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ताकि नए शहर में न हो जेब ख़ाली


ताकि नए शहर में न हो जेब ख़ाली
जब बैकी ब्लूमवुड (ब्रिटिश लेखिका सोफ़ी किन्सेला के उपन्यास शॉपहॉलिक सिरीज़ का एक काल्पनिक किरदार) अपना नया करियर शुरू करने न्यू यॉर्क पहुंचीं, तो कुछ ही दिनों में उनके सामने उनकी क्रेडिट कार्ड देनदारी का ढेर लग गया था. बेशक़ शॉपहॉलिक में यह परिस्थिति कॉमिक अंदाज़ में बताई गई थी. लेकिन हक़ीक़त में ऐसा समय बहुत दुखदायी होता है. उधार में डूबते हुए, जब दूर-दूर तक कोई सहारा नहीं दिखता, हालात बहुत परेशान कर देने वाले होते हैं. फिर भी आप कुछ ऐसे क़दम उठा सकते हैं, जो आपके लिए मददगार साबित हों.
शांत रहें
चेन्नई की मनोवैज्ञानिक माधवी सुंदर कहती हैं,‘‘जब आपको महसूस होता है कि आप अपने पहले ही प्रयास में असफल रहे, तो ऐसे में ख़ुद से शर्मिंदगी या ग्लानि महसूस करना बहुत आम बात है, लेकिन ख़ुद को याद दिलाते रहें कि ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है. ऐसे में शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छुपाने की बजाय अपनी परिस्थितियों को स्वीकारने और उनसे निपटने के लिए ख़ुद को तैयार करें. ख़ुद से ‘मैं ही क्यों’ पूछने की बजाय, यह सोचें कि कमी कहां रही. आगे देखें, पीछे नहीं, और सकारात्मक रहें.’

हिसाब-किताब का वक़्त
आपने पैसा कहां गंवाया? क्या आपकी जीवनशैली का स्तर आपकी जेब की गहराई से ज़्यादा है? अगर ऐसा है, तो अपने ख़र्चों पर कटौती करने का समय आ गया है. चेन्नई की फ़ायनैंशियल एेनलिस्ट लाज अनवर कहती हैं, ‘‘कई बार कार पर ख़र्चा गया पैसा या मार्केट में उतार-चढ़ाव के कारण कुछ स्टॉक्स का गिरना भी आपको वित्तीय संकट में धकेल सकते हैं. ऐसे में परेशान न हों. यह सोचें कि अपने ग़लत निवेश से कैसे उबरा जाए, ख़र्चे कम करें और आगे की योजना पर काम करें. जीवनशैली में परिवर्तन लाएं. शायद समय आ गया है कि आपको रहने का स्थान किसी के साथ बांटना होगा या फिर कोई सस्ती जगह देखनी होगी, बाहर खाना बंद करना होगा. संभव हो तो बस, साइकिल या फिर पैदल ही काम पर जाएं. कपड़ों पर फिज़ूलख़र्ची न करें; बल्कि वह सामान ख़रीदें जो कई तरह से
काम आए.’’
जब जहां हों...
यह सोचना ग़लत होगा कि नए शहर में आपके घर जैसी परिस्थितियां मिलेंगी. लाज अनवर कहती हैं,‘‘विभिन्न शहरों की अर्थव्यवस्थाएं अलग होती हैं. आपके जितना वेतन प्राप्त करने वाले और सामाजिक स्तर वाले कुछ लोगों से बात करें और जानने की कोशिश करें कि वह कैसे अपनी जीवनशैली और पैसे में संतुलन बनाते हैं. कुछ ऐसा ज़रूर होगा, जो आपकी नज़र से दूर हो-राशन ख़रीदने की सस्ती दुकान, कोई सस्ता कैफ़े या मनोरंजन के कुछ क़ििफ़ायती साधन.’
जब इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी प्रोफ़ेशनल बिंदिया शेखरन पांच वर्ष पहले चेन्नई से लंदन पहुंची थीं, तो सामने दिखने वाले बेहतरीन शॉपिंग विकल्पों, थियेटर और नाइटक्लब्स को देखकर बेहद ख़ुश थीं. वह बताती हैं,‘‘मेरी हालत कैंडी की दुकान में एक बच्चे की तरह थी, जिसके पास ख़र्च करने को बेहिसाब पैसे थे. मैं लगातार शॉपिंग और महंगे रेस्तरां में खाना खाने लगी, और एक दिन मुझे महसूस हुआ कि मेरे ख़र्चे मेरी आमदनी से कहीं अधिक पहुंच चुके थे. इसलिए मैंने तीन महीने तक हर तरह की फ़िज़ूलख़र्ची बंद कर दी, जब तक कि मेरे सारे उधार नहीं उतर गए. यह मुश्क़िल, लेकिन बहुत समझदारी से भरा क़दम था. इसके बाद मैंने फालतू ख़र्चों के लिए एक बजट तय किया और उस पर कायम रही.’’

