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टी-स्पॉट से जी-स्पॉट तक


टी-स्पॉट से जी-स्पॉट तक

जी-स्पॉट होता है या नहीं और इसका सेक्स लाइफ़ पर क्या असर पड़ता है, यह विवाद का विषय है, पर टी-स्पॉट का यक़ीनन सेक्स लाइफ़ पर नकारात्मक असर पड़ रहा है. अब आप कहेंगे टी-स्पॉट क्या है? तो टी-स्पॉट है हमारे जीवन में टेक्नोलॉजी की हद से ज़्यादा दख़ल. टेक्नोलॉजी के भौतिक असर का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत में सालाना 20 लाख टन ई-कचरा पैदा हो रहा है. रही बात मानसिक असर की तो हालिया सर्वेक्षणों से स्पष्ट हुआ है कि शहरी और क़स्बाई भारत का एक बड़ा हिस्सा रोज़ाना लगभग तीन घंटे का समय फ़ोन और इंटरनेट पर बिता रहा है. भारत में तक़रीबन 21 करोड़ लोग फ़ेसबुक का इस्तेमाल कर रहे हैं. लगभग 17% भारतीय फ़ोन पर अपना कामकाज निपटा रहे हैं और लगभग 26% लोग ऑफ़िस का काम घर पर ले आते हैं. ज़ाहिर है कि टेक्नोलॉजी के बिना काम नहीं चल सकता, लेकिन इसके नेगेटिव-इफ़ेक्ट से ज़रूर बचा जा सकता है. अपनी सेक्स लाइफ़ को रोमांचक बनाना चाहते हैं तो टी-स्पॉट से ब्रेक लेकर जी-स्पॉट की तलाश में लग जाएं. यक़ीनन आपकी सेक्स लाइफ़ अच्छी, बहुत अच्छी हो जाएगी. 
दरअस्ल, टेक्नोलॉजी चीज़ों को आसान और असरदार बनाने के लिए होती है, लेकिन सेक्स के मामले में कुछ उल्टा ही देखने को मिल रहा है. 4-जी के इस दौर में मोबाइल पर भले ही फ्री-कॉलिंग की अवधि बढ़ रही हो, लेकिन दाम्पत्य जीवन में प्रेम-संवाद सिमट रहा है. हम हर पल फ़ेसबुक की वॉल पर नज़र बनाए हुए हैं, पर अपने पार्टनर से दिल की बात कहने का टाइम नहीं है. इंस्टाग्राम पर फ़ोटो-अपलोड की होड़ है, पर अपने पार्टनर को कुछ ग्राम प्यार दे पाने की बेताबी नदारद है. हम टेक्नोलॉजी के एक ऐसे टी-स्पॉट पर खड़े हैं, जहां रिश्तों के बीच कई तरह की अदृश्य दीवारें खड़ी हो रही हैं. इन दीवारों के पीछे इन्हैबिटिड सेक्शुअल डिज़ायर (आईएसडी), इरेक्टल डिस्फ़ंक्शन, फ्रीजिडिटी (काम-शीतलता) जैसी सेक्स-समस्याएं सिर उठा रही हैं. नतीजा यह हो रहा है कि बेडरूम में उपेक्षा भरी करवटें बदली जा रही हैं और बेड की सिलवटों में सिसकारियों की जगह ख़ामोश सिसकियां हिस्सेदारी निभा रही हैं.
साइकियाट्रिक डॉ हेमांगी ढवले कहती हैं,“स्मार्टफ़ोन और लैपटॉप जैसे उपकरणों से निकलनेवाली इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक फ्रीक्वेंसी (ईएमएफ़) कुछ हद तक महिलाओं और पुरुषों की फ़र्टिलिटी को प्रभावित कर सकती है. ईएमएफ़ का असर हमारे ब्रेन के न्यूरोट्रांसमीटर-सिरोटोनिन और एपिनेफ्रिन पर पड़ता है. इनके प्रभावित होने से डिप्रेशन घेर लेता है, जो प्रेम के स्वाद को फीका कर देता है. सेक्स की भावना शरीर से नहीं, दिमाग़ से जन्म लेती है. कोशिश होनी चाहिए कि टेक्नोलॉजी के प्रयोग से हम अपने दिमाग़ को इतना न थका डालें कि बेड पर बेहतर ढंग से परफ़ॉर्म न कर सकें.”
टूटता प्यार का कनेक्शन
पति-पत्नी और वो के बीच आज वो की भूमिका स्मार्टफ़ोन निभा रहा है. बैठे हैं डिनर टेबल पर और नज़रें टिकी हैं फ़ोन-स्क्रीन पर. खाने की तारीफ़ करने के बजाय यूट्यूब पर कोई नई रेसिपी तलाशी जा रही है. यही हाल बेडरूम का है. टीवी चल रहा है, लेकिन कोई देख नहीं रहा, पति-पत्नी मोबाइल पर मस्त हैं. दिल की बात दिलदार को बताने से पहले फ़ेसबुक फ्रेंड या ट्विटर फ़ॉलोअर्स के साथ शेयर की जा रही हैं. अलसाई सुबह स्नूज़ होते मोबाइल अलार्म से किसी तरह उठने का इंतज़ाम कर भी लिया, तो बेड से उठते ही अपने पार्टनर को प्यार भरा किस करने या मॉर्निंग सेक्स का अनूठा आनंद लेने के बजाय बैठ गए वाट्सऐप की खिड़की खोलकर. दिन की शुरुआत को मोबाइल के हवाले कर दिया गया. मोबाइल के टच से बेहतर पार्टनर का प्यार भरा टच निश्चित ही आपके दिन को तरोताज़ा कर जाएगा.
डॉ ऋषिकेश पई, इंफ़र्टिलिटी एक्स्पर्ट, लीलावती हॉस्पिटल, कहते हैं,“तकनीकी रूप से उन्नत होने के साथ ही हम अधिकाधिक सेडेंटरी (निष्क्रिय) बनते जा रहे हैं. एक्सरसाइज़ और ऐक्टिविटी स्पर्म काउंट को बढ़ाता है. लंबे समय तक बैठे रहना फ़र्टिलिटी के लिए स्वाभाविक रूप से बुरा है. आलम यह है कि लोग ऑफ़िस का काम और तनाव घर ला रहे हैं. इस तनाव से शक्तिशाली ऐंटी-इरेक्शन हार्मोन एड्रेनलिन अपना रंग दिखाता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से इरेक्टल डिस्फ़ंक्शन्स का कारण बनता है.” बेड पर स्मार्टफ़ोन और टैबलेट का उपयोग भी हाई एड्रेनलिन की स्थिति में ले जाता है. समझदारी इसी में है कि बेड का इस्तेमाल सिर्फ़ नींद और सेक्स के लिए ही करें.

