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योग से पाएं खतरनाक रोगों पर नियंत्रण

योग से पाएं खतरनाक रोगों पर नियंत्रण

किसी कठिन और थका देने वाली दो-ढाई घंटे लंबी कसरत के बजाय बीस से तीस मिनट तक किया जाने वाला योगाभ्यास ज्यादा कारगर होता है। कसरत में फिर भी नुकसान की गुंजाइश रहती है क्योंकि पता नहीं शरीर में कौन सा रोग पल रहा है और की जा रही कसरत अपने दबाव से उस रोग को बढ़ा या बिगाड़ दे।
लेकिन योग में ऐसा कोई खतरा नहीं। कोई आसन अभ्यास अनुकूल नहीं बैठ रहा तो आपकी सांस उखड़ने लग सकती है या हो सकता है कि वह आसन करना संभव ही न हो। योग के इन फायदों के साथ ताजा अनुसंधानों में यह भी साबित हुआ है कि योग से मधुमेह, अस्थमा और हृदयरोग जैसी जटिल बीमारियां भी बिना किसी औषधि और उपचार के नियंत्रित की जा सकती है।
चिकित्सा विज्ञान दवाओं और इलाज के बावजूद रोग के ठीक होने या उसे काबू करने की गारंटी नहीं लेता परंतु योग तो निश्चित आश्वासन देता हैं क्योंकि यह शरीर में मौजूद रोग प्रतिरोधक क्षमता से तालमेल बिठाता है।
राजधानी के सर गंगाराम अस्पताल में सौ रोगियों पर योग के प्रभाव का परीक्षण किया गया। कारोनरी हृदय रोग और मधुमेह के रोगियों को दो वर्गों में बांटकर उनकी जीवन शैली में थोड़ा बदलाव किया। इनमें एक वर्ग को सिर्फ दवाओं के भरोसे ही रखा गया और दूसरे वर्ग को योगपरक जीवन शैली के लिए प्रेरित किया।
खानपान, योग और ध्यान समन्वित इस जीवन शैली के उत्साह वर्धक परिणाम आए। जिन साधकों ने योगपरक जीवन शैली अपनाई थी उनके बाडी मास इंडेक्स (बीएनएल), कोलेस्ट्रोल और रक्तचाप नियंत्रित मिले। इस अध्ययन का संयोजन कर रहे डा. डीएससी मनचंदा के अनुसार मधुमेह, हृदय रोग और अस्थमा जैसे आधुनिक सभ्यता के रोगों पर योग से नियंत्रण की दिशा में उत्साह वर्धक परिणाम आए हैं।

  1. अगर फ्लैट टमी चाहिए तो करे ये योग

अगर फ्लैट टमी चाहिए तो करे ये योग
फिट और स्लिम बनने की जद्दोजहद में हम हर दिन कुछ नया करने की सोचते हैं और करते भी है लेकिन कुछ दिनों में ये सोचकर छोड़ देते हैं कि कोई फायदा नहीं हो रहा है। तो अब आपकी चिंता खत्म होने वाली है। 
इस योग को करने से आपको मिलेगी फ्लैट टमी और आपका वजन होगा सौ फी सदी कम। इस आसान योग को करते वक्त थोड़ी सावधानी बरतने की आवश्यकता है और सही तरीके से किया गया योग लाभप्रद होता है।
इस योग का नाम है नौका आसन जो कि करने में आसान है और आपके पेट और जांघों की चर्बी को तेजी से कम करने में मदद करता है। नौका आसन को करने के कुछ आसान टिप्स जिनकी मदद से आप इस आसन को सही तरह से कर पाएंगे।
सबसे पहले सीधे लेट जाएं। अब अपने शरीर का उपरी हिस्सा और दोनों हाथों को उपर की तरफ सावधानी से उठाएं। ऎसे ही पैर भी उपर उठाएं। आपके हाथ हवा में तैरते नजर आएगें। इसी स्थिती में आप जीतनी देर रह सके रहें। 
फिर शरीर को धीरे धीर पुरानी स्थिती में ले आएं। इसमें आपका शरीर नौका की तरह से लगता है इसलिए इसे नौका आसन कहते हैं। ध्यान रखें हाथ और पैर उठाते वक्त सांस लेना है और नीचे रखते वक्त छोड़ना है। जब आप कुछ देर स्थिर रहें तब सांस को या तो रोक या हल्के हल्के लेते और छोड़ते रहे।
इस आसन को करने से आपको ये लाभ होंगे-
- इस आसन से आपका पेट और जांगे पतली होती है।
- अंगूठे से अंगुलियों तक खिंचाव होने के कारण शुद्ध रक्त तीव्र गति से प्रवाहित होता है, जिससे काया निरोगी बनी रहती है।
- यह आसन नाभि डिगने पर अत्यन्त प्रभावशाली है। 
- मोटे पेट को कम करने के लिए इस आसन से लाभ होता है। 
- पेट के कब्ज को दूर करता है। 
- हर्निया रोग में भी यह आसन लाभदायक माना गया है।
- नींद अधिक आती हो तो उसे नियंत्रित करने मे ये नौका आसन सहायक है।

