्शियम की मात्रा लेनी चाहिए।

यह मात्रा किसी भी प्रकार के कैल्शियम सा्रेत की हो सकती है जैसे डेयरी उत्पाद ,खाद्य पेय आदि लेकिन कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि दिन में लगभग 600 मीलिग्राम से 1000 मिली ग्राम ही बहुत है।

अगर मैं कैल्शियम के पूरक पर नहीं निर्भर होना चाहता तो मुझे किस मात्रा में कैल्शियम लेना चाहिए?

एक स्वस्थ आहार का अर्थ है दिन में 200 से 300 मिलीग्राम कैल्शियम लेना। इसमें फल और सब्जिय़ां होनी चाहिए जैसे बीज ,अनाज और हरी पत्तेदार सब्जिय़ां, लेकिन 1 कप दूध से शरीर में 300 मिलीग्राम कैल्शियम की मात्रा जुड़ जाती है और दही से 150 से 200 मिलाग्राम कैल्शियम।

सभी दूध के उत्पादों को अपने आहार में शामिल कर और कुछ मात्रा में फल और सब्जिय़ां लेने से शरीर में 600 से 800 मिलीग्राम कैल्शियम की आपूर्ति होती है।

अगर मैं कैल्शियम के पूरक लेना चाहूं तो इन्हें किस तरह से लेना चाहिए।

स्वास्थ्य चिकित्सकों का ऐसा मानना है कि कैल्शियम के पूरक कैल्शियम साइट्रेट या कैल्शियम कार्बोनेट से बने होते हैं।

कैल्शियम के पूरक जिनमें पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम कार्बोनेट होती है उन्हें खाने के बाद लेना चाहिए क्योंकि उन्हें पेट में मौजूद एसिड को अवशोषित करने की ज़रूरत होती है ा कैल्शियम साइट्रेट पेट में मौजूद एसिड पर निर्भर नहीं होता और इसलिए इसे दिन में किसी भी समय लिया जा सकता है ा

क्या कैल्शियम लेकर फ्रैक्चर से बचा जा सकता है ?

विशेषज्ञों का ऐसा मानना है कि बहुत अधिक मात्रा में कैल्शियम लेने का अर्थ यह नहीं है कि हमारे रक्त में अधिक मात्रा में कैल्शियम होगा ा अगर रक्त में कैल्शियम अधिक मात्रा में नहीं है हड्डियों के रिज़र्पशन से वो सामान्य स्थिति में आ जाती है और ऐसे में हड्डियां और कमज़ोर हो जाती हैं जिससे कि फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है 
विटामिन डी से भरपूर दस आहार








विटामिन डी वसा में घुलनशील विटामिन है। यह कैल्शियम के अवशोषण, न्यूरोमस्कुलर फंक्शनिंग, प्रतिरक्षा प्रणाली के सही तरीके से काम करने, हड्डियों और कोशिकाओं के विकास और नियंत्रण तथा शरीर के अंगों से सूजन को हटाने संबंधी कई कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विटामिन डी की कमी कई प्रकार की गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को भी जन्म दे सकती है। ऐसे कई खाद्य पदार्थ हैं जिनमें भरपूर मात्रा में विटामिन डी होता है।
मछली


विभिन्न प्रकार की मछली जैसे सालमोन और ट्यूना 'विटामिन डीÓ की उच्च स्रोत होती हैं। सालमोन विटामिन डी की हमारी रोजाना जरूरत का एक तिहाई हिस्सा पूरा करने के लिए काफी होती है।
दूध


दूध विटामिन डी का एक और महान स्रोत है। हमें दिन भर में जितना विटामिन डी चाहिए होता है, उसका 20 फीसदी हिस्सा दूध पूरा कर देता है। जबकि डेयरी उत्पादों में आमतौर पर विटामिन डी कम मात्रा में पाया जाता है।
अंडे


अंडों को स्वस्थ भोजन माना जाता है, जो विटामिन डी से भरपूर होते हैं। हालांकि विटामिन डी ज्यादा अंडे की जर्दी में पाया जाता है। लेकिन फिर भी हमें इसको पूरा खाना चाहिए। अंडे का सफेद हिस्सा खाने से विटामिन डी की पर्याप्त आपूर्ति नहीं होती।
संतरे का रस


दूध की तरह ही संतरे का रस भी विटामिन डी से भरपूर होता है। कई स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि विटामिन डी से स्वास्थ्य में जल्दी सुधार कर सकते हैं। इसके लिए आपको संतरे के जूस को अपने आहार का हिस्सा बनाना चाहिए।
अनाज


अनाज विटामिन डी का समृद्ध स्रोत है। विटामिन डी की पूर्ति के लिए नाश्ते से दृढ़ अनाज शामिल कर आप अपने दिन की शुरुआत अच्छे से कर सकते है।
मशरूम


मशरूम में भी विटामिन डी प्रचुर मात्रा में होता है, लेकिन यह मशरूम के प्रकार पर भी निर्भर करता है। शीटेक मशरूम में सफेद मशरूम के तुलना में अधिक विटामिन डी होता है। अगर आप अपने आहार में विटामिन डी को जोडऩा चाहते है तो उसमें शीटेक मशरूम को शामिल करें।
ऑइस्टर (कस्तूरी)


ऑइस्टर विटामिन डी का एक और महान स्रोत है। ऑइस्टर एक स्वस्थ भोजन है इसलिए नहीं कि इसमें विटामिन डी भरपूर मात्रा में होता है बल्कि इसमें विटामिन बी 12, आयरन, जिंक, कॉपर और सेलेनियम भी प्रचुर मात्रा में होता है। लेकिन ऑइस्टर में कोलेस्ट्रॉल ज्यादा होने के कारण इसे सही मात्रा में खाया जाना चाहिए।
पनीर


वैसे तो पनीर के सभी प्रकार में विटामिन डी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है लेकिन अन्य खाद्य पदार्थों की तुलना में विटामिन डी जरा कम होता है। चीज में अन्य पनीर की तुलना में पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी होता है। इसलिए इसे अपने आहार में शामिल करें।
कॉड लिवर ऑयल


कॉड लिवर ऑयल विटामिन डी से समृद्ध एक और अद्भुत भोजन है। इसमें मौजूद विटामिन ए और डी के उच्च स्तर के कारण इसे सबसे अच्छा प्राकृतिक पूरक माना जाता है। अगर आप विटामिन डी में वृद्धि करना चाहते हैं तो आप अपने आहार योजना के लिए कॉड स्तर तेल जोडऩा सुनिश्चित करें।
पोर्क (सूअर का मांस)


अच्छी तरह से कटा और तैयार पोर्क विशेष रूप से पसलियों से, विटामिन डी का एक और समृद्ध स्रोत है। लेकिन इसे सीमित मात्रा में ही लेना चाहिए क्योंकि इसमें कोलेस्ट्रॉल उच्च मात्रा में होता है।

व्रत के लिये फ्राई आलू





किसी भी फलाहारी व्रत के लिये आलू फ्राई कर के खाइये अच्छे लगते हैं। छोटे आलू हों तो आलू साबुत ही फ्राई किये जा सकते हैं, यदि आलू बड़े बड़े हैं तो उनके 4 या 6 टुकड़े कर के फ्राई किये जा सकते हैं। आइये व्रत के लिये आलू फ्राई करें।

बड़े 6-7 मीडियम आकार के आलू अच्छी तरह धोकर उबाल लीजिये, ठंडा कीजिये, छील लीजिये।

तेल कढ़ाई में डाल कर गरम कीजिये, गरम तेल में आलू डाल कर हल्के ब्राउन होने तक तल कर प्लेट में निकाल लीजिये।

एक टेबल स्पून तेल बचाकर,अतिरिक्त तेल निकाल दीजिये। गरम तेल में जीरा डालिये, जीरा तड़कने के बाद आलू, नमक और आधा छोटी चम्मच काली मिर्च डाल कर आलू 2-3 मिनिट तक भूनिये, गैस बन्द कर दीजिये, हरा धनियां और एक नीबू का रस डाल कर मिलाइये। लीजिये व्रत के लिये आलू तैयार हैं। स्वादिष्ट आलू परोसिये और खाइये।

यदि आप तेल ज्यादा नहीं खाना पसन्द करते तब आलू को तले बिना ही बनाइये। कढ़ाई में 1 टेबल स्पून तेल डाल कर गरम कीजिये, गरम तेल में जीरा डालिये, जीरा तड़कने के बाद आलू, नमक और काली मिर्च डाल कर आलू 2-3 मिनिट तक भूनिये, गैस बन्द कर दीजिये, हरा धनियां और नीबू का रस डाल कर मिलाइये। लीजिये व्रत के लिये आलू तैयार हैं। स्वादिष्ट आलू परोसिये और खाइये।






कूटू के आटे का चीला

कूटू के आटे से व्रत के लिये तरह तरह के व्यंजन बनाये जाते हैं। कूटू के आटे के चीले बहुत अच्छे बन जाते हैं। आइये बनायें कूटू के आटे के चीला।

100 ग्राम (आधा कप) कूटू का आटा छान कर किसी बर्तन में निकाल लीजिये, 200 - ग्राम अरबी धोकर उबाल लीजिये। अरबी को छील कर, कद्दूकस करके, मेस कर लीजिये। कूटू के आटे में मिलाइये, थोड़ा थोड़ा पानी डाल कर, आटे को घोलते जाइये, गुठलियां नहीं पडऩी चाहिये।

घोल को अधिक गाढ़ा और अधिक पतला मत कीजिये। घोल को 15 मिनिट के लिये ढककर रख दीजिये।

घोल में 1 छोटी चम्मच नमक, आधा छोटी चम्मच काली मिर्च और एक टेबल स्पून कतरा हुआ हरा धनियां मिला लीजिये।

तवा गैस पर रखिये, गरम कीजिये, एक बड़ा चमचा घोल तवे पर डालिये और चमचे से गोल गोल चलाते हुये पतला चीला फैलाइये। चीले की नीचली सतह ब्राउन होने तक सेक कर पलट दीजिये। दूसरी तरफ भी ब्राउन होने तक सेकिये। चीला तवे से उतार कर प्लेट में रखी कटोरी के ऊपर रखिये। सारे चीले इसी तरह बनाकर तैयार कर लीजिये।

कूटू के चीले तैयार हैं इन्हैं आप गरम गरम फ्राई आलू या दही के साथ खाइये।
मेनोपॉज से जुड़ी परेशानियों को ऐसे करें दूर






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मेनोपॉज समस्या नहीं है, बल्कि उम्र का एक पड़ाव है जो हर महिला की जिंदगी में आता है। जिस तरह पहली बार पीरियड्स होना या फिर पहली बार गर्भ धारण करना समस्या नहीं ठीक उसी तरह मेनोपॉज भी कोई बीमारी नहीं है। इस वक्त कुछ समस्यायें हो सकती हैं लेकिन इसे आसानी से दूर किया जा सकता है।

अधिकांश महिलाओं को 45-50 की उम्र में पीरियड्स बंद हो जाता है, इसी अवस्था को मेनोपॉज कहते हैं। जानकारी के अभाव में कई महिलाओं को मेनोपॉज के दौरान कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। पीरियड्स बंद होने का कारण अंडाशय में एस्ट्रोजन हार्मोन का खत्म हो जाना है। अंडाशय के अंडों की भी एक आयु होती है जो कि समय के साथ-साथ समाप्त हो जाती है। इसके कारण दिमाग में ठीक से सिग्नल न पहुंचने की वजह से फोलिकल नहीं बनता, जिसकी वजह से महिलाओं को पीरियड्स न होने के साथ-साथ कुछ और परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

