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नागकेसर के गुण,लाभ,उपयोग

नागकेसर के गुण,लाभ,उपयोग




नागकेसर या नागचम्पा
एक सीधा सदाबहार वृक्ष है जो देखने में बहुत सुंदर होता है। यह द्विदल अंगुर से उत्पन्न होता है। पत्तियाँ इसकी बहुत पतली और घनी होती हैं, जिससे इसके नीचे बहुत अच्छी छाया रहती है। इसमें चार दलों के बडे़ और सफेद फूल गरमियों में लगते हैं जिनमें बहुत अच्छी महक होती है। लकड़ी इसकी इतनी कडी और मजबूत होती है कि काटनेवाले की कुल्हाडियों की धारें मुड मुड जाती है; इसी से इसे 'वज्रकाठ' भी कहत हैं। फलों में दो या तीन बीज निकलते हैं। हिमालय के पूरबी भाग, पूरबी बंगाल, आसाम, बरमा, दक्षिण भारत, सिहल आदि में इसके पेड बहुतायत से मिलते हैं।
   नागचम्पा की कलि को नागकेसर कहते है| नागकेसर कडवी, कसेली, आमपाचक, किंचित गरम, रुखी, हलकी ,गरम, रुधिर रोग, वात, ह्रदय की पीड़ा, पसीना, दुर्गन्ध, विष, तृषा, कोढ़, कान्त रोग और मस्तक शूल का नाश करती है| भगवान शिव जी की पूजा में नागकेसर का उपयोग किया जाता है, तांत्रिक प्रयोगों और लक्ष्मी दायक प्रयोगों में भी नागकेसर का उपयोग किया जाता है 
    इसे नागेश्वर भी कहते हैं। देखने में यह कलि मिर्च के समान गोल और गेरू के समान रंगीन होती है। इसका फूल गुच्छेदार होता है। नागकेसर महादेव को बहुत प्रिय है। अभिमंत्रित नागकेसर वशीकरण के लिए बहुत उपयोगी होता है 
नागकेसर के गुण : 

नागकेशर स्वाद में कसैला, कड़वा, पचने पर कटु तथा हल्का, रूक्ष तथा कुछ गर्म होता है। इसका मुख्य प्रभाव सर्व-शरीर पर रक्त-स्तम्भक (अर्श, अतिसार, रक्तपित्त, रक्तप्रदर में रक्त का स्तम्भन करनेवाला) रूप में पड़ता है। यह पीड़ाहर, दुर्गन्धनाशक, मस्तिष्क-बलदायक, अग्निदीपक, तृष्णा रक्तशोधक तथा विषहर है ।
विभिन्न रोगों में उपचार
गुदा पाक:
नागकेसर (पीली नागकेसर) का चूर्ण लगभग आधा ग्राम से 1 ग्राम की मात्रा में मिश्री और मक्खन के साथ मिलाकर रोजाना खिलाएं। इसको खाने से गुदा द्वार की जलन (प्रदाह) दूर होती है।

कांच निकलना (गुदाभ्रंश) :
नागकेसर लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग को एक अमरूद के साथ मिलाकर बच्चे को खिलायें। इससे गुदाभ्रंश (कांच निकलना) बन्द हो जाता है।
नागकेशर को 3 ग्राम की मात्रा में छाछ के साथ पीने से श्वेतप्रदर (ल्यूकोरिया) की बीमारी से छुटकारा मिलता है।
*नागकेशर का चूर्ण चावलों के साथ सेवन करने से प्रदर में लाभ होता है।
नागकेशर को पीसकर बारीक चूर्ण बनाकर रख लें। इसे आधे ग्राम की मात्रा में रोजाना मठ्ठे के साथ सेवन करने से प्रदर रोग मिट जाता है। इससे शारीरिक शक्ति भी बढ़ती है।
आधा से 1 ग्राम पीला नागकेसर सुबह-शाम मिश्री और मक्खन के साथ खाने से सफेद प्रदर और रक्त (खूनी) प्रदर दोनों मिट जाते हैं।
*नागकेसर (पीलानागकेसर) आधा से एक ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से रक्तप्रदर ठीक हो जाता है। यह औषधि श्वेत (सफेद) प्रदर के लिए भी लाभकारी है।
नागकेशर चूर्ण 1-3 ग्राम को 50 मिलीलीटर चावल धोवन (चावल का धुला हुआ पानी) के साथ सुबह-शाम सेवन करने से रक्त (खूनी) प्रदर में आराम मिलता है।
शीतपित्त:
नागकेसर 5 ग्राम शहद मिलाकर सुबह-शाम खाने से शीतपित्त में बहुत लाभ होता है।
आधा चुटकी नागकेसर को 25 ग्राम
खांसी:
नागकेसर की जड़ और छाल को लेकर काढ़ा बनाकर पीने से खांसी के रोग में लाभ मिलता है।
ऐसी खांसी जिसमें बहुत अधिक कफ आता हो उसमें लगभग आधा ग्राम से 1 ग्राम नागकेसर (पीला नागकेसर) की मात्रा को मक्खन और मिश्री के साथ सुबह-शाम रोगी को सेवन कराने से अधिक कफ वाली खांसी नष्ट हो जाती है।
घाव:
नागकेसर का तेल घाव पर लगाते रहने से घाव शीघ्र भर जाता है।
प्रदर रोग:
3 ग्राम नागकेसर का चूर्ण ताजे पानी के साथ सेवन करने से श्वेतप्रदर में लाभ होता है।
लगभग 40 ग्राम नागकेसर, 30-30 ग्राम मुलहठी और राल, 100 ग्राम मिश्री लेकर कूट-छानकर चूर्ण बना लें। इसे 3-4 ग्राम की मात्रा में मिश्री मिले गर्म दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से सभी प्रकार के प्रदर रोग मिट जाते हैं।
लगभग 1 चम्मच नागकेसर लेकर प्रतिदिन 20 दिनों तक मठ्ठे के साथ सेवन करने से सफेद प्रदर मिट जाता है।
10-10 ग्राम की मात्रा में नागकेशर, सफेद चन्दन, लोध्र और अशोक की छाल को लेकर सबका चूर्ण बना लें। इसमें से 1 चम्मच चूर्ण दिन में 4 बार ताजे पानी के साथ सेवन करने से प्रदर में लाभ होता है।
खूनी अतिसार:
3 ग्राम नागकेसर के चूर्ण को 10 ग्राम गाय के मक्खन में मिलाकर खाने से खूनी दस्त (रक्तातिसार) के रोगी का रोग कम हो जाता है।
चोट लगने पर:

नागकेशर का तेल शरीर की पीड़ा और जोड़ों के दर्द में बहुत उपयोगी होता है।
अन्न नली (आहार नली) में जलन:
नागकेसर (पीला नागकेसर) की जड़ और छाल को मिलाकर काढ़ा बना लें। इसे रोजाना 1 दिन में 2 से 3 बार खुराक के रूप में सेवन करने से आमाशय की जलन (गैस्ट्रिक) में लाभ होता है।
हिचकी का रोग:
4-10 ग्राम पीला नागकेसर मक्खन और मिश्री के साथ सुबह-शाम रोगी को देने से हिचकी मिट जाती है।
गर्भपात (गर्भ का गिरने) से रोकना:
यदि तीसरे महीने गर्भपात की शंका हो तो नागकेशर के चूर्ण में मिश्री मिलाकर दूध के साथ खाना चाहिए। इससे गर्भपात की संभावना समाप्त हो जाती है।

बवासीर (अर्श):
नागकेसर और सुर्मा को बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। आधा ग्राम चूर्ण को 6 ग्राम शहद के साथ मिलाकर चाटने से सभी प्रकार की बवासीर ठीक हो जाती है।
नागकेशर का चूर्ण 6 ग्राम, मक्खन 10 ग्राम और मिश्री 6 ग्राम लेकर मिला लें। इस मिश्रण को 6 से 7 दिनों तक रोजाना चाटने से रक्तार्श (खूनी बवासीर) से खून का गिरना बन्द हो जाता है।
मासिक-धर्म सम्बन्धी परेशानियां:
नागकेसर, सफेद चन्दन, पठानी लोध्र, अशोक की छाल सभी को 10-10 ग्राम की मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें, फिर इसमें से 1 चम्मच चूर्ण सुबह-शाम 1 चम्मच ताजे पानी के साथ सेवन करने से मासिक-धर्म के विकारों में लाभ मिलता है।
बांझपन:
नागकेसर (पीला नागकेशर) का चूर्ण 1 ग्राम गाय (बछड़े वाली) के दूध के साथ प्रतिदिन सेवन करें और यदि अन्य कोई प्रदर रोग सम्बन्धी रोगों की शिकायत नहीं है तो निश्चित रूप से गर्भस्थापन होगा। गर्भाधान होने तक इसका नियमित रूप से सेवन करने से अवश्य ही सफलता मिलती है।

गर्भधारण (गर्भ ठहराने के लिए):
पिसी हुई नागकेसर को लगभग 5 ग्राम की मात्रा में सुबह के समय बछड़े वाली गाय या काली बकरी के 250 ग्राम कच्चे दूध के साथ माहवारी (मासिक-धर्म) खत्म होने के बाद सुबह के समय लगभग 7 दिनों तक सेवन कराएं। इससे गर्भधारण के उपरान्त पुत्र का जन्म होगा।
* नागकेसर, चमेली का फल, तगर, कुमकुम, कूट को एक साथ मिलाकर्र रवि, पुष्य योग या गुरु पुष्य योग के समय खरल में कूल लें, फिर कपद्छान कर गाय का दूध मिलाकर माथे पर तिलक लगाने से अति तीव्र वशीकरण होता है।
* धन-संपदा प्राप्ति के लिए पूर्णिमा के दिन शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग को दूध, दही, शहद, मीठा, घी, गंगाजल से अभिषेक कर पञ्च विल्वपत्र के साथ नागकेसर के फूल शिवलिंग पर अर्पित करें। यह क्रिया अगली पूर्णिमा तक अविरोध करते रहे। अंतिम दिन अर्पित किये विल्वपत्र और पुष्प घर लाकर तिजोरी में रख दें। अप्रत्याशित रूप से धन की वृद्धि होगी।
* चांदी के ढक्कन वाली छोटी डिब्बी में नागकेसर बंद कर अपने पास रखने से काल सर्प दोष का प्रभाव समाप्त हो जाता है।
* कुंडली में चंद्रमा कमजोर होने पर नागकेसर से शिवजी की पूजा करनी चाहिए।



