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एलर्जी के लक्षण


एलर्जी के लक्षण





बच्चों में एलर्जी होने की संभावना बड़ो से कहीं ज्यादा होती है, क्योंकि बच्चे बड़ो की तरह सतर्क व साफ सफाई नहीं रख पाते हैं। एलर्जी के लक्षण अक्सर यह दिखाते हैं कि बच्चों में कोई एलर्जी होने वाली है। एलर्जी से पहले बच्चों में थकान या अन्य लक्षण दिखाई देने लगते हैं। 
एलर्जी व बीमारी

एलर्जी का सबसे सामान्य व खतरनाक लक्षण है आंखों का लाल व उसमें खुजली होना, आंखों के नीचे काला होना, नाक का भरा होना व बहना और सामान्य थकान। यही लक्षण बच्चों के बीमार होने से पहले दिखाई देते हैं। इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई देने पर या कुछ घंटे में इन लक्षणों के बढऩे पर बच्चों को तुरंत चिकित्सक को दिखाना चाहिए। इन्हीं लक्षणों से बच्चों में गंभीर समस्या पैदा हो सकती है। 
कैसे होती है एलर्जी

फूलों को सूंघने, पालतू जानवरों के साथ खेलने खासकर फर वाले ( कुत्ता, बिल्ली, खरगोश) धूल मिट्टी के कण से बैक्टेरिया बच्चों के शरीर में पहुंच जाते हैं और एलर्जी पैदा करते हैं। बच्चों में एलर्जी के ये बहुत ही सामान्य कारण हैं। बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता युवाओं से कमज़ोर होती है इसलिए उन पर यह बैक्टेरिया आसानी से हमला करके उनके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। कभी कभी बच्चों में एलर्जी के कारणों को जानना मुश्किल हो जाता है क्योंकि आप नहीं जान पाते हैं कि बच्चों में आसपास के किस चीज से एलर्जी हुई है। नीचे दिए गए एलर्जी के लक्षण सभी बच्चों में सामान्य होते हैं। अगर आपके बच्चे में इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे, तो आपको तुरंत उसकी पहचान कर बच्चों को उससे बचाने की कोशिश करनी चाहिए। आईए जाने उन लक्षणों के बारे में। 
नाक में खुजली होना

अगर बच्चों में सर्दी जुकाम की समस्या होती है तो नाक भरा होना व नाक का बहना आम बात है, लेकिन सामान्यत: इसके साथ नाक में खुजली की समस्या नहीं होती है। अगर आपका बच्चा बार-बार अपनी नाक को रगड़े तो हो सकता है कि उसके नाक में किसी तरह की एलर्जी है जिसकी वजह से उसकी नाक भरी व बह रही है। यह समस्या ज्यादातर धूल मिट्टी के कण से होती है। 
त्वचा संबंधी समस्या
त्वचा संबंधी समस्या भी एलर्जी का एक लक्षण हो सकता है। बच्चों में जहां की त्वचा जैसे कोहनी व घुटने मुड़े हुए होते हैं है वहां की त्वचा पर लाल चकत्ते दिखाई देते हैं। ऐसे ही चकत्ते आंखों के आसपास भी दिखाई देने लगते हैं। यह समस्या तब होती है जब बच्चे किसी चीज को छू देते हैं जिससे उन्हें एलर्जी हो जाती है। 
क्रोनिक कफ
जब बच्चों में पहली बार कफ के लक्षण दिखाई देते हैं तो आप मान लेते हैं कि यह एक वायरस है। अगर बच्चे में लगातार कफ बना हुआ है या वह ठीक हो कर बार बार वापस आ जाता है , तो यह एक एलर्जी है। एलर्जी में होने वाला कफ सामान्यत: सूखा होता है। 

कॉस्मेटिक सर्जरी द्वारा खूबसूरती




कॉस्मेटिक सर्जरी द्वारा खूबसूरती सुंदर चेहरा व आकर्षक व्यक्तित्व हर किसी की चाहत होती है, जिन्हें नैसर्गिक सौन्दर्य का अनुपम उपहार प्राप्त नहीं होता है वे हीनभावना से कुठित रहते हैं। कॉस्मेटिक सर्जरी से मानव शरीर के अंग प्रत्यंग को सुडौल बनाया जा सकता है।
राइनोप्लास्टी

नाक का ऑपरेशन चेहरे को आकर्षित बनाने के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। बेडोल नाक को बिना कोई बाहरी निशान छोड़े सुडौल बनाया जा सकता है। इसमें नाक की हड्डी को चटकाकार पास में लाते हैं ताकि ऊपर का चौड़ापन कम हो सके तथा नीचे की हड्डी (कार्टिलेज) को तराशते हैं। जिससे नाक सुन्दर दिखे और जौड़े नथुनों को भी तराशकर सही आकार दिया जा सकता है। इसके जरिए नाक के टेढ़ेपन को दूर किया जा सकता है तथा बैठी हुई नाक को उठा सकते है।
लाइपोसक्शन


पेट के नीचे का हिस्सा या जांच के पीछे का चर्बी केवल व्यायाम और डायटिंग से ही कम करना संभव नहीं है। ऐसे में लाइपोसक्शन विधि से चर्बी को मशीन द्वारा खींचकर निकाला जा सकता है। पेट के आस-पास कमर एवं नितंब की चर्बी जब लम्बी अवधि से जमी रहती है तो ऐसी वसा को एक विशिष्ट प्रवाही के माध्यम से चमड़ी से अलग करते है और उसे 3 से 6 एमएम चौड़ी चुषक नलियों से विशिष्ट मशीन द्वारा निकाल लिया जाता है। एक बार में तीन या चार एक सेमी. छोटे चीरे से 8-10 लीटर वसा निकाल ली जाती है। इस तकनीक द्वारा पेट, पुट्ठे, कमर, जांघ, गले एवं चेहरे के आसपास जमा चर्बी निकालकर सही आकार में नियंत्रण किया जा सकता है। एक हफ्ते बाद काम पर जा सकते हैं। ब्रेस्ट रिडक्शन / स्तन के कसाव को लाना इस प्रक्रिया के तहत अविकसित वक्ष को सही रूप देने के लिए स्तन के नीचे छोटा सा चीरा लगाकर स्तन के नीचे की मांसपेशियों में सीलिकॉन की परत भर दी जाती है। बहुत बड़े वक्ष से उत्पन्न होने वाली तकलीफों को दूर करते हुए छोटा एवं सामान्य किया जा सकता है। इसी तरह असमान वक्ष को भी छोटा-बड़ा करने के साथ ही समान आकार का किया जा सकता है। कैंसर की वजह से निकाले गए वक्ष की जगह पुन: नया वक्ष भी बनाया जा सकता है। सर्जरी में कुल दो घंटे का समय लगता है। जनरल एनेस्थिशिया के द्वारा ऑपरेशन किया जाता हे। अगले ही दिन काम पर जा सकते हैं। कॉस्मेटिक सर्जरी की यह सब विशेषताएं अब आम आदमी के लिए भी आसानी से उपलब्ध हो गई है। 


अच्छी सेहत के लिए बस अच्छा-अच्छा सोचें




सोच और सेहत एक-दूसरे के पूरक हैं। हमारी सोच का हमारी सेहत पर बहुत गहरा असर पड़ता है। इंसान जैसा सोचता है, उसका शरीर वैसा ही रिएक्ट करता है। नेगेटिव सोच शरीर को अस्वस्थ बनाती है। प्रतिरोधक क्षमता को कम कर देती है। सकारात्मक सोच शरीर को स्वस्थ और तनावमुक्त रखती है। 
इन दिनों युवा डिप्रेशन से ग्रस्त हो रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि उसकी सोच आगे बढऩे की होड़ में उलझती जा रही है। इंसान अपने दिमाग का सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत ही इस्तेमाल करता है। ऐसे में अगर सोच नकारात्मक होगी तो नि:संदेह दिमाग भ्रमित हो सकता है। अच्छी सोच से सेहत अच्छी रहती है। खुशी से शरीर की धमनियां सजग और सचेत रहती हैं। सोच का सबसे ज्यादा प्रभाव चेहरे पर पड़ता है। चिंता और थकान से चेहरे की रौनक गायब हो जाती है। आंखों के नीचे कालिख और समय से पूर्व झुर्रियां इसी बात का सबूत हैं। शरीर में साइकोसोमैटिक प्रभाव के कारण स्वास्थ्य बनता है और बिगड़ता है। 


शरीर पर रोगों के प्रभाव और सोच का गहरा संबंध है। अत्यधिक सोच के फलस्वरूप गैस अधिक मात्रा में बनती है और पाचन क्रिया बिगड़ जाती है। सिर के बाल झडऩे लगते हैं शरीर कई रोगों का शिकार हो जाता है। अत्यधिक सोचने से असमय बुढ़ापा घेर लेता है। हाई ब्लडप्रेशर हार्टअटैक का कारण बनता है। 


रोग का निवारण रोगी के विश्वास से होता है, डॉक्टर की दवा से नहीं। दवा दी जा रही है, यह भावना अधिक काम करती है। नदियों का स्रोत यदि हिमालय है तो हमारी सेहत का स्रोत हमारा स्वस्थ मन है। 


यदि युवा रोज सोते समय पॉजिटीव थिंकिंग से खुद को सेचुरेट करे, तो वह अनेक रोगों का सफल व स्थायी उपचार कर सकता है। 


स्वस्थ रहना आसान है और सोच को सकारात्मक रूप देना उससे भी आसान है। जरूरत है तो सिर्फ सकारात्मक रुख अपनाने की। अगर सोच को समय के साथ स्वस्थ रूप दिया जाए तो सोच की लकीरें चेहरे पर खिंच नहीं सकतीं। 


प्रकृति के समीप रहकर सकारात्मक रहा जा सकता है। मनुष्य का दिमाग और शरीर दोनों ही संतुलित रह सकते हैं। सकारात्मक सोच का प्रभाव धीमा होता है। लेकिन होता अवश्य है। 

आ रहा है अदरक का मौसम




अदरक व सौंठ हर मौसम में, हर घर के रसोई घर में प्राय: रहते ही हैं। इनका उपयोग घरेलू इलाज में किया जा सकता है। आने वाले मौसम में तो बिना अदरक की चाय की कल्पना ही नहीं कर सकते। प्रस्तुत है अदरक के घरेलू उपचार- 


भोजन से पहले अदरक को चिप्स की तरह बारीक कतर लें। इन चिप्स पर पिसा काला नम क बुरक कर खूब चबा-चबाकर खा लें फिर भोजन करें। इससे अपच दूर होती है, पेट हलका रहता है और भूख खुलती है। 
अदरक का एक छोटा टुकड़ा छीले बिना (छिलकेसहित) आग में गर्म करके छिलका उतार दें। इसे मुंह में रख कर आहिस्ता-आहिस्ता चबाते चूसते रहने से अन्दर जमा और रुका हुआ बलगम निकल जाता है और सर्दी-खांसी ठीक हो जाती है। 
सौंठ को पानी के साथ घिसकर इसके लेप में थोड़ा सा पुराना गुड़ और 5-6 बूंद घी मिलाकर थोड़ा गर्म कर लें। बच्चे को लगने वाले दस्त इससे ठीक हो जाते हैं। ज्यादा दस्त लग रहें हों तो इसमें जायफल घिसकर मिला लें। 
अदरक का टुकड़ा छिलका हटाकर मुंह में रखकर चबाते-चूसते रहें तो लगातार चलने वाली हिचकी बन्द हो जाती है। 

