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च्यवनप्राश, सबसे पहले किसने और क्यों बनाया था

च्यवनप्राश, सबसे पहले किसने और क्यों बनाया था


सतयुग की बात है, आज से लाखों साल पहले, वैवस्वत मनु के पुत्र शर्याति वेदों के विद्वान थे। उनकी एक बहुत सुंदर बेटी थी जिसका नाम सुकन्या था। एक बार राजा शर्याति अपनी पत्नी और बेटी के साथ जंगल में भ्रमण करने गए। सुकन्या जंगल में घूम रही थी। तभी एक जगह उसे दीमकों की बांबी दिखाई दी। वहां एक छेद से उसे दो किरणें सी निकलती दिखाई पड़ी। अपनी चंचलता के कारण सुकन्या ने एक कांटे से उस ज्योति वाले छेद को बंद करने की कोशिश की। तभी उसमें से खून बहने लगा तो वह घबरा गई।
दरअसल, ऋषि च्यवन उस जगह तपस्या कर रहे थे, लंबे समय तक तपस्या में रहने के कारण उनके शरीर पर दीमकों ने घर बना लिया था। जिस जगह से ज्योति निकल रही थी वो च्यवन ऋषि की आंखें थीं, जो सुकन्या ने भूल से फोड़ दी थी।
सुकन्या ने डरते-डरते कहा पिताजी शायद मुझसे कुछ अपराध हो गया है। यह खून की धारा ज्योति से निकल रही है। यह देखकर राजा बहुत दुखी हुए। उन्होंने च्यवन ऋषि को अनुनय-विनय के साथ मनाने के लिए अपनी कन्या सुकन्या का विवाह उन्हीं से कर दिया और अपनी राजधानी लौट आए। क्रोधी च्यवन ऋषि की सेवा सुकन्या बड़ी श्रद्धा के साथ करती रही।
पति को प्रसन्न करके सुकन्या आश्रम में सुख से रह रही थी। एक बार अश्विनी कुमार आश्रम में आए। च्यवन ऋषि ने उनका स्वागत सत्कार करके उन्हें प्रसन्न किया। फिर आग्रह किया मैं आपको यज्ञ में सोमरस पान का अधिकार दिलवा दूंगा, आप मुझे वृद्धावस्था से छुटकारा दिलवा दीजिए। 
देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों ने च्यवन ऋषि को कुंड में स्नान कराया आैर उन्हें औषधियों से बना एक मिश्रण खिलाया। जब वे तीनों कुंड से बाहर आए तो तीनों का रूप एक सा था। इसी मिश्रण को बाद में च्यवनप्राश कहा गया। अश्विनी कुमारों ने आश्रम लौटकर सुकन्या से कहा- देवी तुम अपने पति को पहचान लो।सुकन्या तीनों को देखकर चकित थी। उसने अश्विनी कुमारों की स्तुति की।
कुछ समय बीत जाने पर राजा शर्याति यज्ञ का नियंत्रण देने अपनी पुत्री और जमाता च्यवन ऋषि के यहां आए। उन्होंने देखा, वहां एक रूपवान युवक के साथ सुकन्या बैठी है।
गुस्से में आकर उन्होंने अपनी पुत्री की निंदा की –तुमने अपने वृद्ध पति का त्याग करके अन्य पुरुष के साथ संबंध जोड़कर मेरे कुल को कलंकित कर दिया है। सुकन्या ने धीरे से कहा- यही मेरे पति च्यवन ऋषि हैं, जिनके साथ विवाह करके आप मुझे यहां छोड़ गए थे। राजा शर्याति प्रसन्न हुए। उन्होंने पुत्री को गले से लगाया। राजा से सोमयज्ञ कराया और उसमें महर्षि च्यवन ने अश्विनी कुमारों को भी सोमरस का पान कराया।

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