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न खोल दिल हर शख्स के सामने,


न खोल दिल हर शख्स के सामने,
हर कोई यँहा आईना तो नही होता...

जरूरी तो नही सब समझ सकें दर्द,
सभी का दर्द से राब्ता तो नही होता..


आईने आर- पार भी दिखाते हैं कुछ ,
यूँ नुमाइश करना भी सही नही होता...

फर्क न भी पता हो काँच और आईने में,
पर उन्हें तोड़ के पता करना नही होता..

हर टुकड़ा तेरे हाथ के पत्थर की गवाही
न दे ये डर कभी ज़ाहिर करना नहीं होता...

ये टूट कर भी तेरे इर्द -गिर्द बिखर जाएँगे,
इन्हें समेट के हटाना भी आसां नही होता..






कल एक झलक ज़िंदगी को देखा,
वो राहों पे मेरी गुनगुना रही थी,

फिर ढूँढा उसे इधर उधर
वो आँख मिचौली कर, मुस्कुरा रही थी,


एक अरसे के बाद आया मुझे क़रार,
वो सहला के मुझे सुला रही थी,

हम दोनों क्यूँ ख़फ़ा हैं एक दूसरे से
मैं उसे और वो मुझे समझा रही थी,

मैंने पूछ लिया-
क्यों इतना दर्द दिया कमबख़्त तूने,

वो हँसी और बोली- मैं ज़िंदगी हूँ...
तुझे जीना सिखा रही थी.....




हम न कहते थे एक सुबह कुछ कमी सी खलेगी,
मन को टटोलोगे तो कुछ यादों की नमी मिलेगी।

इस अहसास को तन्हाई में बैठ महसूस करना तुम,
देखना ये नन्ही बूंदों में तब्दील हो के बह निकलेगी।


इससे पहले कि मन की जमी सूख के बंजर हो जाये,
कोई नया बीज बो दोगे तो नई उम्मीद फिर से खिलेगी।

लाख चाहो सितारों की गोद मे पनाह ले के सो जाना,
जब तक ज़िन्दगी है हमे जगह इस ज़मी पे ही मिलेगी।

चाँद सितारों को छूने की किसे चाह नही इस जँहा में ,
पर इनकी चमक तो निहारने भर को ही मिल सकेगी।


एक तितली मायूस सी बैठी हुई थी।पास ही से एक और तितली उड़ती हुई आई। उसे उदास देखकर रुक गई और बोली - क्या हुआ? उदास क्यों इतनी लग रही हो?
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वह बोली - मैं एक फूल के पास रोज जाती थी। हमारी आपस में बहुत दोस्ती थी। बड़ा प्रेम था। पर अब उसके पास समय ही नहीं है मेरे लिए। वह तो बहुत व्यस्त हो गया है।

दूसरी तितली बोली - वह व्यस्त हो गया है तो तेरे पास तो समय है न तू तो जा सकती है। तू गई?

मैं क्यों जाऊँ? जब अब उसे मेरी ज़रूरत नहीं में क्यों जाऊँ?

तितली बोली - पगली ! तू कैसे कह सकती है कि उसे तेरी ज़रूरत नहीं। अनुमान क्यों लगाती है? क्या पता वह तेरा ही उस भीड़ में इंतज़ार करता हो।

तितली के आँसू निकल आए। उसने अपनी सखी को गले लगाया और गई अपने मित्र से मिलने।
फूल बोला - कहाँ रही इतने दिन ! मेरा बिल्कुल मन नहीं लगा तुम्हारे बिन !! कहाँ थी ??

