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विभिन्न आसन प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली की विशेषताएं

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प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली की विशेषताएं



प्राकृतिक चिकित्सा की मुख्य विशेषताएं हैं 
सभी रोगों, उनके कारण और उपचार एक हैं। दर्दनाक और पर्यावरणीय स्थिति को छोड़कर, सभी रोगों का कारण एक है यानी शरीर में रुग्णता कारक पदार्थ का संचय होना। सभी रोगों का उपचार शरीर से रुग्णता कारक पदार्थ का उन्मूलन है। 
रोग का प्राथमिक कारण रुग्णता कारक पदार्थ का संचय है। बैक्टीरिया और वायरस शरीर में प्रवेश कर तभी जीवित रहते हैं जब रुग्णता कारक पदार्थ का संचय हो और उनके विकास के लिए एक अनुकूल वातावरण शरीर में स्थापित हुआ हो। अतः रोग का मूल कारण रुग्णता कारक पदार्थ है और बैक्टीरिया द्वितीयक कारण बनते हैं। 
गंभीर बीमारियां शरीर द्वारा आत्म चिकित्सा का प्रयास होती हैं। अतः वे हमारी मित्र हैं, शत्रु नहीं। पुराने रोग, गंभीर बीमारियों के गलत उपचार और दमन का परिणाम हैं। 
प्रकृति सबसे बड़ा मरहम लगाने वाली है। मानव शरीर में स्वयं ही रोगों से खुद को बचाने की शक्ति है तथा अस्वस्थ होने पर स्वास्थ्य पुनः प्राप्त कर लेती है। 
प्राकृतिक चिकित्सा में केवल रोग ही नहीं बल्कि रोगी के पूरे शरीर पर असर होकर वह नवीकृत होता है। 
प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा पुरानी बीमारियों से पीड़ित मरीजों को भी अपेक्षाकृत कम समय में सफलतापूर्वक उपचारित किया जाता है। 
प्रकृति के उपचार में दबे हुए रोगों को सतह पर लाया जाता है और स्थायी रूप से हटा दिया जाता है। 
प्राकृतिक चिकित्सा एक ही समय में सभी तरह के पहलुओं जैसे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक, का उपचार करती है। 
प्राकृतिक चिकित्सा शरीर का सम्पूर्ण रूप से उपचार करती है। 
प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार, "केवल भोजन ही चिकित्सा है”, कोई बाहरी दवाओं का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। 
स्वयं के आध्यात्मिक विश्वास के अनुसार प्रार्थना करना उपचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। 

प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली क्या है ?
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प्राकृतिक−चिकित्सा−प्रणाली का अर्थ है प्राकृतिक पदार्थों विशेषतः प्रकृति के पाँच मूल तत्वों द्वारा स्वास्थ्य−रक्षा और रोग निवारण का उपाय करना। विचारपूर्वक देखा जाय तो यह कोई गुह्य विषय नहीं है और जब तक मनुष्य स्वाभाविक और सीधा−सादा जीवन व्यतीत करता रहता है तब तक वह बिना अधिक सोचे−विचारे भी प्रकृति की इन शक्तियों का प्रयोग करके लाभान्वित होता रहता है। पर जब मनुष्य स्वाभाविकता को त्याग कर कृत्रिमता की ओर बढ़ता है, अपने रहन−सहन तथा खान−पान को अधिक आकर्षक और दिखावटी बनाने के लिये प्रकृति के सरल मार्ग से हटता जाता है तो उसकी स्वास्थ्य−सम्बन्धी उलझनें बढ़ने लगती हैं और समय−समय पर उसके शरीर में कष्टदायक प्रक्रियाएँ होने लगती हैं, जिनको ‘रोग’ कहा जाता है। इन रोगों को दूर करने के लिये अनेक प्रकार की चिकित्सा−प्रणालियाँ आजकल प्रचलित हो गई हैं जिनमें हजारों तरह की औषधियों, विशेषतः तीव्र विषात्मक द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है। इन तीव्र दवाओं से जहाँ कुछ रोग अच्छे होते हैं वहाँ उन्हीं की प्रतिक्रिया से कुछ अन्य व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और संसार में रोगों के घटने के बजाय नित्य नवीन रोगों की वृद्धि होती जाती है। इस अवस्था को देख कर पिछले सौ−डेढ़−सौ वर्षों के भीतर योरोप अमरीका के अनेक विचारशील सज्जनों का ध्यान प्राकृतिक तत्वों की उपयोगिता की तरफ गया और उन्होंने मिट्टी, जल, वायु, सूर्य−प्रकाश आदि के विधिवत् प्रयोग द्वारा शारीरिक कष्टों, रोगों को दूर करने की एक प्रणाली का प्रचार किया। वही इस समय प्राकृतिक चिकित्सा या ‘नेचर क्योर’ के नाम से प्रसिद्ध है।