11 पौष्टिक चीजें अवश्य खाएं ठंड के मौसम में
खसखस


भीगी हुई खसखस खाली पेट खाने से दिमाग में तरावट और दिनभर ऊर्जा बनी रहती है।
काजू


इसमें कैलोरी ज्यादा रहती है। ठंड में शरीर का तापमान नियंत्रित रखने के लिए ज्यादा कैलोरी की आवश्यकता होती है। काजू से कैलोरी मिलती है जिससे शरीर स्वस्थ रहता है।
बादाम


यह दिमाग को तेज करने में सहायक होता है। ठंड के दौरान इसे खाने से प्रोटीन, कैल्शियम मिलता है।
अखरोट


कोलेस्ट्राल को कम करने में सहायक होता है। इसमें फायबर, विटामिन ए और प्रोटीन रहता है। जो कि शरीर को स्वस्थ रखने में सहायता प्रदान करता है।
अंजीर


इसमें आयरन होता है, जो खून बढ़ाने में सहायक होता है।
च्यवनप्राश


च्यवनप्राश प्रतिदिन खाने से शरीर का पाचनतंत्र सुदृढ़ होता है, स्फूर्ति बनी रहती है।
गजक


यह गुड़ और तिल से बनाई जाती है। गुड़ में आयरन, फास्फोरस अधिक मात्रा में पाया जाता है। तिल में कैल्शियम व वसा होता है। इसके कारण ठंड के समय शरीर को अधिक कैलोरी मिल जाती है और शरीर का तापमान भी नियंत्रित रहता है।
पिंड खजूर


इसमें आयरन के साथ मिनरल्स और विटामिन भी रहते हैं। इसे ठंड में 20 से 25 ग्राम प्रतिदिन लेना चाहिए।
दूध

रात को सोते समय केसर, अदरक, खजूर, अंजीर, हल्दी दूध में डालकर लेना चाहिए। सर्दी के मौसम में होने वाली सर्दी-खाँसी से बचाव हो जाता है।
गोंद लड्डू

इस मौसम में ज्यादा अच्छे रहते हैं क्योंकि आसानी से पच जाते हैं। एक लड्डू में 300 से 350 कैलोरी होती है।
मिक्स दाल के लड्डू


दाल में प्रोटीन होता है। यह बाल झडऩे को रोकता है और शरीर को स्फूर्ति प्रदान करते हैं।

नारियल तेल में छुपे हैं सुंदरता के रहस्य




नारियल हमारे लिए प्रकृति का उपहार है। नारियल हमारी त्वचा के लिए बहुत उपयोगी है, लेकिन हम उसके गुणों को नजरअंदाज कर देते हैं। 
प्राइमर के रूप में प्रयोग करें
जब आप बाहर जाने के लिए तैयार हों, तब आप फाउंडेशन लगाने से पहले नारियल तेल को प्राइमर के तौर पर लगाएं। इसकी सिर्फ कुछ बूंदें अपने चेहरे पर थपकाकर पूरे चेहरे पर फैला लें। यह फाउंडेशन के लिए बेस का काम करेगा और साथ ही चेहरे को मॉइश्चराइजर भी प्रदान करेगा। आप इसे चिक बोन पर थोड़ा ज्यादा लगा सकती हैं जिससे यह हाईलाइट हो जाए।
आपकी त्वचा के लिए


यदि आप अपनी त्वचा से प्यार करते हैं तो नारियल तेल आपके लिए कुंजी है। यह आपकी त्वचा को हाइड्रेटेड रखता है और प्रदूषण से बचाता है। बदलते मौसम में त्वचा की रक्षा करता रहता है। यह एक प्राकृतिक मॉइस्चराइजर है। नारियल तेल त्वचा को डिटॉक्सीफाय करता है इसलिए नहाने के बाद नियमित रूप से त्वचा पर नारियल तेल लगाएं।
बॉडी स्क्रब बनाएं


नारियल तेल में शक्कर मिलाएं और पूरे शरीर पर धीरे-धीरे रगड़ें और धो लें। आप पाएंगे अपनी त्वचा पर जादुई चमक।
बालों के लिए है संजीवनी बूटी


नियमित रूप से नारियल तेल का प्रयोग बालों की खूबसूरती को बढ़ाता है। उन्हें अल्ट्रावॉयलेट किरणों से बचाता है और उन्हें नरम और सिल्की बनाता है। डस्ट, प्रदूषित वातावरण से बचाता है। आपके बालों को प्रोटीन देता है और उन्हें मजबूत, चमकदार और स्वस्थ बनाता है। यह आपके बालों से दो मुंहे बालों वाली समस्या को पूरी तरह समाप्त करने का अद्भुत काम कर सकता है।
मैकअप रिमूवर के रूप में


नारियल तेल सबसे अच्छा क्लिंजर माना जाता है। मैकअप उतारने के लिए एक कॉटन पैड पर तेल लें और मैकअप रिमूव करें। यह मैकअप तो हटाएगा ही, साथ ही त्वचा के भीतर से गंदगी और बैक्टीरिया भी हटाएगा।
मम्मी भूख लगी है ...





बच्चों को खाना खिलाना उनकी मंम्मी के लिए सबसे बड़ी समस्या होती है। खाने की प्लेट लेकर अक्सर मम्मी बच्चों के पीछे भागती रहती है और शैतान बच्चे खाने से तौबा करते हैं। 


स्कूल में भी कई बच्चे अपना लंच पूरा नहीं लेते और भोजन से भरा टिफिन वैसा का वैसा उनके घर आ जाता है। आखिर क्यों बच्चे खाने से तौबा करते हैं? क्यों न कुछ ऐसा किया जाए कि बच्चे और खाने की दोस्ती हो जाए। हर रोज एक ही प्रकार का खाना खाते-खाते बच्चे भी बोर हो जाते हैं। खाने के प्रति बच्चों का लगाव पैदा करने के लिए उनके लंच में हर रोज कुछ नयापन लाना चाहिए। 


क्या होता है लंच बॉक्स में


बच्चों को अक्सर जंक फूड से प्रेम होता है। उन्हें दाल, सब्जी, रोटी आदि खाना अच्छा नहीं लगता। यही कारण होता है कि पौष्टिक आहार नहीं मिल पाने के कारण बच्चे का सर्वांगीण विकास नहीं हो पाता है।




कई शोधों से निकले परिणामों के मुताबिक करीब 50 प्रतिशत बच्चों के लंच बॉक्स में सैचुरेटेड फैट, नमक और चीनी की मात्रा ज्यादा होती है जिनमें चॉकलेट, जैम, जेली आदि प्रमुख होते हैं। 


क्या होना चाहिए लंच बॉक्स में


बच्चों के लंच बॉक्स में ऐसा खाना होना चाहिए। जो बच्चों को दिन भर अलर्ट व ऊर्जावान बनाए रखे। अंकुरित दालें, पौष्टिक सलाद, हरी सब्जी-रोटी, फल आदि ऐसी चीजें हैं, जो आपके बच्चे के लंच बॉक्स में होनी ही चाहिए।
कैसे करें लंच बॉक्स तैयार


हर रोज एक ही प्रकार का खाना खाते-खाते बच्चे भी बोर हो जाते हैं। खाने के प्रति बच्चों का लगाव पैदा करने के लिए उनके लंच में हर रोज कुछ नयापन लाना चाहिए।




इसके लिए सप्ताह के सात दिनों तक बच्चों के लंच में अलग-अलग प्रयोग कर सकती हैं। जिससे बच्चे को हर दिन कोई नया पौष्टिक आहार मिले। 


सोमवार को यदि आप बच्चों के लंच बॉक्स में अंकुरित दाल व चपाती रखती है तो मंगलवार को फु्रट्स रख सकती है। बुधवार को आप उनके लंच बाक्स में हरी सब्जियाँ तो गुरुवार को वेज सेंडविच रख सकती हैं। 


इस प्रकार बच्चों की पसंद व पौष्टिकता दोनों को ध्यान में रखकर यदि बच्चों का लंच बॉक्स तैयार किया जाए तो आपको खाना खिलाने के लिए बच्चों के पीछे भागना नहीं पड़ेगा। 

घातक हो सकता है किशोरावस्था में गर्भवती होना






20 वर्ष से कम उम्र की महिलाएं गर्भावस्था की जिन जानलेवा जटिलताओं का सामना करती हैं वहीं खतरा अन्य महिलाओं को भी होता है जैसे रक्तस्त्राव, बाधापूर्ण प्रसव, आयरन की कमी (एनिमिया)। युवा महिलाओं को प्रौढ महिलाओं की तुलना में उच्च रक्तचाप, एनिमिया और असुरक्षित गर्भपात के खतरे का सामना अधिक करना पड़ता है। युवा महिलाओं में खतरे केवल उनकी उम्र की वजह से नहीं बल्कि प्रथम प्रसव के कारण होता है जो कि दूसरे, तीसरे और चौथे प्रसव से ज्यादा जोखिम भरा होता है। 


नवजात बच्चों के लिए भी जोखिम 
20 वर्ष से पहले गर्भावस्था युवा महिलाओं के नवजात बच्चों के लिए खतरनाक है। 
डेमोग्राफिक एण्ड हेल्थ सर्वे (डीएचएस) यह दर्शाता है कि युवा महिलाओं से जन्में बच्चों की मृत्यु दर ज्यादा है। 
15 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं में अविकसित प्रसव, स्वत: गर्भपात, नवजातो का कम वजन आदि समस्याओं की दर काफी ज्यादा है। 
यदि किशोरावस्था में महिलाऐं बच्चों को जन्म देती है तो उन्हें हमउम्र महिलाओं की तुलना जल्दी विकसित होना पड़ेगा। 
किशोरावस्था की माँ में आर्थिक रूकावटों और समय की कमी के कारण उच्च शिक्षा कम ही लें पाती है जिसके कारण कॅरियर के कम ही विकल्प होते है और गरीबी भी बढ़ती है। 
गर्भावस्था में व्यायाम के प्रभाव 
ज्यादातर विशेषज्ञों की सहमति है कि प्रसव के दौरान (सामान्य महिलाओं में) निर्धारित 25 से 35 पाउंड से ज्यादा वजन बढ़ाना, बच्चे के जन्म के बाद इसे बढ़े हुए वजन को कम करना काफी कठिन हो जाता है। 
गर्भावस्था के दौरान अपने स्वास्थ्य स्तर को सामान्य रखकर, आपके वजन में वृद्धि को रोका जा सकता है। व्यायाम की मदद से आप अपनी मांसपेशियों की गतिशीलता और मजबूती को बनाए रख सकते हैं। 
गर्भवती महिलाओं के लिए व्यायाम बहुत ही लाभप्रद है, लेकिन जिन महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान अधिक जोखिम होता है अथवा समय से पूर्व प्रसव की संभावना होती है उन महिलाओं को किसी सलाहकार के निर्देशानुसार ही व्यायाम करना चाहिए, जिससे कि यह सुनिश्चित किया जा सके कि व्यायाम से महिला और उसके बच्चे को कोई अतिरिक्त खतरा न उठाना पड़े। 
व्यायाम के दौरान, रक्त का प्रवाह आपके अंत: अंगों से (जिसमें गर्भाशय भी सम्मिलित है) आपके मांसपेशियों, फेफड़ों और हृदय को जाता है। यदि आप ज्यादा तनावपूर्ण व्यायाम करते हैं तो आप ऑक्सीजन को गर्भाशय तक जाने से रोकते हैं इसीलिए यह निर्धारित कर ले कि आपकी हृदय गति सामान्य स्तर की रहे ताकि आपके शिशु को उसकी आवश्यकतानुसार ऑक्सीजन प्राप्त हो। 
जैसे-जैसे गर्भावस्था बढ़ाती है शरीर का संतुलन केन्द्र बदलता रहता है जिससे आपके गिरने की संभावना बढ़ जाती है। 
सामान्य क्रियाएं जैसे, टहलना अथवा लो इम्पैक्ट एरोबिक्स आदि में सम्मिलित होने से गिरने या फिसलने का कोई अतिरिक्त खतरा नहीं होता है। 
कुछ क्रियाएं जैसे घुड़सवारी, पर्वतारोहण और फुटबॉल आदि खेल आपके गिरने या घायल होने के खतरे का बढ़ा देते है। 
व्यायाम आपके शरीर के तापमान को बढ़ा देता है, जो आपके शिशु के विकास को प्रभावित करता है। गर्म मौसम में व्यायाम करते समय सावधानी बरतें और हमेशा यह सुनिश्चित रहे कि व्यायाम के दौरान आपके शरीर में पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ मौजूद हो। आपके शरीर का तापमान कम रहना चाहिए। 