तितली मुस्कुराई और बोली कहीं नहीं रास्ता गुम हो गया था।

प्रेम लेने का मन करे तो प्रेम दे दो। किसी से बात करने का मन करे तो बात कर लो। दूसरे का इंतज़ार न करो। कुछ पता नहीं दूसरा भी इंतज़ार कर रहा हो।

प्रभु हमसे प्रेम करें या प्रभु हमसे पहले प्रेम करें,यह सोचने की बजाय उनसे पहले ही प्रेम करना प्रारम्भ कर दो। उनके प्रेम के इंतज़ार में नहीं, अपितु उनसे लाड प्यार करने में समय व्यतीत करो।प्यार देने में अलग आनन्द है ..और प्यार लेने में अलग।
अनकही......
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इच्छाये अनन्त ना हो
आशाये अतृप्त ना हो ,
है ऐसी कोई विधा नही 
जहाँ जीवन हो बदलाव नही ,
मन की चंचलता रुक जाये
शाखों पर अब गुल ना आये ,
आँखों में स्वप्न ना हो कोई
तन जीवित और मन मर जाये,
हम कोर उठा कर आँचल का
नयनो से आंसू चुरा रहे ,
वो बात कहे कैसे उनसे
जिन पर खुद हमको ही ,
ऐतबार ना हो
एक बून्द नई शबनम की है ,
एक कली अभी अधखिली सी है
सौ बात हुयी मेरी उनसे ,
एक बात मगर, अनकही सी है।

मक्कार
वादों के ,इरादों के ,रस्मो के ,रिवाज़ों के ,
हम देखते है बदले किस्से इन समाजो के
खुद मंजनू के हाथो में ,लैला के कटे सिर है,
हीरों ने जहर दे कर खुद ही ,राँझों को सुलाया है 
इश्क़ के हाथो में अब ,धोखो का ख़ंजर है ,
खुदगर्ज़ी का नशा इस, नस्ल पे छाया है
है जुर्म इश्क़ करना ,है पाप वफ़ा करना ,
कसमो को निभाना और उल्फत है गुनाह, करना
टुकड़ो में टूट कर रोता था, सिसकता था,
दिल शीशा नही है अब वो , श्रगाल (सियार)बन गया है
मासूम नही अब ये मक्कार बन गया है,
रोता नही है अब ये रणनीति बनाता है
अपने शिकार को ये वादों से फसाता है ,
ऐतबार का कत्ल कर ये बस जीत ही के आता है।

किसी रंजिश को हवा दो कि मैं जिंदा हूँ अभी
मुझको अहसास दिला दो कि मैं जिंदा हूँ अभी
मेरे रुकने से सांसे भी रुक जायेगी
फासले और बढ़ा दो कि मैं जिंदा हूँ अभी
जहर पीने की तो आदत थी जमाने वालों 
अब कोई और दवा दो मैं जिंदा हूँ अभी
चलती राहों में मैं यूँ ही आँख लग गयी है
भीड़ लोगों की हटा दो कि मैं जिंदा हूँ अभी
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एक सच्चाई बची तुमको बतानेके लिए
छोड़ना होगा ज़मीं को चाँद पाने के लिए
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दे रहा है कौन दस्तक आज दिल के द्वार पर
आप तो आये न होंगे ज़ुल्म ढाने के लिए
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अश्क आँखों में न ठहरें तो कहो जायें कहाँ
वक़्त ने फ़ुर्सत न दी रोने रुलाने के लिए
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एक लम्हे की मुहब्बत ने खिलाये गुल कई
उम्र भर तरसा किये हम मुस्कुराने के लिए
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हाथ में लेकर मशालें चल पड़ी है भूख फिर
इन्क़िलाबों का नया सैलाब लाने के लिए
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मौत से बदतर रहे हालात सारी ज़िंदगी
मैं न थी तैयार हरगिज़ जहर खाने के लिए

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अपने आप को मिटाना चाहती हूँ
गले मौत को लगाना चाहती हूँ !!

अपनी नज़र में नहीं आना मझको 
खुदी को कहीं छुपाना चाहती हूँ !!

बहुत ही गंवाया है हमने खुद को
अपने आप को कमाना चाहती हूँ !!