अगर एनर्जी पानी है, तो कीजिए ये योग मुद्राएं

अगर एनर्जी पानी है, तो कीजिए ये योग मुद्राएं
योगा आपके शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने का काम करता है। ये एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। इससे शरीर को ऊर्जा मिलती है और शरीर और आत्मा का मिलन होता है। योगा से तनाव तो कम होता ही है, साथ ही ये वजन कम करने से लेकर कई अन्य बीमारियों के इलाज में कारगर साबित होता है।
बालासन
बालासन को करने के लिए घुटने के बल जमीन पर बैठें और शरीर का सारा भार एडियों पर डाल दें। फिर गहरी सांस लेते हुए आगे की तरफ झुकें। ये करते हुए आपका सीना जांघों को छूना चाहिए। इसके बाद अपने माथे से फर्श को छूने की कोशिश करें। कुछ सेकंड उसी स्थिति में रहे। फिर नॉर्मल हो जाएं। इसे करने से स्ट्रेस कम होता है और तुरंत एनर्जी मिलती है।
भुजंगासन
इसे कोबरा आसन भी कहा जाता है। इसके लिए जमीन पर उल्टे लेट जाएं। पैर और हिप्स को समान रूप से फैलाएं। हाथ की हथेलियों को जमीन पर कंधे की सीध में रखे। अब शरीर के बाकी हिस्से को बिना हिलाए ऊपर की तरफ देखे। कुछ देर इसी मुद्रा में रहें। इससे आप तुरंत एनर्जी पा सकते हैं।
श्वासन
ये आसन करने से एनर्जी के साथ-साथ शरीर को भी आराम मिलता है। ये आसन मन को गहरे ध्यान में ले जाकर शरीर में नई ऊर्जा का संचार करता है। इसके लिए जमीन पर दरी बिछाकर सीधा लेट जाए। अपनी आंखें बंद कर लें और अपने हाथ-पैरों को ढीला छोड़ दें। ये मुद्रा 5 से 20 मिनट तक की जा सकती है।
मर्जरी आसन
मर्जरी आसन के लिए दोनों घुटनों और हथेलियों के बल बैठ जाएं। हाथ, पैर और सिर का सीधा रखे और सामने की तरफ देखें। अब ठुड्डी को उठाते हुए सांस खींचकर सिर ऊपर की तरफ उठाएं और शरीर को अच्छी तरह स्ट्रेच करें। कुछ सेकंड बाद सांस छोड़ते हुए सिर नीचे की तरफ लाएं। इससे एनर्जी मिलने के साथ-साथ पेट की चर्बी भी कम होती है।
वीरभद्रासन
इसे करने के लिए सीधे खड़े हो जाएं। फिर दोनों पैरों के बीच में दूरी बनाएं और सांस खींचते हुए दोनों हाथों को दोनों दिशाओं में अपने कंधों के बराबर फैलाएं। अब गर्दन को दाई तरफ ले जाएं और दाएं घुटने को मोड़े। अपने हाथों को नमस्ते का आकार देकर ऊपर की तरफ रखें। अब सांस छोड़ते हुए दोनों हाथों को नीचे लाएं। थोड़ी देर ऎसे ही रहे और फिर से ये क्रिया दोहराएं। इससे शरीर मजबूत होता है और एनर्जी मिलती है।

