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पवनमुक्तासन



आज का मानव भौतिक चकाचौंध में आकर बाहरी वस्तुओं की खोज में प्रयत्नशील है, परन्तु अपने शरीर को जानने का समय और जिज्ञासा उसके पास शायद नहीं है। यह घोर विडम्बना है कि जिस शरीर के माध्यम से वह सब कुछ करता है, सब कुछ जानता है, अनुसंधान करता है, उसके बारे में मनुष्य कितना अंजान है। मानव शरीर को सही तरीके से काम करने के लिए पूर्ण रूप से स्वस्थ होना आवश्यक है।

शरीर के स्वस्थ होने से कार्य क्षमता बढ़ती है तथा जो भी कार्य किया जाता है, उसे मन लगाकर तथा निष्ठापूर्वक किया जाता है। ध्यान पूर्वक कार्य करने वाला व्यक्ति लापरवाही से काम करने वाले से बहुत अच्छा होता है। उसे सभी पसन्द करते हैं। समय का सदुपयोग करना उसे आ जाता है। वह हर कार्य को तनाव रहित होकर करता है।

प्राण का एक भाग अपान प्राण है जिसकी गति नीचे की ओर है। इस क्रिया के करने से वायु ( पेट की गैस ) का निष्कासन सहजपूर्वक हो जाता है। इसलिए इसका नाम पवनमुक्तासन है।
पवनमुक्तासन
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पवनमुक्तासन में सम्पूर्ण बड़ी आंत को प्रभावित करने की बात बताई गयी है। इस आसन में उस पर दबाव डालकर रुकी हुई वायु को बाहर निकालने के लिए बाध्य करते हैं, अन्यथा गैस रुकने से पेट का फूलना, इसके ऊपर चढ़ने से हृदय पर आघात और ऊपर जाने से सिर दर्द की पीड़ा का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए यह आसन आवश्यक व उपयोगी है।
दायीं टाँग को पेट पर दबाने से ऊपर आने वाली बड़ी आंत ल, बायीं टाँग को पेट पर दबाने से नीचे जाने वाली बड़ी आंत एवं क्षोणिगा आंत तथा दोनों टांगों को मोड़कर दबाव डालने से तिरछी जाने वाली बड़ी आंत तथा समूचा नाभिमण्डल आदि अधिक प्रभाव में आते हैं।
गैस के निष्कासन से घबराहट दूर होती है। पेट हल्का हो जाता है। फेफड़े और हृदय सम्बन्धी विकार पैदा नहीं होते।
पेट में चर्बी नै बढ़ती।
जोड़ो के दर्द एवं महिलाओं सम्बन्धी रोगों के उपचार में सहायक है।
यौन अंगों को बल मिलता है। शीघ्रपतन एवं स्वप्न दोष जैसे विकार दूर होते हैं।
दायीं टाँग से पेट को दबाने पर जिगर एवं बायीं टाँग से पेट को दबाने पर तिल्ली एवं अमाशय भी प्रभावित होते हैं।
श्वास को बाहर निकाल कर नासिका को दोनों घुटनों के मध्य लगाने से फेफड़ो का अंदर की ओर दबाव इनमें अधिक क्षमता प्रदान करता है तथा मद्दत नौलि भी प्रभावित होती है।
अपान प्राण को सुदृढ़ बनाता है।
पवनमुक्तासन विधि
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कमर के बल आसन पर लेट जाएं। टाँगों को सीधा करें। दोनों एड़ी पंजे मिलाकर पंजे आगे की ओर तानें। दोनों हाथों को भी शरीर के साथ तानें। दाएं पैर को मोड़ें। दोनों हाथों की अँगुलियों को परस्पर गूंथकर घुटने पर रखें और श्वास भरकर घुटने से पेट को दबाएं। कुछ क्षण इसी स्तिथि में रुकें। श्वास बाहर निकालते हुए नासिका को घुटने से स्पर्श करें। धीरे धीरे वापस आएं। शरीर को ढीला कर लें । यही क्रिया बाएं पैर से तथा उसके बाद दोनों पैरों से करें। वापस आने पर शरीर को ढीला छोड़ दें।

