Header Ads

योग करें,


योग करें, धूम्रपान से छुटकारा पाएं


धूम्रपान के नुकसान से तो हर कोई वाकिफ है, लेकिन इस लत को छोड़ पाने में सभी बेहद लाचार साबित होते हैं। लेकिन ताजा अध्ययन में पता चला है कि योग के जरिए धूम्रपान की लत से छुटकारा पाने में आसानी होती है। प्राण योग के विशेषज्ञ दीपक झा ने बताया कि योग, धूम्रपान छोड़ने का एक समग्र समाधान है। साथ ही दीपक यह भी बताते हैं कि योग केवल धूम्रपान की आदतों से ही लोगों को दूर नहीं रखता बल्कि शरीर पर हुए दुष्प्रभाव को भी दूर कर देता है।


धूम्रपान छोड़ने के लिए यूं तो बाजार में तमाम तरह के रासायनिक विकल्प उपलब्ध हैं, लेकिन इनके सहारे धूम्रपान छोड़ना उतना आसान नहीं होता। सिगरेट के धुएं से निकलने वाला विषाक्त पदार्थ शरीर में प्रवेश कर खून का गाढ़ापन बढ़ा देता है और धीरे-धीरे एक थक्के के रूप में जम जाता है। यह रक्तचाप और हृदय की गति को भी प्रभावित करता है। साथ ही यह धमनियों को संकरा कर अंगों में ऑक्सीजन युक्त रक्त परिसंचरण की मात्रा को कम कर देता है।

धूम्रपान के दुष्प्रभावों से बचने के लिए योग एक अच्छा तरीका है। योगासन और श्वसन से संबंधित व्यायाम धूम्रपान के प्रभाव को खत्म करके फेफड़ों की दशा में सुधार लाते हैं। ध्यान और शुद्धि विषाक्त पदार्थों को शरीर से दूर कर कोशिकाओं को उत्साहित करने में मदद करता है। योग की सहज श्वास तकनीक को प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम से शरीर पूरी तरह से चुस्त रहता है, साथ ही तनाव और चिंता दूर होती है और आत्मविश्वास भी बढ़ता है। निम्न योग आपके मददगार हो सकते हैं 
सर्वागासन (शोल्डर स्टैंड),
सेतु बंधासन (ब्रिज मुद्रा),

भुजंगासन (कोबरा पोज),

शिशुआसन (बाल पोज),

ये सभी आसन स्मोकिंग से छूटकारा दिलाने में मदद करते हैं।
योग
‘योग’ शब्द ‘युज समाधौ’ आत्मनेपदी दिवादिगणीय धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय लगाने से निष्पन्न होता है। इस प्रकार ‘योग’ शब्द का अर्थ हुआ- समाधि अर्थात् चित्त वृत्तियों का निरोध। वैसे ‘योग’ शब्द ‘युजिर योग’ तथा ‘युज संयमने’ धातु से भी निष्पन्न होता है किन्तु तब इस स्थिति में योग शब्द का अर्थ क्रमशः योगफल, जोड़ तथा नियमन होगा। आगे योग में हम देखेंगे कि आत्मा और परमात्मा के विषय में भी योग कहा गया है।


गीता में श्रीकृष्ण ने एक स्थल पर कहा है 'योग: कर्मसु कौशलम्‌' (कर्मो में कुशलता को योग कहते हैं)। स्पष्ट है कि यह वाक्य योग की परिभाषा नहीं है। कुछ विद्वानों का यह मत है कि जीवात्मा और परमात्मा के मिल जाने को योग कहते हैं। इस बात को स्वीकार करने में यह बड़ी आपत्ति खड़ी होती है कि बौद्धमतावलंबी भी, जो परमात्मा की सत्ता को स्वीकार नहीं करते, योग शब्द का व्यवहार करते और योग का समर्थन करते हैं। यही बात सांख्यवादियों के लिए भी कही जा सकती है जो ईश्वर की सत्ता को असिद्ध मानते हैं। पंतजलि ने योगदर्शन में, जो परिभाषा दी है 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः', चित्त की वृत्तियों के निरोध = पूर्णतया रुक जाने का नाम योग है। इस वाक्य के दो अर्थ हो सकते हैं: चित्तवृत्तियों के निरोध की अवस्था का नाम योग है या इस अवस्था को लाने के उपाय को योग कहते हैं।