पर यह समझना कि प्राकृतिक−चिकित्सा प्रणाली का आविष्कार इन्हीं सौ−दो−सौ वर्षों के भीतर हुआ है, ठीक न होगा। हमारे देश में अति प्राचीन काल से प्राकृतिक पंच−तत्वों की चमत्कारी शक्तियों का ज्ञान था और उनका विधिवत् प्रयोग भी किया जाता था। और तो क्या हमारे वेदों में भी, जिनको अति प्राचीनता के कारण अनादि माना जाता है और जिनका उद्भव वास्तव में वर्तमान मानव सभ्यता के आदि काल में हुआ था प्राकृतिक चिकित्सा के मुख्य−सिद्धान्तों का उल्लेख है। ऋग्वेद का एक मंत्र देखिये—


आपः इद्वा उ भेषजीरापो अमीवचातनीः।आपः सर्वस्य भेषजीस्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्॥ (10−137−6)


“जल औषधि रूप है, यह सभी रोगों को दूर करने वाली महान औषधि के तुल्य गुणकारी है। यह जल तुमको औषधियों के समस्त गुण (लाभ) प्राप्त करावे।”


इस तरह के वचन ऋग्वेद और अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर मिलते हैं। साथ ही सूर्य−प्रकाश तथा वायु के आरोग्यप्रदायक गुणों का भी उल्लेख मिलता है। तामिल भाषा में वेदों के समान ही पूजनीय माना जाने वाले ‘कुरल’ नामक ग्रन्थ में प्राकृतिक चिकित्सा की विधियों की बड़े उत्तम ढंग से शिक्षा दी गई हैं। यह ग्रन्थ दो हजार वर्ष से अधिक पुराना है। इसी प्रकार योरोप के सर्वप्रथम चिकित्साशास्त्री माने जाने वाले ‘हिप्पोक्रेट्स’ ने मनुष्यों को स्वास्थ्य विषयक उपदेश देते हुये स्पष्ट लिखा है “तेरा आहार ही तेरी औषधि हो और तेरी औषधि तेरा आहार हो।” आजकल भी प्राकृतिक चिकित्सकों का एक बहुत बड़ा सिद्धांत यही है कि आहार ही ऐसा दिया जाय जो औषधि का काम दे और जिससे शरीर के विकार स्वयं दूर हो जायें। हिप्पोक्रेट्स का सिद्धान्त पूर्णतया भारतीय विद्वानों के मत से मिलता हुआ है, और उसे भारतवर्ष की विद्याओं का ज्ञान हो तो कोई आश्चर्य भी नहीं। क्योंकि उस ढाई हजार पुराने युग में भारत की सभ्यता और संस्कृति का संसार के सभी भागों में प्रचार हो चुका था।


इस प्रकार जब तक मनुष्य प्रकृति की गोद में पलते−खेलते थे, उनका रहन−सहन भी प्राकृतिक नियमों के अनुकूल था तो वे अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति प्राकृतिक ढंग से ही करते थे। पर मध्यकाल में जब बड़े−बड़े राज्यों और साम्राज्यों की स्थापना हो गई तो बड़े आदमियों के रहन−सहन में भोग विलास की अधिकता होने लगी और उसकी पूर्ति के लिये भाँति−भाँति के कृत्रिम उपायों का प्रयोग भी बढ़ने लगा। साधारण लोग भी उनकी नकल करके नकली चीजों को अधिक सुन्दर और आकर्षक समझने लगे, जिसके फल से लोगों का स्वास्थ्य निर्बल पड़ने लगा, तभी तरह−तरह के रोगों की वृद्धि होने लगी। जब काल क्रम से यह अवस्था बहुत बिगड़ गई और संसार की जनसंख्या तरह−तरह के भयानक तथा गन्दे रोगों के पंजे में फँस गई तो विचारशील लोगों का ध्यान इसके मूल कारण की तरफ गया और उन्होंने कृत्रिम आहार−बिहार की हानियों को समझ कर “प्रकृति की ओर लौटो” (बैक टू नेचर) का नारा लगाया।