अपना पता दे दे मुझको बेखुदी
मैं कहीं दूर बहुत जाना चाहती हूँ !!

हमसे फ़िर कोई गुनाह न हो जाये
बर्सो बाद मैं मुस्कराना चाहती हूँ !!
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पिया रूठे तो भाग्य रूठा हुआ सा लगता है 
हर सुलह के बाद प्रेम फिर नया नया सा लगता है
किस तरह समझाऊँ वज़ूद पर छाए हो कैसे 
महकते लोबान का उड़ता धुँआ सा लगता है

जो तुम आस पास हो तो मुश्किलें आसान
तुम से जुदा हर लम्हा बंजर सा लगता है
तुम्हारी सोहबत में वो शोखियां हासिल कि
दुनिया की भीड़ में ये रिश्ता ही अपना लगता है

जमाने भर की शिकायतें तुम्ही से है मुझको
मगर संग तुम्हारा ख़ालिश सोना सा लगता है
दुआ, सज़दे , धागे , फ़रियाद , व्रत में तुम
तुम बिन शाम का सिंदूरी सूरज भी अधूरा लगता है

दिल लुभाने वाली शहद बातें नही आती तुमको
लेकिन तुम्हारा मुस्कुराना भी मनुहार लगता है
किस तरह समझाऊँ छाए हो वज़ूद पर कैसे
महकते लोबान का उड़ता धुँआ सा लगता है

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*कुछ ख्वाइशों का कत्ल करके मुस्कुरा दो*

*जिंदगी खुद ब खुद बेहतर हो जायेगी :
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● #ब्रांड ●
"वो फ्रॉक ..? दिखा तो दूँगा पर क्या तुम ले पाओगी ?" उस शोरूम का सेल्समेन कुछ अनिच्छा प्रकट करता सा व्यंग्यपूर्ण मुस्कान के साथ बोला उस औरत से जो अपने छोटे बच्चे को गोद में लिए खड़ी थी
"दिखाओ .." संगीता के स्वर में दृढ़ता थी | 
उसकी मेमसाब की बेटी पिंकी की बर्थडे थी और उसकी इच्छा थी कि वो उसे बढ़िया से बढ़िया फ्रॉक गिफ्ट करे जिसे कि मेमसाब उसे वास्तव में पहनाए, किसी ओर को न दे दे | जैसे पिछली बार उसने एक खिलौने वाली कार दी थी तो उसे मेमसाब ने बंगले के माली हरिया की पोती को दे दी थी | उसने हरिया की पोती को उस कार से खेलते देखा तो उसे बड़ा अफसोस हुआ था |
उसके पति मोहन ने तब समझाया था कि कार उसकी नजर में तो महंगी थी लेकिन मेमसाब की बिटिया के लायक नहीं थी क्योंकि उसने उस दुकान से खरीदी थी जहाँ से वो अपने बेटे राजू के खिलौने लेती थी , बड़े लोग बड़ी दुकानों से बड़ी ब्रांड की चीजें खरीदते हैं और सारी महिमा ब्रांड की है |
वो उस दिन उसी ब्रांडेड शोरूम में गई थी जहाँ से मेमसाब पिंकी के कपड़े खरीदा करती थी | उस फ्रॉक की कीमत सुन कर उसका कलेजा मुँह को आ गया था लेकिन फिर भी लगभग अपने एक महीने की तनख्वाह लगा कर भी उसने वो फ्रॉक खरीद ली थी और अगले दिन बर्थडे पार्टी में बहुत उत्साह से गई थी और सर्वेंट्स लाईन में खड़ी होकर अपनी बारी आने पर पिंकी को वो गिफ्ट दिया था |
आज लगभग तीन दिन बाद जब वो शुबह की चाय लेकर मेमसाब के कमरे में घुसने ही वाली थी कि अंदर से मेमसाब की मोबाइल पर बात करने की आवाज सुनकर ठिठक गई
"हाँ मेहरा जी ! यह फ्रॉक मेरी घरेलू मेट ने दी थी ..आपके शोरूम से ही ली हुई है .... कितनी भी महंगी हो पर भला बताइये घरेलू नौकरानी की दी हुई फ्रॉक तो बच्ची को पहनाने से रही ...."
"हाहाहा ... अब पता नहीं इतने पैसे कहाँ से लाई ..छोड़िये ये चेप्टर ..मैने आपकी वाट्सएप की हुई ड्रेसेज में से दो सलेक्ट करके वापिस भेजी है ..इस फ्रॉक के बदले में वो दोनों ड्रेसेज भेज दीजिये और बाकी पैसे एकाउंट में जमा रखिए .
संगीता को लगा वो बुरी तरह से ठगी गई थी | उसकी आंखें डबडबा आई थी ..उसे आज पता लग गया था कि गिफ्ट के ब्रांड का मूल्यांकन उसके सस्ता या महंगा होने से नहीं बल्कि देने वाले की हैसियत से होता है ..

