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गुर्दे( Kidney) की समस्यायों लिए करें योग


गुर्दे( Kidney) की समस्यायों लिए करें योग

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आज के आधुनिक जीवनशैली के कारण लोगों को कई तरह की बीमारियाँ, जैसे- डाइबीटिज, हाई ब्लड-प्रेशर, हर्ट डिजीज आदि हो रहे हैं जिसके कारण किडनी के ऊपर बहुत बूरा प्रभाव पड़ रहा है। इसलिए किडनी की बीमारी आज तेजी से बढ़ रही हैं। इस रोग का पता पहले अवस्था में ही नहीं चलता है, इसलिए किडनी को स्वस्थ रखना बहुत ज़रूरी हो जाता है।गुर्दे( Kidney) को नुकसान में कई चरणो में वर्गीकृत किया जाता है। योग केवल प्रारंभिक चरण मे मददगार होना पाया जाता है।
प्राणायाम और ध्यान दोनों गुर्दे के कई विकारो में काबू पाने में मददगार और महत्वपूर्ण व्यवहार कर रहे हैं। इसके अलावा ऊतकों को ऑक्सीजन की आपूर्ति में सुधार और शरीर के सुरक्षा तंत्र में सुधार के लिए उपयोगी है।
यह आसनो से गुर्दे( Kidney) विकारो के संबंधित खिलाफ लड़ने के लिए सक्षम बनाता है। गुर्दे के functionings में सुधार लाने में बहुत मददगार पाए जाते है। प्रमुख आसनो में पश्चिमोत्तमसाना(Paschimottamasana),बद्धकोणासन( Baddha konasana),उपविस्ताकोनासन(Upavishta konasana) और अर्ध मत्स्येन्द्रासन( Ardh matsyendrasana) शामिल है। ये सभी योग मुद्राओ एक अनुभवी योग गुरु या एक Naturopathist से अभ्यास किया जाए।


अर्ध मत्स्येन्द्रासन(Ardha matsyendrasana)
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विधि:
१. दण्डासन में बैठकर बाएं पैर को मोड़कर एड़ी को नितम्ब के पास लगाएँ।
२. दायें पैर को बाएँ के घुटने के पास बाहर की ओर भूमि पर रखें।
३. बाएँ हाथ को दायें घुटने के समीप बाहर की और सीधा रखते हुए दाएँ पैर को पंजे को पकड़ें।
४. दायें हाथ को पीठ के पीछे से घुमाकर पीछे की ओर देखें।
५. इस प्रकार से दूसरी ओर से भी आसन करे। 
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लाभ: 

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ये आसन से गुर्दे( Kidney),मधुमेह(Diabetes) एवं कमरदर्द(Spinal cord) लाभदायी है।

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उपविस्ताकोनासन(Upavishta konasana)


विधिः
१. दण्डासन में बैठकर पैरों को दोनों ओर पाश्व भागों में जितना फैला सकते है ,फैलाइए। 


२. दोनों हाथों से पैरों के अंगूठो को पकड़ कर श्वास बाहर निकले हुये छाती एवं पेट को भूमि पर स्पर्श कीजिए। ठोड़ी भी भूमि पर लगी हुई होगी। इस स्थिति में कुछ देर यथाशक्ति रहकर विधि क्रमांक एक की स्थिति में आ जाये।

लाभ: जंघा ,टांगे , कमर। पीठ एवं गुर्दे( Kidney)लाभकारी है और उदर निर्दोष होकर वीर्य स्थिर होता है। 
बद्धकोणासन( Baddha konasana)

विधिः
दायें पैर को मोड़कर बाये जंघे पर रखें। बांयें हाथ से दाएँ पंजे को पकड़ें तथा दाएँ हाथ को दाहिने घुटने पर रखें। अब दाहिने हाथ को दाएँ घुटने के निचे लगाते हुए घुटने को ऊपर उठाकर छाती से लगाएँ तथा घुटने को दबाते हुए जमीं पर टिका दें। इसी प्रकार इस अभ्यास को विपरीत बायें पैर को मोड़कर दायें जंघे पर रखकर पूर्ववत करें। अंत में दोनों हाथों से पंजो को पकड़कर घुटनो को भी स्पर्श करायें ऊपर उठायें। इस प्रकार कई बार इसकी आवृति करें (बटर फ्लाई ) ।
लाभ:


१. गुर्दे( Kidney) एवं नितम्ब जोड़ को स्वस्थ करने के लिए यह अभ्यास उत्तम है तथा वहां बढ़ी हुई चर्बी को कम करने के लिए उत्तम है।
२. मासिक धर्म की असुविधा में मदद करता है और पाचन शिकायतों और अंडाशय, प्रोस्टेट ग्रंथि, गुर्दे और मूत्राशय के स्वास्थ्य में सुधार में मददगार है। पेट के अंगों को उत्तेजित करता है। योग ग्रंथों के अनुसार, थकान दूर करके, पीठ के निचले हिस्से को खोलने में मदद करता है और कटिस्नायुशूल में राहत मिलती है।

पश्चिमोत्तमसाना(Paschimottamasana)


विधिः
१. दण्डासन में बैठकर दोनों हाथों के अंगुष्ठो व् तर्जनी की सहायता से पैरो के अंगूठो को पकड़िये। 


२. श्वास बहार निकालकर सामने झुकते हुए सिर को घुटनों के बीच लगाने का प्रयत्न कीजिये। पेट को उड़ियान बन्ध की स्थिति मे रख सकते है। घुटने-पैर सीधे भूमि पर लगे हुए तथा कोहनियाँ भी भूमि अपर टिकी हुई हों। इस स्थिति में शक्ति अनुसार आधे से तीन मिनिट तक रहें। फिर श्वास छोड़ते हुए वापस सामान्य स्थिति मे आ जाएँ।


लाभ: 


पेट की पेशियों में संकुचन होता है। जठारग्नि को प्रदीप्त करता है व् वीर्य सम्बन्धी विकारो को नष्ट करता है। कदवृद्धि के लिए महत्वपूर्ण अभ्यास है। 




सिरदर्द ओर माइग्रेन है तो करें प्राणायाम



सिरदर्द कभी गर्मी लगने से हो जाता है कभी शर्दी लगने से हो जाता है और कभी गैस के कारन सिरदर्द होता है। यदि शर्दी के कारन से सिर दर्द है तो कपालभाति प्राणायाम करे, अगर गैस के कारन आपको सिरदर्द है तो अनुलोम विलोंम प्राणायाम करे। ये प्राणायाम १५ मिनिट से ले के ३० मिनिट तक करना चाहिए।

अनुलोम-विलोम प्राणायाम (ANULOM-VILOM PRANAYAM)

दाएँ हाथ को उठकर दाएँ हाथ के अंगुष्ठ के द्वारा दायाँ स्वर तथा अनामिका
व् मध्यमा अंगुलियों के द्वारा बायाँ स्वर बन्द करना चाहिए। हाथ की हथेली नासिका के सामने न रखकर थोड़ा ऊपर रखना चाहिए।
विधि:
अनुलोम-विलोम प्राणायाम को बाए नासिका से प्रारम्भ करते है। अंगुष्ठ के माध्यम से दाहिनी नासिका को बंध करके बाई नाक से श्वास धीरे-धीरे अंदर भरना चाहिए। श्वास पूरा अंदर भरने पर ,अनामिका व्
मध्यमा से वामश्वर को बन्ध करके दाहिनी नाक से पूरा श्वास बाहर छोड़ देना चाहिए। धीरे-धीरे श्वास-पश्वास की गति मध्यम और तीव्र करनी
चाहिए। तीव्र गति से पूरी शक्ति के साथ श्वास अन्दर भरें व् बाहर निकाले व् अपनी शक्ति के अनुसार श्वास-प्रश्वास के साथ गति मन्द,मध्यम और तीव्र करें। तीव्र गति से पूरक, रेचक करने से प्राण की तेज ध्वनि होती है। श्वास पूरा बाहर निकलने पर वाम स्वर को बंद रखते हुए दाए नाक से श्वास पूरा अन्दर भरना चाहिए तथा अंदर पूरा भर जाने पर दाए नाक को बन्द करके बाए नासिका से श्वास बाहर छोड़ने चाहिए। यह एक प्रकियापुरी हुई। इस प्रकार इस विधि को सतत करते रहना। थकान होने पर बीच में थोड़ा विश्राम करे फिर पुनः प्राणायाम करे। इस प्रकार तीन मिनिट से प्रारम्भ करके इस प्राणायाम को १० मिनिट तक किया जा सकता है।
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कपालभाति प्राणायाम(Kapalbhati)


