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योगासन के नियम और विधियाँ


योगासन के नियम और विधियाँयोगासन के के लिए इमेज परिणाम


स्वस्थ रहने के लिए जितना पोषक तत्वों से परिपूर्ण भोजन करना ज़रूरी है उतना ही शरीर को फिट और स्वस्थ रखने के लिए योगासन ज़रूरी है। योगासन करने से पहले योगासन के नियमों का जानना आवश्यक है ताकि इन नियमों का पालन कर आप योगासन पूर्ण लाभ उठा सकें।
Yog & Yogasan Basics in Hindi

योगासन के नियम

1. योगासनों का अभ्यास प्रातः काल करना चाहिए। स्नान करके योगासन किया जाये तो और भी अच्छा रहेगा क्योंकि स्नान करके शरीर हल्का होता है। वैसे शाम के समय भी जब पेट खाली हो तो ये आसन किये जा सकते
हैं।

2. आसन करने का स्थान शांत व स्वच्छ होना चाहिये। किसी बगीचे में आसन किया जाये तो बहुत अच्छा है।


3. जिस स्थान पर आप आसन करें वह समतल होना चाहिए।

4. दरी या चटाई बिछाकर आसन करना चाहिए। ताकि भूमि की चुम्बकीय शक्ति आपका ध्यान तोड़े नहीं और नीचे से कोई भी चीज़ आपको गड़े नहीं।

5. योगासन करते समय बातचीत बिलकुल भी न करें। अपने ध्यान को साँस (साँस लेना) और जिस अंग पर बल पड़ रहा हो, उस पर लगायें। जितना अधिक आप एकाग्र होकर आसन करेंगे उतना ही शारीरिक और मानसिक लाभ आपको मिलेगा।

6. आसन शुरू करने से पहले शव आसन करने से पहले अपने शरीर और मन को शांत कर लें।

7. योगासनों का अभ्यास धीरे धीरे बढ़ायें। आसन की पूर्ण स्थिति तक जाने का प्रतिदिन अभ्यास करें।

8. योगासनों का अभ्यास सभी वर्ग के लोग कर सकते हैं।

9. कुछ विशेष आसनों को विशेषज्ञ की देख रेख में करना चाहिए।

10. योगासन करने वाले व्यक्ति को अपना भोजन हल्का करना चाहिए। भोजन जितना हल्का होगा उतनी उसकी कार्य शक्ति बढ़ जायेगी। शरीर भी हल्का रहेगा।

11. कठिन रोगों और ज्वर से पीड़ित व्यक्ति को आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए।

12. गर्भवती महिलाएँ केवल तीन महीने तक आसन कर सकती हैं इसके बाद आसन उन्हें त्याग देना चाहिए। इसके बाद उन्हें सैर या हल्का व्यायाम करना चाहिए।

13. केवल स्वस्थ व्यक्ति ही आसन का अभ्यास कर सकती हैं।

14. शुरू में एक ही दिन बहुत से आसन न करे।

15. आसन की पहली स्थिति से अंतिम स्थिति और अंतिम स्थिति से वापिस पहली स्थिति में जल्दी जल्दी ना आये।

16. योगासन का अभ्यास ठीक हो रहा है या नही और उसका लाभ आपको मिल रहा है या नही।उसकी पहचान यह है कि आपका शरीर आसन करने के बाद थकावट रहित हो और हल्का फुल्का हो और कार्य करने की शक्ति भी बढ़ जाये।

17. योगासनों की समाप्ति के बाद कुछ समय के लिए शव आसन अवश्य करें। आसनों का लाभ आपको तभी मिल पायेगा, जब आप शव आसन करके अपने शरीर को थोड़ा विश्राम दें। यह अपने आप में एक पूर्ण आसन है।

18. योगासन करने के बाद कम से कम आधे घंटे तक कुछ ना खायें।

19. योगासन करने के बाद एक घंटे आराम करने से योगासनों का विशेष लाभ होगा।

20. योगासन के नियमित अभ्यास से शरीर स्वस्थ व पुष्ठ होता है।


ताड़ासन करने की विधि और लाभ




यदि आप कब्ज़ या शरीर के अन्य रोगों से बेहद परेशान हैं। तो योगासन को अपने जीवन का एक अहम हिस्सा बनाये और कई रोगों से मुक्त हो जाएं। क्योंकि योग में कई प्रकार के रोगों का शमन करने की शक्ति है। योग न केवल आपको रोग मुक्त रखता है बल्कि एक बेहतर जीवन जीने की कला को भी सिखाता है। तो आज हम आपको ऐसे ही एक योग ताड़ासन Tadasana के बारे में बताने जा रहे हैं। जिसे नियमित रूप से करने से आपको अवश्य लाभ होगा।

