Header Ads

रीनल डिनर्वेशन थेरेपी

रीनल डिनर्वेशन थेरेपी
Healths Is Wealth  

एक नया उपचार सामने आया है, जिसे रीनल डिनर्वेशन थेरेपी कहा जाता है। यह एक ऐसा उपचार है, जिसमें एक संक्षिप्त गैर सर्जिकल एंजियोप्लास्टी जैसी चिकित्सा प्रक्रिया के द्वारा गुर्दे में जाने वाली नसों को माइक्रोवेव कैथेटर से अवरुद्ध किया जाता है। अगले दिन से रोगी चलने लगता है और उसे छुट्टी दे दी जाती है। इस प्रक्रिया से अनियंत्रित रक्तचाप को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है। इस चिकित्सा प्रक्रिया को अनियंत्रित रक्तचाप की समस्या का एक बार में ही किया जाने वाला इलाज माना जा रहा है। इससे रक्तचाप की जिंदगी भर चलने वाली दवाओं से छुटकारा मिल सकता है।

एनीमिया : देशी उपचार

Healths Is Wealth  


एनीमिया मतलब शरीर में खून की कमी यानी रक्त-अल्पता। एनीमिया एक गंभीर समस्या है, इसके कारण रक्त में लाल रक्त कणिकाओं की कमी हो जाती है। इसे हीमोग्लेबिन का कम होना या एचबी में कमी आना भी कहते हैं। शरीर में खून की कमी से स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इसके कारण शरीर का रंग पीला पडऩे लगता है, त्वचा बेजान दिखने लगती है और थकान की समस्या हो जाती है। आगे जानिए एनीमिया के घरेलू उपचार के बारे में-

बादाम


एनीमिया में बादाम का सेवन करना चाहिए, इससे खून की कमी दूर होती है। रोज रात को बादाम भिगोकर सुबह पीसकर दूध में मिलाकर पीने से भी खून की कमी शरीर में नहीं होती है। यह शरीर को भी स्वस्थ बनाये रखता है और कई खतरनाक बीमारियों से भी बचाता है।

सोयाबीन
खून की कमी दूर करने में सोयाबीन का महत्वपूर्ण स्थान है। इसमें आयरन के साथ-साथ प्रोटीन भी पाया जाता है। चूंकि एनिमिया के रोगी की पाचन शक्ति कमजोर होती है इसलिये सोयाबीन का दूध बनाकर पीना अधिक फायदेमंद है।

सेवफल
क सेवफल यानी सेब के रस में दो चम्मच शहद मिलाकर रोज पीने से खून की कमी दूर होती है। टमाटर और सेवफल दोनों के रस को 100-100 मिली लेकर मिला लीजिए, और इसका सेवन सुबह खाली पेट करने से खून की कमी दूर हो जाती है।

तुलसी


एंटी-ऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर तुलसी हमारे शरीर के लिए बहुत फायदेमंद है। यह एनीमिया में भी बहुत फायदेमंद है, तुलसी के नियमित सेवन करने से खून की कमी की समस्या दूर होती है। तुलसी के रस को शहद के साथ मिलाकर नियमित सेवन कर सकते हैं।

पालक



खून की कमी को दूर करने के लिए पालक बहुत जरूरी है। पालक में भरपूर मात्रा में लौह तत्व पाया जाता है। यह लौह तत्व शरीर में तेजी से लाल रक्त कणिकाओं को बनाता है। आप पालक की सब्जी के अलावा इसका जूस भी पी सकते हैं।

चुकंदर



इसमें आयरन के तत्व बहुत ज्यादा मात्रा में पाये जाते हैं, यह खून में हीमोग्लोबिन का निर्माण कर लाल रक्त कणिकाओं की सक्रियता को बढ़ाता है। चुकंदर की पत्तियों में भी आयरन भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इसे आप सलाद के रूप में प्रयोग कर सकते हैं। चुकरंदर का रस दिन में दो बार पियें।
 की सब्जी

मेथी की सब्जी भी खून की कमी को दूर करता है, कच्ची मेथी खाने से भी शरीर को आयरन मिलता है। किशोरावस्था में लड़कियों में होने वाली खून की कमी को दूर करने के लिए मेथी की पत्तियां उबालकर उपयोग करने से बहुत फायदा होता है। मेथी के बीज अंकुरित कर नियमित खाने से भी खून की कमी नहीं होती है। 
धनिया


धनिया आयरन से भरपूर होता है जिसके कारण एनीमिया की समस्या से निजात दिलाता है। इसके अलावा धनिया की छोटी-छोटी पत्तियों और बीजों में पोषक तत्वों का खजाना छिपा है। इसमें एंटी ऑक्सीडेंट, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, सोडियम, 



पोटैशियम और विटामिन ए, बी1, बी2 और सी जैसे तत्व पाये जाते हैं।


अंगूर


अंगूर का नियमित सेवन करने से खतरनाक बीमारियों से बचाव होता है। अंगूर में आयरन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, इसलिए एनीमिया की समस्या होने पर अंगूर का सेवन कीजिए। अंगूर खाने से शरीर में हीमोब्लोबिन भी बढ़ता है। इसके अलावा आम, अमरूद आदि फल भी एनीमिया में फायदेमंद हैं।



हार्ट अटैक : घातक बीमारी

हृदय : एक परिचय

यह छाती के मध्य में, थोड़ी सी बाईं ओर स्थित होता है।


यह एक दिन में लगभग 1 लाख बार धड़कता है एवं एक मिनट में 60-90 बार।

यह हर धड़कन के साथ शरीर में रक्त को पम्प करता है। 

हृदय को पोषण एवं ऑक्सीजन, रक्त के ज़रिए मिलता है जो कोरोनरी आर्टरीज़ द्वारा प्रदान किया जाता है। 

हृदय दो भागों में विभाजित होता है, दायां एवं बायां। हृदय के दाहिने एवं बाएं, प्रत्येक ओर दो चैम्बर होते हैं। 


हृदय का दाहिना भाग शरीर से दूषित रक्त प्राप्त करता है एवं उसे फेफडों में पम्प करता है। 

रक्त फेफडों में शोधित होकर ह्रदय के बाएं भाग में वापस लौटता है वहां से शरीर में वापस पम्प किया जाता है। 

चार वॉल्व, दो बाईं ओर (मिट्रल एवं एओर्टिक) एवं दो हृदय की दाईं ओर (पल्मोनरी एवं ट्राइक्यूस्पिड) रक्त के 