यदि हम भारतीय धर्म और संस्कृति की दृष्टि से इस चिकित्सा−प्रणाली की व्याख्या करें तो हम कह सकते हैं कि मनुष्य के स्वास्थ्य और रोगों के भीतर भगवान की दैवी शक्ति ही काम कर रही है। व्यवहारिक क्षेत्र में यह रोगों और व्याधियों के निवारण के लिये केवल उन्हीं आहारों तथा पञ्च तत्वों का औषधि रूप में प्रयोग करना बतलाती है जो सर्वथा प्रकृति के अनुकूल हैं। इस प्रकार इस चिकित्सा के छह विभाग हो जाते हैं−मानसिक चिकित्सा, उपवास, सूर्य−प्रकाश−चिकित्सा, वायु चिकित्सा, जल चिकित्सा, आहार अथवा मिट्टी चिकित्सा।


आजकल जिस डाक्टरी चिकित्सा−पद्धति का विशेष प्रचलन है उसका उद्देश्य किसी भी उपाय से रोग में तत्काल लाभ दिखला देना होता है, फिर चाहे वह लाभ क्षण स्थायी−धोखे की टट्टी ही क्यों न हो। हम देखते हैं कि अस्पतालों में एक−एक रोगी को महीनों तक प्रतिदिन तीव्र इंजेक्शन लगते रहते हैं, पर एक शिकायत ठीक होती है तो दूसरी उत्पन्न हो जाती है। पर पीड़ा के कुछ अंशों में मिटते रहने के कारण लोग इस बाह्य चिह्नों की चिकित्सा के फेर में पड़े रहते हैं। इसके विपरीत प्राकृतिक चिकित्सा में रोगों के विभिन्न नामों तथा रूपों की चिन्ता न करके उनके मूल कारण पर ही ध्यान दिया जाता है और उसी को निर्मूल करने का प्रयत्न किया जाता है। इतना ही नहीं इस चिकित्सा का वास्तविक लक्ष्य केवल शारीरिक ही नहीं वरन् मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य प्राप्त कराना भी माना गया है, क्योंकि मानसिक तथा आध्यात्मिक सुधार के बिना शारीरिक स्वास्थ्य स्थायी नहीं हो सकता। इसलिये भारतीय चिकित्सा प्रणाली में जहाँ शुद्ध आहार−बिहार का विधान है वहाँ उच्च और पवित्र जीवन व्यतीत करने पर भी जोर दिया गया है। प्राकृतिक चिकित्सा के तत्व का यथार्थ रूप में हृदयंगम करने वाला व्यक्ति गीता के “कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” वाले वाक्य पर पूर्ण श्रद्धा रखकर ‘सत्य−आचरण’ को ध्यान रखता है और फल को भगवान के ऊपर छोड़ देता है। सत्य−आचरण वाला व्यक्ति प्रथम तो रोगी ही नहीं होगा और यदि किसी गलती या दुर्घटना से हो भी गया तो उसी आचरण के प्रभाव से रोग का निवारण शीघ्र ही हो जायेगा। रोग की अवस्था में यह ‘सत्य−आचरण’ उपवास शुद्ध वायु, प्रकाश, जल स्नान तथा औषधि रूप आहार का प्रयोग करना ही हो सकता है, इन साधनों से हम सब प्रकार के रोगों की सफलतापूर्वक चिकित्सा करने में सक्षम हो सकते हैं।