मेनोपॉज के वक्त कुछ समस्यायें हो सकती हैं, वजन बढऩा, चिड़चिड़ापन, थकान, लगातार खाते रहने की चाहत आदि मेनोपॉज के प्रमुख लक्षण हैं। हालांकि यह समस्या सभी महिलाओं में एक जैसे नहीं हो सकते। मेनोपॉज से जुड़ी कुछ समस्याओं को योग के जरिये आसानी से दूर किया जा सकता है।
ब्रिज पोज यानी सेतुबंध आसन


इस आसन में महिला के शरीर का आकार पुल की तरह होता है इसलिए इसे ब्रिज पोज भी कहते हैं। इस आसन को करने के लिए पीठ के बल सीधे लेट जाएं, दोनों हाथ शरीर के बगल में सीधा रखें, हथेलियों को जमीन पर सटाकर रखें। अब दोनों घुटनों को मोड़ लीजिये जिससे सिर्फ तलवे ही जमीन से छुएं, सांस लेते हुए कमर को ऊपर उठाने की कोशिश कीजिए। कोशिश करें कि आपका सीना ठुड्डी को छुए, इस दौरान बाजुओं को कोहनी से मोड़ लें और हथेलियों को कमर के नीचे रखकर सपोर्ट दीजिए। कुछ क्षण बाद कमर नीचे लाएं और पीठ के बल सीधे लेट जाइए। इससे कमर दर्द, मांसपेशियों का दर्द दूर होगा और अच्छी नींद आयेगी।
अधोमुखी श्वान आसन

श्वान का अर्थ है कुत्ता और अधोमुखी का अर्थ होता है नीचे की ओर सिर। इस आसन के पोज में कुत्ते के समान सिर को नीचे की तरफ झुकाकर योग का अभ्यास किया जाता है। इस आसन को करने के लिए दोनों पैरों, हाथों पर अपने शरीर का भार लायें। हाथों और पैरों को फैलाकर रखें, फिर अपने कूल्हों को ऊपर उठाकर रखें। फिर आराम से सांसों को अंदर-बाहर करें। इससे पेट का दर्द और सिरदर्द दूर होता है।
लंबी सांसें लेना


सुखासन की मुद्रा में बैठ जाइये, अपने हाथों को अपने पैरों पर रख लीजिए। अब अपने पेट पर दबाव डालते हुए नाक से सांस लीजिए, फिर धीरे-धीरे सांसों को छोड़ें। यह क्रिया 10 मिनट तक दोहरायें। इससे दिमाग शांत होता है और पेट की समस्या दूर होती है।
उर्ध्वमुख श्वान आसन


उर्ध्वमुख श्वान आसन अधोमुख श्वान आसन के विपरीत आसन की क्रिया है। अधोमुख में सिर को नीचे की ओर करके आसन किया जाता है जबकि इसमें सिर को ऊपर की तरफ करके योग किया जाता है। इस आसन का अभ्यास करते समय जब शरीर के ऊपरी भाग को जमीन से ऊपर की ओर उठाते हैं उस समय कमर पर अधिक दबाव नहीं डालना चाहिए बल्कि रीढ़ की हड्डी को एक साथ ऊपर की तरफ घूमाना चाहिए। कंधों को थोड़ा बाहर की ओर आरामदायक स्थिति में फैलाकर बांहों को धीरे-धीरे सीधा कीजिए, सीने को जमीन से उठाकर एवं फैलाकर रखें।

इन आसनों के अलावा खानपान पर विशेष ध्यान दीजिये, समय पर भोजन करें और संतुलित आहार लें। अपनी डाइट में दूध, दही, फल और हरी सब्जियां शामिल करें। अधिक समस्या होने पर चिकित्सक को संपर्क करें।
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क्या होता है मेल मेनोपॉज?


उम्र बढऩा मन का मामला है, यदि आप इस पर ध्यान नहीं देते हैं, तो यह महत्वपूर्ण नहीं है। इसके उलट उम्र बढऩा हमेशा से ही चिंता का विषय रहा है। भारत में पौराणिक पात्र ययाति को एक उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है। हस्तिनापुर के महाराज ययाति पराक्रम, ऐश्वर्य और भोग-विलास करने के लिए अपने पुत्र पुरू से उसका यौवन लेते हैं और उसे अपनी जरावस्था दे देते हैं।

बाद में क्या होता है, इसका संबंध इस लेख से नहीं है, इसलिए इसे यहीं रहने दें। मूल बात यह है कि अपनी जरावस्था यानी बुढ़ापे को पुरुष आसानी से पचा नहीं पाता है। तभी तो दुनिया भर में एंटी-एजिंग को लेकर रिसर्च किए जा रहे हैं, किसी भी तरह से उम्र बढऩे के प्रभाव को रोकने का कोई फार्मूला मिल जाए...आखिर इसकी जड़ में कौन-सी वजहें हैं?

कुछ तो इसके पीछे के चिकित्सकीय कारण हैं तो कुछ सामाजिक...। मेडिकल साइंस इसे हार्मोनल चेंज का मामला बताता है। हम अपने आसपास देखते हैं कि धार्मिक और आध्यात्मिक आयोजनों में बढ़ती उम्र के लोग ज्यादा सक्रिय होते हैं। युवावस्था में तेज रफ्तार गाडिय़ों, तीखा-सनसनाता संगीत, तेज गति की जीवन-शैली और संघर्ष करने की प्रवृत्ति ज्यादा नजर आती है, लेकिन उम्र बढ़ते ही पुरुष इन सबसे दूर होने लगता है। सुनते और महसूस भी करते हैं कि उम्र बढऩे के साथ ही स्वभाव की उग्रता, गुस्सा और तीखापन कम होता जाता है मगर चिड़चिड़ाहट बढ़ जाती है। खतरों की तुलना में सुरक्षा को ज्यादा तवज्जो दी जाने लगती है। याददाश्त कम होती है और भावुकता बढऩे लगती है।

इस तरह के व्यवहारिक लक्षण पुरुषों में स्पष्ट, मुखर औऱ ज्यादा 'प्रॉमिनेंटÓ होते है, बजाय महिलाओं के... क्योंकि महिलाएं पहले से ही 'टैंडरÓ होती हैं। पुरुष अपनी युवावस्था में कभी भी इतना कोमल, इतना भावुक नहीं रहता है, जितना बढ़ती उम्र में होने लगता है। सवाल उठता है कि ऐसा क्यों होता है और इस अवस्था को क्या कहा जाता है?

पुरुषों में होने वाले इस तरह के मनोवैज्ञानिक, व्यवाहारिक और शारीरिक परिवर्तन को एंड्रोपॉज कहा जाता है, इस पर मेडिकल साइंस तो चर्चा करता है, लेकिन सामाजिक-पारिवारिक स्तर पर इस विषय पर चर्चा करने से बचा जाता है। बहुत स्वाभाविक है कि पुरुषों के लिए उसका कथित पौरुष इतना महत्वपूर्ण होता है कि उसमें आने वाले कोमल और भावनात्मक परिवर्तन उसकी कमजोरी का प्रतीक माने जाते है, बजाय उसके ज्यादा मानवीय होने के...।

हमारी व्यवस्था में नर पैदा होता है और फिर समाज उसे पुरुष बनाता है, जैसे सिमोन ने स्त्री के लिए कहा था कि स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है, उसी तरह पुरुष भी...उसे अपने पुरुष होने को सिद्ध करने के लिए हमेशा 'टफÓ होना और दिखाई देते रहना होता है, लेकिन फिलहाल तक तो वक्त बलवान है और जिस तरह महिलाओं में मेनोपॉज होता है, उसी तरह पुरुषों में एंड्रोपॉज होता है।
क्या होता है एंड्रोपॉज?

एंड्रोपॉज पुरुषों में उम्र बढऩे के साथ होने वाले भावनात्मक और शारीरिक परिवर्तन को कहते हैं। यद्यपि ये लक्षण सारे उम्र बढऩे से संबंधित हैं, फिर भी इसका संबंध कुछ विशिष्ट किस्म के हार्मोंनों में बदलाव से है। इसमें उम्र बढऩे के साथ पुरुषों में हार्मोंस के तेजी से प्राकृतिक क्षरण होता है। एंड्रोपॉज को मेल मेनोपॉज, पुरुषों का संकट-काल, हाइपोगोनेडिज्म का हमला, उम्र बढऩे के साथ एंड्रोजन के गिरने से या वीरोपॉज भी कहा जाता है।

न्यूयॉर्क के डॉ. वर्नर कहते हैं कि एंड्रोपॉज हकीकत में पुरुषों का मेनोपॉज है। वे कहते हैं कि दरअसल एंड्रोपॉज सही शब्द नहीं है, क्योंकि यह प्रक्रिया मेनोपॉज की तरह सभी में नहीं देखी जाती। न ही यह प्रजनन क्षमता समाप्त होने पर अचानक आ जाती है। यह उम्र बढऩे के साथ कई पुरुषों में होने वाली सामान्य प्रक्रिया है और यह उम्र बढऩे के साथ-साथ बढ़ती जाती है।
कब से शुरू होती है यह प्रक्रिया?

इसमें 40 से 49 साल की अवस्था के साथ 2 से 5 प्रतिशत की गति से यह प्रक्रिया बढ़ती है, इसी तरह 50 से 59 के बीच की अवस्था के साथ 6 से 40 , 60-69 में 20 से 45 प्रतिशत, 70-79 में 3 ऐ 4 और 70 प्रतिशत के बीच बढ़ती जाती है। इसी तरह 80 साल की उम्र में हाईपोगोनेडिज्म के गिरने की दर 91 प्रतिशत तक होती है। इसमें मध्यवय के पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन और डिहाईड्रोपियनड्रोस्टेरॉन हार्मोन बनने की प्रक्रिया धीमी लेकिन स्थिर गति से कम होती जाती है और इसके परिणामस्वरूप लिडिंग सेल्स बनने में भी कमी हो जाती है।
क्या होता है इसमें?

चूँकि इस दौरान टेस्टोस्टेरॉन बनने की गति धीमी होने लगती है, इसलिए इस तरह के हार्मोंनल बदलाव पुरुषों में शारीरिक और भावनात्मक परिवर्तन भी लाते हैं। इस समय में आमतौर पर पुरुष अपने परिवार का साथ चाहते हैं।

अपनी युवावस्था में करियर, पैसा और शक्ति को केंद्र में रखते हैं तो एंड्रोपॉज के दौरान उनके केंद्र में परिवार, दोस्त और रिश्तेदार आ जाते हैं। वह अपने बच्चों के प्रति 'मातृवत' होने लगता है। घरेलू काम जैसे खाना बनाना, सफाई करना और बच्चों की देखभाल करना उसे अच्छा लगने लगता है। धार्मिक और आध्यात्मिक रुझान बढऩे लगता है। वह व्यर्थ के झंझट मोल लेने से बचने लगता है मगर चुनौतियां लेने से नहीं।

इस वक्त वह अपने अर्जित अनुभव को सान पर चढ़ाना चाहता है, उसे उपयोग करना और परखना चाहता है। ऐसे में उसे शारीरिक बदलाव के चलते चुनौती लेने लायक न समझा जाए तो वह कुंठित होता है। हां, उसे एडवेंचरस खेलों की तुलना में टीवी देखना ज्यादा भाता है। इस तरह के बदलाव से कभी-कभी पुरुष चिड़चिड़ाने भी लगता है।

मनोचिकित्सक बताते हैं कि पुरुषों के लिए चूंकि सामाजिक स्तर पर 'पौरुष' एक मूल्य के तौर पर स्थापित है, इसलिए जब पुरुष इसे कम होता देखता है तो वह थोड़ा निराश और थोड़ा चिड़चिड़ा होने लगता है, वह इसे आसानी से हजम नहीं कर पाता है। दरअसल कमजोरी और हमेशा 'पुरुष' होने और बने रहने की सामाजिक अपेक्षा की वजह से उसका व्यवहार कभी-कभी रूखा और चिड़चिड़ा हो जाता है।