बहाव को निर्देशित करने के लिए एक के द्वार की तरह कार्य करते हैं। 

हार्ट अटैक अपने आप में ही एक भयानक व घातक बीमारी का नाम है। इस बीमारी के नाम मात्र से ही लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इसका मुख्य कारण, हृदय की मांसपेशियों के एक भाग में आक्सीजन युक्त रक्त का प्रवाह अवरूद्ध हो जाना होता है। रक्त का प्रवाह न होने के कारण हृदय अपना कार्य करना बंद कर देता है, जो मृत्यु का कारण बनता है। विश्व भर में हृदय गति रूकने से मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। 


हृदय असंख्य पतली - पतली नसों एवं मांसपेशियों से युक्त एक गोल लम्बवत् खोखला मांस पिण्ड होता है। इसके अन्दर चार खण्ड (पार्ट) होते हैं और प्रत्येक खण्ड में एक ऑटोमैटिक वाल्व लगा रहता है। इससे पीछे से आया हुआ रक्त उस खण्ड में इक_ा होकर आगे तो जाता है, परन्तु वापस आने से पहले वाल्व बन्द हो जाता है, जिससे वह रक्त शरीर के सभी भागों में चला जाता है। ऐसा हृदय के चारों भागों में चलता रहता है। जब इन ऑटोमैटिक वाल्व में खराबी आ जाती है, तो रक्त पूरी मात्रा में आगे नहीं जा पाता और कुछ वापस आ जाता है, इससे रक्त सारे शरीर को पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता है और कई तरह की परेशानियाँ खड़ी होती हैं। हृदय पर अतिरिक्त बोझ पडऩे लगता है। जिससे उसमें अचानक तीव्र दर्द उठता है, जो असहनीय होता है। यह दर्द सीने के बीच के हिस्से में होता हुआ बायीं बाजू, गले व जबड़े की तरफ जाता है। 




कारण

ज्यादा चर्बीयुक्त आहार प्रतिदिन लेने से वह चर्बी नसों में इक_ी होती जाती है और धमनियों में सिकुडऩ या छेद हो जाता है इससे रक्त संचार धीमा हो जाता है, जिससे हृदय में अतिरिक्त दबाव बढ़ जाता है और शरीर में रक्त प्रवाह की कमी हो जाती है। इस स्थिति में जब हम तेज - तेज चलते हैं, सीढिय़ाँ चढ़ते है या कोई वजन उठाते है, तब हमें ज्यादा ऊर्जा की जरूरत पड़ती हैै।

हृदय रोग अथवा दिल का दौरा पडऩे का मुख्य कारण, उच्च रक्तचाप माना जाता है। उच्च रक्तचाप विभिन्न रोगों से होने वाली मौतों का एक प्रमुख कारण है। यह रोग मस्तिष्क आघात, दिल का दौरा और हार्ट या किडनी फेल्योर का कारण बन सकता है।

हृदय रोग के लक्षण




आम तौर पर एक सामान्य स्वस्थ व्यक्ति का ब्लड प्रेशर 120/80 होना चाहिए। अगर किसी व्यक्ति का ब्लडप्रेशर 135/85 एमएमएचजी से अधिक है, तो फिर यह दिल की सेहत के प्रति सचेत करने वाला लक्षण है। अगर कुछ दिनों तक नियमित विश्राम करने व नियमित रूप से चेक कराने के बाद ब्लड प्रेशर 135/85 से अधिक रहता है, तो इस स्थिति को हाई ब्लडप्रेशर कहा जाता है। ब्लड प्रेशर को दो इकाइयों में बांटा जाता है। ऊपर के ब्लड प्रेशर को सिस्टोलिक और नीचे के ब्लडप्रेशर को डाइस्टोलिक कहा जाता है।

ध्यान देने योग्य बातें 

शरीर की आवश्यकता के अनुसार ही कम चिकनाईयुक्त आहार लेना चाहिए। 40वर्ष की उम्र के बाद आवश्यकता से अधिक खाना स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक है। नसों में अत्यधिक चर्बी के जमाव को रोकने के लिए चोकरयुक्त आटे की रोटियाँ, ज्यादा मात्रा में हरी सब्जियाँ, सलाद, चना, फल आदि का उपयोग करें। 

खाने में लाल मिर्च, तीखे मसाला आदि एक निर्धारित मात्रा में ही सब्जी में डालें तथा ज्यादा तली चीजें, तेल युक्त अचार आदि बहुत कम मात्रा में लें। एक बार में ज्यादा खाना न खाकर आवश्यकतानुसार थोड़ा-थोड़ा कई बार खाना खायें। 

सूर्योदय के पहले उठना, धीरे - धीरे टहलना, स्नान आदि करके हल्के योग एवं ध्यान आदि प्रतिदिन करना चाहिये। 

मांसाहार, अण्डे, शराब व धूम्रपान, तम्बाकू आदि से पूर्णत: अपने आपको बचायें। ये हृदय एवं शरीर के लिये अत्यन्त घातक हैं इसलिये इनका भूल कर भी सेवन न करें। 

मानसिक तनाव को दूर रखें। इससे हृदय में दबाव पड़ता है। सदा ही प्रसन्न रहने की कोशिश करें, क्रोध बिल्कुल न करें, सदा हंसते रहें। 

नमक का सेवन कम करे। 

हृदय रोग से सम्बन्धित बीमारियाँ

उच्च रक्तचाप 

उच्च रक्तचाप के लगातार बने रहने से हृदय में अतिरिक्त दबाव बना रहता हैै, जिससे हृदय रोग होने की सम्भावना ज्यादा रहती है। अगर समय रहते दवाओं के माध्यम से ब्लड प्रेशर को सामान्य कर लिया जाये, तो हृदय रोग होने की सम्भावना घट जाती है।




गुर्दे की बीमारियाँ 


गुर्दे की कई प्रकार की बीमारियों की वजह से खून की सफाई का कार्य बाधित होता है और हृदय में दूषित खून के बार - बार जाने से उसकी मांसपेशियाँ कमजोर पडऩे लगती है, जो हृदय रोग का कारण बनती हैैं। 

डायबिटीज अर्थात् मधुमेह 


जब डायबिटीज के कारण खून में शुगर की मात्रा बढ़ जाती है और लम्बे समय तक बराबर बनी रहती है, तो धीरे - धीरे यही हृदय रोग का कारण बनती है। 


मोटापे की अधिकता 



जब अनियमित खान-पान से या कई प्रकार की हार्मोनल बीमारियों से व्यक्ति का मोटापा बढ़ जाता है तब भी हृदय रोग सामान्य से ज्यादा होने की सम्भावना रहती है। 