सीने और पसली मे दर्द के कारण और उपचार


दरअसल सीने का दर्द स्वयं में कोई रोग नहीं यह तो रोगों का लक्षण मात्र है। जिस व्यक्ति को ग्लीसरिल नाइट्रेट की गोली से सीने के दर्द में आराम मिल जाता है वह एंजाइना का रोगी होता है। दूसरी और यदि दर्द प्लूरिसी या न्यूमोनिया के कारण हो तो रोगी को बुखार−खांसी होती है तथा खांसने या सांस की तकलीफ के साथ उठने वाला दर्द दिल का दौरा पड़ने का संकेत हो सकता है।
प्लूरिसी में फेफड़े के पर्दे में पानी भर जाता है, फेफड़ो में सूजन हो जाती हैं, रोगी को ज्वर होता है, सांस रुक-रुक कर आता है, छाती में दर्द रहता है, आदि लक्षण होते है। आयुर्वेद में इसका उपचार बहुत सरल हैं।
उपचार :
इस बीमारी में तुलसी के ताजा पत्तों का स्वरस आधा ओंस (15 ग्राम) से एक ओंस (30 ग्राम) धीरे-धीरे बढ़ाते हए प्रात: सायं (सुबह और शाम) दिन में दो बार खाली पेट लेने से प्लूरिसी में शीघ्र आश्चर्यजनक रूप से लाभ होता है। इससे दो तीन दिन में बुखार नीचे उतरकर सामान्य हो जाता है और सप्ताह या अधिक आठ दस रोज में फेफड़े के पर्दे में भरा पानी सूख जाता है। किसी भी कारण से यह बीमारी क्यों न हो, बिना किसी अन्य दुष्प्रभाव के शत-प्रतिशत लाभ होता है और साथ ही फुस्फुस(फेफड़ो) और ह्रदय की अन्य बीमारियां हो तो भी इससे ठीक हो जाती है।
*चंद्रामृत रस 4 रत्ती, श्रृंग भस्म 1 1/2 रत्ती, नौसादर 1 1/2 रत्ती, मल्लसिंदूर 1 रत्ती लेकर सबको एकसार करके मिला लें। फिर इसकी चार बराबर-बराबर पुड़िया बनाएँ। 1-1 पुड़िया 4-4 घंटे पर दें। यह पसली के दर्द(पार्श्वशूल) का सफल अनुभूत नुस्खा है। 
पसली व सीने का दर्द प्राय: संक्रमण होने के अलावा सर्दी लगने, अनियमित आहार-विहार तथा कब्ज रहने के कारण होता है। इसके अलावा दूषित जल के सेवन से भी यह दर्द उत्पन्न हो जाते हैं।
पसली व सीने के दर्द का उपचार-
अदरकः 30 ग्राम अदरक या सोंठ को पीसकर आधा किलो पानी में उबालकर छानकर दिन में चार बार पीएं। इससे पसली का दर्द ठीक हो जाता है।
गाजरः गाजरों को उबालकर उनका रस निकाल लें। इस रस में शहद मिलाकर पीने से सीने का दर्द ठीक हो जाता है।
आजकल पसलियों में दर्द की समस्या अधिकतर लोगों में देखी जा रही है। युवाओं में भी पसलियों के दर्द की परेशानी अधिक हो रही है। बच्चों को भी यह रोग होता है। ये दर्द खांसी व छींक आने से और ज्यादा होता है। क्योंकि ऐसा होने पर पसलियों पर झटका लगता है और वे दुखने लगती है। पसलियों में दर्द होने का मुख्य कारण है शरीर में खून की कमी और विटामिन डी की कमी ।
जो लोग फ्रिज में रखी चीजों और अधिक ठंडी चीजों का सेवन करते हैं वे इस दर्द से अधिक परेशान होते हैं। 
पसलियों के दर्द से बचने के उपाय 
शहद और चूना-
शहद और पान में मिलाया जाने वाला चूना को मिलाकर पेस्ट बनाएं और इसका लेप पसलियों में दर्द होने वाली जगह पर लगाने से आराम मिलता है।
हींग-
अंडे की जर्दी को एक ग्राम हींग के साथ मिलाकर पीस लें और इसका लेप बनाकर पसलियों में होने वाले दर्द पर लगाएं। यह उपाय दर्द को दूर करता है।
मेथी दाने-
मेथी भी पसलियों के दर्द में बेहद राहत देती है। 100 ग्राम मेथी दानों को हल्का भूनें और इसे कूट लें फिर इसमें बेहद थोड़ा काला नमक भी मिला लें।और इसका सेवन सुबह और शाम एक-एक चम्मच खाएं। एक महीने तक लगातार खाने से पसलियों का दर्द ठीक होने लगता है।
जीरा-
जीरा दो चम्मच, को एक गिलास गर्म पानी में मिला लें। और किसी कपड़े में डालकर निचोड़ लें और इसकी सिकाई पसली वाली जगह पर करें। इससे काफी आराम मिलता है।
गेहूं-
गेहूं से बनी रोटी को इस तरह से बनाए जिससे कि यह एक तरफ से सिकी हुई हो और दूसरी तरफ से कच्ची हो। और कच्ची तरफ वाली जगह पर सरसों का गर्म तेल लगा लें और इसे पसलियों के उपर लगा लें और किसी कपड़े से बांध लें। इस उपाय से रोगी को काफी आराम और दर्द से मुक्ति मिलेगी।
राई-
एक चम्मच राई के दानों को अच्छी तरह से पीस लें और इसे गर्म करके दर्द वाली जगह पर इसका लेप लगाएं। ऐसा करने से पसलियों के दर्द में आराम मिलता है।
दूध-
छोटी इलायची को पीसकर गर्म दूध में डाल लें और इसमें एक चुटकी हल्दी मिला लें। रात को सोने से पहले इस दूध का सेवन करें। आपको फायदा मिलेगा।
*अदरक, तुलसी, तथा कालीमिर्च का काढ़ा बनाकर उसमें एक चुटकी सेंधा नमक मिलाकर सेवन कराना चाहिए.

शहद और चूना-
शहद और पान में मिलाया जाने वाला चूना को मिलाकर पेस्ट बनाएं और इसका लेप पसलियों में दर्द होने वाली जगह पर लगाने से आराम मिलता है।
अदरक-
तुलसी, अदरक और कालीमिर्च को मिलाकर काढ़ा बना लें और उसमें एक चुटकी सेंधा नमक मिलाकर सेवन करें।
*सरसों के तेल में तारपीन का तेल मिलाकर थोड़ी-थोड़ी देर बाद रोगी की पसलियों पर हल्के हाथों से मालिश करें.
हींग-

अंडे की जर्दी को एक ग्राम हींग के साथ मिलाकर पीस लें और इसका लेप बनाकर पसलियों में होने वाले दर्द पर लगाएं। यह उपाय दर्द को दूर करता है।
   न्यूमोनिया की अवस्था में यह योग मिश्रण कफ को द्रव करके निकालता है। फेफड़ों की रोगावस्था को मृदु करके खाँसी कम करता है। इससे हृदय की वेदना कम हो जाती है।
एंजाइना और हार्ट अटैक (मायोकार्डियल इंफेक्शन) जैसे दिल के रोग भी सीने में दर्द पैदा करते हैं। एंजाइना के रोगी में दर्द सीने के बीच में या कुछ बाईं ओर होता है। लगभग तीन से दस मिनट तक लगातार होने वाले इस दर्द की तीव्रता मामूली भी हो सकती है और बहुत अधिक भी। अधिक ठंड, रोगी की मानसिक स्थित, आवश्यकता से अधिक भोजन, दैनिक जीवन का तनाव, दिल की धड़कन बढ़ना तथा रक्तचाप आदि कुछ ऐसे कारक हैं जो दर्द को उभारने में सहायक होते हैं। जीभ के नीचे ग्लीसरिल नाइट्रेट की गोली रखने से इस रोग में तुरन्त लाभ होता है। 


पेट की सूजन कम करने के उपाय


    दुनिया भर में लोगों को पेट की सूजन (pet ki sujan) की समस्या का सामना करना पड सकता है। इस स्थिति में मरीज़ों को काफी बेचैनी सी महसूस होती है। 
पेट में सूजन
खानपान और अनियमित दिनचर्या के कारण पेट से संबंधित कई बीमारियां हो जाती हैं, इसमें से एक है पेट में सूजन होना। पेट में सूजन की समस्‍या के लिए सबसे अधिक जिम्‍मेदार कब्‍ज और गैस बनना है। यह शिकायत तब होती है जब खाना पचने में समस्‍या हो। इसके अलावा कुछ आहार ऐसे भी हैं जो इसके लिए जिम्‍मेदार होते हैं। आगे के स्‍लाइडशो में जानिए पेट की सूजन कम करने के आसान तरीकों के बारे में। 
लिवर की समस्या - लिवर की खराबी के कारण भी पेट पर सूजन नजर आती है जिससे पेट अक्सर फूला हुआ नजर आता है। यह हेपेटाइटिस, अत्यधि‍क अल्कोहल का सेवन, दवाईयां या फिर लिवर कैंसर के परिणामस्वरूप भी हो सकता है।l
जल्दी जल्दी खाना ना खाएं-
अगर आप भी जल्दी जल्दी खाना खाती है तो अच्छा होगा की आप अपनी इस आदत को बदल दे क्योंकि आप जब जल्दबाजी में खाना खाती है तब भोजन के साथ आपके पेट में हवा भी प्रवेश करती है जिसके कारण आपके पेट में गैस बनने लगती हैं। तो अच्छा होगी की आप जब भी खाना खाएं तो धीरे-धीरे खाएं और भोजन को अच्छे से चबा कर भी खाएं। इससे आपके पेट में किसी भी तरह की गैस नही बनेगी।
सूजन दो तरह की होती है। एक शरीर के किसी खास हिस्से में तो दूसरी पूरे शरीर को एक साथ अपनी जद में लेती है। पैर में सूजन की शुरुआत हृदय संबंधी बीमारियों को दर्शाता है। दोनों पैरों के जरिए पूरे शरीर को जद में ले लेता है। सूजन की शुरुआत सुबह के समय चेहरे में हो, फिर दिन चढ़ने के साथ समाप्त हो जाए तो इसे गुर्दे की बीमारी का संकेत है। इसी तरह सूजन पेट में हो तो समझिए आपका लीवर संकट में है। इसमें लीवर सिकुड़ने के कारण सूजन की शुरुआत पेट से होती है। इसके अलावा आयोडीन, विटामिन बी-वन, प्रोटीन की कमी सूजन का कारण बनती है। फाइलेरिया नामक बीमारी में भी किसी एक पैर में सूजन होती है, लेकिन यह पैरों तक ही सिमट कर रह जाती है। 

लीवर के रोगों की वजह
अत्यधिक शराब पीने से लीवर के रोग होने की संभावना रहती है। इसमें लीवर सिकुड़ने की वजह से सूजन पेट पर दिखाई पड़ने लगती है। यूरीन पीला आने लगता है। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर की सलाह लें।
खाने के बाद टहलने जाएं-
अक्सर लोग खाना खाने के बाद तुरन्त ही सो जाते है लेकिन ऐसा नही करना चाहिए क्योकि ऐसा करने से भी आपके पेट में सूजन आ सकती है। तो अच्छा होगा की आप जब भी भोजन करे तो उसके बाद टहलने जरुर जाएं। इससे आपका भोजन भी पच जाएगा और आपके पेट में किसी तरह की सूजन भी नही आएगी। इसके अलावा आप रोज कुछ समय के लिए पैदल जरुर चले इससे आपका शरीर अच्छे से काम करेगा।
दवाओं से लीवर को नुकसान
बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाओं का सेवन करने से लीवर को नुकसान होता है। पैरासिटामाल, क्रोसीन आदि दवाईयां ज्यादा खतरनाक होती हैं। जिसे पहले से लीवर की बीमारी हो उसके लिए एक टेबलेट भी खतरनाक हो सकती है।
हरी सब्जियों का प्रयोग बढ़ाएं
ज्यादा च्युइंग गम ना खाएं-
क्या आप ये जानती है कि जब आप च्युइंग गम चबाती है तो उस समय आपके पेट में सबसे ज्यादा हवा जाती हैं जिसके कारण आपके पेट में सूजन आने लगती हैं। अगर आपको भी च्युइंग गम चबाना अच्छा लगता है तो अच्छा होगी की आप अपनी इस आदत को बदल दें। इसके स्थान पर आप गाजर, पॉपकॉर्न या कैंडी खा सकती हैं।
 कब्‍ज-


पेट की सूजन के लिए सबसे अधिक जिम्‍मेदार कब्‍ज होता है, यह शिकायत खाना ठीक से न पचने के कारण होता है। कम फाइबर और तरल पदार्थ का सेवन करने से कब्ज की शिकायत हो सकती है। इससे निजात पाने के लिए आहार में फाइबर के स्रोतों जैसे - दालें, नट्स, बीज, हरी सब्जियां और ताजे फलों को शामिल कीजिए। फाइबर आपकी पाचन क्रिया को ठीक रखने में बहुत मददगार है।
हरी सब्जियां, फल के सेवन से विटामिन बी-वन की कमी पूरी होती है। इसी तरह प्रोटीन के लिए दूध, दाल का सेवन अत्यधिक लाभकारी होता है। इन खाद्य पदार्थो के सेवन से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। ब्लड की कमी पूरी होती है,जो सूजन का एक महत्वपूर्ण कारक है।
आंत की समस्या - अगर पेट फूलने के साथ ही कठोर भी हो और आप उल्टी, जी मचलाना, कब्जियत जैसी समस्याओं का भी सामना कर रहे हैं, तो यह आंत की गड़बड़ी या आंत में ट्यूमर के कारण भी हो सकता है। 
शराब के स्थान पर नींबू पानी पीएं-
अक्सर लोगों को ये लगाता है ज्यादा पानी पीने के कारण उनका शरीर फूला हुआ लगने लगता है लेकिन ऐसा नही है इसके विपरीत अगर आप पर्याप्त मात्रा में पानी नही पीएंगी तो आपका शरीर फूल सकता हैं। जब आप पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं पीती है तो आपका शरीर आपके अंदर मौजूद पानी का प्रयोग करने लगाता हैं जिसके कारण आपके शरीर में पानी की कमी होने लगती हैं। जिससे आपका स्वास्थ खराब होता हैं। तो अच्छा होगा की आप समय समय पर पानी जरुर पीएं वैसे अगर आप चाहे तो पानी में नींबू डाल कर भी उसे पी सकती है नींबू पानी शरीर के लिए बहुत अच्छा होता हैं और इससे आपके शरीर में पानी की कमी भी नही होगी और ना ही आपके पेट में सूजन आएगी।
कम भोजन करें-
अगर आप जरुरत से ज्यादा भोजन करेंगी तो भी आपको अपना पेट फूला हुआ सा लग सकता हैं। लेकिन एक साथ ज्यादा भोजन करने के स्थान पर आप चाहे तो थोड़ी-थोडी देर में कुछ ना कुछ खाती रहें इससे आपको किसी भी तरह की पेट की समस्या नही होगी। लेकिन भोजन करते समय भी इस बात का ध्यान रखे की आप जितना भोजन कर सकती है बस उतना ही करे उससे ज्यादा खाने की कोशिश करेगी तो आपके पेट में सूजन हो सकती हैं।