परिभाषा


1. पातंजल योग दर्शन के अनुसार - योगश्चित्तवृत्त निरोधः (1/2) अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।


2. सांख्य दर्शन के अनुसार - पुरुषप्रकृत्योर्वियोगेपि योगइत्यमिधीयते। अर्थात् पुरुष एवं प्रकृति के पार्थक्य को स्थापित कर पुरुष का स्व स्वरूप में अवस्थित होना ही योग है।

3. विष्णुपुराण के अनुसार - योगः संयोग इत्युक्तः जीवात्म परमात्मने। अर्थात् जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही योग है।


4. भगवद्गीता के अनुसार - सिद्दध्यसिद्दध्यो समोभूत्वा समत्वंयोग उच्चते । (2/48) अर्थात् दुःख-सुख, लाभ-अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत और उष्ण आदि द्वन्दों में सर्वत्र समभाव रखना योग है। भगवद्गीता के अनुसार - तस्माद्दयोगाययुज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्। अर्थात् कर्त्तव्य कर्म बन्धक न हो, इसलिए निष्काम भावना से अनुप्रेरित होकर कर्त्तव्य करने का कौशल योग है।


5. आचार्य हरिभद्र के अनुसार - मोक्खेण जोयणाओ सव्वो वि धम्म ववहारो जोगो। मोक्ष से जोड़ने वाले सभी व्यवहार योग है।


6. बौद्ध धर्म के अनुसार - कुशल चितैकग्गता योगः। अर्थात् कुशल चित्त की एकाग्रता योग है।


योग भारत में एक आध्यात्मिक प्रकिया को कहते हैं जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने (योग) का काम होता है। यह शब्द, प्रक्रिया और धारणा बौद्ध धर्म,जैन धर्म और हिंदू धर्म में ध्यान प्रक्रिया से सम्बंधित है। योग शब्द भारत से बौद्ध धर्म के साथ चीन, जापान, तिब्बत, दक्षिण पूर्व एशिया और श्री लंका में भी फैल गया है और इस समय सारे सभ्य जगत्‌ में लोग इससे परिचित हैं।


इतनी प्रसिद्धि के बावजूद इसकी परिभाषा सुनिश्चित नहीं है। भगवद्गीता प्रतिष्ठित ग्रंथ माना जाता है। उसमें योग शब्द का कई बार प्रयोग हुआ है, कभी अकेले और कभी सविशेषण, जैसे बुद्धियोग, संन्यासयोग, कर्मयोग। वेदोत्तर काल में भक्तियोग और हठयोग नाम भी प्रचलित हो गए हैं। महात्मा गांधी ने अनासक्ति योग का व्यवहार किया है। पातंजल योगदर्शन में क्रियायोग शब्द देखने में आता है। पाशुपत योग और माहेश्वर योग जैसे शब्दों का भी चर्चा मिलता है। इन सब स्थलों में योग शब्द के जो अर्थ हैं वह एक दूसरे के विरोधी हैं परंतु इतने विभिन्न प्रयोगों को देखने से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि योग की परिभाषा करना कठिन काम है।
खूबसूरती को लंबे समय तक बनाए योग


योगासन के आसनों में खास बात होती है कि हर आसन अपने आप में पूर्ण होता है। योग के इन आसनों के जरिए सेहतमंद तो आप खुद को बना ही सकते है बल्कि योग के जरिए आप अपने सौंदर्य और खूबसूरती को लंबे समय तक बनाए रख सकते है। योग के ये आसन आपकी त्वचा को ढीली नहीं पड़ने देंगे। योगासन के ये आसान आसन और पोज आपके यौवन के साथ आपकी खूबसूरती को भी बनाए रखेंगे। योग के ये आसन आपको सौंदर्य से लबालब कर देंगे। हमारे चेहरे में ही सौंदर्य और खूबसूरती का राज छिपा है जिसे अपनाकर मनचाहा सौंदर्य और यौवन पाया जा सकता है। हम अपने चेहरों को एक निश्चित आकार देकर और आसान आसनों के जरिए सुंदरता और यौवन को लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं।
शेर की तरह चेहरा (सिंहासन) : धीरे-धीरे सांस लें और उसे थोड़ी देर तक रोककर रखें। फिर आप अपने जीभ को बाहर निकाले। अपनी आखों को पूरी तरह से जितना हो सकें खोलें। इस अवस्था में बैठे रहे और जितना हो सकें अपनी जीभ को मुंह से बाहर निकालें। यह आपके शरीर में रक्त संचार बढ़ाता है। साथ ही इससे मांसपेशियों का तनाव भी खत्म होता है। 