पेट में कीड़े (कृमि) होने पर 



जब आमाशय में दूषित खान - पान की वजह से कृमि पड़ जाते हैं और समय से इलाज न मिलने की वजह से पर्याप्त बड़े हो जाते है, तब वे वहां रहते हुए आपका खाना भी खाते हैं तथा दूषित मल भी विसर्जित करते हैं और वही खून हृदय में बार-बार जाता है जो हृदय रोग का कारण बनता है। 



शराब की लत छुड़ाए होमियोपैथी


प्रतिदिन दवाखाने में मरीज के नजदीकी, उनकी पत्नी, भाई, भाभी अथवा मां आते हैं जो अपनी पीड़ा व्यक्त करते हैं कि उनका पति, भाई, देवर या उनका बेटा शराब की बूरी लत में पड़ गया है। क्या ऐसा कोई उपाय होम्योपैथी है जिससे इस बूरी लत से छुटकारा पाया जा सकता है? कुछ परिजन तो ऐसे भी आते हैं जो बताते हैं कि शराब न मिलने पर कुछ अन्य कफ सिरप या दूसरी चीजें भी पीने के आदी हो जाते हैं, जिससे इनका खुद का तथा परिवार का जीवन स्तर बदतर होता जाता है।

शराब का उपभोग मजे तथा जीवन का आनंद लेने के साथ जुड़ा हुआ है. लेकिन अत्यधिक मात्रा में गैरजिम्मेवार तरीके से इसका सेवन जीवन को ही दूर कर देता है. शराब की बुरी लत को 'अल्कोहलिज्मÓ कहते हैं. जब कोई इंसान शराब का आदी हो जाये और वह उसके बगैर अपने को कमजोर समझने लगे. किसी भी कीमत पर उसे छोडऩे को तैयार न हो, उसकी कमी उसे हमेशा महसूस होती रहे. उसके लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहे. ऐसी स्थिति में शराब का सेवन उसके परिवार व स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह होता है.

Healths Is Wealth  
शराब जो पहले शौक बनती है. फिर आदत और बाद में जरूरत बन कर इनसान को शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, सामाजिक एवं वित्तीय रूप से काफी नुकसान पहुंचाती है. ऐसा हम हमेशा टीवी चैनलों या अखबारों के माध्यम से देखते और पढ़ते हैं कि इनसान ज्यादातर गलत काम शरीब पीकर ही करता है. यहां तक कि बलात्कार जैसी गंदी वारदात भी शराब को पीकर ही करता है. वरना कोई चार/पांच साल तक की बच्चियों का बलात्कार कभी होश में नहीं कर सकता है, शराब ही उसके मानसिक संतुलन को बिगाड़ देती है.




जब ऐसी गंदी लत किसी को लग ही जाती है, तब उसे इस दलदल से निकालने का कत्र्तव्य हम चिकित्सकों का हो जाता है कि वह इंसान शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक एवं सामाजिक स्तर पुन: मान-सम्मान पा सके. ऐसी लत को छुड़ाने में होमियोपैथिक दवाइयां काफी कारगर होती है. वशर्ते वह इन्सान दवाओं को दिल से स्वीकार करें. 







अल्कोहलिज्म यानी शराब की लत का शरीर के विभिन्न अंगों पर क्या असर होता है, पहले यह जान लें. 



पाचन तंत्र : सुबह उठते ही उल्टी जैसा लगना, भूख में कमी, अपच जैसा पतला शौच करना, कभी-कभी मुंह से उल्टी के साथ रक्त जैसा आना, आंत नली का कैंसर तक हो जाना. 



यकृत (लीवर): यकृत की कोशिकाओं में चर्बी जमा हो जाना (फैटी लीवर), सिरोसिस लीवर, पेन्क्रियाज में सूजन. 


दिमागी तंत्र : यादाश्त में कमी, सोचने, समझने की क्षमता कम हो जाती है. 



मांसपेशियां : छाती एवं कमर की मांसपेशियां सूखने लगती है. 


अस्थि तंत्र : हड्डियां कमजोर हो जाती है. कैल्शियम, मैग्निशियम, फास्फोरस एवं विटामिन डी की कमी से, हड्डी टूटने पर जुडऩा मुश्किल हो जाता है, हड्डी की मज्जा कमजोर होकर, लाल रक्त कण, श्वेत रक्त कण एवं प्लेटलेट कम कर देता है. 

हार्मोनल तंत्र : इंसुलीन की कमी से डायबिटीज हो जाती है. 

हृदय तंत्र : उच्च रक्त दबाव हो जाता है. 

श्वास नली तंत्र : दमा की शिकायत हो जाती है, क्योंकि प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है. 


त्वचा : बैक्टीरिया, फफूंदी जल्द असर करते हैं और जल्दी समाप्त नहीं होते हैं, क्योंकि प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है. सोरियासिस जैसा चर्म रोग भी हो सकता हैै. 


मर्दो में नपुंसकता एवं टेस्टीस (अंडकोष) सूख जाते हैं. स्त्रियों में ओवरी एवं बच्चेदानी में खराबी, बच्चा न होना, बार-बार गर्भ गिरना (हेबिचुअल अबोरशन) इत्यादि हो जाता है. 


कारगर है होमियोपैथिक दवाइयां


स्टरकुलिया एकुमिनाटा : शरीर में अत्यधिक कमजोरी लगे जैसा हृदय की गति कम हो गयी हो, यह दवा भूख बढ़ाती है और खाना पचाने में सहायक होती है. मुंह का स्वाद ऐसा कर देती है कि शराब की महक से नफरत होने लगती है और उसकी इच्छा को कम कर देती है. 5-10 बूंद अर्क में सुबह-रात आधे कप पानी के साथ लें.


अवेना सटाइवा : मानसिक एवं यौन संबंधी कमजोरी लगे. शराब के बिना एक पल भी रहना मुश्किल लगे. नींद बिल्कुल गायब हो जाये, तब 10 से 20 बूंद मूल अर्क में थोड़ा कुनकुना पानी के साथ सुबह-रात लें.




क्यूरीकस ग्लैडियम स्प्रिटस : शराब से पैदा हुए डर बुरे असर को यह दवा काटती है.शराब के प्रति नफरत पैदा करती है, क्योंकि यह दवा लेने के बाद जब भी कोई शराब लेता है, तब उसे उल्टी के जैसा लगता है या उल्टी हो सकती है, इसलिए डर से शराब छोडऩे लगता है. यह दवा 10 बूंद मूल अर्क लेकर एक चम्मच पानी के साथ दिन मेें चार बार लें. 