नमकीन चीजों का सेवन कम करें-
वैसे तो हम जो कुछ भी खाते है उसमे से ज्यादातर चीजों में नमक मौजूद होता हैं। लेकिन ज्यादा नमक खाना भी हमारे शरीर के लिए अच्छा नही होता हैं क्योकि इसके कारण भी हमारा पेट फूला हुआ सा लगता हैं। ऐसे में आप जो कुछ भी खांए तो उसमे देख ले की नमक कितनी मात्रा में मौजूद है। इतना ही नही आप कभी भी ऐसे पदार्थ का सेवन ना करें जिसमें 500 मिलीग्राम से ज्यादा नमक मौजूद हो।
गर्भाशय का कैंसर - कुछ मामलों में पेट का फूला रहना या भरा रहना गर्भाशय के कैंसर के लक्षणों में शामिल होते हैं। इस स्थि‍ति में श्रोणि‍ या पेट के निचले हिस्से में दर्द और पहले से अधि‍क भराव महसूस होता.
फूड एलर्जी से करें बचाव
पेट में सूजन के लिए फूड एलर्जी भी जिम्‍मेदार है। फूड एलर्जी के लिए अस्‍वस्‍थ खानपान जिम्‍मेदार है। अधिक तला-भुना, फास्‍ट फूड, डिब्‍बाबंद आहार खाने से बचें, क्‍योंकि ये फूड एलर्जी का कारण बन सकते हैं।
गर्म नींबू पानी-


नींबू में राइबोफ्लेविन, विटामिन बी और सी, फास्फोरस, कैल्शियम और मैग्नीशियम होते हैं। नींबू में हाइड्रोक्लोरिक एसिड भी होता जो कि भोजन को पचाने में आपके शरीर को सहायता प्रदान करता हैं तथा हमारे शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है।
• एक गिलास गर्म पानी में नींबू का ताजा रस निचोड़।
• अब इसे अच्छे से मिक्स करें और रोज सुबह खाली पेट इसे पीएं ।
• अगर आप चाहती है कि ये जल्दी असर करे तो आप इसका सेवन रोज कर सकती हैं।
अच्‍छे से चबाकर खायें
खाने में जल्‍दबाजी न करें, जल्दी में ना खाएं। खाने को अच्छे से पचाने के लिए जरूरी है कि चबा-चबा कर खाया जाए। अच्छे से ना चबाने से शरीर के अंदर हवा चली जाती है जिससे पेट में सूजन की समस्या हो सकती है। इसलिए खाने को धीरे-धीरे और अच्छे से चबा कर खाएं इससे खाना अच्‍छे से पचता है और सूजन नहीं होती।
अदरक-
अदरक की मदद से आप आतों की सूजन को कम कर सकती हैं साथ ही अपनी मांसपेशियों को आराम भी दिला सकती हैं। अगर आप नियमित रुप से खाने में अदरक का प्रयोग करती है तो आपको कभी भी पेट में सूजन की समस्या नही होगी।
• अदरक के कुछ टुकड़ों के काट कर एक कप में रख लें और उसमें उपर से उबलता हुआ पानी डाल दें। इसके बाद किसी ढक्कन की मदद से कप को कवर कर दें और कप को 10 मिनट के लिए ऐसे ही छोड़ दे। वैसे आप चाहें तो इसमें 1 चम्मच शहद और नींबू का रस भी जोड़ सकती हैं।
• आप चाहे तो अदरक को कच्चा भी खा सकती हैं।फ के बीज-
सौंफ के बीज में दर्द कम करने की क्षमता होती है इसके साथ ही इसमें कुछ ऐसे तत्व भी होते है जो की भोजन को पचाने में मदद करते हैं और पेट में अगर सूजन आ गयी हो तो उस सूजन को भी कम करते हैं।
• भोजन करने के बाद हमेशा सौंफ के बीज खाने की आदत डालें। इससे आपके पेट में सूजन पैदा नही होगी।
• फूले हुए पेट के इलाज का एक अन्य तरीका भी है इसके लिए आप चाय में सौंफ मिलाकर पी सकती हैं। या फिर आप 1 चम्मच सौंफ को 1 कप पानी में डाल कर अच्छे से उबाल लें। अब इस पानी को पी ले इससे भी आपके पेट में सूजन नही होगी।

चुकंदर के फायदे और औषधीय उपयोग :Benefits of eating beet and medicinal value

  

   आयुर्वेद के अनुसार चुकंदर का दो टुकडे सलाद के रूप में नियमित खाते रहने से शरीर कई बीमारियों से लड़ने में सक्षम हो जाता है।  चुकन्दर को आप सलाद, जूस या हलवा किसी भी रूप में ले सकते हैं। अक्सर लोग चुकंदर को भोजन के साथ सलाद के रूप खाना पसंद करते हैं. चुकंदर खून बढ़ाने का एक अच्छा माध्यम है. चुकंदर को रोजाना खाने से शरीर में विटामिन ए, बी, बी 1, बी 2, बी 6 व विटामिन सी की पूर्ति हो जाती है.जानिये इस खूबसूरत रंग वाली सब्जी से आप क्या क्या लाभ उठा सकते हैं।
इसके अलावा चुकंदर में अच्छी मात्रा में लौह, विटामिन और खनिज होते हैं जो रक्तवर्धन और शोधन के काम में सहायक होते हैं. चुकंदर में एंटीऑक्सीडेंट तत्व पाये जाते हैं जो हमारे शरीर को रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है.
   *यह महिलाओं में होने वाली खून की कमी को दूर करने का सबसे अच्छा साधन है। यह केंसर,हाई ब्लड प्रेशर  के साथ ही Alzheimer बीमारी को दूर भगाने में भी कारगर है। चुकंदर स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। इसमें मौजूद तत्व जहां शरीर को ऊर्जावान बनाए रखते हैं वहीं विभिन्न रोगों से लड़ने की क्षमता पैदा करते हैं। चुकंदर का नियमित सेवन करने से तमाम बीमारियां अपने आप ही भाग जाती हैं। खासतौर से महिलाओं और बढ़ती उम्र के बच्चों के लिये यह एक स्वास्थ्यवर्धक आहार है।

थकान दूर करता है
    अमेरिकन डायबिटिक्स एसोसिएशन की एक कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत किए गए एक अध्ययन में ये बात कही गई है कि चुकन्दर एनर्जी को बढ़ाता है। इसके नाइट्रेट तत्व धमनियों का विस्तार करने में मदद करते हैं जिससे कि शरीर के सभी हिस्सों में ऑक्सीजन ठीक प्रकार से पहुंच पाती है और इससे शरीर में एनर्जी बढ़ती है। इसके अलावा, चुकन्दर में आयरन होता है जो कि स्टैमिना बढ़ाने का काम करता है।
हाइपरटेंशन जैसी समस्याओं से व्यक्ति चिड़चिड़ा सा हो जाता है. इस परेशानी को समाप्त करने के लिए चुकंदर लाभदायक होता है. चुकंदर का जूस पीने से इस परेशानी को कम किया जा सकता है|
एनीमिया से लड़ता है
    ये एक मिथक है कि रंग में लाल होने के कारण चुकन्दर खून की कमी को मिटाने में मदद करता है, और इस वजह से ये एनीमिया में जरूर खाना चाहिए। हालांकि इस मिथक में आधा सच भी छिपा है। चुकन्दर में बहुत अधिक आयरन होता है और आयरन की मदद से हीमाग्लूटनिन बनता है, जो कि रक्त का ही एक ऐसा हिस्सा होता है जो ऑक्सीजन और बहुत से पोषक तत्वों को शरीर के दूसरे अंगों तक पहुंचाने में मदद करता है। चुकन्दर के यही आयरन तत्व एनीमिया से लड़ने में मदद करते हैं।इसका सेवन खून की कमी होने वाले रोगियों के लिए बहुत ही लाभकारी होता है. इसलिए हमे रोजाना किसी ना किसी रूप में चुकंदर का सेवन अवश्य करना चाहिए.
*किडनी की समस्याओं को दूर करने तथा किडनी को स्वस्थ एवं साफ रखने के लिए रोजाना चुकंदर का रस पीए| इससे किडनी से सम्बन्धित समस्याएं समाप्त हो जाएंगी|
ख़राब कोलेस्ट्रॉल कम करता है-
   चुकन्दर में काफी मात्रा में फाइबर, फ्लेवेनॉइड्स  और बेटासायनिन होता है। बेटासायनिन की वजह से ही चुकन्दर का रंग लाल-बैंगनी होता है। यह एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट है। यह एलडीएल कोलेस्ट्रॉल का ऑक्सीकरण कम करने में मदद करता है जिसकी वजह से यह धमनियों में नहीं जमता। इससे दिल के दौरे का जोखिम कम हो जाता है। 
डायबिटीज़ पर नियंत्रण-
    जिन लोगों को डायबिटीज़ है वो चुकन्दर खाकर अपने मीठे की तलब मिटा सकते हैं। इसको खाने का फायदा ये होता है कि मीठे की तलब पूरी होने पर भी ये आपका ब्लड शुगर लेवल नहीं बढ़ाता क्योंकि ये ग्लाइसेमिक इंडेक्स वेजिटेबल   है। इसका अर्थ ये है कि ये खून में बहुत धीरे-धीरे शुगर रिलीज़ करती है। इसमें बहुत कम कैलोरी होती है और इसका फैट-फ्री होना भी इसे डायबिटीज़ के मरीजों के लिए परफेक्ट वेजिटेबल बनाता है।
आस्टिओपरोसिस से बचाव-
   चुकन्दर में मिनरल सिलिका मौजूद होता है। इस तत्व की वजह से शरीर केल्शियम को प्रभावी रूप से इस्तेमाल कर पाता है। केल्शियम हमारे दांतों और हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए जरूरी होता है। इसलिए दिन में एक ग्लास चुकन्दर का जूस पीने से आप आस्टिओपरोसिस और हड्डियों व दांतों की दूसरी समस्याओं से बचे रह सकते हैं।
बवासीर के रोगियों के लिए चुंकदर बहुत ही लाभदायक होता है. बवासीर की परेशानी को दूर करने के लिए रोजाना रात को सोने से पहले आधा या एक ग्लास चुकंदर का जूस पीए. इससे बवासीर की समस्या से राहत मिलेगी|

ब्लड शुगर लेवल कम करता है-
चुकन्दर नाइट्रेट्स का एक अच्छा स्रोत है, इसका सेवन किए जाने पर ये नाइट्राइट्स  और एक गैस नाइट्रिक ऑक्साइड्स में बदल जाता है। ये दोनों तत्व धमनियों को चौड़ा करने और ब्लड प्रेशर को कम करने में मदद करता है। शोधकर्ताओं ने ये भी पाया है कि हर रोज़ 500 ग्राम चुकन्दर खाने से लगभग 6 घंटे में व्यक्ति का ब्लड प्रेशर घट जाता है।
कैंसर में फायदेमंद-
    चुकन्दर का बेटासायनिन तत्व एक और बहुत ज़रूरी काम करता है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में हुए एक अध्ययन में ये पाया गया कि जिन लोगों को ब्रेस्ट या प्रोस्टेट कैंसर होता है, वो अगर चुकन्दर खाए तो उनके ट्यूमर बढ़ने की गति 12.5% कम हो जाती है। जिन लोगों को ये खतरनाक बीमारी नहीं है उनके चुकन्दर खाने से इसका जोखिम कम हो जाता है।
    *बालों में रूसी होने के कारण सिर में खुजली होने लगती है. इस समस्या को दूर करने के लिए चुकंदर का काढ़ा बनाए| अब इसमे थोड़ा सिरका डालकर सिर में लगाए. कुछ देर बाद सिर को साफ पानी से धो दें. इससे बालों की रुसी कम होने लगेगी|