लैप पर न हो लैपटॉप
मशहूर डर्मैटोलॉजिस्ट डॉ आर खारकर कहते हैं,“शोधों से साफ़ हुआ है कि लगातार गर्मी के संपर्क में रहने पर स्पर्म काउंट और उनकी क्वॉलिटी प्रभावित होती है.” हालिया अध्ययन में यह बात सामने आई है कि एक घंटे तक गोद में रखकर लैपटॉप का उपयोग करने पर स्क्रोटम एरिया में स्क्रोटल तापमान लगभग 5 डिग्री तक बढ़ जाता है. कुछ लोग लैपटॉप के नीचे पैड या तकिया लगाकर ख़ुद को सुरक्षित मानते हैं, लेकिन लैपटॉप न हो तो भी जांघ सटाकर बैठने पर इस एरिया का तापमान बढ़ता ही है. धीरे-धीरे ऑक्सिडेटिव तनाव के साथ-साथ स्पर्म मोटिलिटी (गतिशीलता) और वाइअबिलिटी (व्यावहार्यता) में गिरावट देखी जा सकती है. हालांकि इस मामले में अभी काफ़ी शोध किया जाना बाक़ी है.
इंटरनेट की दोधारी तलवार
इंटरनेट पर सुलभ पॉर्न दोधारी तलवार की तरह है. जहां ड्रग की तरह लत बनकर यह जीवन को तबाह कर सकता है, वहीं कभी-कभार पार्टनर एक साथ पॉर्न देखें, तो यह सेक्स लाइफ़ में नया रोमांच पैदा कर सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि रियल-लाइफ़ में सेक्स का आनंद जितना कम होगा, पॉर्न की तरफ़ रुझान उतना ज़्यादा होगा. पॉर्न का आदी व्यक्ति वास्तविक सेक्स के प्रति अरुचि रखने लगता है. कुछ लोग पॉर्न फ़िल्मों की तकनीक रियल-लाइफ़ में आज़माने की कोशिश करते हैं. वाइब्रेटर या अन्य सेक्स टॉय के ग़लत इस्तेमाल से नुक़सान कर बैठते हैं. 
माहौल हो ख़ुशनुमा
प्रसिद्ध अमेरिकी सेक्स रिसर्चर मास्टर्स ऐंड जॉनसन अक्सर अपने मरीजों का इलाज करते समय उन्हें दो सप्ताह की छुट्टी पर ले जाते थे. इस दौरान उन्हें परिवार से दूर रखा जाता था. पार्टनर को सारा समय एक-दूसरे के साथ बिताना पड़ता था. मास्टर्स और जॉनसन का कहना था कि हम किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि रिश्तों का इलाज करते हैं. हमें भी इस बात को अपने जीवन में उतारना चाहिए. अपने घर, अपने पार्टनर के लिए कुछ मी टाइम रखें. इस दौरान, टीवी, फ़ोन, लैपटॉप से दूर रहें. सप्ताह में कम से कम एक बार पार्टनर के साथ घूमने जाएं. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के शोर को बेडरूम से दूर कर माहौल ख़ुशनुमा और अपीलिंग बनाए रखें.

क्या आप सेक्स से ज़्यादा खाने के बारे में सोचती हैं!

हम महिलाएं भोजन में ज़्यादा कैलोरीज़ को लेकर हमेशा सतर्क रहती हैं. पर ऐसा लगता है कि हम पर इसकी धुन ज़रूरत से कहीं ज़्यादा सवार हो चुकी है. महिलाएं अपने रिश्तों को संवारने से कहीं ज़्यादा मेहनत डायटिंग करने पर करती हैं. ये बात एक सर्वे में सामने आई है. सर्वे में ब्रिटेन की 1,290 ऐसी महिलाओं ने भाग लिया था, जो डाय‌टिंग कर रही थीं. सर्वे में देखा गया कि डाय‌टिंग उनके रिश्ते को कैसे प्रभावित कर रही है. इसके नतीजे चौंकाने वाले थे. लगभग 54 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि वे अपने रिश्ते को निभाने से कहीं ज़्यादा मेहनत डायटिंग के लिए कर रही हैं. लगभग 10 प्रतिशत महिलाओं ने तो ये भी माना कि यदि वे अपने पार्टनर से धोखा करेंगी तो भी उन्हें उतना दुख नहीं होगा, जितना कि अपनी डायटिंग से विचलित होने पर होता है. 
भारतीय महिलाएं
भारतीय परिदृश्य में ये बात कितनी सच है? ''महिलाएं, फिर चाहे वो भारतीय हों या दूसरे किसी देश की, अक्सर ख़ुद को इस दृष्टिकोण से देखती हैं कि पुरुष और दूसरी महिलाएं उनके बारे में क्या विचार रखते हैं.'' यह कहना है काउंसलर व लाइफ़ कोच सुजाता बालकृष्णन का. ''बॉयफ्रेंड/पति यह ज़रूर चाहेगा कि उसकी पार्टनर अपना ध्यान रखने में आलस ना करे. यदि महिलाएं अपने शरीर का अच्छी तरह ध्यान नहीं रखतीं तो उन्हें डिप्रेशन व स्वास्थ्य से जुड़ी दूसरी समस्याएं हो सकती हैं. जैसे-आत्मविश्वास में कमी और इस वजह से उनका रिश्ता प्रभावित हो सकता है. फिर भी यदि हम चाहते हैं कि कोई दूसरा हमें पसंद करे तो उससे पहले हमें ख़ुद को पसंद करना सीखना होगा.'' 
सेक्स विशेषज्ञ डॉ महेंद्र वत्स इस सर्वे को सेक्स के बजाय भारत में महिलाओं की स्थिति से जोड़कर देखते हैं. ''हमारे देश में अधिकतर महिलाएं अपने परिवार के सदस्यों को अपने हाथों से बना खाना खिलाती हैं. वो दिनभर घर और खाना पकाने से जुड़े काम ही करती रहती हैं. ऐसे में उनके दिमाग़ में भोजन के अलावा दूसरा कुछ कैसे आ सकता है. डॉ वत्स बताते हैं फिर इस अध्ययन में तो ऐसी महिलाओं को लिया गया है जो डायटिंग पर थीं. जब आप डायटिंग करते हैं तो ख़ुद को अपने पसंदीदा भोजन से वंचित रखते हैं. ये दमन आनेवाले विस्फोट का संकेत है. ऐसे में तो आप हर वक़्त भोजन के बारे में ही सोचेंगे.''
भोजन खाएं, प्यार करें
नृत्यांगना मल्लिका इनासु इस सर्वे को अजीबोग़रीब मानती हैं. ''भोजन आराम देता है और सेक्स मुक्ति. मुझे नहीं लगता कि जब तक इनमें से किसी एक चीज़ के प्रति उन्हें दीवानग़ी न हो, लोग इनमें से किसी के भी बारे में लगातार सोच सकते हैं.'' वे कहती हैं ,''यदि मैं भूखी हूं, तो तब तक सिर्फ़ भोजन के बारे में ही सोचूंगी, तब तक मेरी भूख न मिट जाए. इसी तरह यदि मेरा मन अपने बॉयफ्रेंड का सामीप्य पाने का है तो मैं उसी के बारे में सोचूंगी. हां, कहा जाता है कि सेक्स के बाद भूख लगती है तो फिर सेक्स के बाद मैं भोजन के बारे में सोचूंगी.''