नक्स वोमिका : वैसे स्वभाव के लोग शराब अधिक लेते हों, पतले, चिड़चिड़े हो, जरा सा भी शोर रोशनी और खुशबू बर्दाश्त न होती हो. सुबह उठते ही या खाना खाने के बाद उल्टी के जैसा लगता हो, भूख में बहुत कमी रहती हो और हमेशा शराब की जरूरत महसूस होती है. तब 200 शक्ति की दवा रोज रात में ले. काफी लाभ पहुंचेगा और शराब के द्वारा पैदा सभी खराबियों को सही कर देगा. 




कैसी हो वर्किंग वुमन की डाइट

महिलाओं का खान-पान आम महिलाओं की अपेक्षा और भी न्यूट्रीशियस और स्वास्थ्यवर्धक होना चाहिए, नहीं तो शरीर अंदर से खोखला होने लगता है। उनकी डाइट कार्यक्षमता के अनुरूप होनी चाहिए। इसके लिए उन्हें चाहिए कि वे डाइट में विटामिन, जिंक, प्रोटीन और कैल्शियम वाली चीजों को शामिल करें। 


कामकाजी महिलाओं की डाइट उनके कार्य के अनुरूप होनी चाहिए, यानी स्वास्थ्यवर्धक और न्यूट्रीशियस। अन्यथा, कई तरह की बीमारियां उन पर हावी हो सकती हैं। अगर आप भी कामकाजी हैं, तो जानिए फिट रहने के लिए आपको अपनी डाइट में किन चीजों को शामिल करना चाहिए। कामकाजी महिलाओं का खान-पान आम महिलाओं की अपेक्षा और भी न्यूट्रीशियस और स्वास्थ्यवर्धक होना चाहिए, नहीं तो शरीर अंदर से खोखला होने लगता है। कामकाजी महिलाओं की डाइट उनकी कार्यक्षमता के अनुरूप होनी चाहिए। इसके लिए उन्हें अपनी डाइट में विटामिन, जिंक, प्रोटीन और कैल्शियम वाली चीजें शामिल करनी चाहिए। उन्हें अपना डाइट चार्ट बनाना चाहिए और उसी के हिसाब से डाइट लेनी चाहिए। 
करें स्वस्थ नाश्ता




सुबह का नाश्ता पौष्टिकता से परिपूर्ण होना चाहिए। इसलिए आप अपने दिन की शुरूआत दूध, दलिया, कॉर्नफ्लेक्स जैसी स्वास्थ्यवर्धक चीजों से भी कर सकती हैं। सुबह के नाश्ते में एक फल जरूर खाना चाहिए। कोशिश करें कि लाल, पीले या नारंगी रंग के फल खाएं, जैसे स्ट्रॉबेरी, सेब, पपीता या आडू आदि। इनमें विटामिन-ए की मात्रा मिलती है। सुबह चाय की जगह आप स्किमड मिल्क, म_ा, ब्लैक टी या ग्रीन टी लें तो ज्यादा अच्छा रहेगा। दिमागी ताकत के लिए आप स्प्राउट्स या दूध के साथ ड्राई फ्रूट्स भी ले सकती हैं। नाश्ते में कभी-कभार बदलाव के लिए आप ब्राउन ब्रेड या मल्टी ग्रेन ब्रेड से बना सेंडविच भी खा सकती हैं।

लंच में लाएं बदलाव
ब्रेकफास्ट और लंच के बीच सिर्फ 4-5 घंटे का ही गैप होना चाहिए। कामकाजी महिलाओं को लंच में ऐसी चीजें खानी चाहिए जिनमें जिंक की मात्रा अधिक हो। लंच में पालक या ब्रोकली जैसी हरी सब्जियों को शामिल करें। गेहूं की रोटी की जगह बेसन या गेहूं और बेसन मिक्स रोटी भी खा सकती हैं। खाने में एक कटोरी दाल जरूर खाएं। अधिक प्रोटीन के लिए आप पंच मेल दाल यानी पांच तरह की दालों को एक साथ बनाकर खाएं। अगर आपको हरी सब्जी नहीं पसंद है तो उसकी जगह आप रोटी के साथ अंडे की सफेदी की भुजिया या हल्के तेल में पनीर फ्राई करके भी खा सकती हैं। सर्दियों में दही ठंडा होने की वजह से नुकसानदेह हो सकता है इसलिए इसे खाने से बचें। लेकिन सलाद का सेवन जरूर करें। सलाद के लिए आप कटी हुई शिमला मिर्च में तेल डालकर थोड़ा सा ग्रिल कर लें। फिर उसमें कच्ची सब्जियां, सलाद का पत्ता, किशमिश और थोड़ा-सा नींबू डालकर खाएं।

डिनर भी जरूर लें

रात के समय हल्का खाना ही बेस्ट रहता है। हल्के खाने का यह मतलब बिल्कुल भी नहीं है कि आप कुछ खाएं ही न। परांठे की जगह रोटी और कम मसाले वाली सब्जी खाएं। हल्के खाने में आप पोहा, चीला, सलाद, अंडे की सफेदी का ऑमलेट, उबला हुआ अंडा, कॉर्नफ्लेक्स भी खा सकती हैं। इससे फैट भी नहीं बढ़ता है। सर्दियों के इस मौसम में आप सब्जियों का सूप भी पी सकती हैं।





मीठी गोलियां : सिरदर्द एवं माइग्रेन से निजात

होम्योपैथी में लोगों को स्वस्थ करने की अचूक शक्ति होती है। लोग जब सकल प्रयास के बाद थक हार जाते हैं तब हमारे (होम्योपैथिक चिकित्सक) के पास आते हैं। 



सिरदर्द एवं माइग्रेन के लिए केवल दर्द निवारक गोलियों पर निर्भर रहना ठीक नहीं है। इस तरह से अपनी बिमारी से छुटकारा नहीं हासिल कर सकते हैं बल्कि अन्य कई बिमारियों को आमंत्रित कर लेते हैं। 

जीवन में कभी न कभी हर किसी को सिरदर्द का अनुभव जरूर होता है परन्तु जब वही सिरदर्द लगातार और बार-बार होने लगता है तथा हमारे दैनिक कार्यों को अवरूद्ध करने लगता है। तब हमें काफी परेशानी होने लगती है और सबसे ज्यादा परेशानी तो तब होती है जब सकल प्रयास (सभी प्रकार की दवाईयों) के बाद भी यह सिरदर्द ठीक नहीं होता है और माइग्रेन कहलाने लगता है। माइग्रेन के तीन स्टेज होते हैं- माईल्ड, माडेरेट एवं सीवियर। 


माईल्ड तरह के माइग्रेन में कभी-कभी फटने जैसा सिरदर्द होता है और हमारी दैनिक कार्यों में ज्यादा प्रतिकूल असर नहीं पड़ता है। 