दमा से राहत दिलाए योग व प्राणायाम

दमा से राहत दिलाए योग व प्राणायाम
दमा की यह कहावत अब पुरानी हो चुकी है कि दमा दम लेकर ही दूर होता है। दमा को श्वास रोग कहते हैं। दमा के रोगियों में सांस नली चौड़ी होने के बजाय सिकुड़ जाती है। सांस नली में पड़ी कार्बन डाई ऑक्साइड बाहर नहीं निकल पाती है और रोगी को बलपूर्वक एवं कठिनाई से उसे निकालने का प्रयास करना पड़ता है। परन्तु योग ने यह सिद्ध कर दिया है कि उन्हें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। दमे के रोगियों के लिए कुछ खास योगों में गोमुखासन और सूर्यभेदी प्राणायाम अत्यन्त लाभदायक है।
गोमुखासन
विधि: इस आसन में हमारे शरीर की आकृति गो के मुख समान हो जाती है, इसलिए इसका नाम गोमुखासन है। जमीन पर बैठ जाएं। बाएं पैर को आगे से मोड़कर पीछे की तरफ इस प्रकार लाएं कि एड़ी का हिस्सा हमारे नितम्बों को छुए। उसके बाद दाएं पैर को घुटने से मोड़कर मुड़ी हुई बाईं टांग के ऊपर रखिए। स्थिति घ्सी होनी चाहिए कि दोनों घुटने एक दूसरे के ऊपर आ जाएं। अब दाहिना हाथ कंधे के ऊपर मोड़कर पीछे ले जाएं। बांए हाथ को बगल की ओर ले जाकर दाएं हाथ की अंगुलियों को पकड़ लें। अपनी जांघ, कमर, गर्दन, सिर को सीधा रखें। सांस की गति सामान्य हो। कुछ देर रूकने के बाद इस आसन को इसी प्रकार दूसरी ओर से भी करें।
लाभ: इस आसन के अभ्यास से दमा रोग दूर होता है। इस आसन के अभ्यास से फेफड़े संबंधित सभी रोग व टीबी का निवारण होता है। यह आसन तनाव, अनिद्रा और थकान को दूर करता है। इस आसन से धातु की दुर्बलता, मधुमेह, लो ब्लड प्रेशर और हर्निया रोग में लाभ होता है। यह आसन प्रस्त्रयों की नियमित मासिक धर्म एवं ल्यूकोरिया की समस्या का भी निदान करता है। इस आसन को एक तरफ से करने से एक तरफ के फेफड़े का श्वास अवरूद्ध हो जाता है और दूसरी तरफ का फेफड़ा तीव्र चलने लगता है।
सूर्यभेदी प्राणायाम
विधि:  सुखासन या पाासन की मुद्रा में बैठ जाएं। आंखें बंद रखें। बाएं हाथ को बाएं घुटने पर ष्ज्ञान मुद्रा में रखें, फिर दाएं हाथ की अनामिका से बाएं नासिका के छिद्र को दबाकर बंद करें। फिर दाई नासिका से जोर से श्वास अन्दर लें। अपनी क्षमता अनुसार श्वास रोकने का प्रयास करें। फिर दाएं नासिका के छिद्र को बन्द कर बाएं नासिका छिद्र से श्वास निकाले। प्रारम्भ में इसके कम से कम 10 चक्र करें और धीरे-धीरे जब आप अभ्यस्त हो जाएं तो इसके चक्र बढ़ा लें। शुरू-शुरू में अभ्यासी इस प्राणायाम को करते वक्त सिर्फ दाई नासिका से सांस लें और बाई नासिका से निकाले। सांस रोकने का अभ्यास न करें।
लाभः इस प्राणायाम के अभ्यास से दमा, वात, कफ रोगों का नाश होता है। इस प्राणायाम से रक्त, उदर कृमि, कोढ़, त्वचा संबंधित रोग आदि दूर हो जाते हैं। इस प्राणायाम से हमारे शरीर में ऊर्जा बढ़ जाती है, जिससे कुण्डलिनी शक्ति जागृत हो जाती है। यह ध्यान में सहायक होता है। गर्भाशय के विकार और निम्न रक्तचाप में बहुत ही लाभदायक है यह प्राणायाम।

पॉजीटिव सोच के लिए कपालभाति योग करें

पॉजीटिव सोच के लिए कपालभाति योग करें
एकांत में और आराम की स्थिति में किया जाने वाला योग है कपालभाती। इसे किसी भी उम्र के लोग कर सकते हैं। 
लाभ
डायबिटीज, जोड़ों का दर्द, आर्थराइटिस, सांस व पेट संबंधी रोग, कब्ज, मोटापा व तनाव जैसी बीमारियों को दूर करने के साथ ही सकारात्मक सोच विकसित होती है। दिल के रोगियों को धीमी गति से इस योग को करना चाहिए। 
कब करें 
यह योग खाली पेट सूर्योदय से पहले या सूर्यास्त के बाद 10-15 मिनट के लिए कर सकते हैं। इसे खाने के तुरंत बाद न करके 3 से 4 घंटे बाद शांत वातावरण व खुली हवा में आसन पर बैठकर करें। इस योग को जल्दबाजी में न करके क्रमानुसार ही करना चाहिए। 
कैसे करें
पालथी मारकर आसन पर बैठें। कमर सीधी रखें। हाथ घुटनों पर व हथेली ऊपर की ओर रखें। तर्जनी अंगुली को अंगूठे से मिलाएं। 3-4 मिनट तक नाक से सांस झटके से छोड़ें। पेट अंदर जाएगा। थकने पर आंखे बंद करें व नाक पर ध्यान केंद्रित कर दोहराएं।