ध्यान का केंद्र – मणिपुर चक्र
इस आसन में ध्यान देने योग्य विशेष बात यह है कि आसन करते समय पंजे आगे की ओर तने रहें। श्वास बाहर निकाल कर नासिका मुड़े हुए घुटने से लगाएं। जो पैर सीधा हो उसका घुटना थोड़ा भी ढीला न हो पाए। जब दोनों पैरों से इस क्रिया को करें तो नासिका घुटनों के मध्य में रखें। अपने शरीर को अधिक से अधिक समेट लें।
दायीं ओर करने पर दायां तथा बायीं ओर करने पर बाऐं न झुकें। शरीर सीधा रखें।
चक्रों पर ध्यान करते हुए योगासनों का अभ्यास साधक की साधना में चार चाँद लगा देता है, क्योंकि-

1.हमारा मन सारे संसार की वस्तुओं एवं घटनाओं से हटकर उस अंतरंग शक्ति पर ठहरने का अभ्यासी हो जाए। मन का यह अभ्यास मन की बाहरी यात्रा करने या भागने की चंचल आदत को आंतरिक एक बिंदु पर स्थिर होकर बैठने से बदलेगा।

मणिपुर चक्र

यह नाभि के पीछे रीढ़ पर स्तिथ है।

यह प्राण का भंडार है।

यह अग्नि तत्व का प्रतीक है।

आज कल की युवा पीढ़ी के लिए परेशानी की बात है पेट पर बढी हुई चर्बी, जिसे कम करने में यह आसन बहुत लाभकारी है,जिसे करने से पेट की गैस के साथ साथ पेट की चर्बी भी कम करती है । साथ ही हमारे शरीर को सुगठित और सुडौल भी बनाता है, जो जीवन में एक महत्वपूर्ण योगदान है। आयुर्वेद हर तरीके से हमारे जीवन मे लाभदायक है। जरूरी नही सिर्फ योगासन ही बल्कि हमारा खान पान , उठने का समय , खाने का समय ये सारी बातें हमारे शरीर को पुष्ट बनाती है और आयु लंबी होती है । हैम ज्यादा समय तक अपने आप को ऊर्जावान (energetic) रख सकते है। पवनमुक्तासन की तरह ही आकर्ण धनुरासन भी हमारे शरीर के लिए बहुत लाभदायक है । आकर्ण धनुरासन के बारे में अधिक जानकारी के लिए आगे दिए गए लिंक पर जाएं।

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पवनमुक्तासन से होंगे इतने फायदे

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पवनमुक्त का अर्थ है पवन या हवा को मुक्त करना। इस आसन को करने से पेट की वायु निकालने में मदद करता है, इस कारणवश इस आसन का नाम पवनमुक्तासन है।

विधि 
पवनमुक्तासन योग को करने के लिए सबसे पहले पीठ के बल जमीन पर लेट जाएं। इसके बाद दाएं पैर को घुटने से मोड़ते हुए घुटने को दोनों हाथों से पकड़कर छाती की ओर लाएं। इसके बाद सिर को जमीन से ऊपर उठाने की कोशिश करते हुए अपनी नाक से घुटने का स्‍पर्श करें। इस स्थिति में जब तक हो सके बने रहे। थोड़ी देर बाद वापस पहले वाली स्थिति में आ जाएं। यही क्रिया दूसरे पैर से भी करें। इसके बाद इसे दोनों पैरों से एक साथ करें। पवनमुक्तासन योग दिन में 5 से 10 बार रोजाना करने से पेट की समस्‍या से पूरी तरह से मुक्ति मिल जाती है।