माडेरेट तरह के माइग्रेन में तेज सिरदर्द के साथ-साथ उल्टी जैसा या मिचली हो सकती है और हमारी दैनिक कार्यों को प्रभावित कर सकता है। 


सीवियर माइग्रेन के मरीजों को माह में तीन से पांच बार तक तेज सिरदर्द के साथ उल्टी एवं चक्कर आ सकते हैं तथा दर्द २४ से ७२ घंटे तक रह सकता है और दैनिक कार्य पूर्ण रूप से अवरूद्ध हो सकता है। 



माइग्रेन सामान्तया अनुवांशिक होता है। इसके अलावा कुछ न्युरोलॉजिकल वजह तथा ब्रेन ट्यूमर के कारण भी हो सकता है। माइग्रेन के कारण, लक्षणों तथा स्टेज के आधार पर यदि हम होम्योपैथिक दवाइयों का चयन करते हैं तो मरीजों को शीघ्र ही आशानुरूप परिणाम मिलने लगते हैं और धीरे-धीरे बिमारी से निजात मिल जाती है। 



जरूरी नहीं लंबा हो इलाज

आमतौर पर लोगों को लगता है कि होम्योपैथी इलाज काफी लंबा होता है। जबकि वास्तविकता यह है कि इन दवाइयों का असर कई कारणों पर निर्भर करता है। रोग यदि पुराना है तो मरीज को ठीक होने में समय लगता है वहीं हाल ही में उत्पन्न हुआ रोग कम अवधि के भीतर ठीक हो जाता है। 

साइड इफेक्ट्स न होने की वजह से होम्योपैथिक दवाइयों को लोग प्राथमिकता देते ही हैं, साथ ही ये बच्चों में भी बेहद लोकप्रिय है। वजह यह कि छोटी-छोटी मीठी गोलियों को लेने में बच्चों को कोई तकलीफ भी नहीं होती और दिन में दो बार लेनी हो या तीन बार, मीठे स्वाद की वजह से बच्चे खुद याद रखकर दवाइयों का सेवन कर लेते हैं। 



होम्योपैथी द्वारा टायफाइड चिकित्सा

होम्योपैथी द्वारा टायफाइड चिकित्सा
मोतीझरा अर्थात् टायफाइड भारत तथा अन्य विकसित देशों में व्यापक रूप से विद्यमान रोग है। यह रोग सालमोनेला टाइफी नामक (बैक्टीरिया) से होता है। ये बैक्टीरिया रोगी के तथा वाहक के मलमूत्र के जरिए वातावरण जल आदि को दूषित करते हैं और इस जल से संक्रमित दूध एवं इससे निर्मित पदार्थ एवं अन्य खाद्य पदार्थों का सेवन इस रोग का प्रमुख कारण हैं।
टायफाइड के लक्षण 

कब्जियत 

कफ 

सिर में दर्द 

पेट में दर्द 

गले में खराश 

हर समय बुखार रहना। 

रोग क्यों होता है?
इस ज्वर से पीडि़त रोगी के मल-मूत्र में इसके कीटाणु रहते हैं। ये कीटाणु जल या खाद्य पदार्थों में पहुंचकर अन्य व्यक्ति को भी इस रोग से संक्रमित करने का खतरा पैदा कर देते हैं। ये कीटाणु मल में अधिकतम पन्द्रह दिन तक जीवित रह सकते हैं। अमाशय में स्थित अम्ल से ये कीटाणु मर जाते हैं परन्तु जब इसका वेग अधिक होता है तब ये अम्ल से भी नहीं मर पाते और कृमि संख्या में बढ़कर ज्वर एवं छोटी आंत में सूजन व घाव उत्पन्न कर देते हैं। साथ-साथ एक प्रकार का विष का उत्सर्ग भी करते हैं जिससे ज्वर आदि के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। मरीज को लंबे समय तक परहेज करना पड़ता है। मरीज को हल्का व सुपाच्य भोजन करने के साथ ही उबला पानी पीना चाहिए। 

टायफाइड अधिकतर गंदे पानी के सेवन से होने वाली बीमारी है। उबला हुआ पानी पीने और खान पान पर नियंत्रण रखने से बीमारी पर काबू पाया जा सकता है। 

आमतौर पर ये बुखार एक से दो हफ्ते तक चलता है। मरीज को १०३-१०४ डिग्री बुखार की शिकायत निरंतर रहती है। कई मरीजों को छाती में जकडऩ भी हो जाती है। इसके अलावा पेट दर्द की परेशानी आम बात है। मरीज को पूरी तरह से ठीक होने में ४-६ सप्ताह लग जाते हैं। हमारे पास आने वाले मरीज जांच रिपोर्ट लेकर आते हैं, जो कि पूरी तरह से डायग्नोस्ट केस होते हैं। साथ ही भूख न लगना, सिरदर्द, शरीर तथा जोड़ों में दर्द, कमजोरी, बाल झडऩा, सुस्ती, थकान इत्यादि समस्याएं बुखार उतर जाने के बाद भी मरीजों में बनी रहती है। 

होम्योपैथिक दवाईयों के सेवन से जल्द ही टायफाइड तथा उसके साथ होने वाली अन्य परेशानियों से छुटकारा पा सकते हैं। 


जिनमें ये पांच गुण न हो उनसे दोस्ती करना मूर्खता है... चाणक्य

जिनमें ये पांच गुण न हो उनसे दोस्ती करना मूर्खता है... चाणक्य
सभी रिश्ते व्यक्ति के जन्म के साथ ही बनते हैं। जिस घर-परिवार में हमारा जन्म हुआ है वहां से संबंधित सभी लोगों से हमारा रिश्ता स्वत: ही जुड़ जाता है। इन रिश्तों को तोडऩा या जोडऩा व्यक्ति के हाथों में नहीं रहता है। ये रिश्ते हमेशा ही बने रहते हैं। इन रिश्तों के अतिरक्ति एक रिश्ता है जो हम अपने व्यवहार से बनाते हैं, वह है मित्रता। मित्रता ही एकमात्र ऐसा रिश्ता है जो हम खुद जोड़ते हैं। मित्र हम स्वयं चुनते हैं।


सच्चे मित्र ही हमें सभी परेशानियों से बचा लेते हैं और कठिन समय में मदद करते हैं। हमें कैसे मित्र चुनना चाहिए? इस संबंध में आचार्य चाणक्य ने कहा है कि जिस व्यक्ति में अपने परिवार का पालन पोषण करने की योग्यता ना हो, जो व्यक्ति अपनी गलती होने पर भी किसी से न डरता हो, जो व्यक्ति शर्म नहीं करता है, लज्जावान न हो, अन्य लोगों के लिए जिसमें उदारता का भाव न हो, जो इंसान त्यागशील नहीं है, वे मित्रता के योग्य नहीं कहे जा सकते। 