सेक्सुअल हेल्थ और स्टैमिना बढ़ाने वाला-
   चुकन्दर को नेचुरल वियाग्रा भी कहा जाता है। पुराने ज़माने में इसका इस्तेमाल यौन स्वास्थ्य के लिए किया जाता है। चुकन्दर नाइट्रिक ऑक्साइड रिलीज़ करता है जिससे कि रक्त वाहिनियों का विस्तार होता है और गुप्तांग  में खून का दौरा बढ़ता है। इसके अलावा, चुकन्दर में बहुत अधिक मात्रा में एक केमिकल बोरॉन पाया जाता है जो कि ह्यूमन सेक्स हार्मोन के निर्माण में मददगार होता है। 

गर्भवती महिलाओं और भ्रूण के लिए फायदेमंद-
   चुकन्दर में उच्च मात्रा में फॉलिक एसिड पाया जाता है। यह पोषक तत्व गर्भवती महिलाओं और उनके गर्भ मे  बच्चों के लिए महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इससे गर्भस्थ  बच्चे का मेरुदंड बनने में मदद मिलती है। चुकन्दर गर्भवती महिलाओं को अतिरिक्त ऊर्जा देता है।
*चुकंदर में कार्बोहाइड्रेट होता है जो थकान आदि को मिटाने में सहायक होता है. यदि आपको आलस महसूस हो रहा हो या फिर थकान लगे तो चुकंदर जूस बनाकर पी लें. इससे शरीर फुर्तीला बनेगा|
*बढ़ती उम्र के साथ जोड़ो का दर्द एक आम समस्या है. इस समस्या को खत्म करने के लिए रोजाना चुकंदर का जूस पीए| इससे कुछ ही समय बाद जोड़ो के दर्द से राहत मिलती है|
कब्ज़ से राहत-
चुकन्दर में फाइबर पाया जाता है, इस वजह से ये एक रेचक औषधि के रूप में काम करता है। 

* चुकंदर सिर्फ हमारे शरीर को ही नहीं बल्कि हमारी त्वचा को स्वस्थ बनाने में भी काफी सहायक होता है. इसका प्रयोग करने के लिए चुकंदर को पानी में उबाले. अब इस पानी को छान लें. अब इस पानी को पीए. इससे किल-मुँहासे, झुर्रिया आदि समाप्त हो जाती हैं.ससे मल  नरम हो जाता है। साथ ही पेट से सारे विजातीय पदार्थ  निकल जाते हैं।
*पीलिया के रोगियों के लिए भी चुकंदर काफी फायदेमंद होता है. पीलिया से ग्रस्त रोगी को दिन में करीब चार बार चुकंदर का जूस पिलाना चाहिए| इस जूस को दिन चार बार अलग-अलग समय में पिलाना चाहिए|
दिमाग तेज़ करता है-
    चुकन्दर का जूस पीने से व्यक्ति का स्टैमिना 16 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। ऐसा इसके नाइट्रेट तत्व के कारण होता है। शरीर में ऑक्सीजन बढ़ने से मस्तिष्क भी ठीक प्रकार से अपना काम कर पाता है। चुकन्दर खाकर आप डिमेंशिया तक में राहत पा सकते हैं।
   कई बार अनेक लोगों को उल्टी-दस्त की समस्या हो जाती है. इस समस्या को समाप्त करने के लिए थोड़ा चुकंदर का रस लें| अब इसमें चुटकी भर नमक मिलाये. अब इस रस को पी लें| इससे इससे पेट में गैस बनना समाप्त हो जाता है. जिसके कारण उल्टी-दस्त जैसी समस्याएं नहीं होती|



लाल मिर्च खाने के फायदे,उपयोग ,गुण : The benefits of eating red chili, use, properties

  

 लाल मिर्च सिर्फ आपके भोजन में तीखा स्वाद ही नहीं लाती बल्कि यह सेहत से जुड़ी कुछ आपातकालीन स्थि‍तियों में भी बेहद प्रभावकारी है। लाल मिर्च के यह बेमिसाल फायदे, आपके कभी भी काम आ सकते हैं, 
शुद्धता की पहचान – 
पिसी हुई लालमिर्च में लकड़ी का बुरादा व रंग मिला होता है। एक चम्मच पिसी हुई लालमिर्च एक कप पानी में घोलें। इससे पानी रंगीन हो जायेगा और बुरादा पानी में तैरने लगेगा। पिसी हुई लालमिर्च में थोड़ा-सा नमक या तेल मिलाकर रखें, मिर्च खराब नहीं होगी।


लाल मिर्च का एक बड़ा फायदा यह है कि त्वचा पर कोई चोट, घाव या फिर अन्य कारण से खून का बहना नहीं रुक रहा हो, तो बस एक चुटकी लाल मिर्च लगाने से खून बहना बंद हो जाता है। लाल मिर्च के हीलि‍ंग पावर के कारण ऐसा होता है। हालांकि ऐसा करने पर आपको जलन या तकलीफ हो सकती है, लेकिन बहते खून को रोकने के लिए यह एक अच्छा विकल्प है। 
*अगर आपकी नाक बंद हो गई है या फिर सर्दी के कारण नाक अधि‍क बह रही है, तो लाल मिर्च आपके लिए फायदेमंद हो सकती है। जरा सी लाल मिर्च पानी के साथ घोलकर पीने से आपकी बंद नाक खुल सकती है और बहती नाक भी बंद भी बंद हो सकती है। 
*पिसी हुई लाल मिर्च का रक्तवाहियों में रक्त के थक्के बनने से रोकाता है और सेवन हार्ट अटैक की संभावना को कम करता है। इसके अलावा अवांछि‍त तत्वों को बाहर निकालने के साथ ही आंतों की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाता है। 
शरीर के अंदरुनी हिस्से में चोट, 
आघात या रक्त का बहाव होने पर लाल मिर्च का प्रयोग किया जा सकता है। जरा-सी लाल मिर्च को पानी में घोलकर पीने पर यह काफी फायदेमंद साबित होगा। गर्दन की अकड़न में भी यह फायदेमंद है। 

सर्प-दंश – 
सर्प के काटने पर लालमिर्च खाने पर कड़वी नहीं लगती। इससे सर्पकाटे की पहचान कर सकते हैं।
पागल कुत्ता काटने पर- 
काटे हुए अंग पर लालमिर्च पीसकर लगाने से लाभ होता है। इससे विष नष्ट होकर घाव अच्छा हो जाता है।पागल कुत्ते के काटने पर लाल मिर्चों का लेप करने की विधि गाँवों में तो प्रचलित है ही, अब इसके वैज्ञानिक परीक्षण से भी उपयोगिता सिद्ध हो गई है। यह लेप लगाने से बहुत पसीना आता है, जिसमें लार बह जाती है।
मांसपेशि‍यों में सूजन-
 किसी प्रकार की जलन, कमर या पीठ दर्द या फिर शरीर के किसी भी भाग में होने वाला दर्द लाल मिर्च के प्रयोग से ठीक किया जा सकता है। इसमें मौजूद विटामिन सी, फ्लेवेनॉइड्स, पोटेशि‍यम और मैंगनीज लाभदायक है। 
*पेट दर्द हो तो पिसी हुई लालमिर्च गुड़ में मिलाकर खाने से लाभ होता है।
पानी के दोष – 
देशाटन करते समय जगह-जगह जाना पड़ता है और वहाँ गंदा पानी पीने में आता है। लालमिर्च की चटनी घी में छौंककर नित्य खाने से पानी के दुष्प्रभाव नष्ट हो जाते हैं। मिर्चों में विटामिन ‘ए’ और ‘सी’ भरपूर होते हैं। इनमें टोकोफेरोल अथवा विटामिन ‘ई’ भी होते हैं। लालमिर्च विटामिन ‘सी’ का बहुत अच्छा स्रोत है। कटिवेदना, तंत्रिकाएँ (न्यूरेल्जिया) और रूमेटिक गड़बड़ियों में मिर्च के व्यंजन प्रति-उत्तेजक के रूप में दिए जाते हैं। इन्हें खाने पर टॉनिक का-सा प्रभाव होता है। लेकिन अंधाधुंध खाने पर जठर-अांत्रशोथ हो सकता है।
*भोजन के साथ खाने पर मिर्चें हमारी स्वाद-कलिकाओं को उद्दीप्त करती हैं और लार के प्रवाह को प्रेरित करती हैं, जो मंड वाले अथवा धान्य खाद्य-पदार्थों के पाचन में सहायक होता है। सलाद के साथ ताजे रूप में लेने पर ये विटामिन सम्पूरक का काम करती हैं क्योंकि इनमें विटामिन ‘ए’ और विटामिन ‘सी’ बहुत होते हैं। पकी, सूखी अथवा पिसी मिर्चों की तुलना में हरी मिर्चें पौष्टिक होती हैं। ‘शिमला मिर्च’ में विटामिन ‘सी’ विशेष रूप से अधिक होता है। मिर्च से रतौंधी की रोक में सहायता मिलती है।

*अकोता, दाद, शोथ, खुजली और त्वचा के रोगों में लालमिर्च का तेल लगाना लाभदायक है। वर्षा में होने वाली फुंसियों पर लगाने से अधिक लाभ होता है। लालमिर्च 125 ग्राम, सरसों का तेल 375 ग्राम दोनों को गर्म करके अच्छी तरह उबलने पर छान लें। यह लालमिर्च का तेल है। यह हड्डी पर लगी चोट के दर्द में भी लाभ करता है।
आँख दुखना – 
आँखें दुखने पर लालमिर्च पीसकर, थोड़ा-सा पानी मिलाकर लुगदी बना लें। जिस ओर अाँख दुख रही हो उस पैर के अंगूठे के नाखून पर मिर्ची का लेप करें। यदि दोनों आँखें दु:ख रही हों तो दोनों अंगूठों के नाखूनों पर लेप करें।
    *हरीमिर्च की डंडियाँ तोड़ देने से वे कई दिनों तक खराब नहीं होतीं। मिर्च में एंटीऑक्सीडेंट्स नामक कुछ ऐसे तत्व होते हैं जो कैंसर की रोकथाम करते हैं। मिर्च में विटामिन-‘सी’ भी होता है। 1 ताजी हरीमिर्च 1 नारंगी के बराबर होती है।
जलना – जले हुए पर हरीमिर्च पानी डालकर पीसकर लेप करें। लाभ होगा।
मोटापा – भोजन में नित्य हरीमिर्च खाने से मोटापा कम होता है।
मलेरिया – एक हरी मिर्च के बीज निकालकर, बीजरहित खोले को मलेरिया आने के दो घण्टे पहले अँगूठे में पहनाकर बाँध दें। इस तरह दो-तीन बार बाँधने से मलेरिया बुखार आना बन्द हो जाता है।

सेहत और सौंदर्य का खजाना :कमल का पौधा : A wealth of health and beauty: lotus plant


    कमल का पौधा (कमलिनी, नलिनी, पद्मिनी) पानी में ही उत्पन्न होता है और भारत के सभी उष्ण भागों में तथा ईरान से लेकर आस्ट्रेलिया तक पाया जाता है। कमल का फूल सफेद या गुलाबी रंग का होता है और पत्ते लगभग गोल, ढाल जैसे, होते हैं। पत्तों की लंबी डंडियों और नसों से एक तरह का रेशा निकाला जाता है जिससे मंदिरों के दीपों की बत्तियाँ बनाई जाती हैं। कहते हैं, इस रेशे से तैयार किया हुआ कपड़ा पहनने से अनेक रोग दूर हो जाते हैं। कमल के तने लंबे, सीधे और खोखले होते हैं तथा पानी के नीचे कीचड़ में चारों ओर फैलते हैं। तनों की गाँठों पर से जड़ें निकलती हैं।
उपयोग-
कमल के पौधे के प्रत्येक भाग के अलग-अलग नाम हैं और उसका प्रत्येक भाग चिकित्सा में उपयोगी है-अनेक आयुर्वेदिक, एलोपैथिक और यूनानी औषधियाँ कमल के भिन्न-भिन्न भागों से बनाई जाती हैं। चीन और मलाया के निवासी भी कमल का औषधि के रूप में उपयोग करते हैं।
कमल के फूलों का विशेष उपयोग पूजा और शृंगार में होता है। इसके पत्तों को पत्तल के स्थान पर काम में लाया जाता है। बीजों का उपयोग अनेक औषधियों में होता है और उन्हें भूनकर मखाने बनाए जाते हैं। तनों (मृणाल, बिस, मिस, मसींडा) से अत्यंत स्वादिष्ट शाक बनता है।
आयुर्वेद ने पता लगाया है कि फेंगशुई में अहम स्थान रखने वाला और लक्ष्मी देवी के प्रिय इस फुल कमल की जड़, तना, पत्ते और बीज सभी मानव जीवन के लिए लाभकारी है. तो अब जानते है कि कीचड़ में पैदा होने वाले कमल के इस फुल के कौन से हिस्से को हम किस तरह इस्तेमाल कर सकते है. 
स्वप्नदोष -
 जवानी में अक्सर बच्चे आकर्षण में आ जाते है और वहीँ आकर्षण सोते वक़्त भी उनके दिमाग में रहता है. इसलिए जब वे सपने देखते है तो स्वपन दोष का शिकार हो जाते है. ये बहुत बुरी बिमारी है क्योकि इससे आपके शरीर की सारी ताकत निकल जाती है और आप कमजोर होने लगते हो. किन्तु आप कमल की जड़ों को सुखाकर उनका पाउडर बनायें और रोजाना इस चूर्ण की 4 ग्राम की मात्रा को पानी के साथ ग्रहण करें. करीब 1 माह तक आप इस उपाय को नियमानुसार अपनायें, इसे आपके शरीर की ताकत भी बढ़ेगी और आपको स्वपन दोष से भी मुक्ति मिलेगी


उल्टी -
उल्टी होने का मुख्य कारणविशुद्ध आहार या दूषित आहार होता है. इसलिए हमेशा ताजा और पौष्टिक भोजन ही करना चाहियें किन्तु अगर आप उल्टी से परेशान है तो आप कमल के कुछ बीज लें और उन्हें तवे पर अच्छी तरह भुनें. अब आप बीजों को छिलें,इनके अंदर आपको एक सफ़ेद भाग मिलेगा. इस सफ़ेद भाग को आप पिस लें और शहद मिलाकर खा जाएँ, तुरंत आपको उल्टी आनी बंद हो जायेगी.

