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गर्भवती महिलाओं के लिए योगासन की महता


गर्भवती महिलाओं के लिए योगासन की महता
Puts of yoga for pregnant women
प्राचीन भारत में महिलाओं को घरेलू कार्य, जैसे कुंए से पानी खींचना, चक्की चलाना, आदि करने के कारण योगासन अथवा व्यायाम करने की अलग से आवश्यकता नहीं रहती थी, फिर भी उनका प्रसव बडी सुविधाजनक होता था।


आधुनिक जीवन शैली के कारण महिलाओं का जीवन सुख-सुविधाओं से भर गया। खडे-खड़े रसोई बनाना, घर के कार्यो हेतु नये - नये उपकरणों का आ जाना, झाडू, पोंछा, बर्तन, कपड़ों की धुलाई के लिये नौकरों पर निर्भरता आदि ने स्त्रियों के दैनिक रूप से होने वाले शारीरिक श्रम को कम कर दिया है, इससे उनका नैसर्गिक व्यायाम प्राय: समाप्त सा हो गया है।


फास्ट-फूड संस्कृति ने खान-पान में परिवर्तन कर डाला है। हरी पत्तेदार सब्जियों और ताजा फलों की जगह ब्रेड, पिज्जा, तली हुई चीजों और गरिष्ठ पदार्थों ने ले ली है। दूध-दहीं, छाछ, निम्बू शरबत की जगह चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक्स ने ले ली है।


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इन सब का प्रभाव यह पड़ा कि प्रसव के समय गर्भवती महिलाओं को बहुत कष्ट उठाना पड़ता है। शरीर की स्वाभाविक लचक समाप्त हो जाने से कई बार सिजेरियन ऑपरेशन द्वारा प्रसव कराना आवश्यक हो जाता है। इन दिनों अस्पतालों में सामान्य प्रसव की जगह सीजेरियन आपरेशन की दर में बहुत वृद्घि हो रही है।


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भारत के ऋषि मुनियों अर्थात् प्राचीन वैज्ञानिकों ने अनुसंधान करके ऐसे योगासन खोज निकाले थे, जिनको नियमित करने से प्रसव प्रक्रिया आसान और सुविधा पूर्वक हो सके। अधूरे बच्चे और समय से पूर्व प्रसव को टाला जा सके और पूर्ण समय होने पर सुविधा पूर्वक प्रसव कराया जा सके।

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ऐसे योगासनों को दक्ष शिक्षकों की विशेष देखरेख में सिखाने और गर्भवती महिलाओं की दिनचर्या को सुधारने की अत्यन्त आवश्यकता है। स्वस्थ और सबल संतान होने पर ही आनेवाली पीढ़ी संस्कार युक्त हो सकेगी। बीमार और कृशकाय बच्चों को जन्म देने से नारी जीवन सार्थक नहीं हो सकता है। 




1. प्रसव पूर्व -की शारीरिक पीड़ाऐं जैसे कमर दर्द, पैरों में सूजन आना, उठने बैठने में तकलीफ होना, मानसिक भय, वेदना आदि को दूर किया जा सके।

2. प्रसव - प्रसव सुविधापूर्वक हो सके। आधुनिक युग में सुख-सुविधाओं के कारण नारी की मांसपेशियां ज्यादातर सामान्य प्रसव के अनुकूल नहीं होती है, ऐसे में प्रसव ऑपरेशन द्वारा कराना पड़ता है। उचित व्यायाम व यौगिक क्रियाओं को करने से इस कठिन परिस्थिति को टाला जा सकता है। ऐसी गर्भवती महिलाएं जिनका पहला प्रसव आपरेशन से हुआ है, उन्हें भी दूसरा प्रसव योग एवं व्यायाम द्वारा सामान्य रू प से कराया जा सकता है। कई बार अधिक देर तक चलने वाले प्रसव में होने वाली दुर्घटनाएं जैसे स्टिल बर्थ आदि से बचा जा सकता है। साथ ही ऐसी स्त्रियां जो अधिक उम्र में गर्भधारण करती है, उन्हें भी व्यायाम एवं योग से प्रसव के समय भरपूर लाभ मिलता है।




3.प्रसवोत्तर - प्रसव के पश्चात शरीर में अनावश्यक चर्बी और मोटापे का बढऩा नहीं हो, जिससे कि नारी-शरीर की सुन्दरता और सुघड़ता बनी रहे। साथ ही अत्यधिक मोटापा दूसरे गर्भ के समय हानि भी पहुंचा सकता है, उसे भी रोकने हेतु प्रसवोत्तर योगासन कराये जायेगें।

4. गर्भावस्था के दौरान और प्रसव के पश्चाात् आहार - विहार के बारे में डायटीशियन की सलाह उपलब्ध करना, जिससे खानपान के बारे में फैली हुई भ्रांतियां दूर की जा सके। उचित आहार, गर्भावस्था एवं प्रसव के पश्चाात्, मां एवं आने वाले मेहमान कि लिये अत्यधिक आवश्यक है।

5. व्यायाम, योगासन एवं उचित आहार- स्वास्थ और निरोग संतान को जन्म देने का मूल मंत्र है, जिससे कि अगली पीढ़ी संस्कारयुक्त हो सके। इतिहास गवाह है कि अभिमन्यु को चक्रव्यूह तोडऩे की शिक्षा गर्भावस्था में ही मिली थी।


6.गर्भवती महिलाओं के पठन-पाठन के लिये ज्ञानवर्धक पुस्तकों का सुझाव देना और उनके कमरे की साज-सज्जा एवं उचित देखभाल के बारे में सही मार्ग दर्शन और सुझाव देना क्योंकि गर्भावस्था में स्त्री का शारीरिक व मानसिक रू प से स्वस्थ एवं प्रसन्नचित रहना आवश्यक है। 


7. गर्भावस्था में पहनने के लिये वस्त्रों का चुनाव आदि के बारे में जानकारी देना।

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