शीर्षासन से ठीक रहता है ब्लड सर्कुलेशन

शीर्षासन से ठीक रहता है ब्लड सर्कुलेशन
सिर के बल उल्टा हो जाने को शीर्षासन कहा जाता है। इसमें सिर या हाथों के बल अलग-अलग कोणों में शरीर को उल्टा किया जा सकता है। पूरे शरीर का संतुलन सिर या हाथों पर टिका होता है। योग शास्त्र में इसके कई फायदे बताए हैं।
लाभ 
ब्लड सर्कुलेशन ठीक होता है, मस्तिष्क में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ने से दिमाग सक्रिय होता है, ग्रंथियों की कार्य प्रणाली दुरूस्त होती है, पेट में स्थित अंगों जैसे आमाशय, लिवर, किडनी आदि एक्टिव होते हैं और पाचन तंत्र ठीक रहता है। ईसा पूर्व विख्यात ग्रीक फिजिशियन हिप्पोक्रेट्स भी रोगी को रस्सियों और पुली की सहायता से सीढियों पर उल्टा लटकाते थे।
इन्वर्जन थैरेपी
विदेशों में इसे "इन्वर्जन थैरेपी" के नाम से जाना जाता है जिसमें फ्लेक्सिबल बिस्तरनुमा टेबल पर यह आसन किया जाता है। पैरों को ग्रिप में बांधने के बाद शरीर को उल्टा लटकाया जाता है। इसमें पूरे शरीर का बोझ सिर या हाथों को नहीं उठाना पड़ता और चोट लगने की आशंका भी कम होती है। डिप्रेशन के शिकार लोगों के लिए भी यह फायदेमंद है।

नौकासन सिर से ले कर पैरों तक की सभी बीमारियां दूर करे

 नौकासन  सिर से ले कर पैरों तक की सभी बीमारियां दूर करे
नौका आसन यानी नाव के समान मुद्रा। पीठ एवं मेरूदंड को लचीला व मजबूत बनाये रखने के लिए नौकासन का अभ्यास काफी लाभदायक होता है। यह आसन ध्यान और आत्मबल को बढ़ाने में भी कारगर होता है। कंधों एवं कमर के लिए भी यह व्यायाम फायदेमंद है। शरीर को सुडौल बनाये रखने के लिए भी यह आसन बहुत ही लाभदायक होता है। 7 योग आसन जो आपके पेट को रखें स्वस्थ इससे पाचन क्रिया, छोटी-बड़ी आँत में लाभ मिलता है। अँगूठे से अँगुलियों तक खिंचाव होने के कारण शुद्ध रक्त तीव्र गति से प्रवाहित होता है, जिससे काया निरोगी बनी रहती है। हर्निया रोग में भी यह आसन लाभदायक माना गया है। निद्रा अधिक आती हो तो उसे नियंत्रित करने मे ये नौका आसन सहायक है।
बढ़ती तोंद कम करने में मदद करेगा नौकासन
अगर आप अपनी बढ़ती हुई तोंद की वजह से तनाव में हैं तो इसे कम करने का आसान उपाय जरूर जानना चाहेंगे। योग में इसके लिए नौकासन का अभ्यास बहुत फायदेमंद है।
नियमित रूप से यह आसन न सिर्फ पेट की चर्बी कम करने में मददगार है बल्कि शरीर को लचीला बनाने से लेकर पाचन संबंधी समस्याओं में यह काफी फायदेमंद है।
नौकासन करने की विधि - सबसे पहले शवासन की स्थिति में लेट जाएँ। फिर एड़ी-पंजे मिलाते हुए दोनों हाथ कमर से सटा कर रखें। हथेलियाँ जमीन पर तथा गर्दन को सीधी रखते हैं। अब दोनों पैर, गर्दन और हाथों को धीरे-धीरे एक साथ उपर की ओर उठाते हैं। आखिर में अपने पूरे शरीर का वजन नितंब के ऊपर रख दें। इस स्थिति में 30-40 सेकंड रुकने का प्रयास करें। फिर धीरे-धीरे पुन: उसी अवस्था में आ कर शवासन की अवस्था में लेट जाएँ। इस आसन को चार पांच बार करें।
नोट:- विशेष लाभ हेतु - आसन करते समय अपना गुरुमंत्र का जप करें। यदि दुर्भाग्य से गुरुमंत्र नहीं मिला है तो ॐ नमः शिवाय मंत्र का ही जप करें। अथवा जो भी मन्त्र मन को भाता हो, आसन के साथ - साथ उसीका जप करें।