मेनोपॉज की उदासी को करें दूर


हर महिला को उम्र की ढलान पर मेनोपॉज का सामना करना पड़ता है। इस दौरान महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रॉन हार्मोन का स्तर कम हो जाता है जिससे कई बार वे तनाव का शिकार हो जाती हैं और उन्हें बात-बात पर गुस्सा आता है। थकान, मोटापा, सिरदर्द, बदनदर्द और बालों का झडऩा जैसी समस्याएं होने लगती हैं। इनसे बचने के लिए जरूरी है कि महिलाएं सही खानपान व व्यायाम अपनाएं।
यह है मेनोपॉज


स्त्री रोग विशेषज्ञ के अनुसार यह महिलाओं के शरीर में होने वाली एक ऐसी प्रक्रिया है जो 45-55 साल की उम्र के बीच होती है। इसमें महिलाओं को पीरियड्स होने बंद हो जाते हैं और उनकी प्रजनन क्षमता खत्म हो जाती है।
खानपान में बदलाव


कैल्शियम से भरपूर डाइट लें जैसे दूध, दही, ब्रोकली, सेम, गाजर, शकरकंदी और अंजीर आदि। इनसे हड्डियां मजबूत रहती हैं और आगे चलकर जोड़ों के दर्द की समस्या नहीं होती। मौसमी फल खाएं। फाइबर फूड जैसे पत्तागोभी, ब्रोकली, काबुली चने, राजमा, मसूर व अरहर की दाल अधिक मात्रा में लें। इस दौरान सोया डाइट भी काफी फायदेमंद होती है।
बॉडी में होगा सुधार


मेनोपॉज के दौरान व्यायाम काफी उपयोगी होता है। एक्सरसाइज करने से मोटापे के अलावा ह्वदय रोग और ऑस्टियोपोरोसिस की आशंका कम हो जाती है। एक्सरसाइज से मूड बेहतर होता है और टेंशन कम होती है। इससे एंडोर्फिन एक्टिविटी बढ़ जाती है जिससे रात में सोने के दौरान आने वाला पसीना कम हो जाता है और महिलाएं ठीक से सो पाती हैं।
खुद को व्यस्त रखें


मेनोपॉज के दौरान शारीरिक बदलावों की वजह से महिलाएं अक्सर अपने लुक को लेकर तनाव में आ जाती हैं। इससे बचने के लिए खुद को किसी न किसी एक्टिविटी में व्यस्त रखें। किताबें पढ़ें, बागवानी करें, घूमने जाएंं।

मेनोपॉज से न घबराएं





जिस तरह पहली बार पीरियड्स होना या फिर पहली बार गर्भ धारण करना कोई बीमारी नहीं है, ठीक उसी तरह मेनोपॉज भी कोई बीमारी नहीं है। क्या है मेनोपॉज और इस दौरान होने वाली समस्याओं से कैसे निबटें। अधिकांश महिलाओं को 45-50 वर्ष की उम्र में पीरियड्स बंद हो जाता है। इस अवस्था को मेनोपॉज कहते हैं। जानकारी के अभाव में कई महिलाओं को मेनोपॉज के दौरान कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। पीरियड्स बंद होने का कारण अंडाशय में एस्ट्रोजन हारमोन का खत्म हो जाना है। अंडाशय के अंडों की भी एक आयु होती है जो कि समय के साथ-साथ क्षीण हो जाती है। इसके कारण मस्तिष्क में ठीक से सिग्नल न पहुंचने की वजह से फोलिकल नहीं बनता, जिसकी वजह से महिलाओं को पीरियड्स न होने के साथ-साथ कुछ और परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

कई महिलाओं को पीरियड्स के दौरान कोई भी परेशानी नहीं होती और कुछ को पेट दर्द से लेकर कई अन्य परेशानियों का सामना करना पड़ता है, ठीक वही स्थिति मेनोपॉज के दौरान भी होती है। पर एक बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि पीरियड्स बंद होने का एकमात्र कारण मेनोपॉज नहीं है। कई अन्य वजहों से भी पीरियड्स बंद हो सकता है, जैसे कि बच्चेदानी में किसी भी तरह की बीमारी की वजह से महिला की बच्चेदानी निकाली जा चुकी हो या महिला को कैंसर हुआ हो और उसके ट्रीटमेंट के दौरान उसे रेडिएशन थेरेपी मिली हो। कई अन्य कारणों की वजह से कई बार समय से पहले भी पीरियड्स बंद हो सकता है जैसे कि शीहैन्स सिन्ड्रोम, वायरल इंफेक्शन और इटिंग डिसऑर्डर। मेनोपॉज तीन स्टेज में होता है। प्रीमेनोपॉज, पीरियड्स बंद होने से पहले के एक से दो वर्ष का समय इस स्टेज का हिस्सा है। मेनोपॉज, एक साल तक अगर पीरियड्स लगातार बंद रहे तो इस स्थिति को मेनोपॉज कहा जाता है और मेनोपॉज के बाद के दौर को पोस्ट मेनोपॉज कहा जाता है। मेनोपॉज के वक्त किसी भी महिला को सबसे ज्यादा तीन चीजों की जरूरत पड़ती है, सपोर्टिव जीवनसाथी, अच्छे दोस्त, मां और सास और सही डॉक्टरी परामर्श।
इस दौरान कौन-सी परेशानियां हैं आम

पूरे शरीर में जलन का महसूस होना, नींद न आना, दिल का तेजी से धड़कना, कभी बहुत खुश तो कभी अचानक से गुस्सा हो जाना, जरा-सी बात पर घबरा जाना, हर समय परेशान रहना तथा छोटी- छोटी बातों पर झुंझलाहट होना, स्मरण शक्ति कमजोर होना आदि मेनोपॉज के दौरान होने वाली आप परेशानियां हैं। इनके अलावा मेनोपॉज के दौरान कई शारीरिक समस्या भी घेर लेती हैं। इन समस्याओं में चेहरे पर झुर्रियों का आना, बालों का रंग सफेद होना और झडऩा, वजन बढऩा और थकान होना आदि प्रमुख हैं। मेनोपॉज का सबसे ज्यादा असर हड्डियों पर पड़ता है। एस्ट्रोजन हारमोन के कम होने के कारण बोन मास कम हो जाता है, जिसकी वजह से घुटने में दर्द व जोड़ों की बीमारी होना आम बात है। कैल्शियम की ज्यादा कमी की वजह से रीढ़ की हड्डी कमजोर होने लगती है और मरीज आगे की तरफ झुकना शुरू कर देते हैं। मेनोपॉज के कारण नर्वस सिस्टम और दिल पर भी असर पड़ता है।
ऐसे करें मेनोपॉज का सामना 
सुबह-शाम सैर पर जाएं। 
समय पर भोजन करें और संतुलित आहार लें। अपनी डाइट में दूध, दही, फल और हरी सब्जियां शामिल करें। 
मेनोपॉज के दौरान सोया प्रोडक्ट्स भी काफी फायदा पहुंचाते हैं, उनका भी सेवन करें। 
आजकल योग ने हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान ले लिया है, जो फायदेमंद भी साबित हुआ है। नियमित रूप से योग भी करें। 

भारत और अन्य विकासशील देशों में रजोनिवृत्ति का संस्कृतिक आर्थिक संदर्भ






रजोनिवृत्ति की अवस्था का मतलब एक समाज में कुछ हो सकता है और दुसरे में कुछ और। यह समाज की राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संरचना पर और साथ ही इस बात पर निर्भर करता है कि वह सभी आयु-वर्ग की महिलाओं को अपनी स्वास्थ्य देख-रेख की सुविधा सुलभ कराने के साथ साथ क्या जीवन स्थितियां उपलब्ध कराता है।

परिवेश या वातावरण सभी महिलाओं के स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विकासशील देशों में जब महिलाएँ रजोनिवृत्ति की अवस्था में पहूँचती हैं तो उनका स्वास्थ्य अपनी परिवेशगत स्थितियों के कारण पहले ही गिर चुका होता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य की निम्न स्थिति की वजह से संक्रामक रोगों का होना सामान्य है। भारत और अन्य विकासशील देशों में, औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं के स्वास्थ्य प्रदूषण, रासायनिक विषाणुयुक्त पदार्थों और जोखिम भरी कार्यस्थितियों के कारण प्रभावित होता है।

भारत में बहुत महिलाएं अपर्याप्त भोजन के कारण पोषण संबंधी रक्ताल्पता यानी खून की कमी (एनीमिया) की शिकार हो जाती है और उनका स्वास्थ्य लगातार कुपोषण की वजह से बिगड़ जाता है।

जीवन के मध्यकाल में महिला का स्वास्थ्य केवल इसी बात से प्रभावित नहीं होता हैं कि उसने कितने बच्चे पैदा किए हैं, बल्कि इस बात से भी निर्धारित होता है कि उसने कितने गर्भधारण किए, अंतिम गर्भधारण के समय उसकी उम्र क्या थी, उसके कितने असुरक्षित गर्भपात हुए और उसे गर्भनिरोध की सुविधा कहाँ तक सुलभ हो पाई। अगर असरकारक ढंग से गर्भ- निरोधन किया जाए तो प्रजनन संबंधी कठिनाइयों को दूर किया जा सकता है।

भारत में महिलाओं और पुरूषों, दोनों को स्वास्थ्य सेवा सीमित मात्रा में ही उपलब्ध हो पाती है। रजोनिवृत्ति जैसी कम ज्ञात स्थितियों से निबटने के लिए जो थोड़े से साधन उपलब्ध भी हैं तो उनका उपयोग कम ही हो पाता है।

हमारे देश में खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकतर महिलाएं चुपचाप कष्ट झेलती रहती हैं और अपनी समस्याओं को लेकर खुल कर सामने आने में झिझकते हैं।

जीवन के मध्यकाल में रजोनिवृत्ति महिलाओं को अनेक सामाजिक और पारिवारिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जैसे कि बड़े बच्चों की लिए समय निकलना; घर में बुजुर्गों की देखभाल; सेवानिवृत्त पति की देखरेख (उनमें से कुछ तो घर के दैनिक कार्यों में मदद करते हैं, पर कुछ सचमुच बहुत अपेक्षा करते हैं) या स्वयं कामकाजी महिला की सेवानिवृत्ति। जीवन के इस परिवर्तनकारी दौर में संयुक्त परिवार में रहना कभी-कभी बहुत तनावपूर्ण हो सकता है क्योंकी आस-पास के लोग महिला की समस्या को नहीं समझ पाते ।

मेनोपॉज : सकारात्मक सोच





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बीसवीं सदी के अंत में महिलाओं की औसत जीवन क्षमता 55 वर्ष थी। इस तरह तब महिला की रजोनिवृत्ति जीवन के अंतिम वर्षों में होती थी। पर आज महिलाओं की जीवन क्षमता 80 वर्ष है। महिलाओं के लिए यह सचमुच खुश होने की बात है। रजोनिवृत्ति प्रजनन शक्ति का अंत मात्र है, जीवन या सक्रियता का अंत नहीं। आप रजोनिवृत्ति पर नए जीवन की शूरूआत कर सकती हैं और अपनी नई मिली आजादी के साथ (यानी आपका परिवार बस चुका होता है, और माहवारी, गर्भधारण आदि का कोई झंझट नहीं रहता) आप बाद के तीस वर्ष आराम से बिता सकती हैं। इस स्वभाविक घटना कों सकारात्मक रूप में लेना और जीवन के प्रजननहीन वर्षों को जीवन के सबसे सशक्त और रचनात्मक वर्ष बनाना आप पर निर्भर करता है। रजोनिवृत्ति के बाद किस तरह आप एक स्वस्थ्य और रोग-मुक्त जीवन बिता सकती हैं?
जीवन के प्रति सकारात्मक रवैया