क्या वाकई जी-स्पॉट का अस्तित्व होता है!

साल 1944 में जर्मन गायनाकोलॉजिस्ट अर्नस्ट ग्रैफ़ेनबर्ग ने महिलाओं के इस सबसे अच्छे दोस्त 'जी-स्पॉट' की खोज की थी और इसका नाम भी उन्हीं के नाम पर रखा गया है. ये वेजाइना में स्थित एक बहुत-ही संवेदनशील हिस्सा बताया जाता है. जहां करोड़ों महिलाएं कहती हैं कि उन्होंने जी-स्पॉट के आनंद का अनुभव लिया है, वहीं इसका अस्तित्व अब तक रहस्य बना हुआ है.

यह अध्ययन कहता है 'ना'
किंग्स कॉलेज लंदन में कुछ समय पहले हुए एक शोध ने दावा किया कि जी-स्पॉट के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं है. ''इस अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि जी-स्पॉट का अस्तित्व व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है.'' यह कहना है टिम स्पेक्टर का, जो इस शोध के को-ऑर्थर हैं. यह शोध ब्रिटेन की ऐसी 1800 महिलाओं के सर्वे पर आधारित है, जो एक जैसी दिखनेवाली और एक जैसी न दिखने वाली जुड़वा थीं. एक जैसी दिखनेवाली जुड़वा बहनों के सभी जीन्स समान होते हैं, जबकि एक जैसी न दिखने वाली जुड़वा बहनों के 50 फ़ीसद जीन्स समान होते हैं. ऐसे में एक जैसी दिखने वाली बहनों में से यदि एक बहन जी-स्पॉट के अनुभव को स्वीकारती है, तो दूसरी को भी वैसा ही महसूस होना चाहिए. पर ऐसा नहीं हुआ.

डॉक्टर्स कहते हैं 'हां'
अधिकतर डॉक्टर्स, जिनसे हमने बात की इस अध्ययन से असहमत थे और उन्होंने कहा कि जी-स्पॉट का अस्तित्व होता है. सेक्शुअल हेल्थ फ़िहज़ीशियन डॉ दीपक जुमानी कहते हैं,''जी-स्पॉट बहुत संवेदनशील और आनंद देने वाला हिस्सा है. इसके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता.'' वे बताते हैं कि कई अध्ययनों से पता चला है कि यह वेजाइना का वह हिस्सा है, जहां वेजाइना के दूसरे हिस्सों की तुलना में कहीं ज़्यादा नर्व सेंटर होते हैं. जब इसे उत्तेजित किया जाता है तो रक्त संचार में बढ़ोतरी की वजह से आनंद महसूस होता है. ''जिन महिलाओं को अपने जी-स्पॉट के बारे में पता नहीं चलता, वे इसके अस्तित्व को नकारती हैं.'' वे बताते हैं, ''पर जी-स्पॉट का पता न चल पाने की प्रमुख वजह हैं धूम्रपान, ड्रिंक करना या फिर तनाव.''

यदि आप सोचते हैं कि सेक्स से दूरी सेक्स की इच्छा को बढ़ाती है तो दोबारा सोचें!

श्रुति कदम* के जीवन में सबकुछ अच्छा चल रहा था-ख़ुशहाल विवाह और अच्छा सेक्स जीवन. एक दिन श्रुति ने तय किया कि कुछ माह के लिए वो सेक्स के प्रति आत्म-संयम बरतेगी. ''उसने एक गुरु की बातों का अनुसरण करते हुए आत्मसंयम बरतना शुरू किया, जिसमें सेक्स से जुड़ा संयम भी शामिल था.'' श्रुति की काउंसलर बताती हैं,''इसके पीछे तर्क यह था कि ऐसा करने से वह इच्छाओं पर नियंत्रण रखना सीखेगी और उनका सेक्स जीवन भी उत्साहजनक हो जाएगा. हालांकिस इस बात से उसके पति सहमत नहीं थे! फिर श्रुति और उनके पति ने काउंसलर से सलाह लेने का मन बनाया.'' 
सेक्स के मामले में आत्मसंयम कठिन होता है. फिर चाहे वो इच्छा से बरता जाए या अनिच्छा से. सेक्स स्वस्थ जीवन शैली का सामान्य हिस्सा है. सेक्सोलॉजिस्ट डॉ प्रकाश कोठारी के अनुसार महिलाओं और पुरुषों दोनों ही के लिए सेक्शुअल संतुष्टि आवश्यक है. ''कोई भी अध्ययन इस बात की पुष्टि नहीं करता कि आत्मसंयम बरतने से सेक्स की इच्छा में बढ़ोतरी होती है.'' यह कहते हुए वो बताते हैं,'' सेक्स से मिलने वाली ख़ुशी केवल प्रदर्शन से ही जुड़ी नहीं होती, बल्कि ये तो साझा होने की ख़ुशी होती है.''
इस मामले में आत्मसंयम से केवल खीझ ही पैदा नहीं होती, बल्कि लंबे समय तक ऐसा करने पर कुछ बीमारियां भी हो सकती हैं. मुंबई के केईएम हॉस्पिटल के सेक्शुअल मेडिसन विभाग के प्रमुख डॉ राजन भोसले कहते हैं कि सेक्शुअल संबंध प्राकृतिक होते हैं और इसके विरुद्ध जाना शरीर के लिए नुक़सानदेह हो सकता है. ''इससे पुरुषों को प्रोस्टैटाइटिस हो सकता है,'' यह चेतावनी है डॉ कोठारी की. वहीं अमेरिका के नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ हेल्थ के यूरोलॉजी प्रोग्राम्स के डायरेक्टर डॉ लेरॉय निबर्ग कहते हैं,''पुरुषों को सामान्यतः होनेवाला प्रोस्टैटाइटिस-नॉन बैक्टेरियल होता है, जिसका कारण है तनाव और अनियमित सेक्शुअल गतिविधि.'' जिसके इलाज में इजेकुलेशन की बारंबारता बढ़ाना भी शामिल है. 
सेक्स और खिलाड़ी
बहुत-से खिलाड़ी मानते हैं कि अपने मैच के कुछ सप्ताह पहले से यदि वे सेक्शुअल संबंध नहीं बनाते हैं तो वे मैच में अच्छा प्रदर्शन कर पाते हैं. लेकिन भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कोच गैरी कर्स्टन का सुझाव है कि मैच से पहले खिलाड़ियों को सेक्शुअल संबंध बनाने चाहिए. वे व्याख्या करते हैं,''सेक्स करने से टेस्टोस्टेरॉन का स्तर बढ़ जाता है. जिससे मज़बूती मिलती है, आक्रामकता आती है. और प्रतियोगात्मक स्वभाव बढ़ता है. यदि सेक्स से लंबे समय तक विरत रहा जाए तो टेस्टोस्टेरॉन का स्तर कम हो जाता है और आक्रामकता में कमी आती है.’’

