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महिलाओं को स्वास्थ्य के लिए पांच सुझाव


महिलाओं को स्वास्थ्य के लिए पांच सुझाव
Healths Is Wealth  
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इतिहास की गति ने लिंग के आधार पर स्त्रियों और पुरुषों के लिए अलग-अलग काम निर्धारित कर दिया. पिछले कई दशकों से इस गति के खिलाफ जाकर चीज़ों को व्यवस्थित करने का प्रयत्न किया जा रहा है. इस व्यवस्था में औरतों के ऊपर दोहरा बोझ आ पड़ा है. अब, न सिर्फ वो अर्थोपार्जन में व्यस्त हैं बल्कि घर, बच्चे और रसोई में उनकी भागीदारी अभी भी ज्यादा है. ऐसे में स्त्री स्वस्थ सम्बन्धी शिकायतों में भारी वृद्धि हुई है. अगर, इन शिकायतों पर तुरंत ध्यान न दिया गया तो विकास की ओर बढ़ते हमारे ये कदम विनाशकारी साबित हो सकते हैं. इसके लिए जरूरी है की हम अपनी सोच का दायरा खोलें और संकट को पहचानें 
कैंसर- दुनिया में हर साल लगभग दस लाख औरतें सर्वाइकल तथा ब्रेस्ट कैंसर की वजह से मौत का शिकार होती हैं. इनमें से ज्यादातर संख्या उन देशों की है जहां जीवनशैली तथा आय, दोनों की समस्या है. इन दोनों का अभी कोई समुचित इलाज़ सामने नहीं है. इनका एक ही हल है की आप नियमित रूप से अपनी जांच कराते रहें अगर समय पर इन्हें पकड़ लिया जाए तो कई तरह के इलाज़ से इनसे बचा जा सकता है. हालंकि, इन दोनों रोगों में हमारी जीवनशैली की बड़ी भूमिका है. इनमें आहार और पहनावा प्रमुख हैं. 
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प्रजनन से जुडी समस्या- पंद्रह से चौआलिस साल की औरतों के स्वास्थ्य समस्याओं में लगभग एक तिहाई हिस्सा सिर्फ यौन तथा प्रजनन सम्बन्धी रोगों का है. इसके लिए जागरूकता बेहद जरूरी है. अक्सर ये देखा गया है की इन दोनों मामले में जानकारी सबसे बड़ा अभाव है. दूसरा कारण है झेंप. पुरुष प्रधान समाज के नज़रिए ने इन बातों से जुड़े हर मुद्दे को शर्म से जोड़ दिया है. इसका खामियाजा औरतों को अपने जीवन से चुकाना पड़ता है. सेक्स सम्बन्धी शिक्षा और सुरक्षित सेक्स इसकी ओर पहले और मजबूत कदम हो सकते हैं. 
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एच आई वी यानी एड्स- एड्स की सबसे ज्यादा शिकार कम उम्र की महिलायें होती हैं. एड्स की सबसे ज्यादा शिकायत पिछड़े या कम विकसित देशों में देखि गयी है. इसके लिए असुरक्षित यौन सम्बन्ध सबसे बड़ा कारक है. इसके अलावा समाज में महिलाओं की स्थिति, दूसरी सबसे बड़ी चुनौती है. इस जीवाणु के फैलने से ना सिर्फ मरीज की जान खतरे में रहती है बल्कि इसका असर अगले पीढ़ी में भी जाने का खतरा रहता है. 
मानसिक स्वास्थय- अध्ययन से ये बात पुष्ट होती है की डिप्रेशन, एंग्जायटी जैसी समस्याएं महिलाओं के लिए ज्यादा खतरनाक होती हैं. महिलायें इनकी चपेट में पुरुषों के मुकाबले आसानी से आ सकती हैं. साठ से कम उम्र की महिलाओं में इन बीमारियों की वजह से आत्म-हत्या में काफी तेजी आयी है. इसके लिए जरूरी है सहोग की भावना उत्पन्न करना. इस काम के लिए समाज के हर हिस्से को सहभागी बनना पड़ेगा. इसकी शुरुआत अपने घर से की जा सकती है. इसके लिए बातचीत सबसे अच्छा माध्यम है. जब तक हम एक दूसरे को समझेंगे नहीं, उसकी समस्या का समाधान कैसे कर सकते हैं. 
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बढती उम्र- बढती उम्र पुरुषों के मुकाबले औरतों के लिए ज्यादा परेशानियाँ ले कर आता है. मसलन डेमेंसिया, कैल्शियम की कमी से हड्डियों की समस्याएं. इसका एक मूल कारण है औरतों का अपने आहार पर ध्यान ना देना. दूसरा बड़ा कारण है अकेलापन. इनमें से ज्यादातर समस्याओं का निपटारा अपनी जीवनशैली में कुछ बदलावों से किया जा सकता है.
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सीओपीडी: एक खतरनाक बीमारी