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औरत को आईने में यूं उलझा दिया गया
बखान करके हुश्न को बहला दिया गया

ना हक दिया जमीन का न घर कहीं दिया
गृहस्वामिनी के नाम का रुतबा दिया गया

छूती रही जब पांव परमेश्वर पति को कह
फिर कैसे इनको देवी गृहलक्ष्मी बना दिया

चलती रहे चक्की और जलता रहे चूल्हा
इसलिए औरतों को अन्नपूर्णा बना दिया

न बराबर का हक मिले न चूं ही कर सकें
इसलिए इनको पूज्य देवि दुर्गा बना दिया

ए डॉक्टर इंजीनियर वैज्ञानिक भी हो गईं
पर घर के चूल्हों ने फिर औरत बना दिया

चाँदी सोने की हथकड़ी, नकेल, बेड़ियां
कंगन, पांजेब, नथनियां जेवर बना दिया

व्यभिचार लार आदमी जब रोक ना सका
सृंगार साज वस्त्र पर तोहमत लगा दिया

खुद नंग धड़ंग आदमी घुमत है रात दिन
औरत की टांग क्या दिखी नंगा बता दिया

नारी ने जो ललकारी इस दानव प्रवृत्ति को
जिह्वा निकाल रक्त प्रिय काली बना दिया

नौ माह खुन सिंच के बचपन जवां किया
बेटों को नाम बाप का चिपका दिया गया

औरत पिलाइ दुध थी सीने को गार कर
उस दुध का समाज ने कैसा ए हक दिया

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#एक_अनोखा_तलाक........जरूर पढ़े
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हुआ यों कि पति ने पत्नी को किसी बात पर तीन थप्पड़ जड़ दिए, पत्नी ने इसके जवाब में अपना सैंडिल पति की तरफ़ फेंका, सैंडिल का एक सिरा पति के सिर को छूता हुआ निकल गया।

मामला रफा-दफा हो भी जाता, लेकिन पति ने इसे अपनी तौहिनी समझी, रिश्तेदारों ने मामला और पेचीदा बना दिया, न सिर्फ़ पेचीदा बल्कि संगीन, सब रिश्तेदारों ने इसे खानदान की नाक कटना कहा, यह भी कहा कि पति को सैडिल मारने वाली औरत न वफादार होती है न पतिव्रता।

इसे घर में रखना, अपने शरीर में मियादी बुखार पालते रहने जैसा है। कुछ रिश्तेदारों ने यह भी पश्चाताप जाहिर किया कि ऐसी औरतों का भ्रूण ही समाप्त कर देना चाहिए।