बालों को काला करें-  
जब भी कभी आपको लगे कि आपके बाल सफ़ेद होने लगे है या सारे बाल सफ़ेद भी हो चुके हो तब भी आप 500 से 600 ग्राम कमल के फूलों का इंतजाम करें, उन्हें एक हांडी में डाले और फूलों में गाय का दूध मिलाएं. अब आप इस हांडी को करीब 1 महीने के लिए जमीन में गाद दें. तत्पश्चात आप हांडी को निकालें और रोजाना इसे अपने सिर पर तेल की तरह लगाएं. ध्यान रहे कि 2½ घंटे बाद आपको अपना सिर भी अवश्य धोना है. इस उपाय को करीब 1 माह तक अपनाएँ. आपके बाद पहले की तरह काले और घने होने आरम्भ हो जायेगे.

गर्भस्त्राव -
 ये एक अजीब सा रोग है क्योकि कोई भी महिला नहीं चाहती कि उनका बार बार गर्भ स्त्राव हो, इसलिए वे पूरी सावधानी से गर्भधारण करती है किन्तु फिर भी उनको स्त्राव हो जाता है. इस समस्या से तुरंत निजात पाने के लिए आप कमल की नाल और नागकेसर को सुखा लें और उनको पीसकर पाउडर बनायें. आप इस मिश्रण को गाय के दूध के साथ रोजाना ग्रहण करें. आपकी गर्भ स्त्राव की समस्या शत प्रतिशत दूर हो जायेगी. 
 स्तन सौन्दर्य - 
अक्सर जब महिलायें माँ बन जाती है तो स्तनपान की वजह से उनके स्तन ढीले पड जाते है. ये उनकी सुंदरता में कमी लाता है, किन्तु महिलायें अपने स्तनों को दुबारा से गोल,नर्म और सुडौल बनाने के लिए कमल के बीजों का प्रयोग कर सकती है. इनका इस्तेमाल करने के लिए उन्हें कमल के 500 ग्राम बीजों को पीसकर एक शीशी में रख लेना चाहियें और रोजाना 5 से 6 ग्राम की मात्रा में गाय के दूध के साथ सेवन करना चाहियें. मात्रा 2 माह के बाद ही उनके स्तन पहले से भी अधिक आकर्षक और हष्ट पुष्ट हो जायेगे. महिलाओं के स्तनों का स्वस्थ होना जरूरी भी है क्योकि ये उनके शरीर का सबसे महत्वपूर्ण और आकर्षक अंग है.

  
खुनी बवासीर-
बवासीर का नाम सुनते ही लोगों में भय उत्पन्न हो जाता है और जब बात खुनी बवासीर की हो तो आप समझ ही सकते है कि ये रोग पीड़ित का क्या हाल करता होगा. लेकिन खुनी बवासीर की शिकायत वाले लोगों के लिए कमल की केसर बहुत अधिक लाभदायी होती है. इसलिए इन्हें ½ ग्राम कमल की केसर में थोडा मक्खन और चीनी मिलाकर ग्रहण करना चाहियें. करीब 1 सप्ताह इसका नियमित रूप से इस्तेमाल ही आपको सार्थक परिणाम देगा. किन्तु इसका ये अर्थ नहीं है कि आप इसे मात्र 1 सप्ताह तक ही लें बल्कि आप इस उपाय को तब तक अपनाएँ जब तक आप बवासीर से पूरी तरह से मुक्त नही हो जाते.
चर्म रोग -
 त्वचा रोग होने पर भी कमल की जल लें और उसे पानी के साथ घिसते हुए एक लेप तैयार करें. इस लेप को आप अपने शरीर के उन स्थानों पर लगाएं जहाँ आपको चर्म रोग है. कुछ दिन इसी तरह इसका इस्तेमाल आपको नयी त्वचा प्रदान करता है और सभी चर्म रोग दूर करता है.
हार्ट अटैक -
बढता कोलेस्ट्रॉल, तनाव,रक्त विकार और अनियमित व तला खाना हृदय को नुकसान पहुंचाता है. किन्तु कमल का फुल हृदय रोगियों के लिए एक अमृत की तरह होता है. वे कमल के फुल के साथ मुलेठी, सफ़ेद चन्दन और नागरमोथा मिलाकर उनका पाउडर बनायें और एक दवा तैयार करें. इस दवा का दिन में 2 बार पानी या दूध के साथ सेवन करने से सभी तरह के हृदय रोग और हार्ट अटैक जैसी समस्या उत्पन्न ही नहीं होती. वैसे आप इस दवा का निर्माण खुद ना करते हुए किसी अच्छे वैद से ही करायें क्योकि इसमें सभी चीजों की मात्रा का ध्यान में रखना बहुत अनिवार्य है.

मर्दानगी बढ़ाने के जबर्दस्त उपाय, घरेलू नुस्खे: Male enhancement treatments



   सामान्यत: जो पुरुष ताकतवर होते हैं, उनका दांपत्य जीवन भी सुखी रहता है। इसलिए किसी भी तरह की कमजोरी पुरुषों में आत्मविश्वास की कमी का कारण बन सकती है। कई बार पुरुषों में पाई जाने वाली ये शारीरिक कमजोरियां अस्वस्थ संबंधों का कारण बन जाती हैं। कुछ शारीरिक कमजोरियां जैसे स्वप्न दोष, शीघ्र पतन व कमजोरी आदि ऐसी समस्याएं हैं, जो मन पर नियंत्रण न होने के कारण होती हैं।

  आज कल की भाग दौड़ भरी जिंदगी और काम की अधिकता, तनाव खान पान में अनियमितता की वजह से आजकल के लोगों में यौन शक्ति या सेक्स पॉवर कम हो जाती है, और इस डर से कि कहीं वो अपने साथी को बिस्तर पर संतुष्ट करने में असफल ना हो जाये वो लोग उलटे सीधे साधनों के चक्कर में अपना पैसा और सेहत गंवाते है|
   किसी व्यक्ति के जीवन में यौन समस्याएं उसके यौन जीवन में शुरुआत में विकसित हो सकती हैं या असुखद व असंतोषजनक यौन अनुभव होने के बाद भी हो सकती हैं। यौन समस्याओं के कारण शारीरिक, मानसिक, या दोनों हो सकते हैं। पुरुषों में कमजोरी पैदा करने वाली समस्याओं को खत्म करने के लिए कुछ घरेलू नुस्खे-
    आजकल के युवाओं और प्रौढ़ व्यक्तियों में मर्दानगी की समस्या एक विकराल रूप धारण करती जा रही है लगभग 10 में से 8 व्यक्ति यौन समस्या से घिरे हुए होते हैं मैं यहाँ घरेलू उपाय बता रहा हूँ जो एकदम सस्ते और करने में आसान है. और इसके लिए आपको किसी डॉक्टर के पास जाने की भी जरूरत नहीं है|
    
     आयुर्वेद के हिसाब से चना मर्दानगी बढ़ाने के उपाय मैं से एक बेहतर विकल्प है आपने देखा है होगा के घोड़ा चना खाता है और कितना ताकतवर होता है और चना खाने से आपकी मर्दानगी तो बढ़ेगी ही साथ-साथ यह सुंदरता निखारने में भी बेहद असरदार साबित होता है दोस्तों अक्सर कई बार ऐसा होता है हमें कोई यौन समस्या का सामना करना पड़ता है और ज्यादातर लोग अपनी कमजोर मर्दानगी को लेकर मर्दानगी बढ़ाने के उपाय ढूंढते रहते हैं|चना बलशाली, वीर्यवर्धक और मैथुन शक्ति बढ़ाने में रामबाण है आयुर्वेद में चने को वीर्यवर्द्धक और स्तंभन शक्ति बढ़ाने के लिए अचूक दवा माना जाता है|
   न‌ियमित रूप से व्यायाम करने से शरीर में एंटीऑक्सीडेंट्स एंजाइम्स बढ़ते हैं जो र‌िएक्टिव ऑक्सीजेन जीवाणुओं से रक्षा करते हैं जसिसे वीर्य की कोश‌िकाएं सुरक्ष‌ित रहती हैं |व्यायाम के दौरान पसीना नकिलने से न सिर्फ शरीर में टेस्टोस्टेरोन का स्तर बढ़ता है बल्कि इन्सुल‌िन भी संतुल‌ित होता है और यह कामेच्छा बढ़ाने में मदद करता है।न‌ियमित रूप से व्यायाम करने से वीर्य की तादाद में 43 प्रत‌िशत तक की वृद्ध‌ि हो सकती है
    चने से नपुंसकता समाप्त-

    इसके लिए रात को एक कटोरी में थोड़े चने भिगोकर रख दें और सुबह उन भीगे हुए चने के पानी में दो चम्मच शहद मिलाकर पिया जाए तो इस प्रयोग से सालों पुरानी नपुंसकता खत्म हो जाती है और मैथुन शक्ति में भी बढ़ोतरी होती है. इस प्रयोग को कम से कम आपको ६० दिन नियमित रूप से करना पड़ेगा|अगर वीर्य पतला है या कम बनता है तो इसको आप चने के प्रयोग से दूर कर सकते हैं अगर आपका शरीर कमजोर है तो निश्चित रुप से अपनी स्तभ्न शक्ति कमजोर होती है और साथ में वीर्य की कमी भी होती है तो इस तरह के लोगों को एक चीनी के बर्तन में रात में चने भिगोकर रख दें और फिर इन चनों को सुबह उठकर अच्छी तरह से चबा चबाकर खाएं. चने आपको अपनी पाचन शक्ति के अनुसार ही खाने हैं मतलब कि जितना आप से हो सके और उसके बाद आप जिस चीनी के बर्तन में आप ने चने भिगोये थे उस पानी को भी ऊपर से पी लें. इस तरह का प्रयोग आपको लगभग 4 सप्ताह तक करना पड़ेगा|