जीवन के प्रति सकारात्मक रवैया अपनाने का मतलब है कि आप रजोनिवृत्ति को अपने जीवन के मध्य काल की एक स्वाभाविक घटना के रूप में स्वीकार करें। जहाँ तक संभव हो स्वाभविक रूप में, या अपने डॉक्टर की मदद से रजोनिवृत्ति के लक्षणों से दृढ निश्चय के साथ निबटें। रजोनिवृत्ति के समय तक आपका परिवार बस चुका होता है, आपको हर महीने अपनी माहवारी की तारीख याद रखने की जरूरत नहीं होती, यानी माहवारी का कोई झंझट नहीं होता तो इस तरह से आपको बेहतर गुणवत्तापूर्ण जीवन जीने और अपनी इच्छा से कार्य करने के लिए एक नई आजादी मिलती है।
अपनी जीवन शैली पर नियंत्रण


अपनी जीवन शैली अपनाएं। स्वस्थ जीवन शैली का स्वास्थ्य पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है। वजन को नियंत्रण में रखना और तनावों को वश में करना ये जीवन शैली के दो अतिरिक्त पहलू हैं जो अच्छे स्वास्थ्य में योगदान करते हैं।
स्वास्थयवद्र्धक भोजन


कोई भी एक भोजन ऐसा नहीं है जिसमें सभी स्वास्थयवर्द्धक गुण मौजूद हों। सन्तुलित आहार ही सही रूप से संयोजित भोजन होता है जो आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है। एक सेब रोज खा कर आप डॉक्टर के पास जाने से बच नहीं सकते है, या ही सुबह 10 आंवले खा कर आप अपने याददाश्त नहीं बढ़ा सकते।

अविकसित देशों में जहाँ भोजन की कमी और जनसंख्या विस्फोट सामान्यत: देखने को मिलता है, प्रमुख स्वास्थ्य संबंधी खतरा भोजन में मिलावट का होता है। इससे बचें।

सन्तुलित आहार में भी आवश्यक पोषक तत्व मौजूद रहते हैं, जैसे कि प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन, मिनरल और पानी। रजोनिवृत्ति के तत्काल पूर्व और बाद की अवस्था में महिलाओं को अन्य पोषक तत्वों के साथ- साथ अनेक प्रकार के निम्न वसायुक्त, दूध और दूध से बने खाद्य पदार्थ लेने चाहिए ताकि उनकी दैनिक कैल्शियम संबंधी जरूरतें पूरी हो सकें।
उत्तम भोजन के सिद्धांत


1. भोजन करते समय प्रसन्न और तनावमुक्त रहें। इससे आपके पाचन में सुधार होगा। अच्छे स्वास्थ्य के लिए भोजन के समय हमारी मानसिक स्थिति उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि हमारा भोजन।

2. प्रतिदिन सभी खाद्य समूहों में से एक चीज को शामिल करके सन्तुलित आहार खाएँ।

3. नियमित अन्तराल के बाद भोजन करें। एक बार में भारी भोजन करके पेट पर अतिरिक्त भर डालना और फिर अगली बार भोजन न करना गलत है।

4. भोजन को स्वच्छतापूर्ण ढंग से पकाएं और आकर्षक ढंग से परोसें।
धूम्रपान और शराब


धूम्रपान बीमारी और अकाल मृत्यु का अकेला सबसे बड़ा कारण है जिसे रोका जा सकता है। धूम्रपान अस्थि - भंग को खतरे को दोगुना कर देता है। अध्ययनों से पता चला है कि जो महिलाएं धूम्रपान करती हैं उनकी अस्थि सघनता एस्ट्रोजन बनने में कमी आने के कारण अधिक निम्न हो जाती है। लम्बे समय तक शराब का सेवन अस्थि द्रव्यमान को घटा देता है और अस्थि भंग के खतरे को बढ़ाता है। किन्तु अल्प मात्रा में मदिरा का सेवन करना यानी एक या दो ड्रिंक्स प्रति दिन लेना हानिकर प्रतीत नहीं होता।

प्रोटीन- हमारे शरीर की प्रत्येक कोशिका को ऊतकों की मरम्मत करने और नए ऊतक बनाने के लिए प्रोटीन की जरूरत होती है।

कार्बोहाइड्रेट- कार्बोहाइड्रेट हमारे शारीर के लिए सबसे सस्ता और बना- बनाया ईंधन होते हैं जो हमें कार्य करने के लिए ऊर्जा व शक्ति प्रदान करते हैं। हमारे शरीर के मस्तिष्क, हृदय और लीवर जैसे महत्वपूर्ण अंगों को उचित प्रकार से कम करने के लिए ग्लूकोज की जरूरत होती है।

वसा (फैट)- वसाएं शरीर का आरक्षित ईंधन होती हैं। वे बचत बैंक खाते की तरह होती हैं। वसाएं सबसे खर्चीला और ठोस आहार हैं जिनसे प्रोटीन या कार्बोहाइड्रेट की तुलना में 2 (गुना अधिक कैलोरियाँ प्राप्त होती हैं। मक्खन और घी जैसी पशु वसाओं में विटामिन ए,डी,ई, और के होता है, जबकि वेजिटेबल तेलों में विटामिन ए और डी. नहीं होते। वसाओं में आवश्यक चर्बीयुक्त एसिड भी होते हैं जो शरीरिक विकास और पोषण के लिए जरूरी हैं। वेजिटेबल तेलों में आवश्यक वसायुक्त एसिड प्रचुर मात्रा में मिलते हैं,जबकि घी, मक्खन और पशु वसाओं में आवश्यक वसायुक्त एसिड कम होते हैं। इसलिए सन्तुलित पोषण के लिए यह जरूरी है कि हम कुछ कैलोरियाँ वेजिटेबल तेलों से भी प्राप्त करें।

विटामिन - विटामिन जीवन के लिए आवश्यक तत्व है। प्रोटीन, वसा और कार्बोहाइड्रेट के विपरीत विटामिन न तो ऊर्जा प्रदान करते हैं और न ही वे ऊतकों का निर्माण करने में सहायक होते हैं। वे शरीर के विभिन्न कार्यों के नियमनकर्त्ता हैं और पोषक तत्वों का उपयोग करने में शरीर की सहायता करते हैं। सन्तुलित खुराक में विटामिन बी- कॉमप्लेक्स ( यानी बी समूह के विभिन्न विटामिन), विटामिन सी, ए, डी, ई, और के मिलते हैं। यदि आप प्रतिदिन सन्तुलित आहार नहीं लेती तो आप विटामिन पूरक (सप्लीमेंट) ले सकती हैं। रजोनिवृत्ति के बाद कुछ महिलाओं में विटामिन ई लेने से उत्तापन (हाट फ्लश) और पांव की मरोड़ आदि में कमी आती है।

मिनरल- विटामिन की तरह मिनरल्स भी कोई कैलोरी प्रदान नहीं करते। पर वे (क) शरीर के ऊतकों के विकास और मरम्मत के लिए और (ख) शरीर के विभिन्न कार्यों के नियमन के लिए आवश्यक होते हैं। मिनरल्स में आयरन कैलशियम, फास्फोरस, आयोडीन, सोडियम और पोटाशियमशामिल हैं।

आयरन- आयरन हीमोग्लोबिन और लाल रक्त कोशिकाओ के निर्माण केलिए आवश्यक है। आयरन की कमी से अनीमिया (रक्ताल्पता) हो सकता है जो कि विकासशील देशों में बहुत ही सामान्य है।

कैल्शियम- मजबूत हड्डियों और दांतों के लिए कैल्शियम आवश्यक है। इसके अलावा रक्त का क्लाट (थक्का) बनाने के लिए भी यह आवश्यक है। कैल्शियम शरीर में विभिन्न मांसपेशियों के संकूचन में भी मदद करता है। कैल्शियम के बिना हमारी मांसपेशियां अतिसंवेदनशील हो जाती हैं। यदि आपकी खुराक में दुग्ध उत्पाद शामिल नहीं है तो कैल्शियम की गोलियां लें जिनमें विटामिन दी और सी भी शामिल हो क्योंकी ये विटामिन हड्डियों को बनाने के लिए आवश्यक है।

पानी- पोषक तत्वों के अलावा हमें पानी और ऑक्सीजन की जरूरत भी होती है। हमारे शरीर की सभी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में जैसे कि पाचन, संचरण और मल- विसर्जन – में पानी की जरूरत होती है। हमारे शरीर के ताप- नियमन में भी पानी की भूमिका होती है। पानी कैलोरी- मुक्त होता है, इसलिए हम भी को हर दिन 8-10 गिलास पानी पीना चाहिए।

रजोनिवृत्ति के लक्षण





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रजोनिवृत्ति से अनेक लक्षणों का संबंध जोड़ा जाता है। डिम्ब ग्रंथि के कार्य की क्षति से होने वाले लक्षणों और उम्र बढऩे की प्रक्रिया से होने वाले या प्रौढ़ जीवन के वर्षों के सामाजिक वातावरणगत तनावों से पैदा होने वाले लक्षणों के बीच अक्सर कम ही भेद किया जाता है। उम्र बढऩे के प्रभावों और रजोनिवृत्ति के प्रभावों के बीच भेद करना तो खास तौर पर कठिन है।

रजोनिवृत्ति के सामान्य लक्षण इस प्रकार हैं-
हॉट फ्लश (उत्तापन या उत्तेजना)


हॉट फ्लश यानी अचानक उत्तापन और उत्तेजना और रात को पसीने से तरबदर हो जाना- ये शरीर की ताप-नियमनकारी प्रणाली में आने वाले विध्न हैं जो रजोनिवृत्ति की विशेषता हैं।

उत्तापन या उत्तेजना में चेहरे, गर्दन और छाती में अचानक गर्मी महसूस होने लगती है। इसका संबंध त्वचा के फैले हुए या चकत्तेदार रूप में लाल होने, अत्यधिक पसीना आने और अक्सर धडकन बढ़ जाने, चिडचिडापन और सिरदर्द से है। शुरू में शरीर के ऊपरी भाग में गर्मी महसूस होती है और फिर वह पूरे शरीर के ऊपर से नीचे तक फ़ैल जाती है। इस उत्तेजना का संबंध शारीरिक बेचैनी से है और यह लगभग 3 मिनट तक रहती है।

जो महिलाएं दोनों डिम्ब ग्रंथियों को शल्य चिकित्सा द्वारा निकलवा कर उत्प्रेरित रजोनिवृत्ति प्राप्त करती हैं,उनमें स्वाभाविक रजोनिवृत्ति वाली महिलाओं की तुलना में यह उत्तेजना अधिक गंभीर और तीव्र होती है।

ये वैसोमीटर यानी वाहिका उत्प्रेरक संबंधी लक्षण हार्मोनों से संबंधित हैं और कुछ सप्ताहों से ले कर कुछ वर्षों तक बीच-बीच में हो सकते हैं।

रजोनिवृत्ति के तत्काल पहले की अवधि में मासिक धर्म संबंधी परिवर्तन अधिकतर महिलाओं में रजोनिवृत्ति की ओर बढऩे का पहल संकेत होता है मासिक धर्म के चक्र में बदलाव आना। रजोनिवृत्ति की ओर बढऩे के दौरान मासिक धर्म के रूप में बदलाव आता है। खून का निकलना अनियमित हो जाता है जिसका कारण हार्मोन स्तर में होने वाले उतार-चढ़ाव होते हैं। कुछ महिलाओं की माहवारी अचानक रूक जाती है। कुछ महिलाओं को माहवारी पहले से अधिक बार होने लगती है, कुछ अन्य महिलाओं को बीच-बीच में मासिक धर्म नहीं होता या काफी देर के बाद होता है, कुछ महिलाओं के मामले में माहवारी की अवधि छोटी हो जाती है, और खून भी कम निकलता है या फिर थक्कों के साथ काफी गाढ़ा खून निकलता है। इस तरह का उतार-चढ़ाव रजोनिवृत्ति से पूर्व एक वर्ष या उससे भी अधिक समय तक आते रह सकते हैं पर इस अवधि में खून बहने और किसी संभावित रूप से गंभीर वजह से खून बहने के बीच अंतर करना जरूरी है। इसलिए रजोनिवृत्ति से तत्काल पहले की अवधि में महिला के लिए जाँच कराना जरूरी है ताकि खून बहने के अगर कोई रोग- संबंधी कारण हों तो उनका पता लगाया जा सके।