कपाल अर्थात मश्तिष्क और भाति का अर्थ होता है दीप्ती,आभा,तेज,प्रकाश आदि। कपालभाति में मात्र रेचक अर्थात श्वास को शक्ति पूर्वक बाहर छोड़ने में ही पूरा ध्यान दिया जाता है। श्वास को भरने के लिए प्रयत्न नहीं करते;अपितु सहजरूप से जितना श्वास अन्दर चला जाता है,जाने देते है,पूरी एकाग्रता श्वास को बाहर छोड़ने में ही होती है ऐसा करते हुए स्वाभाविक रूप से पेट में भि अकुंशन व् प्रशारण की क्रिया होती है। इस प्राणायाम को ५ मिनिट तक अवश्य ही करना चाहिए।
कपालभाति प्राणायाम को करते समय मन में ऐसा विचार करना चाहिए की जैसे ही मैं श्वास को बाहर निकल रहा हूँ, इस पश्वास के साथ मेरे शरीर के समस्त रोग बाहर निकल रहे है।
तीन मिनिट से प्रारम्भ करके पांच मिनिट तक इस प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। प्रणायाम करते समय जब-जब थकान अनुभव हो तब-तब बीच में विश्राम कर ले। प्रारम्भ में पेट या कमर में दर्द हो सकता है। वो धीरे धीरे अपने आप मिट जायेगा।


आप घरेलु उपाय कर सकते है। १ चमच्च रीठा का पावडर १ ग्लास पानिमे भिगोकर रखे। उसमे त्रिकुटा और काली मिर्च डाल सकते है। सुबह उस जोल को छानकर सुबह नाक में डाल दे सारा कफ बाहर निकल जायेगा।
वायु के कारन सर दर्द होता है तो बादाम रोगन नाक में डाले और गाय का शुद्ध घी नाक में डाले इसे सिरदर्द में लाभ होगा।
नाभि का टलना दूर करता है सुप्तवज्रासन



सुप्त का अर्थ होता है सोया हुआ अर्थात वज्रासन की स्थिति में सोया हुआ। इस आसन में पीठ के बल लेटना पड़ता है, इसिलिए इस आसन को सुप्त-वज्रासन कहते है, जबकि वज्रासन बैठकर किया जाता है

विधिः 

१. वज्रासन में बैठकर हाथों को पाश्व भाग में रखकर उनकी सहायता से शरीर को पीछे झुकाते हुए भूमि पर सर को टिका दीजिये। घुटने मिले हुए हों तथा भूमि पर ठीके हुए हों।
२. धीरे-धीरे कंधो,ग्रीवा एवं पीठ को भूमि पर टिकाने का प्रयत्न कीजिये। हाथों को जंघाओं पर सीधा रखे।
३. आसन को छोड़ते समय कोहनियों एवं हाथों का सहारा लेते हुये वज्रासन में बैठ जाइए। 


लाभ:


१. इस आसन से पेट के निचे वाला भाग खींचता है जिससे बड़ी आंत सक्रीय होने से कोष्ठबद्धता मिटती है।


२. नाभि का टलना दूर करता है , गुर्दो के लिए भी लाभप्रद है।


3. यह आसन घुटने, वक्षस्थल और मेरुदंड के लिए लाभदायक है।


4. पेट की चर्बी भी घटती है।

सावधानी : जिनको पेट में वायु विकार, कमर दर्द की शिकायत हो उन्हें यह आसन नहीं करना चाहिए। इसे खाना खाने के तुरंत बाद न करें।
नितंब मिलने के बाद ही जमीन पर लेटे। लेटते समय जितनी आसानी से जा सकते है, उतना ही जाए। प्रारंभ में घुटने मिलाकर रखने में कठिनाई हो तो अलग-अलग रख सकते है, धीरे अभ्यास करने पर पैर को मिलाने का प्रयास करें। जमीन पर लेटते समय घुटने उपर नहीं उठने चाहिए, पूर्ण रूप से जमीन पर रखें। 

खांसी और जुकाम बस दस मिनट..........गायब


मौसम के परिवर्तन के कारण संक्रमण से कई बार वाइरल इंफेक्शन के कारण हमारे गले व फेफड़ों में जमने वाली एक श्लेष्मा होती है जो खांसी या खांसने के साथ बाहर आता है। यह फायदेमंद और नुकसानदायक दोनों है। इसे ही कफ कहा जाता है। अगर आप भी खांसी या जुकाम से परेशान है तो बिना दवाई लिए भी रोज सिर्फ दस मिनट इस मुद्रा के अभ्यास से कफ छुटकारा पा सकते हैं।






मुद्रा- बाएं हाथ का अंगूठा सीधा खडा कर दाहिने हाथ से बाएं हाथ कि अंगुलियों में परस्पर फँसाते हुए दोनों पंजों को ऐसे जोडें कि दाहिना अंगूठा बाएं अंगूठे को बहार से कवर कर ले,इस प्रकार जो मुद्रा बनेगी उसे अंगुष्ठ मुद्रा कहेंगे।