छरहरी काया के लिए योगासन

छरहरी काया के लिए योगासन
सुंदर, सलोनी, छरहरी और सुडौल काया किसे पसंद नहीं है? प्राय: सभी स्त्रियां ऐसा ही होना चाहती हैं किन्तु वातावरण, रहन-सहन, खान-पान दिनचर्या एवं अनेक प्रकार की मजबूरियों के कारण बहुतों को चुपचाप मन मारकर रह जाना पड़ता है।
आम जीवन में स्त्री-पुरुष दोनों में ही शारीरिक फिटनेस या सुडौलता के प्रति जिज्ञासा बढ़ी है, परिणामस्वरूप प्रत्येक छोटे-बड़े शहरों व कस्बों में आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित व्यायामशाला, हैल्थ क्लब, जिम, क्लब एवं फिटेनस सेंटर दिखाई दे रहे हैं।
कभी-कभी यह भी देखने में आता है कि अल्पायु में ही शरीर का विकास इस प्रकार बेडौल हो जाता है कि आयु दुगनी-तिगुनी लगने लगती है तथा संबंधित अनेक विकृतियां दृष्टिगत हो जाती हैं। युवतियों को सूर्यनमस्कार, कटिचक्रासन, जानुशिरासन, गोरक्षासन, गोमुखासन, भुजंगासन, वातायनासन, गुल्डासन, उत्थिन कोणासन तथा प्राणायाम का अभ्यास करते रहने से स्वस्थ एवं सुडौल काया बनी रहती है।
दुबली-पतली एवं कमजोर महिलाओं की समस्याओं के समाधान के लिए सूर्यनमस्कार, मकरासन, हस्तपादासन, शलभासन आदि का अभ्यास करते हुए सब्जियों का सूप, फलों का रस, नींबू पानी में दो चम्मच शहद डालकर नित्य प्रति सुबह अवश्य ही पीते रहना चाहिए।
प्रौढ़ महिलाओं के जांघों पर प्राय: अनावश्यक मोटापा तथा भारीपन आ जाता है। पुट्ठा व कमर बेडौल हो जाते हैं। प्राय: प्रसव के बाद पेट भी ढीला होकर बेडौल व बड़ा हो जाता है। इस अवस्था में शरीर को स्वस्थ एवं सुडौल बनाये रखने के लिए गोमुखासन, मकरासन, गर्भासन, अद्र्धमस्स्येन्द्रासन, धनुरासन, समकोणासन, शवासन, सेतुबंधनासन, आदि आसनों का अभ्यास लाभदायक होता है।
इन आसनों के साथ ही प्राणायाम नियमित रूप से करते रहने से न केवल शरीर की विकृतियां ही दूर होती हैं बल्कि युवावस्था की सभी स्थितियां पूर्ववत् आ जाती हैं तथा आजीवन बनी रहती हैं।
प्रौढ़ावस्था की समस्याएं महिलाओं में प्राय: उम्र बढऩे के साथ-साथ ही बढ़ती चली जाती हैं। आयु बढऩे के साथ ही मोटापा अधिक बढ़ जाने से उनकी अनेक शारीरिक समस्याएं भी बढऩे लगती हैं।
इस अवस्था में सूक्ष्म व्यायाम, कटिचक्रासन, सूर्यनमस्कार, त्रिकोणासन, ताड़ासन, शलभासन, शिथिलापन, शवासन, योगनिद्रा, नौकासन एवं वीरभद्रासन आदि में जितना भी और जो भी हो सके, 20-30 मिनट तक नियमित रूप से प्रात:काल करना चाहिए। साथ ही प्राणायाम भी करते रहना चाहिए।
उपरोक्त आसनों के साथ ही निम्नांकित वैज्ञानिक सुझावों का भी पालन स्वस्थ एवं सुडौल शरीर के लिए लाभकारी होता है।
  • भोजन करने के आधे घंटे पहले और आंधे घंटे बाद में ही पानी पीना चाहिए। खाना खाने के बीच में पानी पीने से बचना चाहिए।
  • खाना खाने के कुछ मिनट पहले केवल सलाद चबा-चबाकर खायें।
  • योगाभ्यास तथा प्राणायाम को नियमित एवं खाली पेट ही प्रात: या सायंकाल करना चाहिए।

पेट, कमर और पीठ के लिए करें योगा

पेट, कमर और पीठ के लिए करें  योगा
यदि आपका पेट थुलथुल हो रहा है, कमर मोटी हो चली है या दुखती रहती है, तो योग की यह हल्की-फुल्की एक्सरसाइज करें। ‍इस एक्सरसाइज के नियमित अभ्यास करते रहने से निश्चितरूप से जहां पेट फ्लैट हो जाएगा वहीं कमर भी छरहरी हो जाएगी।
योगा एक्सरसाइज:
स्टेप 1- दोनों पैरों को थोड़ा खोलकर सामने फैलाए। दोनों हाथों को कंधों के समकक्ष सामने उठाकर रखें। फिर दाहिनें हाथ से बाएं पैर के अंगूठे को पकड़े एवं बाएं हाथ को पीछे की ओर ऊपर सीधा रखें, गर्दन को भी बाईं ओर घुमाते हुए पीछे की ओर देखने का प्रयास करें। इसी प्रकार दूसरी ओर से करें। इन दोनों अभ्यासों से कमर दर्द व पेट स्वस्थ होता है तथा कमर की बढ़ी हुई चर्बी दूर होती है, परन्तु जिनको अत्यधिक कमर दर्द है वे इस अभ्यास को न करें।
स्टेप 2- दोनों हाथों से एक दूसरे हाथ की कलाई पकड़कर ऊपर उठाते हुए सिर के पीछे ले जाएं। श्वास अन्दर भरते हुए दाएं हाथ से बाएं हाथ को दाहिनी ओर सिर के पीछे से खीचें। गर्दन व सिर स्थिर रहे। फिर श्वास छोड़ते हुए हाथों को ऊपर ले जाएं। इसी प्रकार दूसरी ओर से इस क्रिया को करें।
स्टेप 3- घुटने और हथेलियों के बल बैठ जाएं। जैसे बैल या बिल्ली खड़ी हो। अब पीठ को ऊपर खिठचें और गर्दन झुकाते हुए पेट को देखने का प्रयास करें। फिर पेट व पीठ को नीचे खिंचे तथा गर्दन को ऊपर उठाकर आसमान में देंखे। यह प्रक्रिया 8-12 बार करें।
एक्सट्रा टिप्स:
आहार संयम : सर्वप्रथम तो अपना आहार बदलें। पानी का अधिकाधिक सेवन करें, ताजा फलों का रस, छाछ, आम का पना, जलजीरा, बेल का शर्बत आदि तरल पदार्थों को अपने भोजन में शामिल करें। ककड़ी, तरबूज, खरबूजा, खीरा, संतरा तथा पुदीने का भरपूर सेवन करें तथा मसालेदार या तैलीय भोज्य पदार्थ से बचें। हो सके तो दो भोजन कम ही करें।
योगासन : प्रतिदिन सवेरे सूर्य नमस्कार का अभ्यास करें। कपालभाति और भस्त्रिका के साथ ही अनुलोम-विलोम करें। खड़े होकर किए जाने वाले योगासनों में त्रिकोणासन, कटिचक्रासन, ताड़ासन, अर्धचंद्रासन और पादपश्चिमोत्तनासन करें।
बैठकर किए जाने वाले आसनों में उष्ट्रासन, अर्धमत्स्येंद्रासन, सिंहासन, समकोणासन, ब्रम्ह मुद्रा और भारद्वाजासन करें। लेटकर किए जाने वाले आसनों में नौकासन, विपरीत नौकासन, भुजंगासन, धनुरासन और हलासन करें। बंधों में जालंधर और उड्डियान बंध का अभ्यास करें।