क्या यह भी एक कारण है सेक्शुअल संबंधों में असंतुष्टि का?
सुमन कुमारी को अपने पहले बच्चे को जन्म देने के बाद लगा कि कुछ समय बाद उनके सेक्सुशअल संबंध सामान्य हो जाएंगे. ''पर हमें अब तक वैसी संतुष्टि नहीं मिल पाई है, जैसे पहले मिला करती थी. मैं उन्हें अपने अंदर महसूस नहीं कर पाती. मुझे समझ में आ रहा है कि ऐसा क्यों हो रहा है. मेरी गायनाकोलॉजिस्ट ने भी इस बात की पुष्टि कर दी. बच्चे के जन्म के बाद मेरी वेजाइना ढीली हो गई थी.''
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वेजाइना का ढीलापन कुछ उतावले कपल्स की एक कल्पना मात्र है, पर ये सेक्शुअल संतुष्टि पाने में इतनी अहम् भूमिका भी नहीं निभाता, जितना कि इसे बताया जाता है. वेजाइना की दीवार लचीली होती है. अतः इसमें प्राकृतिक रूप से पहले और फिर अपने मूल आकार में आ जाने की प्रवृत्ति होती है. ''फिर जब कोई महिला सेक्शुअल संबंधों के प्रति उत्तेजित होती है तो वेजाइना लुब्रिकेटेड (चिकनी) हो जाती है और उसका भीतरी दो तिहाई भाग फैल जाता है,'' यह समझाते हुए सेक्सोलॉजिस्ट डॉ प्रकाश कोठारी कहते हैं,''इसकी वजह से सेक्शुअल संबंधों के दौरान पुरुष को यह महसूस हो सकता है कि ये हिस्सा ढीला हो गया है, जबकि सचमुच ऐसा नहीं हुआ होता है.'' 
वेजाइना में ढीलेपन की दूसरी वजह बच्चे के जन्म को माना जाता है. ''चूंकि नॉर्मल डिलिवरी में बच्चा इसी रास्ते से बाहर आता है, जिससे वेजाइना की दीवारें बहुत ज़्यादा फैलती हैं और ढीली पड़ सकती हैं, पर ऐसा बहुत ही कम महिलाओं में होता है.'' डॉ कोठारी बताते हैं. लेकिन कुछ डॉक्टर्स इस बात से सहमत नहीं हैं. ''वेजाइना का फैला स्वाभाविक है, पर यह ख़ुद अपने सामान्य आकार में आ जाती है.'' यह कहना है साइकोलॉजी टुडे के डॉ आवा कैडेला का. बच्चे के जन्म के बाद वेजाइना को अपने मूल आकार में लौटने में छह महीने का समय लग सकता है.''
एक मिथक ये भी है कि ज़्यादा सेक्स से वेजाइना में ढीलापन आ जाता है. डॉ. कोठारी कहते हैं,''इसका तो सवाल ही पैदा नहीं होता. चाहे कितनी भी बार सेक्सुअल संबंध बनाए जाएं वेजाइना की मांसपेशियां अपने मूल रूप में वापस लौट आती हैं.'' 

अच्छी पकड़ 
सेक्स जीवन में संतुष्टि पाने के लिए सेक्स संबंधी मुद्राओं में बदलाव लाएं. डॉक्टर कहते हैं कि सेक्स के दौरान अपने पैर की एक एड़ी को दूरी एड़ी पर रखें. इस स्थिति में पीनिस पर वेजाइना की पकड़ दूसरी स्थितियों की तुलना में कहीं ज़्यादा होती है. लंबे अंतराल के समाधान के लिए कीगल एक्सरसाइज करें, इससे इस हिस्से की मांसपेशियां मज़बूत होती हैं. योग भी इसके लिए अच्छा रहता है. वज्रोली मुद्रा व अश्विनी मुद्रा का प्रभाव भी कीगल एक्सरसाइज की तरह ही होता है. इन्हें १० सप्ताह तक रोज़ाना करें. इससे आपको बदलाव महसूस होगा.

कुछ अन्य तरीक़े 
ऐसे कुछ तरीक़े भी हैं, जिन्हें अपनाकर महिलाएं अपनी वेजाइना में कसावट लाती हैं. वेजाइनोप्लास्टी एक सर्जिकल तरीक़ा है, जिसमें वेजाइना से अतिरिक्त लाइनिंग को हटाकर व इससे चारों ओर के मुलायम टिशूज़ और मांसपेशियों में कसावट लाकर वेजाइना का ढीलापन दूर किया जाता है. कुछ क्रीम्स भी आती हैं, जिनके प्रयोग से वेजाइना में कसावट आती है. पर केईएम अस्पताल, मुंबई के सेक्सुशल मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष डॉ राजन भासले क्रीम्स पर भरोसा नहीं करते. ''ढीलापन वेजाइना की मांसपेशियों के ढीले होने से आता है. क्रीम्स तो उस हिस्से तक पहुंच ही नहीं पातीं. हां, सर्जरी कसावट लाने में कारगर होती है.''

जब गिर जाए प्यार का सेन्सेक्स

हंगरी मूल के अग्रणी ऐंड्रोक्राइनोलॉजिस्ट हैंस सेले ने ’60 के दशक में जब तनाव की खोज की तब उन्होंने सोचा भी नहीं था कि जिस तनाव को वे शरीर से रिसनेवाला कोई नया हार्मोन समझ रहे हैं एक दिन वह न सिर्फ़ सारी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगा, बल्कि हमारी सेक्स लाइफ़ में भी गहरी सेंध लगा देगा. शरीर विज्ञानियों की भाषा में ‘दबाव में प्रदर्शन करने में मददगार सत्व’ की परिभाषा पा लेने में सफल रहा तनाव अब ताज़ातरीन अध्ययनों से बिल्कुल बेनक़ाब हो चुका है. जहां बहुत से वैज्ञानिक अध्ययनों ने इस बात पर मुहर लगाई है कि सेक्स एक असरदार स्ट्रेस-बस्टर है, वहीं यह भी स्पष्ट हुआ है कि लो लिबिडो यानी कामेच्छा में कमी के लिए भी तनाव ख़तरनाक ढंग से ज़िम्मेदार है. सेक्स लाइफ़ पर तनाव इतने शातिराना ढंग से साइड इफ़ेक्ट छोड़ता है कि ज़रा-सी लापरवाही आपकी सेक्स लाइफ़ को बर्बाद कर सकती है.