आगे चलकर जब रोगों के कारण और स्वरूप पर विचार करते हैं तो मालूम होता है कि रोग जीवित शरीर में ही उत्पन्न हो सकता है। जीवित शरीर एक मशीन या यंत्र की तरह है जिसका संचालन एक सूक्ष्मशक्ति (प्राण) द्वारा होता है। यही शक्ति भौतिक पदार्थों का सार ग्रहण करके उससे शरीर का निर्माण कार्य करती रहती है और दूसरी ओर इसी के द्वारा सब प्रकार के आहार से बचे हुये निस्सार मल रूप अंश का निष्कासन किया जाता है। ये दोनों क्रियाऐं एक दूसरे से सम्बन्धित हैं और इन दोनों के बिना ठीक तरह सञ्चालित हुये न तो जीवन और न स्वास्थ्य स्थिर रह सकता है। पर हम देखते हैं कि अधिकाँश लोग ग्रहण करने की—भोजन की क्रिया के महत्व को तो कुछ अंशों में समझते हैं और अपनी बुद्धि तथा सामर्थ्य के अनुसार पौष्टिक, शक्ति प्रदायक, ताजा, रुचिकारक भोजन की व्यवस्था करते हैं, पर निष्कासन की क्रिया के महत्व को समझने वाले और उस पर ध्यान देने वाले व्यक्तियों की संख्या अत्यन्त न्यून है। लोग समझते हैं कि उत्तम भोजन को पेट में डाल लिया जायेगा तो वह लाभ ही करेगा। पर यह भोजन यदि नियमानुसार परिमित मात्रा में पथ्य−अपथ्य का ध्यान रख कर न किया जायेगा तो निष्कासन की क्रिया का बिगड़ जाना अवश्यम्भावी है। उसके परिणामस्वरूप शरीर के भीतर मल और विकार जमा होने लगते हैं और स्वास्थ्य का संतुलन नष्ट हो जाता है।


यह विकार या विजातीय द्रव्य शरीर के स्वाभाविक तत्वों के साथ मिल नहीं पाता और एक प्रकार का संघर्ष अथवा अशान्ति उत्पन्न कर देता है। हमारी जीवनी−शक्ति यह कदापि पसन्द नहीं करती कि उस पर विजातीय द्रव्य का भार लादकर उसके स्वाभाविक देह−रक्षा के कामों में बाधा उपस्थित की जाय। वह हर उपाय से उसे शीघ्र से शीघ्र बाहर निकालने का प्रयत्न करती है। यदि वह उसे पूर्ण रूप से निकाल नहीं पाती तो ऐसे अंगों में डाल देने का प्रयत्न करती है जो सबसे कम उपयोग में आते हैं और जहाँ वह कम हानि पहुँचा कर पड़ा रह सकता है। इस प्रकार जब तक जीवनी−शक्ति विजातीय द्रव्य के कुप्रभाव को मिटाती रहती है तब तक हमें किसी रोग के दर्शन नहीं होते। पर जब हम बराबर गलत मार्ग पर चलते रहते हैं और विजातीय द्रव्य का परिमाण बढ़ता ही जाता है, तो लाचार होकर जीवनी शक्ति को उसे स्वाभाविक मार्गों के बजाय अन्य मार्गों से निकालना पड़ता है। चूँकि यह कार्य नवीन होता है, हमारे नियमित अभ्यास और आदतों के विरुद्ध होता है, इस लिये उससे हमको असुविधा, कष्ट, पीड़ा का अनुभव होता है और हम उसे ‘रोग’ या बीमारी का नाम देते हैं। पर वास्तविक रोग तो वह विजातीय द्रव्य या विकार होता है जिसे हम अनुचित आहार−विहार द्वारा शरीर के भीतर जमा कर देते हैं। ये कष्ट और पीड़ा के ऊपरी चिह्न तो हमारी शारीरिक प्रकृति अथवा जीवनीशक्ति द्वारा उस रोग को मिटाने का उपाय होते हैं। अगर हम इस तथ्य को समझ कर तथा कष्ट और पीड़ा को प्रकृति की चेतावनी के रूप में ग्रहण करके सावधान हो जायें तो रोग हमारा कुछ भी अनिष्ट नहीं कर सकता। उस समय हमारा कर्तव्य यही होना चाहिये कि हम प्रकृति के काम में किसी तरह का विघ्न बाधा न डालें वरन् अपने गलत रहन−सहन को बदलकर प्राकृतिक−जीवन के नियमों का पालन करने लगें। इससे विजातीय द्रव्य के बाहर निकालने के कार्य में सुविधा होगी और हम बिना किसी खतरे के अपेक्षाकृत थोड़े समय में रोग−मुक्त हो जायेंगे। संक्षेप में यही प्राकृतिक चिकित्सा का मूल रूप है, जिसको उपवास, मिट्टी और जल के प्रयोग, धूप−स्नान आदि कितने ही विभागों में बाँट कर सर्वसाधारण को बोधगम्य बनाने का प्रयत्न किया गया है।
योग करते समय रहें सावधान... और बनें स्वास्थ्य