चाणक्य के अनुसार यदि कोई व्यक्ति अपने परिवार का भरण-पोषण सिर्फ आलस्य और झूठे अभिमान की वजह से नहीं करते हैं। हमेशा जो व्यर्थ की बातों में समय नष्ट करते हैं। ऐसे लोगों से दूर ही रहना चाहिए। इसके अलावा जो लोग अपनी गलती होने पर भी किसी न डरे, विद्वान और वृद्धजन का आदर-सम्मान नहीं करते हैं। उनसे मित्रता नहीं करना चाहिए। जिन लोगों में लज्जा का गुण न हो, जो किसी भी गलत कार्य को करने में संकोच न करें, जो लज्जा हीन हो उनसे मित्रता नहीं करनी चाहिए। जिन लोगों में अन्य लोगों के लिए उदारता का गुण न हो वे भी मित्रता योग्य नहीं होते हैं। दूसरे के दुख पर उपहास करना, किसी की मदद न करने वालों से मित्रता न करें। इसके अलावा जो लोग त्याग की भावना नहीं रखते हो उनसे भी मित्रता नहीं करना चाहिए। 







दूर रहिए नेगेटिव थिंकिंग वाले दोस्तों से



हम सभी अपने दोस्तों से बहुत प्यार करते हैं। उनके साथ समय बिताना हमें प्रिय लगता है। लेकिन जरा अपने आप से पूछिए कि क्या कुछ दोस्तों से मिलने के बाद आप डिप्रेशन में चले जाते हैं। या आपको घबराहट होने लगती है। या भविष्य के प्रति आपकी चिंता बढ़ जाती है। या फिर आपमें नकारात्मक विचार आने लगते हैं। अगर इनमें से किसी एक प्रश्न का भी उत्तर हाँ है तो सावधान आपको अपने मित्र से दूरी बनाने की जरूरत है। या तो आपकी संगत में वह पॉजिटीव हो जाए या फिर उसकी नेगेटिविटी का आप पर असर ना हो इसलिए आजमाइए कुछ आसान से टिप्स खुद को बचाने के -


किसी दोस्त की नकारात्मक बातें सोच-सोच कर आप ऊब गए हैं तो खड़े हो जाइए और 5-10 मिनट टहलें या किसी खुशमिजाज मित्र से फोन पर चलते-चलते बात करें या कोई मधुर संगीत सुनें। 

नकारात्मक न सोचें क्योंकि इससे तनाव बढ़ता है आप डिप्रेशन में आ जाते हैं। 

नकारात्मक सोच वाले लोग सकारात्मक सोचने वालों की तुलना में कम जीते हैं। 

नकारात्मक सोचने वाले लोग अन्य लोगों की तुलना में अधिक भोजन करते हैं। परिणामस्वरूप आगे चलकर उनके बीमार होने की आशंका बढ़ जाती है। 

नकारात्मक विचार मन में न आएँ, इसके लिए सकारात्मक कार्यों में लग जाएँ। 

आप चाहें तो प्रकृति के नजदीक जाकर ईश्वर की खूबसूरत संरचना को निहारें, पेड़-पौधे देखें या पक्षियों की आवाज सुनें। मन को सुकून मिलेगा। 

जब भी मन में नकारात्मक विचार आए तो टीवी पर कोई कॉमेडी प्रोग्राम देखने लगें। कोई अच्छी किताब पढ़ें या रसोई में जाकर मनपसंद व्यंजन बनाएँ। 

यदि आप किसी अन्य कार्य में व्यस्त हो जाते हैं तो दस मिनट में नकारात्मक विचार स्वत: ही गायब हो जाते हैं। 

नकारात्मक विचार वाले दोस्तों को समझाने का प्रयास करें अगर वह ना बदले तो उससे बात न करें क्योंकि ऐसे लोग और कुछ करें या न करें लेकिन आपको परेशान अवश्य कर देंगे। 

दोस्ती अपनी जगह है, दोस्ती में परेशानी भी बाँटी जानी चाहिए लेकिन एक सीमा तक। हर वक्त का रोना आप दोनों के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है। 

इसलिए अच्छा-अच्छा सोचें और अच्छा-अच्छा ही करने की कोशिश करें। यह वक्त अगर चला गया तो फिर लौट कर नहीं आने वाला। 




वरदान होते हैं सच्चे मित्र

वरदान होते हैं सच्चे मित्र




रिश्तों का बंधन जन्म के साथ ही जुड़ा होता है। इन पारिवारिक रिश्तों के साथ-साथ एक बहुत महत्वपूर्ण रिश्ता होता है- दोस्ती का रिश्ता, जो हम अपने विवेक से बनाते हैं। मित्र बनाना या मित्रता करना मानवीय स्वभाव है। छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्गों तक सभी के मित्र होते हैं।




कहा जा सकता है कि बिना मित्रों के सामाजिक जीवन नीरस होता है। कुछ लोग मित्र बनाने में माहिर होते हैं तो कुछ लोगों को दोस्ती करने में बहुत समय लगता है। मित्र पाने की राह है खुद किसी का मित्र बन जाना। 






रक्ताल्पता और हर माह परेशानी

रक्ताल्पता और हर माह परेशानी

स्वल्परज (मासिक के समय कम रक्तस्त्राव) के कारणों में रक्ताल्पता अथवा नारी की साधारण कमजोरी प्राय: एक बहुत बड़ा कारण होता है। ऐसी स्थिति में प्रयास यह होना चाहिए कि कमजोरी दूर हो और रक्त की मात्रा बढ़े। यदि इसके विपरीत मासिक ठीक करने वाली दवाएं दी जाती रहीं, तो वह सर्वथा निरर्थक सिद्ध होंगी।

नारी के लिए मासिक-धर्म होना, निश्चय ही एक स्वाभाविक क्रिया है। और, एक निश्चित समय पर 3-4 दिनों के स्त्राव के बाद, वह स्वत: बन्द हो जाता है। मासिक धर्म ही नारी के लिए गर्भधारण में प्रकारान्तर से सहायक होता है। मासिक धर्म में अनेक व्यतिक्रम भी उपस्थित होते हैं। ये सभी व्यतिक्रम नारी के साधारण स्वास्थ्य से संबद्ध होते हैं। मात्रा में मासिक कम होना, अधिक होना, असमय एक मास में एक बार से अधिक होना, महीने के अन्तर से होना अथवा मासिक के समय कटि-प्रदेश में दर्द सभी नारी स्वास्थ्य के लिए समस्याएं हैं।