लो लिबिडो की समस्या
कंसल्टेंट साइकियाट्रिक व सेक्सोलॉजिस्ट डॉ सागर मूंदड़ा कहते हैं,“तनाव से कभी-कभी डिप्रेशन की समस्या हो जाती है. ऐसे में हमारे शरीर को लगता है कि हम किसी बड़े दबाव में हैं. इस मनोदशा में हमारा शरीर लिबिडो पर ध्यान देने के बजाय हमारे दिल, दिमाग़ आदि पर ज़्यादा ध्यान देता है, क्योंकि हमारे शरीर को ऐसा लगता है कि ये लिबिडो से कहीं ज़्यादा ज़रूरी अंग हैं. इससे लो लिबिडो की समस्या हो जाती है.”
डॉ सागर मूंदड़ा कहते हैं,“पुरुषों में इरेक्शन की प्रक्रिया में पीनिस में अतिरिक्त रक्त प्रवाह की ज़रूरत होती है, लेकिन जब कोई तनाव और चिंता से जूझ रहा हो, तो उसके शरीर की प्रतिक्रिया को नियंत्रित करनेवाले ब्रेन सिग्नल्स प्रभावित होते हैं. ऐसी स्थिति में मस्तिष्क से पीनिस की ओर पर्याप्त रक्त प्रवाहित करने का संदेश प्रेषित करने में बाधा पहुंचती है, जो इरेक्टल डिस्फ़ंक्शन की समस्या के रूप में सामने आता है. यदि समय पर इस समस्या को नियंत्रित नहीं किया जाता है, तो सेक्शुअल परफ़ॉर्मेंस ऐंगज़ाइटी की गंभीर समस्या चपेट में ले लेती है. अक्सर पुरुष इस समस्या को किसी और से शेयर करने में हिचकिचाते हैं और समस्या गंभीर होती जाती है. अपनी झिझक को छोड़कर, समस्या के दुष्चक्र में फंसने के बजाय किसी मनोचिकित्सक या सेक्सोलॉजिस्ट से सलाह लेनी चाहिए. कामेच्छा में कमी की लगभग 90 प्रतिशत समस्या अस्थायी होती है और समय पर उपचार या स्व-प्रयास से इनसे छुटकारा पाया जा सकता है और पूर्ण रूप से संतुष्ट सेक्शुअल लाइफ़ का सुख लिया जा सकता है.” 
तनाव से बाहर निकलने के लिए लोग शराब, सिगरेट या अन्य मादक पदार्थों का सेवन न करें. इससे समस्या और गंभीर हो जाती है. अल्कोहल से शरीर में डिहाइड्रेशन की समस्या पैदा होती है, जो सेक्स का सारा लूब्रिकेशन ग़ायब कर देती है. ऐसे में सेक्स का स्वाभाविक आनंद नहीं मिल पाता है. सिगरेट से शरीर में फ़ैट डिपाजिट की समस्या होती है और प्राइवेट पार्ट्स की ओर रक्त का प्रवाह सही ढंग से नहीं हो पाता है.

तनाव से हार्मोनल ऐब्नॉर्मैलिटी 
ब्रीच कैंडी व जसलोक हॉस्पिटल की पैनल कंसल्टेंट और भारत की मशहूर गायनाकोलॉजिस्ट व इन्फ़र्टिलिटी स्पेशलिस्ट डॉ दुरु शाह कहती हैं,“तनाव के चलते हार्मोनल ऐब्नॉर्मैलिटी होती है. तनाव के दौरान हमारे शरीर से कोर्टिसोल हार्मोन का अधिक मात्रा में और अधिक समय तक रिसाव होने लगता है. हालांकि यह स्टेरॉइड हार्मोन कम मात्रा में शरीर में प्रतिरक्षा प्रणाली को नियंत्रित करने के लिए ग्लूकोनोजेनेसिस के माध्यम से ब्लड-शुगर को बढ़ाने और फ़ैट, प्रोटीन व कार्बोहाइड्रेट के मेटाबॉलिज़्म में सहायक होता है. लेकिन जब लंबे समय तक और अधिक मात्रा में इसका रिसाव होता है, तो यह एस्ट्रोजेन और टेस्टोस्टेरॉन जैसे सेक्स हार्मोन को दबा देता है. इसके चलते कामेच्छा में कमी आती है.”
महिलाओं में तनाव थाइराइड और पिट्यूटरी ग्लैंड्स और ओवरीज़ को प्रभावित करता है. इससे पीरियड्स प्रभावित होता है. कामेच्छा और पीरियड्स का सीधा संबंध होता है. ओव्यलैशन के दौरान महिलाओं में कामेच्छा अधिक प्रबल होती है, लेकिन तनाव के चलते उस दौरान यह इच्छा भी दब जाती है. महिलाओं के मामले में यह पाया गया है कि वे तभी सेक्स का सुख ढंग से ले पाती हैं, जब उनका मूड अच्छा होता है. ज़ाहिर है तनाव में मूड ख़राब रहता है. ऐसे में कामेच्छा भी मंद पड़ती है. तनाव के चलते व्यक्ति में खीझ और आत्महीनता पैदा होती है. जोश ठंडा पड़ जाता है. ऐसे में सेक्स आनंददायी नहीं रह जाता है.

सबसे पहले मूड को करें दुरुस्त 
मसीना हॉस्पिटल व डॉ माचेसवाला काउंसलिंग सेंटर से मनोचिकित्सक डॉ अली अकबर गभरानी कहते हैं,“तनाव हमारे हावभाव और मिज़ाज को नकारात्मक बनाने में योगदान देता है. जब आप प्रसन्नचित्त नहीं होते हैं, तो आपका पार्टनर आपकी ओर सहज आकर्षित नहीं होता है. तनाव के चलते आप अपने पार्टनर से बातचीत करने में रुचि नहीं दिखाते हैं. कुछ मामलों में ऐसा भी होता है कि आप तनाव का कारण बताकर अपने पार्टनर को भी चिंतित नहीं करना चाहते हैं. दोनों ही परिस्थितियों में संवादहीनता की स्थिति पैदा होती है. यह संवादहीनता कामेच्छा घटाती है.”
डॉ गभरानी के अनुसार तनाव के चलते यदि आप कामेच्छा में कमी महसूस कर रहे हों, तो सबसे पहले आप को अपने मूड को दुरुस्त करने की कोशिश करनी चाहिए. बेहतर होगा कि आप शांत होकर बैठ जाएं. हल्का संगीत सुनें. ध्यान करें. संभव हो, तो पांच-दस मिनट टहल आएं. पेट को हमेशा साफ़ रखें. यदि झिझक के चलते आपने समस्या को अधिक गंभीर बना लिया है, तो अच्छा होगा कि किसी अच्छे सेक्स एक्स्पर्ट से परामर्श लें. डार्क चॉकलेट या फिर ख़ूब पका हुआ केला खाएं. इससे मूड बनाने में मददगार डोपामाइन जैसे लव हार्मोन का रिसाव बढ़ता है. योग-प्राणायाम करें. इससे एंर्डोफ़िन का रिसाव होता है, जो तनाव को न्यूट्रल करता है. रोज़ाना लगभग आधा घंटा व्यायाम करें. इससे ब्लड-कैल्शियम बढ़ता है. रोज़ सुबह धूप सेंके. इससे विटामिन डी की ख़ुराक चुस्त होती है जो स्पर्म्स को बढ़ाने में मददगार होती है.