मछली की तरह चेहरा (मत्सय आसन): इस आसन में शरीर का आकार मछली जैसा बनता है, इसलिए यह मत्स्यासन कहलाता है। इस आसन को करने के लिए आप लंबी सांस लें। इसे थोड़ी देर तक रोक कर रखे। पहले पद्मासन लगाकर बैठ जाएं। फिर पद्मासन की स्थिति में ही सावधानीपूर्वक पीछे की ओर चित होकर लेट जाएं। ध्यान रहे कि लेटते समय दोनों घुटने जमीन से ही सटे रहें। फिर दोनों हाथों की सहायता से शिखास्थान को भूमि पर टिकाएं। उसके बाद बाएं पैर के अंगूठे और दोनों कोहनियों को भूमि से लगाए रखें। एक मिनट से प्रारम्भ करके पांच मिनट तक अभ्यास बढ़ाएं। फिर हाथ खोलकर हाथों की सहायता से सिर को सीधा कर कमर, पीठ को भूमि से लगाएं। फिर हाथों की सहायता से उठकर बैठ जाएँ। आसन करते वक्त श्वास-प्रश्वास की गति सामान्य बनाए रखें।


इससे आँखों की रोशनी बढ़ती है। गला साफ रहता है तथा छाती और पेट के रोग दूर होते हैं। रक्ताभिसरण की गति बढ़ती है, जिससे चर्म रोग नहीं होता। दमे के रोगियों को इससे लाभ मिलता है। पेट की चर्बी घटती है। खाँसी दूर होती है।


आंखों से कसरत (नेत्रासन): गहरी सांस लें और अपनी गर्दन को सीधा रखें। अपनी आखों को बायी तरफ घुमाएं। इस अवस्था में कुछ देर तक रहने की कोशिश करें। कुछ सेकेंड के बाद अपनी आंखों को दायी तरफ घुमाएं। इस प्रक्रियो को दोहराते रहे। आंखों की पुतलियों उस अमुक दिशा में पूरी तरह घूमनी चाहिए। इस बात का ध्यान रखें।


गाल से योग: मुंह में जितना हो सकें हवा भर लें । फिर उसे कुछ देर तक रोकें। आपका गाल पूरी तरह फूल जाएगा क्योंकि उसमें हवा भरा हुआ है। इस अवस्था में 30 से 60 सेकेंड तक रहें। फिर मुंह में जमा सांसों को नाक के जरिए छोड़ दें। इस प्रक्रियां को तीन से छह बार दोहराएं।


हथेलियों से योग: अपनी हथेलियों को रगड़कर उन्हें गर्मी प्रदान करें। फिर आंखों को बंद करें और उन्हें अपनी हथिलियों से ढक लें। फिर अपनी नाक के दोनों नथुनों से सांस लें। जितनी देर तक रोक सकते हो रोकें। इससे आपकी आखों को आराम मिलेगा। आप खुद को रिलैक्स महसूस करेंगे। आपकी मांसपेशियों का तनाव दूर होगा। इस बात का ध्यान रखें कि गर्म हथेलियों से चेहरे को पूरी तरह ढकें। 

गर्दन से वर्जिश: आप बिल्कुल सीधी अवस्था में बैठ जाएं। आपकी रीढ़ की हड्डियों बिल्कुल सीधी होनी चाहिए। अपनी हाथों को सीधा कर लें। फिर धीरे से हाथों को मोड़े। फिर उसके बाद उसे सीधा करें। इससे आपको गर्दन के दर्द से छुटकारा मिलेगा। आपको गर्दन की मांसपेशियों में आराम मिलेगा। गर्दन को बिल्कुल सीधी रखें। 


होठों से योग: गहरी सांस लें। अपनी आंखों को बंद कर लें। अपने होठों को जितना संभव हो सकें सख्त करके बंद कर ले। फिर अपने चेहरे को सख्त कर लें। आप इस प्रकार करने की कोशिश करें जैसे आप खुद को रोने से रोकने की कोशिश कर रहे है। फिर अपने चेहरे को ढीला कर ले। जितनी देर रह सकें रहे रहे। सांसों को रोकें रखें। जब जरूरत हो तब सांस लें। इससे आपके पूरे चेहरे का व्यायाम होगा और आराम मिलेगा।