हम मासिक कम होने की समस्याओं पर ही विचार करेंगे। ऐसे कष्ट को स्वल्परज कहते हैं। इस कष्ट के पीछे अनेक कारण हो सकते हैं- यथा डिम्ब-कोष में प्रदाह, डिम्ब-कोष में सूजन या गिल्टी, जरायु का स्थानाच्युत होना, नारी का रक्ताल्पता का शिकार होना, साधारण कमजोरी तथा मानसिक अवसन्नता। 

स्वल्परज के पीछे क्या कारण है, इसका निदान तो अपनी जगह आवश्यक है ही, पर निदान के चक्कर में प्राय: रोगिणी ऐसी भ्रमित हो जाती है कि वह दवा खाती ही जाती है और लाभ कुछ नहीं दिखता। 

रक्ताल्पता को समझें


रक्ताल्पता का अर्थ है-रक्त की कमी। रक्ताल्पता के शिकार व्यक्ति के रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी होती है। हीमोग्लोबिन की रचना में भोजन में आयरन का सही मात्रा में होना अत्यन्त आवश्यक है। श्वसन के द्वारा आए ऑक्सीजन को वही ग्रहण करता है और अपने साथ ही उस ऑक्सीजन को भी कोशिकाओं तक उनके पोषण के लिए पहुंचाता है। हीमोग्लोबिन ही वह पदार्थ है, जो रक्त को लालिमा प्रदान करता है। जिसके रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी होगी, उसकी त्वचा का रंग भी पीताभ होगा। इसी कारण आयुर्वेद में इसे 'पाण्डुÓ नाम दिया गया है। रक्ताल्पता से ग्रस्त व्यक्ति मात्र पीताभ ही नहीं होता, उसे भूख नहीं लगती, वह शक्तिहीनता का अनुभव करता है तथा पूरा पोषण प्राप्त करने में अक्षम होता है। इसका कारण है कि शरीर को पूरा पोषण न मिल पाने के कारण, व्यक्ति शारीरिक और मानसिक दोनों ही स्तरों पर प्रभावित होता है। इसके साथ ही तथ्य यह है कि रक्ताल्पता गलत खान-पान और रहन-सहन का प्रतिफल है। इसके कारण एक चक्र बन जाता है- गलत रहन-सहन के कारण रक्त की आपूर्ति में गड़बड़ी और रक्त की आपूर्ति में गड़बड़ी के कारण, कमजोरी में अभिवृद्धि।

उपचार के पीछे दृष्टि
यदि रक्ताल्पता के रोगी का उपचार करना हो, तो व्यक्ति के पूरे शरीर को दृष्टि में रखकर उपचार करना चाहिए। ऐसे व्यक्ति का पूरा ऑर्गेनिज्म सदोष होता है। उसके ही त्रुटिपूर्ण काम के कारण रक्ताल्पता की स्थिति उत्पन्न होती है। पर चिकित्सक रक्ताल्पता का अर्थ लौह की कमी मान कर उसे लौह देना प्रारम्भ कर देते हैं। पर जैसे पहले कहा जा चुका है और कई बार इस खनिज लौह को आत्मसात कर पाने में शरीर असमर्थ होता है।

आहार


प्राकृतिक आयरन प्राप्त करने का सही साधन आहार है। हरी पत्ती वाली भाजियां, फल, सूखे मेवे, चोकर समेत आटा तथा कन समेत चावल शरीर को लौह आपूर्ति के लिए सही साधन है। रक्ताल्पता से सही रूप में मुक्ति पाने के लिए आवश्यक है कि शुरू में तीन-चार दिन रोगी को मात्र फल पर रखा जाए और रोगी जितने दिनों तक फलाहार करती रहे, उतने दिन नित्य उसे हल्के गरम पानी का एनिमा दिया जाए। फलाहार काल में यह भी ध्यान रखने की बात है कि एक बार में मात्र एक ही फल दिया जाए। उसके बाद रूग्णा को धीरे-धीरे साधारण भोजन पर लाया जाए। यथा प्रात: 250 ग्राम मौसम में मिलने वाला कोई एक फल यथा सेब, नाशपती, अमरूद, ककड़ी, खीरा, खरबूजा, आम तथा 50 ग्राम अंकुरित मूंग तथा दोपहर, शाम को चोकरदार आटे की रोटी तथा 250 ग्राम बिना मसाले वाली सादी सब्जी। सब्जी में दोनों समय हरी पत्तियों वाली भाजियां भी पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिए। और तीसरे प्रहर गाजर, मौसमी, संतरा, खीरा किसी चीज का 250 ग्राम रस।

चिकित्सा कटिस्नान


स्वल्परज से ग्रस्त नारी को प्रात: सायं कटिस्नान लेकर एक-दो किमी. टहलना अवश्य चाहिए। मासिक के दिनों में कटिस्नान स्थगित कर देना चाहिए, पर यथाशक्ति टहलना जारी रखना चाहिए। कटिस्नान दो मिनट से प्रारम्भ करना चाहिए और बढ़ाकर 5 मिनट तक का लेना चाहिए।

गरम-ठंडा कटिस्नान

स्वल्परज से ग्रस्त नारी को सप्ताह में एक दिन गरम ठंडा कटिस्नान लेना चाहिए। यह भी कटिस्नान के समान ही काम है। पर इसके लिए दो टबों की आवश्यकता होती है। एक टब में गरम पानी होता है और दूसरे में ठंडा। गरम पानी के टब में 3 मिनट बैठें और ठंडे पानी के टब में 1 मिनट और ऐसा तीन बार करें। चौथी बार गरम पानी के टब में 3 मिनट बैठें और ठंडे पानी के टब में 3 मिनट। उसके बाद ठंडे पानी से स्नान कर लें। गरम ठंडा कटिस्नान में ध्यान में रखने वाली दो बातें बहुत जरूरी है। गरम पानी वाले टब का पानी ज्यों-ज्यों ठंडा होता जाए, उसमें गरम पानी मिलाकर पानी का तापमान पूर्ववत करते रहें। और दूसरी बात यह कि स्नान शुरू करने से पहले सिर को धो लें और सिर पर गीला तौलिया लपेट लें। इस तौलिया को पूरे काल में 2-3 बार ठंडे पानी से गीला कर लें।