फ़ोर-प्ले ही नहीं, आफ़्टर-प्ले को भी दें अहमियत
महर्षि वात्स्यायन से लेकर पंडित कोक तक ने फ़ोर-प्ले के साथ-साथ आफ़्टर-प्ले की अहमियत को माना है. तनाव से कामेच्छा में आई कमी को दूर करने के लिए इसका सहारा ज़रूर लें. सेक्स के दौरान रोज़ाना नई-नई सेक्स पोज़िशन का प्रयोग करें. सेक्स एक्स्पर्ट का मानना है कि महिलाओं को सेक्स के दौरान फ़ीमेल सुपीरियर पोज़िशन ज़्यादा सुविधाजनक और उन्मुक्त लगती है, क्योंकि इसमें उन्हें ज़्यादा उत्तेजना महसूस होती है. इसी तरह यदि महिला पार्टनर तनाव में है तो फ़ोर प्ले के दौरान पुरुष को उसे हल्का फ़ुट मसाज़ देना चाहिए. सेक्स के बाद करवट बदल कर सोने के बजाय कुछ देर तक बातचीत या बॉडी-प्ले करना चाहिए.
राशि के अनुसार चुनें सेक्स पोज़िशन

आपका राशियों में विश्वास हो न हो, आप उनके आकर्षण से बच नहीं सकतीं. यूनिवर्सिटी ऑफ़ द वेस्ट ऑफ़ इंग्लैंड के सुज़ैन ब्लैकमोर और मैरिएन सीबोल्ड द्वारा वर्ष 2001 में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक़, ज्योतिषशास्त्र का महिलाओं के जीवन पर गहरा असर होता है. निष्कर्ष यह था किः “72 प्रतिशत महिलाएं नहीं मानतीं कि ज्योतिषशास्त्र केवल अंधविश्वास है और तक़रीबन 90 प्रतिशत महिलाएं अपने पार्टनर की राशि पता करती हैं. 78 प्रतिशत महिलाओं ने अपनी राशि के प्यार संबंधों से जुड़ी किताब भी पढ़ी है.”
यदि आप यह स्वीकार लेंगी कि हर राशि का अपना एक तरह का व्यक्तित्व होता है तो आपको समझ आ जाएगा कि यह आपकी सेक्शुअल लाइफ़ को भी प्रभावित करता है. जोआना वोफ़ॉक की किताब सेक्शुअल एस्ट्रॉलॉजीः अ साइन-बाय-साइन गाइड टू योर सेन्शुअल स्टार्स; रैशेल वेनिंग की मोर्ग्ज़ैमः बेबलैंड्स गाइड टू माइंड-ब्लोइंग सेक्स; क्लेयर कावना और जेसिका विट्कस की सेक्सट्रोलॉजीः द एस्ट्रॉलॉजी ऑफ़ सेक्स; स्टेला स्टारस्काय और क्विन कॉक्स की द सेक्सेस; किकी टी की द सेलेस्टियल सेक्सपॉट्स हैंडबुक जैसी ढेरों किताबों में सेक्स और राशि के रिश्ते पर विस्तार से बताया गया है.
अतः यदि आप तय नहीं कर पा रही हैं कि आपको क्या चीज़ पसंद आती है तो हमने किताबों से पता किया है कि आपकी राशि के अनुसार आपको कौन-से मूव्ज़ और पोज़िशन्स पसंद आते हैं. यदि यह बात भी मायने नहीं रखती तो कम से कम ये मूव्ज़ आज रात को दिलचस्प बनाने के काम तो आ ही जाएंगे.

आपकी राशि: मेष (मार्च 21-अप्रैल 20)
आज़माएं: डॉगी पोज़िशन 
मेष राशि की महिलाएं ज़िद्दी होती हैं और उन्हें ध्यान पार्टनर का ध्यान आकर्षित करना बहुत पसंद होता है. डॉगी स्टाइल से आपके पार्टनर को आपके ख़ूबसूरत कूल्हे नज़र आते हैं और उनका ध्यान पूरी तरह से आपको तृप्त करने पर होता है.

आपकी राशि: वृषभ (अप्रैल 21-मई 21)
आज़माएं: मिशनरी पोज़िशन 
इस राशि की महिलाएं काफ़ी कामुक होती हैं. जांचा-परखा मिशनरी पोज़िशन पूरे शरीर से संपर्क करने का मौक़ा देता है, जिससे पार्टनर के शरीर के साथ खेलने का पूरा मौक़ा मिलता है.

आपकी राशि: मिथुन (मई 22-जून 21)
आज़माएं: पिनबॉल विज़ार्ड पोज़िशन 
प्रयोग करना इस राशि का नैसर्गिक गुण है. अतः पिनबॉल विज़ार्ड पोज़ आज़माएं. जिसमें आप अपने कंधों पर सारा वज़न डालकर अपने कूल्हों को उनकी ओर जितना ऊपर हो सके, उतना ऊपर उठाती हैं. वे घुटने के बल बैठकर सही ढंग से आगे बढ़ सकते हैं.

आपकी राशि: कर्क (जून 22-जुलाई 22)
आज़माएं: स्पाइडर पोज़िशन 
संतुलित और ईमानदार, इस राशि की महिलाएं भावनात्मक नज़दीकी पसंद करती हैं. यह स्टाइल आपको अपने पार्टनर के क़रीब होने और उनकी बांहों में महफ़ूज़ होने का एहसास कराता है. एक-दूसरे के सामने मुंह करके बैठ जाएं और उनकी कमर को अपने पैरों के बीच लपेट लें और लुत्फ़ उठाएं सुहाने एहसास का.

आपकी राशि: कन्या (अगस्त 24-सिंतबर 22)
आज़माएं: ऑक्टोपस पोज़िशन 
कन्या राशि की महिलाएं पारंपरिक अंदाज़ वाली होती हैं और परफ़ेक्शन पाने की कोशिश में रहती हैं. ऑक्टोपस पोज़ आज़माएं, जहां आप अपने पार्टनर को ज़मीन पर पैर फैलाकर घुटनों को मोड़कर बैठने के लिए कहती हैं. अब उनके सामने बैठकर पैरों को फैलाएं. एक-एक कर दोनों पैरों को उनके कंधों पर रखें और उन्हें पेनिट्रेट करने दें. इस पोज़िशन में उन्हें बहुत गहरे प्रवेश करने का मौक़ा मिलता है, जिससे आपको भी ज़्यादा आनंद मिलता है.

आपकी राशि: तुला (सितंबर 23-अक्टूबर 23)
आज़माएं: 69 पोज़िशन 
तुला राशि वाले काफ़ी व्यावहारिक होते हैं, लेकिन उन्हें बेडरूम में थोड़ी नाटकीयता पसंद आती है. चूंकि आप संतुलन बनाए रखने में विश्वास करती हैं, इसलिए आपको ऐसी पोज़िशन्स पसंद आती हैं, जहां दोनों पार्टनर्स का प्रयास बराबर का हो. ऐसे में आपके लिए सबसे बेहतरीन पोज़िशन 69 ही होगी.

आपकी राशि: वृश्चिक (अक्टूबर 24-नवंबर 22)
आज़माएं: फ़ेस ऑफ़ पोज़िशन 
वृश्चिक महिलाएं अपने पार्टनर का इज़हार चाहती हैं. अतः फ़ेस-ऑफ़ पोज़िशन आज़माएं, जहां आपके पार्टनर कुर्सी या बेड के किनारे पर बैठते हैं और आप उनकी गोद में बैठती हैं. इस पोज़िशन में आपको अपनी इच्छा के मुताबिक़ मूव करने और पूरा-पूरा लुत्फ़ उठाने का मौक़ा मिलता है.