ताड़ासन करने की विधि

इस आसन में पैर के पंजों के बल खड़े होकर शरीर को ऊपर की ओर उठाया जाता है। इसलिए इसे ताड़ासन कहते हैं।
दोनों पैरों में एक फुट का अंतर छोड़ कर सीधे खड़े हो जाइए।
दोनों हाथों को ऊपर उठाकर उंगलियों को सीधे ऊपर की ओर रखें।
इसके बाद सांस अंदर की ओर लेते हुए हाथों को ऊपर की ओर उठायें तथा पंजों के बल अधिक से अधिक ऊपर उठने का प्रयास करें।
इस प्रकार न केवल हाथ पैरों में नहीं बल्कि पेट की पेशियों में भी खिंचाव होना चाहिए।
फिर एड़ी भूमि पर रखें और हाथ नीचे कर लें।
यदि संभव हो तो सिर को पीछे की ओर झुका कर हाथ को ऊपर की ओर करके उंगलियों को अपलक देखें।
इससे शरीर का संतुलन विकसित होता है। यदि ऐसा करने में कठिनाई हो तो पंजों के बल ही कुछ कदम आगे आगे चलना चाहिए।
लगातार अभ्यास करने से जल्दी ही संतुलन बनाने में आसानी होती है।

इस आसन को दिन में कम से कम 10 बार करना चाहिए।
ताड़ासन के लाभ


1. हाथों एवम् पैरों की उंगलियों, कंधों, टखनों और घुटनों के जोड़ों और पेशियों की समस्या दूर हो जाती है।
2. इस आसन में शरीर का लंबवत प्रसार चरम सीमा तक होता है।
3. पेट के अंदरुनी हिस्सों में खिंचाव आने से कार्य क्षमता में वृद्धि होती है।
4. यह आसन महिलाओं के लिए बहुत उपयोगी है।
5. बच्चों की लम्बाई और वृद्धि में बहुत उपयोगी मन जाता है।
6. ताड़ासन से बच्चों में हीनता की भावना की दूर होती है।
7. इस आसन में सांस लेते समय फेफड़ों का लंबवत विकास होता है।जिससे बंद कोष खुलकर सक्रिय हो जाते है। कोषों में जमा कार्बन बाहर निकल जाता है और इनमें लचीलापन बना रहता है।
8. अंतिम स्थिति में हाथ की उंगलियों को देखने से संतुलन व एकाग्रता शक्ति बढ़ती है।

आप भी आपने जीवन में योग को जगह दें और एक स्वास्थ्य और बेहतर जीवन की शुरुआत करें।



धनुरासन करने की विधि और लाभ

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आज हम धनुरासन के चरण और लाभ के बारे में जानेंगे। जैसा कि हम जानते ही हैं कि आसनों के अभ्यास से मन की चंचलता धीरे धीरे दूर होकर मन में स्थिरता और शांति आती है। आसनों के निरंतर अभ्यास से अनेक प्रकार के मानसिक विकारों का शमन होता है। आसनों का प्रत्यक्ष प्रभाव स्नायुमंडल पर पड़ता है जिससे तनाव और उत्तेजना से बचाव होता है और मानसिक संतुलन बना रहता है।

योगासनों से मस्तिष्क संबंधी विकृतियां भी दूर होती हैं। इससे मस्तिष्क का संतुलन बना रहता है। योग के ऐसे कई महत्वपूर्ण अंग है जो व्यापक रूप में व्यक्तिगत अनुशासन पर बल देते हैं। इनका एक एक अंग महत्वपूर्ण है। यदि इनका भली भाँति पालन किया जाए तो मानसिक रोगों से भी बचा जा सकता है।


अपरिग्रह और संतोष दो चीज़ों पर सबसे ज़्यादा ध्यान देने की आवश्यकता हैं क्योंकि मानसिक रोग की अभिवृद्धि में ये सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आसनों के नियमित उपयोग से हम मानसिक रोगों से मुक्ति पा सकते हैं।