स्टेमसेल एवं थैलेसीमिया




स्टेमसेल एवं थैलेसीमिया 

जिन आनुवंशिक स्वास्थ्य समस्याओं को गंभीर रोगों की श्रेणी में रखा जाता है, थेलासीमिया भी उनमें से एक है। इसमें जीन की संरचना में जन्मजात रूप से गड़बड़ी होने की वजह से शरीर में शुद्ध रक्त का निर्माण नहीं हो पाता और डिफेक्टिव ब्लड शरीर के अपने मेकैनिज्म के जरिये स्वाभाविक रूप से नष्ट हो जाता है। इस वजह से थैलेसीमिया के मरीजों के शरीर में हमेशा खून की कमी रहती है और उसमें हीमोग्लोबिन का स्तर भी बहुत कम रहता है। 



अकसर लोग इसे बच्चों की बीमारी समझ लेते हैं, पर वास्तव में ऐसा है नहीं। दरअसल जिनकी रक्त कोशिकाओं की संरचना में बहुत ज्यादा गड़बड़ी होती है, उनमें जन्म के कुछ दिनों के बाद ही इस बीमारी की पहचान हो जाती है, अगर रक्त कोशिकाओं की संरचना में ज्यादा गड़बड़ी न हो तो कई बार लोगों में 60-65 वर्ष की उम्र में भी अचानक इस बीमारी के लक्षण देखने को मिलते हैं। 


घबराएं नहीं 


कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनमें 3 से 15 प्रतिशत तक इस बीमारी के जींस मौजूद होते है, इन्हें थैलेसीमिया कैरियर कहा जाता है। कुछ लोग इसे थैलेसीमिया माइनर का नाम देते हैं, जो कि सर्वथा अनुचित है। यह अपने आप में कोई बीमारी नहीं है। ऐसे लोग सक्रिय और सामान्य जीवन व्यतीत कर सकते हैं। देश के सुपर स्टार अमिताभ बच्चन इस बात की जीती-जागती मिसाल हैं। थैलेसीमिया के कैरियर लोगों को केवल इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे किसी थैलेसीमिया कैरियर से विवाह न करें। अगर पति-पत्नी दोनों ही इसके कैरियर हों तो बच्चों में इसके लक्षण होने की आशंका बढ़ जाती है। अगर पति-पत्नी दोनों इस बीमारी के वाहक हैं तो गर्भावस्था के शुरुआती दो महीनों में स्त्री को प्रीनेटल डाइग्नोसिस करवा लेना चाहिए। इससे यह मालूम हो जाएगा कि गर्भस्थ भू्रण में थैलेसीमिया के लक्षण हैं या नहीं। अगर रिपोर्ट निगेटिव आए तभी शिशु को जन्म देने का निर्णय लेना चाहिए। 

क्या है लक्षण 


1. त्वचा की रंगत में स्वाभाविक गुलाबीपन के बजाय पीलापन दिखाई देता है। ऐसे लोगों में अक्सर जॉन्डिस का इन्फेक्शन भी हो जाता है। 







2. लिवर बढऩे से पेट फूला हुआ लगता है और हीमोग्लोबिन का स्तर भी काफी कम होता है। 

3. अनावश्यक थकान और कमजोरी महसूस होती है। 

स्टेम सेल से उपचार 


अब तक इसे लाइलाज बीमारी समझा जाता था, क्योंकि नियमित ब्लड ट्रांस्फ्यूजन के अलावा इसका और कोई उपचार नहीं था। यह बल्ड ट्रांस्फ्यूजन मरीज को मौत से बचाए रखने में मददगार साबित होता है, लेकिन यह इस बीमारी का स्थायी उपचार नहीं है। इसे जड़ से समाप्त करने का एकमात्र तरीका स्टेम सेल थेरेपी है। इसके जरिये जन्म के शुरुआती 10 मिनट के भीतर शिशु के गर्भनाल से एक बैग में रक्त के नमूने एकत्र किए जाते है। इसी रक्त में स्टेम सेल्स पाए जाते है। जीवन की ये मूलभूत कोशिकाएं, मानव शरीर के सभी अंगों की रचना का आधार हो 
क्रिया स्टेम सेल के संग्रह की 


जन्म के बाद दस मिनट के भीतर शिशु के गर्भनाल से थोड़ा सा खून लेकर उसे एक स्टरलाइज्ड बैग में रखा जाता है। सैंपल एकत्र करके उसके तापमान को नियंत्रित रखने के लिए उसे एक खास तरह के कंटेनर में रख कर 36 घंटे के भीतर लैब में पहुंचा दिया जाता है। स्टेम सेल को वहां वर्षो तक संरक्षित रखा जा सकता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह सुरक्षित है। इससे मां और बच्चे दोनों को कोई तकलीफ नहीं होती और इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। 


ती है। इनकी तुलना मिट्टी से की जा सकती है, जिसे शिल्पकार मनचाहे आकार में ढाल सकता है। इन्हें शरीर में जहां भी प्रत्यारोपित किया जाता है, ये वहीं दूसरी नई परिपक्व कोशिकाओं का निर्माण करने में सक्षम होती है।

लिवर का ध्यान रखें और सेहतमंद रहें

एडवांस्ड होम्यो हेल्थ सेंटर इंदौर पर लीवर की बीमारी एवं वर्षा जनित रोग पर कार्यशाला आयोजित की गई जिसमें होम्योपैथिक चिकित्सक एवं होम्योपैथिक चिकित्सा महाविद्यालय के प्राध्यापक डा. ए.के. द्विवेदी ने कहा कि आयु की अवधि का बढ़ाना मात्र ही अच्छे स्वास्थ्य का सूचक नहीं इस समय विश्वभर में स्वास्थ्य की स्थिति बहुत ही गंभीर है। प्राथमिक दृष्टि से आयु की अवधि का बढऩा मात्र ही अच्छे स्वास्थ्य का सूचक नहीं है। शहरी भारतीयों के खानपान के तौर-तरीकों में हाल में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। ढेर सारे कार्बोहाइड्रेट, बिना रिफाइन किया हुआ आटा और कम वसा वाली खुराक से, रुझान अब उच्च वसायुक्त और कम अवशिष्ट वाली खुराक की ओर हो गया है। आधुनिक भारतीय आहार अत्यधिक कार्बोहाइड्रेट और वसायुक्त होता जा रहा है। इसके साथ ही एल्कोहल का सेवन भी बढ़ा है, जिसके नतीजे हृदय की बीमारियों, उच्च रक्तचाप (बीपी), मुधमेह और लिवर (कलेजा) से जुड़ी बीमारियों के रूप में सामने आ रहे हैं।

कोई टिप्पणी नहीं

Healths Is Wealth. Blogger द्वारा संचालित.