आपकी राशि: धनु (नवंबर 23-दिसंबर 21)
आज़माएं: शैम्पेन रूम पोज़िशन 
धनु राशि की महिलाओं को सेक्शुअल रोमांच और इसमें रहस्यमयता का पुट भरना पसंद होता है. उन्हें कुर्सी पर बैठने को कहें और उनकी ओर पीठ कर उनकी गोद में बैठ जाएं. चूंकि वे आपके चेहरे के भावों को देख नहीं पाएंगे, तो आपको संतुष्ट करने के लिए वे और भी बेहतर प्रदर्शन करने को प्रोत्साहित महसूस करेंगे.

आपकी राशि: मकर (दिसंबर 22-जनवरी 20)
आज़माएं: बीडीएसएम पोज़िशन (इसमें दासता और अनुशासन मुख्य है)
मकर राशि की महिलाओं को धीमी गति से आगे बढ़ना पसंद है. वे तब तक कोई नई चीज़ नहीं आज़मातीं, जब तक कि वे उसके साथ सहज न महसूस करने लगें. फ़ोरप्ले आपके मामले में बिल्कुल सही ठहरता है. एक बार आप सहज हो जाएं तो ख़ुद को उन्हें समर्पित करने में हर्ज ही क्या है.

आपकी राशि: कुंभ (जनवरी 21-फ़रवरी 18)
आज़माएं: जी-विज़ पोज़िशन 
नयापन इस राशि को आकर्षित करता है. इस स्टाइल में आप ज़मीन पर लेटकर अपने पार्टनर के कंधों पर पैर रख सकती हैं. पैर उठाने से आपकी वेजाइना संकुचित हो जाती है, जिससे उन्हें आपको आनंद देने में और भी मदद मिलती है. इस पोज़िशन में उनका चेहरा आपसे दूर होता है, जिससे आपको उनके चेहरे पर आ रहे भावों का अनुमान लगाने का मौक़ा मिलता है.

आपकी राशि: मीन (फ़रवरी 19-मार्च 20)
आज़माएं: फ्रॉग पोज़िशन 
मीन राशि की महिलाएं आमतौर पर बेडरूम में देने की भूमिका में होती हैं. अपने पार्टनर को लेटने के लिए कहें और उनके ऊपर मेंढक की तरह पैर फैलाकर बैठ जाएं. इस पोज़िशन में आपके शरीर का निचला हिस्सा उनके शरीर के निचले हिस्से के बहुत क़रीब होता है, जिससे आपके क्लिटोरस पर घर्षण होता है. इससे आपको जल्दी ऑर्गैज़्म मिलने की संभावना रहती है.

क्या होता है, जब आप सेक्स नहीं करते?

सेक्स से संबंधित विभिन्ना शोध के आंकड़ों की मानें तो सेक्स को लेकर हमारे समाज में बेहद असंतुलित रुझान नज़र आता है. जहां एक ओर किशोर कम उम्र में ही सेक्स संबंध बनाने लगे हैं, वहीं वह आबादी, क़ायदे से जिन्हें सेक्स को लेकर सक्रिय होना चाहिए, सेक्स से दूर होती जा रही है. तमाम शोधों का निष्कर्ष यह है कि ऐसा हमारी तनावपूर्ण जीवनशैली की वजह से है. ऑफ़िस की व्यस्तता, तनाव, टेक्नोलॉजी की ज़िंदगी में बढ़ती दख़लअंदाज़ी कुछ ऐसे कारण हैं, जो हमारे जीवन से सेक्स के पल कम कर रहे हैं. शुरू-शुरू में यह कमी अखरती है, फिर जल्द ही हम इससे तालमेल बिठा लेते हैं और धीरे-धीरे हमें सेक्स की इतनी ज़रूरत महसूस नहीं होती. आइए, जानते हैं क्या होगा अगर आप सेक्स करना बंद कर देंगे या लंबे-लंबे ब्रेक्स लेने लगेंगे. 

पहले ख़ुद पर और फिर पार्टनर पर से भरोसा डगमगाने लगता है 
ज़्यादातर जोड़ों की ज़िंदगी में सेक्स की कमी का सीधा असर उनके रिश्ते पर होता है. इसका पहला प्रहार आपसी विश्वास पर होता है. यह यूं ही नहीं कहा गया है कि अच्छा सेक्शुअल रिलेशन रिश्तों को जोड़ता है. इस कथन का उल्टा भी उतना ही सही है. यानी सेक्स की कमी रिश्तों को तोड़ सकती है. रिश्ते में रहने की ख़ुशी, संतुष्टि और किसी के द्वारा चाहे जाने या प्यार किए जाने की भावना कम से कमतर होती जाती है. विशेषज्ञों की मानें तो जिस पार्टनर की व्यस्तता के चलते सेक्स संबंध कम हो रहे होते हैं, पहले तो वो गिल्ट महसूस करता है, फिर धीरे-धीरे उसके अंदर की यह भावना ख़त्म होकर इसे सामान्य समझने में बदल जाती है. वहीं दूसरा पार्टनर पहले तो चीज़ों को सहानुभूतिपूर्वक नज़रिए से देखता है, फिर उसे ख़ुद के उपेक्षित किए जाने जैसा लगता है. और यदि चीज़ें नहीं सुधरीं तो वो खीझ से भर जाता है. फिर धीरे-धीरे दोनों के बीच अनबन और छोटे-मोटे झगड़े जैसी बातें आम होने लगती है. 
ये झगड़े दोनों पार्टनर के बीच दूरी लाने का काम करते हैं और अंतत: रिश्ते की सुरक्षा भी दांव पर लग जाती है. साइकोलॉजिस्ट और सेविंग योर मैरिज बिफ़ोर इट स्टार्ट्स के लेखक लेस पैरोट के अनुसार,‘‘सेक्सलेस कपल्स में ऑक्सिटोसिन जैसे बॉन्डिंग हार्मोन्स का स्तर कम हो जाता है. इतना ही नहीं उनमें यह डर भी घर करने लगता है कि कहीं पार्टनर अपनी सेक्शुअल ज़रूरतें पूरा करने के लिए किसी और के प्रति तो नहीं आकर्षित हो रहा. इससे रिश्ते में संदेह की भावना जन्म लेने लगती है.’’ हालांकि वे यह भी कहते हैं,‘‘ऐसा ज़रूरी नहीं है कि हर सेक्सलेस कपल असंतुष्ट या नाख़ुश हो. सेक्स आपसी घनिष्टता का महज़ एक एक्सप्रेशन है. यदि आप अपने पार्टनर के साथ अंतरंग समय बिताने के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं तो चुंबन, गिफ़्ट्स, तारीफ़ों और यूं ही अचानक उसका हाथ पकड़कर कोई बात छेड़कर, उसे इम्पॉर्टेन्ट महसूस करवा सकते हैं.’’ 