प्रौढ़ आयु की, अनियमित मासिक धर्म वाली महिलाओं को गर्भधारण का खतरा तब तक बना रहता है, जब तक कि उन्हें औसतन 24 महीने तक मासिक धर्म न हो।
रजोनिवृत्ति के बाद खून बहना


रजोनिवृत्ति के एक वर्ष बाद योनि से खून निकलने को उत्तर - रजोनिवृत्ति रक्तस्राव कहते हैं। इस रक्तस्राव के अनेक कैंसरकारी और गैर कैंसरकारी कारण हो सकते हैं। रजोनिवृत्ति के बाद योनि से खून बहने के महत्वपूर्ण असाध्य (कैंसरकारी) कारण इस प्रकार हैं- गर्भाशय की ग्रीवा (सर्विक्स) का कैंसर, एंडोमीट्रियम (गर्भाशय अस्तर) का कैंसर, योनि का कैंसर, डिम्बग्रन्थि का कैंसर। अत: रजोनिवृत्ति के एक वर्ष बाद योनि से किसी भी प्रकार का रक्तस्राव हो तो उसकी पूरी जाँच जरूरी है यह जानने के लिए कि वह घातक तो नहीं है।

इसके लिए निम्न प्रकार की जांचें की जाती हैं:

कॉल्पोस्कोपी-गर्भाशय की ग्रीवा और पीछे की ओर वाली योनि की फोर्निक्स के लिए पेप स्मियर जाँच

गर्भाशय की ग्रीवा की बायोस्पी - आंशिक क्यूरेटेज (मूत्र अस्तर के टुकड़ों की हिस्टोपैथिलौजी द्वारा जाँच)

यदि डिम्ब ग्रंथि में मेलिग्नेंसी का संदेह हो तो अल्ट्रासोनोग्राफी और लेप्रोस्कोपी इस जाँच से जो पता चले उसके आधार पर जननांग के असाध्यकारी या साध्यकारी रोगों का इलाज किया जाना चाहिए।

यौन कार्य में विध्न - एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन और टेस्टोस्टेरॉन हार्मोंन का स्तर निम्न हो जाने के कारण कुछ महिलाओं की यौन दिलचस्पी कम हो जाती है। योनि के सूखेपन और अल्प संवहन के कारण, तथा बाद में योनि अस्तर के पतला हो जाने और योनि की क्षीणता की वजह से संभोग के दौरान दर्द होता है।

मूत्र संबंधी लक्षण - बढ़ती उम्र की महिलाओं में मूत्र संबंधी समस्याएँ समान्य बात हैं और वे रजोनिवृत्ति से तत्काल पहले के चरण में सामने आ सकती हैं। पेशाब जोर से आना, बार- बार आना, पेशाब रोकने में कठिनाई, आदि जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं। एस्ट्रोजन की कमी से मूत्र पथ संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

महिला सशक्तिकरण हालात कहां बदले हैं




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भारतीय समाज शुरू से ही पुरुष प्रधान रहा है। यहां महिलाओं को हमेशा से दूसरे दर्जे का माना जाता है। पहले महिलाओं के पास अपने मन से कुछ करने की सख्त मनाही थी। परिवार और समाज के लिए वे एक आश्रित से ज्यादा कुछ नहीं समझी जाती थीं। ऐसा माना जाता था कि उसे हर कदम पर पुरुष के सहारे की जरूरत पड़ेगी ही।

लेकिन अब महिला उत्थान को महत्व का विषय मानते हुए कई प्रयास किए जा रहे हैं और पिछले कुछ वर्षों में महिला सशक्तिकरण के कार्यों में तेजी भी आई है। इन्हीं प्रयासों के कारण महिलाएं खुद को अब दकियानूसी जंजीरों से मुक्त करने की हिम्मत करने लगी हैं। सरकार महिला उत्थान के लिए नई-नई योजनाएं बना रही हैं, कई एनजीओ भी महिलाओं के अधिकारों के लिए अपनी आवाज बुलंद करने लगे हैं जिससे औरतें बिना किसी सहारे के हर चुनौती का सामना कर सकने के लिए तैयार हो सकती हैं।

आज की महिलाओं का काम केवल घर-गृहस्थी संभालने तक ही सीमित नहीं है, वे अपनी उपस्थिति हर क्षेत्र में दर्ज करा रही हैं। बिजनेस हो या पारिवार महिलाओं ने साबित कर दिया है कि वे हर वह काम करके दिखा सकती हैं जो पुरुष समझते हैं कि वहां केवल उनका ही वर्चस्व है, अधिकार है।

जैसे ही उन्हें शिक्षा मिली, उनकी समझ में वृद्धि हुई। खुद को आत्मनिर्भर बनाने की सोच और इच्छा उत्पन्न हुई। शिक्षा मिल जाने से महिलाओं ने अपने पर विश्वास करना सीखा और घर के बाहर की दुनिया को जीत लेने का सपना बुन लिया और किसी हद तक पूरा भी कर लिया।

लेकिन पुरुष अपने पुरुषत्व को कायम रख महिलाओं को हमेशा अपने से कम होने का अहसास दिलाता आया है। वह कभी उसके सम्मान के साथ खिलवाड़ करता है तो कभी उस पर हाथ उठाता है। समय बदल जाने के बाद भी पुरुष आज भी महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना पसंद नहीं करते, उनकी मानसिकता आज भी पहले जैसी ही है। विवाह के बाद उन्हे ऐसा लगता है कि अब अधिकारिक तौर पर उन्हें अपनी पत्नी के साथ मारपीट करने का लाइसेंस मिल गया है। शादी के बाद अगर बेटी हो गई तो वे सोचते हैं कि उसे शादी के बाद दूसरे घर जाना है तो उसे पढ़ा-लिखा कर खर्चा क्यों करना। लेकिन जब सरकार उन्हें लाड़ली लक्ष्मी जैसी योजनाओं लालच देती है, तो वह उसे पढ़ाने के लिए भी तैयार हो जाते हैं और हम यह समझने लगते है कि परिवारों की मानसिकता बदल रही है।

दुर्भाग्य की बात है कि नारी सशक्तिकरण की बातें और योजनाएं केवल शहरों तक ही सिमटकर रह गई हैं। एक ओर बड़े शहरों और मेट्रो सिटी में रहने वाली महिलाएं शिक्षित, आर्थिक रुप से स्वतंत्र, नई सोच वाली, ऊंचे पदों पर काम करने वाली महिलाएं हैं, जो पुरुषों के अत्याचारों को किसी भी रूप में सहन नहीं करना चाहतीं। वहीं दूसरी तरफ गांवों में रहने वाली महिलाएं हैं जो ना तो अपने अधिकारों को जानती हैं और ना ही उन्हें अपनाती हैं। वे अत्याचारों और सामाजिक बंधनों की इतनी आदी हो चुकी हैं की अब उन्हें वहां से निकलने में डर लगता है। वे उसी को अपनी नियति समझकर बैठ गई हैं।

हम खुद को आधुनिक कहने लगे हैं, लेकिन सच यह है कि मॉर्डनाइज़ेशन सिर्फ हमारे पहनावे में आया है लेकिन विचारों से हमारा समाज आज भी पिछड़ा हुआ है। आज महिलाएं एक कुशल गृहणी से लेकर एक सफल व्यावसायी की भूमिका बेहतर तरीके से निभा रही हैं। नई पीढ़ी की महिलाएं तो स्वयं को पुरुषों से बेहतर साबित करने का एक भी मौका गंवाना नहीं चाहती। लेकिन गांव और शहर की इस दूरी को मिटाना जरूरी है।

रजोनिवृत्ति एक समस्या







रजोनिवृत्ति किसी भी महिला के जीवन में घटने वाली एक स्वभाविक घटना है। रजोनिवृत्ति का अर्थ है- डिम्बग्रन्थियों के कार्य में कमी के कारण मासिक धर्म का स्थायी रूप से रूक जाना। यह स्थिति डिम्ब ग्रंथियों द्वारा हार्मोंस एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरान के उत्पादन में कमी आने का परिणाम होती है।

रजोनिवृत्ति होने पर क्या-क्या बदलाव आते हैं?

डिम्ब ग्रंथियों के काम न करने की वजह से रजोनिवृत्ति के समय महिला में अनेक परिवर्तन आते हैं। रजोनिवृत्ति से तत्काल पहले की अवधि और रजोनिवृत्ति के बाद की अवधि में अनेक हार्मोन संबंधी बदलाव आते हैं जो इस प्रकार हैं- 
रक्त का एस्ट्रोजन स्तर कम हो जाता है। 
रक्त में फोलिकल्स उत्प्रेरक हार्मोंस में उल्लेखनीय वृद्धि हो जाती है। 
ल्यूटिनाइजिंग हार्मोंस की संख्या में वृद्धि हो जाती है। 
टेस्टोस्टेरोन का स्तर गिर जाता है क्योंकि डिम्ब ग्रंथि इसका केवल 50प्रतिशत ही उत्पादित कर पाती है। 
प्रोजेस्ट्रान हार्मोंस का स्तर अलग- अलग भी हो सकता है, और अलग-अलग नहीं भी हो सकता। इन हार्मोंस का स्तर दिन के समय, रजोनिवृत्ति के प्रकार, रजोनिवृत्ति के बाद के वर्षों की संख्या के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। 

रजोनिवृत्ति के बाद महिलाओं में अन्य शरीरिक बदलाव


ये बदलाव क्रमिक रूप से और गुपचुप तरीके से होते हैं तथा अलग- अलग व्यक्तियों को अलग-अलग हो सकते हैं। ये बदलाव मुख्य रूप से एस्ट्रोजन की कमी की वजह से होते हैं। 
एस्ट्रोजन की कमी की वजह से त्वचा धीरे-धीरे अपने सब-क्यूटेनीयस वसा को त्यागने लगती हैं, और झुर्रीदार हो जाती है। 
बाल सफेद होने लगते हैं और कभी- कभी एंड्रोजन (पुरूष हार्मोन) की सापेक्ष प्रमुखता की वजह से बालों का अत्यधिक उगना भी देखने में आता है। 
स्तन-ऊतक में कमी आने से स्तनों की कठोरता कम हो जाती है। 
जननांग क्षेत्र में वसा में कमी होने लगती है। 
योनि-छिद्र संकुचित हो जाता है और योनि की झिल्ली पतली हो कर सूख जाती है। इससे यौन कार्य अधिक कठिन और कभी-कभी तो कष्टपूर्ण हो जाता है। 
योनि संबंधी बदलावों की वजह से बेक्टीरिया का संक्रमण अधिक आसानी से हो सकता है। 
गर्भाशय और उसकी ग्रीवा (सर्विक्स) धीरे - धीरे सिकुडऩे लगते हैं। 
ग्रीवा-ग्रंथियां (सर्वाइकल ग्लैंड्स) स्राव छोडऩा बंद कर देती हैं। 
गर्भाशय का अस्तर सूखने या घुलने लगता है। 
कूल्हे का कोशिकीय ऊतक-अवलम्ब शिथिल पड़ जाता है इससे मूत्राशय और जननांग क्षेत्र में कम या अधिक मात्रा में अपकर्ष होता है। 
मूत्र मार्ग और मूत्राशय में होने वाले परिवर्तनों से निचले मूत्र- पथ के संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। 
डिम्ब ग्रंथियां सिकुड़ जाती हैं और उनकी त्वचा खांचेदार बन जाती है। 
मुख्यत: मेरुदंड और कूल्हे के घेरे में क्रमिक रूप से ऑस्टेओपोरेसिसी (यानी हड्डियों की क्षति) होने लगता है। 