तेल मालिश से खिल जाती है रूखी त्वचा





सर्दियों का मौसम हो और त्वचा की मालिश के लिए तेल का इस्तेमाल न किया जाए, ऐसा संभव नहीं। पार्लर से लेकर मालिश सेंटर तक इन दिनों मालिश कराने वालों की भीड़ लगी रहती है। आयुर्वेद में भी तेल मालिश का काफी महत्व है। सर्दियों में रूखी त्वचा व बेजान बालों को मालिश से नमी मिल जाती है। सर्द हवाएं त्वचा को रूखी व बेजान बना देती हैं। ऐसे में मालिश से बेहतर कुछ भी नहीं। ज्यादातर लोग तरह-तरह की क्रीम व ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं। नतीजा यह होता है कि थोड़ी देर बाद त्वचा को फिर नमी की जरूरत महसूस होने लगती है। 


फेशियल तेल मालिश बेहतर विकल्प है त्वचा में नमी बरकरार रखने का। दादी-नानी की बातें याद करें, तो बचपन में वे हमारी मालिश किया करती थीं। जबरदस्ती हमारे बालों में ढेर सारा तेल लगा देती थीं। वह सब हमारे भले के लिए होता था। कड़ाके की ठंड में भी कभी रूखेपन का अहसास नहीं होता था। फेशियल तेल मालिश भी यही काम करता है। सर्दियों में त्वचा में नमी बनाए रखने व सुंदरता बरकरार रखने के लिए मालिश बेहतर विकल्प है। केमिकल युक्त क्रीम त्वचा के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है मगर अच्छा तेल आपकी त्वचा की चमक व नमी बनाए रखता है। 


त्वचा को सुरक्षित रखने के लिए प्राकृतिक तेल की जरूरत होती है अगर हम त्वचा पर तेल नहीं लगाते, तो शरीर इसे बार-बार बनाता है, जिस कारण त्वचा में नमी की कमी होती है। और फिर त्वचा फटने लगती है। हेल्दी तेल कटी-फटी त्वचा को रिपेयर करता है और शरीर को नमी व माश्चराइज प्रदान करता है जिससे त्वचा रूखी बेजान नहीं बल्कि खिली-खिली दिखती है। 


त्वचा के मालिश के लिए मिनरल तेल की जगह जोजोबा एप्रीकॉट और बादाम के तेल का इस्तेमाल करें। कई लोग यह सोचते हैं कि ज्यादा तेल लगाने से स्कीन ज्यादा शाइनी दिखेगी, पर ऐसा नहीं है। त्वचा की नमी के लिए दो-चार बूंद तेल काफी होता है और यह त्वचा को कांतिमय बनाने में मदद करती है। सिर्फ एक-दो बूंद तेल ही आपकी त्वचा व गर्दन के लिए पर्याप्त है। तेल में एंटी-ऑक्सीडेंट की शक्ति और विटामिन्स मौजूद होते हैं, जिससे ये त्वचा की सुरक्षा करते हैं। सर्दियों या मौसम बदलने का सीधा असर पहले हमारी त्वचा पर पड़ता है। ऐसे में ब्यूटी तेल इनकी हिफाजत करता है। 


टीवी विज्ञापनों में तरह-तरह की क्रीम देखकर लोग खरीद तो लाते हैं पर इतना फायदा नहीं दिखता। साथ ही उनमें मौजूद केमिकल्स त्वचा को नुकसान भी पहुंचाते हैं। कई लोगों को इनसे एलर्जी व त्वचा संबंधी समस्याएं भी हो जाती हैं। ऐसे में ये क्रीम उनके लिए आफत बन जाती है। किसी विज्ञापन के लालच में न पड़ कर अगर हर दिन ब्यूटी तेल से त्वचा की मालिश की जाए, तो त्वचा हर पल चमकदार बनी रहती हैं। 


कई क्रीम एंटी-एंजिग भी होती हैं। उम्र बढऩे के संकेत को रोकने के लिए इन्हें बनाया जाता है। मगर इसमें मौजूद केमिकल त्वचा को नुकसान पहुंचा सकते हैं। फेशियल तेल केमिकल फ्री होते हैं। यह वॉटर-बेस्ड नहीं होते। इन्हें सुरक्षित रखने के लिए किसी सिंथेटिक प्रिजरवेटिव का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इनमें मौजूद प्रचुर मात्रा में एंटीआक्सीडेंट, विटामिन सी और ई, फ्री रेडिकल्स से लडऩे में मदद करते हैं। साथ ही अल्ट्रावायलट किरणों से त्वचा की सुरक्षा करते हैं, जो एजिंग और झुर्रियों के मुख्य कारण बनते हैं। फेशियल तेल त्वचा पर एंटीएजिंग का भी काम करता है। तो बस त्वचा की सारी समस्याओं का इलाज कीजिए एक दो बूंद तेल से और सारी समस्याओं से रहिए बेफ्रिक। 
कुनकुनी ठंड खुद को ऐसे करें तैयार




सर्दियों का गुनगुना मौसम आ गया है। कुछ लोगों को बदलते मौसम के साथ एडजस्ट होने में समय लगता है। विशेषकर बुजुर्गों, बच्चों और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों को। उन्हें इस दौरान एहतियात बरतने की जरूरत होती है। जहां थोड़ी लापरवाही हुई नहीं कि सर्दी-जुकाम, कफ आदि की समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। 


जिन लोगों को साइनस, एलर्जी, ब्रोंकाइटिस, अस्थमा जैसे रोग होते हैं, उन्हें सावधानीपूर्वक खाने-पीने में परहेज बरतना चाहिए। उन्हें कफवर्धक चीजों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। नीचे लिखी सावधानियों पर अमल कर आप सर्दियों की तकलीफों से खुद को बचा सकते हैं। 


अगर आप सुबह सैर के लिए निकलते हैं तो आधा-एक घंटा देर से जाना शुरू करें, ताकि सवेरे की ठंड से बचाव हो सके। हल्की-हल्की गुनगुनी धूप में जाएँ तो भी कोई हर्ज नहीं है। विटामिन-डी का सेवन भी हो जाएगा। 
घास पर सीधे या फर्श पर नंगे पैर न घूमें। 
अगर आपके बाल गीले हैं तो उन्हें सुखाने के बाद ही टू-व्हीलर पर निकलें। 
अलसुबह गर्म पानी जरूर पीएं। 
नहाने के लिए ठंडा पानी न लें। गर्म पानी से स्नान करें। 
ठंडी हवा सीधे कान में न जाने पाएं, मफलर स्कार्फ आदि से खुद को बचाएं। सिर और छाती भी ढंकी होना चाहिए। 
गर्म तासीर वाली चीजों का इस्तेमाल बढ़ा दें। जैसे गर्म मसाले, अजवाइन, लौंग, जीरा, मैथीदाना, बड़ी इलायची आदि का काढ़ा बनाकर भी पिया जा सकता है। 
सुबह-शाम अदरक वाली चाय भी फायदेमंद होती है। 
ठंडी और फ्रिज से निकली चीजों को न खाएं तो ज्यादा अच्छा होगा। 
खट्टी चीजें जैसे दही और नींबू के साथ ही चावल, पोहे, दूध और देशी घी जैसी चीजों से कफ भी हो सकता है। 
इस मौसम में इस्तेमाल करने के लिए नारियल तेल की जगह सरसों का तेल ज्यादा उपयुक्त है। सारे गर्म मसाले सर्दियों में किसी वरदान से कम नहीं होते हैं। एक तो इनके इस्तेमाल से शरीर को पर्याप्त गर्मी मिलती है और यदि किसी वजह से सर्दी हो जाए तो ये शरीर पर जादुई असर पैदा करते हैं। ये शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। 


डायट चार्ट अपनाएं वजन बढ़ाएं



वजन बढ़ाने में व्यायाम के साथ-साथ स्वस्थ आहार की बहुत जरूरत होती है। यदि आप अपना वजन बढ़ाना चाहते हैं तो अपने आहार में पोषक तत्वों को शामिल कीजिए। इसके लिए एक डायट चार्ट बनाइए और उसका पालन कीजिए। 


वजन बढ़ाने के लिए आहार में कैलोरी, वसा, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेड की बहुत जरूरत होती है। इसलिए अपना डायट चार्ट बनाते वक्त इन बातों का ध्यान रखिये और इन सबको शामिल कीजिए। आइए हम आपको बताते हैं वजन बढ़ाने वाले आहार के बारे में। 


वजन बढ़ाने वाले आहार 


प्रोटीन शेक और प्रोटीनयुक्त भोजन वजन बढ़ाने में लाभकारी है। आपको चाहिए कि आप प्रोटीनयुक्त फिश, अंडा, अंकुरित चने, मोंठ, चिकन, चावल, दूध या दूध बनी चीजें, सोया मिल्क या पाउडर के सेवन, मछली, फलियां, मेवा, बींस, इत्यादि का सेवन सप्ताह में दो से तीन बार जरूर करें। 


आप यदि दूध पीने के शौकीन हैं तो आपके लिए अच्छी बात है आप रात को सोते समय दूध में शहद डालकर नियमित रूप से लें कुछ ही दिनों में आपको अपना वजन बढ़ता दिखेगा। इसके अलावा आप रात को फुलक्रीम दूध में चने भिगोकर लें, इससे भी आपको वजन बढ़ाने में मदद मिलेगी। आप रोजना एक गिलास दूध के साथ च्यवनप्राश लेंगे तो इससे आपकी हड्डिया मजबूत होंगी और आपका वजन भी बढ़ेगा। 


वजन बढ़ाने के लिए जरूरी है कि आप तैलीय और पौष्टिक भोजन का सेवन करें, इसके लिए आप पनीर, मक्खन, घी, तेल का सेवन कर सकते हैं पनीर, मक्खन, घी, तेल आप चाहे तो अपने सूप में घी, मक्खन इत्यादि मिला सकते हैं। 


आपको फिट रहते हुए वजन बढ़ाने के लिए चाहिए कि आप साबुत अनाज, गेहूं, चने के आटे, बाजरे का आटा इत्यादि की बनी रोटियां खांए। 


आपको गेहूं युक्त बिस्किट, ओट मील, घी युक्त चपाती, ब्राउन चावल इत्यादि का सेवन करना चाहिए। 


वजन बढ़ाने में ड्राई फ्रूट्स महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आप सूखे मेवे में अखरोट, किशमिश, बादाम, खरबूजे की गिरी इत्यादि का सेवन कर सकते हैं। 