कहते हैं जहां भोग है वहां रोग है. जहां योग है वहां निरोग, लेकिन गलत योग रोगी बना सकता है. यानी योग करते समय सावधान रहें.


एक्सरसाइज करना अच्छी बात है. यह शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखती है. लेकिन अधकचरा ज्ञान कभी-कभी आपको बड़ी मुश्किल में डाल सकता है. 


इसलिए एक्सरसाइज करने से पहले कुछ बातें जरूर ध्यान कर लें. फिट रहने के कुछ खास मंत्र होते हैं जिन्हें आप अपनी दिनचर्या में यदि शामिल कर लें तो आप फिटनेस की ओर निरंतर बढ़ते चले जायेंगे.


प्रशिक्षक से सलाह ले


विशेषज्ञों के अनुसार एक्सरसाइज करने से पूर्व किसी प्रशिक्षक से सलाह ले लेनी चाहिए. यह सलाह आपको देखकर दी जायेगी कि आपकी उम्र क्या है. किस व्यवसाय से जुडे़ हैं और ऐसी तमाम बातें जो एक्सरसाइज करने से पहले ध्यान में लानी जरूरी होती हैं. 


एक्सरसाइज में पानी पर्याप्त मात्रा में पिएं. कम पानी से कई तरह के नुकसान हैं. इसलिए समय-समय पर पानी पीते रहें ताकि शरीर की पानी की जरूरत पूरी हो सके.


दौड़ना-टहलना जरूरी


सुबह दौड़ना या टहलना मुख्य होता है. यदि आपने सुबह दौड़ने और घूमने का मन बनाया हो तो हमेशा ऐसे जूते पहनकर वाक पर निकलें जो आपको तकलीफ न दें. यही नहीं कपड़े भी इस तरह के होने चाहिए कि वे शरीर को आरामदायक लगें. 


आप अपने खान-पान पर भी नजर रखें यानी किस मौसम में क्या खाना चाहिए. एक निश्चित डाइट बना लें. इस बात का जरूर ध्यान रखा जाना चाहिए. डाइट भी अच्छी होनी चाहिए. यदि कोई रोग हो तो डाइट चार्ट किसी विशेषज्ञ से बनवाना चाहिए. 
हाई बीपी के मरीजों के लिए शवासन उपयोगी



शवासन में सांस पर नियंत्रण रखकर शरीर को निर्जीव अवस्था में छोड़ा जाता है। इस अभ्यास में हम इंद्रियों व मन को बाहर के विषयों से हटाते हैं और शरीर व मन को ऊर्जा से भर देते हैं। इस आसन का अभ्यास कोई भी व्यक्ति कर सकता है। हाई ब्लड प्रेशर के रोगी लगातार इस आसन को करें तो बीपी कंट्रोल किया जा सकता है। 


फायदे 
इस अभ्यास को करने से मानसिक तनाव, थकान दूर होकर नई ऊर्जा का संचार होता है। इससे सिरदर्द, अनिद्रा और अवसाद की समस्या नहीं रहती।


ध्यान रहे 
अगर आपके कमर में दर्द रहता है तो इस आसन को करते समय घुटने के नीचे कंबल या तकिया लगा लें।