योगासनों के गुण और लाभ

योगासनों का सबसे बड़ा गुण यह हैं कि वे सहज साध्य और सर्वसुलभ हैं। योगासन ऐसी व्यायाम पद्धति है जिसमें न तो कुछ विशेष व्यय होता है और न इतनी साधन-सामग्री की आवश्यकता होती है। योगासन अमीर-गरीब, बूढ़े-जवान, सबल-निर्बल सभी स्त्री-पुरुष कर सकते हैं। आसनों में जहां मांसपेशियों को तानने, सिकोड़ने और ऐंठने वाली क्रियायें करनी पड़ती हैं, वहीं दूसरी ओर साथ-साथ तनाव-खिंचाव दूर करनेवाली क्रियायें भी होती रहती हैं, जिससे शरीर की थकान मिट जाती है और आसनों से व्यय शक्ति वापिस मिल जाती है। शरीर और मन को तरोताजा करने, उनकी खोई हुई शक्ति की पूर्ति कर देने और आध्यात्मिक लाभ की दृष्टि से भी योगासनों का अपना अलग महत्त्व है। आइये जानते हैं योगासन के गुण और लाभ के बारे में।
क्‍या हैं यागासन के लाभ- (1) योगासनों से भीतरी ग्रंथियां अपना काम अच्छी तरह कर सकती हैं और युवावस्था बनाए रखने एवं वीर्य रक्षा में सहायक होती है।
(2) योगासनों द्वारा पेट की भली-भांति सुचारु रूप से सफाई होती है और पाचन अंग पुष्ट होते हैं। पाचन-संस्थान में गड़बड़ियां उत्पन्न नहीं होतीं।
(3) योगासन मेरुदण्ड-रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाते हैं और व्यय हुई नाड़ी शक्ति की पूर्ति करते हैं।
(4) योगासन पेशियों को शक्ति प्रदान करते हैं। इससे मोटापा घटता है और दुर्बल-पतला व्यक्ति तंदरुस्त होता है।
(5) योगासन स्त्रियों की शरीर रचना के लिए विशेष अनुकूल हैं। वे उनमें सुन्दरता, सम्यक-विकास, सुघड़ता और गति, सौन्दर्य आदि के गुण उत्पन्न करते हैं।
(6) योगासनों से बुद्धि की वृद्धि होती है और धारणा शक्ति को नई स्फूर्ति एवं ताजगी मिलती है। ऊपर उठने वाली प्रवृत्तियां जागृत होती हैं और आत्मा-सुधार के प्रयत्न बढ़ जाते हैं।
(7) योगासन स्त्रियों और पुरुषों को संयमी एवं आहार-विहार में मध्यम मार्ग का अनुकरण करने वाला बनाते हैं, अत: मन और शरीर को स्थाई तथा सम्पूर्ण स्वास्थ्य, मिलता है।
(8) योगासन श्वास- क्रिया का नियमन करते हैं, हृदय और फेफड़ों को बल देते हैं, रक्त को शुद्ध करते हैं और मन में स्थिरता पैदा कर संकल्प शक्ति को बढ़ाते हैं।
(9) योगासन शारीरिक स्वास्थ्य के लिए वरदान स्वरूप हैं क्योंकि इनमें शरीर के समस्त भागों पर प्रभाव पड़ता है, और वह अपने कार्य सुचारु रूप से करते हैं।
(10) आसन रोग विकारों को नष्ट करते हैं, रोगों से रक्षा करते हैं, शरीर को निरोग, स्वस्थ एवं बलिष्ठ बनाए रखते हैं।
(11) आसनों से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। आसनों का निरन्तर अभ्यास करने वाले को चश्में की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
(12) योगासन से शरीर के प्रत्येक अंग का व्यायाम होता है, जिससे शरीर पुष्ट, स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनता है। आसन शरीर के पांच मुख्यांगों, स्नायु तंत्र, रक्ताभिगमन तंत्र, श्वासोच्छवास तंत्र की क्रियाओं का व्यवस्थित रूप से संचालन करते हैं जिससे शरीर पूर्णत: स्वस्थ बना रहता है और कोई रोग नहीं होने पाता।
शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक सभी क्षेत्रों के विकास में आसनों का अधिकार है। अन्य व्यायाम पद्धतियां केवल वाह्य शरीर को ही प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं, जब कि योगसन मानव का चहुँमुखी विकास करते हैं।