आपको अधिक से अधिक दालें, चावल की खीर इत्यादि खाना चाहिए। 


वजन बढ़ाने में हरी सब्जियां खाना बहुत लाभदायक होता है, इससे आपकी सेहत भी बनती हैं और आप आसानी से बिना तनाव के अपना वजन भी बढ़ा सकते हैं। 


फल, फलों का रस, सब्जियों का रस, खरबूजा, इत्यादि खाने से भी आप अपना वजन आसानी से बढ़ा सकते हैं। 


आप चाहे तो हेल्दी मिठाईयां, गुड, खीर, हलवा, कस्टर्ड, फ्रूट जूस, शहद से बनी चीजें इत्यादि का सेवन भी वजन बढ़ाने के लिए कर सकते हैं। 


वजन बढाऩे के टिप्स 
वजन बढ़ाने का अर्थ यह नहीं है कि आप फिट ना हो। आपको चाहिए कि आप फिट और संतुलित रहते हुए अपना वजन बढ़ाए अन्यथा आपके स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ेगा। 
वजन बढ़ाने के लिए भी आपको व्यायाम और सैर की जरूरत है ताकि आप एक्ट्रा कैलोरी बर्न कर सकें और संतुलित रूप से अपना वजन बढ़ा सकें। 
वजन बढ़ाने के लिए आपको नाश्ता हैवी करना होगा और डिनर हल्का। 
यदि आप वाकई अपने वजन को बढ़ाना चाहते हैं तो आपको हाई कैलोरी, वसायुक्त भोजन और प्रोटीन, मिनरल्स की मात्रा अपने खाने में बढ़ाने होगी। 
महीने में दो बार अपने वजन को चेक करें। 
यदि आप वजन बढ़ाना चाहते हैं तो अपना हेल्दी और हाई प्रोटीन, हाई कैलोरी युक्त डायट चार्ट बनाएं और उसे सही तरीके से फॉलो करें। 
आपको भूख नहीं लगती फिर भी आपको दिन में हर दो-तीन घंटे के अंतराल में भोजन करना चाहिए। 
जंकफूड, चिप्स, पिज्जा, बर्गर, तले पदार्थ इत्यादि खाने से बचें। 

बच्चों के खेल और व्यायाम











आजकल के बच्चों के लिए खेल का मतलब है टीवी के सामने बैठना, वीडियो गेम व कंप्यूटर पर खेलना। ऐसे में बच्चों के पूरे शरीर को व्यायाम की ज़रूरत है, यानी कि उसका मैदान में खेलना ज़रूरी है। ऐसे खेल जिनमें बच्चों को मेहनत करनी पड़ती है, वे बच्चों को मजबूत बनाते है। इससे बच्चों का वजन भी कम होता है। साथ ही अतिरिक्त उर्जा या एनर्जी बाहर निकालती है। 


ड्रग्स व मारपीट के डर से बहुत से माता पिता अपने बच्चों को बाहर खेलने नहीं देते। खास तौर से काम काज पर जाने वाले माता पिता, क्योंकि बच्चों की हिफाज़त के लिए वो हमेशा उनके पास नहीं रह सकते। ऐसे में अगर माता पिता को आफ्टर केयर व हॉलिडे केयर की सुविधा मिलती है, तो बच्चे को बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित करें। आप बच्चे को उसके दादा दादी के साथ बाहर खेलने भेज सकते है। दूसरे बच्चों के माता पिता के साथ बच्चों का एक ग्रुप बनाया जा सकता है, जो पार्क या गार्डन में साथ खेले। बड़े बच्चे भी आपके छोटे बच्चे की देखभाल कर सकते है। 


अगर स्कूल नज़दीक है तो बच्चे के साथ पैदल ही स्कूल जाएं। ये बच्चे की सुरक्षा के लिहाज़ से तो अच्छा है ही साथ ही उसका व आपका व्यायाम भी हो जाएगा। ये बच्चे के साथ बेहतरीन वक्त बिताने का अच्छा तरीका भी है। 


बच्चे को कंप्यूटर व टीवी के सामने 1 घंटे से ज़्यादा न बैठने दें। अगर आपका बच्चा कंप्यूटर इस्तेमाल करता है तो उस पर नजऱ रखें व देखें कि वो क्या करता है। इंटरनेट बच्चों के लिए खतरनाक भी हो सकता है। 


छुट्टियों में जब भी समय मिले तो पूरे परिवार के साथ बेहतर वक्त बिताएं। बच्चों के साथ ऐसे खेल खेलें जिसमें शारीरिक मेहनत हो, जैसे मैदानी खेल, दौड़ भाग, फुटबॉल, क्रिकेट आदि। आपको सक्रिय देखकर बच्चा भी सक्रिय (एक्टिव) होने की कोशिश करेगा। बच्चे को सक्रिय बनाकर व उसके साथ खेलकर उसे सड़क व ड्रग्स आदि से दूर रखा जा सकता है। बच्चा कहां व किसके साथ है इस बात की जानकारी रखें। उसे स्कूल में या स्थानीय क्लब वगैरह में खेलने के लिए प्रोत्साहित करें। जब वो कोई मैच खेले तो उसकी तारीफ करें। 

बच्चों को सुलाने के आसान तरीके











आमतौर पर बच्चों को जब नींद आती है तो वो चिड़चिड़े हो जाते हैं। फिर उन्हें किसी भी तरह बहलाने फुसलाने की कोशिशे बेकार साबित होती हैं। उस समय उन्हें जरूरत होती हैं प्यारी सी लोरी के साथ शांत माहौल और मां के गोद की। लोरी सुनाकर बच्चों को सुलाने का चलन बरसों से चला आ रहा है। आज भी मांए अपने बच्चों को लोरी सुनाकर ही सुलाती हैं। धीरे-धीरे और मीठे स्वर में गाई गई लोरी का बच्चे के दिमाग पर काफी असर होता है इसको सुनते-सुनते वे धीरे-धीरे मीठी नींद की ओर बढऩे लगते हैं। 


लोरी ही जरूरी नहीं


लोरी बच्चे को सुलाने का सबसे प्यारा तरीका समझा जाता है। लेकिन सिर्फ लोरी ही जरूरी नहीं है इसके साथ बच्चे के शरीर पर हल्की-हल्की थपकी और गोद में उसे धीरे-धीरे झुलाना भी काफी मददगार साबित होते हैं। और यह प्रक्रिया आपको तब तक करनी चाहिए जब तक बच्चा गहरी नींद में ना सो जाए।
लोरी सुनते ही क्यों सो जाते हैं बच्चे


लोरी की मीठी आवाज से बच्चे का ध्यान आस-पास की आवाजों से हटने लगता है। बच्चों को लगातार गोद में झुलाते रहने से उसकी नजर किसी भी चीज पर नहीं टिक पाती। और थोड़ी ही देर में उसकी आखों में नींद आने लगती है। और वह धीरे-धीरे अपनी आंखों को बंद करने लगता है।
स्तनपान करते हुए


आमतौर पर देखा जाता है कि बच्चें मां की गोद में स्तनपान करते हुए भी सो जाते हैं। ऐसे में उनके सिर पर धीरे-धीरे हाथ से सहलाएं जिससे उनकी आंखों में नींद आने लगे। और जब वह पूरी नींद में सो जाए तो उसे धीरे से बिस्तर पर लेटा दें।
गोद में लेकर झुलाएं


बच्चो को जब नींद आती है तो वो आपकी गोद में झुलना चाहते हैं। ऐसे में बच्चे को अपनी गोद में लेकर दाएं से बाएं झुलाएं। धीरे-धीरे उसकी आंखे बोझिल होने लगती है और वह थकवाट के कारण अपनी आंखे बंद करने पर मजबूर हो जाता है। ध्यान रहे कि ज्यादा जोर से झुलाने पर बच्चा डर भी सकता है।
प्रैम या स्ट्रॉलर में


कई बार देखा जाता है कि बच्चा प्रैम या स्ट्रॉलर में बैठकर आगे-पीछे हिलाते हुए सोना चाहता है। यह प्रक्रिया बार-बार करने पर बच्चा धीरे-धीरे नींद की आगोश में चला जाता है।
बच्चे को डराएं नहीं


कभी भी बच्चों को सुलाने के लिए उसे डराएं नहीं। ऐसा करने से उसके मन में डर बैठ जाएगा जो आगे चलकर उसके व्यक्तित्व के विकास में बाधक होगा।
बच्चों का अकेला ना छोड़ें


ध्यान रखें कि बच्चों को सोते समय अकेले कमरे में ना छोड़े। जब कभी भी बच्चे की नींद खुलेगी तो वो खुद को कमरे में अकेला पाकर डर सकता है। ऐसे में जरूरी है कि आप उसके आस-पास रहें।
निम्न बातों का ध्यान रखें 
सुलाने वाली जगह साफ-सुथरी होनी चाहिए। 
जहां सोए वहां ज्यादा शोर नहीं होना चाहिए। 
थोड़ी-थोड़ी देर में देखते रहना चाहिए कि बच्चा गीले में तो नहीं सो रहा है। 
यह देख लें कि बच्चे को कोई परेशानी न हो और उस पर अच्छी तरह ओढऩा पड़ा हुआ हो। 
कमरे में अंधेरा होना चाहिए जिससे बच्चे को लगे कि अभी रात है। 

बच्चों में कुपोषण





वास्तव में कुपोषण कोई बीमारी नहीं। शरीर को पर्याप्त पोषण ना मिल पाने से कुपोषण की सिथति पैदा होती है। इससे शरीर के ज़रूरी अवयव ठीक तरीके से काम नहीं करते और बीमारियां होने लगती है। 


कुपोषण एक ऐसी स्थिति है जो लम्बे समय तक पोषणयुक्त आहार ना मिल पाने के कारण पैदा होती है। कुपोषित बच्चों की रोग प्रतिरोधी क्षमता कमज़ोर होती है और ऐसे बच्चे अकसर बीमार रहते है। कुपोषण के कारण बच्चों की त्वचा और बाल रूखे-बेजान दिखते हैं और वजऩ कम होने लगता है। सिर्फ इतना ही नहीं कुपोषण के कारण बच्चे का विकास भी रूक जाता है। और अगर समय रहते कुपोषण का इलाज ना कराया जाये तो यह समस्या जानलेवा भी हो सकती है। आपका बच्चा स्वस्थ है, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप उसके पोषण पर ध्यान ना दे। चाहे बात नवजात शिशु की करें या स्कूल जाने वाले बच्चों की, बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए पोषणयुक्त आहार बेहद अवश्यक है। 


कुपोषण जैसी समस्या का सबसे बड़ा कारण गरीबी और अज्ञानता है। बच्चे को चाकलेट, बिस्किट आदि देकर आप उसका मन बहला सकते हैं, लेकिन उन्हें सही पोषक आहार देना भी जरुरी है। खासतौर पर बच्चे के लंचबाक्स में तो ऐसी चीजें बिलकुल नही देनी चाहिये, जो उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो। अगर अपने बच्चे को बीमारियों से दूर रखना चाहते हैं, तो उसके सम्पूर्ण पोषण पर ध्यान दे। आप घर पर ही कम खर्चे में पोषणयुक्त आहार बना सकते हैं। ध्यान रखें अपने शिशु को दिन में चार बार ठोस आहार जरुर दें और तीन बार दूध और दूध से बने उत्पाद दे। 


बच्चों का पेट भरा होने का मतलब यह नहीं कि उन्हें पूरा पोषण मिल रहा है। बच्चों के खाने में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेटस, विटामिन्स, मिनरल्स जैसे पोषक तत्व होने चाहिए क्योंकि इन पोषक तत्वों की कमी से ही कुपोषण होता है। 