बुरी बातें चक्रवृत्ति ब्याज की तरह बढ़ती है, सो दोनों तरफ खूब आरोप उछाले गए। ऐसा लगता था जैसे दोनों पक्षों के लोग आरोपों का वॉलीबॉल खेल रहे हैं। लड़के ने लड़की के बारे में और लड़की ने लड़के के बारे में कई असुविधाजनक बातें कही।
मुकदमा दर्ज कराया गया। पति ने पत्नी की चरित्रहीनता का तो पत्नी ने दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया। छह साल तक शादीशुदा जीवन बीताने और एक बच्ची के माता-पिता होने के बाद आज दोनों में तलाक हो गया।

पति-पत्नी के हाथ में तलाक के काग़ज़ों की प्रति थी।
दोनों चुप थे, दोनों शांत, दोनों निर्विकार।
मुकदमा दो साल तक चला था। दो साल से पत्नी अलग रह रही थी और पति अलग, मुकदमे की सुनवाई पर दोनों को आना होता। दोनों एक दूसरे को देखते जैसे चकमक पत्थर आपस में रगड़ खा गए हों।

दोनों गुस्से में होते। दोनों में बदले की भावना का आवेश होता। दोनों के साथ रिश्तेदार होते जिनकी हमदर्दियों में ज़रा-ज़रा विस्फोटक पदार्थ भी छुपा होता।

लेकिन कुछ महीने पहले जब पति-पत्नी कोर्ट में दाखिल होते तो एक-दूसरे को देख कर मुँह फेर लेते। जैसे जानबूझ कर एक-दूसरे की उपेक्षा कर रहे हों, वकील औऱ रिश्तेदार दोनों के साथ होते।

दोनों को अच्छा-खासा सबक सिखाया जाता कि उन्हें क्या कहना है। दोनों वही कहते। कई बार दोनों के वक्तव्य बदलने लगते। वो फिर सँभल जाते।
अंत में वही हुआ जो सब चाहते थे यानी तलाक ................

पहले रिश्तेदारों की फौज साथ होती थी, आज थोड़े से रिश्तेदार साथ थे। दोनों तरफ के रिश्तेदार खुश थे, वकील खुश थे, माता-पिता भी खुश थे।

तलाकशुदा पत्नी चुप थी और पति खामोश था।
यह महज़ इत्तेफाक ही था कि दोनों पक्षों के रिश्तेदार एक ही टी-स्टॉल पर बैठे , कोल्ड ड्रिंक्स लिया।
यह भी महज़ इत्तेफाक ही था कि तलाकशुदा पति-पत्नी एक ही मेज़ के आमने-सामने जा बैठे।

लकड़ी की बेंच और वो दोनों .......
''कांग्रेच्यूलेशन .... आप जो चाहते थे वही हुआ ....'' स्त्री ने कहा।
''तुम्हें भी बधाई ..... तुमने भी तो तलाक दे कर जीत हासिल की ....'' पुरुष बोला।

''तलाक क्या जीत का प्रतीक होता है????'' स्त्री ने पूछा।
''तुम बताओ?''
पुरुष के पूछने पर स्त्री ने जवाब नहीं दिया, वो चुपचाप बैठी रही, फिर बोली, ''तुमने मुझे चरित्रहीन कहा था....
अच्छा हुआ.... अब तुम्हारा चरित्रहीन स्त्री से पीछा छूटा।''
''वो मेरी गलती थी, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था'' पुरुष बोला।
''मैंने बहुत मानसिक तनाव झेली है'', स्त्री की आवाज़ सपाट थी न दुःख, न गुस्सा।

''जानता हूँ पुरुष इसी हथियार से स्त्री पर वार करता है, जो स्त्री के मन और आत्मा को लहू-लुहान कर देता है... तुम बहुत उज्ज्वल हो। मुझे तुम्हारे बारे में ऐसी गंदी बात नहीं करनी चाहिए थी। मुझे बेहद अफ़सोस है, '' पुरुष ने कहा।

स्त्री चुप रही, उसने एक बार पुरुष को देखा।
कुछ पल चुप रहने के बाद पुरुष ने गहरी साँस ली और कहा, ''तुमने भी तो मुझे दहेज का लोभी कहा था।''
''गलत कहा था''.... पुरुष की ओऱ देखती हुई स्त्री बोली।
कुछ देर चुप रही फिर बोली, ''मैं कोई और आरोप लगाती लेकिन मैं नहीं...''