योगासनों में सूर्य नमस्कार , उत्तानपादासन , वज्रासन , कुक्कुटासन , धनुरासन , मयूरासन , प्राणायाम , शवासन आदि ऐसे साधन हैं जिनको नियमित रूप से करने से मनुष्य मनोविकारों से दूर हो सकता है।
धनुरासन करने की विधि
सबसे पहले पेट के बल लेट जाएं।
फिर घुटनों तक अपनी टांगों को मोड़ दीजिए।
दोनों हाथों से अपने टखनों को पकड़ लीजिए।
पांचों अंगुलियों को एक ओर रखिए।
पहले पांव को बाहर की ओर खोलते हुए अपने घुटनों को ऊपर की ओर उठाइए।
अब आगे से सांस भरते हुए छाती को भी उठाइए।
गर्दन ऊपर उठाते हुए ऊपर की ओर देखिए।
पूरी तरह धनुष की स्थिति में आ जाएं। पूरी शक्ति लगाते हुए आगे और पीछे का भाग उठाएं ताकि केवल पेट भूमि को छुए।
अब धीरे धीरे सांस छोड़ते हुए वापस आ जाएं और अब शिथिलाशन करें ।
धनुरासन के लाभ
इस आसन से रीढ़ की हड्डी पर पूरा दबाव पड़ता है, इससे लचक आती है।
पेट के विकार और मोटापा भी दूर होता है।
इससे गले , फेफड़े व पसलियों का विशेष व्यायाम होता है।

आपको धनुरासन से लाभ अवश्य मिलेगा, इसीलिए आप प्रतिदिन योगाभ्यास प्रारम्भ कीजिए।


उत्तानपादासन से पैरों के दर्द और पेट विकार में लाभ
मानव शरीर के लिए योग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका सम्बंध शरीर के अंगों, अन्तःकरण और आत्मा से है। योग के द्वारा हम शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्त हो जाते हैं और हम शारीरिक रूप से स्वस्थ रहते हैं। हमारी बौद्धिक शक्ति भी तीव्र होती है। योग के कारण कई लोगों का जीवन तनाव मुक्त हो गया है। योग के कारण कई लोग आज ख़ुशहाल और समृद्ध जीवन जी रहे हैं। आप भी योग को अपने जीवन में अपनाएं। तो आइए ऐसे ही एक आसान उत्तानपादासन के करने की विधि को सीखते हैं –
उत्तानपादानसन के चरण


उत्तानपादासन करने की विधि भूमि पर लेटकर और पैरों को ऊपर उठाकर जो मुद्राएं बनाई जाती हैं, उसे उत्तानपादासन कहते हैं।
सबसे पहले भूमि पर एक सपाट आसन बिछा लें। अब इस आसन पर पीठ के बल लेट जायें और दोनों पैरों को आपस में सटा कर रखें।
सारे शरीर को ढीला रखें। दोनों हथेलियां भूमि पर स्थिर रहें।
अब दोनों पैरों को धीरे धीरे ऊपर की ओर सीधा उठायें। पैरों को 30 डिग्री ऊपर लें जाकर सांस रोकें, जितने समय तक आप सरलता से रोक सकें।
फिर आप सांस को छोड़ते हुए पैरों को धीरे धीरे भूमि पर लाएं।
पुनः सांस को भरते हुए पैरों को ऊपर की ओर उठायें। अब 60 डिग्री का कोण बनायें। सांस रोककर, जितनी देर आप रोक सकें, रुकें।
फिर सांस छोड़ते हुए पैरों को भूमि पर ले आयें।
प्रारम्भ में इस क्रिया को तीन बार और तीन मिनट तक करना चाहिए। जिनके पास समय का आभाव न हो वे इस क्रिया को अधिक बार और अधिक समय तक भी कर सकते हैं।
इस आसन से पेट और पैरों की मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है अतः झटके के साथ पैरों को भूमि पर न लायें। ऊपर ले जाते समय भी धीरे धीरे ले जायें। वापस आते समय भी पैरों को धीरे धीरे भूमि पर रखना चाहिए।
उत्तानपादासन के लाभ
उत्तानपादासन करते समय मुख्य रूप से पैर उठाते समय मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है। जिससे पैर में होने वाली सनसनाहट एवं दर्द की शिक़ायत दूर हो जाती है। महिलाओं के लिए यह आसन सर्वोत्तम हैं।
इस आसन को करने से पैरों में सूजन व दर्द इत्यादि की समस्या से छुटकारा मिल जाता है।
इस आसन को करने से पाचन क्रिया ठीक रहती है और यकृत अपना कार्य सुचारू रूप से करता है।

