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सार (दस्त) की उत्पत्ति, लक्षण और उसका ईलाज आयुर्वेद द्वारा

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सार (दस्त) की उत्पत्ति, लक्षण और उसका ईलाज आयुर्वेद द्वारा 



अतिसार (दस्त) की उत्पत्ति, लक्षण और उसका ईलाज आयुर्वेद द्वारा – Diarrhea Treatment

जब पाचन क्रिया में किसी प्रकार का दोष उत्पन्न हो जाता है तो उदर के अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होने लगते है| उन्ही रोग में से एक रोग दस्त (Diarrhea) है जिससे पीड़ित होने पर रोगी को अत्यंत कष्ट होता है और वह शारीरिक रूप से निर्बल होने लगता है|
यह रोग बच्चो एवं व्यस्को को अधिकतर होता है|

पाचन क्रिया किसी निश्चित सीमा तक वसायुक्त खाद्यों का पाचन कर पाती है| लेकिन अधिक मात्रा में घी, मक्खन का सेवन करने पर पाचन क्रिया में दोष उत्पन्न होने लगता है जिससे कुपित वायु अधिक मात्रा में शारीरिक धातु को नीचे की ओर प्रेरित करती है|


जल मिश्रित धातु, अग्नि को मंद करके कोष्ठ को बाधा पहुंचाती है तो जल, मल के साथ मिलकर वायु द्वारा प्रेरित होकर, मलद्वार से तीव्र गति के साथ निकलता है| निष्कासन होने की प्रक्रिया ‘अतिसार’ कहलाती है|
कैसे होती है अतिसार की उत्पत्ति –

पाचन क्रिया की में दोष उत्पन्न होने पर अधिक वसा युक्त भोजन करने से अतिसार की उत्पत्ति होती है|

महर्षि सुश्रुत के अनुसार जब कफ, पित्त, रस, रक्त, जल, मूत्र, स्वेद, मेद आदि शरीरगत अग्नि की कमी (पाचन क्रिया की विकृति) से अपरिपक्व अवस्था में जठराग्नि (Gastrodynia) को मंद करते हुए मल वायुवेग से गुदामार्ग से निष्कासित होता है तो अतिसार की उत्पत्ति होती है|

प्रकृति विरुद्ध भोजन करने से भी अतिसार की उत्पत्ति होती है|
अतिसार के लक्षण –

1. वातज अतिसार की उत्पत्ति होने पर पेट में तीव्र दर्द होता है| इसके साथ अल्प मात्रा में मूत्र का निष्कासन होता है| रोगी कई कमर, उरू, जंघा ढीली पड़ जाती है| रोगी का मल जल के सामान निष्कासित होता है और निष्कासन के समय तीव्र ध्वनि करता है|
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2. पित्तज अतिसार की उत्पत्ति पित्त प्रकृति वाले स्त्री-पुरुषो में अधिक होती है| ऐसी प्रकृति वाले स्त्री पुरुष जब अम्ल, लवण, क्षार, उष्ण, तीक्ष्ण खाद्यों का अधिक मात्रा में सेवन करता है तो पित्तज अतिसार से पीड़ित हो जाता है| पित्तज अतिसार से पीड़ित होने पर रोगी के हाथ-पाँव और चेहरे पर हल्दी की तरह पीलेपन के लक्षण दिखाई देते है| हरे, पीले, रक्त कण के पित्त मिश्रित, दुर्गधयुक्त, फटे-फटे, उष्णवेग के साथ जल की तरह अतिसार होते है|


अतिसार होने पर रोगी को अधिक प्यास लगती है| शरीर में जलन, अधिक पसीने के साथ मूर्च्छा, पेट में दर्द, गूदा में दर्द जैसे लक्षण विकसीत हो जाते है| कभी -कभी ज्वर के लक्षण भी दिखाई देते है

अतिसार (दस्त) की उत्पत्ति, लक्षण और उसका ईलाज आयुर्वेद द्वारा – 

3. कफज अतिसार की उत्पत्ति गुरू, मधुर, शीतल और स्निग्ध आहार का अधिक सेवन करने से होती है| शरीर में इन पदार्थो से कफ की मात्रा विकसीत होने से कफ कुपित होकर अध: प्रदेश में पहुंचकर जठराग्नि को नष्ट करके कफज अतिसार की उत्पत्ति करता है|

कफज अतिसार में स्निग्ध (चिकना), श्वेत, आम, गुरू, दुर्गधयुक्त, दर्द उत्पन्न करता हुआ अल्प मात्रा में मल बार -बार निष्कासित होता है| शोच जाने के बाद भी रोगी की फिर से शोच जाने की इच्छा बनी रहती है| रोगी में निद्रा, आलस्य, अवसाद और शरीर में गुरुता के लक्षण दिखाई देते है|
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4. पित्तज अतिसार होने पर जब कोई चिकित्सा में विलम्ब और आहार में लापरवाही करता है तो रक्तातिसार की उत्पत्ति होती है| पित्त मिश्रित वायु मल को द्रव्य रूप में परिवर्तित करके निष्कासित करती है| मल उष्ण, द्रव्य एवं जल में तैरने वाला और अधिक मात्रा में निकलता है|
अतिसार का उपचार –

1. अतिसार में रोगी को मलत्याग के समय अधिक पीड़ा हो तो बड़ी हरड तथा पिप्पली का चूर्ण हल्के उष्ण जल से सेवण कराए| इस चूर्ण से मल सरलता से निष्कासित होता है और दर्द भी नहीं होता|

2. कुटज की छाल और अनार का छिलका दो-दो तोले लेकर क्वाथ बनाकर, मधु मिलाकर सेवन करने से अतिसार के साथ रक्त का निष्कासन बंद हो जाता है|

3. जायफल, लौंग, जीरा, सुहागा सभी बराबर मात्रा में कूट-पीसकर बारीक चूर्ण बनाकर, मधु व् शक्कर मिलाकर सेवन करने से अतिसार नष्ट होता है|

4. कर्पूर रस की एक गोली सुबह और एक गोली शाम को मट्ठे के साथ सेवन करने से पित्तज, रक्तातिसार और ज्वरा तिसार नष्ट होते है|


5. जामुन, आम और आंवले के पत्तो का रस निकालकर बकरी का दूध और मधु मिलाकर दिन में तीन बार सेवन कराने से रक्तातिसार नष्ट होता है|

6. पिप्पलीमूल चुर्ण 1 माशे मात्रा में सुबह-शाम हल्के उष्ण जल से सेवन कराने से रक्तातिसार नष्ट होते है|

7. आनंद भैरव रस की दो गोली अदरक ले रस या मट्ठे के साथ प्रातःऔर सांय को लेने से जीर्ण ज्वर और अतिसार नष्ट होते है|



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ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

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