जिन बच्चों को समय पर खाना नहीं मिलता, उनमें कुपोषण होने की सम्भावना सबसे अधिक रहती है। लेकिन जिन बच्चों को समय पर खाना मिलता है उन्हें भी कुपोषण हो सकता है। ऐसा भी ज़रूरी नहीं कि किसी एक बच्चे में सभी प्रकार के पोषक तत्वों की कमी पाई जाये। किसी एक प्रकार के पोषण तत्व की कमी से भी कुपोषण होता है। इसलिए बच्चों को अनाज, दालें, हरी सब्जीयां, सलाद, दूध और मौसमी फल ज़रूर दे। 


किसी को भी हो सकता कुपोषण


सबसे आम एवं उल्लेखनीय लक्षण है वजन में कमी होना। उदाहरण के लिए, यदि आपने तीन महीनों के दौरान अपने शरीर का वजन यदि १० किलो से अधिक खो दिया है तो आपको जानने की जरूरत है कि कहीं आप कुपोषण के शिकार तो नहीं हो रहे हैं? यह आम तौर पर शरीर मास इंडेक्स या बीएमआई का उपयोग करके मापा जाता है।
कुपोषण के लक्षण 
मांसपेशियों में थकान और कमजोरी। 
थकान की बहुत से लोग शिकायत करते हैं पूरे दिन ऊर्जा की कमी रहती है। यह भी एनीमिया द्वारा कुपोषण के कारण हो सकता है। 
कुपोषित मरीजों में संक्रमण का खतरा बहुत ज्यादा होता है। 
चिड़चिड़ापन और चक्कर आना, बाल झडऩा। 
त्वचा और बाल शुष्क हो जाते हैं। 
त्वचा सूखी, और परतदार दिखाई दे सकती हैं। 
कुछ रोगियों में लगातार दस्त या दीर्घकालिक कब्ज हो सकता है। 
कुपोषण की शिकार महिलाओं में अनियमित अथवा पूरी तरह से माहवारी बंद हो सकती है। 
अवसाद में कुपोषण आम बात है। 




महंगाई की सीधी मार बच्चों के विकास पर


भारत में बच्चों की आधी आबादी का विकास खाने की कमी के कारण रुक गया है. अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसी 'सेव द चिल्ड्रनÓ ने कहा है कि भोजन की कमी के कारण भारत में बच्चों की आधी आबादी का पूरी तरह से शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो पा रहा है.




सहायता एजेंसी 'सेव द चिल्ड्रेनÓ के सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले भारतीय परिवारों में से एक चौथाई परिवारों ने माना कि उनके बच्चों को अक्सर भूखा रहना पड़ता है. 


ये सर्वेक्षण दुनिया के पांच देशों भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, पेरू और नाइजीरिया में किया गया है. इन देशों में दुनिया के कुपोषण के शिकार बच्चों की आधी आबादी रहती है. 


संस्था का कहना है कि इससे 'अगले पंद्रह सालों में दुनिया भर के करीब 50 करोड़ बच्चों के शारीरिक और मानसिक तौर पर अविकसित रह जाने की आशंका है.Ó 


इन आंकड़ों में भी मध्यम और निम्न वर्ग के गरीबों के बीच असमानता पाई गई है. 


आंकड़ों के अनुसार मध्य वर्ग के 11 प्रतिशत गरीब अभिभावकों ने माना कि ऐसा कभी-कभार होता है कि उनके बच्चों को भूखे रहना पड़ता है लेकिन निम्न वर्ग के गरीबों में ये प्रतिशत बढ़कर 24 हो जाता है. 

डेन्टिस्ट की ज़रूरत क्यों है?






साल में कम से कम एक बार डेन्टिस्ट के पास जाकर दांतों की सफाई कराना चाहिए। अगर आपको कैविटी या दांतों से संबंधित कोई समस्या हो तो डेंटिस्ट इलाज करेगा। डेंटिस्ट बच्चों का चेकअप करके ये देखता है कि उनके दांत सही जगह पर आ रहे हैं या नहीं। साथ ही उम्रदराज लोगों को भी अपने दांतों का उतना ही ख्याल रखना चाहिए, जितना हम बच्चों के लिए सजगता रखते हैं। 


डेंटिस्ट कई बीमारियों के लिए चेकअप करता है, जैसे मसूड़े की बीमारी, ओरल कैंसर, डायबिटीज़ और कुछ सेक्सुअली ट्रांस्मिटेड डिसीज़ इत्यादि। 


आप डेन्टिस्ट के पास जाने से पहले याद रखें


आपको डेन्टिस्ट से जो भी सवाल पूछना है उसे लिख लीजिए। कहीं ऐसा ना हो कि आप डेंटिस्ट से कुछ ज़रूरी सवाल पूछना भूल जाएं।




अपने इंश्योरेंस, मेडिकल और डेन्टल स्कीम की जानकारी रखें। 


अपने पुराने डेन्टल रिकॉर्ड और एक्स-रे वगैरह साथ लाएं। अगर आपके पुराने डेन्टिस्ट ने आपको रिकॉर्ड नहीं दिए हैं, उससे वो रिकार्ड ले लें, या उसे नए डेंटिस्ट को रिकॉर्ड देने को कहें। 


अगर बच्चे को साथ ले जा रहे है तो उसे डराए नहीं। ऐसा जताएं कि डेंटिस्ट के पास जाने के लिए आप बहुत उत्साहित हैं। 


डेंटल आपका इलाज कैसे कर सकता है?


एक्स-रे निकालना - जब आप डेन्टिस्ट के क्लीनिक में जाते हैं, तो बहुत सी जांच शुरू हो जाती है। शायद आपके मुंह का एक्स रे भी निकाला जाए। एक्स रे से पता चलता है कि आपके दांत कितने स्वस्थ्य या मजबूती से अपनी जगह पर जमे हुए हैं।




एक्स रे से मुंह के अंदर की हड्डियां भी दिख जाती हैं। इससे केविटी का पता चल जाता है। एक्स रे निकालने के लिए डेन्टिस्ट आपके मुंह के अंदर एक स्पेशल फिल्म डालकर एक्स रे मशीन का इस्तेमाल करता है। डेंटिस्ट आम तौर पर चार एक्स रे निकालते हैं और आप कुछ ही मिनट में उन्हें देख भी सकते हैं। 


दूसरा कदम - दांतों की सफ़ाई 


दांतों की जांच के दौरान डेन्टिस्ट मिरर और मेटल इन्स्ट्रूमेंट का इस्तेमाल करते हैं। मेटल इन्स्ट्रूमेंट की मदद से वो दांतों में जमी गंदगी साफ करते हैं, क्योंकि गंदगी से धीरे-धीरे दांत कमज़ोर पड़ सकते हैं। इसके अलावा डेंटिस्ट एक ट्यूब की मदद से मुंह से लार निकाल सकता है। 


आपके दांतों की सफाई के लिए डेन्टिस्ट इलेक्ट्रिक ब्रश और स्पेशल टूथपेस्ट का इस्तेमाल करता है। इससे आपके दांत चिकने और चमकीले नजऱ आते हैं। डेंटिस्ट आपके दांतों को फ्लॉस भी करता है। 


तीसरा कदम - फ्लोराइड ट्रीटमेंट 


आपको फ्लोराइड ट्रीटमेंट भी दिया जा सकता है। फ्लोराइड एक तरह का खनिज है, जो दांतों को मज़बूत बनाता है, साथ ही केविटी की समस्या नहीं होने देता। ज़्यादातर टूथपेस्ट में फ्लोराइड रहता है। 


फ्लोराइड ट्रीटमेंट के तहत दांत का डॉक्टर आपके मुंह में लिक्विड डालकर उसे पूरे मुंह में फैलाने के लिए कहेगा। या आपके दांतों पर डेन्टिस्ट जैल भी लगा सकता है। कुछ देर मुंह में रखने के बाद आप इसे थूक सकते है या पानी से मुंह धो सकते है। 


चौथा कदम - मसूड़ों की जांच 


डेंटिस्ट आपके दांतों और मसूड़ों की जांच करके देखता है कि केविटी या अन्य बीमारी के लक्षण तो नहीं हैं। आप अपने डेन्टिस्ट से दांतों को स्वस्थ रखने के तरीक़े के बारे में चर्चा करने के साथ ही ये भी पूछ सकते हैं कि कौन-सा खाना दांतों के लिए अच्छा रहेगा। डेन्टिस्ट आपको दांतों को स्वस्थ रखने का तरीक़ा बताएगा। 


सारी जांच के बाद अगर आपके दांतों में कुछ समस्या हुई तो डेन्टिस्ट आपको बता देगा। साथ ही वो अगली मुलाकात की तारीख़ भी बता देगा। 

ब्रश करने का सही तरीका





आहिस्ता आहिस्ता ब्रश करें 
सॉफ्ट ब्रिस्टल वाले टूथ ब्रश का उपयोग करें जो आपके मुंह के आकार के हिसाब से हों। बड़ा ब्रश पीछे वाले दांतों तक नहीं पहुंच सकता और छोटे ब्रश को ज्यादा देर लगती है। अगर ब्रश चुनने में आपको कठिनाई हो रही हो तो अपने डेन्टिस्ट से बात करें। 
फ्लोराइड वाले टूथपेस्ट का उपयोग करें। बच्चों को मटर के दाने बराबर टूथपेस्ट दें, और बड़े उतना टूथपेस्ट लें, जितना ब्रिस्टल पर आ जाए। 
दिन में कम से कम दो बार ब्रश करें, पहली बार सुबह उठने के बाद, और दूसरी बार रात को सोने से पहले। अगर आप हर बार खाना खाने के बाद ब्रश करना चाहें, ये सबसे अच्छा होगा। लेकिन अगर आप ऐसा नहीं कर पाते तो पानी से मुंह धोएं, कुल्ला करें, खासकर जब आपने मीठा खाया हो। 
ब्रश सिर्फ दो मिनिट तक ही करना चाहिए। घड़ी देखकर ब्रश करें। 
हर तीन महीने मे अपना टूथब्रश बदल दीजिए, या तब ब्रश बदलिए जब इसके ब्रिस्टल मुडऩे लगें। 
दांतों को सब तरफ से ब्रश करें 
आहिस्ता आहिस्ता दातों को पीछे और आगे से मांजना चाहिए। 
जहां दांत मसूड़ों से मिलते हैं, वहां बहुत आहिस्ते से गोल घुमाकर ब्रश करें। जहां दांतों और मसूड़ों के बीच खाने के कण फंसे हों, उन्हें ब्रिस्टल से हल्के से निकालिए। 
दांतों को सभी तरफ से ब्रश से साफ कीजीए, बाहर की तरफ, अंदर की तरफ, चबाने की तरफ। 
सामने वाले दांतों के अंदर के हिस्से बड़े ब्रिस्टल से साफ करें। 
बदबू पैदा करने वाले रोगाणुओं को निकालने के लिए जीभ पर हल्के से ब्रश करें। इससे सांस में बदबू नहीं रहेगी। 
जब निकलने लगे बच्चों के दाँत











बच्चों में दाँत निकलने की शुरुआत 6 से 8 वें महीने में होती है, कुछ बच्चों में देरी से भी दाँत निकलते हैं। आमतौर पर यह बच्चे के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। अगर बच्चों के दाँत देरी से निकलने शुरू होते हैं तो इस बारे में ज्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए। दाँत निकलने का क्रम सही होना चाहिए। बच्चों के दाँत पहले नीचे, सामने निकलते हैं, फिर ऊपर के सामने के दाँत आते हैं। 