आशा है इस योगासन से आपको लाभ अवश्य प्राप्त होगा।




सूर्य नमस्कार के 12 आसन व विधियाँ

सूर्य नमस्कार सभी योगासनों में सर्वश्रेष्ठ है। इस आसन को सुबह सूर्य के सामने करने चाहिए। जिससे हमे विटामिन डी मिलता है। इसके नियमित अभ्यास से मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है। वज़न और मोटापा घटाने में भी सूर्य नमस्कार बेहद लाभकारी है। इसके अभ्यास से साधक का शरीर निरोगी और स्वस्थ रहता है। इस आसन को बच्चों से लेकर बड़ों तक, स्त्री हो या पुरुष कोई भी कर सकता है।

सूर्य नमस्कार के लाभ
Benefits of Surya Namasakar
सूर्य नमस्कार से हमारा सारा शरीर प्रभावित होता है। इससे हमारे शरीर को शक्ति और स्फूर्ति मिलती है। सूर्य नमस्कार से शरीर की मांस पेशियाँ, आमाशय, जिगर, गुर्दे, पित्ताशय, फुसफुस को बल मिलता हैं, रीढ़ की हड्डी मज़बूत बनती और कमर में लचक उत्पन्न होती है। सूर्य नमस्कार हमारे शरीर के त्वचा सम्बन्धित रोगों का, उदर के रोगों का शमन करता और पाचनतंत्र की क्रियाशीलता में वृद्धि करता है। इसके नियमित अभ्यास से मन एकाग्र होता है और आलस्य, अतिनिद्रा आदि विकार दूर हो जाते हैं। सूर्य नमस्कार करने से आँखों की रोशनी बढ़ती है, ख़ून का प्रवाह तेज़ होता है, ब्लड प्रेशर में आराम मिलता है और कई रोगों से छुटकारा मिलता है। सूर्य नमस्कार की तीसरी व पांचवीं स्थितियाँ सर्वाइकल एवं स्लिप डिस्क वाले रोगियों के लिए वर्जित हैं।
सूर्य नमस्कार के 12 आसन व विधियाँ
Surya Namaskar Ke 12 Aasan

सूर्य नमस्कार में कुल 12 आसन होते हैं। इसमें 6 विधि के बाद फिर उन्हीं 6 विधि को उल्टे क्रम में दोहराते हैं। इस आसन को सुबह सूर्य की किरणों के सामने करना चाहिए। इन आसनों का अभ्यास स्वच्छ और खुलें हवादार वातावरण में करें। इन आसनों को क्रम बद्ध रूप से करना चाहिए।
सूर्य नमस्कार को स्टेप बाई स्टेप करने की विधि


1. प्रणामासन । Pranamasana

पहले सीधे खड़े हो जाएँ। फिर दोनों हाथों को कंधे के समानांतर उठायें। दोनों हथेलियों को ऊपर की ओर ले जाएँ। हथेलियों के पृष्ठ भाग एक-दूसरे से चिपके रहें। फिर उन्हें उसी स्थिति में सामने की ओर लाएँ। तत्पश्चात नीचे की ओर गोल घुमाते हुए नमस्कार की मुद्रा में खड़े हो जाएँ।
2. हस्तउत्तानासन । Hastauttanasan

अब गहरी श्वास भरें और दोनों हाथों को ऊपर की ओर ले जाएं। अब हाथों को कमर से पीछे की ओर झुकाते हुए भुजाओं और गर्दन को भी पीछे की ओर झुकाएँ।
3. हस्तपादासन । Hasta Padasana

इस स्थिति में आगे की ओर झुकतें हुए श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालें। हाथों को गर्दन के साथ, कानों से लगाते हुए नीचे लेकर जाएँ और हाथों से पृथ्वी का स्पर्श करें। अब कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें और घुटनों को एक दम सीधा रखें।
4. अश्वसंचालासन । AshwaSanchalanasana

इस स्थिति में हथेलियों को भूमि पर रखें। श्वास को लेते हुए दायें पैर को पीछे की ओर ले जाएँ। अब गर्दन को ऊपर की ओर उठाएँ। अब इस स्थिति में कुछ समय तक रुकें।
5. अधोमुखश्वानासन । Adho Mukha Svanasana

