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ॐ....

ॐ.... 

Healths Is Wealth ·

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जाप, साँस, नाड़ी रुक सी गयीं, शरीर स्वचलित है, मुद्रा, आसन, प्राणायाम सब क्यों और कैसे सब अपने आप... बंध, मूल, उड़यन, जालन्धर यानि त्री बंध भी तो है.... नाड़ी शोधन ही तो है...
शरीर शुध्द, नाड़ी शुद्ध, त्री बंध बिन चक्र क्यों जगे..
शुद्धि बिन ना ही जगे, तो अच्छा ही तो है...सब देख कर भी हम स्थिर नहीं रह पाते, अव्यवस्थित व अनुशासित हो जाते है, फिर भागते हैं, तेरी ओर, बार बार, बुराई को मार.. तो ही जीत है.. 
रात्री है, शांति है, चुपी है..... बस मैं नहीं हूँ... मध्यम सी लौ....
मूलधार में स्पन्दन, हल्की सी... अनुभूति सी... भय भी. विस्वास भी, सब ही तो है... आशंकित... विस्वास भय को मारेगा... शिव शक्ति जागृत सी..
अभ्यसी, विस्वासी उपर की ओर...
स्वधिसठआन की ओर.. सब ठीक, तेरे अपराध ही तेरे दुश्मन,..... पश्चाताप अहिंसा आनंद ही तेरे मित्र... ्‍यही साथ हैं फिर क्या डर... मणिपुर की ओर.... तेरी शर्म कम जोरी की ी इच्छा शक्ति ही काट है... जीता बही इच्छा शक्ति के साथ है...
हृदय में शोक दुख डुबोता है... प्रेम पार ले जाता है...
विसुद्धी सच ही है.. सरस्वती है....... झूठ ही दुश्मन है... रोकता है... जीत फिर सच की... शुद्धि की, विशुद्धि की,.. जो यहां तक जीता, तन. मन साफ है...
ह्‍म सब देख कर अनुभव कर, फिर नीचे गिर जाते हैं... ये नकारात्मक गुण ही तो हैं, जो उपर आने नहीं देते..
स्कारातम्क, नकारात्मक, की ही तो लड़ाई है.. सच को जीतना होगा, झूठ को मरना होगा... आस्था, विस्वास भाव, इच्छा शक्ति को फिर जगाना. ही मंज़िल पे जाना है.. सब पा के भी क्यों खोना है... बार बार क्यों आना है, क्यों जाना है.. उठ विशुद्धि से उठ, तुझे क्या नयी बात है...... यहां तू है ही नहीं..अब यहां मैं कोयी और है.
आंतरिक है, दिव्या है,...... व्यवस्थित है, अनुशासित है... भ्रम की मृत्यु है... आत्मन है, सब देख रहीं हैं...तू शासित है.. तू क्या नहीं है. सब तू ही है..
यहां तेरा अहंकार ना तुझ पे भारी पड़ जाए, तू मिट्टी ही है,...... जो दिख रहा है, बो चेतन है... तू है ही नहीं...
्‍यही तो स्माधी है... सब शांत.. कुछ भी नहीं... कुछ भी नहीँ..... ॐ.. भी नहीं.. कुछ भी तो..
नहीं.. समाधि ही है..
. बस ्‍यहीँ रहने दो... ्‍यही. बस ्‍यही..

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