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सेक्स में पहल करने से क्यों कतराती हैं महिलाएं



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सेक्स में पहल करने से क्यों कतराती हैं महिलाएं 


सेक्स पर न जाने कितनी बातें कही और लिखी जाती रही हैं. इसके बावजूद कुछ धारणाएं ऐसी हैं, जो आज भी ज्यों की त्यों बरक़रार हैं, उसी में से एक है- स्त्रियों का सेक्स में पहल करने से कतराना. आइए, इसी विषय से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर एक नज़र डालते हैं.

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कहते हैं, पुरुषोें के लिए सेक्स की प्राथमिकता अहम् होती है, जबकि महिलाओं के साथ ऐसा नहीं है. महिलाएं सेक्स से कहीं ज़्यादा भावनाओं को महत्व देती हैं. ऐसे में महिलाओं द्वारा सेक्स में ख़ुद से आगे न बढ़ने के कई कारण हो सकते हैं, जैसे- सेक्स की इच्छा न होना, पार्टनर से मतभेद, बीमारी, घर-बाहर का मानसिक-शारीरिक बोझ, थकावट, नारी सुलभ शर्म-संकोच, सेक्स को लेकर ग़लतफ़हमियां या भ्रांतियां, सदियों से चली आ रही सोच या धारणा कि स्त्रियों को पहल नहीं करनी चाहिए इत्यादि. ऐसी तमाम बातें रही हैं, जो स्त्रियों को सेक्स में पहल करने से रोकती हैं.

इसी विषय पर हमने डॉ. अनिल पाटिल (इंफर्टिलिटी एंड सेक्स स्पेशलिस्ट) और डॉ. राजीव आनंद (मैरिज काउंसलर और सेक्सोलॉजिस्ट) से बात की. आइए, इस मुद्दे के बारे में विस्तार से जानने की कोशिश करते हैं. डॉ. पाटिल बेहद बेबाक ढंग से अपनी बात रखते हुए कहते हैं कि भारतीय संस्कृति के बारे में गहराई से देखेंगे, तो पाएंगे कि हज़ारों साल पहले जब कामसूत्र लिखा गया था, तब उसमें काम जीवन से जुड़े हर पहलू और आसनों का ज़िक्र किया गया था. उस दौर में गणिकाएं उन लड़कियों को जिनकी शादी होनेवाली होती थीं, उन्हें सेक्सुअलिटी के बारे में संपूर्ण जानकारी, पति को रिझाने और कामसूत्र से जुड़े विभिन्न विषयों के बारे में समझाती और सिखाती थीं. लेकिन आज स्थिति बिल्कुल बदल गई है. समाज में एक वर्ग ऐसा है, जो सेक्स के बारे में खुलकर बात करता है, तो दूसरा वर्ग इससे परहेज़ करता है. इन सबके लिए बेहद ज़रूरी है सेक्स एजुकेशन.

आज भी सेक्स के मामले में हम पूरी तरह से खुलकर बात नहीं करते, उस पर आप स्त्री हैं, तो और भी दोहरा मापदंड झेलना पड़ता है. आज केवल 5% महिलाएं होंगी, जो सेक्स में अपनी इच्छा और अनिच्छा जतलाती हैं, जबकि 95% चुप रहना और कतराने वाला रवैया अपनाती हैं. सेक्स में पहल करने में कतराने की सबसे बड़ी वजह संस्कृति का डर, आधा-अधूरा सेक्सुअल नॉलेज, कहीं पति कैरेक्टर पर उंगली न उठाए आदि भी रहती हैं.


आइए, इससे जुड़े अन्य पहलुओं को भी देखते हैं, जिनके कारण महिलाएं सेक्स में पहल करने से हिचकिचाती हैं. 
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इच्छा की कमीः कई बार महिलाओं की सेक्स करने की इच्छा नहीं रहती. इसकी वजह दिनभर के काम की थकान, कोई मानसिक परेशानी या फिर और भी कई कारण हो सकते हैं. साथ ही वे इस संशय से भी घिरी रहती हैं कि कहीं पार्टनर का मूड न बन जाए? इसलिए भलाई इसी में है कि पहल न की जाए.

आपसी मतभेदः अक्सर पति-पत्नी आपसी कलह, छोटे-मोटे झगड़े या फिर ईगो आदि को सेक्सुअल रिलेशन में हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं. पार्टनर से नाराज़गी उन पर इस कदर हावी रहती है कि वे किसी भी क़ीमत पर समझौता करने को तैयार नहीं रहतीं. इन सबका असर उनकी लव लाइफ पर भी पड़ने लगता है.