बच्चे के जब दाँत निकलने शुरू होते हैं तो उसके मसूड़े सूज जाते हैं। उनमें खुजली होती है, इससे उसे हर समय झुंझालाहट होती है। इस दौरान वह अक्सर अपनी ऊँगली मुँह में डालता रहता है। 
उसे अपने आसपास, जो भी चीज दिखाई देती है, वह हर चीज को मुँह में डालता रहता है। इस दौरान सबसे ज्यादा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि बच्चा, जो कुछ भी मुँह में डाले, वह गंदा न हो। 
आमतौर पर यह कहा जाता है कि दाँत निकलते समय बच्चे को दस्त लग जाते हैं। हालांकि ऐसा होता भी है, लेकिन इसकी खास वजह होती है बच्चे की साफ-सफाई में बरती गई लापरवाही। बच्चे को इस दौरान दस्त तभी लगते हैं, जब कोई गंदी चीज उसके मुँह में चली जाती है। 
हमारे मुँह में जीवाणु हमेशा मौजूद रहते हैं। बच्चे के जब दाँत नहीं होते, उस समय उसके मुँह के अंदर जीवाणुओं की तादाद कम होती है और जैसे-जैसे बच्चे के दाँत निकलते जाते हैं, जीवाणुओं की संख्या भी बढ़ती जाती है, क्योंकि बच्चा जीवाणुओं को झेल नहीं सकता, इसलिए उस का पेट खराब हो जाता है और उसे दस्त लग जाते हैं। 
धीरे-धीरे जब बच्चा जीवाणुओं के साथ अपना तालमेल बिठा लेता है तो उस का पेट भी ठीक हो जाता है। बच्चे को शारीरिक परेशानी हो तो उसे डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवा देनी चाहिए। 

होम्योपैथी : बच्चों के स्वास्थ्य का साथी











पालक जब भी दवाखाने पर अपने बच्चों को लेकर आते हैं तो उनके चेहरे पर अत्यंत प्रसन्नता रहती है। वे बताते हैं कि मेरा बच्चा दूसरे डॉक्टर्स के पास जाने को मना करता है परन्तु आप के पास आने के लिए सहजता से तैयार हो जाता है, बल्कि स्वयं कहता है दवाईयां खत्म हो गई है। मीठी गोली वाले डॉक्टर साहब के पास चलना है। 


बच्चे तन-मन से अत्यंत नाजूक होते हैं। कोई भी पीड़ा या कष्ट उन्हें अत्यंत परेशान कर देता है, चाहे वह इंजेक्शन का दर्द हो या जबरदस्ती दी जाने वाली कड़वी दवाईयां। जबरदस्ती करने से डाक्टर या चिकित्सा के खिलाफ हो जाता है। होम्योपैथी में चूंकि मीठी दवाइयों का प्रयोग किया जाता है तथा बच्चे चॉकलेट के बाद सबसे ज्यादा इन मीठी गोलियों को पसंद करते हैं। 


होम्योपैथी द्वारा हम बच्चों में होने वाले रोग जैसे दस्त, कब्ज, दांत निकलने के समय होने वाली परेशानियां, रात्री में बिस्तर गीला करना इत्यादि से सहजता के साथ छुटकारा दिला सकते हैं। बच्चों को यदि बार-बार सर्दी-जुकाम, निमोनिया या प्रायमरी कॉम्प्लेक्स होगा तो उनका शारीरिक और मानसिक विकास स्वस्थ बच्चों जैसा नहीं हो सकेगा। होम्योपैथी ऐसी चिकित्सा प्रणाली है, जिसके प्रयोग से बार-बार होने वाले सर्दी-जुकाम, निमोनिया एवं प्रायमरी कॉम्प्लेक्स से छुटकारा पाया जा सकता है तथा इन दवाइयों के प्रयोग से रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाया जा सकता है। 


हमारे दवाखाने पर पूर्व में आए कई बच्चे जिन्हें होम्योपैथी दवाइयों का सेवन कुछ माह तक उनके पालकों ने कराया। वे स्वयं ही बताते हैं कि पिछले कई वर्षों से उन बच्चों को सर्दी-जुकाम होता ही नहीं है। कई बच्चों को अस्थमा में होम्योपैथिक दवाइयों का प्रयोग २-३ वर्षों तक कराया जिससे इन्हेलर से छुटकारा एवं अस्थमा से भी पूरी तरह निजात मिल गई है। 


छोटे बच्चों को भी पथरी बन जाती है, जिन्हें कुछ माह तक होम्योपैथी दवाइयां देने से पथरी निकल भी जाती है तथा बार-बार पथरी का बनना भी बंद हो जाता है। बच्चों के स्वभाव के लिए होम्योपैथी से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता है, ऐसे बच्चे जो दिनभर रोते रहते हैं या चिड़चिड़ करते हैं, बात-बात पर गुस्सा करते हैं एवं पालकों की बात नहीं मानते हैं, उन्हें होम्योपैथिक दवाइयों की कुछ खुराक से ही पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है। होम्योपैथिक दवाइयों द्वारा याददाश्त एवं एकाग्रता को भी बढ़ाया जा सकता है। 

शिशु त्वचा की देखभाल




जन्म के समय शिशु की त्वचा नर्म, चिकनी और बेदाग होती है। जैसे-जैसे समय बीतता है, त्वचा को कई प्रकार के वातावरण का सामना करना पड़ता है, जिससे त्वचा की प्राकृतिक सुंदरता नष्ट हो जाती है। 


त्वचा का सौंदर्य क्षीण होने का मुख्य कारण है त्वचा की उपेक्षा और इसकी समुचित देखभाल नहीं करना। बच्चों की त्वचा कोमल होती है, इसलिए उसकी विशेष देखभाल की जरूरत होती है। त्वचा की देखभाल का मतलब सिर्फ चेहरे की त्वचा की देखभाल करना ही नहीं, बल्कि इसका अर्थ पूरे शरीर की त्वचा की सुरक्षा करना है। 


बच्चों को सॉफ्ट सोप से नहलाना चाहिए। सूखे मौसम में नहाने से पहले तेल मालिश करने से उनकी त्वचा नर्म और साफ रहती है। आयुर्वेद पद्धति मौसम के अनुरूप तेल के चयन की बात कहती है। जैतून, नारियल और सूरजमुखी के तेल गर्मियों के मौसम के लिए अच्छे हैं, जबकि सरसों और बादाम का तेल जाड़ों के मौसम में गुणकारी रहता है। 


तिल का तेल आयुर्वेदक मालिश के लिए बहुत लोकप्रिय है, क्योंकि यह तमाम दोषों में संतुलन बनाए रखने में सहायक है। आप अपने बच्चे के लिए इनमें से कोई भी तेल चुन सकती हैं, लेकिन सुनिश्चित कर लें कि यह शुद्ध हो। इसमें सुगंधित पुष्प के कुछ बूंदें, गुलाब या चंदन मिला सकते हैं। इससे प्राकृतिक सुगंध का एहसास होगा। 


अपने बच्चे के लिए बहुत ज्यादा सुगंधित या सुवासित तेलों का इस्तेमाल न करें, क्योंकि कुछ सुगंधों से त्वचा में एलर्जी या खुजली होने लगती है। असली तेलों में कुछ मिलाए बिना कभी उनका उपयोग नहीं करें। उन्हें जैतून या तिल के तेल जैसे अन्य तेलों के साथ मिला लें। 


कॉस्मेटिक का इस्तेमाल न करें




जब बच्चा छोटा हो तो क्रीम और कॉस्मेटिक्स का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। हाँ, त्वचा का रूखापन दूर करने के लिए इनका उपयोग किया जा सकता है। त्वचा की नमी बरकरार रखने के लिए हलका मॉइश्चराइजर उपयोग कर सकती हैं।




भारी क्रीम से बचें, क्योंकि वह रोमछिद्रों को बंद कर सकती है। खासकर उस समय तो इनके इस्तेमाल से बचें, जब बच्चा किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा हो। अगर बच्चे की त्वचा रूखी हो तो बेबीलोशन या क्रीम का इस्तेमाल जारी रखा जा सकता है। 


सप्ताह में एक बार दूध में बेसन मिलाकर पेस्ट बना लें। नहाने से पहले इस उबटन को हलके हाथों से बच्चे के शरीर पर रगड़ें। इससे त्वचा की भीतरी सफाई हो जाती है। 


किशोरावस्था से पहले यह ध्यान रखें कि त्वचा तैलीय तो नहीं है, ताकि जरूरत पडऩे पर सुरक्षात्मक उपाय किए जा सकें। अगर त्वचा पर चिकनाहट दिखने लगे तो गुलाबजल से चेहरे को रगड़कर साफ करें। 


दिन में चेहरे को दो बार से ज्यादा साबुन और पानी से नहीं धोएँ, क्योंकि इससे त्वचा क्षारीय (अल्कालाइन) बन जाती है, जिससे बैक्टीरिया सक्रिय होकर त्वचा को नुकसान पहुँचा सकते हैं। 


अनेक बच्चों के शरीर पर जन्म से ही घने बाल होते हैं, लेकिन आमतौर पर समय के साथ उनके बाल कम होते जाते हैं। यह तो स्पष्ट है कि बाल हटाने के तरीके बच्चों पर नहीं आजमाए जा सकते, लेकिन बेसन और दूध का उबटन शरीर पर रगडऩे से माना जाता है कि घने बालों की बढ़त थम जाएगी। त्वचा को निखारने में भी इससे मदद मिल सकती है। 


दही को त्वचा पर 15-20 मिनट तक लगाकर धोने से त्वचा में निखार आ जाता है। त्वचा का रंग ज्यादा मायने नहीं रखता। यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि त्वचा का स्वास्थ्य। त्वचा का स्वास्थ्य ही सुंदरता के लिए महत्वपूर्ण है। 
रुषों को भी होती है ब्यूटी ट्रीटमेंट की जरूरत

स्केर्ब से हटाएं मृत त्वचा


सुंदर दिखने की चाह केवल महिलाओं में ही नहीं होती, पुरुष भी चाहते हैं कि वे खूबसूरत नजर आएं। अब वो दौर नहीं है जब रफ एंड टफ रहना ही पुरुषों की पहचान होता है। इसलिए जितना जरूरी महिलाओं के लिए अपनी त्वचा की देखभाल करना होता है, पुरुषों के लिए भी अपनी त्वचा की देखभाल भी उतन‌ी ही जरूरी है।




आज बाजार में पुरुषों को खूबसूरत बनाने के ढेरों उत्पाद मौजूद हैं। सिर्फ शेव करने से ही चेहरा चमकाने का जमाना अब चला गया है आज दौर है 'हाय हैंडसम' और 'नंबर वन' नजर आने का। आज हर व्यक्ति युवा और बेदाग त्वचा पाने के लिए नॉन सर्जिकल उपचारों अर्थात बोटोक्स और जुवेडर्म फिलर्स जैसे उपचारों का विकल्प चुन रहे हैं। ऐसी एंटी-एजिंग तकनीकें इन दिनों ज्यादा लोकप्रिय हो रही हैं और इसका असर भी तुरंत दिखने को मिलता है। 


साबुन का ध्यान से करें चुनाव


पुरुषों को साबुन के चयन में महिलाओं से भी अधिक समझदारी बरतने की जरूरत होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि पुरुषों का सामना धूल, ऑयल और प्रदूषण से अधिक होता है। इसलिए त्वचा के प्रकार के हिसाब से साबुन का चुनाव करें। ऑयली स्किन के लिए फ्रूट या जेल बेस साबुन और ड्राइ स्किन के लिए क्रीम बेस साबुन लें।