डिप्रेशन हो या माइग्रेन, योग से ठीक रहेगा ब्रेन



योग से सेहत संवारने में थोड़ा वक्त जरूर चाहिए लेकिन इसका असर रामबाण है। बदलती जीवनशैली से जो बीमारियां आम हो चुकी हैं उनको चंद आसन ठीक कर सकते हैं। योग में ऐसे आसन भी हैं जिनसे रोग जिस्म पर सवार होने की हिम्मत नहीं कर सकता। योग विशेषज्ञ मीना सोंधी कहती हैं कि आसनों का असर इतना है कि दवाओं का सहारा लेने की जरूरत ही नहीं।


ये हैं शीर्ष 10 आसन

सूक्ष्म आसन
चालीस की उम्र पार कर चुकी महिलाओं में खानपान की अनियमितता आदि से कैल्शियम की कमी हो जाती है। इसका नतीजा यह है कि घुटनों में दर्द और स्पांडलाइटिस की तकलीफ परेशान करने लगती है। इस आसन को करने से काफी लाभ होता है।

तितली आसन
महिलाओं में गर्भाशय संबंधी समस्या और मांसपेशियों में खिंचाव इस आसन से दूर हो जाते हैं। नियमित आसन करने से इस समस्या से निजात पाई जा सकती है।


कपालभाति
हर उम्र के स्त्री-पुरुष के लिए लाभकारी हैं। इससे फेफड़ों और नर्वस सिस्टम ठीक रहते हैं।


अनुलोम-विलोम
सांस संबंधी दिक्कत, ब्लड प्रेशर और शुगर कंट्रोल में कारगर है। सभी कर सकते हैं।


भ्रामरी प्राणायाम
मानसिक दबाव, एंजायटी और डिप्रेशन को दूर किया जा सकता है। सभी के लिए लाभकारी है।


शीतली प्राणायाम
गर्मी के दिनों में शीतली प्राणायाम करने से एसिडिटी समेत पेट संबंधी दिक्कतें नहीं रहतीं। यह आसन बुजुर्गो को विशेष तौर पर अपनाना चाहिए।


सूर्य नमस्कार
बच्चों के विकास, खासतौर पर लंबाई बढ़ाने और आंखों की रोशनी ठीक रखने को सूर्य नमस्कार बेहद जरूरी है।


वृक्ष आसन, सर्वांगासन
इस आसन से शिक्षा और रोजगार संकट के चलते डिप्रेशन में आ रहे युवाओं को भी लाभ मिल सकता है। शारीरिक तौर पर सुगठित होने के लिए यह आसन अच्छे हैं।


ताड़ आसन-चक्र आसन
एकाग्रता के साथ साथ हृदय के लिए यह आसन हर किसी के लिए फायदेमंद हैं।


हल आसन
इस आसन से दिमाग में स्फूर्ति के साथ-साथ शारीरिक चुस्ती भी बनी रहती है। 
चित्त की सभी वृत्तियों को रोकने का नाम योग है




योग अनेक प्रकार के होते हैं। राजयोग , कर्मयोग ,हठयोग , लययोग , सांख्ययोग , ब्रह्मयोग , ज्ञान योग ,भक्ति योग , ध्यान योग , क्रिया योग , विवेक योग ,विभूति योग व प्रकृति - पुरुष योग , मंत्र योग , पुरुषोत्तमयोग , मोक्ष योग , राजाधिराज योग आदि। मगरयाज्ञवल्क्य ने जीवात्मा और परमात्मा के मेल को ही योगकहा है। वास्तव में योग एक ही प्रकार का होता है , दो याअनेक प्रकार का नहीं। 


याज्ञवल्क्य बहुत बड़े ऋषि थे। वे योग विद्या के जनक माने जाते हैं। उन्होंने ही योग को संपूर्ण रूप से पारिभाषितकिया था। याज्ञवल्क्य के मुताबिक जिस समय मनुष्य सब चिंताओं का परित्याग कर देता है , उस समय उसके मनकी , उसकी उस लय अवस्था को योग कहते हैं। अर्थात चित्त की सभी वृत्तियों को रोकने का नाम योग है। 