इस स्थिति में श्वास को धीरे-धीरे छोड़ते हुए बायें पैर को पीछे की ओर ले जाएँ। ध्यान रहें इस स्थिति में दोनों पैरों की एड़ियाँ परस्पर मिली हुई हों। अब गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कंठ में लगाने का प्रयास करें।
6. अष्टांगनमस्कारासन । AshtangaNamaskara

इस स्थिति में धीरे धीरे श्वास लें और शरीर को पृथ्वी के समानांतर रखें जैसे आप दंडवत प्रणाम के समय होते हैं, ठीक उसी के प्रकार शरीर को पृथ्वी के समानांतर रखें। अब घुटने, छाती और ठोड़ी पृथ्वी पर लगा दें। छाती को थोड़ा ऊपर उठायें। अब धीरे धीरे श्वास छोड़े।
7. भुजंगासन । Bhujangasana

इस स्थिति में धीरे-धीरे श्वास को लेते हुए छाती को आगे की ओर खींचे। हाथों को सीधे रखें, हथेलियां पृथ्वी पर लगी हों। अब गर्दन को धीरे धीरे पीछे की ओर ले जाएँ। घुटने पृथ्वी का स्पर्श करें तथा पैरों के पंजे खड़े रहें।
8. अधोमुखश्वानासन । AdhoMukhaSvanasana

यह स्थिति पांचवीं स्थिति के समान है। इस स्थिति में श्वास को धीरे-धीरे छोड़ते हुए बायें पैर को पीछे की ओर ले जाएँ। ध्यान रहें इस स्थिति में दोनों पैरों की एड़ियां परस्पर मिली हुई हों। अब गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कंठ में लगाने का प्रयास करें।
9. अश्वसंचालासन । AshwaSanchalanasana

यह स्थिति चौथी स्थिति के समान है। इस स्थिति में हथेलियों को भूमि पर टिकाएं। श्वास को लेते हुए दायें पैर को पीछे की ओर ले जायें। अब गर्दन को ऊपर उठाएँ। अब इस स्थिति में कुछ समय तक रुकें।
10. हस्तपादासन । Hasta Padasana

यह स्थिति तीसरी स्थिति के समान हैं। इस स्थिति में आगे की ओर झुकतें हुए श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालें। हाथों को गर्दन के साथ, कानों से लगाते हुए नीचे लेकर जाएँ और हाथों से पृथ्वी का स्पर्श करें। अब कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें और घुटनों को एक दम सीधा रखें।
11. हस्तउत्तानासन । Hastauttanasana

यह स्थिति दूसरी स्थिति के समान हैं। इसमें धीरे धीरे श्वास भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा भुजाओं और गर्दन को पीछे की ओर झुकायें।
12. प्रणामासन । Pranamasana

यह स्थिति पहली स्थिति के समान रहेंगी।

सूर्य नमस्कार को करने के बाद कुछ देर शवासन करें।

सूर्य नमस्कार की बारह स्थितियाँ हमारे शरीर के समस्त रोगों को दूर कर हमें निरोगी बनाती हैं। इसके नियमित अभ्यास से शरीर की फ़ालतू चर्बी कम हो जाती है। तो इस आसन के नियमित अभ्यास से निरोगी काया को पायें और एक स्वस्थ जीवन बितायें।


उष्ट्रासन की विधि और लाभ

क्रोध मनुष्य का वह अवगुण है, जिस पर उसका कोई संयम नहीं रहता। परिणाम स्वरूप से आपसी सम्बंधों में अक्सर दरारें आ जाती हैं। क्रोध हमारी दिनचर्या और सफलता दोनों को बाधित करती है। अतः एक सफल जीवन जीने के लिए क्रोध पर नियंत्रण करना अति आवश्यक है। उष्ट्रासन योग आपको एक ऐसी जीवनशैली देता है, जिसके द्वारा आप न केवल अपने क्रोध पर संयम कर सकते हैं, बल्कि योग को अपनाकर तन और मन से स्वस्थ भी रह सकते हैं। आज क्रोध को कम करने के लिए उष्ट्रासन करने की विधि को सीखेंगे।