प्लास्टिक के कप में चाय आ गई।
स्त्री ने चाय उठाई, चाय ज़रा-सी छलकी। गर्म चाय स्त्री के हाथ पर गिरी।
स्सी... की आवाज़ निकली।
पुरुष के गले में उसी क्षण 'ओह' की आवाज़ निकली। स्त्री ने पुरुष को देखा। पुरुष स्त्री को देखे जा रहा था।
''तुम्हारा कमर दर्द कैसा है?''
''ऐसा ही है कभी वोवरॉन तो कभी काम्बीफ्लेम,'' स्त्री ने बात खत्म करनी चाही।

''तुम एक्सरसाइज भी तो नहीं करती।'' पुरुष ने कहा तो स्त्री फीकी हँसी हँस दी।
''तुम्हारे अस्थमा की क्या कंडीशन है... फिर अटैक तो नहीं पड़े????'' स्त्री ने पूछा।
''अस्थमा।डॉक्टर सूरी ने स्ट्रेन... मेंटल स्ट्रेस कम करने को कहा है, '' पुरुष ने जानकारी दी।

स्त्री ने पुरुष को देखा, देखती रही एकटक। जैसे पुरुष के चेहरे पर छपे तनाव को पढ़ रही हो।
''इनहेलर तो लेते रहते हो न?'' स्त्री ने पुरुष के चेहरे से नज़रें हटाईं और पूछा।
''हाँ, लेता रहता हूँ। आज लाना याद नहीं रहा, '' पुरुष ने कहा।

''तभी आज तुम्हारी साँस उखड़ी-उखड़ी-सी है, '' स्त्री ने हमदर्द लहजे में कहा।
''हाँ, कुछ इस वजह से और कुछ...'' पुरुष कहते-कहते रुक गया।
''कुछ... कुछ तनाव के कारण,'' स्त्री ने बात पूरी की। 


पुरुष कुछ सोचता रहा, फिर बोला, ''तुम्हें चार लाख रुपए देने हैं और छह हज़ार रुपए महीना भी।''
''हाँ... फिर?'' स्त्री ने पूछा।
''वसुंधरा में फ्लैट है... तुम्हें तो पता है। मैं उसे तुम्हारे नाम कर देता हूँ। चार लाख रुपए फिलहाल मेरे पास नहीं है।'' पुरुष ने अपने मन की बात कही।

''वसुंधरा वाले फ्लैट की कीमत तो बीस लाख रुपए होगी??? मुझे सिर्फ चार लाख रुपए चाहिए....'' स्त्री ने स्पष्ट किया।
''बिटिया बड़ी होगी... सौ खर्च होते हैं....'' पुरुष ने कहा।
''वो तो तुम छह हज़ार रुपए महीना मुझे देते रहोगे,'' स्त्री बोली।
''हाँ, ज़रूर दूँगा।''
''चार लाख अगर तुम्हारे पास नहीं है तो मुझे मत देना,'' स्त्री ने कहा।
उसके स्वर में पुराने संबंधों की गर्द थी।

पुरुष उसका चेहरा देखता रहा....
कितनी सह्रदय और कितनी सुंदर लग रही थी सामने बैठी स्त्री जो कभी उसकी पत्नी हुआ करती थी।
स्त्री पुरुष को देख रही थी और सोच रही थी, ''कितना सरल स्वभाव का है यह पुरुष, जो कभी उसका पति हुआ करता था। कितना प्यार करता था उससे...