लाभ 
• पीठ व पेट कि मासपेशियों को मज़बूत बनाता है|
• हाथों व पैरों की मासपेशियों को मज़बूत बनाता है|
• पेट एवं दूसरे इन्द्रियों की मालिश करता है|
• पेट में से वायु को निकलता है और पाचन क्रिया में मदद करता है|
• रक्त परिसंचरण को बढ़ाता है और पीठ व कूल्हे के जोड़ के हिस्से को तनाव मुक्त करता है|

सावधानी 
• अगर किसी व्यक्ति के घुटनों में दर्द हो तो वो ये आसन बिल्कुल ना करें।
• खाना खाने के तुरंत बाद इस आसन को नहीं करना चाहिए।
• अगर आपकी कमर या गर्दन में दर्द रहता हो तो इस आसन को करने से बचें।


गैस से परेशान रहते हैं तो करें पवनमुक्तासन





आजकल के मशीनी युग की भागदौड़ से लोगों में गैस की शिकायत एक आम समस्या बन गई है। हालांकि गांवों में भी इस समस्या से पीड़ित लोगों की संख्या कम नहीं, लेकिन शहर में रहने वाला प्राय: हर व्यक्ति गैस की परेशानी से पीड़ित है। 

क्या होता है इस रोग में
इस रोग में डकारें आना, पेट में गैस भरने से बेचैनी, घबराहट, छाती में जलन, पेट में गुड़गुड़ाहट, पेट व पीठ में हल्का दर्द, सिर में भारीपन, आलस्य व थकावट तथा नाड़ी दुर्बलता जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं। इसका प्रमुख कारण असंयमित तथा अनियमित जीवनशैली, आरामतलबी, धूम्रपान, मानसिक तनाव, चिंता आदि हैं।

मुक्ति का क्या है उपाय
यौगिक जीवनशैली तथा यौगिक क्रियाओं के अभ्यास से इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है। इस समस्या के समाधान के लिए कुछ यौगिक क्रियाओं का अभ्यास जरूरी है।

आसन
गैस की समस्या से निबटने में महत्वपूर्ण आसन हैं-पवनमुक्तासन, शशांकासन, भुजंगासन, धनुरासन, मरकटासन, सर्वांगासन, व्याघ्रासन, बज्रासन, सुप्त बज्रासन आदि। यदि पवनमुक्तासन की पांच से दस आवृत्तियों का प्रतिदिन अभ्यास किया जाए तो इस समस्या से पूरी तरह मुक्ति पाने में मदद मिलती है। 

पवनमुक्तासन की अभ्यास विधि
पीठ के बल जमीन पर लेट जाएं। दाएं पैर को घुटने से मोड़ें। इस घुटने को दोनों हाथों से पकड़ कर छाती की ओर लाएं। इसके बाद सिर को जमीन से ऊपर उठा कर प्रयास करें कि नाक घुटने को स्पर्श करे, किन्तु किसी भी प्रकार की अधिकता न करें। इस स्थिति में आरामदायक अवधि तक रुक कर वापस पूर्व स्थिति में आएं। यही क्रिया दूसरे पैर से भी करें। इसके बाद इस क्रिया को दोनों पैरों से एक साथ करें। यह पवनमुक्तासन की एक आवृत्ति है। इसके बाद तीन-चार चक्रों का अभ्यास प्रारंभ में करें। इसके बाद इसे बढ़ा कर 10 चक्रों तक ले जाएं।

धनुरासन भी है जरूरी
पवनमुक्तासन के अभ्यास के बाद धनुरासन का अभ्यास अवश्य करें। इसमें पेट के बल जमीन पर लेट कर दोनों पैरों को घुटनों से मोड़ लें। दोनों पैरों के पंजों को हाथों से पकड़ क र घुटने, जांघों, सिर एवं छाती को जमीन से ऊपर उठाएं। इस स्थिति में आरामदायक समय तक रुक कर वापस पूर्व स्थिति में आएं। यह धनुरासन है।

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