लाभ - अंगूठे में अग्नि तत्व होता है.इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर में गर्मी बढऩे लगती है. शरीर में जमा कफ तत्व सूखकर नष्ट हो जाता है।सर्दी जुकाम,खांसी इत्यादि रोगों में यह बड़ा लाभदायी होता है, कभी यदि शीत प्रकोप में आ जाए और शरीर में ठण्ड से कपकपाहट होने लगे तो इस मुद्रा का प्रयोग लाभदायक होता है। रोज दस मिनट इस मुद्रा को करने से बहुत कफ होने पर भी राहत मिलती है। कफ शीघ्र ही सुख जाता है। साथ ही जरा सा सेंधा नमक धीरे धीरे चूसने से लाभ होता है। सुबह कोमल सूर्यकिरणों में बैठके दायें नाक से श्वास लेकर सवा मिनट रोकें और बायें से छोड़ें। ऐसा 3-4 बार करें। इससे कफ की शिकायतें दूर होंगी।


सावधानी: इसका प्रयोग करने पर जल,फल ,फलों का रस, घी और दूध का सेवन अधिक मात्र में करें। इसे अधिक लम्बे समय तक न करें।



योग –एक वैज्ञानिक विवेचना 

भारतीय दर्शन में मानव जीवन का लक्ष्य , धर्म, अर्थ, काम ,मोक्ष-ये चार पुरुषार्थ हैं, जिनमें अन्तिम लक्ष्य मोक्ष को परम पुरुषार्थ माना गया है। वेदिक व उपनिषदीय ज्ञान के अनुसार अन्तिम लक्ष्य अमृत प्राप्ति या मोक्ष है, यही वास्तविक मोक्ष है । योग शास्त्र के अनुसार ’ आत्मा का परमात्मा से मिलन’ ही योग है । जबकि गीता के अनुसार-’ योगः कर्मसु कौसलम”, प्रत्येक कर्म को कुशलता से, श्रेष्ठतम रूप से करना ही योग है। यही तो विज्ञान की मूल मान्यता है, वर्क इज़ वर्शिप’ । 


यदि ध्यान से देखें तो सभी व्यख्याओं का एक ही अर्थ है-मानव अपने को इतना ऊपर उठाले कि वह प्रत्येक कार्य सर्वश्रेष्ठ ढंग से कर सके। वह सर्वश्रेष्ठ तरीका सर्वश्रेष्ठ परमात्मा जैसा होकर ही पाया जा सकता है। अर्थात आत्म( मानव ) स्वयम को परमात्मा जैसे गुणों में ढालने क प्रयत्न करे और उसमें लय हुए बिना सारे गुण कैसे आसकते हैं। यह आत्मा का परमात्मा में लय होना ही योग है। इसे विज्ञान किसी भी कार्य को पूर्ण रूप से रत होकर मनोयोग से करना कहता है। परम के अर्थ हैं –व्यापक व उत्कृष्ट , विज्ञानकी द्र्ष्टि में “अब्सोल्यूट”,अन्तिम सीमा, यथा एब्सोल्यूट ताप । व्यापक का अर्थ है समष्टि अर्थात प्राणि जगत, मानव समाज, यही परमात्मा का विराट रूप है इसे वेदान्त ’सर्व खल्विदं ब्रह्म’ कहता है।अतः व्यक्ति स्वयम को समाज़ के प्रति अर्पित करे, समष्टि के लिये व्यष्टि को उत्सर्ग करे। 


अपनी क्षमताएं लोक मन्गल के लिये प्रयोग करे। यही तो विज्ञान का भी उद्देश्य है । 


यही योग है । 


परम का अन्य अर्थ- उत्कृष्ट, अर्थात मनसा वाचा कर्मणा हम जो भी करें, श्रेष्ठ करें। प्रत्येक वस्तु का वही पक्ष अपनाने योग्य है जो सर्वश्रेष्ठ ह सदभावनाएं, सदविचार, सतप्रवृत्तियाँ ,आदर्श,मर्यादा, सत्सन्गति आदि अपनाने का यही भाव है। 


समाज में सदवृत्तियों का वर्धन व दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन ही परमात्मा की आराधना व उससे एकाकार होना है, यही तो विज्ञान का भी मूल उद्देश्य है। यही योग है। अतः चाहे परिवार हो या समाज़ या व्यक्तिगत स्तर श्रेष्ठता का सम्वर्धन व निकृष्टता का सन्वर्धन करना ही वास्तविक योग है । तभी गीता कहती है-’ योगः कर्मसु कौशलं” 