एक बार हरिद्वार में जब वह गंगा में स्नान कर रही थी तो उसके हाथ से जंजीर छूट गई। फिर पागलों की तरह वह बचाने चला आया था उसे। खुद तैरना नहीं आता था लाट साहब को और मुझे बचाने की कोशिशें करता रहा था... कितना अच्छा है... मैं ही खोट निकालती रही...''

पुरुष एकटक स्त्री को देख रहा था और सोच रहा था, ''कितना ध्यान रखती थी, स्टीम के लिए पानी उबाल कर जग में डाल देती। उसके लिए हमेशा इनहेलर खरीद कर लाती, सेरेटाइड आक्यूहेलर बहुत महँगा था। हर महीने कंजूसी करती, पैसे बचाती, और आक्यूहेलर खरीद लाती। दूसरों की बीमारी की कौन परवाह करता है? ये करती थी परवाह! कभी जाहिर भी नहीं होने देती थी। कितनी संवेदना थी इसमें। मैं अपनी मर्दानगी के नशे में रहा। काश, जो मैं इसके जज़्बे को समझ पाता।''

दोनों चुप थे, बेहद चुप।
दुनिया भर की आवाज़ों से मुक्त हो कर, खामोश।
दोनों भीगी आँखों से एक दूसरे को देखते रहे....

''मुझे एक बात कहनी है, '' उसकी आवाज़ में झिझक थी।
''कहो, '' स्त्री ने सजल आँखों से उसे देखा।
''डरता हूँ,'' पुरुष ने कहा।
''डरो मत। हो सकता है तुम्हारी बात मेरे मन की बात हो,'' स्त्री ने कहा।
''तुम बहुत याद आती रही,'' पुरुष बोला।
''तुम भी,'' स्त्री ने कहा।
''मैं तुम्हें अब भी प्रेम करता हूँ।''
''मैं भी.'' स्त्री ने कहा।

दोनों की आँखें कुछ ज़्यादा ही सजल हो गई थीं।
दोनों की आवाज़ जज़्बाती और चेहरे मासूम।
''क्या हम दोनों जीवन को नया मोड़ नहीं दे सकते?'' पुरुष ने पूछा।
''कौन-सा मोड़?''
''हम फिर से साथ-साथ रहने लगें... एक साथ... पति-पत्नी बन कर... बहुत अच्छे दोस्त बन कर।''

''ये पेपर?'' स्त्री ने पूछा।
''फाड़ देते हैं।'' पुरुष ने कहा औऱ अपने हाथ से तलाक के काग़ज़ात फाड़ दिए। फिर स्त्री ने भी वही किया। दोनों उठ खड़े हुए। एक दूसरे के हाथ में हाथ डाल कर मुस्कराए। दोनों पक्षों के रिश्तेदार हैरान-परेशान थे। दोनों पति-पत्नी हाथ में हाथ डाले घर की तरफ चले गए। घर जो सिर्फ और सिर्फ पति-पत्नी का था ।।

पति पत्नी में प्यार और तकरार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जरा सी बात पर कोई ऐसा फैसला न लें कि आपको जिंदगी भर अफसोस हो ।।
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उफ़ कितना मुश्किल है यह सफर
बड़ा दुशवार होता है
जरा सा फैसला करना
की जीवन की कहानी को
बयाने बेजबानी को
कहाँ से याद रखना है
कहाँ से भूल जाना है
उसे कितना बताना है
उसे कितना छुपाना है
कहाँ रो रो के हँसना है
कहाँ हँस हँस के रोना है
इस आँचल के कोने को कितना भिगोना है
कहाँ आवाज देनी है
कहाँ ख़ामोश रहना है
किसी दुःख को कहाँ पर
कौनसी शिद्दत से कहना है
कहाँ रास्ता बदलना है
कहाँ से लौट आना है
जरा सा फैसला करना
बड़ा दुशवार होता है
उफ़ कितना मुश्किल है यह सफर ....

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