ऎसे करें अभ्यास
पीठ के बल जमीन पर लेट जाएं। सांस छोड़ते हुए दोनों पैरों को अपनी ओर हल्का-सा घुमाएं। दोनों हाथों को शरीर से थोड़ी दूरी पर फैलाएं व हथेलियों को ऊपर की ओर रखें। आंखे बंद करके शरीर को ढीला छोड़ दें। खाने के 4 घंटे बाद दिन में दो बार 10-10 मिनट तक करें, सोने से पहले करने पर नींद अच्छी आती है। 
योगा करें और पायें निरोग आंखें
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आखों के योग अपनाकर आजीवन अपनी दृष्टि को मजबूत बना सकते हैं। निश्चित अंतराल के बाद आखों की रोशनी अपने-आप कम हो जाती है। आखों के आसपास की मांसपेशियां अपने लचीलेपन को समाप्त कर देती हैं और कठोर हो जाती हैं। लेकिन अगर आखों के आस-पास की मासपेशिया मजबूत हों तो आखों की रोशनी बढ़ती है। आखों और दिमाग के बीच एक गहरा संबंध होता है। दिमाग की 40 प्रतिशत क्षमता आखों की रोशनी पर निर्भर होती है। जब हम अपनी आखों को बंद करते हैं तो दिमाग को अपने-आप आराम मिलता है। दुनिया की कुल आबादी की 35 प्रतिशत जनसंख्या निकट दृष्टि दोष और दूरदृष्टि दोष (हाइपरमेट्रोपिया) से ग्रस्त है जिसकी वजह से लोग मोटे-मोटे चश्मों का प्रयोग करते हैं। लेकिन चश्मे का प्रयोग करके आखों की रोशनी को बढाया नहीं जा सकता है। योगा करके आखों की रोशनी को कायम रखा जा सकता है।


काम के दौरान कुछ बातों का ख्याल रखें:

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-गर्दन को सीधा रखकर आखों की पुतलियों को पहले 4-6 बार ऊपर नीचे और फिर दाएं-बाएं घुमाएं। उसके पश्चात 4-6 बार दाएं-बाएं गोलाई में क्लॉकवाइज और एंटी-क्लॉकवाइज घुमाइए।


-आखों को घुमाते वक्त हथेलियों के मध्य भाग से आखों को कुछ देर तक ढंककर रखें, इससे आखों की मासपेशिया मजबूत बनी रहेंगी।


-कंप्यूटर पर काम करते वक्त हर 10 मिनट बाद कम से कम 20 फुट दूर जरूर देखें, इससे दूर दृष्टि बनी रहेगी।


आखों के लिए कुछ योगा
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सर्वागासन:


-इस क्त्रिया को करने के लिए सबसे पहले शवासन में लेट जाइए, दोनों हाथों को जाघों की बगल में तथा हथेलियों को जमीन पर रखें। पैरों को घुटनों से मोडकर ऊपर उठाइए तथा पीठ को कंधों तक उठाइए। दोनों हाथ कमर के नीचे रखकर शरीर के उठे हुए भाग को सहारा दीजिए इस तरह ठुड्डी को छाती से लगाए रखें। अब सास को रोके नहीं। अब पैरों को घुटनों से मोड़ते हुए वापस माथे के पास ले आइए। अब हाथों को जमीन पर रखते हुए शरीर और पैरों को धीरे-धीरे शवासन में लाइए। आसन करते समय आखों को खुला रखें। इस आसन को करने से आखों की रोशनी तेजी से बढती है। क्त्रोध और चिड़चिड़ापन भी समाप्त होता है। बच्चों के दिमाग के लिए यह आसन बहुत उपयोगी है।


शवासन:


इस आसन को करने के लिए सहज और शात मन से पीठ के बल लेट जाइए। पैरों को ढीला छोड़कर भुजाओं को शरीर से सटाकर बगल में रख लीजिए। शरीर को पूरी तरह से फर्श पर स्थिर हो जाने दीजिए। इस आसन को करने से शरीर की थकान और दबाव कम हो जाएगी। सास और नाड़ी की गति सामान्य हो जाएगी। आखों को आराम मिलता है और रोशनी बढ़ती है।


प्राणायाम:

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प्राणायाम पद्मासन और सिद्धासन की मुद्रा में बैठकर किया जाता है। प्राणायम शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की साधनाओं में किया जा सकता है। प्राणायाम करने से दिमाग स्थिर रहता है और आखों की रोशनी बनी रहती है। प्राणायाम से शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं।