रजोनिवृत्ति की आयु


रजोनिवृत्ति की आयु भौगोलिक, नस्लीय, पोषण संबंधी और अन्य कारणों से अलग-अलग महिलाओं में अलग-अलग हो सकती है।

भारत और अन्य विकासशील देशों में रजोनिवृत्ति की औसत आयु 45 से 50 वर्ष के बीच होती है।

जो महिलाओं धूम्रपान करती हैं, जिन्होने कभी गर्भधारण नहीं किया और जो निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आती हैं,। उनकी रजोनिवृत्ति कम आयु में होने की संभावना रहती है। हाल में किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि जिन महिलाओं की माहवारी का चक्र 26 दिन से कम का होता है उनकी रजोनिवृत्ति अधिक लम्बे माहवारी चक्र वाली महिलाओं की तुलना में 1.4 वर्ष पहले हो जाती है रजोनिवृत्ति की अधिक आयु का सम्बद्ध दीर्घ आयु से जोड़ा जा सकता है। अधिकतर रिपोर्ट यह दर्शाती हैं कि विकसित देशों की महिलाओं से विकाशील देशों की महिलाओं की आयु प्रथम माहवारी के समय अधिक तथा रजोनिवृत्ति के समय कम होती है।
रजोनिवृत्ति की जानकारी


नियमित मासिक धर्म चक्र से लेकर मासिक धर्म के रूक जाने तक का सफर एकाएक खत्म हो जाए। ऐसा बिरले ही मामलों में होता है। ज्यादातर महिलाओं को पता चल जाता है कि रजोनिवृत्ति का वक्त नजदीक आ गया है। माहवारी के चक्र में बदलाव आने के साथ ही वे यह समझ लेती हैं। माहवारी में बदलाव का मतलब है कि वह नियमित न हो कर कभी-कभी हो या फिर काफी देर के बाद हो या खून चकतों के साथ काफी भारी मात्रा में हो।

रजोनिवृत्ति से जुड़े विभिन्न प्रमुख पहलुओं को दर्शाने वाले विभिन्न शब्द/शब्द समूह इस प्रकार हैं- 
स्वाभाविक मेनोपॉज अर्थात रजोनिवृत्ति का अर्थ है डिम्ब ग्रंथियों के कार्य में कमी की वजह से माहवारी का स्थायी रूप से समाप्त हो जाना। यह माना जाता है कि स्वभाविक रजोनिवृत्ति लगातार बारह महीनों तक मासिक धर्म न होने के बाद होती है और इसका कोई अन्य स्पष्ट रोग वैज्ञानिक अथवा शारीरिकक्रिया वैज्ञानिक कारण नहीं होता। 
पेरिमेनोपौज अर्थात रजोनिवृत्ति से तत्काल पहले की अवधि (जब रजोनिवृत्ति के नजदीक आने के लक्षण शुरू होते हैं) और रजोनिवृत्ति के बाद का एक वर्ष। 
मेनोपॉज ट्रांजीशन अर्थात रजोनिवृत्ति संक्रमण अंतिम माहवारी की अवधि से पहले की अवधि को कहते हैं जब मासिक धर्म चक्र की अस्थिरता अक्सर बढ़ जाती है। संक्रमण का यह दौर औसतन 3 से 4 वर्ष तक का रहता है। 
सर्जिकल मेनोपॉज अथवा अभिप्रेरित रजोनिवृत्ति का अर्थ है दोनों डिम्ब ग्रंथियों (गर्भाशय हटाने के साथ या उसके बिना) को शल्य चिकित्सा द्वारा निकाल देने या किमोथैरोपी अथवा रेडिएशन से डिम्ब ग्रंथियों के कार्य में चिकित्सा हस्तक्षेप करने के बाद माहवारी समाप्त होना। 
सिंपल (सरल) हिस्ट्रेक्टामी (यानी गर्भाशय को हटाना)- इसमें केवल गर्भाशय को या एक डिम्ब ग्रंथि को हटाया जाता है। 
पोस्ट मेनोपॉज यानी रजोनिवृत्ति- के बाद का समय। इसे अंतिम माहवारी के अवधि के बाद की अवधि के रूप में परिभाषित किया जाता है चाहे रजोनिवृत्ति प्रेरित हो या स्वभाविक हो। 
समय से पहले रजोनिवृत्ति को ऐसी रजोनिवृत्ति के रूप में परिभाषित किया जाता है जो औसत अनुमानित रजोनिवृत्ति की आयु से कम आयु में होती है। 
उदाहरण के लिए, विकाशील देशों में 40 वर्ष के आयु में रजोनिवृत्ति की आयु मान लिया जाता है। जिन महिलाओं को इस पहले रजोनिवृत्ति हो जाए उनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें समय से पहले रजोनिवृत्ति (प्रीमेच्योर मेनोपॉज) हो गई है। 

बीते कल से सीखिए सेहतमंद रहिए







आज पहले की तुलना में न सिर्फ बीमारियां बढ़ रही हैं बल्कि कौन-सी उम्र में क्या बीमारी होगी, इसका फर्क भी मिट रहा है। इसके लिए काफी हद तक हमारी जीवनशैली और खानपान में आ रहा बदलाव जिम्मेदार है। कैसे अपने बीते कल से सीखकर हम अपना आज सेहतमंद बना सकते हैं, जानें...

आज आठ साल का बच्चा शुगर का मरीज है...छह महीने की बच्ची कैंसर से जूझ रही है..तीस साल की महिला जोड़ों के दर्द से परेशान है...कभी सोचा है कि कल ऐसा क्यों नहीं था? कारण एकदम साफ है। समय की अंधी दौड़ में भागते-भागते हम पीछे मुड़कर देखना और सोचना भूल गए हैं। अगर हम ऐसा करते तो यकीनन जान पाते कि हमारी लगभग हर चीज में औषधीय गुण छिपे हैं। जरूरत है तो सिर्फ उस ओर रुख करने की। तो चलिए गौर करते हैं कुछ ऐसे ही बिंदुओं पर...
मोटा अनाज है जरूरी


क्या कभी सोचा है कि हमारे दादा-दादी के जमाने में ये मल्टीग्रेन आटा, मसाला ओट्स सरीखी चीजें नहीं होती थीं, फिर भी वो हमसे ज्यादा फिट कैसे रहते थे? आखिर क्यों हमें या हमारे अपनों को छोटी-सी उम्र में हाई बीपी, शुगर, कैंसर आदि बीमारियों से दो-चार होना पड़ रहा है? हमारी खुराक में शामिल अनाज से कैल्शियम, आयरन, फाइबर वगैरह दूर हो गए हैं। मौसमी फसल बाजरा, ज्वार आदि की जगह गेहूं और चावल ने ले ली है। नतीजा मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, शुगर तेजी से बढ़ रहा है। इस बाबत न्यूट्रीशनिस्ट बताते हैं कि पहले लोग मोटा अनाज यानी बाजरा, ज्वार, मकई आदि के आटे का प्रयोग मौसम के हिसाब से करते थे। ये अनाज कैल्शियम, आयरन, फाइबर, माइक्रो मिनरल के स्रोत हैं। पॉलिश वाले चमकदार चावल की जगह लोग सावां चावल सरीखे सुपाच्य चावल का प्रयोग करते थे।
मसालों में छिपी है दवा
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छींक आने पर दादी के हल्दी वाले दूध के नुस्खे से तो अब वैज्ञानिक भी इत्तफाक रखते हैं। हल्दी में बहुत सारे गुण हैं। यह खून साफ करती है, सर्दी-जुकाम में राहत देती है। हल्दी कैंसर प्रतिरोधक के रूप में भी काम करती है। आपकी रसोई में इसके आलावा रोग प्रतिरोधक क्षमता में इजाफा करने वाले और भी कई मसाले हैं। इनका इस्तेमाल आप रोज करती हैं। जैसे जीरा हमारे पाचन तंत्र को ठीक रखता है, काली मिर्च सांस संबंधी समस्याओं में कारगर होती है, मेथी मधुमेह को नियंत्रित करती है। अगर हम सिल और मिक्सी में पिसे मसालों की तुलना करें तो उसमें भी हमारा पुराना तरीका बेहतर साबित होता है। सिल में पिसा मसाला या चटनी न सिर्फ ज्यादा स्वादिष्ट होती है, बल्कि उसमें बट्टे से होने वाले घर्षण के कारण मसालों के पोषक तत्व पर भी असर नहीं पड़ता, जबकि मिक्सी में मसालों के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं।
गुड़ है अच्छा


गुड़ की मिठाई-कभी कल्पना की है, नहीं तो करके देखिए। सेहत और स्वाद दोनों ही मिल सकेगा। गुड़ गन्ने के रस को पकाकर बनाया जाता है। इसमें आयरन, कैल्शियम, फास्फोरस, निकल सरीखे कई पोषक तत्व की भरपूर मात्रा होती है। गुड़ हिमोग्लोबिन का अच्छा स्त्रोत है, नर्वस सिस्टम को मजबूत करता है, पाचनतंत्र ठीक रखता है और खून को साफ करता है। जबकि साफ-सुथरी सफेद दिखने वाली चीनी हमें सिर्फ और सिर्फ कैलोरी देती है। नतीजा मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, हाई शुगर।
देसी है बेहतर


मिट्टी की सोंधी-सी महक। जिसने भी वो दौर देखा है वह हमेशा उसे याद करता है। विज्ञान भी मान चुका है कि मिट्टी के बर्तन में पके खाने में पोषक तत्व ज्यादा मात्रा में होते हैं। हमारे किचन में लोहे के तवे और कड़ाही की जगह नॉनस्टिक पैन ले ली है पर, असलियत यह है कि जल्द खाना बनाने के चक्कर में हम बीमारी को न्योता दे रहे हैं।


मेटाबोलिक डिसऑर्डर नजरअंदाज न करें







क्या आपके शरीर में पोषक तत्व उचित मात्रा में बन रहे हैं? क्या आहार का पोषक तत्व में परिवर्तन सही तरह से हो पा रहा है? कहीं आपके शरीर में शर्करा अधिक या इन्सुलिन कम तो नहीं हो रही? क्या प्रोटीन उचित मात्रा में बन रहा है? यदि इस तरह की कुछ भी परेशानी है तो उसे हल्के में न लें, क्योंकि यह मेटाबोलिक डिसऑर्डर यानी चयापचय विकार के कारण हो सकता है।

हमारा शरीर सही तरह से काम करे, इसके लिए जरूरी है कि खाया गया आहार सही तरीके से ऊर्जा में बदले। शरीर द्वारा आहार को ऊर्जा में बदलने की जो पूरी प्रक्रिया की जाती है, उसे मेटाबोलिज्म यानी चयापचय प्रक्रिया कहते हैं।

हमारा आहार प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और वसा से युक्त होता है। हमारे पाचन तंत्र में कुछ ऐसे रसायन होते हैं, जो खाने को शरीर के भीतर ही शर्करा और एसिड में बदलते हैं। शरीर यह ईंधन या तो तुरंत इस्तेमाल कर लेता है या फिर इस ऊर्जा को शरीर के ऊतकों, जिगर, मांसपेशियों और शरीर में वसा के रूप में जमा कर लेता है। जब इस प्रक्रिया को असामान्य रासायनिक प्रतिक्रियाएं बाधित करने लगती हैं तो चयापचय विकार पनपने लगता है। ऐसा होने पर व्यक्ति के स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक तत्व या तो जरूरत से अधिक मात्रा में बनने लगते हैं या अत्यंत कम मात्रा में बनते हैं।
क्या हैं इसके दुष्परिणाम