ग़लतफ़हमी व भ्रांतिः अब जहां एक तबका लीक से हटकर सेक्स के बारे में खुलकर अपने विचार रख रहा है, तो वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं, जो इस बारे में कुछ भी कहने-सुनने से परहेज़ करते हैं. ऐसे में आज भी सेक्स से जुड़ी कई तरह की भ्रांतियों व ग़लतफ़हमियों के शिकार ज्यों के त्यों बने हुए हैं. इसी फेहरिस्त में एक भ्रांति यह भी है कि सेक्स में महिलाओं को पहल नहीं करनी चाहिए. इसे ग़लत माना जाता है. यहां तक कि पार्टनर आपके चरित्र पर भी शक कर सकता है. दांपत्य जीवन में दरारें आ सकती हैं…, इस तरह की समस्याओं के बारे में सोचते हुए महिलाएं पहल न करना ही श्रेयस्कर समझती हैं.

अस्वस्थ होनाः कई बार छोटी-मोटी बीमारी, जैसे- सर्दी-खांसी, बुख़ार आदि के कारण भी रिलेशन बनाने की इच्छा महिलाओं की नहीं होती है.

प्रतिबंधित धारणाएंः हम कितने भी आधुनिक हो जाएं, पर आज भी हमारे समाज में महिलाओं को लेकर कुछ ऐसी धारणाएं हैं, जिनमें यह माना जाता है कि कुछ कार्य स्त्रियों को नहीं करने चाहिए. उसी में से एक सेक्स में पहल करने को भी देखा जाता है. साथ ही जाने-अनजाने में सामाजिक रोक, पाबंदी और बरसों से चले आ रहे संस्कार नारी को पहल करने से रोक देते हैं.

बेमेल जोड़ीः यह ज़रूरी नहीं कि हर किसी को सही जीवनसाथी मिले. पति का ख़्वाबों के राजकुमार जैसा न होना या फिर ज़बर्दस्ती शादी या अनिच्छा से जोड़ा गया रिश्ता भी सेक्सुअल लाइफ को बुरी तरह से प्रभावित करता है. पति का साधारण या फिर श्याम वर्ण का होना और पत्नी का बेइंतहा ख़ूबसूरत होना भी पत्नी को पहल करने से रोकता है, क्योंकि उसके मन में कहीं न कहीं इस बात की फांस रहती ही है.

बच्चे-परिवार को प्राथमिकताः ऐसी महिलाओं की कमी नहीं है, जो अपने जीवन में बच्चों और परिवार को पति व अपनी सेक्सुअल लाइफ से अधिक महत्व देती हैं. अक्सर देखा गया है कि जब नारी मां बन जाती है, तो उसकी पूरी दुनिया काफ़ी हद तक बच्चे के इर्द-गिर्द सिमट जाती है. उस पर पत्नी काफ़ी घरेलू व पारिवारिक मूूल्यों को अहमियत देनेवाली है, तो स्थिति और भी सोचनीय हो जाती है.

धार्मिक प्रवृत्तिः कुछ महिलाएं बचपन से ही पूजा-पाठ और धार्मिक कर्मकांड आदि में पूर्ण रूप से समर्पित रहती हैं. यही सिलसिला शादी के बाद भी बरक़रार रहता है. इनमें से कुछेक की नज़र में सेक्स केवल वंश बढ़ाने यानी बच्चा पैदा करने के लिए ही किया जाना चाहिए, ऐसी सोच रहती है. इसी के चलते वे सेक्स से जुड़े अन्य ख़ूबसूरत पहलुओं को नकार देती हैं.


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डॉ. आनंद तस्वीर के दूसरे पहलू से रू-ब-रू कराते हैं. उनका मानना है कि हमारा सामाजिक ढांचा ही इस तरह का रहा है कि पुरुष बचपन से ही ऐसे माहौल में पले-बढ़े होते हैं कि उनकी पसंंद और इच्छा को सर्वोपरि माना जाता है. उस पर अधिकतर पति अपनी पत्नियों को भोग और उनकी इच्छाओं की पूर्ति का ज़रिया मानते हैं. उनकी यह सोच रहती है कि स्त्री का धर्म है पति को ख़ुश रखना. इसमें लड़के के माता-पिता और परिवार का दबाव भी कुछ इसी तरह का रहता है. इन्हीं सभी कारणों से नारी अपनी इच्छाओं के बारे में न खुलकर सोच पाती है और न ही कह पाती है. ऐसे में उसके लिए सेक्सुअल रिलेशन मशीनी तौर पर किया गया कार्य बनकर रह जाता है. यही बातें उसके अंतर्मन को भी आहत करती हैं. स्वाभाविक-सी बात है, ऐसी मानसिकता के परिप्रेक्ष्य में भला किसकी इच्छा होगी सेक्स में पहल करने की. यदि पति केयरिंग नेचर का, पत्नी की भावनाओं को समझनेवाला और उसे उचित मान-सम्मान देनेवाला हो, तो स्थिति बिल्कुल बदल जाती है. इसलिए यहां पर बात सेक्स में पहल करने की नहीं है, बल्कि पुरुषों द्वारा पत्नी को, उसके तन के साथ-साथ मन से जुड़ी भावनाओं को समझने और उसकी कद्र करने की है.

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