वासना और कामना से लिप्त चित्त को वृत्ति कहा गया है। यम - नियम आदि की साधना से चित्त का मैल छुड़ा करइस वृत्ति को रोकने का नाम योग है। योग के आठ अंग हैं। उन्हीं की साधना करनी होती है। साधना का अर्थ हैअभ्यास। ऋषि याज्ञवल्क्य के अनुसार यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान और समाधियोग के ये आठ अंग हैं। 


पहले यम , नियम के साथ ही साथ आसन का भी अभ्यास करनाउचित है। स्थिर सुखमासनम् - यानि शरीर न हिले , न डुले , न दुखे, न चित्त में किसी प्रकार का उद्वेग हो , ऐसी अवस्था में बैठने कोआसन कहते हैं। इस के लिए सिद्धासन श्रेष्ठ है। सिद्ध योगीसिद्धासन तथा मुक्त पद्मासन की ही सलाह देते हैं। 


सिद्धासन का अभ्यास करने से योग में शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है। इसके कारण वायुपथ सरल होता है। पद्मासनलगाने से निद्रा , आलस्य , जड़ता और देह की ग्लानि निकल जाती है। पद्मासन में बैठ कर दांत की जड़ में जीभ कीनोक जमाने से अनेक प्रकार की बीमारियां दूर होती हैं। 


इन दो प्रकार के आसनों के अतिरिक्त स्वस्तिकासन , भद्रासन , उग्रासन , वीरासन , योगासन , शवासन , सिंहासन ,मयूरासन , शीर्षासन आदि अनेक प्रकार के आसन भी प्रचलित हैं। मगर वे ध्यान और प्राणायाम के लिए उपयुक्तऔर सहज नहीं हैं। आसन करने का मतलब यही है कि शरीर स्वस्थ रहे। परंतु सदा ही यह स्मरण रखना चाहिए किआसन का सबसे मुख्य उद्देश्य यह है कि मेरूदंड ( पीठ की रीढ़ ) सदा सीधा रहे। इसलिए प्रत्येक बार कम से कमआधा घंटा अवश्य आसन लगाना चाहिए। 


शास्त्रों में लिखा है - जप से ध्यान में सौगुना अधिक फल मिलता है। और ध्यान की अपेक्षा सौगुना अधिक लाभ होताहै - लय योग से। अत : जप आदि करने की अपेक्षा सबको किसी न किसी प्रकार की लय साधना करनी चाहिए । 


साधना की अनेक विधियों में सबसे सरल नादानुसंधान विधि मानी जाती है। योग साधना के स्थान पर उत्तर दिशा कीओर मुंह करके आसन जमाकर बैठ जाना चाहिए। जिन्हें निर्वाण अथवा मुक्ति की इच्छा हो , उन्हें उत्तर दिशा कीओर मुंह करके बैठना चाहिए। परंतु जिन्हें सांसारिक उन्नति की इच्छा हो , उनके लिए तो पूर्व दिशा की ओर मुंहकरके बैठना ही उचित है। 


जिसे जिस आसन का अभ्यास हो , उसे वही आसन लगा कर अपने शरीर को सीधा करके बैठना चाहिए। इसके बादनाभि मंडल में दृष्टि जमाकर कुछ देर तक पलक नहीं गिराना चाहिए। नाभि स्थान में दृष्टि और मन रखने से श्वास कीगति धीरे - धीरे जितनी कम होती जाएगी , मन भी उतना ही स्थिर होता जाएगा। मन स्थिर करने का ऐसा सरलउपाय दूसरा कोई नहीं है। 


पर गीता में शरीर के आसन की अपेक्षा मन की अवस्था को विशेष महत्व दिया गया है। वहां भगवान कृष्ण ने अर्जुनको समझाया है कि सुख और दुख में जो हमेशा समान दृष्टि रखता है , वही योगी श्रेष्ठ है। वैसे ऋषि याज्ञवल्क्य ने भीयम , नियम और आसन आदि की व्यवस्था इसीलिए बताई है , ताकि सामान्य लोग इनके माध्यम से अपने मन कोसाध सकें।

योग का जीवन में महत्व


यह प्रमाणित तथ्य हैं की योग मुद्रा, ध्यान और योग में श्वसन की विशेष क्रियाओं द्वारा तनाव से राहत मिलती है, योग मन को विभिन्न विषयों से हटाकर स्थिरता प्रदान करता है और कार्य विशेष में मन को स्थिर करने में सहायक होता है.