अजवायन- 
अजवायन को प्याज़ के रस में भीगा कर सुखा लें. ये विधि तीन बार करें. फिर प्याज़ के रस में भीगी अजवायन के पूर्ण रूप से सूखने पर इसे कूट कर चूर्ण बना लें|एक महीने तक रोज़ करीब आधा चम्मच अजवायन का चूर्ण मिश्री में मिलकर खाले और उसके बाद दूध पीलें. एक महीनें में ही देखिएगा आपकी सेक्स पॉवर पहले से बढ़ जाएगी. इस विधि में आपको बस एक परहेज करना है कि मिश्रण का सेवन करने के दौरान एक महीने तक सम्भोग नहीं करना है|अजवाइन की पत्तियां स्वप्नदोष की समस्या के लिए एक बेहतरीन दवा है। अजवाइन की पत्तियों का जूस निकालकर उसे शहद के साथ लें। अजवाइन का रस इस तरह से लेने से बहुत जल्दी लाभ होता है।
*साइक‌िल‌िंग अध‌िक करने से वीर्य कम हो सकता है। इस शोध के अनुसार, जो लोग सप्ताह में 90 म‌िनट से अध‌िक साइक‌िल‌िंग करते हैं उनके वीर्य का स्तर 35 प्रत‌िशत कम होता है।
*निम्बू और सेब शायद सब जगह बड़ी आसानी से मिल जाते है. अगर आप सम्भोग के दौरान अधिक देर तक टिक नहीं पाते तो उसका इलाज सेब निम्बू और बकरी के दूध से आसानी से हो सकता है.
*रोज रात को सोने से पहले लहसुन की दो कलियां निगल लें। फिर थोड़ा-सा पानी पिएं। आंवले के चूर्ण में मिश्री पीसकर मिलाएं। इसके बाद प्रतिदिन रात को सोने से पहले करीब एक चम्मच इस मिश्रित चूर्ण का सेवन करें। इसके बाद थोड़ा-सा पानी पिएं।
* एक सेब में लौंग लगा दे, इसी प्रकार एक बड़े निम्बू में भी लौंग लगा दें. तीन दिन तक रखने के बाद प्रतिदिन बदल बदल कर ये सेब और निम्बू में लगे लौंग पीसकर बकरी के दूध के साथ सेवन करे. देखिये कैसे आपकी सेक्स पॉवर कुछ ही दिनों में बढ़ जाएगी|
*लहसुन की 5-6 कलिया देसी घी में फ्राई कर के रोजाना खाए 15 से 20 में इसका रिजल्ट आपको मिल जायेगा लेकिन इसका सेवन ठंडी के सीजन में ही करना चाहिये क्योकि लहसुन की तासीर गरम होती है अगर आप रोजाना लहसुन का सेवन करते है तो बहुत सारी बिमारिया आपके पास आने से डरेगी साथ ही लहसुन ब्लड प्रशर में भी फायेदेमंद है
*आधा किलो इमली के बीजों को लेकर उन्हें तीन दिन तक पानी में भिगो दे. तीन दिन बाद इन बीजों का सफ़ेद हिस्सा निकाल कर अलग करलें. अब इन सफ़ेद बीजों को पीसे और इन पीसे हुए बीजों में बराबर मात्र में पीसी हुई मिश्री मिला दे| यह मिश्रण रोज़ सुबह शाम आधा-आधा चम्मच दूध के साथ लें. ये मिश्रण खासकर उन लोगोंके लिए है जिन्हें स्वप्नदोष और शीघ्रपतन की शिकायत होती है|

*अगर वीर्य में बहुत पतलापन है और सेक्स पॉवर भी बहुत कम है तो हल्दी आपके लिए रामबाण औषधि है| इसे ग्रहण करना भी बहुत आसान है. बस एक चम्मच शहद में एक चम्मच हल्दी पाउडर मिलाकर रोज़ सुबह उठाते ही ख़ाली पेट सेवन करना चाहिए. इस मिश्रण का लगातार सेवन करने से सेक्स पॉवर में बढ़ोत्तरी होती है और वीर्य के पतलेपन से भी निजात मिल जाती है|
   *स्वस्थ सोच से ही शरीर स्वस्थ रहता है। यह एक सच्चाई है। इन समस्याओं के लिए हमारे मन की भावनाएं भी काफी हद तक जिम्मेदार होती हैं। मन में भोग-विलास के वासनात्मक ख्याल रहना या मन में हमेशा काम-वासना के विचार घुमड़ते रहना स्वप्नदोष व शीघ्रपतन जैसी समस्याओं का एक बड़ा कारण है।
*नपुंसकता दूर करने के लिए पुरुषों को कच्ची भिंडी चबानी चाहिए। इस समस्या में भिंडी एक बेहतरीन दवा का काम करती है।
*प्याज के सफेद कंद का रस, शहद, अदरक का रस और घी का मिश्रण 21 दिनों तक लगातार लेने से नपुंसकता दूर होकर पौरुष शक्ति प्राप्त होती है।

*शायद बहुत कम लोग जानते होगे की तरबूज का बीज देसी वियाग्रा का काम करता है| अरबी लोग इतने गरम क्यों होते है क्योकि वो लोग रोजाना तरबूज का बीज खाते है अरबी भासा में इसे मगज कहते हैं|
*रोज़ 3-4 छुहारे और इतने ही काजू और 2 बादाम दूध में डालकर उबाले और पकाकर मिश्री के साथ खा लें. ऐसा रोज़ रात सोने से पहले करें. कुछ ही समय में आपको ना सिर्फ अपनी कम हो चुकी यौन इच्छा में असर दिखेगा बल्कि आपकी सेक्स पॉवर भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ जाएगी|



तिल के औषधीय गुण,लाभ,उपचार Sesame health benefits,


भारतीय खानपान में तिल का बहुत महत्वो है। सर्दियों के मौसम में तिल खाने से शरीर को ऊर्जा मिलती है और शरीर सक्रिय रहता है। तिल में कई प्रकार के प्रोटीन, कैल्शियम, बी काम्प्ल्रेक्स और कार्बोहाइट्रेड आदि तत्व पाये जाते हैं। तिल का सेवन करने से तनाव दूर होता है और मानसिक दुर्बलता नही होती। प्राचीन समय से खूबसूरती बनाये रखने के लिए तिल का प्रयोग किया जाता रहा है। तिल तीन प्रकार के होते हैं - काले, सफेद और लाल। लाल तिल का प्रयोग कम किया जाता है। तिल का तेल भी बहु फायदेमंद होता है।

 तिल के औषधीय गुणों के बारे में बताते हैं।
तिल के गुण :
सर्दियों में तिल का सेवन शरीर में उर्जा का संचार करता है, और इसके तेल की मालिश से दर्द में राहत मिलती है।
तिल को कूटकर खाने से कब्ज की समस्या नहीं होती, साथ ही काले तिल को चबाकर खाने के बाद ठंडा पानी पीने से बवासीर में लाभ होता है। इससे पुराना बवासीर भी ठीक हो जाता है।
 मुहासे-
 मुहासो के लिए तिल की खली को जलाकर इसकी राख में गोमूत्र मिलाकर लेप करने से कुछ दिनों में मुहासे ठीक हो जाते है।
• नारू रोग-
 खली तिल की को काफी में पीसकर लेप करने से नारू रोग में लाभ होता है।
• बहुमूत्रता-
 जाड़े के दिनो में गुड़ तिल की गर्म ताजा गजक खाने से अधिक पेशाब आना और गले की खुजली ठीक हो जाती है।
बिस्तर पर पेशान आना-
बच्चा सोते समय पेशाब करता हो़ तो भुने काले तिलों को गुड़ के साथ मिलाकर उसका लड्डू बना लीजिए। बच्चेस को यह लड्डू हर रोज रात में सोने से पहले खिलाइए, बच्चान सोते वक्त पेशाब नही करेगा। 
मोटापा- 
काले तिल एक चम्मच खाने के बाद चबा चबा कर खाए, चर्बी खत्म हो जाएगी
मुंह के छाले -
 मुंह में छाले होने पर तिल के तेल में थोड़ा सा सेंधा नमक मिला कर मुंह के छालों में लगाइए, इससे मुंह के छाले ठीक हो जाएंगे।
• रक्त स्त्राव-
 प्रसूती या गर्भवती महिला के योनी मार्ग से रक्त निकलना बन्द नही हो तो तिल व जौ को कुटकर शक्कर मिलाकर शहद के साथ चाटना चाहिए।
• रक्तार्श-
लगभग 50 ग्राम काले तिलों को सोखने योग्य पानी में भिगोये। लगभग 30 मिनट जल में भीगे रहने के बाद उन्हें पीसकर उसमें लगभग एक चम्मच मक्खन एंव दो चम्मच मिश्री मिला दें। इसका प्रतिदिन दो बार सेवन करने से खूनी बवासीर (रक्तार्श) में लाभ होता है।
• पेट दर्द- 
20-25 ग्राम साफ तिल चबाकर उपर से गर्म पानी पिलाने से पेट का दर्द ठीक हो जाता है। साथ ही तिलों को पीसकर लम्बा सा गोला बनाकर उसे तवे पर सहन करने योग्य करके पेट के उपर फिराने से अत्यन्त से अत्यन्त कष्टदायी पेट का दर्द (उदर शूल) भी शान्त हो जाता है।
• सूजाक- 
15-15 ग्राम की मात्रा में काले तिल तथा देशी खाड बारीक पीसकर गाय के कच्चे दूध के साथ रोग की स्थिति के अनुसार सेवन करने से लाभ हो जाता है।
• बवासीर- 
1. काले तिल चबाकर उपर से ठंडा जल पीने से बादी बवासीर ठीक हो जाता है।
2. तिल पीसकर गर्म करके मस्सो पर लेप करने या बाधने से भी बवासीर में लाभ होता है। इसके साथ तिल के तेल का एनिमा (बासी) देने से आते चिकनी होकर शौच के गुच्छे निकल जाते है। जिससे धीरे धीरे रोग समाप्त हो जाने लगता है।
• खूनी दस्त रक्तातिसार- 
काले तिल एक भाग में मिश्री 5 भाग मिलाकर पीसकर बकरी के दूध के साथ देने से रक्तातिसार में लाभ हो जाता है।
• वात रक्त-
 तिलों भूनकर दूध में बुझाकर बारीक पीसकर लेप करने से वात रक्त का रोग दूर हो जाता है।
• भगन्दर- 
भयंकर व्याधि भगन्दर या वेदनायुक्त वातजन्य धावों में तिल या असली को भूनकर परन्तु गर्भ स्थिति में दूध में बुझाकर व उसी दूध में पीसकर लेप करना चाहिए। भगन्दर रोग मिट जायेगा।
• बहुमूत्र- 
प्रातः साय तिल मोदक (तिल के लड्डू) खाने से अधिक पेशाब आना बन्द हो जाता है।
• कब्ज-
 लगभग 60 ग्राम तिल लेकर उन्हे कूट लें फिर उनमें कोई मिष्ठान मिला लें। इसे खाने से कब्ज का नाश होता है।
• बालों में रूसी होना- 
बालो में तिल के तेल की मालिश कर लगभग 30 मिनट के पश्चात गर्म पानी में भीगी एंव निचोडी हुई तौलिया सिर पर लपेंटें। तौलिया के ठंडे होने पर पुनः तौलिया गर्म जल में भिगोकर निचोड़कर सिर पर लपेटे। यह क्रिया लगभग 5 मिनट तक करे। फिर कुछ देर के बाद शीतल जल से सिर धो लेने पर रूसी दूर हो जायेगी ।
• सुखी खासी- 
यदि सर्दी के कारण सूखी खासी हो तो 4-5 चम्मच मिश्री एंव इतने ही तिल मिश्रित कर ले। इन्हे एक गिलास मे आधा पानी रहने तक उबाले। इसे प्रतिदिन प्रातः साय एंव रात्री के समय पीये।
• आग से जलना-
 तिल जल में चटनी की भाती पीस लें। इस का दग्ध जले स्थान पर मोटा लेप करने से जलन शान्त हो जाती है।
• मोच आना-
 तिल की खल लेकर उसे पीसे एंव पानी मे गर्म करे फिर उतारकर गर्म ही मोच आये स्थान पर बाधने से मोच के दर्द में लाभ होता है।
बवासीर- 
1. काले तिल चबाकर उपर से ठंडा जल पीने से बादी बवासीर ठीक हो जाता है।
2. तिल पीसकर गर्म करके मस्सो पर लेप करने या बाधने से भी बवासीर में लाभ होता है। इसके साथ तिल के तेल का एनिमा  देने से आते चिकनी होकर शौच के गुच्छे निकल जाते है। जिससे धीरे धीरे रोग समाप्त हो जाने लगता है।
खूनी दस्त रक्तातिसार- 
काले तिल एक भाग में मिश्री 5 भाग मिलाकर पीसकर बकरी के दूध के साथ देने से रक्तातिसार में लाभ हो जाता है।
वात रक्त- 
तिलों भूनकर दूध में बुझाकर बारीक पीसकर लेप करने से वात रक्त का रोग दूर हो जाता है।
भगन्दर- 
भयंकर व्याधि भगन्दर या वेदनायुक्त वातजन्य घावों में तिल या अलसी को भूनकर परन्तु गरम स्थिति में दूध में बुझाकर व उसी दूध में पीसकर लेप करना चाहिए। भगन्दर रोग मिट जायेगा।
बहुमूत्र-
प्रातः साय तिल मोदक (तिल के लड्डू) खाने से अधिक पेशाब आना बन्द हो जाता है।
कब्ज- लगभग 60 ग्राम तिल लेकर उन्हे कूट लें फिर उनमें कोई मिष्ठान मिला लें। इसे खाने से कब्ज का नाश होता है।
बालों में रूसी होना-
 बालो में तिल के तेल की मालिश कर लगभग 30 मिनट के पश्चात गर्म पानी में भीगी एंव निचोडी हुई तौलिया सिर पर लपेंटें। तौलिया के ठंडे होने पर पुनः तौलिया गर्म जल में भिगोकर निचोड़कर सिर पर लपेटे। यह क्रिया लगभग 5 मिनट तक करे। फिर कुछ देर के बाद शीतल जल से सिर धो लेने पर रूसी दूर हो जायेगी ।
• मानसिक दुर्बलता- 
तिल गुड दोनो सममात्रा में लेकर मिला लें।उसके लड्डू बना ले। प्रतिदिन 2 बार 1-1 लड्डू दूध के साथ खाने से मानसिक दुर्बलता एंव तनाव दूर होते है। शक्ति मिलती है। कठिन शारीरिक श्रम करने पर सांस फूलना जल्दी बुढ़ापा आना बन्द हो जाता है।
• दंत चिकित्सा-
 प्रातः काल तथा साय काल लगभग 50-50 ग्राम की मात्रा में (बिना मिठा मिलाये) धीरे धीरे काले तिल चबाकर उपर से पानी पीने से दात मजबूत मल रहित हो जाते है। और हिलते हुए दात भी पुनः जम जाते है।
• पथरी-
 तिल क्षार को रोग की दशानुसार देशी शहद में मिलाकर दूध के साथ सेवन करने से पथरी रोग में लाभ होता है।
• मकड़ी का विष-
 तिलो को पिलवाकर तेल निकाल लेने के उपरान्त बचे भाग खली में थोड़ी हल्दी मिलाकर पानी में पीसकर रोग स्थान पर लेप कर देने से मकड़ी का विष समाप्त हो जाता है।
तिल से घरेलू ईलाज::