उष्ट्रासन के चरण । Ustrasana Steps
भूमि पर एक मोटी दरी बिछाकर अपने घुटनों के बल बैठ जाएँ।
घुटने को अपने कूल्हे की चौड़ाई के बराबर फैलाएं, इससे ज़्यादा नहीं।
अपने दोनों हाथ कमर पर इस प्रकार रखें, कि उंगलियां पेट की ओर हों और अंगूठा पीठ में गुर्दो पर, इस स्थिति में गर्दन को पीछे लटकाते हुए कमर को पीछे झुकाएं।
इस स्थिति में कुल्हे आपके घुटने के ठीक ऊपर होने चाहिए।
जब आप पूरी तरह झुक जाएं तो हाथों को कमर से हटाकर पैरों के तलवों पर ले जाएं, श्वास भरकर पेट को आगे की ओर खीचें और गर्दन को पीछे की ओर मोड़ते हुए शरीर को पूरी तरह खीचें।
अब गहरी साँस लीजिए, थोड़ी देर इस स्थिति मे रुके फिर धीरे धीरे पुन: प्रारम्भ की स्थिति में आ जाएं।
थोड़ी देर रुकें। धीरे धीरे पुनः अभ्यास करें।
उष्ट्रासन के लाभ
पीछे की तरफ मुड़ने वाले इस आसन से हमारे स्नायु तंत्र और मेरुदंड पर असर पड़ता है और आपको तनाव भरी परिस्थितियों में स्वयं पर नियंत्रण करने में आसानी होती है।
पीछे की ओर मुड़ते हुए अपनी श्वसन क्रिया पर ध्यान लगाने से मन शांत रहता है। जिससे अहम भाव को समाप्त करने में सफलता मिलती है।
यह आसन सर्वाइकल स्पांडलायटिस में बहुत लाभकारी है।
यह पाचन शक्ति को ठीक कर पेट के विकारों को दूर करता है।
यह कमर और उदर की स्थूलता को नष्ट करके उसे लचीला बनाता है।



सुखासन विधि और लाभ

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आज की इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हर कोई तनाव ग्रस्त है, जिस कारण से मनुष्य का स्वभाव काफ़ी चिड़चिड़ा हो गया है। जिस कारण से उसके आपसी रिश्तों मे भी दरारें पड़ जाती हैं। ऐसे मे ज़रूरी है कि मनुष्य अपनी ज़िंदगी मे योग को अपनाये। योग को नियमित रूप से करने से मानसिक शांति मिलती है और मन के साथ साथ तन भी स्वस्थ रहता है। आज ऐसे ही एक आसन सुखासन करने की विधि के बारे मे जानेंगे। जिसको नियमित रूप से करने से आपको कई लाभ प्राप्त होंगे। सुखासन का शाब्दिक अर्थ है सुख देने वाला आसन, यह आसन बहुत ही आसान है।

सुखासन करने की विधि । Sukhasan Steps
सुखासन करने के लिए भूमि पर दरी या मैट बिछाकर बैठ जाएँ।
अब दोनों पैर सामने और सीधे रखें।
फिर एक पैर की एड़ी अपने दूसरे पैर की जंघा के नीचे लें आयें और यही क्रम दूसरे पैर के साथ करें। (पालथी मोड़ कर बैठ जाएँ)
अब आप अपनी पीठ और मेरूदंड को सीधा करें। ध्यान रहे कि अधिक झुक कर न बैठें।
कंधों को थोड़ा ढ़ीला छोड़ें, अब गहरी सांस अन्दर की ओर ले फिर धीरे धीरे सांस को छोड़ें।
हथेलियों को एक के ऊपर एक अपनी पालथी पर रखें।
सिर को थोड़ा ऊपर उठायें और आखे बंद कर लें।
अपना ध्यान अपनी श्वसन क्रिया पर लगायें, लम्बी गहरी साँस लेते रहें।
अगर प्रारम्भ में कठिनाई आती है तो आप दीवार से टिक कर बैठ सकते हैं।

