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आखिर में ध्यान साधना है क्या:-

आखिर में ध्यान साधना है क्या:-
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आज बात करते है कि ध्यान साधना है क्या और यह किस लिए की जाती है। सबसे पहले आपको यह समझना होगा कि यह एक ऐसा रहस्यमय विज्ञान है जिसके बारे में लिखित रूप में कुछ भी उल्लेख नही मिलता है। जो भी मिलेगा वह सिर्फ हठयोग की विधियों के रूप में या उनके मूल रूप से छेेड़छाड़ कर लिखी गई नई व आधुनिक लेखकों के लुभावने शब्दों के साथ ही मिलेगा। जिस प्रकार आज तक लंकापति रावण के नाभी के रहस्य को कोई नही समझ सका बस एक लुभावना व आकर्षण भरा शब्द अमृत का प्रयोग कर दिया है। जबकि रावण का एक राजा के रूप में जीवन शुरू होने से पहले ही वह ब्रह्मांड के रहस्यों को जान गया था। जिसको इतना ज्ञान हो उसके नाभी के रहस्य को हम समझ सके असंभव कार्य है।
इसका रहस्य आदियोगी शिव ने अपनी गुरू शिष्य परंपरा में विस्तार से बताया था। आज के भौतिक जगत के व्यक्ति में इतना धैर्य नही है कि वह मानव शरीर के भौतिक व आध्यात्मिक रहस्यों को जान सकें। जब आप और हम में इतना धैर्य नही है तो इस बात की कामना आप भौतिक जगत के गुरूओं से कैसे कर सकते है कि वह ध्यान साधना के गूढ़ रहस्यों को उजागर कर बता व समझा सकें।
व्यक्ति सामान्य रूप से जिस रूप में ध्यान करते है। वह एक सामान्य प्रक्रिया है अगर उसे भी सही क्रम व रूप में नही किया जाता है तो वह भी सिरे नही लगता है। इसका सबसे मुख्य कारण उनका किताबी ज्ञान है। जो कि एक कल्पनात्मक व भ्रमित करने वाला ज्ञान ही होता है। इसीलिए ध्यान साधना के पथ पर अग्रसर होने वाले साधको को पूरी तरह से किसी भी प्रकार की किताबें व ग्रंथों के अध्ययन के लिए इसी कारण सख्त मना किया जाता है कि वह भ्रमों से दूर रहें। और व्यावहारिक ज्ञान पर बल और उसे धारण कर सके।
ध्यान साधना में आपको प्रत्येक अवस्था का पूर्ण रूप से ज्ञान दिया जाता है। क्योंकि इसमें आपको एक के बाद एक कई प्रकार के व्यावहारिक ज्ञान के कारण व उसके पीछे के रहस्यों को पूर्ण रूप से समझाया जाता है। ध्यान साधना के पथ पर आपको सीधे ही धकेला या अग्रसर नही किया जाता है। बल्कि आपको पूरी तरह से इस रूप में पूर्ण बनाया जाता है कि ना तो आपके भीतर कोई जिज्ञासा बचे और ना ही कोई प्रश्न की चाह पैदा हो ताकि आप लंबे अरसे और इंतजार के बाद जब इस मार्ग पर अग्रसर होकर चले तो आप ध्यान साधना के मार्ग में होने वाली हर हलचल के सकारात्मक व नकारात्मक प्रभाव को पहचान व उसका पूर्ण रूप से समाधान कर सके।
इसीलिए मैंने अपनी पिछली कई पोस्टो में लिखा भी था कि प्राणायाम वगैरह करना व उसके साथ जो ध्यान किया जाता है वह एक सामान्य ध्यान की अवस्था है। अगर इसे इसकी क्षमता से हल्का सा भी ज्यादा दबाव के साथ शारीरिक या आज्ञा चक्र में एकाग्रता के साथ देखते हुए किया जाता है तो यह अपने आप हानिकारक अवस्था में बदल जाता है।
मेरी कई बार फेसबुक के ध्यान साधको के साथ बहस हुई थी कि अपान वायु को ऊपर चढ़ाये बिना कुंडलिनी शक्ति को ऊपर नही उठा सकते है। मगर जब मैंने उनसे पूछा कि आप ऊपर नीचे की यह क्या करती है क्या नही करती है कि बात छोड़े मुझे सिर्फ इतना ही बता दे कि यह वायु शरीर में बनती कैसे है व इसकी पहचान क्या है??? हम इस विषय पर चर्चा नही कर रहे है कि आप क्या करते है आप किस अवस्था में है और आप पर किसने शक्तिपात किया है किसने नही किया है। या आप स्वयं सिद्ध पुरुष हुए है।
मित्रों मेरी बात आपको थोड़ा अजीब लग सकती है। मगर यह भी कुंडलिनी शक्ति के जागरण से पहले की अवस्था है। यह वायु आपके पूरे जीवन काल में कभी भी नही बन सकती है। जब तक आपको प्रोपर मार्ग नही मिल जाता है। तब आप सिर्फ चक्र और चक्रों की महिमा कितने चक्र किस क्रम में कौनसे चक्र में किस देवी या किस देवता का वास है व उसकी अनुभूति के चक्कर में उलझे रहते है।