योग के ये 5 आसन दूर कर सकते हैं डिप्रेशन

योग के ये 5 आसन दूर कर सकते हैं डिप्रेशन
अक्सर किसी को खोने या जीवन में छोटी-बड़ी घटनाएं घटने से हम डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं। कई बार हम लंबे समय तक इसे नजरंदाज करते रहते हैं। इस तरह ना तो हम प्रफेशनली अपना बेस्ट दे पाते हैं और न ही निजी जिंदगी में खुश रह पाते हैं। ऐसा माना गया है कि डिप्रेशन का इलाज योग में भी है। आइए जानें कि किस तरह दिनचर्या से कुछ वक्त निकालकर योग के जरिए हम डिप्रेशन को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं- 
उत्तनासन- इस आसन के जरिए हम अपने मन-मस्तिष्क को एकाग्रता की ओर ले जाते हैं। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस आसन को 2-2 मिनट के अंतराल पर करने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है। आसन में आपको सीधे खड़े रहकर अपने पैरों की ओर झुकना है और दोनों हथेलियां पंजों के करीब रखनी हैं। याद रहे पीठ को उतना ही लचीला रखें जितने में आप हाथ को पंजों के करीब ले जा सकें। 
जनुसिर्सान- इस आसन को करने से मस्तिष्क में सकारात्मकता का सृजन होता है। निरंतर अभ्यास के बाद आप खुद को तरो-ताज़ा और ऊर्जावान महसूस करने लगते हैं। आसन को बैठकर हाथ आगे की ओर ले जाएं और पैरों को सीधा रखें। 

भुजंगासन- दिमाग को शांत कर नए सकारात्मक विचारों को अंदर लाने में मदद करने वाला यह आसन डिप्रेशन मरीजों के लिए बेहद लाभदायक है। ख़ास बात यह है कि इस आसन को नियमित करने से लिवर और किडनी ठीक से काम करते हैं। आसन को करने का तरीका है कि आप पेट के बल लेट जाएं और गर्दन से कमर तक के हिस्से को उठाए रखें। ध्यान रहे इस क्रिया में आपके हाथ ज़मीन पर ही रहेंगे, बस कमर से चेहरे तक का हिस्सा उठा हुआ रहेगा। ऐसा लगभग 5-15 मिनट तक अपनी सुविधानुसार करें। 
सेतुबंधसर्वांगासन- एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस आसन से आप शारीरिक-मानसिक संतुलन को मजबूत करते हैं। सीधे पीठ के बल लेटकर पैरों को ऐसे रखें कि जैसे आप बैठे हुए हैं। यह क्रिया कुछ वक्त तक निरंतर दोहराएं। इससे फेंफड़ों और स्वसन क्रिया पर भी सकारात्मक असर दिखता है। 
सलंबसिर्सासन- हालांकि यह आसन थोड़े से कठिन आसनों में आता है पर निरंतर अभ्यास से इसे करना काफी लाभदायक सिद्ध हो सकता है। इसमें आपको घुटनों पर पहले बैठ जाएं, फिर पूरे शरीर का बल हाथों पर लेते हुए पैरों को ऊपर उठाते हुए खुद को उल्टा खड़ा कर लें। यह क्रिया 10-15 सुविधानुसार नियमत करें। 