सीओपीडी: एक खतरनाक बीमारीसीओपीडी यानी की क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज. ये काफी सारे लक्षणों और बीमारियों को एक नाम के अन्दर एकजुट करने की कोशिश की गयी है. मूलतः ये साड़ी बीमारियाँ फेफड़े से जुडी हुई हैं. इसके अंदर क्रोनिक ब्रोंकाइटिस, रिफ्रैक्टरी अस्थमा तथा एम्फ्य्सेमा जैसी बीमारियाँ आती हैं. इन सारी बीमारियों में सांस फूलना एक आम लक्षण है. सीओपीडी के लक्षण इतने स्पष्ट नहीं होते की आप एकदम से किसी बीमारी की सूचना पा सकें. शुरुआत में तो बिलकुल भी नहीं. ये काफी धीरे-धीरे गतिशील होते हैं. कई सारे लोगों को साँसों का फूलना या बराबर कफ़ की शिकायत उम्र से जुडी लगती है. लेकिन, ऐसा नहीं है. अगर आपको सांस लेने में तकलीफ का अहसास हो रहा हो या बिना सीढ़ी चढ़े भी आप हांफने लगते हैं तो निःसंकोच आपको डॉक्टर से सलाह की जरूरत है.



सीओपीडी के लक्षण

सबसे पहली बात है उन लक्षणों की पहचान करना जिससे आप कह सकते हैं की आप सीओपीडी के चपेट में आने के खतरे में हैं. 
साँसों का फूलना. 
सीने में घरघराहट महसूस करना. 
बराबर कफ़ की शिकायत होना 
सीना कसा-कसा या बंद लगना. 


सीओपीडी के कारण

स लाख लोगों की मृत्यु सिर्फ सीओपीडी से हुई थी. ये उस साल हुई कुल मौतों का लगभग पांच प्रतिशत है. आयें जानते हैं सीओपीडी के कारक 
सीओपीडी का सबसे बड़ा कारक है धूम्रपान. आप धूम्रपान खुद करते हैं या ऐसी हवा लेते हैं जहाँ धूम्रपान हो रहा है तो आपको इस बीमारी की संभावना प्रबल हो जाती है. 
धूम्रपान के अलावा वायु प्रदूषण भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है 
तरह-तरह के धुल कण, केमिकल्स तथा गैस इसमें इजाफा करते हैं. 
इनके अलावा आनुवांशिक रूप से भी आप इस रोग की चपेट में आ सकते हैं. 
लम्बे समय तक दमे का रहना अनततः सीओपीडी में बदल जाता है. 
चालीस वर्ष के ऊपर के लोगों में इस बीमारी का खतरा ज्यादा हो जाता है. 


कैसे पहचानें सीओपीडी

इसकी पहचान के लिए एक जांच होती है जिसे स्पिरोमेट्री कहते हैं. इसमें ये देखा जाता है की आप कितनी जल्दी और कितना ज्यादा सांस बहार छोड़ सकते हैं. सीओपीडी को जड़ से ठीक नहीं किया जा सकता है. इसे नियंत्रित जरूर किया जा सकता है. वर्तमान में इसके शिकार ज्यादा मर्द हैं. लेकिन, बदलते व्यावसायिक कारणों और बढ़ते धूम्रपान की वजह से महिलाओं में भी इसकी संख्या में वृद्धि हुई है. इसका सबसे पहला इलाज़ है धूम्रपान छोड़ देना. यदि आप खुद नहीं करते हैं तो परोक्ष रूप से ऐसी हवा में सांस लेने से बचें.


सीओपीडी से बचाव

सीओपीडी से बचने का व्यक्ति विशेष का तरीका कभी पूर्ण रूप से प्रभावित नहीं हो सकता है. इसके लिए सामाजिक तौर पर जागरूकता जरूरी है. क्योंकि हवा सबका अपना-अपना नहीं बल्कि सामूहिक होता है. इसके लिए जरूरी है की हम सभी वायु प्रदूषण के खतरे को समझें. हम इस बात को स्वीकारें की जितनी जल्दी हो धूम्रपान छोड़ना की एकमात्र विकल्प है. हम ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगायें और सामाजिक तौर शारीरिक स्फूर्ति की चेतना को जगाएं. अगर समय रहते इस बीमारी के प्रति उचित कदम ना लिए गए तो बहुत जल्द दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा इसकी चपेट में आने वाला है.

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