हम मनुष्य किसी चीज़ की ओर तभी आकर्षित होते हैं जब उनसे हमें लाभ मिलता है. जिस तरह से योग के प्रति हमलोग आकर्षित हो रहे हैं वह इस बात का संकेत हैं कि योग के कई फायदे हैं. योग को न केवल हमारे शरीर को बल्कि मन और आत्मिक बल को सुदृढ़ और संतुष्टि प्रदान करता है. दैनिक जीवन में भी योग के कई फायदे हैं, आइये! इनसे परिचय करें.


स्त्री पुरूष, बच्चे, युवा, वृद्ध सभी के लिए योग लाभप्रद और फायदेमंद है. शरीर क्षमताओं एवं लोच के अनुसार योग में किसी परिवर्तन और बदलाव किया जा सकता है. किसी भी स्थिति में योग लाभप्रद होता है.


मन और भावनाओं पर योग


जीवन में सकारात्मक विचारों का होना बहुत आवश्यक है. निराशात्मक विचार असफलता की ओर ले जाता है. योग से मन में सकारात्मक उर्जा का संचार होता है. योग से आत्मिक बल प्राप्त होता है और मन से चिंता, विरोधाभास एवं निराशा की भावना दूर हो जाती है. मन को आत्मिक शांति एवं आराम मिलता है जिससे मन में प्रसन्नता एवं उत्साह का संचार होता है. इसका सीधा असर व्यक्तित्व एवं सेहत पर होता है.


तनाव से मुक्ति (Stress relief through Yoga)

तनाव अपने आप में एक बीमारी है जो कई अन्य बीमारियों को निमंत्रण देता है. इस तथ्य को चिकित्सा विज्ञान भी स्वीकार करता है. योग का एक महत्वपूर्ण फायदा यह है कि यह तनाव से मुक्ति प्रदान करता है. योग मुद्रा, ध्यान और योग में श्वसन की विशेष क्रियाओं द्वारा तनाव से राहत मिलती है, यह प्रमाणित तथ्य है. योग मन को विभिन्न विषयों से हटाकर स्थिरता प्रदान करता है और कार्य विशेष में मन को स्थिर करने में सहायक होता है. तनाव मुक्त होने से शरीर और मन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. कार्य करने की क्षमता भी बढ़ती है.


मानसिक क्षमताओं का विकास (Mental Functions improvement through Yoga)


स्मरण शक्ति एवं बौद्धिक क्षमता जीवन में प्रगति के लिए प्रमुख साधन माने जाते हैं. योग से मानसिक क्षमताओं का विकास होता है और स्मरण शक्ति पर भी गुणात्मक प्रभाव होता है. योग मुद्रा और ध्यान मन को एकाग्र करने में सहायक होता है. एकाग्र मन से स्मरण शक्ति का विकास होता है. प्रतियोगिता परीक्षाओं में तार्किक क्षमताओं पर आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं. योग तर्क शक्ति का भी विकास करता है एवं कौशल को बढ़ता है. योग की क्रियाओं द्वारा तार्किक शक्ति एवं कार्य कुशलता में गुणात्मक प्रभाव होने से आत्मविश्वास भी बढ़ता है.


शरीर में लोच (Physical Functions improvement through Yoga)
योग से शरीर मजबूत और लचीला होता है. योग मांसपेशियों को सुगठित और शरीर को संतुलित रखता है. सुगठित और संतुलित और लोचदार शरीर होने से कार्य क्षमता में भी वृद्धि होती है. कुछ योग मुद्राओं से शरीर की हड्डियां भी पुष्ट और मजबूत होती हैं. यह अस्थि सम्बन्धी रोग की संभावनाओं को भी कम करता है.

सेहत और योग (Yoga and Health)

योग शरीर को सेहतमंद बनाए रखता है और कई प्रकार की शरीरिक और मानसिक परेशानियों को दूर करता है. योग श्वसन क्रियाओं को सुचारू बनाता है. योग के दौरान गहरी सांस लेने से शरीर तनाव मुक्त होता है. योग से रक्त संचार भी सुचारू होता है और शरीर से हानिकारक टाँक्सिन निकल आते हैं. यह थकान, सिरदर्द, जोड़ों के दर्द से राहत दिलाता है एवं ब्लड प्रेसर को सामान्य बनाए रखने में भी सहायक होता है.

कोई टिप्पणी नहीं

Healths Is Wealth. Blogger द्वारा संचालित.