कई समस्याओं का एक हल: कपालभाति

कपालभाति प्राणायाम नहीं बल्कि षट्कर्म का अभ्यास है। इसके लिए पालथी लगाकर सीधे बैठें, आंखें बंदकर हाथों को ज्ञान मुद्रा में रख लें। ध्यान को सांस पर लाकर सांस की गति को अनुभव करें और अब इस क्रिया को शुरू करें। इसके लिए पेट के निचले हिस्से को अंदर की ओर खींचे व नाक से सांस को बल के साथ बाहर फेंके। यह प्रक्रिया बार-बार इसी प्रकार तब तक करते जाएं जब तक थकान न लगे। फिर पूरी सांस बाहर निकाल दें और सांस को सामान्य करके आराम से बैठ जाएं।
कपालभाति के बाद मन शांत, सांस धीमी व शरीर स्थिर हो जाता है। कुछ समय के लिए ध्यान की अवस्था में बैठे रहें। यह एक राउंड कपालभाति है। एक राउंड में जितनी बार आप आराम से सांस बाहर फेंक सकें उतना ही करें। इस प्रकार इसका तीन से चार राउंड अभ्यास कर लें।
सावधानी : यह अभ्यास सुबह खाली पेट शौचादि के बाद खुले वातावरण में करें। हाई बीपी, हृदय रोग में इसका अभ्यास गाइडेंस में करें। हर्निया, अल्सर व पेट का ऑपरेशन हुआ हो तो इसका अभ्यास न करें। महिलाओं को गर्भावस्था व मासिक धर्म के दिनों में यह अभ्यास नहीं करना चाहिए।

लाभ : अभ्यास के समय ध्यान को गिनती या घड़ी पर न रखें। बल्कि विचार करें कि निकलती हुई सांस अपने साथ अन्दर के विकारों को बाहर निकाल रही है।
पेट के बार-बार अन्दर जाने से पाचन तंत्र के अंग जैसे अमाशय, आंतें, लीवर, किडनी, पैंक्रियाज आदि अंग स्वस्थ हो रहे हैं।
इससे मोटापा, डायबटीज, कब्ज़, गैस, भूख ना लगना और अपच जैसे पेट के रोग ठीक होते हैं।
यह बाल झड़ने से भी बचाता है।
हृदय, फेफड़े, थायरॉयड व मस्तिष्क को बल मिलता है।
खून में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़कर रक्त शुद्ध होने लगता है।
महिलाओं में मासिक धर्म की अनियमितता, कष्टार्तव, श्वेत प्रदर, आदि को ठीक कर गर्भाशय व ओवरी को बल मिलता है।
इसके अभ्यास से हार्मोंस संतुलित रहते हैं व शरीर में गांठे नहीं पड़ने देते।
- यह क्रिया शरीर का वज़न संतुलित रखने में भी मदद करती है।

पेट के रोग में राम-बाण है अग्निसार क्रिया

हमारे शरीर को 13 प्रकार की अग्नियां चलाती हैं, जिनमें खाना पचाने में उपयोगी सात धातुओं की अग्नि, पांच भूतों की अग्नि व एक भूख लगाने वाली जठराग्नि होती है। अतः जो इन 13 प्रकार की अग्नियों को बल दे, उसे अग्निसार कहते हैं। यह क्रिया पेट के रोगों से जीवन भर बचाव के लिए बड़ी महत्वपूर्ण है। यह भी षट्कर्म का एक अभ्यास है।
विधि : इसके लिए खड़े हो जाए और दोनों पैरों को थोड़ा खोल लें। अब पूरी सांस भरें और अच्छी तरह से सांस बाहर निकालते हुए आगे झुकें और हाथों को जंघाओं पर रख लें। अब सांस को बाहर ही रोक कर रखें व हाथों से पैरों पर जोर डालते हुए पेट को अन्दर की तरफ खींचे और फिर बाहर की ओर ढीला छोड़े। इस प्रकार जब तक सांस बाहर रोक सकें, तब तक लगातार पेट को अंदर-बाहर पम्पिंग की तरह हिलाते रहें। फिर जब लगे अब सांस नहीं रोक सकते, तब पेट को ढीला छोड़ दें और सांस भरकर आराम से सीधे खड़े हो जाएं। थोड़ा आराम करने के बाद इस क्रिया को फिर से दोहरा लें। 3 से 4 बार क्रिया का अभ्यास करें।
सावधानियां : पेप्टिक अल्सर, कोलाईटिस, हर्निया या पेट का ऑपरेशन हुआ हो तो इसका अभ्यास न करें। स्त्रियां मासिक धर्म के दिनों में और गर्भावस्था में इसका अभ्यास न करें।

लाभ: इससे पेट के सभी अंगों को अधिक मात्रा में रक्त मिलने लगता है जिससे आमाशय, लीवर, आंतें, किडनी, मलाशय व मूत्राशय को बल मिलता है और इनसे संबंधित रोग नहीं होते। कब्ज, गैस, डकार, अफारा, भूख न लगना आदि पाचन तंत्र के रोग ठीक हो जाते हैं। इसलिए प्रतिदिन इसका अभ्यास करने से कभी पेट के रोग परेशान नहीं करते। इसके अभ्यास से कभी पेट बाहर नहीं निकलता। मोटापा दूर होने लगता है। डायबटीज़ में यह क्रिया राम-बाण की तरह कार्य करती है और बढ़ा हुआ शुगर लेवल बड़ी शीघ्रता से कम हो जाता है। साथ ही यह नपुंसकता को दूर कर युवा अवस्था को बनाए रखने में बड़ा उपयोगी है।

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