घाव होना- 
पानी में तिलों को पीसकर पुल्टिस बांधने से अशुद्ध घाव साफ होकर शीघ्र भर जाता है।
 गर्भाशय की पीड़ा-
 तिलों को बारीक पीसकर तिल के ही तेल में मिला किंचित् गर्म करके नाभि के भाग में धीरे धीरे लेप करने या मलने (मर्दन करने) से शीत जन्यपीड़ा शान्त हो जाती है।
मधुमेह के दवाईयों को प्रभावकारी बनाता है(Makes effective medicines for diabetes)
डिपार्टमेंट ऑफ बायोथेक्सनॉलॉजी विनायक मिशन यूनवर्सिटी, तमिलनाडु (Department of Biothechnology at the Vinayaka Missions University, Tamil Nadu) के अध्ययन के अनुसार यह उच्च रक्तचाप को कम करने के साथ-साथ इसका एन्टी ग्लिसेमिक प्रभाव रक्त में ग्लूकोज़ के स्तर को 36% कम करने में मदद करता है जब यह मधुमेह विरोधी दवा ग्लिबेक्लेमाइड (glibenclamide) से मिलकर काम करता है। इसलिए टाइप-2 मधुमेह (type 2 diabetic) रोगी के लिए यह मददगार साबित होता है।
अस्थि-सुषिरता (osteoporosis) से लड़ने में मदद करता है-
तिल में जिन्क और कैल्सियम होता है जो अस्थि-सुषिरता से संभावना को कम करने में मदद करता है।
शीघ्र प्रसव-
 शीघ्र प्रसव हो सके इसके लिये 70 ग्राम की मात्रा मे काले तिल कूटकर 24 घन्टें के लिये जल में भिगों दे। सुबह उन्हें छानकर प्रसव महिला को पीला दें। बच्चा शीघ्र हो जायेगा।
रक्त स्त्राव- प्रसूती या गर्भवती महिला के योनी मार्ग से रक्त निकलना बन्द नही हो तो तिल व जौ को कुटकर शक्कर मिलाकर शहद के साथ चाटना चाहिए।
रक्तार्श- लगभग 50 ग्राम काले तिलों को सोखने योग्य पानी में भिगोये। लगभग 30 मिनट जल में भीगे रहने के बाद उन्हें पीसकर उसमें लगभग एक चम्मच मक्खन एंव दो चम्मच मिश्री मिला दें। इसका प्रतिदिन दो बार सेवन करने से खूनी बवासीर (रक्तार्श) में लाभ होता है।
गर्भाशय की पीड़ा(Uterine Pain)-
तिलों को बारीक पीसकर तिल के ही तेल में मिला किंचित् गर्म करके नाभि के भाग में धीरे धीरे लेप करने या मलने (मर्दन करने) से शीत जन्यपीड़ा शान्त हो जाती है।
प्रमेह- तिल तथा अजवायन को दो एक के अनुपात में मिलाकर पीस लें और समान मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करवायें
पेट दर्द- 
 20-25 ग्राम साफ तिल चबाकर उपर से गर्म पानी पिलाने से पेट का दर्द ठीक हो जाता है। साथ ही तिलों को पीसकर लम्बा सा गोला बनाकर उसे तवे पर सहन करने योग्य करके पेट के उपर फिराने से अत्यन्त से अत्यन्त कष्टदायी पेट का दर्द (उदर शूल) भी शान्त हो जाता है।
सूजाक- 
15-15 ग्राम की मात्रा में काले तिल तथा देशी खाड बारीक पीसकर गाय के कच्चे दूध के साथ रोग की स्थिति के अनुसार सेवन करने से लाभ हो जाता है।

  



जायफल (Nutmeg) के आयुर्वेदिक और औषधीय गुण: the herbal and medicinal properties of nutmeg

     

    जायफल या मीरीस्टिका फ्रेगरैन्स् एक सदाबहार वृक्ष है जो इन्डोनेशिया  मूल का  है। इस पेड़ के फल 2 अलग-अलग मसालों के स्रोत हैं- जायफल और जाविंत्री। जायफल के बीज एक पीले रंग के खाने योग्य फल के अंदर होते हैं, जिसका आकार लगभग छोटे आडू जैसा होता है। यह फल दो भाग में कटकर, जाल जैसा, लाल रंग का आकार दर्शाता है जिसके अंदर बीज बँधा रहता है। इस बीजचोल को जमा कर, सूखाकर जाविंत्री के रुप में बेचा जाता है। इस बीजचोल के बीच में गहरे रंग का चमकीला मेवे जैसा आकार होता है और इसके अंदर अंडे के आकार का बीज होता है, जिसे जायफल कहते हैं।
जायफल को अकसर जाविंत्री या कड़े परत के बिना बेचा जाता है। यह अंडाकार और लगभग 1″ लंबे होते, हल्के सिकुड़े हुए और बाहर से गहरे भुरे रंग और अंदर से हल्के भुरे रंग के होते हैं। जायफल और जाविंत्री का स्वाद लगभग समान होता है और समान गुण होते हैँ। जायफल थोड़ा मीठा होता है ओर वहीं जाविंत्री का स्वाद सौम्य होता है। जाविंत्री को अकसर हल्के व्यंजन में डाला जाता है, जहाँ यह व्यंजन को नारंगी, केसर जैसा रंग प्रदान करता है और वहीं जायफल ज़रुरी तेज़ स्वाद प्रदान करता है, जैसे चीज़ सॉस में। जायफल  को बहुधा  कद्दूकस कर के खाने में डाला जाता है।
   अत्यधिक मात्रा में प्रयोग करने पर, जायफल द्रव्य पदार्थ के रुप में काम करता है और यह जहरीला भी हो सकता है। इसलिए, हर बार में एक या दो चुटकी से ज़्यादा प्रयोग ना करें।
जायफल यूं तो सर्दियों में उपयोगी है लेकिन इसकी औषधीय महत्ता आयुर्वेद में साल भर मानी गई है। यह वेदनानाशक, वातशामक और कृमिनाशक है। स्नायविक संस्थान के लिए उपयोगी होता है। यकृत को सक्रिय करने वाला और सुपाच्य होने से पाचन संस्थान के लिए उपयोगी होता है।
जायफल के गुण : 
यह स्वाद में चरपरा, कड़वा, कसैला, पचने पर कटु तथा हल्का, चिकना, तीक्ष्ण और गर्म है। इसका मुख्य प्रभाव पाचन-संस्थान पर ग्राही रूप में पड़ता है। यह शोथहर, पीड़ाशामक, दुर्गन्धनाशक, अग्निदीपक, वायुज्वरहर तथा कटु-पौष्टिक है।
अनिद्रा, खांसी, सांस, हिचकी, शीघ्रपतन और नपुंसकता आदि व्याधियां दूर करने में उपयोगी होता है। इसके चूर्ण और तेल को उपयोग में लिया जाता है।
नपुंसकता : 

जायफल को घिस कर दूध में मिलाकर हफ्ते में तीन दिन पीने से नपुंसकता की बीमारी दूर होती है। यौन शक्ति बढ़ाने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। इसके चूर्ण और तेल को शीघ्रपतन दूर करने में उपयोग में लिया जाता है।
  * इसे थोडा सा घिसकर काजल की तरह आँख में लगाने से आँखों की ज्योति बढ़ जाती है और आँख की खुजली और धुंधलापन ख़त्म हो जाता है।
*यह शरीर की स्वाभाविक गरमी की रक्षा करता है, इसलिए ठंड के मौसम में इसे जरूर प्रयोग करना चाहिए।
यह कामेन्द्रिय की शक्ति भी बढाता है।
*जायफल  आवाज में सम्मोहन भी पैदा करता है।
*जायफल और काली मिर्च और लाल चन्दन को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चेहरे पर लगाने से चेहरे की चमक बढ़ती है, मुहांसे ख़त्म होते हैं।
*किसी को अगर बार-बार पेशाब जाना पड़ता है तो उसे जायफल और सफ़ेद मूसली 2-2 ग्राम की मात्र में मिलाकर पानी से निगलवा दीजिये, दिन में एक बार, खाली पेट, 10 दिन लगातार।
*बच्चों को सर्दी-जुकाम हो जाए तो जायफल का चूर्ण और सोंठ का चूर्ण बराबर मात्रा में लीजिये फिर 3 चुटकी इस मिश्रण को गाय के घी में मिलाकर बच्चे को चटा दीजिये। सुबह शाम चटायें।
*फालिज का प्रकोप जिन अंगों पर हो उन अंगों पर Jayephal को पानी में घिसकर रोज लेप करना चाहिए, दो माह तक ऐसा करने से अंगों में जान आ जाने की 80%संभावना देखी गयी है।प्रसव के बाद अगर कमर दर्द नहीं ख़त्म हो रहा है तो जायफल पानी में घिसकर कमर पे सुबह शाम लगाएं, एक सप्ताह में ही दर्द गायब हो जाएगा।
*पैरों में जाड़े में बिवाई खूब फटती है, ऐसे समय ये जायफल बड़ा काम आता है, इसे महीन पीसकर बीवाइयों में भर दीजिये। 12-15 दिन में ही पैर भर जायेंगे।

*जायफल के चूर्ण को शहद के साथ खाने से ह्रदय मज़बूत होता है। पेट भी ठीक रहता है।
*अगर कान के पीछे कुछ ऎसी गांठ बन गयी हो जो छूने पर दर्द करती हो तो Jayephal को पीस कर वहां लेप कीजिए जब तक गाठ ख़त्म न हो जाए, करते रहिये।
*अगर हैजे के रोगी को बार-बार प्यास लग रही है, तो Jayephal को पानी में घिसकर उसे पिला दीजिये।
जी मिचलाने की बीमारी भी Jayephal को थोड़ा सा घिस कर पानी में मिला कर पीने से नष्ट हो जाती है।
*सर में बहुत तेज दर्द हो रहा हो तो बस जायफल  को पानी में घिस कर लगाएं।
*सर्दी के मौसम के दुष्प्रभाव से बचने के लिए जायफल  को थोड़ा सा खुरचिये, चुटकी भर कतरन हो जाए तो उसे मुंह में रखकर चूसते रहिये। यह काम आप पूरे जाड़े भर एक या दो दिन के अंतराल पर करते रहिये।
*आपको किन्हीं कारणों से भूख न लग रही हो तो चुटकी भर जायफल  की कतरन चूसिये इससे पाचक रसों की वृद्धि होगी और भूख बढ़ेगी, भोजन भी अच्छे तरीके से पचेगा।
*दस्त आ रहे हों या पेट दर्द कर रहा हो तो जायफल  को भून लीजिये और उसके चार हिस्से कर लीजिये एक हिस्सा मरीज को चूस कर खाने को कह दीजिये। सुबह शाम एक-एक हिस्सा खिलाएं।