यदि आप अपनी डल और रूखी त्वचा से परेशान हैं तो डेड स्किन, ब्लैक हैड्स और व्हाइट हैड्स रिमूव करने के लिए हफ्ते में कम से कम दो बार स्कर्ब करें। इससे चेहरे पर निखार तो आएगा साथ ही त्वचा भी जवां रहेगी। 


त्वचा को करें मॉश्चयराइज़


जैसा कि हम बात कर चुके हैं कि पुरुषों की त्वचा का सामना धूल और प्रदूषण से अधिक होता है इसलिए उनकी त्वचा की नमीं का खोना लाजिमी है। ऐसे में रोज सोने से पहले व नहाने के बाद उन्हें हल्के मॉश्चयराइजर का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए, ताकि त्वचा की नमी ना खोने पाए और आप फटी व रूखी त्वचा से बच पाएं।
सनस्क्रीन बने सेहत की छतरी


अक्सर लड़के बिना छाते या किसी कपड़े आदि की आड़ लिए सीधे धूप में निकल जाते हैं, वैसे भी उनका धूप में निकलना अधिक होता है। ऐसे में धूप से बचाव की जरूरत आपकी त्वचा को तो और अधिक होती है। सामान्यतः एसपीएफ 30 युक्त सनस्क्रीन आपकी त्वचा को धूप से बचाने में कारगर है। आप अपनी त्वचा के हिसाब से भी सनस्क्रीन का चुनाव कर सकते हैं।
पूरी बांह के कपड़े पहनें 


त्वचा को नुकसान और स्किन टैन न हो इसलिए गर्मियों में और तेज धूप में जाते समय हमेशा पूरी बांह की कोटन की शर्ट पहनें। ये न सिर्फ आपकी त्वचा को सुरक्षित रखते हैं बल्कि आरामदायक भी होते हैं। 


धूम्रपान को कहें न


सिगरेट आपकी सेहत के लिए बहुत नुकसानदेह होती है। सिगरेट पीने से सेहत पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का असर चेहरे पर भी साफ नजर आता है। साथ ही सिगरेट से चेहरे पर झुर्रियां पड़ने लगती हैं और होंठ भी काले हो जाते हैं।
फेशियल से चमकेगा चेहरा


चेहरे की चमक को बनाए रखने के लिए पुरूष भी महीने में एक बार फेशियल करवा सकते है, महिलाओं की तरह खास मौकों पर गोल्ड या पर्ल फेशियल ही कराएं। फेशियल करनाने से त्वचा की साफ सफाई भी होती रहती है।
शेव करने से पहले ध्यान दें


पुरूषों को कई बार शेव करने में ज्यादा दिक्कत होती है क्योकि उनकी त्वचा हार्ड होती है। इसलिए शेव करने से पहले नींबू का रस या शेविंग जेल लगाएं। इससे शेव आसानी से बन जाती है और साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि फोम का ज्यादा इस्तेमाल त्वचा को नुकसान पहुंचाता है।
पिंपल से मिलेगा छुटकारा


अगर आपके फेस पर पिंपल्स हैं तो नींबू और मुल्तानी मिट्टी को मिक्स करके लगाएं और साथ ही साथ काली मिर्च में शहद मिलाकर लगाने से भी फायदा होगा। अगर आपकी त्वचा तैलीय है तो टमाटर और नींबू का फेस पैक लगाए। इसके लिए एक टमाटर और नींबू का रस मिलाकर आंखों के हिस्से को छोड़कर पूरे चेहरे पर लगाएं।
दाग धब्बे यूं हटाएं


चेहरे पर झाइयां और दाग-धब्बे हैं तो इन्हें हटाने के लिए बेसन में मौसमी का जूस मिलाकर लगाने से फायदा होगा।
आटा का यह इस्तेमाल देखा है कभी


चेहरे की त्वचा को चिकनी और कोमल बनाए रखने के लिए जौ के आटे को फेस पैक के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं क्योंकि यह कुदरती तौर पर त्वचा को कोमल, गोरा और चमकदार बनाता है।

रात में क्यों रोते हैं बच्चे





बच्चे अकसर रोते हैं, हर उम्र में बच्चों का रोना आम बात है। छोटे बच्चों के रोने का कारण हैं कि वे अपनी बात को सही तरह से कह नहीं पाते, जिससे अपनी बात को कहने के लिए रोने का सहारा लेते हैं। बच्चों के रोने का कम्यूनिकेशन से गहरा ताल्लुक है इसीलिए आपके बच्चे अपनी बात कहने के लिए रोने का सहारा लेते हैं। 


वैसे बच्चे के रोने के और भी कई कारण हो सकते हैं जिसे आपको समझना चाहिए। लेकिन सवाल ये उठता है कि बच्चे रात में क्यों रोते हैं। अचानक बच्चे नींद में उठकर रोना क्यों शुरू कर देते हैं। आपके साथ भी कभी ऐसा अनुभव हुआ होगा आपका बच्चा अचानक नींद से जागकर रोना शुरू कर देता है। आपको बच्चों के सोने के पैटर्न को समझना चाहिए। इतना ही नहीं जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते जाएं आपको उन कारणों को भी जानना चाहिए कि आपके बच्चे के साथ ऐसा क्यों होता है। इतना ही नहीं बच्चे के स्वास्थ्य संबंधी सवालों के जवाब आपको पता होने चाहिए। ज्यादातर बच्चों के साथ ऐसा होता है कि वे नींद से जागकर रोने लगते हैं। ऐसा कई बच्चों के साथ बहुत ज्यादा होता है तो कईयों के साथ बहुत कम। आइए जानें बच्चे रात को क्यों रोते हैं। 


बच्चे नींद में क्यों रोते हैं


जब बच्चा इस दुनिया में जन्म लेता है तो वह अपने अनुभवों से दुनिया को महसूस करने लगता है। नया सीखने की प्रक्रिया में बच्चा चीजों को महसूस करने लगता है जिससे कई बार बच्चे को असहज भी महसूस होता है, नतीजन, बच्चा शुरूआती महीनों में अकसर नींद में असहज महसूस करता है। कई बार नवजात शिशुओं में छिकनें की समस्या होती है तो कई बच्चो के नींद में जगने की।




कई बार बच्चे के रोने का कारण शारीरिक परेशानियां होती है। इतना ही नहीं कई बार बच्चे के आसपास का तापमान बहुत गर्म या फिर बहुत ठंडा होता है जिससे बच्चे की नींद में खलल पडऩे लगता है और बच्चा नींद से जगकर रोने लगता है। 


कई बार बच्चे के सोने की जगह ठीक नहीं होती यानी बच्चा सोते हुए सहज नहीं होता तो भी बच्चा नींद से जगकर रोने लगता है। 


थोड़े बड़े बच्चे बहुत लंबे समय तक नहीं सो पाते जिससे बच्चों को जल्दी ही भूख भी लग जाती है इसीलिए आधी रात को बच्चों को भूख लग सकती है और बच्चे भूख के कारण रोने लगते हैं। हालांकि कई बार मां के दूध पीने के बाद बच्चा फिर से आराम से सो जाता है, ऐसा स्थिति में ये भी हो सकता है कि बच्चा तुरंत दोबारा ना सोएं। 


कई बार बच्चा बिस्तर गीला कर देता है तो भी बच्चा रोने लगता है तो कई बार ऐसी स्थिति आ जाती है कि बच्चे को नींद में ही पेशाब आता है जिससे वह असहज हो जाता है और नींद में ही जोर-जोर से रोने लगता है। हालांकि ऐसी स्थिति में आप बच्चे के लिए डाइपर का इस्तेमाल कर सकते हैं। बहुत लंबे समय तक या नींद में बच्चे को गीला डाइपर परेशान कर सकता है जिससे बच्चा नींद से उठकर रोने लगता है। 


कई बार बच्चे असुरक्षित या फिर अकेला महसूस करते हैं जिससे अपने आसपास मां को ना पाकर अचानक नींद में रोने लगते हैं। 


कई बार बच्चे को डरावने सपने दिखाई देते हैं जिससे बच्चा अचानक डर जाता है और एकदम नींद से उठकर रोने लगता है। 


इसी तरह के और भी कई कारण है जिससे बच्चा नींद में उठकर अचानक रोने लगता है। 

सर्दियों के दिन शिशुओं का स्वास्थ्य




अपने नवजात शिशु की देखभाल के लिए हर मां चिंतित रहती है और वह इसके लिए हर संभव कोशिश भी करती है। खास तौर से जब शिशु पहली बार सर्दी के मौसम का सामना कर रहा हो तो मां को भी कई बार समझ में नहीं आता कि वह अपने बच्चे को इस मौसम में होने वाली समस्याओं से कैसे बचाए। 


सर्दी के मौसम में वायरस और बैक्टीरिया बहुत तेजी से सक्रिय हो जाते हैं। नवजात शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता पूर्णत: विकसित नहीं होती। इसलिए ये वॉयरस बहुत तेजी से उनके शरीर पर हमला करते हैं। बच्चों के शरीर में मौजूद एंटी बॉडीज और बैक्टीरिया के बीच संघर्ष होता है तो इसी की प्रतिक्रियास्वरूप उन्हें सर्दी-जुकाम, बंद नाक, सांस लेने में तकलीफ, बुखार, गले और कान में इनफेक्शन जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं। बच्चों में होने वाली इस समस्या को सीजनल एफेक्टेड डिसॉर्डर (एसएडी) कहा जाता है। 


दरअसल सर्दी के मौसम को लेकर लोगों के मन में कई तरह की भ्रांतियां बनी हुई हैं। अकसर लोग ऐसा समझते हैं कि इस मौसम में बच्चे ज्यादातर बीमार ही रहते हैं, पर सच्चाई यह है कि यह मौसम स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा होता है। अगर आप इन बातों का ध्यान रखें तो इस मौसम में भी आपका शिशु स्वस्थ रहेगा। 


क्या करें 
शिशु की सफाई का पूरा ध्यान रखें। उसे प्रतिदिन गुनगुने पानी से नहलाएं। ऐसा सोचना गलत है कि नहलाने से बच्चों को सर्दी-जुकाम हो जाता है। 
अगर सर्दी-जुकाम के कारण बच्चे की नाक बंद हो तो एक ग्लास पानी उबाल कर उसे ठंडा करें और उसमें 1/4 टी स्पून नमक मिलाकर ड्रापर से दो-दो बूंद उसकी नाक में डालें। इससे उसकी बंद नाक आसानी से खुल जाएगी। 


ऐसी समस्या होने पर बच्चे को स्टीम देना भी उसके लिए फायदेमंद साबित होगा। 


आप शिशु के कमरे में रूम हीटर चलाती हैं तो वहां पानी से भरा बर्तन रखें, इससे कमरे में ऑक्सीजन व नमी का स्तर संतुलित रहता है। 
रात को सुलाते समय बच्चे को डॉयपर जरूर पहनाएं वरना देर तक गीले बिस्तर पर रहने से उसे सर्दी लग सकती है। 
सुबह की धूप शिशु की सेहत के लिए बहुत अच्छी होती है। इसमें विटमिन डी होता है, जो बच्चे के शरीर में कैल्शियम सोखने की क्षमता को बढाता है। अत: नवजात शिशु को सुबह थोडी देर के लिए धूप में जरूर लिटाना चाहिए। 
क्या न करें 
बच्चे को बहुत ज्यादा ऊनी कपडे न पहनाएं क्योंकि इससे पसीना आता है और पसीने की ठंडक के कारण उसे सर्दी-जुकाम हो सकता है। 
शिशु को सुलाते समय उसका चेहरा न ढके। इससे उसकी सांस घुट सकती है 
बच्चे के कमरे में लगातार रूम हीटर न चलाएं 
नहलाने के तुरंत बाद शिशु को खुली हवा में न ले जाएं। इससे उसे सर्दी-जुकाम हो सकता है। 
शाम को सूरज ढलने के बाद शिशु को साथ लेकर घर से बाहर खुली हवा में न निकलें। 
एक वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सिर की त्वचा बहुत कोमल होती है इसलिए उन्हें सीधे ऊनी कैप न पहनाएं बल्कि पहले सूती कपडे के टुकडे को स्कार्फ की तरह उसके सिर पर बांधने के बाद ही उसे ऊनी कैप पहनाएं। 
बच्चे को सर्दी-जुकाम या बुखार होने पर उसे बिना डॉक्टर की सलाह के कोई दवा न दें। 