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अपान का क्या विज्ञान है यह कब बनती है और यह किस अवस्था में जाकर बनती है इसका मुख्य कारण व कार्य क्या होता है अपान कभी ऊपर नही उठती है। बल्कि यह बनना स्वयं ही बंद हो जाती है। पूरे विधान और विज्ञान को बस चंद शब्दों में ही समझाया गया है कि जब तक अपान ऊपर नही उठेगी तब तक कुंडलिनी शक्ति ऊपर नही उठेगी मगर अपान को व्यावहारिक रूप में जानना ही सबसे ज्यादा अहम है ना कि अपान का नाम जानना।
ध्यान करना व ध्यान साधना के शब्दों में ही बड़ा अंतर है। हम सुबह आँखों बंद कर किसी मंत्र तथा त्राटक से या शक्तिपात लेकर ध्यान किया जा सकता है ध्यान साधना नही। ध्यान करने वाले ध्यान में दस-पंद्रह साल सुबह शाम नियम पूर्वक करने में गुजार देते है।
जबकि ध्यान साधना में बेसिक नोलेज को व्यावहारिक रूप में जानने व एनर्जी के भौतिक शरीर में परिवर्तन आदि को समझने मे ही उतने साल गुजार देते है कि जब भी रहस्य मिले तो फिर शंका समाधान जिज्ञासा मे उलझ कर ना रह जाए व हर प्रकार की अवस्था व परिस्थिति के लिए तैयार रहें।
हकीकत में जब ध्यान साधना की शुरुआत होती है तब एक से दो साल के भीतर ही आप स्वयं को शारीरिक परिवर्तन के रूप में बदल कर हर प्रकार से तैयार हो जाते है व पूर्ण रूप से खुद को एनर्जी सोर्स रूप में बदलने लगते है। ध्यान साधना के मार्ग में गुरू आज्ञा के पालन का बड़ा ही ज्यादा और रहस्य से भरा महत्व है। ध्यान साधना के साधको का अंतिम लक्ष्य चेतना के लक्ष्य को भेदना चाहे वह कुछ भी कर रहे है। किसी भी अवस्था और परिस्थिति में से क्यों न गुजर रहे हो। बस लक्ष्य पर से नज़र नही हटा सकते है।
मेरी कल की पोस्ट को लेकर कुछ ऐसे व्यक्तिगत प्रश्न भी हुए पैरों के तलवों में ऊर्जा का प्रवाह एक बात है और आपके पैरों में हल्की हल्की थकान होना एक अलग विषय जो ऊर्जा के प्रवाह के रूकने से होने वाली समस्या है। आप पिछली जितनी भी पोस्ट को पढ़ेगे तो पायेगे कि मेरी पोस्ट और आपकी ध्यान की अवस्था में बहुत बड़ा आधारभूत अंतर नजर आयेगा क्योंकि आप ध्यान करते है और मैं ध्यान साधना के बेसिक नोलेज पर अक्सर लिखता रहता हूँ...........आप पढ़ते रहए 

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