ऐसा लगता है कि दुनियाभर का तनाव आपको सौंप दिया गया हो 
यह कोई सीक्रेट नहीं है कि सेक्स एक बेहतरीन स्ट्रेस बस्टर है. यदि आप और आपके पार्टनर नियमित रूप से सेक्स संबंधी गतिविधियों के लिए समय निकालते हैं तो तनाव दूर हो जाता है. यह आपने भी अनुभव किया होगा कि जैसे ही आप लंबे समय तक सेक्स से दूरी बना लेते हैं, स्ट्रेस लेवल में बढ़ोतरी होने लगती है. आर्काइव्स ऑफ़ सेक्शुअल बिहेवियर नामक एक जर्नल में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ लंबे समय तक सेक्स से दूर रहने पर महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक डिप्रेस्ड महसूस करती हैं. हालांकि उस रिपोर्ट में एक तथ्य पर एक्स्पर्ट्स एक राय नहीं हैं. दरअस्ल, उस रिपोर्ट में लिखा गया था कि जिन महिलाओं के पार्टनर कंडोम पहनकर सेक्स करते हैं, उनका स्ट्रेस लेवल उन महिलाओं की तुलना में अधिक होता है, जिनके पार्टनर बिना कंडोम सेक्स करते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि पुरुषों के स्पर्म में मेलाटोनिन, सेरोटोनिन और ऑक्सिटोसिन जैसे मूड बूस्टिंग कम्पाउंड्स होते हैं. इस शोध में भले ही कंडोम के बिना सेक्स को तनाव भगानेवाले बताया गया है, सच तो यह है कि अनप्रोटेक्टेड सेक्स के अपने अलग ख़तरे हैं. ये कई बार तनाव बढ़ानेवाले साबित होते हैं. 

सेक्स से दूर होते ही सर्दी-खांसी आपसे नज़दीकी बढ़ाने लगती है 
यह तो आपने सुना ही होगा कि नियमित रूप से सेक्स करने से हमारे शरीर की इम्यूनिटी बढ़ती है. पुरुषों की तुलना में महिलाओं में सेक्स और इम्यूनिटी का संबंध ख़ासा तगड़ा होता है. इस तरह देखें तो कम सेक्स या न के बराबर सेक्स बीमारियों को आमंत्रित कर सकती है. पेन्सल्वेनिया की विल्किस-बेयर यूनिवर्सिटी के रिसचर्स ने पाया कि जो लोग नियमित रूप से सप्ताह में एक या दो बार सेक्स का आनंद लेते हैं, उनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता सेक्स से दूर रहनेवाले (चाहे किसी भी वजह से) लोगों की तुलना में 30% अधिक होती है. आप ख़ुद भी यह फ़र्क़ महसूस कर सकते हैं, याद करें जब आपने आख़िरी बार सेक्स से लंबा ब्रेक लिया था, तब सर्दी-खांसी जैसी बीमारियां आपको कुछ ज़्यादा ही परेशान कर रही थीं. सर्दी-खांसी तो आम समस्या हो गई. डॉक्टर्स की मानें तो यदि आपके जीवन में प्यार भरे रूमानी पलों का अकाल पड़ जाता है तो शरीर उन हार्मोन्स का स्राव कम कर देता है, जो हमारे हृदय की सेहत के लिए अच्छे होते हैं. यानी आपको दिल की बीमारियों से भी जूझना पड़ सकता है. 
पुरुषों के मामले में यह देखने मिला है कि जो पुरुष सेक्स में कम रुचि लेते हैं, उन्हें दूसरों के मुक़ाबले प्रोस्टेट कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है. अमेरिकन यूरोलॉजिकल असोसिएशन ने गहन अध्ययन के बाद यह बताया है कि नियमित रूप से सेक्स करनेवाले पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर की संभावना 20% तक कम हो जाती है. इसका कारण यह है कि इजैकुलेशन के समय सीमन के साथ-साथ वो केमिकल्स भी बाहर आ जाते हैं, जिनसे प्रोस्टेट को नुक़सान पहुंचने की संभावना हो सकती है. 


चिड़चिड़ापन आपका पक्कावाला दोस्त बन जाता है 
अच्छा सेक्स हमारी मानसिक स्थिति को सामान्य बनाए रखने में बड़ा मददगार होता है. एक स्कॉटिश अध्ययन की मानें तो जो लोग सप्ताह में एक या दो बार सेक्स करते हैं, वे सेक्स से सन्यास लेनेवालों की तुलना में कहीं ज़्यादा ख़ुश रहते हैं. दरअस्ल, सेक्स के दौरान मस्तिष्क फ़ील-गुड केमिकल्स रिलीज़ करता है. एन्डॉर्फ़िन और ऑक्सिटोसिन नामक ये केमिकल्स हमें ख़ुशनुमा एहसास कराते हैं. यह आंतरिक ख़ुशी हमारे चेहरे पर भी झलकती है. वहीं जिन लोगों की सेक्स लाइफ़ अच्छी नहीं चल रही होती है वे थोड़े चिड़चिड़े और झक्की बन जाते हैं. वे अपना आप बहुत जल्दी खो बैठते हैं. 

पहले आप सेक्स से दूरी बनाते हैं, फिर सेक्स आपसे बेवफ़ाई करने लगता है 
यदि आप काम की व्यस्तता या किसी अन्य कारण से सेक्स को इग्नोर करते हैं तो धीरे-धीरे सेक्स करने की इच्छा भी आपको नज़रअंदाज़ करने लगती है. यानी सेक्स से परहेज़ का सीधा-सीधा असर आपकी कामेच्छा पर पड़ता है. वैसे सेक्स महिलाओं की तुलना में पुरुषों से अधिक रूठता है. अब इसका मतलब यह है कि ‌यदि महिला-पुरुष सामान रूप से सेक्स से दूरी बनाते हैं तो पुरुषों की कामेच्छा अधिक प्रभावित होती है. पुरुषों द्वारा अपने प्राइवेट पार्ट्स का इस्तेमाल न करने से वे इरेक्टाइल डिस्फ़ंक्शन की समस्या से दो-चार हो सकते हैं. ऐसा हम अपने मन से नहीं कह रहे हैं, यह कहना है अमेरिकन जरनल ऑफ़ मेफडिसिन की एक स्टडी रिपोर्ट का. वहां यह भी सलाह दी गई है कि यदि पुरुषों को सेक्स करने का समय नहीं मिल पा रहा है तो वे मास्टरबेशन यानी हस्तमैथुन का सहारा लेकर अपनी कामेच्छा को सजीव बनाए रख सकते हैं. 
वहीं उन महिलाओं, जिन्होंने सेक्स से लंबी छुट्टी ले रखी है, के लिए भी थोड़ी बुरी ख़बर है. यदि आपकी उम्र 50 के क़रीब है और आप सेक्शुअली ऐक्टिव नहीं हैं तो इस बात की काफ़ी संभावना है कि आपकी वेजाइना सेक्स को लेकर उतनी उत्तेजित महसूस न करे. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सेक्शुअली निष्क्रिय रहने से वेजाइना की दीवारें पतली और कमज़ोर हो जाती हैं. इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि यदि कभी-कभार सेक्स करते भी हैं तो उतना आनंद महसूस नहीं हो.

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