हमारे शरीर में होने वाली चयापचय प्रक्रिया के बिगडऩे से विभिन्न तरह के रोगों से ग्रस्त होने की आशंका बढ़ जाती है। यही नहीं, अलग-अलग उम्र में चयापचय विकार से होने वाले रोग भी भिन्न हो सकते हैं। इन रोगों के लक्षण, कारण और इलाज भी रोग व उसकी स्थिति पर ही निर्भर करते हैं। हालांकि चयापचय प्रक्रिया के सुचारु रूप से कार्य न करने से होने वाली अधिकांश बीमारियों के इलाज संभव हैं।

कौन-कौन सी बीमारियां हो सकती हैं 
डायबिटीज 
थायराइड की परेशानी 
यूरिक एसिड बढऩा 
लिपिड विकार 
गुर्दे और अग्नाशय से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं 

बचाव के लिए क्या करें 
स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं। सोने-जागने का समय निर्धारित करें और पूरी नींद लें। नियमित व्यायाम या वॉकिंग/जॉगिंग करें। 
संतुलित आहार लें। अपने लिए जरूरी संतुलित आहार के बारे में आप स्वयं तय न कर पा रहे हों तो एक बार डायटीशियन से मिल कर जरूरी सलाह ले लें। 
सेहत संबंधी परेशानियों को नजरअंदाज न करें और डॉक्टर से मिल कर जरूरी उपचार कराएं। 
आपको डायबिटीज, बीपी जैसी कोई स्वास्थ्य संबंधी स्थाई समस्या है तो उसके लिए ली जाने वाली दवाओं को कभी नजरअंदाज न करें। 

कैसे बनाएं त्वचा को रेशमी और कोमल

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सुंदरता में सबसे ज्यादा योगदान होता है साफ और चमचमाती त्वचा का। हम सभी मुलायम और चिकनी त्वचा के साथ पैदा होते हैं, पर वक्त गुजरने के साथ हमारी त्वचा का टेक्सचर खराब हो जाता है, खास तौर पर चेहरे की त्वचा पर असर जल्दी आता है। चेहरे की त्वचा की खूबसूरती को बनाए रखने के लिए क्या-क्या करें, आइये जानते हैं-
त्वचा की समस्याएं


चेहरे की त्वचा की सबसे आम समस्या है-मुंहासे। युवावस्था में यह समस्या सबसे ज्यादा होती है। वक्त बीतने के साथ मुंहासे तो चले जाते हैं, लेकिन निशान छोड़ जाते हैं। इसलिए उपचार से ज्यादा जरूरी है कि उन्हें होने से रोका जाए। त्वचा की सफाई का विशेष ध्यान रखा जाए, अच्छी कंपनी के प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करें और कॉस्मेटिक का उपयोग कम से कम करें। 'जिन लोगों में मुंहासों की समस्या अधिक होती है उनके शरीर में इंसुलिन का स्त्राव औसत से अधिक होता है। इसके लिए जरूरी है कि अपने भोजन में कार्बोहाइट्रेट और डेयरी उत्पादों का सेवन कम करें।Ó आंखों के आसपास मौजूद डार्क सर्कल चेहरे की सुंदरता में ग्रहण लगा देते हैं। यहां की त्वचा बहुत पतली और नाजुक होती है, इसलिए जल्दी ही काली पड़ जाती है। यहां झुर्रियां भी अधिक पड़ती हैं। इस स्थान की त्वचा की सुंदरता और सुरक्षा के लिए जरूरी है कि पर्याप्त रोशनी में पढ़ा जाए, संतुलित भोजन और पर्याप्त नींद ली जाए।
त्वचा की सेहत का रखें ख्याल


चेहरे की त्वचा बहुत नाजुक होती है। दाग-धब्बे दूर करने और चेहरे को निखारने के लिए जो प्रोडक्ट बाजार में मिलते हैं। वह पिगमेंटेशन को दूर नहीं करते, सिर्फ त्वचा को ब्लीच कर देते हैं। पहले अपनी त्वचा के प्रकार और उसकी समस्याओं को समझें उसके बाद ही कॉस्मेटिक खरीदें। हर्बल प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल ज्यादा करें।

कई अध्ययनों में यह तथ्य उभर कर आया है कि व्यायाम और योग से शरीर में रक्त का संचरण बढ़ता है, तनाव कम होता है, जिससे त्वचा में निखार आता है और त्वचा की कई समस्याएं दूर हो जाती हैं। डायटीशियन सुहासिनी अग्रवाल कहती हैं, 'त्वचा की रंगत और स्वास्थ्य के लिए जरूरी है कि भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियों, मौसमी फलों, मेवों और दही को शामिल करें और जंक फूड, सॉफ्ट ड्रिंक, अधिक तैलीय और मसालेदार भोजन से बचें। ग्रीन टी का सेवन बहुत लाभदायक होता है, क्योंकि इसमें एंटीऑक्ससीडेंट होते हैं। जो सुंदर त्वचा के लिए वरदान हैं।Ó पानी और ताजे फलों का जूस त्वचा की नमी बनाए रखने में मददगार है। सुबह एक गिलास गुनगुने पानी में एक नीबू निचोड़कर पीने से पेट साफ रहता है, टॉक्सिन शरीर से बाहर निकल जाते हैं।
कॉफी के दीवाने ही समझे कॉफी की दीवानगी
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कॉफी सिर्फ एक बेवरेज नहीं है, बल्कि एक लाइफस्टाइल बन गई है। आप सुबह खुद को जगाने के लिए, दिन भर नींद भगाने के लिए और किसी दोस्त या समवन स्पेशल से मुलाकात का बहाना बनाने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। कुल मिलाकर, हर रोज, हर सिचुएशन में आप कॉफी को याद करते हैं।

कॉफी, जिसके दीवानों की गिनती लगातार बढ़ती ही जा रही है, आसानी से उपलब्ध होने वाली चीज है। दुनिया के लगभग हर कोने में कॉफी पी जाती है। कॉफी लवर्स की अपनी एक जमात है। कुछ ऐसी बातें भी हैं जो सिर्फ कॉफी के दीवाने ही समझ सकते हैं। अगर आप भी उन्हीं दीवानों में से हैं तो आइये जानें वो कौन सी बातें हैं जो आपके सिवा और कोई नहीं समझ पाता।
दिन की शुरुआत बिना कॉफी के? न बाबा न!


कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपनी सुबह की शुरुआत सूरज को नहीं बल्कि कॉफी के मग को देखकर करते हैं। कॉफी मग उनकी सुबह का अलार्म होता है, जो उन्हें जगाता है। कॉफी की वो भीनी-भीनी खुशबू जब उनके पास पहुंचती है तो वो नींद और आलस छोड़ कर खुद-ब-खुद उठ कर बैठ जाते हैं।
सारे ब्रांड और टेस्ट की जानकारी


मार्केट में कितने ब्रांड की कॉफी मिलती है आपको ये जानना हो तो कॉफी के किसी दीवाने से पूछिये। वो आपको मार्केट में अवेलेबल कॉफी ब्रांड के नाम और टाइप बताने के साथ-साथ उनकी रेटिंग भी आसानी से बता देंगे। यानी आप कौन सी कॉफी लें और कौन सी नहीं, इस बात की सलाह आपको कॉफी लवर से बेहतर कोई नहीं दे पाएगा।
ये लत नहीं, लगाव है प्यारे!


आपके घर वाले, गर्लफ्रेंड, कलीग और फ्रेंड्स सभी इस बात के लिए आपके पीछे पड़े रहते हैं कि आपको कॉफी की लत लग गई है। आपके जानने वाले लोग अक्सर आपको 'कॉफी पीने के नुकसानÓ नाम के आर्टिकल में टैग करते रहते हैं। लेकिन आपकी नजर में ये सब नादान हैं! दरअसल, सब आपके कॉफी के लगाव को कॉफी की लत समझ बैठे हैं।
क्या है आपका टेस्ट


आप अपने किसी भी दोस्त को लेकर अपने एरिया के किसी भी कैफे में चले जाएं, आपकी शक्ल देखते ही वेटर आपकी पसंद की कॉफी का ऑर्डर ले आएगा। आप अपनी कॉफी के स्टाइल के लिए इतने पर्टिक्यूलर हैं कि कैफे में जो शख्स आपका ऑर्डर तैयार करता है उसे सब याद हो चुका है कि आपकी कॉफी कितनी हार्ड, कितनी शुगर वाली और उसमें कितनी क्रीम होती है।
कॉफी मग की भरमार


आपका कॉफी का शौक आपके दोस्तों और जानने वालों के लिए एक मुश्किल को आसान कर देता है। दरअसल, आपको बर्थडे, फेयरवेल पार्टी या किसी भी खास मौके पर क्या तोहफा देना है, इस बात पर किसी को ज्यादा सोचना नहीं पड़ता। सब आपको अलग-अलग तरह के कॉफी मग बतौर तोहफे में दे देते हैं, और आप भी इस तोहफे से काफी खुश हो जाते हैं। इस वजह से आपके पास कॉफी मग का एक इतना बड़ा कलेक्शन है कि आप लगातार दो हफ्ते बिना कॉफी मग रिपीट किये कॉफी पी सकते हैं।
जिन्हें कॉफी पसंद नहीं, वो आपको पसंद नहीं


अक्सर आपका सामना उन लोगों से होता है, जो आपसे कहते हैं, 'मुझे कॉफी पसंद नहीं!Ó ऐसे लोग जिन्हें कॉफी पसंद नहीं आती, आप भी उनको पसंद नहीं करते। आप इन लोगों के ऊपर भरोसा कतई नहीं कर पाते। आपको हमेशा ये बात हैरान करती है कि कॉफी कैसे किसी को पसंद नहीं आ सकी। ये थीं कुछ ऐसी बातें जिन्हें हर कॉफी का शौकीन आसानी से समझ सकता है।


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बतायें जरूरी बातें जब बच्चा हो घर पर अकेला





वर्तमान एकल परिवार की संख्या बढ़ रही है और ज्यादातर घरों में पति-पत्नी दोनों काम करते हैं। ऐसे में घर में तीसरा मेहमान यानी बच्चा होने के बाद प्रोफेशनल लाइफ प्रभावित होती है। लेकिन धीरे-धीरे आपका बच्चा बड़ा होता है और आपको लगता है अकेले बच्चे को घर पर छोड़कर आप अपने काम से बाहर जा सकते हैं।

बच्चे को घर पर अकेले छोड़कर जाना किसी मुसीबत को बुलाने से कम नहीं है, लेकिन अगर आपको लगता है कि आपका बच्चा समझदार हो गया है और वह अकेले घर पर रह सकता है तो कुछ जरूरी बातें बताकर अकेले उसे घर पर रख सकते हैं और अपने काम के लिए बाहर जा सकते हैं। तो बच्चे को घर पर अकेला छोडऩे से पहले उसे कुछ जरूरी बातें बताकर जायें।
इमर्जेंसी नंबर की जानकारी

बच्चे को घर पर अकेला छोड़ते समय सभी जरूरी नंबरों की एक लिस्ट रख कर जाइये। इस लिस्ट में आपका नंबंर होने के अलावा सारे इमरजेंसी नंबर होने चाहिए जिससे जरुरत के समय आपके बच्चे आपको फोन मिलाकर स्थिति की जानकारी दे सकें। बच्चों को इमरजेंसी नंबरों के बारे में अच्छे से जानकारी दीजिए और उन्हें उसकी उपयोगिता की जानकारी दीजिए।
कमरे में लॉक न करें

अगर आप बाहर जा रहे हैं तो बच्चे को कमरे में लॉक करके बिलकुल भी न जायें। अगर आप बाहर हैं और बच्चे को घर में लॉक करके जा रहे हैं और आपके पीछे कोई दुर्घटना हो गई तो बच्चे के लिए मुसीबत हो सकता है। अगर घर में आग लग गई तो वह जल सकता है, इसलिए बच्चे को कभी लॉक करके न जायें।