सहयोग की तलाश
नए शहर में यह मुश्क़िल काम होगा, लेकिन कोई दोस्त या ऐसे समूह की तलाश करें, जो आपको भावनात्मक सहारा दें. माधवी सुंदर के अनुसार,‘‘सिर्फ़ यह पता होना कि ऐसा कोई है, जिसे आप अपनी समस्याएं सुना सकती हों, आपको भावनात्मक सहारा देता है. वह आपकी परिस्थिति को समझकर सलाह और व्यावहारिक सुझाव दे सकते हैं. और अगर वह बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के आपको कारपूल जैसी सुविधा दे सकें, तो मदद स्वीकारने में देर मत कीजिए. हालांकि, आपको बेहिसाब उधार लेने से बचना चाहिए, ऐसे में दोस्तों का साथ तो छूटता ही है, फिर से पुरानी हालत में पहुंचने का ख़तरा भी बना रहता है!’’
परिवार का सहारा
अधिकांश लोग एक सीमा तक पहुंचने से पहले इस विकल्प का चुनाव नहीं करते. ऐसा इसलिए कि या तो वह अपने अभिभावकों को तंग नहीं करना चाहते, या फिर अपनी हालत बताने से झिझकते हैं. वहीं, अधिकांश भारतीय परिवार ऐसी परिस्थितियों में अपने बच्चों को सबकुछ छोड़कर वापस आने की सलाह देने को तैयार रहते हैं. परिवार से बात करें और उन्हें बताएं कि आप नए शहर में ही रहना चाहेंगे लेकिन आपको थोड़ी और मदद की ज़रूरत है. लाज अनवर कहती हैं,‘‘अगर परिवार इस लायक हो तो आप उनसे उधार मांग सकते हैं. यह ठीक रहेगा, क्योंकि इस उधार को चुकाने की शर्तें आसान होंगी और आपके ऊपर ब्याज का भार नहीं आएगा. अगर आप पैसा घर भेजते हैं तो परिवार से ही कुछ कटौतियां करने को कहें, क्योंकि कुछ समय तक आप कम पैसा भेज पाएंगे. जो भी हो, परिवार को सच बताने में ईमानदारी बरतें.’’


शहर पर फिर से सोचो
पीआर कंसल्टेंट आदित्य के* बेहतर करियर की तलाश में बैंगलोर से नई दिल्ली गए थे. उन्हें जल्दी ही महसूस हुआ कि ज़्यादा वेतन के बावजूद वह कुछ बचा नहीं पा रहे थे. हालात यह थे कि उन्हें कई बार अपने अभिभावकों से मदद मांगनी पड़ी. आदित्य के अनुसार,‘‘दिल्ली की पीआर इंडस्ट्री में ख़ुद को बनाए रखने के लिए हमें कुछ अतिरिक्त पैसा ख़र्च करना पड़ता है. यह अपने आप में कुछ ग़लत नहीं है, लेकिन मेरे लिए यह ठीक साबित नहीं हुआ, क्योंकि मुझे किराया और अन्य ख़र्चे भी उठाने पड़ते थे. इसलिए मैंने बंगलौर में ही काम खोजा और वापस लौट गया. आज बेशक़ हालात बदल गए हैं, लेकिन अगर मैं वहां रुका होता तो आर्थिक तौर पर मुझे बहुत नुक़सान पहुंचता.’’
आग्रह पर नाम बदले गए हैं.

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