    पुनर्नवा के गुण,लाभ,उपचार : Punarnava benefits and treatment


        पुनर्नवा का संस्कृत पर्याय 'शोथघ्नी' (सूजन को हरनेवाली) है। पुनर्नवा (साटी) या विषखपरा के नाम से विख्यात यह वनस्पति वर्षा ऋतु में बहुतायत से पायी जाती है। शरीर की आँतरिक एवं बाह्य सूजन को दूर करने के लिए यह अत्यंत उपयोगी है।
    पुनर्नवा का अभिप्राय यह है कि जो रसायन व रक्तवर्धक होने से शरीर को फिर से नया जैसा बना दे, उसे पुनर्ववा कहते हैं। पुनर्नवा का सूखा पौधा बारिश के मौसम में नया जीवन
    पाकर फूलने-फलने लगता है। पुनर्नवा पूरे भारत में खासकर गर्म प्रदेशों में बहुतायत से प्राप्त होता है। हर साल बारिश के मौसम में नए पौधे निकलना और गर्मी के मौसम में सूख जाना इसकी खासियत होती है। पुनर्नवा की 2 प्रकार की जातियां लाल और सफेद पाई जाती हैं। इनमें रक्त (खून) जाति वनस्पति का प्रयोग अधिकता से औषधि के रूप में किया जाता है। पुनर्नवा का कांड (तना), पत्ते, फूल सभी रक्त (खून या लाल) रंग के होते हैं। फलों के पक जाने पर वायवीय भाग सूख जाता है। परंतु भूमि में पड़ी रहती है, जो बारिश के मौसम में फिर से उग आती है।

        पुनर्नवा की तीन जातियां होती हैं। सफेद फूल वाली को विषखपरा, लाल फूल वाली को साठी और नीली फूल वाली को पुनर्नवा कहते हैं। सफेद पुनर्नवा की जड़ को पीस घी में मिलाकर आंख में लगाने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। आंखों में अगर खुजली हो रही हो तो इसे लगाने से फायदा होता है। रतौंधी के मरीज अगर गाय के गोबर के रस में पीपल के साथ उबालकर आंख में लगायें तो रतौंधी में लाभ होता है। लाल पुनर्नवा यानी साठी कड़वी और ठंडी होती है जो कि सांस की समस्‍या, कफ, पित्‍त और खून के विकार को समाप्‍त करती है।
    गुण : श्वेत पुनर्नवा भारी, वातकारक और पाचनशक्तिवर्द्धक है। यह पीलिया, पेट के रोग, खून के विकार, सूजन, सूजाक (गिनोरिया), मूत्राल्पता (पेशाब का कम आना), बुखार तथा मोटापा आदि विकारों को नष्ट करती है। पुनर्नवा का प्रयोग जलोदर (पेट में पानी का भरना), मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में परेशानी या जलन), घाव की सूजन, श्वास (दमा), हृदय (दिल) रोग, बेरी-बेरी, यकृत (जिगर) रोग, खांसी, विष (जहर) के दुष्प्रभाव को दूर करता है। यूनानी चिकित्सा पद्धति के अनुसार पुनर्नवा दूसरे दर्जे की गर्म और रूक्ष होती है। यह गुर्दे के कार्यो में वृद्वि करके पेशाब की मात्रा बढ़ाती है, खून साफ करती है, सूजन दूर करती है, भूख को बढ़ाती है और हृदय के रोगों को दूर करती है। इसके साथ ही यह बलवर्द्धक, खून में वृद्धि करने वाला, पेट साफ करने वाला, खांसी और मोटापा को कम करने वाला होता है।
    दमा के मरीजों के लिए भी यह बहुत फायदेमंद है। दमा के मरीज चंदन के साथ मिलाकर इसका सेवन करें। इससे कफ आना बंद होता है और दमे से श्‍वांस की नली में हुई सूजन भी समाप्‍त होती है। अपच होने पर पुनर्नवा का सेवन करने से फायदा होता है। गोनोरिया होने पुनर्नवा का प्रयोग करना चाहिए। इससे पेशाब की मात्रा बढ़ जाती है और गोनोरिया के घाव पेशाब के रास्‍ते बाहर निकल जाते हैं। गोनोरिया के रोगी को पुनर्नवा की जड़ पीसकर देना चाहिए।
    कफ की समस्‍या होने पर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दिन में कई बार नीला पुनर्नवा देने से फायदा होता है। ऐसा करने से उल्‍टी के साथ कफ निकल जाता है और मरीज को आराम मिलता है। पुनर्नवा का प्रयोग करने से दिल पर खून का दबाव बढ़ता है जिसके कारण ब्‍लड सर्कुलेशन तेजी से होता है और खून से होने वाले वाले विकार नही होते हैं।
    किडनी पर इसका प्रभाव पड़ता है और किडनी संबंधित बीमारियों के होने की संभावना कम होती है। हर रोज पुनर्नवा का रस 1 से 4 ग्राम देने पर गुर्दे के संक्रमण होने की कम संभावना होती है। इसमें पाया जाने वाला पोटैशियम नाइट्रेट और अन्‍य पोटैशियम के यौगिक विद्यमान होते हैं। जोड़ो में हो रहे दर्द को दूर करने के लिए इसका प्रयोग करना चाहिए। यह गठिया के मरीजों के लिए फायदेमंद है। गठिया के रोगी
    चूहे का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 2-2 ग्राम चूर्ण 10 ग्राम शहद के साथ दिन में 2 बार दें।
    पागल कुत्ते का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 25 से 50 ग्राम रस, 20 ग्राम घी में मिलाकर रोज पियें।
    विद्राधि (फोड़ा) : पुनर्नवा के मूल का काढ़ा पीने से कच्चा अथवा पका हुआ फोड़ा भी मिट जाता है।
    अनिद्राः पुनर्नवा के मूल का क्वाथ 100-100 मि.ली. दिन में 2 बार पीने से निद्रा अच्छी आती है।
    संधिवातः पुनर्नवा के पत्तों की भाजी सोंठ डालकर खायें।
    वातकंटकः वायुप्रकोप से पैर की एड़ी में वेदना होती हो तो पुनर्नवा में सिद्ध किया हुआ तेल पैर की एड़ी पर पिसें एवं सेंक करें।
    योनिशूलः पुनर्नवा के हरे पत्तों को पीसकर बनायी गयी उँगली जैसे आकार की सोगटी को योनि में धारण करने से भयंकर योनिशूल भी मिटता है।
    विलंबित प्रसव-मूढ़गर्भः पुनर्नवा के मूल के रस में थोड़ा तिल का तेल मिलाकर योनि में लगायें। इससे रुका हुआ बच्चा तुरंत बाहर आ जाता है।
    इसके पत्‍तों को पीसकर लें, उसे गरम करके जोड़ों पर लगाने से फायदा होता है। 
    पुनर्नवा के पत्‍ते विषनाशक होते हैं। सांप के काटने पर पुनर्नवा के पत्‍तों को पीसकर उसका रस निकाल सांप के कटे वाली जगह पर लगाने से विष का प्रभाव कम हो जाता है। यह बिच्‍छू का विष भी कम करता है। बिच्‍छू का डंक लगने पर इसकी जड़ को पानी में घिसकर लगाने से फायदा होता है।
    मात्रा : पुनर्नवा के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर, जड़ का चूर्ण 3 से 5 ग्राम, बीजों का चूर्ण 1 से 3 ग्राम, पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) चूर्ण 5 से 10 ग्राम।
    और भी-
     *पेट के रोगः गोमूत्र एवं पुनर्नवा का रस समान मात्रा में मिलाकर पियें।
    *श्लीपद (हाथीरोग) : 50 मि.ली. पुनर्नवा का रस और उतना ही गोमूत्र मिलाकर सुबह शाम पियें।
    *वृषण शोथः पुनर्नवा का मूल दूध में घिसकर लेप करने से वृषण की सूजन मिटती है। यह हाड्रोसील में भी फायदेमंद है।
    *हृदयरोगः हृदयरोग के कारण सर्वांगसूजन हो गयी हो तो पुनर्नवा के मूल का 10 ग्राम चूर्ण और अर्जुन की छाल का 10 ग्राम चूर्ण 200 मि.ली. पानी में काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पियें।
    *श्वास (दमा) : 10 ग्राम भारंगमूल चूर्ण और 10 ग्राम पुनर्नवा चूर्ण को 200 मि.ली. पानी में उबालकर काढ़ा बनायें। जब 50 मि.ली. बचे तब उसमें आधा ग्राम श्रृंगभस्म डालकर सुबह-शाम पियें।
    *रसायन प्रयोगः हमेशा उत्तम स्वास्थ्य बनाये रखने के लिए रोज सुबह पुनर्नवा के मूल का या पत्ते का 2 चम्मच (10 मि.ली.) रस पियें अथवा पुनर्नवा के मूल का चूर्ण 2 से 4 ग्राम की मात्रा में दूध या पानी से लें या सप्ताह में 2 दिन पुनर्नवा की सब्जी बनाकर खायें।
    *गैसः 2 ग्राम पुनर्नवा के मूल का चूर्ण, आधा ग्राम हींग तथा 1 ग्राम काला नमक गर्म पानी से लें।
    स्थूलता-मेदवृद्धिः पुनर्नवा के 5 ग्राम चूर्ण में 10 ग्राम शहद मिलाकर सुबह-शाम लें। पुनर्नवा की सब्जी बना कर खायें।
    *मूत्रावरोधः पुनर्नवा का 40 मि.ली. रस अथवा उतना ही काढ़ा पियें। पुनर्नवा के पान बाफकर पेड़ू पर बाँधें। 1 ग्राम पुनर्नवाक्षार (आयुर्वेदिक औषधियों की दुकान से मिलेगा) गरम पानी के साथ पीने से तुरंत फायदा होता है।
    *खूनी बवासीरः पुनर्नवा के मूल को पीसकर फीकी छाछ (200 मि.ली.) या बकरी के दूध (200 मि.ली.) के साथ पियें।
    *चूहे का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 2-2 ग्राम चूर्ण 10 ग्राम शहद के साथ दिन में 2 बार दें।
    *पागल कुत्ते का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 25 से 50 ग्राम रस, 20 ग्राम घी में मिलाकर रोज पियें।
    *विद्रधि (फोड़ा) : पुनर्नवा के मूल का काढ़ा पीने से कच्चा अथवा पका हुआ फोड़ा भी मिट जाता है।
    *अनिद्राः पुनर्नवा के मूल का क्वाथ 100-100 मि.ली. दिन में 2 बार पीने से निद्रा अच्छी आती है।
    *संधिवातः पुनर्नवा के पत्तों की भाजी सोंठ डालकर खायें।
    *वातकंटकः वायुप्रकोप से पैर की एड़ी में वेदना होती हो तो पुनर्नवा में सिद्ध किया हुआ तेल पैर की एड़ी पर पिसें एवं सेंक करें।
    *योनिशूलः पुनर्नवा के हरे पत्तों को पीसकर बनायी गयी उँगली जैसे आकार की सोगटी को योनि में धारण करने से भयंकर योनिशूल भी मिटता है।
    *विलंबित प्रसव-मूढ़गर्भः पुनर्नवा के मूल के रस में थोड़ा तिल का तेल मिलाकर योनि में लगायें। इससे रुका हुआ बच्चा तुरंत बाहर आ जाता है।
    *नेत्रों की फूलीः पुनर्नवा की जड़ को घी में घिसकर आँखों में आँजें।
    *नेत्रों की खुजलीः पुनर्नवा की जड़ को शहद अथवा दूध में घिसकर आँजने से लाभ होता है।
    *नेत्रों से पानी गिरनाः पुनर्नवा की जड़ को शहद में घिसकर आँखों में आँजने से लाभ होता है।
    *रतौंधीः पुनर्नवा की जड़ को काँजी में घिसकर आँखों में आँजें।
    *खूनी बवासीरः पुनर्नवा की जड़ को हल्दी के काढ़े में देने से लाभ होता है।
    *पीलियाः पुनर्नवा के पंचांग (जड़, छाल, पत्ती, फूल और बीज) को शहद एवं मिश्री के साथ लें अथवा उसका रस या काढ़ा पियें।
    *मस्तक रोग व ज्वर रोगः पुनर्नवा के पंचांग का 2 ग्राम चूर्ण 10 ग्राम घी एवं 20 ग्राम शहद में सुबह-शाम देने से लाभ होता है।
    *जलोदरः पुनर्नवा की जड़ के चूर्ण को शहद के साथ खायें।
    *सूजनः पुनर्नवा की जड़ का काढ़ा पिलाने एवं सूजन पर लेप करने से लाभ होता है।
    *पथरीः पुनर्नवामूल को दूध में उबालकर सुबह-शाम पियें।

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