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युवाओं को तनाव रोगी बना रहा स्मार्टफोन

युवाओं को तनाव रोगी बना रहा स्मार्टफोन
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युवाओं को तनाव रोगी बना रहा स्मार्टफोन


लखनऊ: आज कल ज्यादातर युवा सोशल साइट्स पर ज्यादा क्रियाशील रहते हैं, जिसकी वजह से वह अपने परिवार से दूर होते जाते हैं तथा धीरे-धीरे तनाव से ग्रसित होते जाते हैं। स्मार्टफोन और सोशल साईट्स एवं विभिन्न सोशल ऐप्स ऐसे भी हैं जो युवाओं को तनाव रोगी बना रहे हैं। स्मार्टफोन पर युवा पूरे दिन इंटरनेट से जुड़े रहते हैं तथा जो व्यर्थ की जानकारी नहीं चाहिए होती है वह भी उन्हें प्राप्त होती रहती है। यह बातें बेंगलूर से न्यूरोलोजी के प्रोफेसर प्रो. डा. बी.एस.शंकरनारायण राव ने केजीएमयू में आयोजित व्याख्यान में कही। वह केजीएमयू के फिजियोलोजी विभाग के 107 वें स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।
प्रो. राव ने बताया कि शरीर के विभिन्न अंगो से अथवा विभिन्न पर्यावरण कारकों से प्राप्त सूचना मानव दिमाग के विभिन्न हिस्सों में एकत्रित होती है। हम जो कुछ भी सीखते हैं देखते हैं वो हमारे दिमाग के ऊपर निर्भर करता है। किन्तु कुछ न्यूरोलाॅजिकल या ब्रेन डिसआर्डर की वजह से हमारे दिमाग की कार्य क्षमता प्रभावित होती है और हम अपने विभिन्न प्रकार के कार्यों को उचित प्रकार से नहीं कर पाते हैं। प्रो. शंकरनारायण राव ने कहा कि ब्रेन डिसआर्डर दो प्रकार के होते हैं न्यूरोलाॅजिकल एवं मानसिक। जिन्हे प्रारम्भिक अवस्था में पहचान पाना कठिन होता है। ज्यादातर ब्रेन डिसआर्डर तनाव से सम्बंधित होते हैं। जब हम लम्बे वक्त तक तनाव में रहते हैं और उसे दूर करने का प्रयास नहीं करते या किसी वजह से हम तनाव से बाहर नहीं निकल पाते हैं तो धीरे—धीरे हम अवसाद से ग्रसित हो जाते हैं।

आज हमारे समाज में लड़के-लड़कियों की जनन उम्र भी समय से पहले आती जा रही है। इसका कारण भी इन अत्याधुनिक चीजों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल है। आज कल बच्चे इंटरनेट पर ज्यादा से ज्यादा देर तक रहते हैं, जिससे वे विभिन्न प्रकार की सेक्सुअल जानकारी एक​त्रित करते हैं तथा विभिन्न प्रकार की ऐसी साइट को देखते हैं जो सेक्स को बढ़वा देने वाली होती हैं। इसकी वजह से उनके दिमाग द्वारा उन हर्मोन्स का स्राव होने लगता है जो उनकी जनन क्षमता को समय से पहले विकसित करने लगता है।

बच्चों को मोबाइल से रखें दूर
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बच्चों के दिमाग का विकास 18 से 21 वर्ष तक होता रहता है तथा इस अवस्था तक वो सही निर्णय करने में असमर्थ होते हैं ऐसे में उन्हें अपने अभिभवाकों का ज्यादा से ज्यादा सहयोग चाहिए। हमें 8 साल तक के बच्चों को मोबाइल फोन नहीं देना चाहिए इससे उनके दिमाग के विकास में गतिरोध उत्पन्न होता है। इस प्रकार हम देखें तो विभिन्न शारीरिक बीमारियों और सामाजिक दोषों का कारण तनाव है। तनाव के प्रबंधन पर हमें ध्यान देना होगा कि हम किस प्रकार की जीवन शैली को अपनाएं, जिससे हम कम से कम तनाव में रहे।
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तनाव दूर करने के लिए हमें योगा, ध्यान, टहलना और शारीरिक श्रम करना चाहिए। इससे हमारे दिमाग में अच्छे हार्मोन्स का स्राव होता है जो हमें तनाव से मुक्त करता है। दिमाग में विभिन्न प्रकार के हार्मोन्स के कम स्राव होने से भी लोगों को पैरालिसिस का अटैक हो सकता है तथा यदि किसी केमिकल का स्राव ज्यादा होता है तो भी उसके दिमाग में इलेक्ट्रीकल एक्टिविटी बढ़ जाता है, जिससे वह व्यक्ति उत्तेजना का शिकार हो सकता है। अवसाद से ग्रसित व्यक्ति को ठीक करने में दवा से ज्यादा उसके आस पास का माहौल एवं पर्यावरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि हमें तनाव का प्रबंधन सही ढंग से करना होगा ताकी हम तनाव मुक्त रह सके और विभिन्न प्रकार के मानसिक परेशानियों के साथ ही साथ शारीरिक परेशानियों से भी बच सके।

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