कई लोग जो कंप्यूटर पर लगातार 8-10 घटे काम करते वक्त आखें गड़ाए रहते हैं उनकी आखों पर नुकसान पहुंचता है। आखों को आराम देने के लिए केवल नींद लेना ही पर्याप्त नहीं होता है। आखों में कमजोरी आने की वजह से स्मृति दोष और चिड़चिड़ापन की समस्या आम हो जाती है जिसके लिए आखों का योगा बहुत जरूरी है।
रोजाना योगा करने के 14 फायदे
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योगा एक ऐसी वैज्ञानिक प्रमाणिक व्यायाम पद्धति है।जिसके लिए न तो ज्यादा साधनों की जरुरत होती हैं और न ही अधिक खर्च करना पड़ता है। इसलिए पिछले कुछ सालों से योगा की लोकप्रियता और इसके नियमित अभ्यास करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि योगा करने के क्या लाभ है....

1. योगासन अमीर-गरीब, बूढ़े-जवान, सबल-निर्बल सभी स्त्री-पुरुष कर सकते हैं।


2. आसनों में जहां मांसपेशियों को तानने, सिकोडऩे और ऐंठने वाली क्रियाएं करनी पड़ती हैं, वहीं दूसरी ओर साथ-साथ तनाव-खिंचाव दूर करनेवाली क्रियाएं भी होती रहती हैं, जिससे शरीर की थकान मिट जाती है और आसनों से व्यय शक्ति वापस मिल जाती है। शरीर और मन को तरोताजा करने, उनकी खोई हुई शक्ति की पूर्ति कर देने और आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से भी योगासनों का अपना अलग महत्व है।


3. योगासनों से भीतरी ग्रंथियां अपना काम अच्छी तरह कर सकती हैं और युवावस्था बनाए रखने एवं वीर्य रक्षा में सहायक होती है।


4. योगासनों द्वारा पेट की भली-भांति सुचारु रूप से सफाई होती है और पाचन अंग पुष्ट होते हैं। पाचन-संस्थान में गड़बडिय़ां उत्पन्न नहीं होतीं।


5. योगासन मेरुदण्ड-रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाते हैं और व्यय हुई नाड़ी शक्ति की पूर्ति करते हैं।


6. योगासन पेशियों को शक्ति प्रदान करते हैं। इससे मोटापा घटता है और दुर्बल-पतला व्यक्ति तंदरुस्त होता है।


7. योगासन स्त्रियों की शरीर रचना के लिए विशेष अनुकूल हैं। वे उनमें सुन्दरता, सम्यक-विकास, सुघड़ता और गति, सौन्दर्य आदि के गुण उत्पन्न करते हैं।


8. योगासनों से बुद्धि की वृद्धि होती है और धारणा शक्ति को नई स्फूर्ति एवं ताजगी मिलती है। ऊपर उठने वाली प्रवृत्तियां जागृत होती हैं और आत्म-सुधार के प्रयत्न बढ़ जाते हैं।
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9. योगासन स्त्रियों और पुरुषों को संयमी एवं आहार-विहार में मध्यम मार्ग का अनुकरण करने वाला बनाते हैं, मन और शरीर को स्थाई तथा सम्पूर्ण स्वास्थ्य, मिलता है।

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10. योगासन श्वास- क्रिया का नियमन करते हैं, दिल और फेफड़ों को बल देते हैं, रक्त को शुद्ध करते हैं और मन में स्थिरता पैदा कर संकल्प शक्ति को बढ़ाते हैं।

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11. योगासन शारीरिक स्वास्थ्य के लिए वरदान स्वरूप हैं क्योंकि इनमें शरीर के समस्त भागों पर प्रभाव पड़ता है, और वह अपने कार्य सुचारु रूप से करते हैं।


12. आसन रोग विकारों को नष्ट करते हैं, रोगों से रक्षा करते हैं, शरीर को निरोग, स्वस्थ और बलिष्ठ बनाए रखते हैं।


13. आसनों से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। आसनों का निरन्तर अभ्यास करने वाले को चश्में की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।


14. योगासन से शरीर के प्रत्येक अंग का व्यायाम होता है, जिससे शरीर पुष्ट, स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनता है

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