बच्चों को कुछ जानकारी दें

बच्चों को घर में बंद करके जाने के बजाय उन्हें कुछ जानकारी दीजिए, उन्हें बताइये कि क्या करना सही है क्या गलत है। आपको अपने बच्चों को बताना चाहिये कि उन्हें घर से बाहर बेवजह नहीं निकलना चाहिये और इसके साथ जाते समय अपने पड़ोसियों को भी सूचित कर दें।

दरवाजा बंद रखना सिखाइये

जब मां-बाप घर में नहीं होते, तो चोरी की घटना होना आम बात होती है। घर पर बच्चों को अकेला छोडने से पहले उन्हें सिखाएं कि खुद को अंदर कैसे बंद रखा जाता है। दरवाजा कैस लॉक करना है और उसे कैसे खोलना है। ये सारी बातों को उनको सिखाएं।
किचन है खतरनाक

अगर आप बच्चे को घर में अकेला छोड़ रहे हैं तो किचन से उन्हें दूर रखिये। घर छोड़ते वक्त किचन बंद कर के जाना चाहिये। अगर बच्चों के लिए खाना बाहर रखना संभव है, तो रख दें। साथ ही गैस की वाल्व बंद करके ही जाएं। चाकू, छूरी को अंदर लॉक कर दें वरना बच्चे उसे खिलौना समझ कर खेलने लगते हैं और इससे चोटिल हो सकते हैं।
टीवी टाइम

बच्चे घर में होते हैं तो अपने मन की मर्जी चलाना चाहते हैं, उनकी नजर टीवी पर पहले पड़ती है। वह टीवी पर हर वह चीज देखना चाहते हैं, जो आप उन्हें देखने से मना करते हैं। इसलिए बच्चे को बता कर जायें कि उसे टीवी कब देखना चाहिए, और ऐसे चैनल लॉक करके जाइये जिससे बच्चे को गंदी शिक्षा और जानकारी मिलती हो। घर से पहले पूरी तरह सुनिश्चित कीजिए कि आपका बच्चा घर में पूरी तरह सुरक्षित है या नहीं। उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के बाद ही उसे घर में अकेला छोड़ें।
धूप सेकने से बढती है सेक्स ड्राइव की क्षमता
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धूप से न सिर्फ विटामिन डी मिलता है बल्कि इससे सेक्स ड्राइव में भी इजाफा होता है। एक शोध में पता चला है कि धूप सेक्स ड्राइव के लिए जिम्मेदार टेस्टोस्टेरोन हार्मोन के अधिक बहाव में इजाफा करता है। प्राप्त जानकारी के अनुसार ऑस्ट्रिया की मेडिकल यूनिवर्सिटी में हुई एक रिसर्च के अनुसार धूप सेकने से पुरूषों के सेक्स ड्राइव में इजाफा होता है।

शोध में पता लगा कि जिन लोगों के खून में विटामिन डी की मात्रा अधिक थी, उनमें सेक्सुअल हार्मोन टेस्टेस्टेरोन की मात्रा भी ज्यादा पायी गई। शोधकर्ताओं के अनुसार एक घंटे की धूप सेकने से टेस्टेस्टेरोन के स्तर में 69 प्रतिशत का इजाफा होता है।

दांत दर्द में पाएं राहत








दांत में कैविटी की शिकायत और दर्द होना आम है। लेकिन यदि दांत में होने वाला दर्द लंबे समय तक बना रहे तो यह परेशानी का कारण बन सकता है। दांतों के दर्द या फिर अन्य परेशानी होने में बहुत अंतर होता है।

दांत के दर्द में बहुत परेशानी होती है, इस दर्द के होने के कई कारण हो सकते हैं। कई बार कुछ गलत खाना भी दांत दर्द का कारण बन जाता है। दांतों की ठीक से सफाई न होने या कीड़ा लगने से भी दांतों में दर्द की समस्या हो जाती है। दांतों में संक्रमण भी दर्द का कारण हो सकता है। अक्सर लोग दांत दर्द होने पर एलोपैथिक दवाईयों का सेवन करते हैं, लेकिन इस दर्द से राहत के लिए कई अन्य घरेलू उपचार भी हो सकते हैं।

एलोपैथिक दवाओं का सेवन आपके लिए नुकसानदेह हो सकता है। ऐसे में इस समस्या से राहत पाने के लिए आपको घरेलू नुस्खों को अपनाना चाहिए। घरेलू नुस्खे नुकसानदेह नहीं होते और एलोपैथिक दवाओं के मुकाबले ज्यादा फायदेमंद होते हैं। इस लेख के जरिए हम आपको बताते हैं दांत दर्द में आराम देने वाले ऐसे ही कुछ घरेलू नुस्खों के बारे में।
सरसों का तेल


दांतों में दर्द की समस्या रहने पर आप नियमित रूप से सरसों के तेल में हल्दी और नमक मिलाकर अंगुली से दांतों पर रगड़ें, फायदा मिलेगा। यदि ज्यादा दर्द हो रहा है तो तुरंत राहत पाने के लिए 15 मिनट तक लगातार मालिश करें। यदि आपके दांत में दर्द नहीं भी है, तो सरसों के तेल और नमक की मालिश से आपके दांत हमेशा के लिए स्वस्थ रहेंगे।
हींग


हींद दांतों के दर्द से तुरंत राहत देती है। हींग को मौसंबी के रस में भिगोने के बाद दर्द वाले दांत के पास रखें। मौसंबी न होने पर आप हींग को नींबू के रस में भी डुबो सकती हैं। ऐसा करने से आपको कुछ देर बाद दांत दर्द में आराम मिलेगा।
बर्फ


बर्फ दर्द वाली जगह को सुन्न करने में मदद करता है। यदि आप दर्द वाले दांत पर कुछ समय के लिए बर्फ रखेंगे तो आपको राहत मिलेगी। यदि आपके दांत में खाली होने के कारण दर्द हो रहा है, तो बर्फ न रखें। ऐसे में बर्फ का टुकड़ा रखना ज्यादा परेशानी भरा हो सकता है।
लौंग


लौंग का सेवन या लौंग का तेल दांत दर्द में बहुत ही असरदार होता है। जिस दांत में दर्द हो रहा है, उस पर लौंग का तेल लगाने से वैक्टीरिया के असर को कम किया जा सकता है। दरअसल, दांतों में कई बार बैक्टीरिया जम जाते हैं और ये दर्द का कारण होता है।
प्याज

आमतौर पर सलाद के रूप में खाई जाने वाली प्याज एक अच्छे दर्द निवारक का भी काम करती है। दर्द होने पर प्याज का सेवन या प्याज का रस लगाने से राहत मिलती है। कच्ची प्याज के सेवन से मुंह घाव और बैक्टीरिया आदि खत्म हो जाते हैं।
लहसुन


लहसुन की एक कली को सेंधा नमक के साथ पीसकर दर्द वाले दांत में लगाने से दर्द में राहत मिलती है। यदि आप इसे पीस भी न सकें तो लहसुन की कली को दर्द वाले दांत के ऊपर रखने से आराम मिलेगा।
तंबाकू


अक्सर देखा जाता है कि जो लोग तंबाकू का सेवन करते हैं, उन्हें दांत दर्द की शिकायत कम होती है। तंबाकू में नमक मिलाकर इस पाउडर से रोजाना ब्रश करने से दांतों में दर्द की शिकायत नहीं रहती।
गर्म पानी से सेंक


यदि आप कोई प्रयोग नहीं करना चाहते, तो दर्द वाली जगह पर गर्म पानी के सेंक से आराम मिलेगा। आप चाहे तो गर्म पानी से गार्गल भी कर सकते हैं। गर्म पानी से भाप लेने से भी दांतों के दर्द को दूर करने में मदद मिलती है। गर्म पानी हल्का नमक डालना फायदेमंद रहेगा।








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जननांगों पर मस्से या दानें



जननांगों पर मस्से (जेनिटल वाटर्स) होने का कारण ह्यूमन पैपीलोमा-वायरस (एचपीवी) है। यह पूरे विश्व में सबसे आम पाया जाने वाला यौनसंचारित रोग है। आपके जननांगों (लिंग, योनि या गुदा) पर एचपीवी संक्रमण हो सकता है, इसके साथ-साथ यह आपके मुंह के अंदर और गले में भी हो सकता है।

एचपीवी से संक्रमित अधिकांश लोगों को इसका पता नहीं चलता क्योंकि उन्हें मस्से या दाने होने का पता नहीं होता। फिर भी संक्रमित व्यक्ति से यह दूसरों को लग सकता है।

जननांग पर हुए मस्सों का कोई इलाज नहीं है। या तो वे अपने-आप ठीक हो जाते हैं अथवा इन्हें दबाने के लिए आपको उपाय तलाशने होते हैं।
जननांग पर मस्से कैसे होते हैं?
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असुरक्षित मुख, यौन और गुदा मैथुन करने से आपको जननांग पर मस्से हो सकते हैं। साथ ही यह विषाणु किसी ऐसे व्यक्ति के सेक्स ट्वाय का प्रयोग करने से भी आपको हो सकता है, जिसके जननांग पर मस्से तो नहीं हैं किंतु वह ह्यूमन पैपीलोमावायरस से संक्रमित है।

साथ-साथ नहाने, एक ही तौलिया, प्याले या चम्मच, कांटे आदि का प्रयोग करने से यह आपको नहीं लगता हैं, न तो यह तरण ताल (स्वीमिंग पूल) में तैरने या टॉयलेट सीट का प्रयोग करने से होता है।

जननांग पर होने वाले मस्सों (जेनाइटल वार्ट्स) के लक्षण क्या हैं?

जननांग पर होने वाले मस्सों से बचने के लिए आप निम्नलिखित उपाय कर सकते हैं-

1. टीके लगवाएं

2. जेनाइटल वार्ट्स, जिस विषाणु, ह्यूमन पैपीलोमा-वायरस (एचपीवी) के कारण होता है, उससे प्रतिरक्षा के लिए टीके उपलब्ध हैं।

ऐसे 40 प्रकार के एचपीवी जिनके कारण जेनिटल वार्ट्स होते हैं, इनमें से केवल 4 सबसे आम एचपीवी के खिलाफ ये टीके सुरक्षा प्रदान करते हैं। महिलाओं और लड़कियों के लिए दो टीके - सर्वारिक्स और गार्डासिल, उपलब्ध हैं। गार्डासिल सभी चार प्रकार के एचपीवी से सुरक्षा प्रदान करता है, इसकी तुलना में सर्वारिक्स केवल दो प्रकार के एचपीवी से सुरक्षा प्रदान करता है। पुरुषों और लड़कों के लिए केवल गार्डासिल उपलब्ध है। लड़कियां एवं लड़के दोनों ही इन टीकों को 9 से 26 वर्ष की उम्र के बीच लगवा सकते हैं।

3. हमेशा कंडोम का प्रयोग करें।

कंडोम का प्रयोग करने से आपको जेनिटल वार्ट्स होने या उनके फैलाने का जोखिम कम हो सकता है। हालांकि उनसे पूरी तरह जोखिम खत्म नहीं होता, क्योंकि जेनिटल वार्ट्स उन जगहों पर भी हो सकते हैं जो कंडोम से नहीं ढकी होती हैं।

4. कम साथियों के साथ यौन संबंध बनाएं।

आपको जेनिटल वार्ट्स होने का जोखिम उतना ही बढ़ता जाता है, जितने अधिक आपके यौन संबंध बनाने वाले साथी होते हैं- यौन संबंध बनाने वाले साथियों की संख्या के साथ-साथ यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आपके पूरे जीवन काल में आपके कितने यौन संबंध बनाने वाले साथी रहे हैं।

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