बच्चे क्या खाएं, क्या ना खाएं











क्या खाएं




छोटे बच्चों के लिए मूल रुप से 5 पोषक तत्वों की ज़रुरत होती है। 


प्रोटीन - इसकी ज़रुरत बच्चों के शरीर के विकास और सामान्य वृद्धि के लिए है। प्रोटीन बच्चों को स्वस्थ और ताकतवर बनाता है। नीचे लिखे खाद्य पदार्थों में प्रोटीन उपलब्ध होता है, दालें, सोयाबीन, दही, चीज़, दूध और अंडा। 


फायबर - सब्जिय़ों और फलों में पाए जाने वाले पोषक तत्व और रेशे (फायबर) शरीर को अंदरूनी और बाहरी तौर पर स्वस्थ रखने के लिए सख्त ज़रूरी है। जहां तक हो सके, खाने में अधिक से अधिक रंगों के फल और सब्जिय़ां होनी चाहिए। 


कार्बोहाइड्रेट्स - ये शरीर को उर्जा प्रदान करते हैं। बच्चों को दिन भर की भागदौड़ के लिए उर्जा की सख्त ज़रूरत होती है। नीचे लिखे खाद्य पदार्थों में कार्बोहाइड्रेड्स होते हैं- रोटी, आटे की ब्रेड, पास्ता, चावल, आलू 


गुड फैट्स - ये दिमाग और तंत्रिकाओं की कोशिका को बनाने के लिए ज़रूरी है। खाद्य पदार्थ, जिनमें गुड फेट्स होते हैं, वो इस प्रकार हैं - मूंगफली, सूखे मेवे, हरी पत्तेदार सब्जिय़ां, सूर्यमुखी और मूंगफली का तेल। 


पानी - हमारा 80 प्रतिशत शरीर पानी से बना है। बच्चों के शरीर की ज़रुरत पूरी करने का ये सबसे सस्ता और अच्छा ज़रिया है। ज़्यादातर पानी में फ्लोराइड होता है, जो बच्चों के मजबूत दांतों के लिए ज़रूरी है। 


क्या न खाएं




अधिक नमक, शक्कर, कैफीन मिली चीज़ें - बच्चों का शरीर इन्हें नहीं अपनाता। ज़्यादा नमक, बच्चों की किडनी के लिए सही नहीं है और कोल्ड्रिंक में कैफीन होता है। कोल्ड्रिंक से बच्चों के दांत खराब होते हैं। 


फास्ट फूड और जंक फूड - चिप्स, मैदे के बिस्किट्स, केक, अधिक शक्कर की मिठाईयां, चॉकलेट्स, तला हुआ खाना इनके अंतर्गत आते हैं। इन सभी में फायबर और न्यूट्रिएंट्स बहुत ही कम मात्रा में होते हैं, जबकि शक्कर और बुरे फैट्स ज़्यादा होते हैं। 

मिथ्स और फैक्ट्स







जल्दी-जल्दी धोने पर बाल टूटेंगे


सिर को गंदा रखने पर ज्यादा बाल झड़ते हैं जबकि नियमित शैंपू करने पर कम। जो लोग एसी में रहते हैं, वे हफ्ते में दो-तीन बार शैंपू करें। जो बाहर का काम करते हैं या जिन्हें पसीना ज्यादा आता है, उन्हें रोजाना बाल धोने चाहिए।
हर्बल शैंपू में डिटर्जेंट नहीं


जो शैंपू झाग देता है, उसमें डिटर्जेंट जरूर होता है। हर्बल शैंपू भी इसका अपवाद नहीं है। रीठा, शिकाकाई और मेहंदी का मिक्सचर घर में बनाकर लगाएं। कई शैंपू एक्स्ट्रा प्रोटीन होने का दावा करते हैं। बाल धोने के दौरान शैंपू का प्रोटीन बालों के अंदर नहीं जाता। बालों को प्रोटीन की जरूरत है, लेकिन वह खुराक से मिलता है।
कंडीशनर का इस्तेमाल


शैंपू करने के बाद बहुत से लोग कंडीशनर नहीं लगाते। उन्हें लगता है कि इससे बाल कमजोर हो जाते हैं। यह गलत है। कंडीशनर से बालों की चमक बनी रहती है और वे उलझते नहीं हैं।
जुकाम से टूटते हैं बाल


जुकाम से बाल टूटने की भ्रांति बहुत लोगों में होती है। असल में इससे पीडित लोग ज्यादातर दवाएं खाते रहते हैं और उनकी सेहत ठीक नहीं होती। इस वजह से कई बार बाल गिरने लगते हैं।
गंजे होने से ग्रोथ तेज


कई लोग अपने बालों को बहुत छोटा करा देते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसा करने से बालों का झडऩा कम हो जाएगा और नए बाल ज्यादा तादाद में आएंगे। यह सोच बिल्कुल गलत है। गंजा होने से बालों की ग्रोथ तेज नहीं होती।
बाल उखाडऩे से सफेद होते हैं


अक्सर लोग सफेद बाल उखाडऩे से मना करते हैं क्योंकि उनका मानना होता है कि अगर एक बाल उखाड़ेंगे, तो उसकी जड़ से द्रव निकलेगा, जो आसपास के बालों को भी सफेद कर देगा। यह गलत है।
क्या कहता है आयुर्वेद


आयुर्वेद बाल धोने के बाद तेल लगाने की हिमायत करता है। महाभृंगराज या ब्राह्मी तेल से बालों को अच्छा पोषण मिलता है। इसमें त्रिफला होता है, जो बालों की सेहत के लिए अच्छा है। महाभृंगराज तेल से बालों का कालापन भी बढ़ता है, हालांकि यह सफेद बाल काले नहीं कर सकता।आयुर्वेद के मुताबिक हफ्ते में एक-दो बार तेल लगाकर अच्छी तरह सिर की मसाज करें। मसाज किसी भी तेल से कर सकते हैं लेकिन आंवला, ऑलिव, नारियल या तिल का तेल अच्छा है। रात भर तेल रखकर सुबह किसी अच्छे हर्बल शैंपू से बाल धो लें। इसके बाद एक लोशन लगाएं। इसे बनाने के लिए गेहूं के पत्ते, दूर्वा घास, अरबी के पत्ते, गुड़हल के पत्ते, नीबू के छिलके, संतरे के छिलकों को थोड़ा-थोड़ा लें और पानी में उबाल लें। पानी को छानकर बालों की जड़ों में हल्के हाथों से लगाएं और धीरे-धीरे मसाज करें। पांच मिनट के लिए लगा रहने दें और पानी से सिर धो लें।
खुराक


ऐसी चीजों से परहेज करना चाहिए, जिनसे सर्दी, जुकाम होता है। सॉस, सिरका, अचार, नमक और खट्टी चीजें कम खाएं। बादाम, दूध, दही, घी, मक्खन का सेवन संतुलित मात्रा में करें।


ऐसे करें शैंपू


पहले बालों को गीला करें। फिर थोड़े पानी में घोलने के बाद शैंपू को बालों और स्किन पर लगाएं। झाग बनाते या बालों को रगड़ते समय उन्हें उलझाएं नहीं, न ही ज्यादा रगड़ें। शैंपू 3-4 मिनट तक लगाकर रखना चाहिए। शैंपू को अच्छी तरह साफ करने के बाद कंडीशनर लगाएं। एक मिनट तक लगाए रखने के बाद कंडीशनर को अच्छी तरह से धो डालें। इसमें शैंपू से भी ज्यादा सावधानी बरतें। गीले बालों को न तो बहुत तेजी से झटक कर सुखाएं और न ही तौलिए से रगड़कर पोंछें। ध्यान रखें कि इस स्टेज में बाल सबसे ज्यादा सॉफ्ट और कमजोर होते हैं। बाल धोने के बाद उन्हें तौलिए से हल्के से साफ करें या तौलिए को बांधकर छोड़ दें। गीले बालों में कंघी भी न करें। बारीक कंघी के इस्तेमाल से बचें। लंबे बालों में कंघी करते हुए पहले आधे बालों को कंघी करें, ताकि आसानी से सुलझ जाएं।

कैसे पाएं रेशमी जुृल्फें





आजकल की भागदौड़ और बिज़ी लाइफस्टाइल की वजह से आखिर कितनी ऐसी औरते हैं, जो अपने बालों को लंबा और रेशमी करने की सोंच सकती हैं लंबे बाल पाने के लिये खान-पान और उनकी केयर करने की आवश्यकता होती है, जो कि हर किसी के बस की बात नहींहोती। लेकिन अगर आप हमारे बताए गए इन तरीको को आजमाएंगी तो आपके भी बाल लंबे और घने हो सकते हैं। 


बालों में तेल लगाएं


अगर बाल बढाना है तो उसमें तेल लगाना होगा। बालों में तकरीबन 1 घंटे के लिये तेल लगा रहने दें जिससे बालों की जड़ तेल को पूरी तरह से सोख ले। सिर पर हल्के गरम तेल से मालिश करें और गरम पानी में डुबोई हुई तौलिये से सिर ढंक कर भाप लें।
बादाम का तेल


जल्दी बाल बढाने के लिये कोई भी तेल कारगर नहीं होता। इसके लिये सबसे अच्छा तेल बादाम का होता है। बादाम के तेल में विटामिन ई भारी मात्रा में पाया जाता है।
हेल्दी खाएं


बालों के लिये कुछ आहार बहुत अच्छे होते हैं जैसे, हरी सब्जियां, बादाम, मछली, नारियल आदि। इनको अपनी डाइट में शामिल करें और लंबे बाल पाएं।
ट्रिम करवाएं


बालों को तीन महीने पर एक बार जरुर ट्रिम करवाएं, जिससे दोमुंहे बालों से निजात मिले। बालों को ट्रिम करवाने से बाल जल्दी जल्दी बढते हैं।
ड्रायर और अन्य मशीनों से दूर रहें


ब्लो ड्रायर या फिर बालों को कर्ली करने वाली मशीनों से दूर रहें क्योंकि इससे बाल खराब हो जाते हैं। अगर आपके बाल लंबे हैं तो उसे सुखाने के लिये धूप में पांच मिनट तक खड़ी हो जाएं लेकिन ड्रायर का प्रयोग ना करें।
रोजाना धुलाई


जिस तरह से बालों में तेल लगाना जरुरी है उसी तरह से बालों की सफाई और धुलाई भी बहुत जरुरी है। अगर आपके बाल लंबे हैं तो उन्हें हफ्ते में दो बार जरुर धोएं। आपके सिर की सफाई बहुत जरुरी है जिससे जड़ों को सांस लेने की जगह मिल सके।
बांध कर रखें


लंबे बालों को प्रदूषण, धूल मिट्टी और हवा से बचाना चाहिये। अगर आप कहीं सफर पर निकल रहीं हैं तो अच्छा होगा कि बालों को बांध लें या फिर जूडा बना लें।

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