यह योग, परम पुरुषार्थ या मोक्ष जो मनव जीवन की अन्तिम सीढी है-धर्म, अर्थ व काम की सीढियों पर नितन्तर ऊपर उठ कर ही प्राप्त किया जासकता है,अर्थात प्रत्येक कार्य मेंश्रेष्ठता व समाज़ का व्यापक हित निहित होना चाहिये। यही योग है। 


योग वशिष्ठ के अनुसार, अपने वास्तविक रूप का अनुभव ही योग है। परमात्मा के उपरोक्त गुणों को अपने में सन्निहित करना ही स्वयम को जानना है, यही योग है। गीता में कथन है— 


“” योगस्थः कुरु कर्माणि संग्त्यक्त्वा धनंजय समोभूत्वा । 


सिद्धि सिद्दयोःसमो भूत्वा समत्वं योगं उच्यते ॥“ 


-हे अर्जुन! आसक्ति छोडकर सम भाव से कर्म करते जाना, यह समत्व भाव ही योग है। यही सम भाव ,समष्टि भाव परमात्मा का भी गुण है, परम व श्रेष्ठ, वैज्ञानिकों व मनीषियों के भी यही गुण होते हैं। 


यह समभाव,समष्टि भाव, परमात्वभाव रूपी योग कैसे प्राप्त किया जाय। मुन्डकोपनिषद में शिष्य पूछता है- कश्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्व इदं विज्ञातं भवति ।“ 


आचार्य का उत्तर है, “ प्राण वै “ । वह क्या है जिसको जानने से सब कुछ ज्ञात हो जाता है, जो ईश्वर प्राप्ति मे सहायक है। उत्तर है प्राण- अर्थात स्वयम को समझने पर समस्त मानसिक शारीरिक क्षमताओं को समझा जा सकता है। प्राणायाम का यही तो सिद्धान्त है। और शरीर-विज्ञान का भी। पतन्जलि योग शास्त्र कहता है-“योगश्चित्तव्रत्तिनिरोध:” चित्त की वृत्तियों को, मन की चंचलता को रोक कर ,मन पर अधिकार करके , स्वयम को समझ कर ही ईश्वर( व संसार दोनों) को प्राप्त किया जासकता है। आसन,उपासना,ध्यान,धारणा,व्रत,संयम ,जप,तप,चिन्तन,प्रत्याहार, आदर्श्वादी व्यवहार,उत्तम जीवनचर्या, आदि योग के विभिन्न क्रियात्मक पक्ष हैं जो सद वृत्तियों के सम्वर्धन में सहायक होते हैं। हठयोग, ध्यान्योग,जप, कुन्डलिनी जागरण, लय, नाद, भक्तियोग,इसी योग की प्राप्ति के विभिन्न साधन हैं,जिसे विभिन्न धर्म,विचारधाराएं विभिन्न रूप से कहतीं है। विज्ञान के रूप- मनोविग्यान, -, साइको-थेरेपी, मनो- चिकित्सा, फ़िज़ियोथीरेपी ,सजेशन-थीरेपी, आदि सभी इसी के रूप हैं—- 


“”एको सद विप्र वहुधा वदन्ति””॥ 

प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली खुराक चिकित्सा




इस थेरेपी के अनुसार, भोजन प्राकृतिक रूप में लिया जाना चाहिए। ताज़े मौसमी फल, ताज़ी हरी पत्तेदार सब्जियां और अंकुरित भोजन बहुत ही लाभकारी हैं। ये आहार मोटे तौर पर तीन प्रकार में विभाजित हैं जो इस प्रकार हैं: 
एलिमिनेटिव (निष्कासन हेतु) आहार: तरल-नींबू, साइट्रिक रस, नर्म नारियल का पानी, वनस्पति सूप, छाछ, गेहूं की घास का रस आदि। 
सुखदायक आहार: फल, सलाद, उबली हुई/ वाष्पीकृत सब्जियां, अंकुर, सब्ज़ी की चटनी आदि 
रचनात्मक आहार: पौष्टिक आटा, अप्रसंस्कृत चावल, थोड़ी सी दालें, अंकुर, दही आदि 
क्षारीय होने के नाते, ये आहार स्वास्थ्य में सुधार करने में, शरीर की सफ़ाई और बीमारी के लिए प्रतिरक्षा के प्रतिपादन में मदद करते हैं। इस लिहाज़ से भोजन का उचित संयोजन आवश्यक है। स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए हमारा भोजन 20% अम्लीय और 80% क्षारीय होना चाहिए। अच्छा स्वास्थ्य चाहने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए संतुलित भोजन नितान आवश्यक है। प्राकृतिक चिकित्सा में भोजन को दवा के रूप में माना जाता है. 

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