सही समय: कभी भी एकांत में
दिशा: अगर अध्यात्मिक दृष्टी से योग कर रहे हैं तो उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख रखें।
सुखासन के लाभ
इस आसन के नियमित अभ्यास से आपको मानसिक सुख और शांति की भी अनुभूति होगी।
अगर आप चिंता, अवसाद या अति क्रोध से ग्रस्त हैं, तो इस आसन को करने से बहुत लाभ प्राप्त होगा।
इस आसन को करने से चित्त शांत और मन एकाग्रचित्त होता है।
यह आसन बैठने की आदत को सुधारता है।
यह आसन मानसिक चंचलता को भी कम करता है।
यह आसन मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी) की परेशानियों से भी मुक्ति दिलाता है।
सावधानियाँ
जिन लोगों को घुटनों के जोड़ों में परेशानी हो, वे लोग यह आसन न करें या किसी एक्स्पर्ट के निगरानी में योग करें।
रीढ़ की हड्डी में किसी तरह की चोट हो तो सावधानी पूर्वक करें कोशिश करें, अधिक लम्बे समय तक न बैठें।
अपने शरीर की प्रतिक्रिया को समझ कर उसके अनुरूप आसन करें।



भरद्वाजासन की विधि और लाभ
भरद्वाजासन, भरद्वाज मुनि द्वारा बनाया गया यह आसान एक ऐसा आसन है, जिसे युवा से लेकर वृद्ध तक सभी लोग कर सकते हैं। इस आसन को करने से पाचन सम्बन्धी परेशानियों में लाभ मिलता है। यह आसन को करने से पीठ दर्द, नींद न आना, कमर दर्द में जैसी परेशानियों में राहत मिलती है। इस आसन को करने से न केवल तन स्वस्थ रहता है, बल्कि मन भी स्थिर और शांत रहता है। आज हम आपको भरद्वाज आसन करने की विधि को बतायेंगे।

भरद्वाज आसन विधि । Bharadvaja’s Asana
एक दरी या आसन बिछाकर भूमि पर बैठ जाएँ और अपने पैर सामने सीधे रखें, हाथों को सामान्य मुद्रा में रखें।
अब घुटनों को कुछ इस तरह मोड़ें कि आपका पूरा भार दायें कूल्हों पर हो।
अब आप अपनी दायें पैर की एड़ी को बाएँ पैर की जंघा पर रखें।
गहरी लंबी सांस लें और रीढ़ की हड्डी को सीधा करें, फिर धीरे धीरे साँस छोड़ें और शरीर के ऊपरी भाग को घुटने के विपरीत दिशा में दायीं ओर मोड़ते जाएँ।
आप अपना सीधा हाथ सहारे के लिए दायीं ओर और उल्टा हाथ बाएँ घुटने पर रख सकते हैं।
हर सांस के साथ रीढ़ की हड्डी को सीधा करते जाएँ।
अपना सिर बायीं ओर मोड़कर अपने बाएँ कंधे के ऊपर से देखें और थोड़ी देर तक इसी अवस्था में रहें।
अब धीरे धीरे सांस छोड़े और सामान्य अवस्था में आ जाएँ।
अब यही प्रक्रिया विपरीत दिशा में करें (अर्थात्‌ अभी जिस दिशा में किया है उसकी विपरीत दिशा में)।
सावधानियाँ
जिन लोगों को रीढ़ की हड्डी या कमर से सम्बंधित गंभीर समस्या है, वे भरद्वाजासन को न करें। यदि करें तो किसी एक्सपर्ट कि निगरानी में करें।
रक्तचाप की परेशानी, दस्त, नींद न आना, सर दर्द इन सब परेशानी से ग्रसित लोग यह आसन न करें।
भरद्वाजासन के लाभ
भरद्वाजासन से शरीर के ऊपरी भाग की मांसपेशियों में खिंचाव होता है, जिससे वर्षों की अकड़ी हुई मांसपेशियाँ खुल जाती हैं और पीठ दर्द की शिक़ायत भी दूर हो जाती है।
इस आसन को करने से आपके पेट पर खिंचाव आता है, जिस कारण कम पर जमी हुई वसा कम हो जाती है।
यह आसन आपके उदर में मौजूद अंगों पर सकारात्मक असर करता है, जिससे कब्ज़ और पाचन सम्बन्धित बीमारियाँ दूर होती हैं।
इस आसन से आपके मस्तिष्क पर अच्छा असर पड़ता है, इससे आप रिलैक्स फ़ील करते हैं तथा शरीर और मन का संतुलन भी बना रहता है। जिससे आप तनाव मुक्त रहते हैं।
यह आपके शरीर में रक्त संचार को सुचारू बनाये रखता है।
यह निचले पीठ दर्द, सायऐटिका दर्द (Sciatica Pain) और गर्दन के पीछे का दर्द कम करता है।

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